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अनुशासन पर्व · अध्याय 251

ईश्वर द्वारा कृष्ण के जन्म की भविष्यवाणी

ऋषि शिव (ईश्वर) से वासुदेव की महिमा सुनाने को कहते हैं। शिव हरि को वह परम पुरुष बताते हैं जिनसे ब्रह्मा और स्वयं वे उत्पन्न हुए और जिन्होंने देवताओं के कार्य के लिए मानव शरीर धारण किया है; फिर वे मनु, दक्ष, ययाति और यदु की वंशपरम्परा से होते हुए शूर, वसुदेव और कृष्ण तक का वंशक्रम बताते हैं और बलराम को उनका बड़ा भाई कहते हैं। वे ऋषियों से कृष्ण का आदर करने को कहते हैं, क्योंकि कृष्ण के दर्शन शिव और ब्रह्मा के ही दर्शन हैं, और कृष्ण तथा बलराम को विष्णु और अनन्त शेष घोषित करते हैं।

अध्याय 250अध्याय-सूचीअध्याय 252

ऋषय ऊचुः

श्लोक 1 (13.251.1)

पिनाकिन्भगनेत्रघ्न सर्वलोकनमस्कृत । महात्म्यं वासुदेवस्य श्रोतुमिच्छाम शङ्कर ॥

pinākinbhaganetraghna sarvalokanamaskṛta | mahātmyaṃ vāsudevasya śrotumicchāma śaṅkara

हे पिनाकधारी, भग के नेत्रों का नाश करने वाले, सब लोकों से वन्दित शङ्कर, हम वासुदेव की महिमा सुनना चाहते हैं।

ईश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.251.2)

पितामहादपि वरः शाश्वतः पुरुषो हरिः । कृष्णो जाम्बूनदाभासो व्यभ्रे सूर्य इवोदितः ॥

pitāmahādapi varaḥ śāśvataḥ puruṣo hariḥ | kṛṣṇo jāmbūnadābhāso vyabhre sūrya ivoditaḥ

सनातन पुरुष हरि पितामह ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ हैं। जाम्बूनद स्वर्ण के समान आभा वाले कृष्ण बादलों से रहित आकाश में उदित सूर्य के समान हैं।

श्लोक 3 (13.251.3)

दशबाहुर्महातेजा देवतारिनिषूदनः । श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥

daśabāhurmahātejā devatāriniṣūdanaḥ | śrīvatsāṅko hṛṣīkeśaḥ sarvadaivatapūjitaḥ

वे दस भुजाओं वाले, महातेजस्वी, देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले, श्रीवत्स चिह्न से अंकित और सब देवताओं से पूजित हृषीकेश हैं।

श्लोक 4 (13.251.4)

ब्रह्मा तस्योदरभवस्तस्याहं च शिरोभवः । शिरोरुहेभ्यो ज्योतींषि रोमभ्यश्च सुराऽसुराः ॥

brahmā tasyodarabhavastasyāhaṃ ca śirobhavaḥ | śiroruhebhyo jyotīṃṣi romabhyaśca surā'surāḥ

ब्रह्मा उनके उदर से उत्पन्न हुए और मैं उनके मस्तक से; उनके केशों से ज्योतियाँ और उनके रोमकूपों से देवता तथा असुर उत्पन्न हुए।

श्लोक 5 (13.251.5)

ऋषयो देहसम्भूतास्तस्य लोकाश्च शाश्वताः । पितामहगृहं साक्षात्सर्वदेवगृहं च सः ॥

ṛṣayo dehasambhūtāstasya lokāśca śāśvatāḥ | pitāmahagṛhaṃ sākṣātsarvadevagṛhaṃ ca saḥ

ऋषि उनके शरीर से उत्पन्न हुए हैं और शाश्वत लोक उन्हीं के हैं। वे स्वयं पितामह का निवास हैं और सब देवताओं का भी निवास हैं।

श्लोक 6 (13.251.6)

सोस्याः पृथिव्याः कृत्स्नायाः स्रष्टा त्रिभुवनेश्वरः । संहर्ता चैव भूतानां स्थावरस्य चरस्य च ॥

sosyāḥ pṛthivyāḥ kṛtsnāyāḥ sraṣṭā tribhuvaneśvaraḥ | saṃhartā caiva bhūtānāṃ sthāvarasya carasya ca

वे इस सारी पृथ्वी के स्रष्टा और तीनों लोकों के स्वामी हैं, तथा चर-अचर सब प्राणियों का संहार भी वही करते हैं।

श्लोक 7 (13.251.7)

स हि देववरः साक्षाद्देवनाथः परन्तपः । सर्वज्ञः सर्वसंश्लिष्टः सर्वगः सर्वतोमुखः ॥

sa hi devavaraḥ sākṣāddevanāthaḥ parantapaḥ | sarvajñaḥ sarvasaṃśliṣṭaḥ sarvagaḥ sarvatomukhaḥ

वे साक्षात् देवों में श्रेष्ठ, देवताओं के स्वामी और शत्रुओं को तपाने वाले हैं; सर्वज्ञ, सबसे जुड़े हुए, सर्वत्र जाने वाले और सब ओर मुख वाले हैं।

श्लोक 8 (13.251.8)

परमात्मा हृषीकेशः सर्वव्यापी महेश्वरः । न तस्मात्परमं भूतं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ॥

paramātmā hṛṣīkeśaḥ sarvavyāpī maheśvaraḥ | na tasmātparamaṃ bhūtaṃ triṣu lokeṣu kiñcana

वे परमात्मा, हृषीकेश, सर्वव्यापी और महेश्वर हैं। तीनों लोकों में उनसे बढ़कर कोई प्राणी नहीं है।

श्लोक 9 (13.251.9)

सनातनो वै मधुहा गोविन्द इति विश्रुतः । स सर्वान्पार्थिवान्सङ्ख्ये घातयिष्यति मानदः ॥

sanātano vai madhuhā govinda iti viśrutaḥ | sa sarvānpārthivānsaṅkhye ghātayiṣyati mānadaḥ

मधु का संहार करने वाले, गोविन्द नाम से प्रसिद्ध, मान देने वाले वे सनातन पुरुष युद्ध में सब राजाओं का वध करवाएँगे।

श्लोक 10 (13.251.10)

सुरकार्यार्थमुत्पन्नो मानुषं वपुरास्थितः । न हि देवगणाः शक्तास्त्रिविक्रमविनाकृताः ॥

surakāryārthamutpanno mānuṣaṃ vapurāsthitaḥ | na hi devagaṇāḥ śaktāstrivikramavinākṛtāḥ

वे देवताओं के कार्य के लिए उत्पन्न हुए हैं और उन्होंने मानव शरीर धारण किया है; क्योंकि त्रिविक्रम के बिना देवताओं के समूह समर्थ नहीं हैं

श्लोक 11 (13.251.11)

भुवने देवकार्याणि कर्तुं नायकवर्जिताः । नायकः सर्वभूतानां सर्वदेवनमस्कृतः ॥

bhuvane devakāryāṇi kartuṃ nāyakavarjitāḥ | nāyakaḥ sarvabhūtānāṃ sarvadevanamaskṛtaḥ

कि वे नेता के बिना संसार में देवताओं के कार्य पूरे कर सकें। वही सब प्राणियों के नायक हैं और सब देवताओं से नमस्कृत हैं।

श्लोक 12 (13.251.12)

एतस्य देवनाथस्य देवकार्यपरस्य च । ब्रह्मभूतस्य सततं ब्रह्मर्षिशरणस्य च ॥

etasya devanāthasya devakāryaparasya ca | brahmabhūtasya satataṃ brahmarṣiśaraṇasya ca

इन देवनाथ के शरीर में, जो सदा देवताओं के कार्य में लगे रहते हैं, ब्रह्मरूप हो चुके हैं और ब्रह्मर्षियों के आश्रय हैं,

श्लोक 13 (13.251.13)

ब्रह्मा वसति गर्भस्थः शरीरे सुखसंस्थितः । शर्वः सुखं संश्रितश्च शरीरे सुखसंस्थितः ॥

brahmā vasati garbhasthaḥ śarīre sukhasaṃsthitaḥ | śarvaḥ sukhaṃ saṃśritaśca śarīre sukhasaṃsthitaḥ

ब्रह्मा गर्भ में सुखपूर्वक स्थित रहते हैं; और शर्व भी उस शरीर में सुख से आश्रय लिए हुए सुखपूर्वक रहते हैं।

श्लोक 14 (13.251.14)

सर्वाः सुखं संश्रिताश्च शरीरे तस्य देवताः । स देवः पुण्डरीकाक्षः श्रीगर्भः श्रीसहोषितः ॥

sarvāḥ sukhaṃ saṃśritāśca śarīre tasya devatāḥ | sa devaḥ puṇḍarīkākṣaḥ śrīgarbhaḥ śrīsahoṣitaḥ

सभी देवता भी उनके शरीर में सुखपूर्वक आश्रित हैं। वे देव कमलनयन हैं, श्री को अपने भीतर धारण करने वाले और श्री के साथ निवास करने वाले हैं।

श्लोक 15 (13.251.15)

शार्ङ्गचक्रायुधः खड्गी सर्वनागरिपुध्वजः । उत्तमेन स शीलेन दमेन च शमेन च ॥

śārṅgacakrāyudhaḥ khaḍgī sarvanāgaripudhvajaḥ | uttamena sa śīlena damena ca śamena ca

वे शार्ङ्ग धनुष, चक्र और खड्ग धारण करने वाले हैं और उनकी ध्वजा पर सब नागों का शत्रु (गरुड़) है। वे उत्तम शील, दम और शम से युक्त हैं,

श्लोक 16 (13.251.16)

पराक्रमेण वीर्येण वपुषा दर्शनेन च । आरोहेण प्रमाणेन धैर्येणार्जवसम्पदा ॥

parākrameṇa vīryeṇa vapuṣā darśanena ca | āroheṇa pramāṇena dhairyeṇārjavasampadā

पराक्रम और वीर्य से, शरीर और रूप-दर्शन से, ऊँचाई और डील-डौल से, धैर्य और सरलता की सम्पदा से,

श्लोक 17 (13.251.17)

आनृशंस्येन रूपेण बलेन च समन्वितः । अस्त्रैः समुदितः सर्वैर्दिव्यैरद्भुतदर्शनैः ॥

ānṛśaṃsyena rūpeṇa balena ca samanvitaḥ | astraiḥ samuditaḥ sarvairdivyairadbhutadarśanaiḥ

दया, सौन्दर्य और बल से वे सम्पन्न हैं; और अद्भुत दिखने वाले सब दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं।

श्लोक 18 (13.251.18)

योगमायः सहस्राक्षो निरपायो महामनाः । वीरो मित्रजनश्लाघी ज्ञातिबन्धुजनप्रियः ॥

yogamāyaḥ sahasrākṣo nirapāyo mahāmanāḥ | vīro mitrajanaślāghī jñātibandhujanapriyaḥ

वे योगमाया के स्वामी, सहस्राक्ष, कभी विफल न होने वाले, महामना, मित्रों की प्रशंसा करने वाले वीर और जाति-बन्धुओं के प्रिय हैं,

श्लोक 19 (13.251.19)

क्षमावांश्चानहंवादी ब्रह्मण्यो ब्रह्मनायकः । भयहर्ता भयार्तानां मित्राणां नन्दिवर्धनः ॥

kṣamāvāṃścānahaṃvādī brahmaṇyo brahmanāyakaḥ | bhayahartā bhayārtānāṃ mitrāṇāṃ nandivardhanaḥ

क्षमाशील और अहंकार से रहित, ब्राह्मणों के भक्त और उनके नायक, भयभीतों का भय हरने वाले और मित्रों का आनन्द बढ़ाने वाले हैं,

श्लोक 20 (13.251.20)

शरण्यः सर्वभूतानां दीनानां पालने रतः । श्रुतवानर्थसम्पन्नः सर्वभूतनमस्कृतः ॥

śaraṇyaḥ sarvabhūtānāṃ dīnānāṃ pālane rataḥ | śrutavānarthasampannaḥ sarvabhūtanamaskṛtaḥ

सब प्राणियों के शरणदाता, दीनों की रक्षा में रत, विद्वान्, गुणरूपी धन से सम्पन्न और सब प्राणियों से नमस्कृत हैं,

श्लोक 21 (13.251.21)

समाश्रितानां वरदः शत्रूणामपि धर्मवित् । नीतिज्ञो नीतिसम्पन्नो ब्रह्मवादी जितेन्द्रियः ॥

samāśritānāṃ varadaḥ śatrūṇāmapi dharmavit | nītijño nītisampanno brahmavādī jitendriyaḥ

शरण में आए हुओं को वर देने वाले, शत्रुओं के प्रति भी धर्म को जानने वाले, नीति के ज्ञाता और नीति से सम्पन्न, ब्रह्मवादी और जितेन्द्रिय हैं।

श्लोक 22 (13.251.22)

भवार्थमिह देवानां बुद्ध्या परमया युतः । प्राजापत्ये शुभे मार्गे मानवे धर्मसंस्कृते ॥

bhavārthamiha devānāṃ buddhyā paramayā yutaḥ | prājāpatye śubhe mārge mānave dharmasaṃskṛte

यहाँ देवताओं के कल्याण के लिए परम बुद्धि से युक्त होकर, प्रजापति के शुभ मार्ग में, धर्म से संस्कारित मानव मार्ग में,

श्लोक 23 (13.251.23)

समुत्पत्स्यति गोविन्दो मनोर्वंशे महात्मनः । अङ्गो नाम मनोः पुत्रो अन्तर्धामा ततः परः ॥

samutpatsyati govindo manorvaṃśe mahātmanaḥ | aṅgo nāma manoḥ putro antardhāmā tataḥ paraḥ

महात्मा मनु के वंश में गोविन्द उत्पन्न होंगे। मनु का अङ्ग नाम का पुत्र था, और उसके बाद अन्तर्धामा हुआ।

श्लोक 24 (13.251.24)

अन्तर्धाम्नो हविर्धामा प्रजापतिरनिन्दितः । प्राचीनबर्हिर्भविता हविर्धाम्नः सुतो महान् ॥

antardhāmno havirdhāmā prajāpatiraninditaḥ | prācīnabarhirbhavitā havirdhāmnaḥ suto mahān

अन्तर्धामा से निष्कलंक प्रजापति हविर्धामा हुआ; और हविर्धामा का महान् पुत्र प्राचीनबर्हि होगा।

श्लोक 25 (13.251.25)

तस्य प्रचेतःप्रमुखा भविष्यन्ति दशात्मजाः । प्राचेतसस्तथा दक्षो भवितेह प्रजापतिः ॥

tasya pracetaḥpramukhā bhaviṣyanti daśātmajāḥ | prācetasastathā dakṣo bhaviteha prajāpatiḥ

उसके प्रचेता आदि दस पुत्र होंगे, और प्रचेताओं का पुत्र दक्ष यहाँ प्रजापति होगा।

श्लोक 26 (13.251.26)

दाक्षायण्यास्तथाऽऽदित्यो मनुरादित्यतस्तथा । मनोश्च वंशज इला सुद्युम्नश्च भविष्यति ॥

dākṣāyaṇyāstathā''dityo manurādityatastathā | manośca vaṃśaja ilā sudyumnaśca bhaviṣyati

दक्ष की पुत्री से आदित्य हुए और आदित्य से मनु; और मनु के वंश में इला तथा सुद्युम्न उत्पन्न होंगे।

श्लोक 27 (13.251.27)

बुधात्पुरूरवाश्चापि तस्मादायुर्भविष्यति । नहुषो भविता तस्माद्ययातिस्तस्य चात्मजः ॥

budhātpurūravāścāpi tasmādāyurbhaviṣyati | nahuṣo bhavitā tasmādyayātistasya cātmajaḥ

बुध से पुरूरवा होगा, उससे आयु; उससे नहुष उत्पन्न होगा और नहुष का पुत्र ययाति था।

श्लोक 28 (13.251.28)

यदुस्तस्मान्महासत्वः क्रोष्टा तस्माद्भविष्यति । क्रोष्टुश्चैव महान्पुत्रो वृजिनीवान्भविष्यति ॥

yadustasmānmahāsatvaḥ kroṣṭā tasmādbhaviṣyati | kroṣṭuścaiva mahānputro vṛjinīvānbhaviṣyati

उससे महाबली यदु हुआ और यदु से क्रोष्टा उत्पन्न होगा; क्रोष्टा का महान् पुत्र वृजिनीवान् होगा।

श्लोक 29 (13.251.29)

वृजिनीवतश्च भविता उषङ्गुरपराजितः । उषङ्गोर्भविता पुत्रः शूरश्चित्ररथस्तथा । तस्य त्ववरजः पुत्रः शूरो नाम भविष्यति ॥

vṛjinīvataśca bhavitā uṣaṅguraparājitaḥ | uṣaṅgorbhavitā putraḥ śūraścitrarathastathā | tasya tvavarajaḥ putraḥ śūro nāma bhaviṣyati

वृजिनीवान् से अपराजित उषङ्गु होगा। उषङ्गु का पुत्र शूर होगा, और चित्ररथ भी; और उसका छोटा पुत्र शूर नाम का होगा।

श्लोक 30 (13.251.30)

तेषां विख्यातवीर्याणां चरित्रगुणशालिनाम् । यज्वनां सुविशुद्धानां वंशे ब्राह्मणसम्मते ॥

teṣāṃ vikhyātavīryāṇāṃ caritraguṇaśālinām | yajvanāṃ suviśuddhānāṃ vaṃśe brāhmaṇasammate

इन प्रसिद्ध पराक्रमी, चरित्र और गुणों से शोभित, यज्ञ करने वाले, अत्यन्त शुद्ध और ब्राह्मणों द्वारा सम्मानित पुरुषों के वंश में,

श्लोक 31 (13.251.31)

स शूरः क्षत्रियश्रेष्ठो महावीर्यो महायशाः । स्ववंशविस्तरकरं जनयिष्यति मानदः । वसुदेव इति ख्यातं पुत्रमानकदुन्दुभिम् ॥

sa śūraḥ kṣatriyaśreṣṭho mahāvīryo mahāyaśāḥ | svavaṃśavistarakaraṃ janayiṣyati mānadaḥ | vasudeva iti khyātaṃ putramānakadundubhim

क्षत्रियों में श्रेष्ठ, महापराक्रमी और महायशस्वी वह शूर, जो दूसरों को मान देने वाला है, अपने वंश को बढ़ाने वाले पुत्र को जन्म देगा, जो वसुदेव नाम से प्रसिद्ध आनकदुन्दुभि है।

श्लोक 32 (13.251.32)

तस्य पुत्रश्चतुर्बाहुर्वासुदेवो भविष्यति । दाता ब्राह्मणसत्कर्ता ब्रह्मभूतो द्विजप्रियः ॥

tasya putraścaturbāhurvāsudevo bhaviṣyati | dātā brāhmaṇasatkartā brahmabhūto dvijapriyaḥ

उसका पुत्र चार भुजाओं वाला वासुदेव होगा, जो दाता, ब्राह्मणों का सत्कार करने वाला, ब्रह्मरूप और द्विजों का प्रिय होगा।

श्लोक 33 (13.251.33)

राज्ञो मागधसंरुद्धान्मोक्षयिष्यति यादवः ॥

rājño māgadhasaṃruddhānmokṣayiṣyati yādavaḥ

वह यादव मगध के राजा द्वारा बन्दी बनाए गए राजाओं को छुड़ाएगा।

श्लोक 34 (13.251.34)

जरासन्धं तु राजानं निर्जित्य गिरिगह्वरे । सर्वपार्थिवरत्नाढ्यो भविष्यति स वीर्यवान् ॥

jarāsandhaṃ tu rājānaṃ nirjitya girigahvare | sarvapārthivaratnāḍhyo bhaviṣyati sa vīryavān

पर्वत की गुफा में राजा जरासन्ध को जीतकर वह पराक्रमी सब राजाओं के रत्नों से सम्पन्न होगा।

श्लोक 35 (13.251.35)

पृथिव्यामप्रतिहतो वीर्येण च भविष्यति । विक्रमेण च सम्पन्नः सर्वपार्थिवपार्थिवः ॥

pṛthivyāmapratihato vīryeṇa ca bhaviṣyati | vikrameṇa ca sampannaḥ sarvapārthivapārthivaḥ

वह अपने पराक्रम से पृथ्वी पर अप्रतिहत होगा और विक्रम से सम्पन्न, सब राजाओं का राजा होगा।

श्लोक 36 (13.251.36)

शूरसेनेषु भूत्वा स द्वारकायां वसन्प्रभुः । पालयिष्यति गां देवीं विजित्य नयवित्सदा ॥

śūraseneṣu bhūtvā sa dvārakāyāṃ vasanprabhuḥ | pālayiṣyati gāṃ devīṃ vijitya nayavitsadā

शूरसेनों के बीच उत्पन्न होकर और द्वारका में रहते हुए वह प्रभु, नीति में सदा कुशल रहकर, देवी पृथ्वी को जीतकर उसका पालन करेगा।

श्लोक 37 (13.251.37)

तं भवन्तः समासाद्य वाङ्माल्यैरर्हणैर्वरैः । अर्चयन्तु यथान्यायं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥

taṃ bhavantaḥ samāsādya vāṅmālyairarhaṇairvaraiḥ | arcayantu yathānyāyaṃ brahmāṇamiva śāśvatam

उसके पास जाकर वाणी की मालाओं और उत्तम अर्घ्य-उपहारों से विधिपूर्वक उसकी पूजा करो, जैसे शाश्वत ब्रह्मा की करते हो।

श्लोक 38 (13.251.38)

यो हि मां द्रष्टुमिच्छेत ब्रह्माणं च पितामहम् । द्रष्टव्यस्तेन भगवान्वासुदेवः प्रतापवान् ॥

yo hi māṃ draṣṭumiccheta brahmāṇaṃ ca pitāmaham | draṣṭavyastena bhagavānvāsudevaḥ pratāpavān

जो कोई मुझे या पितामह ब्रह्मा को देखना चाहे, उसे प्रतापी भगवान् वासुदेव के दर्शन करने चाहिए।

श्लोक 39 (13.251.39)

दृष्टे तस्मिन्नहं दृष्टो न मेऽत्रास्ति विचारणा । पितामहो वा देवेश इति वित्त तपोधनाः ॥

dṛṣṭe tasminnahaṃ dṛṣṭo na me'trāsti vicāraṇā | pitāmaho vā deveśa iti vitta tapodhanāḥ

उनके दर्शन होने पर मेरे ही दर्शन हो जाते हैं, इसमें मुझे कोई संशय नहीं। अथवा, हे तपोधन ऋषियो, जान लो कि पितामह, देवताओं के स्वामी, के ही दर्शन हुए।

श्लोक 40 (13.251.40)

स यस्य पुण्डरीकाक्षः प्रीतियुक्तो भविष्यति । तस्य देवगणः प्रीतो ब्रह्मपूर्वो भविष्यति ॥

sa yasya puṇḍarīkākṣaḥ prītiyukto bhaviṣyati | tasya devagaṇaḥ prīto brahmapūrvo bhaviṣyati

वे कमलनयन जिस पर प्रसन्न होंगे, ब्रह्मा सहित देवताओं का समूह उस पर प्रसन्न होगा।

श्लोक 41 (13.251.41)

यश्च तं मानवे लोके संश्रयिष्यति केशवम् । तस्य कीर्तिर्जयश्चैव स्वर्गश्चैव भविष्यति ॥

yaśca taṃ mānave loke saṃśrayiṣyati keśavam | tasya kīrtirjayaścaiva svargaścaiva bhaviṣyati

और जो मनुष्य मानव लोक में केशव का आश्रय लेगा, उसे कीर्ति, विजय और स्वर्ग प्राप्त होंगे।

श्लोक 42 (13.251.42)

धर्माणां देशिकः साक्षात्स भविष्यति धर्मभाक् । धर्मवद्भिः स देवेशो नमस्कार्यः सदोद्यतैः ॥

dharmāṇāṃ deśikaḥ sākṣātsa bhaviṣyati dharmabhāk | dharmavadbhiḥ sa deveśo namaskāryaḥ sadodyataiḥ

वे साक्षात् धर्मों के उपदेशक और धर्म के भागी होंगे; उन देवेश्वर को धर्म जानने वाले, सदा उद्यमी लोगों को सदा नमस्कार करना चाहिए।

श्लोक 43 (13.251.43)

धर्म एव परो हि स्यात्तस्मिन्नभ्यर्चिते विभौ । स हि देवो महातेजाः प्रजाहितचिकीर्षया ॥

dharma eva paro hi syāttasminnabhyarcite vibhau | sa hi devo mahātejāḥ prajāhitacikīrṣayā

उन सर्वव्यापी प्रभु की पूजा करने पर धर्म ही सर्वोपरि हो जाता है। क्योंकि महातेजस्वी उन देव ने प्राणियों का हित चाहकर

श्लोक 44 (13.251.44)

धर्मार्थं पुरुषव्याघ्र ऋषिकोटीः ससर्ज ह । ताः सृष्टास्तेन विभुना पर्वते गन्धमादने ॥

dharmārthaṃ puruṣavyāghra ṛṣikoṭīḥ sasarja ha | tāḥ sṛṣṭāstena vibhunā parvate gandhamādane

धर्म के लिए एक करोड़ ऋषियों की सृष्टि की, हे पुरुषसिंह। उन प्रभु द्वारा रचे गए वे ऋषि गन्धमादन पर्वत पर रहते हैं,

श्लोक 45 (13.251.45)

सनत्कुमारप्रमुखास्तिष्ठन्ति तपसाऽन्विताः । तस्मात्स वाग्मी धर्मज्ञो नमस्यो द्विजपुङ्गवाः ॥

sanatkumārapramukhāstiṣṭhanti tapasā'nvitāḥ | tasmātsa vāgmī dharmajño namasyo dvijapuṅgavāḥ

सनत्कुमार को आगे रखकर और तप से युक्त होकर। इसलिए, हे द्विजश्रेष्ठो, वे वक्ता और धर्मज्ञ नमस्कार करने योग्य हैं।

श्लोक 46 (13.251.46)

दिवि श्रेष्ठो हि भगवान्हरिर्नारायणः प्रभुः । वन्दितो हि स वन्देत मानितो मानयीत च । अर्हितश्चार्हयेन्नित्यं पूजितः प्रतिपूजयेत् ॥

divi śreṣṭho hi bhagavānharirnārāyaṇaḥ prabhuḥ | vandito hi sa vandeta mānito mānayīta ca | arhitaścārhayennityaṃ pūjitaḥ pratipūjayet

भगवान् प्रभु हरि नारायण स्वर्ग में सर्वश्रेष्ठ हैं। वन्दना करने पर वे वन्दना करते हैं, मान देने पर मान देते हैं, अर्चना करने पर अर्चना करते हैं और पूजा करने पर बदले में पूजा करते हैं।

श्लोक 47 (13.251.47)

दृष्टः पश्येदहरहः संश्रितः प्रतिसंश्रयेत् । अर्चितश्चार्चयेन्नित्यं स देवो द्विजसत्तमाः ॥

dṛṣṭaḥ paśyedaharahaḥ saṃśritaḥ pratisaṃśrayet | arcitaścārcayennityaṃ sa devo dvijasattamāḥ

दर्शन करने पर वे प्रतिदिन दर्शन देते हैं, आश्रय लेने पर आश्रय देते हैं, अर्चना करने पर सदा अर्चना करते हैं — हे द्विजश्रेष्ठो, ऐसे हैं वे देव।

श्लोक 48 (13.251.48)

एतत्तस्यानवद्यस्य विष्णोर्वै परमं व्रतम् । आदिदेवस्य महतः सज्जनाचरितं सदा ॥

etattasyānavadyasya viṣṇorvai paramaṃ vratam | ādidevasya mahataḥ sajjanācaritaṃ sadā

यह निर्दोष विष्णु का परम व्रत है, उन महान् आदिदेव का, जिसका सज्जन सदा आचरण करते हैं।

श्लोक 49 (13.251.49)

भुवनेऽभ्यर्चितो नित्यं देवैरपि सनातनः । अभयेनानुरूपेण युज्यन्ते तमनुव्रताः ॥

bhuvane'bhyarcito nityaṃ devairapi sanātanaḥ | abhayenānurūpeṇa yujyante tamanuvratāḥ

वे सनातन देव संसार में देवताओं द्वारा भी सदा पूजित हैं; उनके अनुयायी योग्य निर्भयता से युक्त होते हैं।

श्लोक 50 (13.251.50)

कर्मणा मनसा वाचा स नमस्यो द्विजैः सदा । यत्नवद्भिरुपस्थाय द्रष्टव्यो देवकीसुतः ॥

karmaṇā manasā vācā sa namasyo dvijaiḥ sadā | yatnavadbhirupasthāya draṣṭavyo devakīsutaḥ

कर्म, मन और वाणी से द्विजों को सदा उन्हें नमस्कार करना चाहिए; यत्नपूर्वक समीप जाकर सेवा करते हुए देवकीपुत्र के दर्शन करने चाहिए।

श्लोक 51 (13.251.51)

एष वोऽभिहितो मार्गो मया वै मुनिसत्तमाः । तं दृष्ट्वा सर्वशो देवं दृष्टाः स्युः सुरसत्तमाः ॥

eṣa vo'bhihito mārgo mayā vai munisattamāḥ | taṃ dṛṣṭvā sarvaśo devaṃ dṛṣṭāḥ syuḥ surasattamāḥ

हे मुनिश्रेष्ठो, यह मार्ग मैंने तुम्हें बताया है। उन देव को सब प्रकार से देख लेने पर श्रेष्ठ देवता भी देख लिए जाएँगे।

श्लोक 52 (13.251.52)

महावराहं तं देवं सर्वलोकपितामहम् । अहं चैव नमस्यामि नित्यमेव जगत्पतिम् ॥

mahāvarāhaṃ taṃ devaṃ sarvalokapitāmaham | ahaṃ caiva namasyāmi nityameva jagatpatim

मैं भी उन महावराह देव को, जो सब लोकों के पितामह और जगत् के स्वामी हैं, सदा नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 53 (13.251.53)

तत्र च त्रितयं दृष्टं भविष्यति न संशयः । समस्ता हि वयं देवास्तस्य देहे वसामहे ॥

tatra ca tritayaṃ dṛṣṭaṃ bhaviṣyati na saṃśayaḥ | samastā hi vayaṃ devāstasya dehe vasāmahe

और उनमें तीनों का दर्शन होगा, इसमें संशय नहीं: हम सब देवता उनके शरीर में निवास करते हैं।

श्लोक 54 (13.251.54)

तस्य चैवाग्रजो भ्राता सिताद्रिनिचयप्रभः । हली बल इति ख्यातो भविष्यति धराधरः ॥

tasya caivāgrajo bhrātā sitādrinicayaprabhaḥ | halī bala iti khyāto bhaviṣyati dharādharaḥ

उनके बड़े भाई, श्वेत पर्वतों के समूह के समान प्रभा वाले, हलधारी बल नाम से प्रसिद्ध होंगे और पृथ्वी को धारण करने वाले होंगे।

श्लोक 55 (13.251.55)

त्रिशिरास्तस्य दिव्यश्च सातकुम्भमयो द्रुमः । ध्वजस्तृणेन्द्रो देवस्य भविष्यति रथाश्रितः ॥

triśirāstasya divyaśca sātakumbhamayo drumaḥ | dhvajastṛṇendro devasya bhaviṣyati rathāśritaḥ

उन देव की ध्वजा रथ पर स्थित होगी: सोने का बना, तीन शिखरों वाला दिव्य ताड़ वृक्ष, जो तृणराज कहलाता है।

श्लोक 56 (13.251.56)

शिरो नागैर्महाभोगैः परिकीर्णं महात्मभिः । भविष्यति महाबाहोः सर्वलोकेश्वरस्य च ॥

śiro nāgairmahābhogaiḥ parikīrṇaṃ mahātmabhiḥ | bhaviṣyati mahābāhoḥ sarvalokeśvarasya ca

सब लोकों के उन महाबाहु स्वामी का मस्तक विशाल फनों वाले महात्मा नागों से चारों ओर घिरा होगा।

श्लोक 57 (13.251.57)

चिन्तितानि समेष्यन्ति शस्त्राण्यस्त्राणि चैव ह । अनन्तश्च स एवोक्तो भगवान्हरिरव्ययः ॥

cintitāni sameṣyanti śastrāṇyastrāṇi caiva ha | anantaśca sa evokto bhagavānhariravyayaḥ

उनके चिन्तन मात्र से शस्त्र और अस्त्र उनके पास आ जाएँगे। और वही अनन्त भी कहे गए हैं, वे अविनाशी भगवान् हरि।

श्लोक 58 (13.251.58)

समादिष्टश्च विबुधैर्दर्शय त्वमिति प्रभो । सुपर्णो यस्य वीर्येण कश्यपस्यात्मजो बली । अन्तं नैवाशकद्द्रष्टुं देवस्य परमात्मनः ॥

samādiṣṭaśca vibudhairdarśaya tvamiti prabho | suparṇo yasya vīryeṇa kaśyapasyātmajo balī | antaṃ naivāśakaddraṣṭuṃ devasya paramātmanaḥ

देवताओं के "हे प्रभो, आप दिखाइए" कहकर प्रेरित करने पर भी कश्यप के बलवान् पुत्र सुपर्ण (गरुड़), जो उन्हीं के पराक्रम से बलवान् है, उन परमात्मा देव का अन्त नहीं देख सका।

श्लोक 59 (13.251.59)

स च शेषो विचरते परया वै मुदा युतः । अन्तर्वसति भोगेन परिरभ्य वसुन्धराम् ॥

sa ca śeṣo vicarate parayā vai mudā yutaḥ | antarvasati bhogena parirabhya vasundharām

और वह शेष परम आनन्द से भरकर विचरता है, भीतर निवास करता हुआ अपने कुण्डलों से पृथ्वी को आलिङ्गन किए रहता है।

श्लोक 60 (13.251.60)

य एव विष्णुः सोऽनन्तो भगवान्वसुधाधरः । यो रामः स हृषीकेशो योच्युतः स धराधरः ॥

ya eva viṣṇuḥ so'nanto bhagavānvasudhādharaḥ | yo rāmaḥ sa hṛṣīkeśo yocyutaḥ sa dharādharaḥ

जो विष्णु हैं वही अनन्त हैं, पृथ्वी को धारण करने वाले भगवान्; जो राम हैं वही हृषीकेश हैं, और जो अच्युत हैं वही धराधर हैं।

श्लोक 61 (13.251.61)

तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ दिव्यौ दिव्यपराक्रमौ । द्रष्टव्यौ माननीयौ च चक्रलाङ्गलधारिणौ ॥

tāvubhau puruṣavyāghrau divyau divyaparākramau | draṣṭavyau mānanīyau ca cakralāṅgaladhāriṇau

वे दोनों पुरुषसिंह, दिव्य और दिव्य पराक्रम वाले, चक्र और हल धारण करने वाले, दर्शन और सम्मान के योग्य हैं।

श्लोक 62 (13.251.62)

एष वोऽनुग्रहः प्रोक्तो मया पुण्यस्तपोधनाः । यद्भवन्तो यदुश्रेष्ठं पूजयेयुः प्रयत्नतः ॥

eṣa vo'nugrahaḥ prokto mayā puṇyastapodhanāḥ | yadbhavanto yaduśreṣṭhaṃ pūjayeyuḥ prayatnataḥ

हे तपोधन पुण्यात्माओ, यह अनुग्रह मैंने तुम्हें बताया है कि तुम यदुश्रेष्ठ की यत्नपूर्वक पूजा करो।

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