Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 247

महेश्वर द्वारा पाशुपतों और शिवलिंग-पूजा का वर्णन

उमा महेश्वर की स्तुति करके पूछती हैं कि उनके भक्त उनकी सेवा कैसे करते हैं और उनका सायुज्य कैसे पाते हैं। महेश्वर बताते हैं कि उन्होंने चारों आश्रमों से चार ब्राह्मणों को चुनकर उन्हें महान् पाशुपत योग सिखाया, भस्म रमाने वाले अपने पाशुपत भक्तों का वर्णन करते हैं, और कहते हैं कि शिवलिंग को किया गया एक प्रणाम यज्ञों और दानों से बढ़कर है। वे दूध, घी, जल, धूप और फूलों से लिंग-पूजा के फल गिनाते हैं, अपने प्रिय पत्र-पुष्प बताते हैं, और भक्तों तथा उनसे द्वेष करने वालों की गति कहकर समाप्त करते हैं।

अध्याय 246अध्याय-सूचीअध्याय 248

उमोवाच

श्लोक 1 (13.247.1)

त्रियक्ष त्रिदशश्रेष्ठ त्र्यम्बक त्रिदशाधिप । त्रिपुरान्तक कामाङ्गहर त्रिपथगाधर ॥

triyakṣa tridaśaśreṣṭha tryambaka tridaśādhipa | tripurāntaka kāmāṅgahara tripathagādhara

“हे त्रियक्ष, देवताओं में श्रेष्ठ, हे त्र्यम्बक, देवताओं के अधिपति, त्रिपुर के विनाशक, कामदेव के शरीर का नाश करने वाले, त्रिपथगा गंगा को धारण करने वाले,”

श्लोक 2 (13.247.2)

दक्षयज्ञप्रशमन शूलपाणेऽरिसूदन । नमस्ते लोकपालेश लोकपालवरप्रद ॥

dakṣayajñapraśamana śūlapāṇe'risūdana | namaste lokapāleśa lokapālavaraprada

“दक्ष के यज्ञ को शान्त करने वाले, शूलपाणि, शत्रुओं का संहार करने वाले: लोकपालों के ईश्वर और लोकपालों को वर देने वाले, आपको नमस्कार है।”

श्लोक 3 (13.247.3)

नैकशाखमपर्यन्तमध्यात्मज्ञानमुत्तमम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं साङ्ख्ययोगसमन्वितम् ॥

naikaśākhamaparyantamadhyātmajñānamuttamam | apratarkyamavijñeyaṃ sāṅkhyayogasamanvitam

“आत्मज्ञान, जो अनेक शाखाओं वाला, अन्तरहित, तर्क से परे और अज्ञेय है, और सांख्य तथा योग से युक्त है,”

श्लोक 4 (13.247.4)

भवता परिपृष्टेन शृण्वन्त्या मम भाषितम् । इदानीं श्रोतुमिच्छामि सायुज्यं त्वद्गतं विभो ॥

bhavatā paripṛṣṭena śṛṇvantyā mama bhāṣitam | idānīṃ śrotumicchāmi sāyujyaṃ tvadgataṃ vibho

“उसे आपने पूछे जाने पर मुझे सुनाया, और मैंने सुना। अब हे विभो, मैं आपके सायुज्य के विषय में सुनना चाहती हूँ।”

श्लोक 5 (13.247.5)

कथं परिचरन्त्येते भक्तास्त्वां परमेष्ठिनम् । आचारः कीदृशस्तेषां केन तुष्टो भवेद्भवान् । वर्ण्यमानं त्वया साक्षात्प्रीणयत्यधिकं हि माम् ॥

kathaṃ paricarantyete bhaktāstvāṃ parameṣṭhinam | ācāraḥ kīdṛśasteṣāṃ kena tuṣṭo bhavedbhavān | varṇyamānaṃ tvayā sākṣātprīṇayatyadhikaṃ hi mām

“ये भक्त आप परमेष्ठी की सेवा कैसे करते हैं? उनका आचार कैसा है, और आप किससे प्रसन्न होते हैं? क्योंकि आपके स्वयं वर्णन करने पर वह मुझे और भी अधिक प्रसन्न करता है।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 6 (13.247.6)

हन्त ते कथयिष्यामि मम सायुज्यमद्भुतम् । येन ते न निवर्तन्ते युक्ताः परमयोगिनः ॥

hanta te kathayiṣyāmi mama sāyujyamadbhutam | yena te na nivartante yuktāḥ paramayoginaḥ

“सुनो, मैं तुम्हें अपने अद्भुत सायुज्य के विषय में बताऊँगा, जिसे पाकर वे युक्त परम योगी लौटकर नहीं आते।”

श्लोक 7 (13.247.7)

अव्यक्तोऽहमचिन्त्योऽहं पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । साङ्ख्ययोगौ मया सृष्टौ सर्वं चापि चराचरम् ॥

avyakto'hamacintyo'haṃ pūrvairapi mumukṣubhiḥ | sāṅkhyayogau mayā sṛṣṭau sarvaṃ cāpi carācaram

“मैं अव्यक्त हूँ, मैं अचिन्त्य हूँ, पहले के मोक्ष चाहने वालों के लिए भी। सांख्य और योग को मैंने रचा है, और इस सारे चराचर जगत् को भी।”

श्लोक 8 (13.247.8)

अर्चनीयोऽहमीशोऽहमव्ययोऽहं सनातनः । अहं प्रसन्नो भक्तानां ददाम्यमरतामपि ॥

arcanīyo'hamīśo'hamavyayo'haṃ sanātanaḥ | ahaṃ prasanno bhaktānāṃ dadāmyamaratāmapi

“मैं पूजनीय हूँ, मैं ईश्वर हूँ, मैं अविनाशी और सनातन हूँ। भक्तों पर प्रसन्न होकर मैं उन्हें अमरता तक दे देता हूँ।”

श्लोक 9 (13.247.9)

न मां विदुः सुरगणा मुनयश्च तपोधनाः । त्वत्प्रियार्थमहं देवि मद्विभूतिं ब्रवीमि ते ॥

na māṃ viduḥ suragaṇā munayaśca tapodhanāḥ | tvatpriyārthamahaṃ devi madvibhūtiṃ bravīmi te

“देवगण मुझे नहीं जानते, और तपोधन मुनि भी नहीं। हे देवि, तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैं तुम्हें अपनी विभूति बताता हूँ।”

श्लोक 10 (13.247.10)

आश्रमेभ्यश्चतुर्भ्योऽहं चतुरो ब्राह्मणाञ्शुभे । मद्भक्तान्निर्मलान्पुण्यान्समानीय तपस्विनः ॥

āśramebhyaścaturbhyo'haṃ caturo brāhmaṇāñśubhe | madbhaktānnirmalānpuṇyānsamānīya tapasvinaḥ

“हे शुभे, मैंने चारों आश्रमों से चार ब्राह्मणों को, जो मेरे भक्त, निर्मल, पुण्यात्मा और तपस्वी थे, बुलाया,”

श्लोक 11 (13.247.11)

व्याचख्येऽहं तथा देवि योगं पाशुपतं महत् । गृहीतं तच्च तैः सर्वं मुखाच्च मम दक्षिणात् ॥

vyācakhye'haṃ tathā devi yogaṃ pāśupataṃ mahat | gṛhītaṃ tacca taiḥ sarvaṃ mukhācca mama dakṣiṇāt

“और हे देवि, उन्हें महान् पाशुपत योग समझाया। उन्होंने वह सब मेरे दाहिने मुख से ग्रहण किया,”

श्लोक 12 (13.247.12)

श्रुत्वा तत्त्रिषु लोकेषु स्थापितं चापि तैः पुनः । इदानीं च त्वया पृष्टो वदाम्येकमनाः शृणु ॥

śrutvā tattriṣu lokeṣu sthāpitaṃ cāpi taiḥ punaḥ | idānīṃ ca tvayā pṛṣṭo vadāmyekamanāḥ śṛṇu

“और सुनकर उन्होंने उसे फिर तीनों लोकों में स्थापित किया। अब तुमने पूछा है, इसलिए मैं कहता हूँ; एकाग्र मन से सुनो।”

श्लोक 13 (13.247.13)

अहं पशुपतिर्नाम मद्भक्ता ये च मानवाः । सर्वे पाशुपता ज्ञेया भस्मदिग्धतनूरुहाः ॥

ahaṃ paśupatirnāma madbhaktā ye ca mānavāḥ | sarve pāśupatā jñeyā bhasmadigdhatanūruhāḥ

“मैं पशुपति नाम से जाना जाता हूँ; और जो मनुष्य मेरे भक्त हैं, उन सबको पाशुपत जानना चाहिए, जिनके शरीर भस्म से लिपे रहते हैं।”

श्लोक 14 (13.247.14)

रक्षार्थं मङ्गलार्थं च पवित्रार्थं च भामिनि । लिङ्गार्थं चैव भक्तानां भस्म दत्तं मया पुरा ॥

rakṣārthaṃ maṅgalārthaṃ ca pavitrārthaṃ ca bhāmini | liṅgārthaṃ caiva bhaktānāṃ bhasma dattaṃ mayā purā

“हे भामिनि, रक्षा के लिए, मंगल के लिए, पवित्रता के लिए और भक्तों के चिह्न के रूप में मैंने पहले भस्म दी थी।”

श्लोक 15 (13.247.15)

तेन संदिग्धसर्वाङ्गा भस्मना ब्रह्मचारिणः । जटिला मुण्डिता वाऽपि नानाकारशिखण्डिनः ॥

tena saṃdigdhasarvāṅgā bhasmanā brahmacāriṇaḥ | jaṭilā muṇḍitā vā'pi nānākāraśikhaṇḍinaḥ

“उसी से सारा शरीर भस्म से लिपे हुए वे ब्रह्मचारी हैं; कुछ जटाधारी हैं, कुछ मुण्डित हैं, कुछ अनेक प्रकार की शिखाएँ रखते हैं,”

श्लोक 16 (13.247.16)

विकृताः पिङ्गलाभाश्च नग्ना नानाप्रकारिणः । भैक्षं चरन्तः सर्वत्र निःस्पृहा निष्परिग्रहाः ॥

vikṛtāḥ piṅgalābhāśca nagnā nānāprakāriṇaḥ | bhaikṣaṃ carantaḥ sarvatra niḥspṛhā niṣparigrahāḥ

“कोई विकृत रूप के, कोई पीले-भूरे वर्ण के, कोई नग्न, अनेक प्रकार के वेश में, सब जगह भिक्षा माँगते हुए, निस्पृह और अपरिग्रही,”

श्लोक 17 (13.247.17)

मृत्पात्रहस्ता मद्भक्ता मन्निवेशितबुद्ध्यः । चरन्तो निखिलं लोकं मम हर्षविवर्धनाः ॥

mṛtpātrahastā madbhaktā manniveśitabuddhyaḥ | caranto nikhilaṃ lokaṃ mama harṣavivardhanāḥ

“हाथों में मिट्टी के पात्र लिए हुए मेरे भक्त, जिनकी बुद्धि मुझमें लगी है, सारे संसार में घूमते हुए मेरा हर्ष बढ़ाते हैं।”

श्लोक 18 (13.247.18)

मम पाशुपतं दिव्यं योगशास्त्रमनुत्तमम् । सूक्ष्मं सर्वेषु लोकेषु विमृशन्तश्चरन्ति ते ॥

mama pāśupataṃ divyaṃ yogaśāstramanuttamam | sūkṣmaṃ sarveṣu lokeṣu vimṛśantaścaranti te

“वे सब लोकों में मेरे दिव्य, अनुपम और सूक्ष्म पाशुपत योगशास्त्र का मनन करते हुए विचरते हैं।”

श्लोक 19 (13.247.19)

एवं नित्याभियुक्तानां मद्भक्तानां तपस्विनाम् । उपायं चिन्तयाम्याशु येन मामुपयान्ति ते ॥

evaṃ nityābhiyuktānāṃ madbhaktānāṃ tapasvinām | upāyaṃ cintayāmyāśu yena māmupayānti te

“इस प्रकार सदा लगे रहने वाले मेरे भक्त तपस्वियों के लिए मैं शीघ्र वह उपाय सोचता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त हों।”

श्लोक 20 (13.247.20)

स्थापितं त्रिषु लोकेषु शिवलिङ्गं मया मम । नमस्कारेण वा तस्य मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ॥

sthāpitaṃ triṣu lokeṣu śivaliṅgaṃ mayā mama | namaskāreṇa vā tasya mucyante sarvakilbiṣaiḥ

“मैंने तीनों लोकों में अपना शिवलिंग स्थापित किया है; उसे प्रणाम करने से ही वे सब पापों से छूट जाते हैं।”

श्लोक 21 (13.247.21)

इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः । शिवलिङ्गप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

iṣṭaṃ dattamadhītaṃ ca yajñāśca bahudakṣiṇāḥ | śivaliṅgapraṇāmasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm

“यज्ञ, दान, अध्ययन और बहुत दक्षिणा वाले यज्ञ भी शिवलिंग को किए गए प्रणाम की सोलहवीं कला के बराबर नहीं हैं।”

श्लोक 22 (13.247.22)

अर्चया शिवलिङ्गस्य परितुष्याम्यहं प्रिये । शिवलिङ्गार्चनायां तु विधानमपि मे शृणु ॥

arcayā śivaliṅgasya parituṣyāmyahaṃ priye | śivaliṅgārcanāyāṃ tu vidhānamapi me śṛṇu

“हे प्रिये, शिवलिंग की पूजा से मैं सन्तुष्ट होता हूँ। अब शिवलिंग की पूजा की विधि भी मुझसे सुनो।”

श्लोक 23 (13.247.23)

गोक्षीरनवनीताभ्यामर्चयेद्यः शिवं मम । इष्टस्य हयमेधस्य यत्फलं तत्फलं भवेत् ॥

gokṣīranavanītābhyāmarcayedyaḥ śivaṃ mama | iṣṭasya hayamedhasya yatphalaṃ tatphalaṃ bhavet

“जो गाय के दूध और मक्खन से मेरे शिव की पूजा करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ करने का फल मिलता है।”

श्लोक 24 (13.247.24)

घृतमण्डेन यो नित्यमर्चयेद्धि शिवं मम । स फलं प्राप्नुयान्मर्त्यो ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः ॥

ghṛtamaṇḍena yo nityamarcayeddhi śivaṃ mama | sa phalaṃ prāpnuyānmartyo brāhmaṇasyāgnihotriṇaḥ

“जो मनुष्य घी के मण्ड से नित्य मेरे शिव की पूजा करता है, वह अग्निहोत्री ब्राह्मण के फल को प्राप्त करता है।”

श्लोक 25 (13.247.25)

केवलेनापि तोयेन स्नापयेद्यः शिवं मम । स चापि लभते पुण्यं प्रियं च लभते नरः ॥

kevalenāpi toyena snāpayedyaḥ śivaṃ mama | sa cāpi labhate puṇyaṃ priyaṃ ca labhate naraḥ

“जो केवल जल से भी मेरे शिव को स्नान कराता है, वह पुण्य पाता है और प्रिय वस्तु भी पाता है।”

श्लोक 26 (13.247.26)

सघृतं गुग्गुलु सम्यग्धूपयेद्यः शिवान्तिके । गोसवस्य तु यज्ञस्य यत्फलं तस्य तद्भवेत् ॥

saghṛtaṃ guggulu samyagdhūpayedyaḥ śivāntike | gosavasya tu yajñasya yatphalaṃ tasya tadbhavet

“जो शिव के समीप घी के साथ गुग्गुल को विधिपूर्वक धूप के रूप में जलाता है, उसे गोसव यज्ञ का फल मिलता है।”

श्लोक 27 (13.247.27)

यस्तु गुग्गुलपिण्डेन केवलेनापि धूपयेत् । तस्य रुक्मप्रधानस्य यत्फलं तस्य तद्भवेत् ॥

yastu guggulapiṇḍena kevalenāpi dhūpayet | tasya rukmapradhānasya yatphalaṃ tasya tadbhavet

“और जो केवल गुग्गुल का पिण्ड भी जलाता है, उसे उस यज्ञ का फल मिलता है जिसमें स्वर्ण प्रधान दान होता है।”

श्लोक 28 (13.247.28)

यस्तु नानाविधैः पुष्पैर्मम लिङ्गं समर्चयेत् । स हि धेनुसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥

yastu nānāvidhaiḥ puṣpairmama liṅgaṃ samarcayet | sa hi dhenusahasrasya dattasya phalamāpnuyāt

“जो अनेक प्रकार के फूलों से मेरे लिंग की पूजा करता है, वह हजार गायों के दान का फल पाता है।”

श्लोक 29 (13.247.29)

यस्तु देशान्तरं गत्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत् । तस्मात्सर्वमनुष्येषु नास्ति मे प्रियकृत्तमः ॥

yastu deśāntaraṃ gatvā śivaliṅgaṃ samarcayet | tasmātsarvamanuṣyeṣu nāsti me priyakṛttamaḥ

“जो दूसरे देश में जाकर शिवलिंग की पूजा करता है, उससे बढ़कर सब मनुष्यों में मेरा प्रिय करने वाला कोई नहीं है।”

श्लोक 30 (13.247.30)

एवं नानाविधैर्द्रव्यैः शिवलिङ्गं समर्चयेत् । मत्समानो मनुष्येषु न पुनर्जायते नरः ॥

evaṃ nānāvidhairdravyaiḥ śivaliṅgaṃ samarcayet | matsamāno manuṣyeṣu na punarjāyate naraḥ

“इस प्रकार जो अनेक प्रकार की वस्तुओं से शिवलिंग की पूजा करता है, वह मनुष्यों में मेरे समान हो जाता है और फिर जन्म नहीं लेता।”

श्लोक 31 (13.247.31)

अर्चनाभिर्नमस्कारैरुपहारैः स्तवैरपि । भक्तो मामर्चयेन्नित्यं शिवलिङ्गेष्वतन्द्रितः ॥

arcanābhirnamaskārairupahāraiḥ stavairapi | bhakto māmarcayennityaṃ śivaliṅgeṣvatandritaḥ

“भक्त को निरन्तर, बिना आलस्य के, पूजन, नमस्कार, उपहार और स्तुतियों से शिवलिंगों में मेरी आराधना करनी चाहिए।”

श्लोक 32 (13.247.32)

पलाशबिल्वपत्राणि राजवृक्षस्रजं तथा । अर्कपुष्पाणि मेध्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः ॥

palāśabilvapatrāṇi rājavṛkṣasrajaṃ tathā | arkapuṣpāṇi medhyāni matpriyāṇi viśeṣataḥ

“पलाश और बिल्व के पत्ते, राजवृक्ष की मालाएँ और पवित्र अर्क के फूल मुझे विशेष प्रिय हैं।”

श्लोक 33 (13.247.33)

फलं वा यदि वा शाकं पुष्पं वा यदि वा जलम् । दत्तं सम्प्रीणयेद्देवि भक्तैर्मद्गतमानसैः ॥

phalaṃ vā yadi vā śākaṃ puṣpaṃ vā yadi vā jalam | dattaṃ samprīṇayeddevi bhaktairmadgatamānasaiḥ

“फल हो, शाक हो, फूल हो या जल, हे देवि, मुझमें मन लगाने वाले भक्त जो अर्पित करते हैं, वह मुझे प्रसन्न करता है।”

श्लोक 34 (13.247.34)

ममाभिपरितुष्टस्य नास्ति लोकेषु दुर्लभम् । तस्मात्ते सततं भक्ता मामेवाभ्यर्चयन्त्युत ॥

mamābhiparituṣṭasya nāsti lokeṣu durlabham | tasmātte satataṃ bhaktā māmevābhyarcayantyuta

“जिस पर मैं पूर्ण रूप से प्रसन्न होता हूँ, उसके लिए लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं; इसीलिए मेरे भक्त सदा मेरी ही पूजा करते हैं।”

श्लोक 35 (13.247.35)

मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः । मद्भक्ताः सर्वलोकेषु पूजनीया विशेषतः ॥

madbhaktā na vinaśyanti madbhaktā vītakalmaṣāḥ | madbhaktāḥ sarvalokeṣu pūjanīyā viśeṣataḥ

“मेरे भक्त नष्ट नहीं होते; मेरे भक्त निष्पाप होते हैं; मेरे भक्त सब लोकों में विशेष रूप से पूजनीय हैं।”

श्लोक 36 (13.247.36)

मद्द्वेषिणश्च ये मर्त्या मद्भक्तद्वेषिणश्च वा । यान्ति ते नरकं घोरमिष्ट्वा क्रतुशतैरपि ॥

maddveṣiṇaśca ye martyā madbhaktadveṣiṇaśca vā | yānti te narakaṃ ghoramiṣṭvā kratuśatairapi

“जो मनुष्य मुझसे द्वेष करते हैं, या मेरे भक्तों से द्वेष करते हैं, वे सैकड़ों यज्ञ करके भी घोर नरक में जाते हैं।”

श्लोक 37 (13.247.37)

एतत्ते सर्वमाख्यातं योगं पाशुपतं महत् । मद्भक्तैर्मनुजैर्देवि श्राव्यमेतद्दिनेदिने ॥

etatte sarvamākhyātaṃ yogaṃ pāśupataṃ mahat | madbhaktairmanujairdevi śrāvyametaddinedine

“हे देवि, मैंने तुम्हें यह सब, महान् पाशुपत योग, बता दिया। मेरे भक्त मनुष्यों को यह प्रतिदिन सुनाया जाना चाहिए।”

श्लोक 38 (13.247.38)

शृणुयाद्यः पठेद्वाऽपि ममेदं धर्मनिश्चयम् । स्वर्गं कीर्तिं धनं धान्यं स लभेत नरोत्तमः ॥

śṛṇuyādyaḥ paṭhedvā'pi mamedaṃ dharmaniścayam | svargaṃ kīrtiṃ dhanaṃ dhānyaṃ sa labheta narottamaḥ

“जो श्रेष्ठ पुरुष मेरे इस धर्मनिर्णय को सुनता या पढ़ता है, वह स्वर्ग, कीर्ति, धन और धान्य पाता है।”

अध्याय 246अध्याय-सूचीअध्याय 248