अनुशासन पर्व · अध्याय 249
उमा द्वारा स्त्रीधर्म: देवप्रिया और यम
नारद बताते हैं कि ऋषियों, गन्धर्वों, यक्षों, अप्सराओं, नागों और भूतों की स्त्रियों तथा नदियों के एकत्र होने पर देवी उमा महेश्वर से स्त्रियों के धर्म पर बोलना आरम्भ करती हैं। वे बताती हैं कि कन्या का दान कौन कर सकता है, विवाह के प्रकार क्या हैं, और पत्नी को अपने पति के प्रति कैसी निष्ठा रखनी चाहिए, जिसे वह अपना देवता माने। इसे वे एक ब्राह्मण की दो पत्नियों की कथा से समझाती हैं, जिनमें से एक ने पति की उपेक्षा करके देवताओं की पूजा की और यम ने उसे पुण्यलोकों से लौटा दिया।
नारद उवाच
श्लोक 1 (13.249.1)
एवं ब्रुवन्त्यां स्त्रीधर्मं देव्यां देवस्य शासनात् । ऋषिगन्धर्वयक्षाणां योषितश्चाप्सरोगणाः ॥
evaṃ bruvantyāṃ strīdharmaṃ devyāṃ devasya śāsanāt | ṛṣigandharvayakṣāṇāṃ yoṣitaścāpsarogaṇāḥ
देवी जब महादेव की आज्ञा से इस प्रकार स्त्रियों के धर्म का वर्णन कर रही थीं, तब ऋषियों, गन्धर्वों और यक्षों की पत्नियाँ तथा अप्सराओं के समूह,
श्लोक 2 (13.249.2)
नागभूतस्त्रियश्चैव नद्यश्चैव समागताः । श्रोतुकामाः परं वाक्यं सर्वाः पर्यवतस्थिरे ॥
nāgabhūtastriyaścaiva nadyaścaiva samāgatāḥ | śrotukāmāḥ paraṃ vākyaṃ sarvāḥ paryavatasthire
नागों और भूतों की स्त्रियाँ तथा नदियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं; सब उनके उत्तम वचन सुनने की इच्छा से चारों ओर खड़ी हो गईं।
श्लोक 3 (13.249.3)
उमादेवी मुदा युक्ता पूज्यमानाऽङ्गनागणैः । आनृशंस्यपरा देवी सततं स्त्रीगणं प्रति ॥
umādevī mudā yuktā pūjyamānā'ṅganāgaṇaiḥ | ānṛśaṃsyaparā devī satataṃ strīgaṇaṃ prati
उमादेवी प्रसन्न थीं और स्त्रियों के समूह उनका सत्कार कर रहे थे; वे देवी स्त्री-समुदाय के प्रति सदा दयालु थीं।
श्लोक 4 (13.249.4)
स्त्रीगणस्य हितार्थाय भवप्रियचिकीर्षया । वक्तुं वचनमारेभे स्त्रीणां धर्माश्रयान्वितम् ॥
strīgaṇasya hitārthāya bhavapriyacikīrṣayā | vaktuṃ vacanamārebhe strīṇāṃ dharmāśrayānvitam
स्त्रियों के हित के लिए और भव (शिव) का प्रिय करने की इच्छा से उन्होंने स्त्रियों के लिए धर्म पर आधारित वचन कहना आरम्भ किया।
उमोवाच
श्लोक 5 (13.249.5)
भगवन्सर्वभूतेश श्रूयतां वचनं मम । ऋतुप्राप्ता सुशुद्धा या कन्या सेत्यभिधीयते ॥
bhagavansarvabhūteśa śrūyatāṃ vacanaṃ mama | ṛtuprāptā suśuddhā yā kanyā setyabhidhīyate
हे भगवन्, सब प्राणियों के स्वामी, मेरी बात सुनिए। जो कन्या ऋतुमती हो चुकी है और पूर्णतः शुद्ध है, वह "कन्या" कही जाती है।
श्लोक 6 (13.249.6)
तां तु कन्यां पिता माता भ्राता मातुल एव वा । पितृव्यश्चैव पञ्चैते दातुं प्रभवतां गताः ॥
tāṃ tu kanyāṃ pitā mātā bhrātā mātula eva vā | pitṛvyaścaiva pañcaite dātuṃ prabhavatāṃ gatāḥ
उस कन्या को देने का अधिकार पिता, माता, भाई, मामा और चाचा, इन पाँचों को प्राप्त है।
श्लोक 7 (13.249.7)
विवाहाश्च तथा पञ्च तासां धर्मार्थकारणात् । कामतश्च मिथो दानमितरेतरकाम्यया ॥
vivāhāśca tathā pañca tāsāṃ dharmārthakāraṇāt | kāmataśca mitho dānamitaretarakāmyayā
धर्म और अर्थ के कारण उनके लिए विवाह के पाँच प्रकार भी हैं; और इच्छा से, एक-दूसरे की कामना के कारण, परस्पर आत्मदान भी होता है।
श्लोक 8 (13.249.8)
दत्ता यस्य भवेद्भार्या एतेषां येन केन चित् । दातारः सुविमृश्यैव दातुमर्हन्ति नान्यथा ॥
dattā yasya bhavedbhāryā eteṣāṃ yena kena cit | dātāraḥ suvimṛśyaiva dātumarhanti nānyathā
इनमें से जिस किसी के द्वारा कन्या जिसे दी जाती है, वह उसकी पत्नी होती है। देने वालों को खूब सोच-विचार करके ही देना चाहिए, अन्यथा नहीं।
श्लोक 9 (13.249.9)
उत्तमानां तु वर्णानां मन्त्रवत्पाणिसङ्ग्रहः । विवाहकारणं चाहुः शूद्राणां सम्प्रयोगतः ॥
uttamānāṃ tu varṇānāṃ mantravatpāṇisaṅgrahaḥ | vivāhakāraṇaṃ cāhuḥ śūdrāṇāṃ samprayogataḥ
उत्तम वर्णों में मन्त्रों के साथ पाणिग्रहण को विवाह का आधार कहा गया है; शूद्रों में वह केवल सम्बन्ध-स्थापन से माना जाता है।
श्लोक 10 (13.249.10)
यदा दत्ता भवेत्कन्या तस्माद्भार्यार्थिने स्वकैः । तदाप्रभृति सा नारी दशरात्रं विलज्जया । मनसा कर्मणा वाचा अनुकूला च सा भवेत् ॥
yadā dattā bhavetkanyā tasmādbhāryārthine svakaiḥ | tadāprabhṛti sā nārī daśarātraṃ vilajjayā | manasā karmaṇā vācā anukūlā ca sā bhavet
जब कन्या को उसके अपने लोग पत्नी चाहने वाले पुरुष को दे देते हैं, तब से वह स्त्री दस रात तक लज्जा के साथ मन, कर्म और वाणी से अनुकूल बनी रहे।
श्लोक 11 (13.249.11)
इति भर्तृव्रतं कुर्यात्पतिमुद्दिश्य शोभना । तदाप्रभृति सा नारी न कुर्यात्पत्युरप्रियम् ॥
iti bhartṛvrataṃ kuryātpatimuddiśya śobhanā | tadāprabhṛti sā nārī na kuryātpatyurapriyam
इस प्रकार वह सुशीला स्त्री पति को लक्ष्य करके पतिव्रत का पालन करे। उसी समय से वह पति का अप्रिय कभी न करे।
श्लोक 12 (13.249.12)
यद्यदिच्छति वै भर्ता धर्मकामार्थकारणात् । तथैवानुप्रिया भूत्वा तथैवोपचरेत्पतिम् । पतिव्रतात्वं नारीणामेतदेव सनातनम् ॥
yadyadicchati vai bhartā dharmakāmārthakāraṇāt | tathaivānupriyā bhūtvā tathaivopacaretpatim | pativratātvaṃ nārīṇāmetadeva sanātanam
धर्म, काम या अर्थ के लिए पति जो-जो चाहे, उसके अनुकूल होकर वह उसी प्रकार पति की सेवा करे। स्त्रियों का पतिव्रत-धर्म यही सनातन है।
श्लोक 13 (13.249.13)
तादृशी सा भवेन्नित्यं यादृशस्तु भवेत्पतिः । शुभाशुभसमाचार एतद्वृत्तं समासतः ॥
tādṛśī sā bhavennityaṃ yādṛśastu bhavetpatiḥ | śubhāśubhasamācāra etadvṛttaṃ samāsataḥ
पति जैसा हो, पत्नी भी सदा वैसी ही हो जाए, चाहे उसका आचरण शुभ हो या अशुभ। संक्षेप में यही आचार है।
श्लोक 14 (13.249.14)
दैवतं सततं साध्वी भर्तारं या तु पश्यति । दैवमेव भवेत्तस्याः पतिरित्यवगम्यते ॥
daivataṃ satataṃ sādhvī bhartāraṃ yā tu paśyati | daivameva bhavettasyāḥ patirityavagamyate
जो साध्वी स्त्री अपने पति को सदा देवता के रूप में देखती है, उसके लिए पति ही देवता माना जाता है।
श्लोक 15 (13.249.15)
एतस्मिन्कारणं देव पौराणी श्रूयते श्रुतिः । कथयामि प्रसादात्ते शृणु देव समासतः ॥
etasminkāraṇaṃ deva paurāṇī śrūyate śrutiḥ | kathayāmi prasādātte śṛṇu deva samāsataḥ
हे देव, इस विषय में एक पुरानी श्रुति सुनी जाती है। आपकी कृपा से मैं उसे कहती हूँ; हे देव, संक्षेप में सुनिए।
श्लोक 16 (13.249.16)
कस्य चित्त्वथ विप्रस्य भार्ये द्वे हि बभूवतुः । तयोरेका धर्मकामा देवानुद्दिश्य भक्तितः ॥
kasya cittvatha viprasya bhārye dve hi babhūvatuḥ | tayorekā dharmakāmā devānuddiśya bhaktitaḥ
किसी ब्राह्मण की दो पत्नियाँ थीं। उनमें से एक धर्म की इच्छा से भक्तिपूर्वक देवताओं को लक्ष्य करके चलती थी,
श्लोक 17 (13.249.17)
भर्तारमवमत्यैव देवतासु समाहिता । चकार विपुलं धर्मं पूजयानाऽर्चयाऽन्वितम् ॥
bhartāramavamatyaiva devatāsu samāhitā | cakāra vipulaṃ dharmaṃ pūjayānā'rcayā'nvitam
और पति का अनादर करके देवताओं में ही मन लगाए हुए पूजा और अर्चना के साथ बहुत-से पुण्य कर्म करती थी।
श्लोक 18 (13.249.18)
अपरा धर्मकामा च पतिमुद्दिश्य शोभना । भर्तारं दैवतं कृत्वा चकार किल तत्प्रियम् ॥
aparā dharmakāmā ca patimuddiśya śobhanā | bhartāraṃ daivataṃ kṛtvā cakāra kila tatpriyam
दूसरी भी धर्म की इच्छा रखने वाली और सुशील थी; उसने पति को ही देवता मानकर उसी का प्रिय किया।
श्लोक 19 (13.249.19)
एवं विवर्तमाने तु युगपन्मरणेऽध्वनि । गते किल महादेव तत्रैका या पतिव्रता । देवप्रियायां तिष्ठन्त्यां पुण्यलोकं जगाम सा ॥
evaṃ vivartamāne tu yugapanmaraṇe'dhvani | gate kila mahādeva tatraikā yā pativratā | devapriyāyāṃ tiṣṭhantyāṃ puṇyalokaṃ jagāma sā
इस प्रकार रहते हुए मार्ग में दोनों की एक ही समय मृत्यु हो गई। हे महादेव, तब उनमें से जो पतिव्रता थी, वह पुण्यलोक को चली गई, और देवप्रिया वहीं खड़ी रह गई।
श्लोक 20 (13.249.20)
देवप्रिया च तिष्ठन्ती विललाप सुदुःखिता । तां यमो लोकपालस्तु बभाषे पुष्कलं वचः ॥
devapriyā ca tiṣṭhantī vilalāpa suduḥkhitā | tāṃ yamo lokapālastu babhāṣe puṣkalaṃ vacaḥ
देवप्रिया वहाँ खड़ी अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी। तब लोकपाल यम ने उससे सारगर्भित वचन कहे।
यम उवाच
श्लोक 21 (13.249.21)
मा शुचस्त्वं निवर्तस्व न लोकाः सन्ति तेऽनघे । स्वधर्मविमुखा सा त्वं तस्माल्लोका न सन्ति ते ॥
mā śucastvaṃ nivartasva na lokāḥ santi te'naghe | svadharmavimukhā sā tvaṃ tasmāllokā na santi te
"शोक मत करो, लौट जाओ। हे निष्पाप, तुम्हारे लिए कोई लोक नहीं हैं। तुम अपने धर्म से विमुख रही, इसलिए तुम्हारे लोक नहीं हैं।
श्लोक 22 (13.249.22)
देवता हि पतिर्नार्याः स्थापिता सर्वदैवतैः । अवमत्य शुभे तत्त्वं कथं लोकान्गमिष्यसि ॥
devatā hi patirnāryāḥ sthāpitā sarvadaivataiḥ | avamatya śubhe tattvaṃ kathaṃ lokāngamiṣyasi
स्त्री का देवता पति ही है, जिसे सभी देवताओं ने इस रूप में स्थापित किया है। हे शुभे, उस तत्त्व का अनादर करके तुम लोकों को कैसे पाओगी?
श्लोक 23 (13.249.23)
मोहेन त्वं वरारोहे न जानीषे स्वदैवतम् । पतिमत्या स्त्रिया कार्यो धर्मः पत्यर्पणस्त्विति ॥
mohena tvaṃ varārohe na jānīṣe svadaivatam | patimatyā striyā kāryo dharmaḥ patyarpaṇastviti
हे सुन्दरी, तुमने मोह के कारण अपने देवता को नहीं पहचाना। पतिवाली स्त्री को अपना धर्म पति को अर्पित करके ही करना चाहिए।"
श्लोक 24 (13.249.24)
तस्मात्त्वं हि निवर्तस्व कुरु पत्याश्रितं हितम् । तदा गन्तासि लोकांस्तान्यान्गच्छन्ति पतिव्रताः । नान्यथा शक्यते प्राप्तुं पतीनां लोकमुत्तमम् ॥
tasmāttvaṃ hi nivartasva kuru patyāśritaṃ hitam | tadā gantāsi lokāṃstānyāngacchanti pativratāḥ | nānyathā śakyate prāptuṃ patīnāṃ lokamuttamam
"इसलिए लौट जाओ और पति के आश्रित रहकर हित का आचरण करो। तब तुम उन लोकों को पाओगी, जहाँ पतिव्रताएँ जाती हैं। किसी और प्रकार से पतियों का उत्तम लोक नहीं पाया जा सकता।"
उमोवाच
श्लोक 25 (13.249.25)
यमेनैवंविधं चोक्ता निवृत्ता पुनरेव सा । बभूव पतिमालम्ब्य पतिप्रियपरायणा ॥
yamenaivaṃvidhaṃ coktā nivṛttā punareva sā | babhūva patimālambya patipriyaparāyaṇā
यम के इस प्रकार कहने पर वह फिर लौट गई और पति का आश्रय लेकर पति के प्रिय कार्य में ही तत्पर हो गई।
श्लोक 26 (13.249.26)
एवमेतन्महादेव दैवतं हि स्त्रियाः पतिः । तस्मात्पतिपरा भूत्वा पतीनुपचरेदिति ॥
evametanmahādeva daivataṃ hi striyāḥ patiḥ | tasmātpatiparā bhūtvā patīnupacarediti
हे महादेव, यह ऐसा ही है: स्त्री का देवता उसका पति है। इसलिए पति-परायण होकर उसे पति की सेवा करनी चाहिए।