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अनुशासन पर्व · अध्याय 244

महेश्वर द्वारा उमा को वैराग्य का उपदेश

महेश्वर उमा से कहते हैं कि निर्वाण उसी को मिलता है जो संसार से उद्विग्न होता है, और धन, आसक्ति तथा तृष्णा के दुःखों और स्वजनों, सम्पत्ति तथा जीवन की अनित्यता का वर्णन करते हैं। उमा पूछती हैं कि बुढ़ापा और मृत्यु कैसे टल सकते हैं; वे उत्तर देते हैं कि मोक्ष के सिवा कोई उपाय नहीं, क्योंकि काल सब प्राणियों को बहा ले जाता है। अन्त में वे दिखाते हैं कि अनित्यता के चिन्तन से उद्वेग, फिर वैराग्य और फिर शान्ति मिलती है।

अध्याय 243अध्याय-सूचीअध्याय 245

महेश्वर उवाच

श्लोक 1 (13.244.1)

अनुद्विग्नमतेर्जन्तोरस्मिन्संसारमण्डले । शोकव्याधिजरादुःखैर्निर्वाणं नोपपद्यते ॥

anudvignamaterjantorasminsaṃsāramaṇḍale | śokavyādhijarāduḥkhairnirvāṇaṃ nopapadyate

इस संसार-मण्डल में जिस प्राणी का मन कभी उद्विग्न नहीं होता, वह शोक, रोग, बुढ़ापे और दुःखों के बीच रहता हुआ भी निर्वाण नहीं पाता।

श्लोक 2 (13.244.2)

तस्मादुद्वेगजननं मनोऽवस्थापनं तथा । ज्ञानं ते सम्प्रवक्ष्यामि तन्मूलममृतं हि वै ॥

tasmādudvegajananaṃ mano'vasthāpanaṃ tathā | jñānaṃ te sampravakṣyāmi tanmūlamamṛtaṃ hi vai

इसलिए मैं तुम्हें वह ज्ञान बताऊँगा जो संसार के प्रति उद्वेग जगाता और मन को स्थिर करता है; वही अमरत्व का मूल है।

श्लोक 3 (13.244.3)

शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसेदिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

śokasthānasahasrāṇi bhayasthānaśatāni ca | divasedivase mūḍhamāviśanti na paṇḍitam

शोक के हज़ारों कारण और भय के सैकड़ों कारण प्रतिदिन मूर्ख के भीतर घुसते हैं, पण्डित के नहीं।

श्लोक 4 (13.244.4)

नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते । अहो दुःखमिति ध्यायञ्शोकस्य पदमाव्रजेत् ॥

naṣṭe dhane vā dāre vā putre pitari vā mṛte | aho duḥkhamiti dhyāyañśokasya padamāvrajet

धन या पत्नी के नष्ट होने पर, अथवा पुत्र या पिता के मरने पर, "हाय, कैसा दुःख!" यह सोचता हुआ मनुष्य शोक के स्थान में जा पड़ता है।

श्लोक 5 (13.244.5)

द्रव्येषु समतीतेषु ये शुभास्तान्न चिन्तयेत् । ताननाद्रियमाणस्य शोकबन्धः प्रणश्यति ॥

dravyeṣu samatīteṣu ye śubhāstānna cintayet | tānanādriyamāṇasya śokabandhaḥ praṇaśyati

वस्तुओं के बीत जाने पर उनके जो सुख थे उनका चिन्तन न करे; जो उनका आदर नहीं करता, उसका शोक का बन्धन टूट जाता है।

श्लोक 6 (13.244.6)

सम्प्रयोगादनिष्टस्य विप्रयोगात्प्रियस्य च । मानुषा मानसैर्दुःखैः संयुज्यन्तेऽल्पबुद्धयः ॥

samprayogādaniṣṭasya viprayogātpriyasya ca | mānuṣā mānasairduḥkhaiḥ saṃyujyante'lpabuddhayaḥ

अनिष्ट के संयोग और प्रिय के वियोग से अल्पबुद्धि मनुष्य मानसिक दुःखों से जुड़ जाते हैं।

श्लोक 7 (13.244.7)

मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति । सन्तापेन च युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ॥

mṛtaṃ vā yadi vā naṣṭaṃ yo'tītamanuśocati | santāpena ca yujyeta taccāsya na nivartate

जो मरे हुए या खोए हुए बीते पदार्थ के लिए शोक करता है, वह सन्ताप से जुड़ता है, और वह वस्तु उसके लिए नहीं लौटती।

श्लोक 8 (13.244.8)

उत्पन्नमिह मानुष्ये गर्भप्रभृति मानवम् । विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥

utpannamiha mānuṣye garbhaprabhṛti mānavam | vividhānyupavartante duḥkhāni ca sukhāni ca

इस लोक में जन्मे मनुष्य के पास गर्भ से ही अनेक प्रकार के दुःख और सुख आते रहते हैं।

श्लोक 9 (13.244.9)

तयोरेकतरो मार्गो यद्येनमभिसंनमेत् । सुखं प्राप्य न संहृष्येन्न दुःखं प्राप्य संज्वरेत् ॥

tayorekataro mārgo yadyenamabhisaṃnamet | sukhaṃ prāpya na saṃhṛṣyenna duḥkhaṃ prāpya saṃjvaret

उन दोनों में से कोई भी मार्ग यदि उसके सामने आ झुके, तो वह सुख पाकर हर्ष से फूल न उठे और दुःख पाकर सन्ताप से न जले।

श्लोक 10 (13.244.10)

दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते । अनिष्टेनान्वितं पश्येद्यथा क्षिप्रं विरज्यते ॥

doṣadarśī bhavettatra yatra snehaḥ pravartate | aniṣṭenānvitaṃ paśyedyathā kṣipraṃ virajyate

जिस वस्तु में स्नेह उत्पन्न हो रहा हो, उसमें दोष देखे; उसे अनिष्ट से जुड़ा हुआ देखे, जिससे वह शीघ्र ही उससे विरक्त हो जाए।

श्लोक 11 (13.244.11)

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ । समेत्य च व्यपेयातां तद्वज्ज्ञातिसमागमः ॥

yathā kāṣṭhaṃ ca kāṣṭhaṃ ca sameyātāṃ mahodadhau | sametya ca vyapeyātāṃ tadvajjñātisamāgamaḥ

जैसे महासागर में दो लकड़ियाँ मिलती हैं और मिलकर फिर अलग हो जाती हैं, वैसा ही स्वजनों का मिलन है।

श्लोक 12 (13.244.12)

अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः । स्नेहस्तत्र न कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवम् ॥

adarśanādāpatitāḥ punaścādarśanaṃ gatāḥ | snehastatra na kartavyo viprayogo hi tairdhruvam

वे अदृश्य से आकर फिर अदृश्य हो जाते हैं; उनमें स्नेह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनसे बिछड़ना निश्चित है।

श्लोक 13 (13.244.13)

कुटुम्बपुत्रदारांश्च शरीरं धनसञ्चयम् । ऐश्वर्यं स्वस्तिता चेति न मुह्येत्तत्र पण्डितः ॥

kuṭumbaputradārāṃśca śarīraṃ dhanasañcayam | aiśvaryaṃ svastitā ceti na muhyettatra paṇḍitaḥ

कुटुम्ब, पुत्र और पत्नियाँ, शरीर, धन का संचय, ऐश्वर्य और कुशल-क्षेम: इनमें पण्डित मोह में न पड़े।

श्लोक 14 (13.244.14)

सुखमेकान्ततो नास्ति शक्रस्यापि त्रिविष्टपे । तत्रापि सुमहद्दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ॥

sukhamekāntato nāsti śakrasyāpi triviṣṭape | tatrāpi sumahadduḥkhaṃ na nityaṃ labhate sukham

स्वर्ग में स्थित इन्द्र को भी एकान्त सुख नहीं है; वहाँ भी बहुत बड़ा दुःख है, और वह नित्य सुख नहीं पाता।

श्लोक 15 (13.244.15)

सुखस्यान्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । क्षया निचयाः सर्वे पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ॥

sukhasyāntaraṃ duḥkhaṃ duḥkhasyānantaraṃ sukham | kṣayā nicayāḥ sarve patanāntāḥ samucchrayāḥ

सुख के बाद दुःख है और दुःख के बाद सुख; सब संचय क्षय ही हैं और सब ऊँचाइयाँ पतन में समाप्त होती हैं।

श्लोक 16 (13.244.16)

संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् । उच्छ्रयांश्च निपाताश्च दृष्ट्या प्रत्यक्षतस्त्रयम् । अनित्यमसुखं चेति व्यवस्येत्सर्वमेव च ॥

saṃyogā viprayogāntā maraṇāntaṃ ca jīvitam | ucchrayāṃśca nipātāśca dṛṣṭyā pratyakṣatastrayam | anityamasukhaṃ ceti vyavasyetsarvameva ca

मिलन का अन्त बिछोह में है और जीवन का अन्त मृत्यु में। उत्थान और पतन को भी देखो; ये तीनों बातें प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं। इसलिए यही निश्चय करे कि सब कुछ अनित्य और सुखरहित है।

श्लोक 17 (13.244.17)

अर्थानामार्जने दुःखमार्जितानां तु रक्षणे । नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थं दुःखभाजनम् ॥

arthānāmārjane duḥkhamārjitānāṃ tu rakṣaṇe | nāśe duḥkhaṃ vyaye duḥkhaṃ dhigarthaṃ duḥkhabhājanam

धन कमाने में दुःख है, कमाए हुए की रक्षा में दुःख है, नष्ट होने में दुःख है, खर्च होने में दुःख है। दुःख के पात्र धन को धिक्कार है!

श्लोक 18 (13.244.18)

अर्थवन्तं नरं नित्यं पञ्चाभिघ्नन्ति शत्रवः । राजा चोरश्च दायादा भूतानि क्षय एव च ॥

arthavantaṃ naraṃ nityaṃ pañcābhighnanti śatravaḥ | rājā coraśca dāyādā bhūtāni kṣaya eva ca

धनवान् मनुष्य पर पाँच शत्रु सदा प्रहार करते हैं: राजा, चोर, उत्तराधिकारी, प्राणी और क्षय।

श्लोक 19 (13.244.19)

अर्थमेव ह्यनर्थस्य मूलमित्यवधारय । न ह्यनर्थाः प्रबाधन्ते नरमर्थविवर्जितम् ॥

arthameva hyanarthasya mūlamityavadhāraya | na hyanarthāḥ prabādhante naramarthavivarjitam

यह निश्चय जानो कि धन ही अनर्थ की जड़ है; क्योंकि धन से रहित मनुष्य को अनर्थ नहीं सताते।

श्लोक 20 (13.244.20)

अर्थप्राप्तिर्महद्दुःखमाकिञ्चिन्यं परं सुखम् । उपद्रवेषु चार्थानां दुःखं हि नियतं भवेत् ॥

arthaprāptirmahadduḥkhamākiñcinyaṃ paraṃ sukham | upadraveṣu cārthānāṃ duḥkhaṃ hi niyataṃ bhavet

धन की प्राप्ति बड़ा दुःख है और अकिंचनता परम सुख है; धन पर विपत्तियाँ आने पर दुःख निश्चित ही होता है।

श्लोक 21 (13.244.21)

धनलोभेन तृष्णाया न तृप्तिरुपलभ्यते । लब्धाश्रयो विवर्धेत समिद्ध इव पावकः ॥

dhanalobhena tṛṣṇāyā na tṛptirupalabhyate | labdhāśrayo vivardheta samiddha iva pāvakaḥ

धन के लोभ से तृष्णा तृप्त नहीं होती; आश्रय पाकर वह ईंधन से भड़की आग की तरह बढ़ती ही जाती है।

श्लोक 22 (13.244.22)

जित्वाऽपि पृथिवीं कृत्स्नां चतुःसागरमेखलाम् । सागराणां पुनः पारं जेतुमिच्छत्यसंशयम् ॥

jitvā'pi pṛthivīṃ kṛtsnāṃ catuḥsāgaramekhalām | sāgarāṇāṃ punaḥ pāraṃ jetumicchatyasaṃśayam

चारों सागरों की मेखला वाली सारी पृथ्वी को जीतकर भी वह निश्चय ही सागरों के उस पार को जीतना चाहता है।

श्लोक 23 (13.244.23)

अलं परिग्रहेणेह दोषवान्हि परिग्रहः । कोशकारः क्रिमिर्देवि बध्यते हि परिग्रहात् ॥

alaṃ parigraheṇeha doṣavānhi parigrahaḥ | kośakāraḥ krimirdevi badhyate hi parigrahāt

बस करो परिग्रह; परिग्रह दोष से भरा है। हे देवि! रेशम का कीड़ा अपने ही संचय से बँध जाता है।

श्लोक 24 (13.244.24)

एकोऽपि पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छत्रां प्रशास्ति च । एकस्मिन्नेव राष्ट्रे तु स चापि निवसेन्नृपः ॥

eko'pi pṛthivīṃ kṛtsnāmekacchatrāṃ praśāsti ca | ekasminneva rāṣṭre tu sa cāpi nivasennṛpaḥ

जो सारी पृथ्वी पर एकछत्र शासन करता है, वह राजा भी रहता तो एक ही राष्ट्र में है।

श्लोक 25 (13.244.25)

तस्मिन्राष्ट्रेऽपि नगरमेकमेवाधितिष्ठति । नगरेऽपि गृहं चैकं भवेत्तस्य निवेशनम् ॥

tasminrāṣṭre'pi nagaramekamevādhitiṣṭhati | nagare'pi gṛhaṃ caikaṃ bhavettasya niveśanam

उस राष्ट्र में भी वह एक ही नगर में रहता है, और उस नगर में उसका निवास एक ही घर है।

श्लोक 26 (13.244.26)

एक एव प्रतिष्ठः स्यादावासस्तद्गृहेऽपि च । आवासे शयनं चैकं निशि यत्र प्रलीयते ॥

eka eva pratiṣṭhaḥ syādāvāsastadgṛhe'pi ca | āvāse śayanaṃ caikaṃ niśi yatra pralīyate

उस घर में भी उसका रहने का स्थान एक ही होता है, और उस स्थान में एक ही शय्या, जिस पर रात को वह सो जाता है।

श्लोक 27 (13.244.27)

शयनस्यार्धमेवास्य स्त्रियाश्चार्धं विधीयते । तदनेन प्रसङ्गेन स्वल्पेनैव हि युज्यते ॥

śayanasyārdhamevāsya striyāścārdhaṃ vidhīyate | tadanena prasaṅgena svalpenaiva hi yujyate

उस शय्या का आधा भाग उसका है और आधा उसकी स्त्री का; इस हिसाब से वह बहुत थोड़े से ही जुड़ा है।

श्लोक 28 (13.244.28)

सर्वं ममेति सम्मूढो बलं पश्यति बालिशः । एवं सर्वोपयोगेषु स्वल्पमस्य प्रयोजनम् ॥

sarvaṃ mameti sammūḍho balaṃ paśyati bāliśaḥ | evaṃ sarvopayogeṣu svalpamasya prayojanam

मूर्ख मोहित मनुष्य "सब कुछ मेरा है" इसी में अपना बल देखता है; पर सब उपभोगों में उसका वास्तविक प्रयोजन थोड़ा ही है।

श्लोक 29 (13.244.29)

तण्डुलप्रस्थमात्रेण यात्रा स्यात्सर्वदेहिनाम् । ततो भूयस्तरो योगो दुःखाय तपनाय च ॥

taṇḍulaprasthamātreṇa yātrā syātsarvadehinām | tato bhūyastaro yogo duḥkhāya tapanāya ca

सब देहधारियों का निर्वाह एक प्रस्थ चावल से हो जाता है; उससे अधिक का संयोग तो दुःख और सन्ताप के लिए ही है।

श्लोक 30 (13.244.30)

नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् । सर्वान्कामान्परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

nāsti tṛṣṇāsamaṃ duḥkhaṃ nāsti tyāgasamaṃ sukham | sarvānkāmānparityajya brahmabhūyāya kalpate

तृष्णा के समान दुःख नहीं है और त्याग के समान सुख नहीं; सब कामनाओं को छोड़कर मनुष्य ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है।

श्लोक 31 (13.244.31)

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥

yā dustyajā durmatibhiryā na jīryati jīryataḥ | yo'sau prāṇāntiko rogastāṃ tṛṣṇāṃ tyajataḥ sukham

जिस तृष्णा को दुर्बुद्धि लोग नहीं छोड़ पाते, जो शरीर के जीर्ण होने पर भी जीर्ण नहीं होती, जो प्राण जाने तक रहने वाला रोग है, उस तृष्णा को त्यागने वाले को सुख मिलता है।

श्लोक 32 (13.244.32)

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati | haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate

कामना कभी कामनाओं के भोग से शान्त नहीं होती; घी पड़ने से अग्नि की तरह वह और अधिक बढ़ती ही है।

श्लोक 33 (13.244.33)

अलाभेनैव कामानां शोकं त्यजति पण्डितः । आयासविटपस्तीव्रः कामाग्निः कर्षणारणिः । इन्द्रियार्थैश्च सम्मोह्य दहत्यकुशलं जनम् ॥

alābhenaiva kāmānāṃ śokaṃ tyajati paṇḍitaḥ | āyāsaviṭapastīvraḥ kāmāgniḥ karṣaṇāraṇiḥ | indriyārthaiśca sammohya dahatyakuśalaṃ janam

पण्डित कामनाओं के न मिलने से ही शोक को छोड़ देता है। कामना की अग्नि प्रचण्ड है; परिश्रम उसकी शाखाएँ हैं और पीड़ा उसकी अरणि। वह इन्द्रियों के विषयों से मोहित करके नासमझ मनुष्य को जला देती है।

श्लोक 34 (13.244.34)

यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । नालमेकस्य पर्याप्तमिति पश्यन्न मुह्यति ॥

yatpṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ | nālamekasya paryāptamiti paśyanna muhyati

पृथ्वी पर जितना अन्न और जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वह सब एक मनुष्य के लिए भी पर्याप्त नहीं है; यह देखने वाला मोह में नहीं पड़ता।

श्लोक 35 (13.244.35)

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥

yacca kāmasukhaṃ loke yacca divyaṃ mahatsukham | tṛṣṇākṣayasukhasyaite nārhataḥ ṣoḍaśīṃ kalām

संसार में कामना का जो सुख है और स्वर्ग का जो महान् सुख है, वे तृष्णा के क्षय से मिलने वाले सुख की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं।

श्लोक 36 (13.244.36)

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नैव धीरो नियोजयेत् । मनःषष्ठानि संयम्य नित्यमात्मनि योजयेत ॥

indriyāṇīndriyārtheṣu naiva dhīro niyojayet | manaḥṣaṣṭhāni saṃyamya nityamātmani yojayeta

धीर पुरुष इन्द्रियों को उनके विषयों में न लगाए। मन को छठा मानकर इन्द्रियों को संयत करके उन्हें सदा आत्मा में लगाए।

श्लोक 37 (13.244.37)

इन्द्रियाणां विसर्गेण दोषमृच्छत्यसंशयम् । संनियम्य नु तान्येव ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ॥

indriyāṇāṃ visargeṇa doṣamṛcchatyasaṃśayam | saṃniyamya nu tānyeva tataḥ siddhimavāpnuyāt

इन्द्रियों को खुला छोड़ने से वह निश्चय ही दोष को प्राप्त होता है; उन्हीं को रोक लेने से वह सिद्धि पाता है।

श्लोक 38 (13.244.38)

षण्णामात्मनि युक्तानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति । न च पापैर्न चानर्थैः संयुज्येत विचक्षणः ॥

ṣaṇṇāmātmani yuktānāmaiśvaryaṃ yo'dhigacchati | na ca pāpairna cānarthaiḥ saṃyujyeta vicakṣaṇaḥ

आत्मा में लगे हुए इन छहों पर जो विवेकी ऐश्वर्य पा लेता है, वह न पापों से जुड़ता है और न अनर्थों से।

श्लोक 39 (13.244.39)

अप्रमत्तः सदा रक्षेदिन्द्रियाणि विचक्षणः । अरक्षितेषु तेष्वाशु नरो नरकमेति हि ॥

apramattaḥ sadā rakṣedindriyāṇi vicakṣaṇaḥ | arakṣiteṣu teṣvāśu naro narakameti hi

विवेकी मनुष्य प्रमाद-रहित होकर इन्द्रियों की सदा रक्षा करे; उनकी रक्षा न होने पर मनुष्य शीघ्र नरक में जाता है।

श्लोक 40 (13.244.40)

हृदि काममयश्चित्रो मोहसञ्चयसम्भवः । अज्ञानरूढमूलस्तु विवित्सापरिषेचनः ॥

hṛdi kāmamayaścitro mohasañcayasambhavaḥ | ajñānarūḍhamūlastu vivitsāpariṣecanaḥ

हृदय में कामनामय एक रंग-बिरंगा वृक्ष है, जो मोह के ढेर से उत्पन्न हुआ है, जिसकी जड़ें अज्ञान में जमी हैं और जिसे जानने की इच्छा से सींचा जाता है।

श्लोक 41 (13.244.41)

रोषलोभमहास्कन्धः पुरा दुष्कृतसारवान् । आयासविटपस्तीव्रशोकपुष्पो भयाङ्कुरः ॥

roṣalobhamahāskandhaḥ purā duṣkṛtasāravān | āyāsaviṭapastīvraśokapuṣpo bhayāṅkuraḥ

क्रोध और लोभ उसका विशाल तना हैं, पूर्व के दुष्कर्म उसका सार हैं, परिश्रम उसकी शाखाएँ, तीव्र शोक उसके फूल और भय उसके अंकुर हैं।

श्लोक 42 (13.244.42)

नानासङ्कल्पपत्राढ्यः प्रमादात्परिवर्धितः । महतीभिः पिपासाभिः समन्तात्परिवेष्टितः ॥

nānāsaṅkalpapatrāḍhyaḥ pramādātparivardhitaḥ | mahatībhiḥ pipāsābhiḥ samantātpariveṣṭitaḥ

वह नाना संकल्पों के पत्तों से भरा है, प्रमाद से बढ़ा है और चारों ओर बड़ी-बड़ी प्यासों से घिरा हुआ है।

श्लोक 43 (13.244.43)

संरोहत्यकृतप्रज्ञे पादपः कामसम्भवः । नैव रोहति तत्वज्ञे रूढो वा छिद्यते पुनः ॥

saṃrohatyakṛtaprajñe pādapaḥ kāmasambhavaḥ | naiva rohati tatvajñe rūḍho vā chidyate punaḥ

कामना से उत्पन्न यह वृक्ष अपरिपक्व बुद्धि वाले में जड़ पकड़ता है; तत्त्वज्ञानी में वह उगता ही नहीं, और उग भी जाए तो फिर काट दिया जाता है।

श्लोक 44 (13.244.44)

कृच्छ्रोपायेष्वनित्येषु निःसारेषु फलेषु च । दुःखादिषु दुरन्तेषु कामयोगेषु का रतिः ॥

kṛcchropāyeṣvanityeṣu niḥsāreṣu phaleṣu ca | duḥkhādiṣu duranteṣu kāmayogeṣu kā ratiḥ

जो कामनाएँ कठिन उपायों से मिलती हैं, अनित्य हैं, जिनके फल निःसार हैं, जो आरम्भ में दुःखरूप और अन्त में बुरी हैं, उन कामभोगों में क्या रति है?

श्लोक 45 (13.244.45)

इन्द्रियेषु च जीर्यत्सु च्छिद्यमाने तथाऽऽयुषि । पुरस्ताच्च स्थिते मृत्यौ किं सुखं पश्यतासुखे ॥

indriyeṣu ca jīryatsu cchidyamāne tathā''yuṣi | purastācca sthite mṛtyau kiṃ sukhaṃ paśyatāsukhe

जब इन्द्रियाँ जीर्ण हो रही हैं, आयु कट रही है और मृत्यु सामने खड़ी है, तब इस दुःख-भरी दशा को देखने वाले के लिए कौन-सा सुख है?

श्लोक 46 (13.244.46)

व्याधिभिः पीड्यमानस्य नित्यं शारीरमानसैः । नरस्याकृतकृत्यस्य किं सुखं मरणे सति ॥

vyādhibhiḥ pīḍyamānasya nityaṃ śārīramānasaiḥ | narasyākṛtakṛtyasya kiṃ sukhaṃ maraṇe sati

जो सदा शारीरिक और मानसिक रोगों से पीड़ित है और जिसने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया, ऐसे मनुष्य को मृत्यु के रहते क्या सुख है?

श्लोक 47 (13.244.47)

सञ्चिन्वानं तमेवार्थं कामानामवितृप्तकम् । व्याघ्रः पशुमिवारण्ये मृत्युरादाय गच्छति ॥

sañcinvānaṃ tamevārthaṃ kāmānāmavitṛptakam | vyāghraḥ paśumivāraṇye mṛtyurādāya gacchati

जैसे वन में बाघ पशु को उठा ले जाता है, वैसे ही धन जोड़ते हुए और कामनाओं से अतृप्त मनुष्य को मृत्यु उठा ले जाती है।

श्लोक 48 (13.244.48)

जन्ममृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः । संसारे पच्यमानस्तु पापान्नोद्विजते जनः ॥

janmamṛtyujarāduḥkhaiḥ satataṃ samabhidrutaḥ | saṃsāre pacyamānastu pāpānnodvijate janaḥ

जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के दुःखों से निरन्तर सताए जाते और संसार में पकाए जाते हुए भी लोग पाप से उद्विग्न नहीं होते।

उमोवाच

श्लोक 49 (13.244.49)

केनोपायेन मर्त्यानां निवर्त्येते जरान्तकौ । यद्यस्ति भगवन्मह्यमेतदाचक्ष्व माचिरम् ॥

kenopāyena martyānāṃ nivartyete jarāntakau | yadyasti bhagavanmahyametadācakṣva māciram

हे भगवन्! मनुष्यों के लिए बुढ़ापा और मृत्यु किस उपाय से टल सकते हैं? यदि कोई उपाय है तो मुझे शीघ्र बताइए।

श्लोक 50 (13.244.50)

तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा । रसायनप्रयोगैर्वा केनात्येति जरान्तकौ ॥

tapasā vā sumahatā karmaṇā vā śrutena vā | rasāyanaprayogairvā kenātyeti jarāntakau

बड़े तप से, या कर्म से, या शास्त्र-ज्ञान से, या रसायनों के प्रयोग से: किससे मनुष्य बुढ़ापे और मृत्यु को पार करता है?

महेश्वर उवाच

श्लोक 51 (13.244.51)

नैतदस्ति महाभागे जरामृत्युनिवर्तनम् । सर्वलोकेषु जानीहि मोक्षादन्यत्र भामिनि ॥

naitadasti mahābhāge jarāmṛtyunivartanam | sarvalokeṣu jānīhi mokṣādanyatra bhāmini

हे महाभागे! समस्त लोकों में मोक्ष को छोड़कर बुढ़ापे और मृत्यु को लौटा देने का कोई उपाय नहीं है; हे भामिनि! यह जान लो।

श्लोक 52 (13.244.52)

न धनेन न राज्येन नोग्रेण तपसाऽपि वा । मरणं नातितरते विना मुक्त्या शरीरिणः ॥

na dhanena na rājyena nogreṇa tapasā'pi vā | maraṇaṃ nātitarate vinā muktyā śarīriṇaḥ

न धन से, न राज्य से, न उग्र तप से ही देहधारी मृत्यु को पार करता है; मुक्ति के बिना नहीं।

श्लोक 53 (13.244.53)

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । न तरन्ति जरामृत्यू निर्वाणाधिगमाद्विना ॥

aśvamedhasahasrāṇi vājapeyaśatāni ca | na taranti jarāmṛtyū nirvāṇādhigamādvinā

हज़ारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ भी निर्वाण की प्राप्ति के बिना बुढ़ापे और मृत्यु से पार नहीं कराते।

श्लोक 54 (13.244.54)

ऐश्वर्यं धनधान्यं च विद्यालाभस्तपस्तथा । रसायनप्रयोगाद्वै न तरन्ति जरान्तकौ ॥

aiśvaryaṃ dhanadhānyaṃ ca vidyālābhastapastathā | rasāyanaprayogādvai na taranti jarāntakau

ऐश्वर्य, धन-धान्य, विद्या की प्राप्ति, तप और रसायनों का प्रयोग: इनमें से कोई भी बुढ़ापे और मृत्यु से पार नहीं कराता।

श्लोक 55 (13.244.55)

दानयज्ञतपःशीलरसायनविदोऽपि वा । स्वाध्यायनिरता वाऽपि न तरन्ति जरान्तकौ ॥

dānayajñatapaḥśīlarasāyanavido'pi vā | svādhyāyaniratā vā'pi na taranti jarāntakau

दान, यज्ञ, तप, शील और रसायन के जानकार, अथवा स्वाध्याय में लगे रहने वाले भी बुढ़ापे और मृत्यु को पार नहीं करते।

श्लोक 56 (13.244.56)

देवदानवगन्धर्वकिन्नरोरगराक्षसान् । स्ववशे कुरुते कालो न कालस्यास्त्यगोचरः ॥

devadānavagandharvakinnaroragarākṣasān | svavaśe kurute kālo na kālasyāstyagocaraḥ

देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग और राक्षस, इन सबको काल अपने वश में कर लेता है; काल की पहुँच से बाहर कुछ नहीं है।

श्लोक 57 (13.244.57)

न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः । सोऽयं प्रपद्यतेऽध्वानमजस्रं ध्रुवमव्ययम् ॥

na hyahāni nivartante na māsā na punaḥ kṣapāḥ | so'yaṃ prapadyate'dhvānamajasraṃ dhruvamavyayam

दिन नहीं लौटते, न महीने, न रातें; यह काल निरन्तर अपने मार्ग पर चलता है, स्थिर और अक्षय।

श्लोक 58 (13.244.58)

स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव । आयुरादाय मर्त्यानामहोरात्रेषु सन्ततम् ॥

sravanti na nivartante srotāṃsi saritāmiva | āyurādāya martyānāmahorātreṣu santatam

वे नदियों की धाराओं की तरह बहते जाते हैं, लौटते नहीं, और दिन-रात निरन्तर मनुष्यों की आयु हरते रहते हैं।

श्लोक 59 (13.244.59)

जीवितं सर्वभूतानामक्षयः क्षपयन्नसौ । आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनः पुनरुदेति च ॥

jīvitaṃ sarvabhūtānāmakṣayaḥ kṣapayannasau | ādityo hyastamabhyeti punaḥ punarudeti ca

यह अक्षय काल सब प्राणियों का जीवन क्षीण करता रहता है; सूर्य अस्त होता है और बार-बार फिर उदित होता है।

श्लोक 60 (13.244.60)

यस्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं भवेत् । गाधोदके मत्स्य इव किन्नु तस्य कुमारता ॥

yasyāṃ rātryāṃ vyatītāyāmāyuralpataraṃ bhavet | gādhodake matsya iva kinnu tasya kumāratā

जिस रात के बीतने पर आयु और थोड़ी रह जाए, उस मनुष्य की जवानी कैसी? वह तो उथले जल की मछली के समान है।

श्लोक 61 (13.244.61)

मरणं हि शरीरस्य नियतं ध्रुवमेव च । तिष्ठन्नपि क्षणं सर्वः कालस्यैति वशं पुनः ॥

maraṇaṃ hi śarīrasya niyataṃ dhruvameva ca | tiṣṭhannapi kṣaṇaṃ sarvaḥ kālasyaiti vaśaṃ punaḥ

शरीर की मृत्यु निश्चित और ध्रुव है; खड़े-खड़े भी सब क्षण भर में फिर काल के वश में चले जाते हैं।

श्लोक 62 (13.244.62)

न म्रियेरन्न जीर्येरन्यदि स्युः सर्वदेहिनः । न चानिष्टं प्रवर्तेत शोको वा प्राणिनं क्वचित् ॥

na mriyeranna jīryeranyadi syuḥ sarvadehinaḥ | na cāniṣṭaṃ pravarteta śoko vā prāṇinaṃ kvacit

यदि सब देहधारी न मरते और न बूढ़े होते, तो न कोई अनिष्ट होता और न किसी प्राणी को कहीं शोक होता।

श्लोक 63 (13.244.63)

अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो भूतेषु तिष्ठति । अप्रमत्तस्य कालस्य क्षयं प्राप्तो न मुच्यते ॥

apramattaḥ pramatteṣu kālo bhūteṣu tiṣṭhati | apramattasya kālasya kṣayaṃ prāpto na mucyate

काल प्रमत्त प्राणियों के बीच सजग रहता हुआ स्थित है; सजग काल के क्षय में पड़ा हुआ मनुष्य छूटता नहीं।

श्लोक 64 (13.244.64)

श्वःकार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम् । कोऽपि तद्वेद यत्रासौ मृत्युना नाभिवीक्षितः ॥

śvaḥkāryamadya kurvīta pūrvāhṇe cāparāhṇikam | ko'pi tadveda yatrāsau mṛtyunā nābhivīkṣitaḥ

कल का काम आज और दोपहर बाद का काम पूर्वाह्न में कर ले। कौन जानता है कि वह कहाँ और कब मृत्यु की दृष्टि से बचा रहेगा?

श्लोक 65 (13.244.65)

वर्षास्विदं करिष्यामि इदं ग्रीष्मवसन्तयोः । इति बालश्चिन्तयति अन्तरायं न बुध्यति ॥

varṣāsvidaṃ kariṣyāmi idaṃ grīṣmavasantayoḥ | iti bālaścintayati antarāyaṃ na budhyati

"यह वर्षा में करूँगा, यह ग्रीष्म और वसन्त में": ऐसा बालक की तरह सोचता है, और आने वाली बाधा को नहीं समझता।

श्लोक 66 (13.244.66)

इदं मे स्यादिदं मे स्यादित्येवं मनसा नराः । अनवाप्तेषु कामेषु ह्रियन्ते मरणं प्रति ॥

idaṃ me syādidaṃ me syādityevaṃ manasā narāḥ | anavāpteṣu kāmeṣu hriyante maraṇaṃ prati

"मुझे यह मिले, मुझे वह मिले": मन में ऐसा सोचते हुए मनुष्य अधूरी कामनाओं के साथ मृत्यु की ओर खींच लिए जाते हैं।

श्लोक 67 (13.244.67)

कालपाशेन बद्धानामहन्यहनि जीर्यताम् । का श्रद्धा प्राणिनां मार्गे विषमे भ्रमतां सदा ॥

kālapāśena baddhānāmahanyahani jīryatām | kā śraddhā prāṇināṃ mārge viṣame bhramatāṃ sadā

काल के पाश में बँधे हुए और दिन-दिन जीर्ण होते हुए प्राणियों के लिए, जो सदा ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर भटक रहे हैं, कौन-सा भरोसा है?

श्लोक 68 (13.244.68)

युवैव धर्मशीलः स्यादनिमित्तं हि जीवितम् । फलानामिव पक्वानां सदा हि पतनाद्भयम् ॥

yuvaiva dharmaśīlaḥ syādanimittaṃ hi jīvitam | phalānāmiva pakvānāṃ sadā hi patanādbhayam

मनुष्य को युवावस्था में ही धर्मशील होना चाहिए, क्योंकि जीवन का कोई निश्चित कारण नहीं; पके फलों की तरह उसे सदा गिरने का भय है।

श्लोक 69 (13.244.69)

मर्त्यस्य किं धनैर्दारैः पुत्रैर्भोगैः प्रियैरपि । एकाह्ना सर्वमुत्सृज्य मृत्योस्तु वशमन्वियात् ॥

martyasya kiṃ dhanairdāraiḥ putrairbhogaiḥ priyairapi | ekāhnā sarvamutsṛjya mṛtyostu vaśamanviyāt

मरणशील मनुष्य को धन, स्त्रियों, पुत्रों और प्रिय भोगों से क्या लाभ? एक ही दिन में सब छोड़कर उसे मृत्यु के वश में जाना पड़ता है।

श्लोक 70 (13.244.70)

जायमानांश्च सम्प्रेक्ष्य म्रियमाणांस्तथैव च । न संवेगोऽस्ति चेत्पुंसः काष्ठलोष्टसमो हि सः ॥

jāyamānāṃśca samprekṣya mriyamāṇāṃstathaiva ca | na saṃvego'sti cetpuṃsaḥ kāṣṭhaloṣṭasamo hi saḥ

जन्म लेते और उसी तरह मरते हुए प्राणियों को देखकर भी यदि मनुष्य को संवेग नहीं होता, तो वह काठ और ढेले के समान है।

श्लोक 71 (13.244.71)

विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य । किं बन्धुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च । विहाय यद्गच्छति सर्वमेवं । क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ॥

vināśino hyadhruvajīvitasya | kiṃ bandhubhirmitraparigrahaiśca | vihāya yadgacchati sarvamevaṃ | kṣaṇena gatvā na nivartate ca

जो नाशवान् है और जिसका जीवन अस्थिर है, उसके लिए बन्धुओं और मित्रों के संग्रह से क्या? वह यह सब छोड़कर चला जाता है, और क्षण भर में जाकर फिर नहीं लौटता।

श्लोक 72 (13.244.72)

एवं चिन्तयतो नित्यं सर्वार्थानामनित्यताम् । उद्वेगो जायते शीघ्रं निर्वाणस्य पुरस्सरः ॥

evaṃ cintayato nityaṃ sarvārthānāmanityatām | udvego jāyate śīghraṃ nirvāṇasya purassaraḥ

इस प्रकार सब पदार्थों की अनित्यता का नित्य चिन्तन करने वाले में शीघ्र उद्वेग उत्पन्न होता है, जो निर्वाण का अग्रदूत है।

श्लोक 73 (13.244.73)

तेनोद्वेगेन चाप्यस्य विमर्शो जायते पुनः । विमर्शो नाम वैराग्यं सर्वद्रव्येषु जायते ॥

tenodvegena cāpyasya vimarśo jāyate punaḥ | vimarśo nāma vairāgyaṃ sarvadravyeṣu jāyate

उस उद्वेग से फिर उसमें विमर्श उत्पन्न होता है; यह विमर्श, जिसे वैराग्य कहते हैं, सब पदार्थों के प्रति उत्पन्न होता है।

श्लोक 74 (13.244.74)

वैराग्येण परां शान्तिं लभन्ते मानवाः शुभे । मोक्षस्योपनिषद्दिव्यं वैराग्यमिति निश्चितम् ॥

vairāgyeṇa parāṃ śāntiṃ labhante mānavāḥ śubhe | mokṣasyopaniṣaddivyaṃ vairāgyamiti niścitam

हे शुभे! वैराग्य से मनुष्य परम शान्ति पाते हैं; वैराग्य ही मोक्ष का दिव्य रहस्य (उपनिषद्) है, यह निश्चित है।

श्लोक 75 (13.244.75)

एतत्ते कथितं देवि वैराग्योत्पादनं वचः । एवं सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य मुच्यन्ते हि मुमुक्षवः ॥

etatte kathitaṃ devi vairāgyotpādanaṃ vacaḥ | evaṃ sañcintya sañcintya mucyante hi mumukṣavaḥ

हे देवि! वैराग्य उत्पन्न करने वाला यह वचन मैंने तुम्हें कह सुनाया। इसी प्रकार बार-बार चिन्तन करके मुमुक्षु मुक्त हो जाते हैं।

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