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अनुशासन पर्व · अध्याय 248

महेश्वर का उमा से स्त्रीधर्म पूछना

महादेव देवताओं और ऋषियों की प्रसिद्ध पत्नियों के नाम गिनाकर उमा से स्त्रीधर्म बताने को कहते हैं। उनके सामने बोलने में संकोच करती उमा से वे कहते हैं कि यह उनकी आज्ञा है; तब उमा विपाशा से लेकर गंगा तक महानदियों को बुलाकर उनसे परामर्श करना चाहती हैं। नदियों की ओर से गंगा उनकी विनम्रता की प्रशंसा करके उनसे बोलने की प्रार्थना करती हैं, और उमा महेश्वर की ओर मुड़कर कहना आरम्भ करती हैं।

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नारद उवाच

श्लोक 1 (13.248.1)

एवमुक्त्वा महादेवः श्रोतुकामः स्वयं प्रभुः । अनुकूलां प्रियां भार्यां पार्श्वस्तामभ्यभाषत ॥

evamuktvā mahādevaḥ śrotukāmaḥ svayaṃ prabhuḥ | anukūlāṃ priyāṃ bhāryāṃ pārśvastāmabhyabhāṣata

ऐसा कहकर स्वयं प्रभु महादेव ने, जो स्वयं सुनने के इच्छुक थे, अपने पास खड़ी अनुकूल और प्रिय पत्नी से कहा।

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.248.2)

परावरज्ञे धर्माणां तपोवननिवासिनाम् । दीक्षाविधिदमोपेते सततं व्रतचारिणि । पृच्छामि त्वां वरारोहे पृष्टा वद ममेप्सितम् ॥

parāvarajñe dharmāṇāṃ tapovananivāsinām | dīkṣāvidhidamopete satataṃ vratacāriṇi | pṛcchāmi tvāṃ varārohe pṛṣṭā vada mamepsitam

“तपोवन में रहने वालों के धर्मों के ऊँच-नीच को जानने वाली, दीक्षा की विधि और संयम से युक्त, निरन्तर व्रत का पालन करने वाली, हे वरारोहे, मैं तुमसे पूछता हूँ; पूछे जाने पर मुझे वह बताओ जो मैं जानना चाहता हूँ।”

श्लोक 3 (13.248.3)

सावित्री ब्रह्मणः पत्नी कौशिकस्य शची शुभा । लक्ष्मीर्विष्णोः प्रिया भार्या धृतिर्भार्या यमस्य तु ॥

sāvitrī brahmaṇaḥ patnī kauśikasya śacī śubhā | lakṣmīrviṣṇoḥ priyā bhāryā dhṛtirbhāryā yamasya tu

“सावित्री ब्रह्मा की पत्नी हैं, शुभ शची कौशिक (इन्द्र) की, लक्ष्मी विष्णु की प्रिय भार्या हैं, और धृति यम की पत्नी हैं,”

श्लोक 4 (13.248.4)

मार्कण्डेयस्य धूमोर्णा ऋद्धिर्वैश्रवणस्य तु । वरुणस्य प्रिया गौरी सवितुश्च सुवर्चला ॥

mārkaṇḍeyasya dhūmorṇā ṛddhirvaiśravaṇasya tu | varuṇasya priyā gaurī savituśca suvarcalā

“मार्कण्डेय की धूमोर्णा, वैश्रवण की ऋद्धि, वरुण की प्रिय गौरी और सविता की सुवर्चला हैं,”

श्लोक 5 (13.248.5)

रोहिणी शशिनो भार्या स्वाहा चाग्नेरनिन्दिता । काश्यपस्यादितिश्चैव वसिष्ठस्याप्यरुन्धती ॥

rohiṇī śaśino bhāryā svāhā cāgneraninditā | kāśyapasyāditiścaiva vasiṣṭhasyāpyarundhatī

“चन्द्रमा की पत्नी रोहिणी, अग्नि की निर्दोष स्वाहा, कश्यप की अदिति और वसिष्ठ की अरुन्धती हैं।”

श्लोक 6 (13.248.6)

एताश्चान्याश्च देव्यस्तु सर्वास्ताः पतिदेवताः । श्रूयन्ते लोकविख्यातास्त्वया चैव सहोषिताः ॥

etāścānyāśca devyastu sarvāstāḥ patidevatāḥ | śrūyante lokavikhyātāstvayā caiva sahoṣitāḥ

“ये और अन्य देवियाँ, जो सब अपने पति को ही देवता मानती हैं, लोक में प्रसिद्ध सुनी जाती हैं, और वे सब तुम्हारे साथ रह चुकी हैं।”

श्लोक 7 (13.248.7)

ताभिश्च पूजिताऽपि त्वमनुवृत्त्यनुभाषणैः । तस्मात्तु परिपृच्छामि धर्मज्ञे लोकसम्मते ॥

tābhiśca pūjitā'pi tvamanuvṛttyanubhāṣaṇaiḥ | tasmāttu paripṛcchāmi dharmajñe lokasammate

“उन्होंने भी तुम्हारा सेवा-भाव और मधुर वचनों से सम्मान किया है। इसलिए, हे धर्म को जानने वाली और लोक में सम्मानित, मैं तुमसे पूछता हूँ।”

श्लोक 8 (13.248.8)

स्त्रीधर्मं श्रोतुमिच्छामि त्वयैव समुदाहृतम् । सधर्मचारिणी मे त्वं लोकसन्धारिणी तथा ॥

strīdharmaṃ śrotumicchāmi tvayaiva samudāhṛtam | sadharmacāriṇī me tvaṃ lokasandhāriṇī tathā

“मैं स्त्रियों का धर्म तुम्हारे ही मुख से सुनना चाहता हूँ। तुम मेरी सहधर्मचारिणी हो और संसार को धारण करने वाली भी।”

श्लोक 9 (13.248.9)

अयं हि स्त्रीगणस्त्वां तु अनुयाति न मुञ्चति । त्वत्प्रसादाद्धितं श्रोतुं स्त्रीवृत्तं शुभलक्षणम् ॥

ayaṃ hi strīgaṇastvāṃ tu anuyāti na muñcati | tvatprasādāddhitaṃ śrotuṃ strīvṛttaṃ śubhalakṣaṇam

“स्त्रियों का यह समूह तुम्हारे पीछे चलता है और तुम्हें छोड़ता नहीं। तुम्हारी कृपा से मैं उनके हित की बात, शुभ लक्षणों वाला स्त्रियों का आचरण, सुनना चाहता हूँ।”

श्लोक 10 (13.248.10)

त्वया चोक्तं विशेषेण गुणभूतं हि तिष्ठति । स्त्रिय एव सदा लोके स्त्रीगणस्य गतिः प्रिये ॥

tvayā coktaṃ viśeṣeṇa guṇabhūtaṃ hi tiṣṭhati | striya eva sadā loke strīgaṇasya gatiḥ priye

“तुम्हारा कहा हुआ विशेष महत्त्व रखता है; क्योंकि हे प्रिये, लोक में स्त्रियाँ ही सदा स्त्रीसमूह की आश्रय हैं।”

श्लोक 11 (13.248.11)

शश्वद्गौर्गोषु गच्छेत नान्यत्र रमते नरः । एवं लोकगतिर्देवि आदिप्रभृति वर्तते ॥

śaśvadgaurgoṣu gaccheta nānyatra ramate naraḥ | evaṃ lokagatirdevi ādiprabhṛti vartate

“गाय सदा गायों के बीच ही जाती है, और मनुष्य भी अन्यत्र रमण नहीं करता। हे देवि, लोक की गति आरम्भ से ऐसी ही चली आ रही है।”

श्लोक 12 (13.248.12)

प्रमदोक्तं तु यत्किञ्चित्तत्स्त्रीषु बहुमन्यते । न तथा मन्यते स्त्रीषु पुरुषोक्तमनिन्दिते ॥

pramadoktaṃ tu yatkiñcittatstrīṣu bahumanyate | na tathā manyate strīṣu puruṣoktamanindite

“स्त्री का कहा हुआ जो कुछ भी हो, स्त्रियों में उसका बहुत आदर होता है; हे अनिन्दिते, पुरुष का कहा हुआ उनमें वैसा आदर नहीं पाता।”

श्लोक 13 (13.248.13)

त्वयैष विदितो ह्यर्थः स्त्रीणां धर्मः सनातनः । तस्मात्त्वां प्रति पृच्छामि पृष्टा वद ममेप्सितम् ॥

tvayaiṣa vidito hyarthaḥ strīṇāṃ dharmaḥ sanātanaḥ | tasmāttvāṃ prati pṛcchāmi pṛṣṭā vada mamepsitam

“स्त्रियों का यह सनातन धर्म तुम्हें ज्ञात है; इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ। पूछे जाने पर मुझे वह बताओ जो मैं जानना चाहता हूँ।”

नारद उवाच

श्लोक 14 (13.248.14)

एवमुक्ता तदा देवी महादेवेन शोभना । सोद्वेगा च सलज्जा च नावदत्तत्र किञ्चन । पुनः पुनस्तदा देवी देवः किमिति चाब्रवीत् ॥

evamuktā tadā devī mahādevena śobhanā | sodvegā ca salajjā ca nāvadattatra kiñcana | punaḥ punastadā devī devaḥ kimiti cābravīt

महादेव के ऐसा कहने पर सुन्दरी देवी उद्विग्न और लज्जित होकर उस समय कुछ नहीं बोलीं। तब देव ने बार-बार उनसे कहा, “क्या बात है?”

उमोवाच

श्लोक 15 (13.248.15)

भगवन्देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत । त्वदन्तिके मया वक्तुं स्त्रीणां धर्मः कथं भवेत् ॥

bhagavandevadeveśa surāsuranamaskṛta | tvadantike mayā vaktuṃ strīṇāṃ dharmaḥ kathaṃ bhavet

“भगवन्, देवों के देव, सुरों और असुरों से नमस्कृत, आपके सामने मैं स्त्रियों का धर्म कैसे कहूँ?”

महेश्वर उवाच

श्लोक 16 (13.248.16)

मन्नियोगादवश्यं तु वक्तव्यं तु मम प्रिये ॥

manniyogādavaśyaṃ tu vaktavyaṃ tu mama priye

“मेरी आज्ञा से, हे प्रिये, यह अवश्य कहा जाना चाहिए।”

उमोवाच

श्लोक 17 (13.248.17)

इमा नद्यो महादेव सर्वतीर्थोदकान्विताः । उपस्पर्शनहेतोस्त्वां न त्यजन्ति समीपतः ॥

imā nadyo mahādeva sarvatīrthodakānvitāḥ | upasparśanahetostvāṃ na tyajanti samīpataḥ

“हे महादेव, ये नदियाँ, जो सब तीर्थों के जल से युक्त हैं, उपस्पर्शन के लिए आपके समीप रहती हैं और आपका साथ नहीं छोड़तीं।”

श्लोक 18 (13.248.18)

एताभिः सह सम्मन्त्र्य प्रवक्ष्यामि तवेप्सितम् । अयुक्तं सत्सु तन्त्रेषु तानतिक्रम्य भाषितुम् ॥

etābhiḥ saha sammantrya pravakṣyāmi tavepsitam | ayuktaṃ satsu tantreṣu tānatikramya bhāṣitum

“मैं इनसे विचार-विमर्श करके आपकी इच्छित बात कहूँगी। सज्जनों के रहते उनकी उपेक्षा करके शास्त्रीय विषय पर बोलना उचित नहीं है।”

श्लोक 19 (13.248.19)

मया सम्मानिताश्चैव भविष्यन्ति सरिद्वराः ॥

mayā sammānitāścaiva bhaviṣyanti saridvarāḥ

“और श्रेष्ठ नदियाँ मेरे द्वारा सम्मानित भी होंगी।”

नारद उवाच

श्लोक 20 (13.248.20)

इति मत्वा महादेवी नदीर्देवीः समाह्वयत् । विपाशां च वितस्त्यां च चन्द्रभागां सरस्वतीम् ॥

iti matvā mahādevī nadīrdevīḥ samāhvayat | vipāśāṃ ca vitastyāṃ ca candrabhāgāṃ sarasvatīm

ऐसा विचारकर महादेवी ने देवी-स्वरूपा नदियों को बुलाया: विपाशा, वितस्ता, चन्द्रभागा, सरस्वती,

श्लोक 21 (13.248.21)

शतद्रुं देविकां सिन्धुं गौतमीं कौशिकीं तथा । यमुनां नर्मदां चैव कावेरीमथ निम्नगाम् ॥

śatadruṃ devikāṃ sindhuṃ gautamīṃ kauśikīṃ tathā | yamunāṃ narmadāṃ caiva kāverīmatha nimnagām

शतद्रु, देविका, सिन्धु, गौतमी, कौशिकी, यमुना, नर्मदा, कावेरी और निम्नगा,

श्लोक 22 (13.248.22)

तथा देवनदीं गङ्गां श्रेष्ठां त्रिपथगां शुभाम् । सर्वतीर्थोदकवहां सर्वपापविनाशिनीम् । एता नदीः समाहूय समुद्वीक्ष्येदमब्रवीत् ॥

tathā devanadīṃ gaṅgāṃ śreṣṭhāṃ tripathagāṃ śubhām | sarvatīrthodakavahāṃ sarvapāpavināśinīm | etā nadīḥ samāhūya samudvīkṣyedamabravīt

तथा देवनदी गंगा को भी, जो श्रेष्ठ, त्रिपथगा और शुभ हैं, सब तीर्थों के जल को वहन करती हैं और सब पापों का नाश करती हैं। इन नदियों को बुलाकर और उनकी ओर देखकर देवी ने यह कहा।

उमोवाच

श्लोक 23 (13.248.23)

हे पुण्याः सरितः श्रेष्ठाः सर्वपापविनाशिकाः । ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः शृणुध्वं वचनं मम ॥

he puṇyāḥ saritaḥ śreṣṭhāḥ sarvapāpavināśikāḥ | jñānavijñānasampannāḥ śṛṇudhvaṃ vacanaṃ mama

“हे पुण्यमयी श्रेष्ठ नदियो, सब पापों को नष्ट करने वाली, ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न, मेरी बात सुनो।”

श्लोक 24 (13.248.24)

अयं भगवता प्रश्न उक्तः स्त्रीधर्ममाश्रितः । न चैकया मया साध्यं तस्माद्वस्त्वानयाम्यहम् ॥

ayaṃ bhagavatā praśna uktaḥ strīdharmamāśritaḥ | na caikayā mayā sādhyaṃ tasmādvastvānayāmyaham

“भगवान् ने यह प्रश्न पूछा है, जो स्त्रियों के धर्म के विषय में है। मैं अकेली इसे पूरा नहीं कर सकती, इसीलिए आप सबको यहाँ ले आई हूँ।”

श्लोक 25 (13.248.25)

युष्माभिस्तद्विचार्यैवं वक्तुमिच्छामि शोभनाः । तत्कथं देवदेवाय वाच्यः स्त्रीधर्म उत्तमः ॥

yuṣmābhistadvicāryaivaṃ vaktumicchāmi śobhanāḥ | tatkathaṃ devadevāya vācyaḥ strīdharma uttamaḥ

“हे शोभने, आपके साथ विचार करके मैं बोलना चाहती हूँ। तो देवों के देव से स्त्रियों का उत्तम धर्म कैसे कहा जाए?”

नारद उवाच

श्लोक 26 (13.248.26)

इति पृष्टास्तथा देव्या महानद्यश्चकम्पिरे । तासां श्रेष्ठतमा गङ्गा वचनं त्विदमब्रवीत् ॥

iti pṛṣṭāstathā devyā mahānadyaścakampire | tāsāṃ śreṣṭhatamā gaṅgā vacanaṃ tvidamabravīt

देवी के ऐसा पूछने पर महानदियाँ काँप उठीं। उनमें श्रेष्ठतम गंगा ने यह वचन कहा।

गङ्गोवाच

श्लोक 27 (13.248.27)

धन्याश्चानुगृहीताः स्म अनेन वचनेन ते । या त्वं सुरासुरैर्मान्या नदीराद्रियसेऽनघे ॥

dhanyāścānugṛhītāḥ sma anena vacanena te | yā tvaṃ surāsurairmānyā nadīrādriyase'naghe

“हे अनघे, आपके इस वचन से हम धन्य और अनुगृहीत हुईं; आप, जो सुरों और असुरों से सम्मानित हैं, नदियों का आदर करती हैं।”

श्लोक 28 (13.248.28)

तवैवार्हति कल्याणि एवं सान्त्वप्रसादनम् । अशक्यमपि ये मूर्खाः स्वात्मसम्भावनायुताः । वाक्यं वदन्ति संसत्सु स्वयमेव यथेष्टतः ॥

tavaivārhati kalyāṇi evaṃ sāntvaprasādanam | aśakyamapi ye mūrkhāḥ svātmasambhāvanāyutāḥ | vākyaṃ vadanti saṃsatsu svayameva yatheṣṭataḥ

“हे कल्याणि, ऐसी सान्त्वना और कृपा आप ही को शोभा देती है। जो मूर्ख अपने ही बड़प्पन के अभिमान से भरे होते हैं, वे सभाओं में जो नहीं हो सकता, वह भी मनमाने ढंग से कह डालते हैं।”

श्लोक 29 (13.248.29)

शक्तो यश्चानहंवादी सुदुर्लभतमो मतः ॥

śakto yaścānahaṃvādī sudurlabhatamo mataḥ

“जो समर्थ होकर भी अपनी बड़ाई नहीं करता, वह अत्यन्त दुर्लभ माना गया है।”

श्लोक 30 (13.248.30)

त्वं हि शक्ता सती देवी वक्तुं प्रश्नमशेषतः । व्याहर्तुं नेच्छसि स्त्रीत्वात्संपूजयति नस्तथा ॥

tvaṃ hi śaktā satī devī vaktuṃ praśnamaśeṣataḥ | vyāhartuṃ necchasi strītvātsaṃpūjayati nastathā

“देवि, आप समर्थ और सती हैं, इस प्रश्न पर पूरा बोल सकती हैं; फिर भी स्त्री-स्वभाव की लज्जा से आप बोलना नहीं चाहतीं, और इस प्रकार हमारा सम्मान करती हैं।”

श्लोक 31 (13.248.31)

त्वं हि देवि महादेवी ऊहापोहविशारदा । दिव्यज्ञानयुता देवि दिव्यज्ञानेन्धनैधिता ॥

tvaṃ hi devi mahādevī ūhāpohaviśāradā | divyajñānayutā devi divyajñānendhanaidhitā

“हे देवि, आप महादेवी हैं, तर्क-वितर्क में निपुण, दिव्य ज्ञान से युक्त और दिव्य ज्ञान रूपी ईंधन से प्रज्वलित हैं।”

श्लोक 32 (13.248.32)

त्वमेवार्हसि तद्वक्तुं स्त्रीणां वृत्तं शुभाशुभम् । याचामहे वयं श्रोतुममृतं त्वन्मुखोद्गतम् । कुरु देवप्रियं देवि वद स्त्रीधर्ममुत्तमम् ॥

tvamevārhasi tadvaktuṃ strīṇāṃ vṛttaṃ śubhāśubham | yācāmahe vayaṃ śrotumamṛtaṃ tvanmukhodgatam | kuru devapriyaṃ devi vada strīdharmamuttamam

“स्त्रियों का शुभ-अशुभ आचरण कहने के योग्य आप ही हैं। हम आपके मुख से निकला अमृत सुनना चाहती हैं। हे देवि, देव का प्रिय कीजिए; स्त्रियों का उत्तम धर्म बताइए।”

नारद उवाच

श्लोक 33 (13.248.33)

एवं प्रसादिता देवी गङ्गया लोकपूज्यया । प्राह धर्ममशेषेण स्त्रीधर्मं सुरसुन्दरी ॥

evaṃ prasāditā devī gaṅgayā lokapūjyayā | prāha dharmamaśeṣeṇa strīdharmaṃ surasundarī

लोकपूज्य गंगा के इस प्रकार प्रसन्न करने पर देवसुन्दरी देवी ने स्त्रियों का धर्म सम्पूर्ण रूप से कहा।

उमोवाच

श्लोक 34 (13.248.34)

भगवन्देवदेवेश सुरेश्वर महेश्वर । त्वत्प्रसादात्सुरश्रेष्ठ तवैव प्रियकाम्यया । तमहं कीर्तयिष्यामि यथावच्छ्रोतुमिच्छसि ॥

bhagavandevadeveśa sureśvara maheśvara | tvatprasādātsuraśreṣṭha tavaiva priyakāmyayā | tamahaṃ kīrtayiṣyāmi yathāvacchrotumicchasi

“भगवन्, देवों के देव, सुरेश्वर, महेश्वर! हे सुरश्रेष्ठ, आपकी कृपा से और केवल आपका प्रिय करने की इच्छा से मैं उसे वैसे ही कहूँगी जैसे आप सुनना चाहते हैं।”

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