अनुशासन पर्व · अध्याय 250
उमा का स्त्रीधर्म-उपदेश: पतिव्रता और अन्य स्त्रियाँ
उमा महेश्वर से अपना उपदेश जारी रखती हैं: पतिव्रता स्त्री का दैनिक आचरण, पति, अतिथियों और गृहस्थी की सेवा, और निष्ठावती पत्नी का परम फल, चाहे वह पति के पीछे प्राण त्यागे या संयम के साथ विधवा-जीवन बिताए। फिर वे आसुरी, पैशाची और राक्षसी स्वभाव वाली स्त्रियों, उनके दोषों और उनसे मिलने वाले दुःखों का वर्णन करती हैं। अन्त में नारद बताते हैं कि उपस्थित सभी ने उमा की स्तुति की और महेश्वर ने इस संवाद को पढ़ने-सुनने वालों को पुण्य, यश, आयु और आरोग्य का वचन दिया।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.250.1)
पतिमत्या दिवारात्रं वृत्तान्तं श्रूयतां शुभम् । पत्युः पूर्वं समुत्थाय प्रातःकर्म समाचरेत् ॥
patimatyā divārātraṃ vṛttāntaṃ śrūyatāṃ śubham | patyuḥ pūrvaṃ samutthāya prātaḥkarma samācaret
अब पतिवाली स्त्री के दिन-रात के शुभ आचरण का वृत्तान्त सुनिए। वह पति से पहले उठकर प्रातःकाल के कार्य करे।
श्लोक 2 (13.250.2)
पत्युर्भावं विदित्वा तु पश्चात्सम्बोधयेत्तु तम् । नित्यं पौर्वाह्णिकं कार्यं स्वयं कुर्याद्यथाविधि ॥
patyurbhāvaṃ viditvā tu paścātsambodhayettu tam | nityaṃ paurvāhṇikaṃ kāryaṃ svayaṃ kuryādyathāvidhi
पति की मनःस्थिति जानकर वह बाद में उसे जगाए। प्रतिदिन के पूर्वाह्न के कार्य वह विधि के अनुसार स्वयं करे।
श्लोक 3 (13.250.3)
निवेद्य च तथाऽऽहारं यथा सम्पद्यतामिति । तथैव कुर्यात्तत्सर्वं यथा पत्युः प्रियं भवेत् ॥
nivedya ca tathā''hāraṃ yathā sampadyatāmiti | tathaiva kuryāttatsarvaṃ yathā patyuḥ priyaṃ bhavet
वह भोजन प्रस्तुत करके कहे, "जैसा उचित हो वैसा हो जाए," और वह सब उसी प्रकार करे जिससे पति को प्रिय लगे।
श्लोक 4 (13.250.4)
यथा भर्ता तथा नारी गुरूणां प्रतिपद्यते ॥
yathā bhartā tathā nārī gurūṇāṃ pratipadyate
पति जैसा अपने बड़ों के साथ व्यवहार करता है, पत्नी भी उनके साथ वैसा ही व्यवहार करे।
श्लोक 5 (13.250.5)
शुश्रूषापोषणविधौ पतिप्रियचिकीर्षया । भर्तुर्निष्क्रमणे कार्यं संस्मरेदप्रमादतः ॥
śuśrūṣāpoṣaṇavidhau patipriyacikīrṣayā | bharturniṣkramaṇe kāryaṃ saṃsmaredapramādataḥ
सेवा और पालन-पोषण के कार्य में पति को प्रसन्न करने की इच्छा से, वह पति के बाहर जाते समय जो करना हो उसे सावधानी से स्मरण रखे।
श्लोक 6 (13.250.6)
आगतं तु पतिं दृष्ट्वा सहसा परिचारणम् । स्वयं कुर्वीत सम्प्रीत्या कायश्रमहरं परम् ॥
āgataṃ tu patiṃ dṛṣṭvā sahasā paricāraṇam | svayaṃ kurvīta samprītyā kāyaśramaharaṃ param
पति को घर आया देखकर वह तुरन्त प्रेमपूर्वक स्वयं उसकी ऐसी सेवा करे जिससे शरीर की थकान सबसे अधिक दूर हो।
श्लोक 7 (13.250.7)
पाद्यासनाभ्यां शयनैर्वाक्यैश्च हृदयप्रियैः । अतिथीनामागमेन प्रीतियुक्ता सदा भवेत् ॥
pādyāsanābhyāṃ śayanairvākyaiśca hṛdayapriyaiḥ | atithīnāmāgamena prītiyuktā sadā bhavet
पैर धोने का जल, आसन और शय्या देकर तथा हृदय को प्रिय लगने वाले वचनों से; और अतिथियों के आने पर वह सदा प्रसन्न रहे।
श्लोक 8 (13.250.8)
कर्मणा वचनेनापि तोषयेदतिथीन्सदा । मङ्गलं गृहशौचं च सर्वोपकरणानि च ॥
karmaṇā vacanenāpi toṣayedatithīnsadā | maṅgalaṃ gṛhaśaucaṃ ca sarvopakaraṇāni ca
वह कर्म और वाणी से सदा अतिथियों को सन्तुष्ट करे। मांगलिक वस्तुएँ, घर की स्वच्छता और सब उपकरण
श्लोक 9 (13.250.9)
सर्वकालमवेक्षेत कारयन्ती च कुर्वती । धर्मकार्ये तु सम्प्राप्ते तद्वद्धर्मपरा भवेत् ॥
sarvakālamavekṣeta kārayantī ca kurvatī | dharmakārye tu samprāpte tadvaddharmaparā bhavet
वह सदा स्वयं करती हुई या करवाती हुई देखती रहे। धर्म का कार्य आने पर वह उसी प्रकार धर्म में तत्पर रहे।
श्लोक 10 (13.250.10)
अर्थकार्ये पुनर्भर्तुः प्रमादालस्यवर्जिता । सा यत्नं परमं कुर्यात्तस्य साहाय्यकारणात् ॥
arthakārye punarbhartuḥ pramādālasyavarjitā | sā yatnaṃ paramaṃ kuryāttasya sāhāyyakāraṇāt
जब पति का कोई अर्थ-सम्बन्धी कार्य हो, तब वह प्रमाद और आलस्य छोड़कर उसकी सहायता के लिए पूरा प्रयत्न करे।
श्लोक 11 (13.250.11)
धुरन्धरा भवेद्भर्तुः साध्वी धर्मार्थयोः सदा । विहारकाले वै भर्तुर्ज्ञात्वा भावं हृदि स्थितम् ॥
dhurandharā bhavedbhartuḥ sādhvī dharmārthayoḥ sadā | vihārakāle vai bharturjñātvā bhāvaṃ hṛdi sthitam
साध्वी पत्नी धर्म और अर्थ में सदा पति के भार को उठाने वाली हो। विहार के समय पति के हृदय में स्थित भाव को जानकर
श्लोक 12 (13.250.12)
अलङ्कृत्य यथायोगं मन्दहाससमन्वितम् । वाक्यैर्मधुरसंयुक्तैः स्मयन्ती तोषयेत्पतिम् ॥
alaṅkṛtya yathāyogaṃ mandahāsasamanvitam | vākyairmadhurasaṃyuktaiḥ smayantī toṣayetpatim
वह यथोचित श्रृंगार करके, मन्द मुस्कान के साथ, मधुर वचनों से मुस्कराती हुई पति को प्रसन्न करे।
श्लोक 13 (13.250.13)
कठोराणि न वाच्यानि अन्यथा प्रमदान्तरे । यस्यां कामी भवेद्भर्ता तस्याः प्रीतिकरी भवेत् ॥
kaṭhorāṇi na vācyāni anyathā pramadāntare | yasyāṃ kāmī bhavedbhartā tasyāḥ prītikarī bhavet
कठोर वचन नहीं बोलने चाहिए, न अन्य स्त्रियों के बीच ही। जिस स्त्री में पति की आसक्ति हो, उसके प्रति वह प्रीतिपूर्वक व्यवहार करे।
श्लोक 14 (13.250.14)
अप्रमादं पुरस्कृत्य मनसा तोषयेत्पतिम् । अनन्तरमथान्येषां भोजनावेक्षणं चरेत् ॥
apramādaṃ puraskṛtya manasā toṣayetpatim | anantaramathānyeṣāṃ bhojanāvekṣaṇaṃ caret
सावधानी को आगे रखकर वह मन से पति को प्रसन्न करे। उसके बाद वह दूसरों के भोजन की देखभाल करे।
श्लोक 15 (13.250.15)
दासीदासबलीवर्दांश्चण्डालं च शुनस्तथा । अनाथान्कृपणांश्चैव भिक्षुकांश्च तथैव च । पूजयेद्बलिभैक्षेण पत्युर्धर्मं विवर्धयेत् ॥
dāsīdāsabalīvardāṃścaṇḍālaṃ ca śunastathā | anāthānkṛpaṇāṃścaiva bhikṣukāṃśca tathaiva ca | pūjayedbalibhaikṣeṇa patyurdharmaṃ vivardhayet
दासी, दास, बैल, चाण्डाल और कुत्ते, अनाथ, दीन और भिक्षुक भी, इन सबको वह बलि और भिक्षा देकर सम्मान दे और पति के धर्म को बढ़ाए।
श्लोक 16 (13.250.16)
कुपितं वाऽर्थहीनं वा श्रान्तं वोपचरेत्पतिम् । यथा स तुष्टः स्वस्थश्च तथा सन्तोषयेत्पतिम् ॥
kupitaṃ vā'rthahīnaṃ vā śrāntaṃ vopacaretpatim | yathā sa tuṣṭaḥ svasthaśca tathā santoṣayetpatim
पति क्रोधित हो, निर्धन हो या थका हुआ हो, वह उसकी सेवा करे; जिस प्रकार वह सन्तुष्ट और स्वस्थ हो, उसी प्रकार उसे प्रसन्न करे।
श्लोक 17 (13.250.17)
यथा कुटुम्बचिन्तायां विवादे वाऽर्थसञ्चये । आहूता तत्सहायार्थं तथा प्रियहितं वदेत् ॥
yathā kuṭumbacintāyāṃ vivāde vā'rthasañcaye | āhūtā tatsahāyārthaṃ tathā priyahitaṃ vadet
जब परिवार की चिन्ता में, किसी विवाद में या धन-संचय में सहायता के लिए उसे बुलाया जाए, तब वह प्रिय और हितकर बात कहे।
श्लोक 18 (13.250.18)
अप्रियं च हितं ब्रूयात्तस्य धर्मार्थकाङ्क्षया । एकान्तचर्याकथनं कलहं वर्जयेत्परैः ॥
apriyaṃ ca hitaṃ brūyāttasya dharmārthakāṅkṣayā | ekāntacaryākathanaṃ kalahaṃ varjayetparaiḥ
उसके धर्म और अर्थ की इच्छा से वह अप्रिय किन्तु हितकर बात भी कहे। एकान्त में किए गए आचरण को कहना और दूसरों के साथ कलह, इनसे वह दूर रहे।
श्लोक 19 (13.250.19)
बहिरालोकनं चैव मोहं व्रीडां च पैशुनम् । बह्वाशित्वं दिवास्वप्नमेवमादि विवर्जयेत् ॥
bahirālokanaṃ caiva mohaṃ vrīḍāṃ ca paiśunam | bahvāśitvaṃ divāsvapnamevamādi vivarjayet
बाहर ताकना, मोह, लज्जा, चुगली, अधिक खाना, दिन में सोना और ऐसी ही बातों को वह छोड़ दे।
श्लोक 20 (13.250.20)
रहस्येकासनं साध्वी न कुर्यादात्मजैरपि । यद्यद्दद्यान्निधत्स्वेति न्यासवत्परिपालयेत् ॥
rahasyekāsanaṃ sādhvī na kuryādātmajairapi | yadyaddadyānnidhatsveti nyāsavatparipālayet
साध्वी स्त्री एकान्त में अपने पुत्रों के साथ भी एक आसन पर न बैठे। जो-जो वस्तु पति "इसे रखो" कहकर दे, उसे वह धरोहर की तरह सँभालकर रखे।
श्लोक 21 (13.250.21)
विस्मृतं वाऽपि यद्द्रव्यं प्रतिपद्यात्स्वशौचतः । यत्किञ्चित्पतिना दत्तं लब्ध्वा तत्सा सुखी भवेत् ॥
vismṛtaṃ vā'pi yaddravyaṃ pratipadyātsvaśaucataḥ | yatkiñcitpatinā dattaṃ labdhvā tatsā sukhī bhavet
जो वस्तु पति भूल गया हो, उसे भी वह अपनी ईमानदारी से लौटा दे; और पति ने जो कुछ दिया हो, उसे पाकर वह प्रसन्न रहे।
श्लोक 22 (13.250.22)
अतीवाज्ञामतीर्ष्यां च दूरतः परिवर्जयेत् । बालवद्वृद्धवद्भार्या सदैवानुचरेत्पतिम् ॥
atīvājñāmatīrṣyāṃ ca dūrataḥ parivarjayet | bālavadvṛddhavadbhāryā sadaivānucaretpatim
अत्यधिक आज्ञा देना और ईर्ष्या, इन्हें वह दूर से ही त्याग दे। पत्नी बच्चे और वृद्ध की तरह सदा पति की सेवा करे।
श्लोक 23 (13.250.23)
भार्याया व्रतमित्येव कर्तव्यं सततं विभो । एतत्पतिव्रतावृत्तमुक्तं देव समासतः ॥
bhāryāyā vratamityeva kartavyaṃ satataṃ vibho | etatpativratāvṛttamuktaṃ deva samāsataḥ
हे प्रभो, पत्नी का यही व्रत है, जिसका उसे सदा पालन करना चाहिए। हे देव, इस प्रकार पतिव्रता का आचरण संक्षेप में कहा गया।
श्लोक 24 (13.250.24)
न च भोगे न चैश्वर्ये न सुखे न धने तथा । स्पृहा यस्यास्तथा भर्तुः सा नारीणां पतिव्रता ॥
na ca bhoge na caiśvarye na sukhe na dhane tathā | spṛhā yasyāstathā bhartuḥ sā nārīṇāṃ pativratā
जिस स्त्री को भोग, ऐश्वर्य, सुख या धन की लालसा नहीं, केवल पति की ही लालसा है, वही स्त्रियों में पतिव्रता है।
श्लोक 25 (13.250.25)
पतिर्हि दैवतं स्त्रीणां पतिर्बन्धुः पतिर्गतिः । नान्यं गतिमहं पश्ये प्रमदाया यथा पतिः ॥
patirhi daivataṃ strīṇāṃ patirbandhuḥ patirgatiḥ | nānyaṃ gatimahaṃ paśye pramadāyā yathā patiḥ
स्त्रियों के लिए पति ही देवता है, पति ही बन्धु है और पति ही गति है। मैं स्त्री के लिए पति के समान कोई और आश्रय नहीं देखती।
श्लोक 26 (13.250.26)
जातिष्वपि च वै स्त्रीत्वं विशिष्टं मे मतिः प्रभो । कायक्लेशेन महता पुरुषः प्राप्नुयात्फलम् । तत्सर्वं लभते नारी सुखेन पतिपूजया ॥
jātiṣvapi ca vai strītvaṃ viśiṣṭaṃ me matiḥ prabho | kāyakleśena mahatā puruṣaḥ prāpnuyātphalam | tatsarvaṃ labhate nārī sukhena patipūjayā
हे प्रभो, मेरा मत है कि सब जन्मों में स्त्री-जन्म श्रेष्ठ है। पुरुष को बड़े कायक्लेश से जो फल मिलता है, वह सब स्त्री को सुखपूर्वक पति की सेवा से मिल जाता है।
श्लोक 27 (13.250.27)
यथासुखं पतिमती सर्वं पत्यनुकूलतः । ईदृशं धर्मसाकल्यं पश्य त्वं प्रमदां प्रति । एतद्विसृज्य पच्यन्ते कुस्त्रियः पापमोहिताः ॥
yathāsukhaṃ patimatī sarvaṃ patyanukūlataḥ | īdṛśaṃ dharmasākalyaṃ paśya tvaṃ pramadāṃ prati | etadvisṛjya pacyante kustriyaḥ pāpamohitāḥ
पतिवाली स्त्री को पति के अनुकूल रहने से सब प्रकार का सुख मिलता है। आप स्त्री के लिए धर्म की इस पूर्णता को देखिए। इसे छोड़कर पाप से मोहित दुष्ट स्त्रियाँ कष्ट पाती हैं।
श्लोक 28 (13.250.28)
तपश्चर्या च दानं च पतौ तस्याः समर्पितम् । रूपं कुलं यशस्तेजः सर्वं तस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥
tapaścaryā ca dānaṃ ca patau tasyāḥ samarpitam | rūpaṃ kulaṃ yaśastejaḥ sarvaṃ tasminpratiṣṭhitam
उसका तप और दान पति में अर्पित है; रूप, कुल, यश और तेज, सब उसी में स्थित हैं।
श्लोक 29 (13.250.29)
एवं व्रतसमाचाराः स्ववृत्तेनैव शोभनाः । स्वभर्त्रा च समं गच्छेत्पुण्यलोकान्सुकर्मणा ॥
evaṃ vratasamācārāḥ svavṛttenaiva śobhanāḥ | svabhartrā ca samaṃ gacchetpuṇyalokānsukarmaṇā
इस प्रकार व्रत और आचार वाली स्त्रियाँ अपने ही आचरण से शोभित होती हैं और अपने सत्कर्म से पति के साथ पुण्यलोकों को जाती हैं।
श्लोक 30 (13.250.30)
वृद्धो विरूपो बीभत्सो धनवान्निर्धनोऽपि वा । एवंभूतोपि वै भर्ता स्त्रीणां भूषणमुत्तमम् ॥
vṛddho virūpo bībhatso dhanavānnirdhano'pi vā | evaṃbhūtopi vai bhartā strīṇāṃ bhūṣaṇamuttamam
वृद्ध, कुरूप, घृणित, धनवान या निर्धन, ऐसा होने पर भी पति स्त्रियों का सर्वोत्तम आभूषण है।
श्लोक 31 (13.250.31)
आढ्यं वा रूपयुक्तं वा विरूपं धनवर्जितम् । या पतिं तोषयेत्साध्वी सा पत्नीनां विशिष्यते ॥
āḍhyaṃ vā rūpayuktaṃ vā virūpaṃ dhanavarjitam | yā patiṃ toṣayetsādhvī sā patnīnāṃ viśiṣyate
पति सम्पन्न हो या रूपवान, अथवा कुरूप और निर्धन, जो साध्वी स्त्री पति को प्रसन्न रखती है, वह पत्नियों में श्रेष्ठ मानी जाती है।
श्लोक 32 (13.250.32)
दरिद्रांश्च विरूपाश्च प्रमूढान्कुष्टसंयुतान् । पतीनुपचरेल्लोकानक्षयान्प्रतिपद्यते ॥
daridrāṃśca virūpāśca pramūḍhānkuṣṭasaṃyutān | patīnupacarellokānakṣayānpratipadyate
दरिद्र, कुरूप, महामूर्ख और कोढ़ी पतियों की भी सेवा करने से स्त्री अक्षय लोकों को पाती है।
श्लोक 33 (13.250.33)
एवं प्रवर्तमानायाः पतिः पूर्वं म्रियेत चेत् । तदाऽनुमरणं गच्छेत्पुनर्धर्मं चरेत वा ॥
evaṃ pravartamānāyāḥ patiḥ pūrvaṃ mriyeta cet | tadā'numaraṇaṃ gacchetpunardharmaṃ careta vā
इस प्रकार रहती हुई स्त्री का पति यदि उससे पहले मर जाए, तो वह उसके पीछे प्राण त्याग दे, अथवा फिर धर्म का आचरण करती रहे।
श्लोक 34 (13.250.34)
एतदेवं मया प्रोक्तं स्त्रियस्तु बहुधा स्मृताः । देवदानवगन्धर्वा मनुष्या इति नैकधा ॥
etadevaṃ mayā proktaṃ striyastu bahudhā smṛtāḥ | devadānavagandharvā manuṣyā iti naikadhā
यह मैंने ऐसा कहा है; स्त्रियाँ अनेक प्रकार की कही गई हैं: देव, दानव, गन्धर्व और मनुष्य, इस प्रकार वे एक ही प्रकार की नहीं हैं।
श्लोक 35 (13.250.35)
सौम्यशीलाः शुभाचाराः सर्वास्ताः सम्भवन्ति च । यथा शुभं प्रवक्ष्यामि स्त्रीणां धर्मं महेश्वर ॥
saumyaśīlāḥ śubhācārāḥ sarvāstāḥ sambhavanti ca | yathā śubhaṃ pravakṣyāmi strīṇāṃ dharmaṃ maheśvara
वे सब सौम्य स्वभाव और शुभ आचरण वाली होती हैं। हे महेश्वर, इस प्रकार मैं स्त्रियों का शुभ धर्म कहूँगी।
श्लोक 36 (13.250.36)
आसुर्यश्चैव पैशाच्यो राक्षस्यश्च भवन्ति हि । तासां वृत्तमशेषेण श्रूयतां लोककारणात् ॥
āsuryaścaiva paiśācyo rākṣasyaśca bhavanti hi | tāsāṃ vṛttamaśeṣeṇa śrūyatāṃ lokakāraṇāt
आसुरी, पैशाची और राक्षसी प्रकृति की स्त्रियाँ भी होती हैं। लोक के हित के लिए उनका आचरण पूरी तरह सुनिए।
श्लोक 37 (13.250.37)
न्यायतो वाऽन्यथा प्रोक्ता भावदोषसमन्विताः । भर्तॄनुपचरन्त्येव रागद्वेषबलात्कृताः ॥
nyāyato vā'nyathā proktā bhāvadoṣasamanvitāḥ | bhartṝnupacarantyeva rāgadveṣabalātkṛtāḥ
ठीक हो या अन्यथा, इसी नाम से कही जाने वाली, स्वभाव के दोषों से युक्त वे स्त्रियाँ राग और द्वेष के वश होकर ही पतियों की सेवा करती हैं।
श्लोक 38 (13.250.38)
स्वधर्मविमुखा भूत्वा प्रदूष्यन्ति यतस्ततः । प्रवृद्धविषया नित्यं प्रतिकूलं वदन्ति च ॥
svadharmavimukhā bhūtvā pradūṣyanti yatastataḥ | pravṛddhaviṣayā nityaṃ pratikūlaṃ vadanti ca
अपने धर्म से विमुख होकर वे जहाँ-तहाँ बिगड़ जाती हैं; विषयों में बढ़ी हुई आसक्ति वाली वे सदा विपरीत बातें करती हैं।
श्लोक 39 (13.250.39)
अर्थान्विनाशयन्त्येवं न गृह्णन्ति हितं क्वचित् । स्वबुद्धिनिरता भूत्वा जीवन्ति च यथा तथा ॥
arthānvināśayantyevaṃ na gṛhṇanti hitaṃ kvacit | svabuddhiniratā bhūtvā jīvanti ca yathā tathā
वे धन का नाश करती हैं और कहीं भी हितकर बात नहीं मानतीं; अपनी ही बुद्धि में रमी हुई वे जैसे-तैसे जीवन बिताती हैं।
श्लोक 40 (13.250.40)
गुणवत्यः क्वचिद्भूत्वा पतिधर्मपरा इव । पुनर्भवन्ति पापिष्ठा विषमं वृत्तमास्थिताः ॥
guṇavatyaḥ kvacidbhūtvā patidharmaparā iva | punarbhavanti pāpiṣṭhā viṣamaṃ vṛttamāsthitāḥ
कभी गुणवती बनकर मानो पतिधर्म में तत्पर हो जाती हैं, फिर वे अत्यन्त पापिनी हो जाती हैं और टेढ़े आचरण में लग जाती हैं।
श्लोक 41 (13.250.41)
अनवस्थितमर्यादा बहुवेषा व्यवस्थिताः । असन्तुष्टाश्च लुब्धाश्च ईर्ष्याक्रोधयुता भृशम् ॥
anavasthitamaryādā bahuveṣā vyavasthitāḥ | asantuṣṭāśca lubdhāśca īrṣyākrodhayutā bhṛśam
वे मर्यादा नहीं रखतीं, अनेक वेश धारण करके उन्हीं में डटी रहती हैं, असन्तुष्ट, लोभी तथा अत्यन्त ईर्ष्यालु और क्रोधी होती हैं,
श्लोक 42 (13.250.42)
भोगप्रिया हितद्वेष्याः कामभोगपरायणाः । प्रायशोऽनृतभूयिष्ठा गुरूणां प्रतिलोमकाः ॥
bhogapriyā hitadveṣyāḥ kāmabhogaparāyaṇāḥ | prāyaśo'nṛtabhūyiṣṭhā gurūṇāṃ pratilomakāḥ
भोग-प्रिय, अपने हित से द्वेष करने वाली, काम और भोग में लगी हुई, प्रायः झूठ बोलने वाली और बड़ों के प्रतिकूल चलने वाली होती हैं।
श्लोक 43 (13.250.43)
एवंवृत्तसमाचारा आसुरं भावमाश्रिताः । अपकारपरा नित्यं सततं कलहप्रिया ॥
evaṃvṛttasamācārā āsuraṃ bhāvamāśritāḥ | apakāraparā nityaṃ satataṃ kalahapriyā
ऐसे आचरण और व्यवहार वाली वे आसुरी भावना का आश्रय लेती हैं: सदा अपकार में तत्पर और निरन्तर कलह-प्रिय,
श्लोक 44 (13.250.44)
परुषा रुक्षवचना निर्घृणा निरपत्रपाः । निःस्नेहाः क्रोधनाश्चैव भर्तृपुत्रस्वबन्धुषु ॥
paruṣā rukṣavacanā nirghṛṇā nirapatrapāḥ | niḥsnehāḥ krodhanāścaiva bhartṛputrasvabandhuṣu
कठोर, रूखे वचन बोलने वाली, निर्दय, निर्लज्ज, स्नेहहीन और पति, पुत्रों तथा अपने बन्धुओं पर क्रोध करने वाली,
श्लोक 45 (13.250.45)
घोरा मांसप्रिया नित्यं हसन्ति च रुदन्ति च । पतीन्व्यभिचरन्त्येव दुर्मार्गेण यथा तथा । बन्धुभिर्भर्त्सिता भूत्वा गृहकार्याणि कुर्वते ॥
ghorā māṃsapriyā nityaṃ hasanti ca rudanti ca | patīnvyabhicarantyeva durmārgeṇa yathā tathā | bandhubhirbhartsitā bhūtvā gṛhakāryāṇi kurvate
भयंकर, सदा मांस-प्रिय, वे हँसती भी हैं और रोती भी हैं; वे जैसे-तैसे बुरे मार्ग से पतियों के प्रति व्यभिचार करती हैं; और बन्धुओं के डाँटने पर घर के काम करती हैं।
श्लोक 46 (13.250.46)
अथवा भर्त्सिता देव निवृत्ताः स्वेषु कर्मसु । तथैवात्मवधं घोरं व्यवस्येयुर्न संशयः ॥
athavā bhartsitā deva nivṛttāḥ sveṣu karmasu | tathaivātmavadhaṃ ghoraṃ vyavasyeyurna saṃśayaḥ
अथवा हे देव, डाँटे जाने पर वे अपने कामों से हट जाती हैं, और उसी प्रकार भयंकर आत्मघात का निश्चय भी कर बैठती हैं, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 47 (13.250.47)
निर्दया निरनुक्रोशाः कुटुम्बार्थविलोपकाः । धर्मार्थरहिता घोराः सततं कुर्वते क्रियाः ॥
nirdayā niranukrośāḥ kuṭumbārthavilopakāḥ | dharmārtharahitā ghorāḥ satataṃ kurvate kriyāḥ
निर्दय और कठोर हृदय वाली, कुटुम्ब के धन को नष्ट करने वाली, धर्म और अर्थ से रहित, भयंकर वे सदा अपने कर्म करती रहती हैं।
श्लोक 48 (13.250.48)
अनर्थे निपुणाः पापाः परप्राणेषु निर्दयाः । एवंयुक्तसमाचाराः स्त्रियः पैशाचमाश्रिताः ॥
anarthe nipuṇāḥ pāpāḥ paraprāṇeṣu nirdayāḥ | evaṃyuktasamācārāḥ striyaḥ paiśācamāśritāḥ
अनर्थ करने में निपुण, पापिनी और दूसरों के प्राणों के प्रति निर्दय, ऐसे आचरण वाली स्त्रियाँ पैशाची भावना का आश्रय लेती हैं।
श्लोक 49 (13.250.49)
अपरा मोहसंयुक्ता निर्लज्जा रोदनप्रियाः । अशुद्धा मलदिग्धाङ्गाः पानमांसरता भृशम् । वदन्त्यनृतवाक्यानि हसन्ति विलपन्ति च ॥
aparā mohasaṃyuktā nirlajjā rodanapriyāḥ | aśuddhā maladigdhāṅgāḥ pānamāṃsaratā bhṛśam | vadantyanṛtavākyāni hasanti vilapanti ca
कुछ और स्त्रियाँ मोह से ग्रस्त, निर्लज्ज और रोने-प्रिय, अपवित्र, मैल से लिपटे अंगों वाली और मद्य तथा मांस में बहुत रमी हुई होती हैं; वे झूठ बोलती हैं, हँसती हैं और विलाप करती हैं।
श्लोक 50 (13.250.50)
दुष्प्रसादा महाक्रोधाः स्वप्नशीला निरन्तरम् । तामस्यो नष्टतत्त्वार्था मन्दशीला महोदराः । भुञ्जते विविधं सिद्धं भोजनं तीव्रसम्भ्रमाः ॥
duṣprasādā mahākrodhāḥ svapnaśīlā nirantaram | tāmasyo naṣṭatattvārthā mandaśīlā mahodarāḥ | bhuñjate vividhaṃ siddhaṃ bhojanaṃ tīvrasambhramāḥ
कठिनाई से प्रसन्न होने वाली, अत्यन्त क्रोधी, निरन्तर सोने वाली, तमोगुणी, सार-तत्त्व को खो चुकी, मन्द आचरण वाली और बड़े पेट वाली वे बड़ी उतावली में अनेक प्रकार का पका हुआ भोजन खाती हैं।
श्लोक 51 (13.250.51)
गुणरूपवयोयुक्तं पतिं कामिनमुत्तमम् । हित्वाऽन्येनैव गच्छन्ति सर्वधा भृशतापिताः ॥
guṇarūpavayoyuktaṃ patiṃ kāminamuttamam | hitvā'nyenaiva gacchanti sarvadhā bhṛśatāpitāḥ
गुण, रूप और यौवन से युक्त, प्रेम करने वाले उत्तम पति को छोड़कर वे सब प्रकार से अत्यन्त तप्त होकर दूसरे के पास चली जाती हैं।
श्लोक 52 (13.250.52)
निर्लज्जा धर्मसन्दिग्धाः प्रतिकूलाः समन्ततः । एवंरूपसमाचाराः स्त्रियो राक्षसमाश्रिताः ॥
nirlajjā dharmasandigdhāḥ pratikūlāḥ samantataḥ | evaṃrūpasamācārāḥ striyo rākṣasamāśritāḥ
निर्लज्ज, धर्म में सन्देह रखने वाली और सब ओर विरोध करने वाली, ऐसे आचरण वाली स्त्रियाँ राक्षसी भावना का आश्रय लेती हैं।
श्लोक 53 (13.250.53)
एवंविधानां सर्वासां न परत्र महासुखम् । नरकाद्विप्रमुक्तानां मानुष्यं दुर्लभं भवेत् ॥
evaṃvidhānāṃ sarvāsāṃ na paratra mahāsukham | narakādvipramuktānāṃ mānuṣyaṃ durlabhaṃ bhavet
ऐसी सब स्त्रियों के लिए परलोक में बड़ा सुख नहीं है। नरक से छूटने पर भी उन्हें मनुष्य-जन्म दुर्लभ होता है।
श्लोक 54 (13.250.54)
कष्टं तत्रापि भुञ्जन्ते स्वकृतं दुःखजं बहु । दरिद्राः क्लेशभूयिष्ठा विरूपाः कुत्सिताः परैः । विधवा दुर्भगा वाऽपि लभन्ते दुःखमीदृशम् ॥
kaṣṭaṃ tatrāpi bhuñjante svakṛtaṃ duḥkhajaṃ bahu | daridrāḥ kleśabhūyiṣṭhā virūpāḥ kutsitāḥ paraiḥ | vidhavā durbhagā vā'pi labhante duḥkhamīdṛśam
वहाँ भी वे अपने किए का बहुत दुःख भोगती हैं: दरिद्र, क्लेशों से भरी, कुरूप, दूसरों से तिरस्कृत, विधवा या अभागी होकर वे ऐसा ही दुःख पाती हैं।
श्लोक 55 (13.250.55)
शतवर्षसहस्राणि निरयं व्यभिचारिणी । व्रजेत्पतिं च पापेन संयोज्य स्वकुलं तथा ॥
śatavarṣasahasrāṇi nirayaṃ vyabhicāriṇī | vrajetpatiṃ ca pāpena saṃyojya svakulaṃ tathā
व्यभिचारिणी स्त्री अपने पति और अपने कुल को पाप में जोड़कर लाखों वर्ष नरक में जाती है।
श्लोक 56 (13.250.56)
एतद्विज्ञाय पतितं पुनश्चेद्धितमात्मनः । कुर्याद्भर्तारमाश्रित्य तथा धर्ममवाप्नुयात् ॥
etadvijñāya patitaṃ punaśceddhitamātmanaḥ | kuryādbhartāramāśritya tathā dharmamavāpnuyāt
यह जानकर यदि गिरी हुई स्त्री फिर अपना हित चाहे, तो वह पति का आश्रय लेकर धर्म को प्राप्त करे।
श्लोक 57 (13.250.57)
अतिसंयान्ति ताँल्लोकान्पुण्यान्परमशोभनान् । अवमत्य च याः पूर्वं पतिं दुष्टेन चेतसा ॥
atisaṃyānti tām̐llokānpuṇyānparamaśobhanān | avamatya ca yāḥ pūrvaṃ patiṃ duṣṭena cetasā
वे उन पवित्र और परम सुन्दर लोकों को जाती हैं। जो पहले दूषित मन से अपने पति का अनादर करके
श्लोक 58 (13.250.58)
वर्तमानाश्च सततं भर्तॄणां प्रतिकूलतः । भर्त्रानुमरणं काले याः कुर्वन्ति तथाविधाः ॥
vartamānāśca satataṃ bhartṝṇāṃ pratikūlataḥ | bhartrānumaraṇaṃ kāle yāḥ kurvanti tathāvidhāḥ
सदा पतियों के प्रतिकूल चलती रहीं, और ऐसी होकर भी समय आने पर पतियों के पीछे प्राण त्यागती हैं,
श्लोक 59 (13.250.59)
कामात्क्रोधाद्भयाल्लोभादपहास्या भवन्ति ताः । आदिप्रभृति कुस्त्रीणां तथाऽनुमरणं वृथा ॥
kāmātkrodhādbhayāllobhādapahāsyā bhavanti tāḥ | ādiprabhṛti kustrīṇāṃ tathā'numaraṇaṃ vṛthā
वे काम, क्रोध, भय या लोभ से ऐसा करने के कारण हँसी की पात्र बनती हैं। जो स्त्रियाँ आरम्भ से ही बुरी रही हैं, उनका पति के पीछे मरना भी व्यर्थ है।
श्लोक 60 (13.250.60)
आदिप्रभृति या साध्वी पत्युः प्रियपरायणा । ऊर्ध्वं गच्छति सा पूता भर्त्राऽनुमरणं गता ॥
ādiprabhṛti yā sādhvī patyuḥ priyaparāyaṇā | ūrdhvaṃ gacchati sā pūtā bhartrā'numaraṇaṃ gatā
किन्तु जो साध्वी स्त्री आरम्भ से ही पति के प्रिय में लगी रही, वह पति के पीछे प्राण त्यागकर पवित्र होकर ऊर्ध्वलोक को जाती है।
श्लोक 61 (13.250.61)
एवं मृताया वै लोकानहं पश्यामि चक्षुषा । स्पृहणीयान्सुरगणैर्यान्गच्छन्ति पतिव्रताः ॥
evaṃ mṛtāyā vai lokānahaṃ paśyāmi cakṣuṣā | spṛhaṇīyānsuragaṇairyāngacchanti pativratāḥ
इस प्रकार मरी हुई स्त्री के उन लोकों को मैं अपनी आँखों से देखती हूँ, जो देवताओं के समूहों के लिए भी स्पृहणीय हैं और जहाँ पतिव्रताएँ जाती हैं।
श्लोक 62 (13.250.62)
अथवा भर्तरि मृते वैधव्यं धर्ममाश्रिताः । तूष्णीं भौमं जले नित्यमञ्जलिस्नानमुत्तमम् । व्रतं च पतिमुद्दिश्य कुर्युश्चैव विधिं ततः ॥
athavā bhartari mṛte vaidhavyaṃ dharmamāśritāḥ | tūṣṇīṃ bhaumaṃ jale nityamañjalisnānamuttamam | vrataṃ ca patimuddiśya kuryuścaiva vidhiṃ tataḥ
अथवा पति के मर जाने पर जो स्त्रियाँ वैधव्य-धर्म का आश्रय लेती हैं, मौन रहकर, भूमि पर रहती हुई, प्रतिदिन अंजलि-स्नान रूपी उत्तम स्नान करती हुई, पति के उद्देश्य से व्रत करें और फिर विधि का पालन करें।
श्लोक 63 (13.250.63)
एवं गच्छति सा नारी पतिलोकमनुत्तमम् । रमणीयमनिर्देश्यं दुष्प्रापं देवमानुषैः ॥
evaṃ gacchati sā nārī patilokamanuttamam | ramaṇīyamanirdeśyaṃ duṣprāpaṃ devamānuṣaiḥ
इस प्रकार वह स्त्री पति के सर्वोत्तम लोक को जाती है, जो रमणीय, अवर्णनीय और देवताओं तथा मनुष्यों के लिए भी दुर्लभ है।
श्लोक 64 (13.250.64)
प्राप्नुयात्तादृशं लोकं केवलं या पतिव्रता । इति ते कथितं देव स्त्रीणां धर्ममनुत्तमम् ॥
prāpnuyāttādṛśaṃ lokaṃ kevalaṃ yā pativratā | iti te kathitaṃ deva strīṇāṃ dharmamanuttamam
ऐसा लोक केवल वही पाती है जो पूरी तरह पतिव्रता है। हे देव, इस प्रकार आपको स्त्रियों का सर्वोत्तम धर्म बता दिया गया।
श्लोक 65 (13.250.65)
भवतः प्रियकामिन्या यन्मयोक्तं तवाग्रतः । चापल्यान्मम देवेश तद्भवान्क्षन्तुमर्हति ॥
bhavataḥ priyakāminyā yanmayoktaṃ tavāgrataḥ | cāpalyānmama deveśa tadbhavānkṣantumarhati
आपको प्रसन्न करने की इच्छा से मैंने आपके सामने जो कहा है, हे देवेश, मेरी चपलता के कारण आप उसे क्षमा करें।
नारद उवाच
श्लोक 66 (13.250.66)
एवं वदन्तीं रुद्राणीं लज्जाभावसमन्विताम् । प्रशशंस च देवेशो वाचा सञ्जनयन्प्रियम् ॥
evaṃ vadantīṃ rudrāṇīṃ lajjābhāvasamanvitām | praśaśaṃsa ca deveśo vācā sañjanayanpriyam
रुद्राणी जब लज्जा से भरी हुई इस प्रकार कह रही थीं, तब देवेश्वर ने अपनी वाणी से उन्हें प्रसन्न करते हुए उनकी प्रशंसा की।
श्लोक 67 (13.250.67)
ऋषयो देवगन्धर्वाः प्रमदाश्च सहस्रशः । प्रणम्य शिरसा देवीं स्तुतिभिश्चाभितुष्टुवुः ॥
ṛṣayo devagandharvāḥ pramadāśca sahasraśaḥ | praṇamya śirasā devīṃ stutibhiścābhituṣṭuvuḥ
ऋषि, देवता, गन्धर्व और हजारों स्त्रियों ने सिर झुकाकर देवी को प्रणाम किया और स्तुतियों से उनकी स्तुति की।
श्लोक 68 (13.250.68)
पूजयामासुरपरे देवदेव मुदा युताः । संवादं चिन्तयन्त्यन्ते श्रद्दधानाः सुचेतसः ॥
pūjayāmāsurapare devadeva mudā yutāḥ | saṃvādaṃ cintayantyante śraddadhānāḥ sucetasaḥ
हे देवदेव, दूसरों ने हर्ष से भरकर उनकी पूजा की; और अन्त में श्रद्धायुक्त तथा शुद्ध मन वाले उन सबने इस संवाद का चिन्तन किया।
श्लोक 69 (13.250.69)
ततस्तु देवदेवेशो देवीं वचनमब्रवीत् । शृणु कल्याणि मद्वाक्यं संवादोऽयं मया तव । पुण्यं पवित्रं ख्यातं च भविता नात्र संशयः ॥
tatastu devadeveśo devīṃ vacanamabravīt | śṛṇu kalyāṇi madvākyaṃ saṃvādo'yaṃ mayā tava | puṇyaṃ pavitraṃ khyātaṃ ca bhavitā nātra saṃśayaḥ
तब देवों के देव ने देवी से कहा: "हे कल्याणी, मेरी बात सुनो। मेरे और तुम्हारे बीच का यह संवाद पवित्र और पावन कहकर प्रसिद्ध होगा, इसमें सन्देह नहीं।
महेश्वर उवाच
श्लोक 70 (13.250.70)
य इमं श्रावयेद्विद्वान्संवादं चावयोः प्रिये । शुचिर्भूत्वा नरान्युक्तान्स तैः स्वर्गं व्रजेत्सुखम् ॥
ya imaṃ śrāvayedvidvānsaṃvādaṃ cāvayoḥ priye | śucirbhūtvā narānyuktānsa taiḥ svargaṃ vrajetsukham
हे प्रिये, जो विद्वान् पवित्र होकर हमारे इस संवाद को ध्यान लगाए हुए मनुष्यों को सुनाएगा, वह उनके साथ सुखपूर्वक स्वर्ग जाएगा।
श्लोक 71 (13.250.71)
यस्त्वेनं शृणुयान्नित्यं संवादं चावयोः शुभम् । कीर्तिमायुष्यमारोग्यं लभते स गतिं पराम् ॥
yastvenaṃ śṛṇuyānnityaṃ saṃvādaṃ cāvayoḥ śubham | kīrtimāyuṣyamārogyaṃ labhate sa gatiṃ parām
और जो प्रतिदिन हमारे इस शुभ संवाद को सुनेगा, वह कीर्ति, आयु और आरोग्य पाएगा और परम गति को प्राप्त करेगा।"