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अनुशासन पर्व · अध्याय 245

महेश्वर द्वारा साङ्ख्य-ज्ञान का उपदेश

महेश्वर उमा को साङ्ख्य-मत समझाते हैं: अव्यक्त से पुरुष तक पचीस तत्त्व, सत्त्व, रजस् और तमस् ये तीन गुण और उनके लक्षण, तथा पाँच भूत, उनके गुण और उनसे उत्पन्न इन्द्रियाँ। वे सब देहों में अदृश्य रूप से रहने वाले आत्मा का और उसके विषय में दूसरों के भिन्न-भिन्न मतों का वर्णन करते हैं। उमा कहती हैं कि आत्मा का हेतु पाना अत्यन्त कठिन है, और अन्त में वे बताते हैं कि आत्मा का दर्शन ही परम गति की प्राप्ति है।

अध्याय 244अध्याय-सूचीअध्याय 246

महेश्वर उवाच

श्लोक 1 (13.245.1)

साङ्ख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि यथावत्ते शुचिस्मिते । यज्ज्ञात्वा न पुनर्मर्त्यः संसारेषु प्रवर्तते ॥

sāṅkhyajñānaṃ pravakṣyāmi yathāvatte śucismite | yajjñātvā na punarmartyaḥ saṃsāreṣu pravartate

हे शुचिस्मिते! मैं तुम्हें यथार्थ रूप से साङ्ख्य-ज्ञान बताऊँगा, जिसे जानकर मनुष्य फिर संसारों में जन्म नहीं लेता।

श्लोक 2 (13.245.2)

ज्ञानेनैव विमुक्तास्ते साङ्ख्याः संन्यासकोविदाः । शरीरं तु तपो घोरं साङ्ख्याः प्राहुर्निरर्थकम् ॥

jñānenaiva vimuktāste sāṅkhyāḥ saṃnyāsakovidāḥ | śarīraṃ tu tapo ghoraṃ sāṅkhyāḥ prāhurnirarthakam

संन्यास में कुशल वे साङ्ख्य ज्ञान से ही मुक्त होते हैं; वे शरीर को कष्ट देने वाले घोर तप को निष्फल कहते हैं।

श्लोक 3 (13.245.3)

पञ्चविंशतिकं ज्ञानं तेषां ज्ञानमिति स्मृतम् । मूलप्रकृतिरव्यक्तमव्यक्ताज्जायते महान् ॥

pañcaviṃśatikaṃ jñānaṃ teṣāṃ jñānamiti smṛtam | mūlaprakṛtiravyaktamavyaktājjāyate mahān

उनका ज्ञान पचीस तत्त्वों का ज्ञान कहा गया है: मूल प्रकृति अव्यक्त है और अव्यक्त से महत् उत्पन्न होता है।

श्लोक 4 (13.245.4)

महतोऽभूदहङ्कारस्तस्मात्तन्मात्रपञ्चकम् । इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्रेभ्यो भवन्त्युत ॥

mahato'bhūdahaṅkārastasmāttanmātrapañcakam | indriyāṇi daśaikaṃ ca tanmātrebhyo bhavantyuta

महत् से अहङ्कार हुआ, उससे पाँच तन्मात्राएँ, और तन्मात्राओं से दस इन्द्रियाँ तथा एक (मन) उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 5 (13.245.5)

तेभ्यो भूतानि पञ्चास्य शरीरं यैः प्रवर्तते । इति क्षेत्रस्य संक्षेपं चतुर्विंशतिरिष्यते । पञ्चविंशतिरित्याहुः पुरुषेणेह सङ्ख्यया ॥

tebhyo bhūtāni pañcāsya śarīraṃ yaiḥ pravartate | iti kṣetrasya saṃkṣepaṃ caturviṃśatiriṣyate | pañcaviṃśatirityāhuḥ puruṣeṇeha saṅkhyayā

उनसे पाँच महाभूत होते हैं, जिनसे यह शरीर चलता है। इस प्रकार क्षेत्र का संक्षेप चौबीस माना जाता है, और पुरुष को मिलाकर गिनती में उसे पचीस कहते हैं।

श्लोक 6 (13.245.6)

सत्वं रजस्तमश्चेति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । तैः सृजत्यखिलं लोकं प्रकृतिः स्वात्मकैर्गुणैः ॥

satvaṃ rajastamaśceti guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ | taiḥ sṛjatyakhilaṃ lokaṃ prakṛtiḥ svātmakairguṇaiḥ

सत्त्व, रजस् और तमस् ये प्रकृति से उत्पन्न गुण हैं; प्रकृति अपने ही इन गुणों से सारे लोक की सृष्टि करती है।

श्लोक 7 (13.245.7)

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । विकाराः प्रकृतेश्चैते वेदितव्या मनीषिभिः ॥

icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṃghātaścetanā dhṛtiḥ | vikārāḥ prakṛteścaite veditavyā manīṣibhiḥ

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना और धृति: विद्वानों को इन्हें प्रकृति के विकार जानना चाहिए।

श्लोक 8 (13.245.8)

लक्षणं चापि सर्वेषां विकल्पं चादितः पृथक् । विस्तरेणैव वक्ष्यामि तस्य व्याख्यामहं शृणु ॥

lakṣaṇaṃ cāpi sarveṣāṃ vikalpaṃ cāditaḥ pṛthak | vistareṇaiva vakṣyāmi tasya vyākhyāmahaṃ śṛṇu

इन सबके लक्षण और उनके भेद मैं आरम्भ से अलग-अलग विस्तार से कहूँगा; उसकी व्याख्या सुनो।

श्लोक 9 (13.245.9)

नित्यमेकमणु व्यापि क्रियाहीनमहेतुकम् । अग्राह्यमिन्द्रियैः सर्वैरेतदव्यक्तलक्षणम् ॥

nityamekamaṇu vyāpi kriyāhīnamahetukam | agrāhyamindriyaiḥ sarvairetadavyaktalakṣaṇam

नित्य, एक, सूक्ष्म, सर्वव्यापी, क्रियाहीन, कारणरहित और किसी भी इन्द्रिय से ग्रहण न होने वाला: यह अव्यक्त का लक्षण है।

श्लोक 10 (13.245.10)

अव्यक्तं प्रकृतिर्मूलं प्रधानं योनिरव्ययम् । अव्यक्तस्यैव नामानि शब्दैः पर्यायवाचकैः ॥

avyaktaṃ prakṛtirmūlaṃ pradhānaṃ yoniravyayam | avyaktasyaiva nāmāni śabdaiḥ paryāyavācakaiḥ

अव्यक्त, प्रकृति, मूल, प्रधान, योनि और अव्यय: ये पर्यायवाची शब्दों में अव्यक्त के ही नाम हैं।

श्लोक 11 (13.245.11)

तत्सूक्ष्मत्वादनिर्देश्यं तत्सदित्यभिधीयते । तन्मूलं च जगत्सर्वं तन्मूला सृष्टिरिष्यते ॥

tatsūkṣmatvādanirdeśyaṃ tatsadityabhidhīyate | tanmūlaṃ ca jagatsarvaṃ tanmūlā sṛṣṭiriṣyate

सूक्ष्म होने के कारण उसका निर्देश नहीं किया जा सकता, और उसे "सत्" कहा जाता है। सारा जगत् उसी के मूल पर है और सृष्टि भी उसी के मूल पर मानी जाती है।

श्लोक 12 (13.245.12)

सत्वादयः प्रकृतिजा गुणास्तान्प्रब्रवीम्यहम् ॥

satvādayaḥ prakṛtijā guṇāstānprabravīmyaham

सत्त्व आदि गुण प्रकृति से उत्पन्न हैं; अब मैं उनका वर्णन करता हूँ।

श्लोक 13 (13.245.13)

सुखं तुष्टिः प्रकाशश्च त्रयस्ते सात्विका गुणाः । रागद्वेषौ सुखं दुःखं स्तम्भश्च रजसो गुणाः । अप्रकाशो भयं मोहस्तन्द्री च तमसो गुणाः ॥

sukhaṃ tuṣṭiḥ prakāśaśca trayaste sātvikā guṇāḥ | rāgadveṣau sukhaṃ duḥkhaṃ stambhaśca rajaso guṇāḥ | aprakāśo bhayaṃ mohastandrī ca tamaso guṇāḥ

सुख, सन्तोष और प्रकाश ये तीन सात्त्विक गुण हैं; राग और द्वेष, सुख, दुःख और जड़ता (स्तम्भ) रजस् के गुण हैं; अप्रकाश, भय, मोह और आलस्य तमस् के गुण हैं।

श्लोक 14 (13.245.14)

श्रद्धा प्रहर्षो विज्ञानमसंमोहो दया धृतिः । सत्वे प्रवृत्ते वर्धन्ते विपरीते विपर्ययः ॥

śraddhā praharṣo vijñānamasaṃmoho dayā dhṛtiḥ | satve pravṛtte vardhante viparīte viparyayaḥ

श्रद्धा, हर्ष, विज्ञान, असम्मोह, दया और धृति सत्त्व के प्रबल होने पर बढ़ते हैं; इसके विपरीत होने पर विपरीत बातें होती हैं।

श्लोक 15 (13.245.15)

कामक्रोधौ मनस्तापो लोभो मोहस्तथामृषा । प्रवृद्धे परिवर्धन्ते रजस्येतानि सर्वशः ॥

kāmakrodhau manastāpo lobho mohastathāmṛṣā | pravṛddhe parivardhante rajasyetāni sarvaśaḥ

काम और क्रोध, मन का सन्ताप, लोभ, मोह और असत्य: रजस् के प्रबल होने पर ये सब प्रकार से बढ़ते हैं।

श्लोक 16 (13.245.16)

विषादः संशयो मोहस्तन्द्री निद्रा भयं तथा । तमस्येतानि वर्धन्ते प्रवृद्धे हेत्वहेतुकम् ॥

viṣādaḥ saṃśayo mohastandrī nidrā bhayaṃ tathā | tamasyetāni vardhante pravṛddhe hetvahetukam

विषाद, संशय, मोह, आलस्य, निद्रा और भय: तमस् के प्रबल होने पर ये कारण सहित या बिना कारण बढ़ते हैं।

श्लोक 17 (13.245.17)

एवमन्योन्यमेतानि वर्धन्ते च पुनःपुनः । हीयन्ते च तथा नित्यमभिभूतानि भूरिशः ॥

evamanyonyametāni vardhante ca punaḥpunaḥ | hīyante ca tathā nityamabhibhūtāni bhūriśaḥ

इस प्रकार ये एक-दूसरे के साथ बार-बार बढ़ते हैं, और अभिभूत होने पर वैसे ही बहुधा सदा घटते भी हैं।

श्लोक 18 (13.245.18)

तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं कायेन मनसाऽपि वा । वर्तते सात्विको भाव इत्युपेक्षेत तत्तथा ॥

tatra yatprītisaṃyuktaṃ kāyena manasā'pi vā | vartate sātviko bhāva ityupekṣeta tattathā

उनमें जो कुछ शरीर या मन से प्रीति के साथ होता है, उसे "सात्त्विक भाव चल रहा है" ऐसा जानकर वैसा ही मानना चाहिए।

श्लोक 19 (13.245.19)

यदा सन्तापसंयुक्तं चित्तक्षोभकरं भवेत् । वर्तते रज इत्येव तदा तदभिचिन्तयेत् ॥

yadā santāpasaṃyuktaṃ cittakṣobhakaraṃ bhavet | vartate raja ityeva tadā tadabhicintayet

जब वह सन्ताप के साथ हो और चित्त में क्षोभ पैदा करे, तब उसे "रजस् चल रहा है" ऐसा समझे।

श्लोक 20 (13.245.20)

यदा सम्मोहसंयुक्तं यद्विषादकरं भवेत् । अप्रतार्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥

yadā sammohasaṃyuktaṃ yadviṣādakaraṃ bhavet | apratārkyamavijñeyaṃ tamastadupadhārayet

जब वह मोह से युक्त हो, विषाद उत्पन्न करे और तर्क तथा ज्ञान से परे हो, तब उसे तमस् समझे।

श्लोक 21 (13.245.21)

समासात्सात्विको धर्मः समासाद्राजसं धनम् । समासात्तामसः कामस्त्रिवर्गे त्रिगुणाः क्रमात् ॥

samāsātsātviko dharmaḥ samāsādrājasaṃ dhanam | samāsāttāmasaḥ kāmastrivarge triguṇāḥ kramāt

संक्षेप में धर्म सात्त्विक है, धन राजस है और काम तामस है; त्रिवर्ग में तीनों गुण इसी क्रम से हैं।

श्लोक 22 (13.245.22)

ब्रह्मादिदेवसृष्टिर्या सात्विकीति प्रकीर्त्यते । राजसी मानवी सृष्टिस्तिर्यग्योनिस्तु तामसी ॥

brahmādidevasṛṣṭiryā sātvikīti prakīrtyate | rājasī mānavī sṛṣṭistiryagyonistu tāmasī

ब्रह्मा आदि देवताओं की सृष्टि सात्त्विक कही जाती है; मनुष्यों की सृष्टि राजसी है और पशु-पक्षी की योनि तामसी है।

श्लोक 23 (13.245.23)

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

ūrdhvaṃ gacchanti satvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ | jaghanyaguṇavṛttisthā adho gacchanti tāmasāḥ

सत्त्व में स्थित लोग ऊपर जाते हैं, राजस बीच में रहते हैं और निकृष्ट गुण की वृत्ति में स्थित तामस नीचे जाते हैं।

श्लोक 24 (13.245.24)

देवमानुषतिर्यक्षु यद्भूतं सचराचरम् । आदिप्रभृति संयुक्तं व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्गुणैः ॥

devamānuṣatiryakṣu yadbhūtaṃ sacarācaram | ādiprabhṛti saṃyuktaṃ vyāptamebhistribhirguṇaiḥ

देवताओं, मनुष्यों और पशुओं में जो भी चर-अचर प्राणी है, वह आदि से ही इन तीनों गुणों से युक्त और व्याप्त है।

श्लोक 25 (13.245.25)

अतः परं प्रवक्ष्यामि महदादीनि लिङ्गतः । विज्ञानं च विवेकश्च महतो लक्षणं भवेत् ॥

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi mahadādīni liṅgataḥ | vijñānaṃ ca vivekaśca mahato lakṣaṇaṃ bhavet

इसके आगे मैं महत् आदि को उनके लक्षणों के अनुसार बताऊँगा। विज्ञान और विवेक महत् का लक्षण होगा।

श्लोक 26 (13.245.26)

महान्बुद्धिर्मतिः प्रज्ञा नामानि महतो विदुः । अहङ्कारः स विज्ञेयो लक्षणेन समासतः ॥

mahānbuddhirmatiḥ prajñā nāmāni mahato viduḥ | ahaṅkāraḥ sa vijñeyo lakṣaṇena samāsataḥ

महत्, बुद्धि, मति और प्रज्ञा: ये महत् के नाम जाने जाते हैं। अहङ्कार को उसके लक्षण से संक्षेप में जानना चाहिए।

श्लोक 27 (13.245.27)

अहङ्कारेण भूतानां सर्गो नानाविधो भवेत् । अहङ्कारनिवृत्तिर्हि निर्वाणायोपपद्यते ॥

ahaṅkāreṇa bhūtānāṃ sargo nānāvidho bhavet | ahaṅkāranivṛttirhi nirvāṇāyopapadyate

अहङ्कार से प्राणियों की नाना प्रकार की सृष्टि होती है, और अहङ्कार की निवृत्ति से निर्वाण सिद्ध होता है।

श्लोक 28 (13.245.28)

खं वायुरग्निः सलिलं पृथिवी चेति पञ्चमी । महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ॥

khaṃ vāyuragniḥ salilaṃ pṛthivī ceti pañcamī | mahābhūtāni bhūtānāṃ sarveṣāṃ prabhavāpyayau

आकाश, वायु, अग्नि, जल और पाँचवीं पृथ्वी: ये महाभूत सब प्राणियों की उत्पत्ति और लय के स्थान हैं।

श्लोक 29 (13.245.29)

शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसम्भवम् । स्पर्शवत्प्राणिनां चेष्टा पवनस्य गुणाः स्मृताः ॥

śabdaḥ śrotraṃ tathā khāni trayamākāśasambhavam | sparśavatprāṇināṃ ceṣṭā pavanasya guṇāḥ smṛtāḥ

शब्द, श्रोत्र और शरीर के छिद्र: ये तीन आकाश से उत्पन्न हैं; स्पर्श और प्राणियों की चेष्टा वायु के गुण माने गए हैं।

श्लोक 30 (13.245.30)

रूपं पाकोऽक्षिणी ज्योतिश्चत्वारस्तेजसो गुणाः । रसः स्नेहस्तथा जिह्वा शैत्यं च जलजा गुणाः ॥

rūpaṃ pāko'kṣiṇī jyotiścatvārastejaso guṇāḥ | rasaḥ snehastathā jihvā śaityaṃ ca jalajā guṇāḥ

रूप, पाक, दोनों नेत्र और ज्योति: ये चार तेज के गुण हैं; रस, स्नेह, जिह्वा और शीतलता जल से उत्पन्न गुण हैं।

श्लोक 31 (13.245.31)

गन्धो घ्राणं शरीरं च पृथिव्यास्ते गुणास्त्रयः । इति सर्वगुणा देवि विख्याताः पाञ्चभौतिकाः ॥

gandho ghrāṇaṃ śarīraṃ ca pṛthivyāste guṇāstrayaḥ | iti sarvaguṇā devi vikhyātāḥ pāñcabhautikāḥ

गन्ध, नासिका और शरीर: ये तीन पृथ्वी के गुण हैं। इस प्रकार, हे देवि! पाँच भूतों से बने सब गुण बताए गए।

श्लोक 32 (13.245.32)

गुणान्पूर्वस्यपूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तराणि तु । तस्मान्नैकगुणाश्चेह दृश्यन्ते भूतसृष्टयः ॥

guṇānpūrvasyapūrvasya prāpnuvantyuttarāṇi tu | tasmānnaikaguṇāśceha dṛśyante bhūtasṛṣṭayaḥ

आगे के भूत अपने से पहले-पहले भूत के गुणों को प्राप्त करते हैं; इसलिए यहाँ भूतों की सृष्टियाँ एक ही गुण वाली नहीं दिखाई देतीं।

श्लोक 33 (13.245.33)

उपलभ्याप्सु ये गन्धं केचिद्ब्रूयुरनैपुणाः । अपां गन्धगुणं प्राज्ञा नेच्छन्ति कमलेक्षणे ॥

upalabhyāpsu ye gandhaṃ kecidbrūyuranaipuṇāḥ | apāṃ gandhaguṇaṃ prājñā necchanti kamalekṣaṇe

जल में गन्ध पाकर कुछ अकुशल लोग कुछ कह दें; पर हे कमलनयने! ज्ञानी जल का गुण गन्ध नहीं मानते।

श्लोक 34 (13.245.34)

तद्गन्धत्वमपां नास्ति पृथिव्या एव तद्गुणः । भूमिर्गन्धे रसे स्नेहो ज्योतिश्चक्षुषि संस्थितम् । प्राणापानाश्रयो वायुः खेष्वाकाशः शरीरिणां ॥

tadgandhatvamapāṃ nāsti pṛthivyā eva tadguṇaḥ | bhūmirgandhe rase sneho jyotiścakṣuṣi saṃsthitam | prāṇāpānāśrayo vāyuḥ kheṣvākāśaḥ śarīriṇāṃ

वह गन्ध जल में नहीं है; वह पृथ्वी का ही गुण है। पृथ्वी गन्ध में, जल रस में और ज्योति नेत्र में स्थित है; वायु प्राण और अपान का आश्रय है और आकाश देहधारियों के छिद्रों में है।

श्लोक 35 (13.245.35)

केशास्थिनखदन्तत्वक्पाणिपादशिरांसि च । पृष्ठोदरकटिग्रीवाः सर्वं भूम्यात्मकं स्मृतम् ॥

keśāsthinakhadantatvakpāṇipādaśirāṃsi ca | pṛṣṭhodarakaṭigrīvāḥ sarvaṃ bhūmyātmakaṃ smṛtam

केश, हड्डी, नख, दाँत, त्वचा, हाथ, पैर, सिर, पीठ, पेट, कमर और गर्दन: यह सब पृथ्वी-रूप माना गया है।

श्लोक 36 (13.245.36)

यत्किञ्चिदपि कायेऽस्मिन्धातुदोषमलाश्रितम् । तत्सर्वं भौतिकं विद्धि देहैरेवास्य स्वामिकम् ॥

yatkiñcidapi kāye'smindhātudoṣamalāśritam | tatsarvaṃ bhautikaṃ viddhi dehairevāsya svāmikam

इस शरीर में धातु, दोष और मल के आश्रित जो कुछ भी है, उस सबको भौतिक जानो; वह इस (जीव) का अपना केवल देहों के द्वारा ही है।

श्लोक 37 (13.245.37)

बुद्धीन्द्रियाणि कर्णत्वक्चक्षुर्जिह्वाऽथ नासिका । कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादौ मेढ्रं गुदस्तथा ॥

buddhīndriyāṇi karṇatvakcakṣurjihvā'tha nāsikā | karmendriyāṇi vākpāṇipādau meḍhraṃ gudastathā

ज्ञानेन्द्रियाँ कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका हैं; कर्मेन्द्रियाँ वाणी, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा हैं।

श्लोक 38 (13.245.38)

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । बुद्धीन्द्रियार्थाञ्जानीयाद्भूतेभ्यस्त्वभिनिःसृतान् ॥

śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca raso gandhaśca pañcamaḥ | buddhīndriyārthāñjānīyādbhūtebhyastvabhiniḥsṛtān

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध: इन्हें भूतों से निकले हुए ज्ञानेन्द्रियों के विषय जानो।

श्लोक 39 (13.245.39)

वाक्यं क्रिया गतिः प्रीतिरुत्सर्गश्चेति पञ्चधा । कर्मेन्द्रियार्थाञ्जानीयात्ते च भूतोद्भवा मताः ॥

vākyaṃ kriyā gatiḥ prītirutsargaśceti pañcadhā | karmendriyārthāñjānīyātte ca bhūtodbhavā matāḥ

वचन, क्रिया, गति, प्रीति और उत्सर्ग: ये पाँच प्रकार के कर्मेन्द्रियों के विषय जानो, और ये भी भूतों से उत्पन्न माने गए हैं।

श्लोक 40 (13.245.40)

इन्द्रियाणां तु सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते । प्रार्थनालक्षणं तच्च इन्द्रियं तु मनः स्मृतम् ॥

indriyāṇāṃ tu sarveṣāmīśvaraṃ mana ucyate | prārthanālakṣaṇaṃ tacca indriyaṃ tu manaḥ smṛtam

मन को सब इन्द्रियों का स्वामी कहा जाता है; उसका लक्षण संकल्प-इच्छा है, और मन भी एक इन्द्रिय माना गया है।

श्लोक 41 (13.245.41)

नियुङ्क्ते च सदा तानि भूतानि मनसा सह । नियमे च विसर्गे च मनसः कारणं प्रभुः ॥

niyuṅkte ca sadā tāni bhūtāni manasā saha | niyame ca visarge ca manasaḥ kāraṇaṃ prabhuḥ

वह सदा मन के साथ उन भूतों को प्रवृत्त करता है; मन को रोकने और छोड़ने में स्वामी ही कारण है।

श्लोक 42 (13.245.42)

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना धृतिः । भूताभूतविकारश्च शरीरमिति संस्मृतम् ॥

indriyāṇīndriyārthāśca svabhāvaścetanā dhṛtiḥ | bhūtābhūtavikāraśca śarīramiti saṃsmṛtam

इन्द्रियाँ और उनके विषय, स्वभाव, चेतना, धृति और भूत तथा अभूत के विकार: इन सबको शरीर कहा गया है।

श्लोक 43 (13.245.43)

शरीराच्च परो देही शरीरं च व्यपाश्रितः । शरीरिणः शरीरस्य सोऽन्तरं वेत्ति वै मुनिः ॥

śarīrācca paro dehī śarīraṃ ca vyapāśritaḥ | śarīriṇaḥ śarīrasya so'ntaraṃ vetti vai muniḥ

देही शरीर से परे है और शरीर का आश्रय लिए हुए है; वह मुनि शरीरी और शरीर के भेद को सचमुच जानता है।

श्लोक 44 (13.245.44)

रसः स्पर्शश्च गन्धश्च रूपं शब्दविवर्जितम् । अशरीरं शरीरेषु दिदृक्षेत निरिन्द्रियम् ॥

rasaḥ sparśaśca gandhaśca rūpaṃ śabdavivarjitam | aśarīraṃ śarīreṣu didṛkṣeta nirindriyam

रस, स्पर्श, गन्ध, रूप और शब्द से रहित, देहों में अशरीरी और इन्द्रियरहित उसको देखने की इच्छा करे।

श्लोक 45 (13.245.45)

अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येष्वमरमाश्रितम् । यः पश्येत्परमात्मानं बन्धनैः स विमुच्यते ॥

avyaktaṃ sarvadeheṣu martyeṣvamaramāśritam | yaḥ paśyetparamātmānaṃ bandhanaiḥ sa vimucyate

जो सब देहों में अव्यक्त, मरणशीलों में रहने वाले अमर परमात्मा को देखता है, वह बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 46 (13.245.46)

नैवायं चक्षुषां ग्राह्यो नापरैरिन्द्रियैरपि । मनसैव प्रदीप्तेन महानात्मा प्रदृश्यते ॥

naivāyaṃ cakṣuṣāṃ grāhyo nāparairindriyairapi | manasaiva pradīptena mahānātmā pradṛśyate

यह न नेत्रों से ग्रहण किया जाता है, न अन्य इन्द्रियों से; प्रदीप्त मन से ही महान् आत्मा देखा जाता है।

श्लोक 47 (13.245.47)

स हि सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च । वसत्येको महावीर्यो नानाभावसमन्वितः ॥

sa hi sarveṣu bhūteṣu sthāvareṣu careṣu ca | vasatyeko mahāvīryo nānābhāvasamanvitaḥ

वह महापराक्रमी अकेला ही सब प्राणियों में, स्थावरों और जङ्गमों में, नाना भावों से युक्त होकर रहता है।

श्लोक 48 (13.245.48)

नैव चोर्ध्वं न तिर्यक्च नाधस्तान्न कदाचन । इन्द्रियैरिव बुद्ध्या वा न दृश्येत कदाचन ॥

naiva cordhvaṃ na tiryakca nādhastānna kadācana | indriyairiva buddhyā vā na dṛśyeta kadācana

न ऊपर, न तिरछे, न नीचे, किसी समय भी वह इन्द्रियों या बुद्धि से देखा हुआ-सा नहीं दिखाई देता।

श्लोक 49 (13.245.49)

नवद्वारं पुरं गत्वा स्थितोऽसौ नियतो वशी । ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च ॥

navadvāraṃ puraṃ gatvā sthito'sau niyato vaśī | īśvaraḥ sarvalokeṣu sthāvarasya carasya ca

नौ द्वारों वाले नगर में जाकर यह संयमी और जितेन्द्रिय स्थित है; यह सब लोकों में स्थावर और जङ्गम का ईश्वर है।

श्लोक 50 (13.245.50)

तमेवाहुरणुभ्योऽणुं तु महद्भ्यो महत्तरम् । बहुधा सर्वभूतानि व्याप्य तिष्ठति शाश्वतम् ॥

tamevāhuraṇubhyo'ṇuṃ tu mahadbhyo mahattaram | bahudhā sarvabhūtāni vyāpya tiṣṭhati śāśvatam

उसी को अणु से भी अणु और महान् से भी महान् कहते हैं; वह शाश्वत सब प्राणियों में अनेक प्रकार से व्याप्त होकर स्थित है।

श्लोक 51 (13.245.51)

क्षेत्रज्ञमेकतः कृत्वा सर्वं क्षेत्रमथैकतः । एवं स विमृशेज्ज्ञानी संयतः सततं हृदि ॥

kṣetrajñamekataḥ kṛtvā sarvaṃ kṣetramathaikataḥ | evaṃ sa vimṛśejjñānī saṃyataḥ satataṃ hṛdi

क्षेत्रज्ञ को एक ओर और सारे क्षेत्र को दूसरी ओर रखकर संयमी ज्ञानी इस प्रकार सदा हृदय में विचार करे।

श्लोक 52 (13.245.52)

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । अकर्ताऽलेपको नित्यो मध्यस्थः सर्वकर्मणाम् ॥

puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijānguṇān | akartā'lepako nityo madhyasthaḥ sarvakarmaṇām

प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है; वह अकर्ता, निर्लेप, नित्य और सब कर्मों में मध्यस्थ है।

श्लोक 53 (13.245.53)

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥

kāryakāraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate | puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate

कार्य और कारण के कर्तृत्व में प्रकृति को हेतु कहा जाता है; सुख और दुःख के भोक्तृत्व में पुरुष को हेतु कहा जाता है।

श्लोक 54 (13.245.54)

अजय्योऽयमचिन्त्योऽयमव्यक्तोऽयं सनातनः । देही तेजोमयो देहे तिष्ठतीत्यपरे विदुः ॥

ajayyo'yamacintyo'yamavyakto'yaṃ sanātanaḥ | dehī tejomayo dehe tiṣṭhatītyapare viduḥ

यह अजेय, अचिन्त्य, अव्यक्त और सनातन है; तेजोमय देही देह में रहता है, ऐसा दूसरे लोग जानते हैं।

श्लोक 55 (13.245.55)

ज्ञानमूष्मा च वायुश्च शरीरे जीवसंज्ञकः । इत्येते निश्चिता बुद्ध्या तत्रैते बुद्धिचिन्तकाः ॥

jñānamūṣmā ca vāyuśca śarīre jīvasaṃjñakaḥ | ityete niścitā buddhyā tatraite buddhicintakāḥ

ज्ञान, ऊष्मा और वायु, ये शरीर में जीव नाम से कहे जाते हैं। ऐसा ये लोग बुद्धि से निश्चय करते हैं; ये बुद्धि के चिन्तक हैं।

श्लोक 56 (13.245.56)

अपरे सर्वलोकांश्च व्याप्य तिष्ठन्तमीश्वरम् । ब्रुवते केचिदत्रैव तिलतैलवदास्थितम् ॥

apare sarvalokāṃśca vyāpya tiṣṭhantamīśvaram | bruvate kecidatraiva tilatailavadāsthitam

दूसरे कहते हैं कि ईश्वर सब लोकों में व्याप्त होकर स्थित है, और कुछ कहते हैं कि वह यहीं तिल में तेल की तरह स्थित है।

श्लोक 57 (13.245.57)

अपरे नास्तिका मूढा हीनत्वात्स्थूललक्षणैः । नास्त्यात्मेति विनिश्चित्याप्रज्ञास्ते निरयालयाः ॥

apare nāstikā mūḍhā hīnatvātsthūlalakṣaṇaiḥ | nāstyātmeti viniścityāprajñāste nirayālayāḥ

दूसरे मूर्ख नास्तिक, हीन होने के कारण स्थूल लक्षणों से "आत्मा नहीं है" ऐसा निश्चय करके अज्ञानी होते हुए नरकवासी होते हैं।

श्लोक 58 (13.245.58)

एवं नानाविधा नैव विमृशन्ति महेश्वरम् ॥

evaṃ nānāvidhā naiva vimṛśanti maheśvaram

इस प्रकार नाना प्रकार के लोग महेश्वर का विचार नहीं करते।

उमोवाच

श्लोक 59 (13.245.59)

भगवन्ब्राह्मणो लोके नित्यमक्षरमव्ययम् । अस्त्यात्मा सर्वभूतेषु हेतुस्तत्र सुदुर्गमः ॥

bhagavanbrāhmaṇo loke nityamakṣaramavyayam | astyātmā sarvabhūteṣu hetustatra sudurgamaḥ

हे भगवन्! संसार में ब्राह्मण नित्य, अक्षर और अव्यय तत्त्व की बात कहता है कि सब प्राणियों में आत्मा है; पर उसका हेतु पाना अत्यन्त कठिन है।

महेश्वर उवाच

श्लोक 60 (13.245.60)

ऋषिभिश्चापि देवैश्च व्यक्तमेष न दृश्यते । दृष्ट्वा तु तं महात्मानं पुनस्तु न निवर्तते ॥

ṛṣibhiścāpi devaiśca vyaktameṣa na dṛśyate | dṛṣṭvā tu taṃ mahātmānaṃ punastu na nivartate

ऋषियों और देवताओं को भी वह स्पष्ट दिखाई नहीं देता; पर उस महात्मा को देख लेने पर मनुष्य फिर नहीं लौटता।

श्लोक 61 (13.245.61)

तस्मात्तद्दर्शनादेव विन्दते परमां गतिम् । इति ते कथितो देवि साङ्ख्यधर्मः सनातनः । कपिलादिभिराचार्यैः सेवितः परमर्षिभिः ॥

tasmāttaddarśanādeva vindate paramāṃ gatim | iti te kathito devi sāṅkhyadharmaḥ sanātanaḥ | kapilādibhirācāryaiḥ sevitaḥ paramarṣibhiḥ

इसलिए उसके दर्शन से ही मनुष्य परम गति पाता है। हे देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हें वह सनातन साङ्ख्य-धर्म बताया, जिसका कपिल आदि आचार्यों और महर्षियों ने सेवन किया है।

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