अनुशासन पर्व · अध्याय 252
ऋषियों द्वारा कृष्ण की स्तुति और भीष्म का उपदेश-समापन
नारद बताते हैं कि हिमालय पर आकाश बादलों से घिर गया और शिव अदृश्य हो गए, और बाद में ऋषियों ने कृष्ण की स्तुति की तथा उनसे फिर दर्शन देने की प्रार्थना की। फिर भीष्म बताते हैं कि कृष्ण द्वारका लौटे और रुक्मिणी से काम-रूप पुत्र उत्पन्न हुआ; वे कहते हैं कि कृष्ण ही नारायण हैं, पाण्डवों की विजय के आधार हैं, और काल ने कौरवों का संहार किया है इसलिए युधिष्ठिर को शोक नहीं करना चाहिए। वे युधिष्ठिर को शिव के उपदेश का स्मरण रखने और धर्म से प्रजा की रक्षा करने को कहते हैं; सभा आश्चर्य से मौन हो जाती है और युधिष्ठिर भीष्म से फिर प्रश्न करते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (13.252.1)
अथ व्योम्नि महाञ्शब्दः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् । मेघैश्च गगनं नीलं संरुद्धमभवद्धनैः ॥
atha vyomni mahāñśabdaḥ savidyutstanayitnumān | meghaiśca gaganaṃ nīlaṃ saṃruddhamabhavaddhanaiḥ
तब आकाश में बिजली और गर्जन के साथ बड़ा भारी शब्द हुआ, और घने काले बादलों से आकाश घिर गया।
श्लोक 2 (13.252.2)
प्रावृषीव च पर्जन्यो ववृषे निर्मलं पयः । तमश्चैवाभवद्घोरं दिशश्च न चकाशिरे ॥
prāvṛṣīva ca parjanyo vavṛṣe nirmalaṃ payaḥ | tamaścaivābhavadghoraṃ diśaśca na cakāśire
वर्षा ऋतु की भाँति मेघ ने निर्मल जल बरसाया; घोर अन्धकार छा गया और दिशाएँ दिखाई नहीं देती थीं।
श्लोक 3 (13.252.3)
ततो देवगिरौ तस्मिन्रम्ये पुण्ये सनातने । न शर्वं भूतसङ्घं वा ददृशुर्मुनयस्तदा ॥
tato devagirau tasminramye puṇye sanātane | na śarvaṃ bhūtasaṅghaṃ vā dadṛśurmunayastadā
तब उस रमणीय, पवित्र और सनातन देवगिरि पर मुनियों ने न शर्व को देखा, न प्राणियों के समूह को।
श्लोक 4 (13.252.4)
व्यभ्रं च गगनं सद्यः क्षणेन समपद्यत । तीर्थयात्रां ततो विप्रा जग्मुश्चान्ये यथागतम् ॥
vyabhraṃ ca gaganaṃ sadyaḥ kṣaṇena samapadyata | tīrthayātrāṃ tato viprā jagmuścānye yathāgatam
क्षण भर में आकाश फिर बादलों से रहित हो गया; तब ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए चले गए और दूसरे जिस मार्ग से आए थे उसी से लौट गए।
श्लोक 5 (13.252.5)
तदद्भुतमचिन्त्यं च दृष्ट्वा ते विस्मिताऽभवन् । शङ्करस्योमया सार्धं संवादं त्वत्कथाश्रयम् ॥
tadadbhutamacintyaṃ ca dṛṣṭvā te vismitā'bhavan | śaṅkarasyomayā sārdhaṃ saṃvādaṃ tvatkathāśrayam
उस अद्भुत और अचिन्त्य घटना को देखकर वे विस्मित हो गए — शङ्कर और उमा के उस संवाद पर, जिसका आधार आपकी ही कथा थी।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 6 (13.252.6)
स भवान्पुरुषव्याघ्र ब्रह्मभूतः सनातनः । यदर्थमनुशिष्टा स्मो गिरिपृष्ठे महात्मना ॥
sa bhavānpuruṣavyāghra brahmabhūtaḥ sanātanaḥ | yadarthamanuśiṣṭā smo giripṛṣṭhe mahātmanā
हे पुरुषसिंह, आप वही सनातन ब्रह्मरूप हैं जिनके लिए उन महात्मा ने हमें पर्वत की चोटी पर उपदेश दिया था।
श्लोक 7 (13.252.7)
द्वितीयं त्वद्भुतमिदं त्वत्तेजःकृतमद्य वै । दृष्ट्वा च विस्मिताः कृष्ण सा च नः स्मृतिरागता ॥
dvitīyaṃ tvadbhutamidaṃ tvattejaḥkṛtamadya vai | dṛṣṭvā ca vismitāḥ kṛṣṇa sā ca naḥ smṛtirāgatā
और यह दूसरा आश्चर्य आज आपके ही तेज से रचा गया है। हे कृष्ण, इसे देखकर हम विस्मित हुए और वह स्मृति हमें लौट आई।
श्लोक 8 (13.252.8)
एतत्ते देवदेवस्य माहात्म्यं कथितं प्रभो । कपर्दिनो गिरीशस्य महाबाहो जनार्दन ॥
etatte devadevasya māhātmyaṃ kathitaṃ prabho | kapardino girīśasya mahābāho janārdana
हे प्रभो, हे महाबाहु जनार्दन, देवाधिदेव कपर्दी, गिरीश की यह महिमा आपको सुना दी गई है।
नारद उवाच
श्लोक 9 (13.252.9)
इत्युक्तः स तदा कृष्णस्तपोवननिवासिभिः । मानयामास तान्सर्वानृषीन्देवकिनन्दनः ॥
ityuktaḥ sa tadā kṛṣṇastapovananivāsibhiḥ | mānayāmāsa tānsarvānṛṣīndevakinandanaḥ
तपोवन के निवासियों के ऐसा कहने पर देवकीनन्दन कृष्ण ने उन सब ऋषियों का सम्मान किया।
श्लोक 10 (13.252.10)
अथर्षयः सम्प्रहृष्टाः पुनस्ते कृष्णमब्रुवन् । पुनःपुनर्दर्शयास्मान्सदैव मधुसूदन ॥
atharṣayaḥ samprahṛṣṭāḥ punaste kṛṣṇamabruvan | punaḥpunardarśayāsmānsadaiva madhusūdana
तब अत्यन्त हर्षित ऋषियों ने कृष्ण से फिर कहा: "हे मधुसूदन, आप सदा बार-बार हमें दर्शन देते रहें।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 11 (13.252.11)
न हि नः सा रतिः स्वर्गे या च त्वद्दर्शने विभो । तदृतं च महाबाहो यदाह भगवान्भवः ॥
na hi naḥ sā ratiḥ svarge yā ca tvaddarśane vibho | tadṛtaṃ ca mahābāho yadāha bhagavānbhavaḥ
क्योंकि हे विभो, स्वर्ग में हमें वैसा आनन्द नहीं मिलता जैसा आपके दर्शन में मिलता है; और हे महाबाहो, भगवान् भव ने जो कहा वह सत्य है।
श्लोक 12 (13.252.12)
एतत्ते सर्वमाख्यातं रहस्यमरिकर्शन । त्वमेव ह्यर्थतत्त्वज्ञः पृष्टोऽस्मान्पृच्छसे यदा ॥
etatte sarvamākhyātaṃ rahasyamarikarśana | tvameva hyarthatattvajñaḥ pṛṣṭo'smānpṛcchase yadā
हे शत्रुसूदन, यह सारा रहस्य आपको बता दिया गया है; क्योंकि आप स्वयं ही सब बातों का तत्त्व जानते हैं, फिर भी जब आपसे पूछा जाता है तो आप हमीं से पूछते हैं।
श्लोक 13 (13.252.13)
तदस्माभिरिदं गुह्यं त्वत्प्रियार्थमुदाहृतम् । न च तेऽविदितं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
tadasmābhiridaṃ guhyaṃ tvatpriyārthamudāhṛtam | na ca te'viditaṃ kiñcittriṣu lokeṣu vidyate
इसलिए यह गुप्त बात हमने आपकी प्रसन्नता के लिए कही है; और तीनों लोकों में आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है।
श्लोक 14 (13.252.14)
जन्म चैव प्रसूतिश्च यच्चान्यत्कारणं विभो । वयं तु बहुचापल्यादशक्ता गुह्यधारणे ॥
janma caiva prasūtiśca yaccānyatkāraṇaṃ vibho | vayaṃ tu bahucāpalyādaśaktā guhyadhāraṇe
हे विभो, आपका जन्म, आपकी उत्पत्ति और जो भी अन्य कारण पृथ्वी पर है — पर हम अपनी बहुत चंचलता के कारण रहस्य को सँभालकर रखने में असमर्थ हैं।
श्लोक 15 (13.252.15)
ततः स्थिते त्वयि विभो लघुत्वात्प्रलपामहे । न हि किञ्चित्तदाश्चर्यं यन्न वेत्ति भवानिह ॥
tataḥ sthite tvayi vibho laghutvātpralapāmahe | na hi kiñcittadāścaryaṃ yanna vetti bhavāniha
इसलिए हे विभो, आपके सामने होते हुए भी हम हल्केपन से बकबक करते हैं। क्योंकि ऐसा कुछ आश्चर्य नहीं है जिसे आप यहाँ न जानते हों।
श्लोक 16 (13.252.16)
दिवि वा भुवि वा देव सर्वं हि विदितं तव । साधयाम वयं कृष्ण बुद्धिं पुष्टिमवाप्नुहि ॥
divi vā bhuvi vā deva sarvaṃ hi viditaṃ tava | sādhayāma vayaṃ kṛṣṇa buddhiṃ puṣṭimavāpnuhi
स्वर्ग में हो या पृथ्वी पर, हे देव, सब कुछ आपको ज्ञात है। हे कृष्ण, हम अपना कर्तव्य निभाएँगे; आपको बुद्धि और समृद्धि प्राप्त हो।
श्लोक 17 (13.252.17)
पुत्रस्ते सदृशस्तात विशिष्टो वा भविष्यति । महाप्रभावसंयुक्तो दीप्तिकीर्तिकरः प्रभुः ॥
putraste sadṛśastāta viśiṣṭo vā bhaviṣyati | mahāprabhāvasaṃyukto dīptikīrtikaraḥ prabhuḥ
हे प्रिय, आपका पुत्र आप ही के समान हो, या उससे भी श्रेष्ठ — महान् प्रभाव वाला, दीप्ति और कीर्ति बढ़ाने वाला, हे प्रभो।
भीष्म उवाच
श्लोक 18 (13.252.18)
ततः प्रणम्य देवेशं यादवं पुरुषोत्तमम् । प्रदक्षिणमुपावृत्य प्रजग्मुस्ते महर्षयः ॥
tataḥ praṇamya deveśaṃ yādavaṃ puruṣottamam | pradakṣiṇamupāvṛtya prajagmuste maharṣayaḥ
तब देवेश्वर, पुरुषोत्तम यादव को प्रणाम कर और उनकी प्रदक्षिणा करके वे महर्षि चले गए।
श्लोक 19 (13.252.19)
सोयं नारायणः श्रीमन्दीप्त्या परमया युतः । व्रतं यथावत्तच्चीर्त्वा द्वारकां पुनरागमत् ॥
soyaṃ nārāyaṇaḥ śrīmandīptyā paramayā yutaḥ | vrataṃ yathāvattaccīrtvā dvārakāṃ punarāgamat
परम तेज से युक्त वे श्रीमान् नारायण अपना व्रत विधिपूर्वक पूरा करके फिर द्वारका लौट आए।
श्लोक 20 (13.252.20)
पूर्णे च दशमे मासि पुत्रोऽस्य परमाद्भुतः । रुक्मिण्यां सम्मतो जज्ञे शूरो वंशधरः प्रभो ॥
pūrṇe ca daśame māsi putro'sya paramādbhutaḥ | rukmiṇyāṃ sammato jajñe śūro vaṃśadharaḥ prabho
और दसवाँ महीना पूरा होने पर रुक्मिणी से एक परम अद्भुत पुत्र उत्पन्न हुआ — सम्मानित, वीर और वंश को धारण करने वाला, हे प्रभो।
श्लोक 21 (13.252.21)
स कामः सर्वभूतानां सर्वभावगतो नृप । असुराणां सुराणां च चरत्यन्तर्गतः सदा ॥
sa kāmaḥ sarvabhūtānāṃ sarvabhāvagato nṛpa | asurāṇāṃ surāṇāṃ ca caratyantargataḥ sadā
हे राजन्, वह सब प्राणियों में काम (इच्छा) है, सब भावों में स्थित है; वह असुरों और देवताओं के भीतर सदा विचरता है।
श्लोक 22 (13.252.22)
सोयं पुरुषशार्दूलो मेघवर्णश्चतुर्भुजः । संश्रितः पाण्डवान्प्रेम्णा भवन्तश्चैनमाश्रिताः ॥
soyaṃ puruṣaśārdūlo meghavarṇaścaturbhujaḥ | saṃśritaḥ pāṇḍavānpremṇā bhavantaścainamāśritāḥ
मेघ के समान वर्ण वाले और चार भुजाओं वाले ये पुरुषसिंह प्रेम से पाण्डवों का आश्रय बने हैं, और आप लोग भी इनके आश्रित हैं।
श्लोक 23 (13.252.23)
कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिश्चैव स्वर्गमार्गस्तथैव च । यत्रैष संस्थितस्तत्र देवो विष्णुस्त्रिविक्रमः ॥
kīrtirlakṣmīrdhṛtiścaiva svargamārgastathaiva ca | yatraiṣa saṃsthitastatra devo viṣṇustrivikramaḥ
कीर्ति, लक्ष्मी, धृति और स्वर्ग का मार्ग — जहाँ ये स्थित हैं, वहीं देव विष्णु त्रिविक्रम स्थित हैं।
श्लोक 24 (13.252.24)
सेन्द्रा देवास्त्रयस्त्रिंशदेष नात्र विचारणा । आदिदेवो महादेवः सर्वभूतप्रतिश्रयः ॥
sendrā devāstrayastriṃśadeṣa nātra vicāraṇā | ādidevo mahādevaḥ sarvabhūtapratiśrayaḥ
इन्द्र सहित तैंतीस देवता वही हैं, इसमें कोई संशय नहीं। वे आदिदेव हैं, महादेव हैं, सब प्राणियों के आश्रय हैं,
श्लोक 25 (13.252.25)
अनादिनिधनोऽव्यक्तो महात्मा मधुसूदनः । अयं जातो महातेजाः सुराणामर्थसिद्धये ॥
anādinidhano'vyakto mahātmā madhusūdanaḥ | ayaṃ jāto mahātejāḥ surāṇāmarthasiddhaye
आदि और अन्त से रहित, अव्यक्त, महात्मा मधुसूदन हैं। वे महातेजस्वी देवताओं का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए उत्पन्न हुए हैं।
श्लोक 26 (13.252.26)
सुदुस्तरार्थतत्त्वस्य वक्ता कर्ता च माधवः । तव पार्थ जयः कृत्स्नस्तव कीर्तिस्तथाऽतुला ॥
sudustarārthatattvasya vaktā kartā ca mādhavaḥ | tava pārtha jayaḥ kṛtsnastava kīrtistathā'tulā
अत्यन्त दुर्बोध तत्त्व के वक्ता और कर्ता माधव हैं। हे पार्थ, सारी विजय तुम्हारी है, तुम्हारी ही अतुलनीय कीर्ति है;
श्लोक 27 (13.252.27)
तवेयं पृथिवी देवी कृत्स्ना नारायणाश्रयात् । अयं नाथस्तवाचिन्त्यो यस्य नारायणो गतिः ॥
taveyaṃ pṛthivī devī kṛtsnā nārāyaṇāśrayāt | ayaṃ nāthastavācintyo yasya nārāyaṇo gatiḥ
यह सारी दिव्य पृथ्वी नारायण के आश्रय से तुम्हारी है। तुम्हारे ये स्वामी अचिन्त्य हैं, जिनकी गति नारायण हैं।
श्लोक 28 (13.252.28)
स भवांस्त्वमुपाध्वर्यू रणाग्नौ हुतवान्नृपान् । कृष्णस्रुवेण महता युगान्ताग्निसमेन वै ॥
sa bhavāṃstvamupādhvaryū raṇāgnau hutavānnṛpān | kṛṣṇasruveṇa mahatā yugāntāgnisamena vai
इस प्रकार तुमने उपाध्वर्यु के समान युगान्त की अग्नि जैसे महान् कृष्णरूपी स्रुवा से रणाग्नि में राजाओं की आहुति दे दी है।
श्लोक 29 (13.252.29)
दुर्योधनश्च शोच्योसौ सपुत्रभ्रातृबान्धवः । कृतवान्योऽबुधः क्रोधाद्धरिगाण्डीविविग्रहम् ॥
duryodhanaśca śocyosau saputrabhrātṛbāndhavaḥ | kṛtavānyo'budhaḥ krodhāddharigāṇḍīvivigraham
और पुत्रों, भाइयों तथा बान्धवों सहित दुर्योधन शोचनीय है, जिस मूर्ख ने क्रोध में हरि और गाण्डीवधारी से विरोध किया।
श्लोक 30 (13.252.30)
दैतेया दानवेन्द्राश्च महाकाया महाबलाः । चक्राग्नौ क्षयमापन्ना दावाग्नौ शलभा इव ॥
daiteyā dānavendrāśca mahākāyā mahābalāḥ | cakrāgnau kṣayamāpannā dāvāgnau śalabhā iva
विशाल शरीर और महान् बल वाले दैत्य और दानवेन्द्र चक्र की अग्नि में वैसे ही नष्ट हो गए जैसे दावानल में पतंगे।
श्लोक 31 (13.252.31)
प्रतियोद्धुं न शक्यो हि मानुषैरेव संयुगे । विहीनैः पुरुषव्याघ्र सत्त्वशक्तिबलादिभिः ॥
pratiyoddhuṃ na śakyo hi mānuṣaireva saṃyuge | vihīnaiḥ puruṣavyāghra sattvaśaktibalādibhiḥ
हे पुरुषसिंह, युद्ध में मनुष्य उनसे लड़ नहीं सकते, क्योंकि वे सत्त्व, शक्ति, बल आदि से हीन हैं।
श्लोक 32 (13.252.32)
जयो योगी युगान्ताभः सव्यसाची रणाग्रगः । तेजसा हतवान्सर्वं सुयोधनवलं नृप ॥
jayo yogī yugāntābhaḥ savyasācī raṇāgragaḥ | tejasā hatavānsarvaṃ suyodhanavalaṃ nṛpa
जय (अर्जुन) योगी हैं, युगान्त की अग्नि के समान तेजस्वी हैं; रण में आगे चलने वाले सव्यसाची ने, हे राजन्, अपने तेज से सुयोधन की सारी सेना को नष्ट कर दिया।
श्लोक 33 (13.252.33)
यत्तु गोवृषभाङ्केन मुनिभ्यः समुदाहृतम् । पुराणं हिमवत्पृष्ठे तन्मे निगदतः शृणु ॥
yattu govṛṣabhāṅkena munibhyaḥ samudāhṛtam | purāṇaṃ himavatpṛṣṭhe tanme nigadataḥ śṛṇu
अब मुझसे वह सुनो जो वृषभ-ध्वज देव ने ऋषियों से कहा था, हिमालय की पीठ पर कही गई वह पुरानी कथा।
श्लोक 34 (13.252.34)
यावत्तस्य भवेत्पुष्टिस्तेजो दीप्तिः पराक्रमः । प्रभावः सन्नतिर्जन्म कृष्णे तत्त्रिगुणं विभो ॥
yāvattasya bhavetpuṣṭistejo dīptiḥ parākramaḥ | prabhāvaḥ sannatirjanma kṛṣṇe tattriguṇaṃ vibho
जितनी भी पुष्टि, तेज, दीप्ति, पराक्रम, प्रभाव, विनम्रता और जन्म किसी में हो, हे विभो, कृष्ण में वह तिगुना है।
श्लोक 35 (13.252.35)
कः शक्नोत्यन्यथा कर्तुं तद्यदि स्यात्तथा शृणु । यत्र कृष्णो हि भगवांस्तत्र पुष्टिरनुत्तमा ॥
kaḥ śaknotyanyathā kartuṃ tadyadi syāttathā śṛṇu | yatra kṛṣṇo hi bhagavāṃstatra puṣṭiranuttamā
उसे अन्यथा कौन कर सकता है? यदि ऐसा हो तो सुनो: जहाँ भगवान् कृष्ण हैं वहाँ सर्वोत्तम समृद्धि है।
श्लोक 36 (13.252.36)
वयं त्विहाल्पमतयः परतन्त्राः सुविक्लबाः । ज्ञानपूर्वं प्रपन्नाः स्मो मृत्योः पन्थानमव्ययम् ॥
vayaṃ tvihālpamatayaḥ paratantrāḥ suviklabāḥ | jñānapūrvaṃ prapannāḥ smo mṛtyoḥ panthānamavyayam
हम यहाँ अल्पबुद्धि, पराधीन और अत्यन्त व्याकुल हैं; जानते हुए भी हम मृत्यु के अन्तहीन मार्ग पर चल पड़े हैं।
श्लोक 37 (13.252.37)
भवांश्चाप्यार्जवपरः पूर्वं कृत्वा प्रतिश्रयम् । राजवृत्तं न लभते प्रतिज्ञापालने रतः ॥
bhavāṃścāpyārjavaparaḥ pūrvaṃ kṛtvā pratiśrayam | rājavṛttaṃ na labhate pratijñāpālane rataḥ
और आप सरलता में तत्पर हैं; पहले वचन दे चुके हैं और प्रतिज्ञा के पालन में लगे रहने के कारण राजाओं का सामान्य आचरण नहीं अपनाते।
श्लोक 38 (13.252.38)
अत्येवात्मवधं लोके राजंस्त्वं बहु मन्यसे । न हि प्रतिज्ञा या दत्ता तां प्रहातुमरिंदम ॥
atyevātmavadhaṃ loke rājaṃstvaṃ bahu manyase | na hi pratijñā yā dattā tāṃ prahātumariṃdama
हे राजन्, आप संसार में अपने वध को भी बहुत महत्त्व देते हैं; जो प्रतिज्ञा दी गई, हे शत्रुदमन, उसे आप छोड़ नहीं सकते।
श्लोक 39 (13.252.39)
कालेनायं जनः सर्वो निहतो रणमूर्धनि । वयं च कालेन हताः कालो हि परमेश्वरः ॥
kālenāyaṃ janaḥ sarvo nihato raṇamūrdhani | vayaṃ ca kālena hatāḥ kālo hi parameśvaraḥ
काल के द्वारा ही यह सारा जनसमूह रणभूमि के अग्रभाग में मारा गया है, और हम भी काल से मारे गए हैं; काल ही परमेश्वर है।
श्लोक 40 (13.252.40)
न हि कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हसि । कालो लोहितरक्ताक्षः कृष्णो दण्डी सनातनः ॥
na hi kālena kālajñaḥ spṛṣṭaḥ śocitumarhasi | kālo lohitaraktākṣaḥ kṛṣṇo daṇḍī sanātanaḥ
काल को जानने वाले को, काल से स्पृष्ट होने पर शोक नहीं करना चाहिए। काल श्याम है, उसकी आँखें रक्त के समान लाल हैं, वह दण्डधारी और सनातन है।
श्लोक 41 (13.252.41)
तस्मात्कुन्तीसुत ज्ञातीन्नेह शोचितुमर्हसि । व्यपेतमन्युर्नित्यं त्वं भव कौरवनन्दन ॥
tasmātkuntīsuta jñātīnneha śocitumarhasi | vyapetamanyurnityaṃ tvaṃ bhava kauravanandana
इसलिए, कुन्तीपुत्र, तुम्हें यहाँ अपने बन्धुओं के लिए शोक नहीं करना चाहिए। हे कुरुनन्दन, तुम सदा क्रोध से रहित रहो।
श्लोक 42 (13.252.42)
माधवस्यास्य महात्म्यं श्रुतं यत्कथितं मया । तदेव तावत्पर्याप्तं सज्जनस्य निदर्शनम् ॥
mādhavasyāsya mahātmyaṃ śrutaṃ yatkathitaṃ mayā | tadeva tāvatparyāptaṃ sajjanasya nidarśanam
माधव की जो महिमा मैंने कही और तुमने सुनी, वही एक सज्जन के लिए उदाहरण के रूप में पर्याप्त है।
श्लोक 43 (13.252.43)
व्यासस्य वचनं श्रुत्वा नारदस्य च धीमतः । स्वयं चैव महाराज कृष्णस्यार्हतमस्य वै ॥
vyāsasya vacanaṃ śrutvā nāradasya ca dhīmataḥ | svayaṃ caiva mahārāja kṛṣṇasyārhatamasya vai
हे महाराज, व्यास, बुद्धिमान् नारद और स्वयं परम पूज्य कृष्ण के वचन सुनकर —
श्लोक 44 (13.252.44)
प्रभावश्चर्षिपूगस्य कथितः सुमहान्मया । महेश्वरस्य संवादं शैलपुत्र्याश्च भारत ॥
prabhāvaścarṣipūgasya kathitaḥ sumahānmayā | maheśvarasya saṃvādaṃ śailaputryāśca bhārata
ऋषि-समूह का अत्यन्त महान् प्रभाव मैंने तुम्हें बताया, साथ ही हे भारत, महेश्वर और पर्वतपुत्री का संवाद भी।
श्लोक 45 (13.252.45)
धारयिष्यति यश्चैनं महापुरुषसम्भवम् । शृणुयात्कथयेद्वा यः स श्रेयो लभते परम् ॥
dhārayiṣyati yaścainaṃ mahāpuruṣasambhavam | śṛṇuyātkathayedvā yaḥ sa śreyo labhate param
जो इस महापुरुष के प्रादुर्भाव की कथा को धारण करता है, और इसे सुनता या सुनाता है, वह परम कल्याण पाता है।
श्लोक 46 (13.252.46)
भवितारश्च तस्याथ सर्वे कामा यथेप्सिताः । प्रेत्य स्वर्गं च लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ॥
bhavitāraśca tasyātha sarve kāmā yathepsitāḥ | pretya svargaṃ ca labhate naro nāstyatra saṃśayaḥ
उसकी सब कामनाएँ इच्छानुसार पूर्ण होंगी, और मरने के बाद वह मनुष्य स्वर्ग पाता है; इसमें संशय नहीं।
श्लोक 47 (13.252.47)
न्याय्यं श्रेयोभिकामेन प्रतिपत्तुं जनार्दनः । एष एवाक्षयो विप्रैः स्तुतो राजञ्जनार्दनः ॥
nyāyyaṃ śreyobhikāmena pratipattuṃ janārdanaḥ | eṣa evākṣayo vipraiḥ stuto rājañjanārdanaḥ
परम कल्याण चाहने वाले को जनार्दन की शरण लेना उचित है; वही अविनाशी हैं, जिनकी स्तुति ब्राह्मण करते हैं, हे राजन्, वही जनार्दन हैं।
श्लोक 48 (13.252.48)
महेश्वरमुखोत्सृष्टा ये च धर्मगुणाः स्मृताः । ते त्वया मनसा धार्याः कुरुराज दिवानिशम् ॥
maheśvaramukhotsṛṣṭā ye ca dharmaguṇāḥ smṛtāḥ | te tvayā manasā dhāryāḥ kururāja divāniśam
और महेश्वर के मुख से निकले जो धर्म के गुण कहे गए हैं, हे कुरुराज, उन्हें तुम दिन-रात मन में धारण करो।
श्लोक 49 (13.252.49)
एवं ते वर्तमानस्य सम्यग्दण्डधरस्य च । प्रजापालनदक्षस्य स्वर्गलोको भविष्यति ॥
evaṃ te vartamānasya samyagdaṇḍadharasya ca | prajāpālanadakṣasya svargaloko bhaviṣyati
इस प्रकार आचरण करते हुए, ठीक से दण्ड धारण करने वाले और प्रजा के पालन में कुशल तुम्हें स्वर्गलोक प्राप्त होगा।
श्लोक 50 (13.252.50)
धर्मेणापि सदा राजन्प्रजा रक्षितुमर्हसि । यस्तस्य विपुलो दण्डः सम्यग्धर्मः स कीर्त्यते ॥
dharmeṇāpi sadā rājanprajā rakṣitumarhasi | yastasya vipulo daṇḍaḥ samyagdharmaḥ sa kīrtyate
हे राजन्, तुम्हें धर्म से भी सदा प्रजा की रक्षा करनी चाहिए; राजा का जो विशाल दण्ड है, वह ठीक से प्रयुक्त होने पर धर्म ही कहलाता है।
श्लोक 51 (13.252.51)
य एष कथितो राजन्मया सज्जनसन्निधौ । शङ्करस्योमया सार्धं संवादो धर्मसंहितः ॥
ya eṣa kathito rājanmayā sajjanasannidhau | śaṅkarasyomayā sārdhaṃ saṃvādo dharmasaṃhitaḥ
शङ्कर और उमा का यह धर्मयुक्त संवाद, जो मैंने, हे राजन्, सज्जनों की उपस्थिति में कहा है —
श्लोक 52 (13.252.52)
श्रुत्वा वा श्रोतुकामो वाऽप्यर्चयेद्वृषभध्वजम् । विशुद्धेनेह भावेन य इच्छेद्भूतिमात्मनः ॥
śrutvā vā śrotukāmo vā'pyarcayedvṛṣabhadhvajam | viśuddheneha bhāvena ya icchedbhūtimātmanaḥ
उसे सुन चुके या सुनने के इच्छुक जो भी अपना कल्याण चाहें, उन्हें शुद्ध भाव से वृषभ-ध्वज देव की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 53 (13.252.53)
एष तस्यानवद्यस्य नारदस्य महात्मनः । संदेशो देवपूजार्थं तं तथा कुरु पाण्डव ॥
eṣa tasyānavadyasya nāradasya mahātmanaḥ | saṃdeśo devapūjārthaṃ taṃ tathā kuru pāṇḍava
यह निर्दोष महात्मा नारद का देवपूजा के लिए सन्देश है; हे पाण्डव, उसी के अनुसार करो।
श्लोक 54 (13.252.54)
एतदत्यद्भुतं वृत्तं पुण्ये हि भवति प्रभो । वासुदेवस्य कौन्तेय स्थाणोश्चैव स्वभावजम् ॥
etadatyadbhutaṃ vṛttaṃ puṇye hi bhavati prabho | vāsudevasya kaunteya sthāṇoścaiva svabhāvajam
हे प्रभो, यह अत्यन्त अद्भुत घटना पुण्य देने वाली है; हे कौन्तेय, यह वासुदेव और स्थाणु के स्वभाव से ही उत्पन्न हुई।
श्लोक 55 (13.252.55)
दशवर्षसहस्राणि बदर्यामेष शाश्वतः । तपश्चचार विपुलं सह गाण्डीवधन्वना ॥
daśavarṣasahasrāṇi badaryāmeṣa śāśvataḥ | tapaścacāra vipulaṃ saha gāṇḍīvadhanvanā
इन सनातन ने गाण्डीवधारी के साथ दस हज़ार वर्ष तक बदरी में विपुल तप किया।
श्लोक 56 (13.252.56)
त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनंजयौ । विदितौ नारदादेतौ मम व्यासाच्च पार्थिव ॥
triyugau puṇḍarīkākṣau vāsudevadhanaṃjayau | viditau nāradādetau mama vyāsācca pārthiva
कमलनयन वासुदेव और धनंजय, त्रियुग वे दोनों, हे राजन्, मुझे नारद और व्यास से ज्ञात हुए हैं।
श्लोक 57 (13.252.57)
बाल एव महाबाहुश्चकार कदनं महत् । कंसस्य पुण्डरीकाक्षो ज्ञातित्राणार्थकारणात् ॥
bāla eva mahābāhuścakāra kadanaṃ mahat | kaṃsasya puṇḍarīkākṣo jñātitrāṇārthakāraṇāt
बाल्यावस्था में ही उन महाबाहु कमलनयन ने अपने बन्धुओं की रक्षा के लिए कंस का भारी संहार किया।
श्लोक 58 (13.252.58)
कर्मणामस्य कौन्तेय नान्तं सङ्ख्यातुमुत्सहे । शाश्वतस्य पुराणस्य पुरुषस्य युधिष्ठिर ॥
karmaṇāmasya kaunteya nāntaṃ saṅkhyātumutsahe | śāśvatasya purāṇasya puruṣasya yudhiṣṭhira
हे कौन्तेय, हे युधिष्ठिर, उन सनातन, पुरातन पुरुष के कर्मों का अन्त मैं गिन नहीं सकता।
श्लोक 59 (13.252.59)
ध्रुवं श्रेयः परं तात भविष्यति तवोत्तमम् । यस्य ते पुरुषव्याघ्रः सखा चायं जनार्दनः ॥
dhruvaṃ śreyaḥ paraṃ tāta bhaviṣyati tavottamam | yasya te puruṣavyāghraḥ sakhā cāyaṃ janārdanaḥ
हे तात, तुम्हें निश्चय ही परम और स्थायी कल्याण प्राप्त होगा, क्योंकि ये पुरुषसिंह जनार्दन तुम्हारे सखा हैं।
श्लोक 60 (13.252.60)
दुर्योधनं तु शोचामि प्रेत्य लोकेऽपि दुर्मतिम् । यत्कृते पृथिवी सर्वा विनष्टा सहयद्विपा ॥
duryodhanaṃ tu śocāmi pretya loke'pi durmatim | yatkṛte pṛthivī sarvā vinaṣṭā sahayadvipā
परन्तु मैं दुर्बुद्धि दुर्योधन के लिए परलोक में भी शोक करता हूँ, जिसके कारण घोड़ों और हाथियों सहित सारी पृथ्वी नष्ट हो गई।
श्लोक 61 (13.252.61)
दुर्योधनापराधेन कर्णस्य शकुनेस्तथा । दुःशासनचतुर्थानां कुरवो निधनं गताः ॥
duryodhanāparādhena karṇasya śakunestathā | duḥśāsanacaturthānāṃ kuravo nidhanaṃ gatāḥ
दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और चौथे दुःशासन के अपराध से कौरव मृत्यु को प्राप्त हुए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 62 (13.252.62)
एवं सम्भाषमाणे तु गाङ्गेये पुरुषर्षभे । तूष्णीं बभूव कौरव्यो मध्ये तेषां महात्मनाम् ॥
evaṃ sambhāṣamāṇe tu gāṅgeye puruṣarṣabhe | tūṣṇīṃ babhūva kauravyo madhye teṣāṃ mahātmanām
पुरुषश्रेष्ठ गङ्गापुत्र के इस प्रकार बोलने पर उन महात्माओं के बीच कुरुवंशी युधिष्ठिर चुप हो गए।
श्लोक 63 (13.252.63)
तच्छ्रुत्वा विस्मयं जग्मुर्धृतराष्ट्रादयो नृपाः । सम्पूज्य मनसा कृष्णं सर्वे प्राञ्जलयोऽभवन् ॥
tacchrutvā vismayaṃ jagmurdhṛtarāṣṭrādayo nṛpāḥ | sampūjya manasā kṛṣṇaṃ sarve prāñjalayo'bhavan
यह सुनकर धृतराष्ट्र आदि राजा विस्मय में पड़ गए, और मन ही मन कृष्ण का सम्मान करते हुए सब हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
श्लोक 64 (13.252.64)
ऋषयश्चापि ते सर्वे नारदप्रमुखास्तदा । प्रतिगृह्याभ्यनन्दन्त तद्वाक्यं प्रतिपूज्य च ॥
ṛṣayaścāpi te sarve nāradapramukhāstadā | pratigṛhyābhyanandanta tadvākyaṃ pratipūjya ca
और नारद आदि वे सब ऋषि भी उसके वचन को स्वीकार कर, उसका आदर करके आनन्दित हुए।
श्लोक 65 (13.252.65)
इत्येतदखिलं सर्वैः पाण्डवो भ्रातृभिः सह । श्रुतवान्सुमहाश्चर्यं पुण्यं भीष्मानुशासनम् ॥
ityetadakhilaṃ sarvaiḥ pāṇḍavo bhrātṛbhiḥ saha | śrutavānsumahāścaryaṃ puṇyaṃ bhīṣmānuśāsanam
इस प्रकार पाण्डव ने भाइयों सहित यह सारा अत्यन्त आश्चर्यजनक और पवित्र भीष्मोपदेश सुना।
श्लोक 66 (13.252.66)
युधिष्ठिरस्तु गाङ्गेयं विश्रान्तं भूरिदक्षिणम् । पुनरेव महाबुद्धिः पर्यपृच्छन्महीपतिः ॥
yudhiṣṭhirastu gāṅgeyaṃ viśrāntaṃ bhūridakṣiṇam | punareva mahābuddhiḥ paryapṛcchanmahīpatiḥ
तब महाबुद्धिमान् पृथ्वीपति युधिष्ठिर ने विश्राम करते हुए, दक्षिणा देने में उदार गङ्गापुत्र से फिर प्रश्न किया।