Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 246

महेश्वर द्वारा उमा को योगधर्म का उपदेश

महेश्वर उमा से कहते हैं कि सांख्य का मार्ग बता चुकने के बाद अब वे योग का धर्म कहेंगे: व्रत और संयम से तैयारी, आसन और बैठने की विधि, इन्द्रियों को मन में समेटना, तथा पाँच प्राणों के स्थान और कार्य। वे योगी के मार्ग में बाधा डालने वाले दस दोष और उसे मिलने वाली आठ सिद्धियाँ गिनाते हैं, आहार और निद्रा की अति से सावधान करते हैं, और देवताओं के सायुज्य को, विशेषतः अपने या विष्णु के सायुज्य को, लक्ष्य बताकर समाप्त करते हैं।

अध्याय 245अध्याय-सूचीअध्याय 247

महेश्वर उवाच

श्लोक 1 (13.246.1)

साङ्ख्यज्ञाने नियुक्तानां यथावत्कीर्तितं मया । योगधर्मं पुनः कृत्स्नं कीर्तयिष्यामि ते शृणु ॥

sāṅkhyajñāne niyuktānāṃ yathāvatkīrtitaṃ mayā | yogadharmaṃ punaḥ kṛtsnaṃ kīrtayiṣyāmi te śṛṇu

“सांख्यज्ञान में लगे हुए लोगों का मार्ग मैंने तुम्हें यथावत् बता दिया। अब योग के धर्म को फिर से पूर्ण रूप में बताऊँगा; सुनो।”

श्लोक 2 (13.246.2)

स च योगो द्विधा भिन्नो ब्रह्मदेवर्षिसम्मतः । समानमुभयत्रापि वृत्तं शास्त्रप्रचोदितम् ॥

sa ca yogo dvidhā bhinno brahmadevarṣisammataḥ | samānamubhayatrāpi vṛttaṃ śāstrapracoditam

“वह योग दो प्रकार का है और दोनों ही ब्रह्मा तथा देवर्षियों को मान्य हैं। शास्त्र ने जो आचरण बताया है, वह दोनों में एक-सा है।”

श्लोक 3 (13.246.3)

स चाष्टगुणमैश्वर्यमधिकृत्य विधीयते । सायुज्यं सर्वदेवानां योगधर्मं परं श्रिताः ॥

sa cāṣṭaguṇamaiśvaryamadhikṛtya vidhīyate | sāyujyaṃ sarvadevānāṃ yogadharmaṃ paraṃ śritāḥ

“वह आठ गुणों वाले ऐश्वर्य को लक्ष्य करके विहित है; और जिन्होंने परम योगधर्म का आश्रय लिया है, उन्हें सब देवताओं का सायुज्य प्राप्त होता है।”

श्लोक 4 (13.246.4)

ज्ञानं सर्वस्य योगस्य मूलमित्यवधारय । व्रतोपवासनियमैस्तत्सर्वं चापि बृंहयेत् ॥

jñānaṃ sarvasya yogasya mūlamityavadhāraya | vratopavāsaniyamaistatsarvaṃ cāpi bṛṃhayet

“जान लो कि ज्ञान ही समस्त योग का मूल है; और उस सबको व्रत, उपवास तथा नियमों से पुष्ट करना चाहिए।”

श्लोक 5 (13.246.5)

ऐकात्म्यं बुद्धिमनसोरिन्द्रियाणां च सर्वशः । आत्मनो वेदितं प्राज्ञे ज्ञानमेतत्तु योगिनाम् ॥

aikātmyaṃ buddhimanasorindriyāṇāṃ ca sarvaśaḥ | ātmano veditaṃ prājñe jñānametattu yoginām

“बुद्धि, मन और इन्द्रियों की सब प्रकार से एकता तथा आत्मा का बोध: हे प्राज्ञे, यही योगियों का ज्ञान है।”

श्लोक 6 (13.246.6)

अर्चयेद्ब्राह्मणानग्निं देवतायतनानि च । वर्जयेदशिवं भावं सर्वसत्त्वमुपाश्रितः ॥

arcayedbrāhmaṇānagniṃ devatāyatanāni ca | varjayedaśivaṃ bhāvaṃ sarvasattvamupāśritaḥ

“ब्राह्मणों, अग्नि और देवमन्दिरों की पूजा करनी चाहिए, और सब प्राणियों के हित का आश्रय लेकर अमंगल भाव का त्याग करना चाहिए।”

श्लोक 7 (13.246.7)

दानमध्ययनं श्रद्धा व्रतानि नियमास्तथा । सत्यमाहारशुद्धिश्च शौचमिन्द्रियनिग्रहः । एतैश्च वर्धते तेजः पापं चाप्यवधूयते ॥

dānamadhyayanaṃ śraddhā vratāni niyamāstathā | satyamāhāraśuddhiśca śaucamindriyanigrahaḥ | etaiśca vardhate tejaḥ pāpaṃ cāpyavadhūyate

“दान, अध्ययन, श्रद्धा, व्रत और नियम, सत्य, आहार की शुद्धि, शौच और इन्द्रियों का संयम: इनसे तेज बढ़ता है और पाप झड़ जाता है।”

श्लोक 8 (13.246.8)

निर्धूतपापस्तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । अमोधो निर्मलो दान्तः पश्चाद्योगं समाचरेत् ॥

nirdhūtapāpastejasvī laghvāhāro jitendriyaḥ | amodho nirmalo dāntaḥ paścādyogaṃ samācaret

“जब मनुष्य पाप से मुक्त, तेजस्वी, अल्पाहारी, जितेन्द्रिय, अमोघ, निर्मल और संयमी हो जाए, तभी उसे योग का अभ्यास करना चाहिए।”

श्लोक 9 (13.246.9)

अवरुध्यात्मनः पूर्वं मत्स्यघात इवामिषम् । एकान्ते विजने देशे सर्वतः संवृते शुचौ । कल्पयेदासनं तत्र स्वास्तीर्णं मृदुभिः कुशैः ॥

avarudhyātmanaḥ pūrvaṃ matsyaghāta ivāmiṣam | ekānte vijane deśe sarvataḥ saṃvṛte śucau | kalpayedāsanaṃ tatra svāstīrṇaṃ mṛdubhiḥ kuśaiḥ

“पहले अपने को वश में करके, जैसे मछुआरा चारे को सँभालता है, एकान्त, निर्जन, चारों ओर से ढके हुए और शुद्ध स्थान में कोमल कुशों से भली-भाँति बिछा हुआ आसन बनाए।”

श्लोक 10 (13.246.10)

उपविश्यासने तस्मिन्नृजुकायशिरोधरः । अव्यग्रः सुखमासीनः स्वाङ्गानि न विकम्पयेत् । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥

upaviśyāsane tasminnṛjukāyaśirodharaḥ | avyagraḥ sukhamāsīnaḥ svāṅgāni na vikampayet | samprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan

“उस आसन पर बैठकर, शरीर, सिर और गर्दन को सीधा रखे, अविचल और सुखपूर्वक स्थित रहे, अपने अंगों को न हिलाए, और दिशाओं की ओर न देखते हुए अपनी नासिका के अग्रभाग को देखता रहे।”

श्लोक 11 (13.246.11)

मनोऽवस्थापनं देवि योगस्योपनिषद्भवेत् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मनोऽवस्थापयेत्सदा ॥

mano'vasthāpanaṃ devi yogasyopaniṣadbhavet | tasmātsarvaprayatnena mano'vasthāpayetsadā

“हे देवि, मन को स्थिर करना योग का रहस्य है; इसलिए सब प्रयत्न से सदा मन को स्थिर रखना चाहिए।”

श्लोक 12 (13.246.12)

त्वक्छ्रोत्रं च ततो जिह्वा घ्राणं चक्षुश्च संहरेत् । पञ्चेन्द्रियाणि सन्धाय मनसि स्थापयेद्बुधः ॥

tvakchrotraṃ ca tato jihvā ghrāṇaṃ cakṣuśca saṃharet | pañcendriyāṇi sandhāya manasi sthāpayedbudhaḥ

“बुद्धिमान साधक त्वचा, कान, फिर जिह्वा, नाक और नेत्र को भीतर समेटे; और पाँचों इन्द्रियों को एकत्र करके मन में स्थापित करे।”

श्लोक 13 (13.246.13)

सर्वं चापोह्य सङ्कल्पमात्मनि स्थापयेन्मनः । यदैतान्यवतिष्ठन्ते मनःषष्ठानि चात्मनि ॥

sarvaṃ cāpohya saṅkalpamātmani sthāpayenmanaḥ | yadaitānyavatiṣṭhante manaḥṣaṣṭhāni cātmani

“सब संकल्पों को हटाकर वह मन को आत्मा में स्थापित करे। जब मन के सहित ये छहों आत्मा में टिक जाते हैं,”

श्लोक 14 (13.246.14)

प्राणापानौ तदा तस्य युगपत्तिष्ठतो वशे । प्राणे हि वशमापन्ने योगसिद्धिर्ध्रुवा भवेत् ॥

prāṇāpānau tadā tasya yugapattiṣṭhato vaśe | prāṇe hi vaśamāpanne yogasiddhirdhruvā bhavet

“तब उसके प्राण और अपान एक साथ उसके वश में रहते हैं; और प्राण के वश में आ जाने पर योग की सिद्धि निश्चित होती है।”

श्लोक 15 (13.246.15)

शरीरं चिन्तयेत्सर्वं विपाट्य च समीपतः । अन्तर्देहगतिं चापि प्राणानां परिचिन्तयेत् ॥

śarīraṃ cintayetsarvaṃ vipāṭya ca samīpataḥ | antardehagatiṃ cāpi prāṇānāṃ paricintayet

“वह सारे शरीर का चिन्तन करे, मानो उसे चीरकर अपने समीप देख रहा हो, और शरीर के भीतर प्राणों की गति का भी चिन्तन करे।”

श्लोक 16 (13.246.16)

ततो मूर्धानमग्निं च शरीरं परिपालयेत् । प्राणो मूर्धनि च श्वासो वर्तमाने विचेष्टते ॥

tato mūrdhānamagniṃ ca śarīraṃ paripālayet | prāṇo mūrdhani ca śvāso vartamāne viceṣṭate

“तब वह सिर, अग्नि और शरीर की रक्षा करे; क्योंकि सिर में स्थित प्राण और श्वास वहीं से अपना कार्य करते रहते हैं।”

श्लोक 17 (13.246.17)

सज्जस्तु सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयांश्च सः ॥

sajjastu sarvabhūtātmā puruṣaḥ sa sanātanaḥ | mano buddhirahaṅkāro bhūtāni viṣayāṃśca saḥ

“वह सनातन पुरुष, जो सब प्राणियों का आत्मा है, वहीं स्थित है; वही मन, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत और विषय भी है।”

श्लोक 18 (13.246.18)

बस्तिर्मूलं गुदं चैव पावकं च समाश्रितः । वहन्मूत्रं पुरीषं च सदाऽपानः प्रवर्तते ॥

bastirmūlaṃ gudaṃ caiva pāvakaṃ ca samāśritaḥ | vahanmūtraṃ purīṣaṃ ca sadā'pānaḥ pravartate

“मूत्राशय, मूल, गुदा और अग्नि का आश्रय लेकर अपान वायु सदा मूत्र और मल को बाहर ले जाता हुआ चलता है।”

श्लोक 19 (13.246.19)

अतः प्रवृत्तिर्देहेषु कर्म चापानसंयुतम् । उदीरयन्सर्वधातूनत ऊर्ध्वं प्रवर्तते । उदान इति तं विद्युरध्यात्मकुशला जनाः ॥

ataḥ pravṛttirdeheṣu karma cāpānasaṃyutam | udīrayansarvadhātūnata ūrdhvaṃ pravartate | udāna iti taṃ vidyuradhyātmakuśalā janāḥ

“इसी से देहधारियों में प्रवृत्ति होती है और अपान से जुड़ा कर्म चलता है। सब धातुओं को प्रेरित करता हुआ वह फिर ऊपर की ओर चलता है; अध्यात्म में कुशल लोग उसे उदान कहते हैं।”

श्लोक 20 (13.246.20)

सन्धौसन्धौ स निर्विष्टः सर्वचेष्टाप्रवर्तकः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥

sandhausandhau sa nirviṣṭaḥ sarvaceṣṭāpravartakaḥ | śarīreṣu manuṣyāṇāṃ vyāna ityupadiśyate

“जो प्रत्येक सन्धि में स्थित होकर सब चेष्टाओं को चलाता है, मनुष्यों के शरीर में उसे व्यान कहा जाता है।”

श्लोक 21 (13.246.21)

धातुष्वग्नौ च विततः समानोऽग्निः समीरणः । स एव सर्वचेष्टानामन्तकाले निवर्तकः ॥

dhātuṣvagnau ca vitataḥ samāno'gniḥ samīraṇaḥ | sa eva sarvaceṣṭānāmantakāle nivartakaḥ

“समान वायु, जो स्वयं अग्नि-रूप है, धातुओं और अग्नि में फैला रहता है; वही अन्त समय में सब चेष्टाओं को रोक देता है।”

श्लोक 22 (13.246.22)

प्राणानां सन्निपातेषु संसर्गाद्यः प्रजायते । ऊष्मा सोऽग्निरिति ज्ञेयः सोऽन्नं पचति देहिनाम् ॥

prāṇānāṃ sannipāteṣu saṃsargādyaḥ prajāyate | ūṣmā so'gniriti jñeyaḥ so'nnaṃ pacati dehinām

“प्राणों के मिलने और संसर्ग से जो ऊष्मा उत्पन्न होती है, उसे अग्नि जानना चाहिए; वही देहधारियों के अन्न को पचाती है।”

श्लोक 23 (13.246.23)

अपानप्राणयोर्मध्ये व्यानोदानावुपाश्रितौ । समन्वितः समानेन सम्यक्पचति पावकः ॥

apānaprāṇayormadhye vyānodānāvupāśritau | samanvitaḥ samānena samyakpacati pāvakaḥ

“अपान और प्राण के बीच व्यान और उदान स्थित हैं; समान से युक्त होकर वह अग्नि भली-भाँति अन्न पचाती है।”

श्लोक 24 (13.246.24)

शरीरमध्ये नाभिः स्यान्नाभ्यामग्निः प्रतिष्ठितः । अग्नौ प्राणाश्च संयुक्ताः प्राणेष्वात्मा व्यवस्थितः ॥

śarīramadhye nābhiḥ syānnābhyāmagniḥ pratiṣṭhitaḥ | agnau prāṇāśca saṃyuktāḥ prāṇeṣvātmā vyavasthitaḥ

“शरीर के मध्य में नाभि है; नाभि में अग्नि प्रतिष्ठित है; अग्नि में प्राण जुड़े हैं; और प्राणों में आत्मा स्थित है।”

श्लोक 25 (13.246.25)

पक्वाशयस्त्वधो नाभेरूर्ध्वमामाशयस्तथा । नाभिर्मध्ये शरीरस्य सर्वप्राणाश्च संश्रिताः ॥

pakvāśayastvadho nābherūrdhvamāmāśayastathā | nābhirmadhye śarīrasya sarvaprāṇāśca saṃśritāḥ

“नाभि के नीचे पक्वाशय है और ऊपर आमाशय है; नाभि शरीर के मध्य में है और सब प्राण उसी के आश्रित हैं।”

श्लोक 26 (13.246.26)

स्थिताः प्राणादयः सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधश्चराः । वहन्त्यन्नरसान्नाड्यो दशप्राणाग्निचोदिताः ॥

sthitāḥ prāṇādayaḥ sarve tiryagūrdhvamadhaścarāḥ | vahantyannarasānnāḍyo daśaprāṇāgnicoditāḥ

“प्राण आदि सब वायु वहीं स्थित हैं, जो तिरछे, ऊपर और नीचे चलते हैं; और प्राण तथा अग्नि से प्रेरित दस नाड़ियाँ अन्न के रस को वहन करती हैं।”

श्लोक 27 (13.246.27)

योगिनामेष मार्गस्तु पञ्चस्वेतेषु तिष्ठति । जितश्रमः समासीनो मूर्धन्यात्मानमादधेत् ॥

yogināmeṣa mārgastu pañcasveteṣu tiṣṭhati | jitaśramaḥ samāsīno mūrdhanyātmānamādadhet

“यही योगियों का मार्ग है, और वह इन पाँचों पर टिका है। थकान को जीतकर, बैठकर, वह अपने को मस्तक में स्थापित करे।”

श्लोक 28 (13.246.28)

मूर्धन्यात्मानमाधाय भ्रुवोर्मध्ये मनस्तथा । सन्निरुध्य ततः प्राणानात्मानं चिन्तयेत्परम् ॥

mūrdhanyātmānamādhāya bhruvormadhye manastathā | sannirudhya tataḥ prāṇānātmānaṃ cintayetparam

“अपने को मस्तक में स्थिर करके और उसी प्रकार मन को भौंहों के बीच टिकाकर, फिर प्राणों को रोककर परमात्मा का चिन्तन करे।”

श्लोक 29 (13.246.29)

प्राणे त्वपानं युञ्जीत प्राणांश्चापानकर्मणि । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरो भवेत् ॥

prāṇe tvapānaṃ yuñjīta prāṇāṃścāpānakarmaṇi | prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparo bhavet

“वह प्राण में अपान को और अपान के कर्म में प्राण को जोड़े; प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम में तत्पर हो।”

श्लोक 30 (13.246.30)

एवमन्तः प्रयुञ्जीत पञ्च प्राणान्परस्परम् । विजने सम्मिताहारो मुनिस्तूष्णीं निरुच्छ्वसन् ॥

evamantaḥ prayuñjīta pañca prāṇānparasparam | vijane sammitāhāro munistūṣṇīṃ nirucchvasan

“इस प्रकार वह एकान्त में, परिमित आहार करता हुआ, मौन रहकर और बहुत थोड़ी साँस लेते हुए, पाँचों प्राणों को भीतर एक-दूसरे से जोड़े।”

श्लोक 31 (13.246.31)

अश्रान्तश्चिन्तयेद्योगी उत्थाय च पुनःपुनः । तिष्ठन्गच्छन्स्वपंश्चापि युञ्जीतैवमतन्द्रितः ॥

aśrāntaścintayedyogī utthāya ca punaḥpunaḥ | tiṣṭhangacchansvapaṃścāpi yuñjītaivamatandritaḥ

“योगी थके बिना बार-बार उठकर ध्यान करे; खड़े, चलते और सोते हुए भी आलस्य छोड़कर इसी प्रकार अभ्यास करे।”

श्लोक 32 (13.246.32)

एवं नियुञ्जतस्तस्य योगिनो युक्तचेतसः । प्रसीदति मनः क्षिप्रं प्रसन्ने दृश्यते परम् ॥

evaṃ niyuñjatastasya yogino yuktacetasaḥ | prasīdati manaḥ kṣipraṃ prasanne dṛśyate param

“इस प्रकार अभ्यास करते हुए एकाग्रचित्त योगी का मन शीघ्र प्रसन्न हो जाता है, और मन के प्रसन्न होने पर परम तत्त्व दिखाई देता है।”

श्लोक 33 (13.246.33)

विधूम इव दीप्तोऽग्निरादित्य इव रश्मिवान् । वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे पुरुषो दृश्यतेऽव्ययः ॥

vidhūma iva dīpto'gnirāditya iva raśmivān | vaidyuto'gnirivākāśe puruṣo dṛśyate'vyayaḥ

“वह अविनाशी पुरुष धूमरहित जलती हुई अग्नि के समान, किरणों वाले सूर्य के समान और आकाश में चमकती बिजली के समान दिखाई देता है।”

श्लोक 34 (13.246.34)

दृष्ट्वा तदात्मनो ज्योतिरैश्वर्याष्टगुणैर्युतः । प्राप्नोति परमं स्थानं स्पृहणीयं सुरैरपि ॥

dṛṣṭvā tadātmano jyotiraiśvaryāṣṭaguṇairyutaḥ | prāpnoti paramaṃ sthānaṃ spṛhaṇīyaṃ surairapi

“आत्मा की उस ज्योति को, जो ऐश्वर्य के आठ गुणों से युक्त है, देखकर वह उस परम स्थान को पाता है जिसकी देवता भी अभिलाषा करते हैं।”

श्लोक 35 (13.246.35)

इमान्योगस्य दोषांश्च दशैव परिचक्षते । दोषैर्विघ्ने वरारोहे योगिनां कविभिः स्मृताः ॥

imānyogasya doṣāṃśca daśaiva paricakṣate | doṣairvighne varārohe yogināṃ kavibhiḥ smṛtāḥ

“हे सुन्दरि, योग के दोष ठीक दस बताए जाते हैं; विद्वान उन्हें योगियों के मार्ग में दोषों से आने वाले विघ्न के रूप में स्मरण करते हैं।”

श्लोक 36 (13.246.36)

कामः क्रोधो भयं स्वप्नः स्नेहमत्यशनं तथा । वैचित्यं व्याधिरालस्यं लोभं च दशमं स्मृतम् ॥

kāmaḥ krodho bhayaṃ svapnaḥ snehamatyaśanaṃ tathā | vaicityaṃ vyādhirālasyaṃ lobhaṃ ca daśamaṃ smṛtam

“काम, क्रोध, भय, निद्रा, स्नेह, अधिक भोजन, चित्त की विकलता, रोग, आलस्य और दसवाँ लोभ: ये दस माने गए हैं।”

श्लोक 37 (13.246.37)

एतैस्तेषां भवेद्विघ्नो दशभिर्देवकारितैः । तस्मादेतानपास्यादौ युञ्जीत च परं मनः ॥

etaisteṣāṃ bhavedvighno daśabhirdevakāritaiḥ | tasmādetānapāsyādau yuñjīta ca paraṃ manaḥ

“देवताओं द्वारा रचे गए इन दसों से उनके लिए विघ्न होता है; इसलिए पहले इन्हें त्यागकर फिर परम में मन को लगाना चाहिए।”

श्लोक 38 (13.246.38)

इमानपि गुणानष्टौ योगस्य परिचक्षते । गुणैस्तैरष्टभिर्द्रव्यमैश्वर्यमधिगम्यते ॥

imānapi guṇānaṣṭau yogasya paricakṣate | guṇaistairaṣṭabhirdravyamaiśvaryamadhigamyate

“योग के ये आठ गुण भी बताए जाते हैं; उन आठ गुणों के द्वारा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।”

श्लोक 39 (13.246.39)

अणिमा महिमा चैव प्राप्तिः प्राकाम्यमेव हि । ईशित्वं च वशित्वं च यत्र कामावसायिता ॥

aṇimā mahimā caiva prāptiḥ prākāmyameva hi | īśitvaṃ ca vaśitvaṃ ca yatra kāmāvasāyitā

“वे हैं: अणिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, तथा यत्रकामावसायिता, जिसमें हर इच्छा पूर्ण हो जाती है।”

श्लोक 40 (13.246.40)

एतानष्टौ गुणान्प्राप्य कथञ्चिद्योगिनां वराः । ईशाः सर्वस्य लोकस्य देवानप्यतिशेरते ॥

etānaṣṭau guṇānprāpya kathañcidyogināṃ varāḥ | īśāḥ sarvasya lokasya devānapyatiśerate

“इन आठ गुणों को किसी प्रकार पाकर योगियों में श्रेष्ठ पुरुष सारे लोक के स्वामी हो जाते हैं और देवताओं से भी बढ़ जाते हैं।”

श्लोक 41 (13.246.41)

योगोऽस्ति नैवात्यशिनो न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य नातिजागरतस्तथा ॥

yogo'sti naivātyaśino na caikāntamanaśnataḥ | na cātisvapnaśīlasya nātijāgaratastathā

“जो बहुत खाता है उसके लिए योग नहीं है, और जो बिलकुल नहीं खाता उसके लिए भी नहीं; जो बहुत सोता है उसके लिए नहीं, और जो बहुत जागता है उसके लिए भी नहीं।”

श्लोक 42 (13.246.42)

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu | yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā

“जिसका आहार-विहार नियमित है, कर्मों में चेष्टा नियमित है, और सोना-जागना नियमित है, उसके लिए योग दुःख का नाश करने वाला होता है।”

श्लोक 43 (13.246.43)

अनेनैव विधानेन सायुज्यं तत्प्रकल्प्यते । सायुज्यं देवसात्कृत्वा प्रयुञ्जीतात्मभक्तितः ॥

anenaiva vidhānena sāyujyaṃ tatprakalpyate | sāyujyaṃ devasātkṛtvā prayuñjītātmabhaktitaḥ

“इसी विधि से सायुज्य सिद्ध होता है; देवताओं के साथ उस सायुज्य को अपना बनाकर साधक आत्मभक्ति से उसका अभ्यास करे।”

श्लोक 44 (13.246.44)

अनन्यमनसा देवि नित्यं तद्गतचेतसा । सायुज्यं प्राप्यते देवैर्यत्नेन महता चिरात् ॥

ananyamanasā devi nityaṃ tadgatacetasā | sāyujyaṃ prāpyate devairyatnena mahatā cirāt

“हे देवि, एकाग्र मन से और सदा उसी में चित्त लगाए रखने पर बड़े प्रयत्न से, बहुत समय के बाद देवताओं का सायुज्य प्राप्त होता है।”

श्लोक 45 (13.246.45)

हविर्भिरर्चनैर्होमैः प्रणामैर्नित्यचिन्तया । अर्चयित्वा यथाशक्ति स्वकं देशं विशन्ति ते ॥

havirbhirarcanairhomaiḥ praṇāmairnityacintayā | arcayitvā yathāśakti svakaṃ deśaṃ viśanti te

“हविष्य, पूजन, होम, प्रणाम और नित्य चिन्तन से यथाशक्ति आराधना करके वे अपने लोक में प्रवेश करते हैं।”

श्लोक 46 (13.246.46)

सायुज्यानां विशिष्टं च मामकं वैष्णवं तथा । मां प्राप्य न निवर्तन्ते विष्णुं वा शुभलोचने ॥

sāyujyānāṃ viśiṣṭaṃ ca māmakaṃ vaiṣṇavaṃ tathā | māṃ prāpya na nivartante viṣṇuṃ vā śubhalocane

“सायुज्यों में श्रेष्ठ मेरा और विष्णु का सायुज्य है; हे सुनयने, मुझे या विष्णु को पाकर वे लौटकर नहीं आते।”

श्लोक 47 (13.246.47)

इति ते कथितो देवि योगधर्मः सनातनः । न शक्यः प्रष्टुमन्येन योगधर्मस्त्वया विना ॥

iti te kathito devi yogadharmaḥ sanātanaḥ | na śakyaḥ praṣṭumanyena yogadharmastvayā vinā

“हे देवि, इस प्रकार मैंने तुम्हें सनातन योगधर्म बता दिया; तुम्हारे सिवा दूसरा कोई योगधर्म के विषय में पूछ नहीं सकता।”

अध्याय 245अध्याय-सूचीअध्याय 247