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अनुशासन पर्व · अध्याय 257

कार्तवीर्य अर्जुन और आकाशवाणी

युधिष्ठिर पूछते हैं कि भीष्म ब्राह्मणों के सम्मान में क्या फल देखते हैं, और भीष्म वायु तथा अर्जुन का प्राचीन संवाद सुनाते हैं। माहिष्मती का राजा कार्तवीर्य दत्तात्रेय से सहस्र भुजाओं तथा अन्य वर पाता है। अपने बल के गर्व में वह कहता है कि उसके समान कोई नहीं; आकाशवाणी उसे बताती है कि ब्राह्मण क्षत्रिय से श्रेष्ठ है, तो वह ब्राह्मणों का तिरस्कार करता है। तब वायु उसे ब्राह्मणों को नमस्कार करने की चेतावनी देते हैं, और अर्जुन उनसे पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, सूर्य और आकाश के समान ब्राह्मणों का वर्णन करने को कहता है।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.257.1)

कां तु ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्ट्वा जनाधिप । कं वा धर्मोदयं मत्वा तानर्चसि महामते ॥

kāṃ tu brāhmaṇapūjāyāṃ vyuṣṭiṃ dṛṣṭvā janādhipa | kaṃ vā dharmodayaṃ matvā tānarcasi mahāmate

हे जनाधिप! ब्राह्मणों की पूजा में आप कौन-सा फल देखकर, अथवा किस धर्मोदय को मानकर, हे महामते! उनका सम्मान करते हैं?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.257.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पवनस्य च संवादमर्जुनस्य च भारत ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | pavanasya ca saṃvādamarjunasya ca bhārata

हे भारत! इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — वायु और अर्जुन का संवाद।

श्लोक 3 (13.257.3)

सहस्रभुजभृच्छ्रीमान्कार्तवीर्योऽभवत्प्रभुः । अस्य लोकस्य सर्वस्य माहिष्मत्यां महाबलः ॥

sahasrabhujabhṛcchrīmānkārtavīryo'bhavatprabhuḥ | asya lokasya sarvasya māhiṣmatyāṃ mahābalaḥ

सहस्र भुजाओं को धारण करने वाला श्रीमान् और महाबली कार्तवीर्य प्रभु हुआ, जो माहिष्मती से इस सारे लोक पर शासन करता था।

श्लोक 4 (13.257.4)

स तु रत्नाकरवतीं सप्तद्वीपां ससागराम् । शशास पृथिवीं सर्वां हैहयः सत्यविक्रमः ॥

sa tu ratnākaravatīṃ saptadvīpāṃ sasāgarām | śaśāsa pṛthivīṃ sarvāṃ haihayaḥ satyavikramaḥ

सत्य पराक्रमी उस हैहय ने रत्नों की खान वाली, सात द्वीपों और सागरों से युक्त सारी पृथ्वी पर शासन किया।

श्लोक 5 (13.257.5)

स्ववित्तं तेन दत्तं तु दत्तात्रेयाय कर्मणे । क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य विनयं श्रुतमेव च ॥

svavittaṃ tena dattaṃ tu dattātreyāya karmaṇe | kṣatradharmaṃ puraskṛtya vinayaṃ śrutameva ca

क्षत्रिय-धर्म, विनय और शास्त्र-ज्ञान को आगे रखकर उसने अपना सारा धन कर्म के निमित्त दत्तात्रेय को दे दिया।

श्लोक 6 (13.257.6)

आराधयामास च तं कृतवीर्यात्मजो मुनिम् । न्यमन्त्रयत संतुष्टो द्विजश्चैनं वरैस्त्रिभिः ॥

ārādhayāmāsa ca taṃ kṛtavīryātmajo munim | nyamantrayata saṃtuṣṭo dvijaścainaṃ varaistribhiḥ

कृतवीर्य के पुत्र ने उन मुनि की आराधना की, और संतुष्ट होकर उस ब्राह्मण ने उसे तीन वर माँगने के लिए आमन्त्रित किया।

श्लोक 7 (13.257.7)

स वरैश्छन्दितस्तेन नृपो वचनमब्रवीत् । सहस्रबाहुता मेऽस्तु यूपमध्ये ग्रहो यथा ॥

sa varaiśchanditastena nṛpo vacanamabravīt | sahasrabāhutā me'stu yūpamadhye graho yathā

उनके द्वारा वर माँगने को कहे जाने पर राजा ने कहा: "मुझे सहस्र भुजाएँ प्राप्त हों, जैसे यज्ञ-स्तम्भों के बीच सोम का पात्र रखा होता है।

अर्जुन उवाच

श्लोक 8 (13.257.8)

मम बाहुसहस्रं तु पश्यन्तां सैनिका रणे । विक्रमेण महीं कृत्स्नां जयेयं संशितव्रत ॥

mama bāhusahasraṃ tu paśyantāṃ sainikā raṇe | vikrameṇa mahīṃ kṛtsnāṃ jayeyaṃ saṃśitavrata

युद्ध में मेरे सैनिक मेरी हजार भुजाएँ देखें; हे दृढ़व्रत! मैं पराक्रम से सारी पृथ्वी को जीत लूँ।

श्लोक 9 (13.257.9)

तां च धर्मेण सम्प्राप्य पालयेयमतन्द्रितः । चतुर्थं तु वरं याचे त्वामहं द्विजसत्तम ॥

tāṃ ca dharmeṇa samprāpya pālayeyamatandritaḥ | caturthaṃ tu varaṃ yāce tvāmahaṃ dvijasattama

और उसे धर्म से पाकर मैं निरालस्य होकर उसका पालन करूँ। हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे चौथा वर माँगता हूँ।

श्लोक 10 (13.257.10)

तं ममानुग्रहकृते दातुमर्हस्यनिन्दित । अनुशाशन्तु मां सन्तो मिथ्यावृत्तं त्वदाश्रयम् ॥

taṃ mamānugrahakṛte dātumarhasyanindita | anuśāśantu māṃ santo mithyāvṛttaṃ tvadāśrayam

हे निष्कलंक! मुझ पर अनुग्रह करने के लिए वह भी आप मुझे दें: यदि मैं मिथ्या आचरण करूँ, तो सज्जन मुझे उपदेश दें, क्योंकि मैं आपकी शरण में हूँ।"

भीष्म उवाच

श्लोक 11 (13.257.11)

इत्युक्तः स द्विजः प्राह तथास्त्विति नराधिपम् । एवं समभवंस्तस्य वरास्ते दीप्ततेजसः ॥

ityuktaḥ sa dvijaḥ prāha tathāstviti narādhipam | evaṃ samabhavaṃstasya varāste dīptatejasaḥ

ऐसा कहे जाने पर उस ब्राह्मण ने राजा से कहा, "ऐसा ही हो।" इस प्रकार उसके वे तेजस्वी वर सिद्ध हुए।

श्लोक 12 (13.257.12)

गतः स रथमास्थाय ज्वलनार्कसमद्युतिम् । अब्रवीद्वीर्यसंमोहात्को वाऽस्ति सदृशो मम ॥

gataḥ sa rathamāsthāya jvalanārkasamadyutim | abravīdvīryasaṃmohātko vā'sti sadṛśo mama

वह अग्नि और सूर्य के समान दीप्तिमान् रथ पर चढ़कर निकल पड़ा, और पराक्रम के मोह में बोला, "मेरे समान कौन है

श्लोक 13 (13.257.13)

धैर्यैर्वीर्यैर्यशःशौर्यैर्विक्रमेणौजसाऽपि वा । तद्वाक्यान्ते चान्तरिक्षे वागुवाचाशरीरिणी ॥

dhairyairvīryairyaśaḥśauryairvikrameṇaujasā'pi vā | tadvākyānte cāntarikṣe vāguvācāśarīriṇī

धैर्य, वीरता, यश, शौर्य, विक्रम या ओज में?" उसकी बात समाप्त होते ही आकाश में एक अशरीरी वाणी बोली।

अशरीरिणी वाकुवाच

श्लोक 14 (13.257.14)

न त्वं मूढ विजानीषे ब्राह्मणं क्षत्रियाद्वरम् । सहितो ब्राह्मणेनेह क्षत्रियः शास्ति वै प्रजाः ॥

na tvaṃ mūḍha vijānīṣe brāhmaṇaṃ kṣatriyādvaram | sahito brāhmaṇeneha kṣatriyaḥ śāsti vai prajāḥ

"मूढ़! तू नहीं जानता कि ब्राह्मण क्षत्रिय से श्रेष्ठ है। क्षत्रिय ब्राह्मण के साथ मिलकर ही प्रजा का शासन करता है।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 15 (13.257.15)

कुर्यां भूतानि तुष्टोऽहं क्रुद्धो नाशं तथा नये । कर्मणा मनसा वाचा न मत्तोस्ति वरो द्विजः ॥

kuryāṃ bhūtāni tuṣṭo'haṃ kruddho nāśaṃ tathā naye | karmaṇā manasā vācā na mattosti varo dvijaḥ

"मैं प्रसन्न होकर प्राणियों की सृष्टि कर सकता हूँ और क्रुद्ध होकर उनका नाश भी कर सकता हूँ। कर्म, मन या वाणी से मुझसे श्रेष्ठ कोई ब्राह्मण नहीं है।

श्लोक 16 (13.257.16)

पूर्वो ब्रह्मोत्तरो वादो द्वितीयः क्षत्रियोत्तरः । त्वयोक्तौ हेतुयुक्तौ तौ विशेषस्तत्र दृश्यते ॥

pūrvo brahmottaro vādo dvitīyaḥ kṣatriyottaraḥ | tvayoktau hetuyuktau tau viśeṣastatra dṛśyate

दो मतों में पहला ब्राह्मण को ऊपर रखता है और दूसरा क्षत्रिय को। तुमने दोनों को हेतुओं सहित कहा है, और उनमें अन्तर दिखाई देता है।

श्लोक 17 (13.257.17)

ब्राह्मणाः संश्रिताः क्षत्रं न क्षत्रं ब्राह्मणाश्रितम् । श्रिता ब्रह्मोपधा विप्राः खादन्ति क्षत्रियान्भुवि ॥

brāhmaṇāḥ saṃśritāḥ kṣatraṃ na kṣatraṃ brāhmaṇāśritam | śritā brahmopadhā viprāḥ khādanti kṣatriyānbhuvi

ब्राह्मण क्षत्रिय के आश्रित हैं, क्षत्रिय ब्राह्मण के आश्रित नहीं। आश्रय लेकर वेद के बहाने ये ब्राह्मण पृथ्वी पर क्षत्रियों को खाते हैं।

श्लोक 18 (13.257.18)

क्षत्रियेष्वाश्रितो धर्मः प्रजानां परिपालनम् । क्षत्राद्वृत्तिर्ब्राह्मणानां तैः कथं ब्राह्मणो वरः ॥

kṣatriyeṣvāśrito dharmaḥ prajānāṃ paripālanam | kṣatrādvṛttirbrāhmaṇānāṃ taiḥ kathaṃ brāhmaṇo varaḥ

धर्म क्षत्रियों में टिका है, वह प्रजा का पालन ही है। ब्राह्मणों की आजीविका क्षत्रिय से है; फिर ब्राह्मण श्रेष्ठ कैसे हुआ?

श्लोक 19 (13.257.19)

सर्वभूतप्रधानांस्तान्भैक्षवृत्तीनहं सदा । आत्मसम्भावितान्विप्रान्स्थापयाम्यात्मनो वशे ॥

sarvabhūtapradhānāṃstānbhaikṣavṛttīnahaṃ sadā | ātmasambhāvitānviprānsthāpayāmyātmano vaśe

यद्यपि वे सब प्राणियों में प्रधान माने जाते हैं, तथापि भिक्षा से जीने वाले और अपने ही मुँह से अपनी बड़ाई करने वाले उन ब्राह्मणों को मैं सदा अपने वश में रखता हूँ।

श्लोक 20 (13.257.20)

कथितं त्वनयाऽसत्यं गायन्त्या कन्यया दिवि । विजेष्याम्यवशान्सर्वान्ब्राह्मणांश्चर्मवाससः ॥

kathitaṃ tvanayā'satyaṃ gāyantyā kanyayā divi | vijeṣyāmyavaśānsarvānbrāhmaṇāṃścarmavāsasaḥ

स्वर्ग में गाती हुई इस कन्या ने यह असत्य कहा है। मैं चर्म-वस्त्र पहनने वाले सब ब्राह्मणों को, वे चाहे विवश हों, जीत लूँगा।

श्लोक 21 (13.257.21)

न च मां च्यावयेद्राष्ट्रात्त्रिषु लोकेषु कश्चन । देवो वा मानुषो वाऽपि तस्माज्जेष्ये द्विजानहम् ॥

na ca māṃ cyāvayedrāṣṭrāttriṣu lokeṣu kaścana | devo vā mānuṣo vā'pi tasmājjeṣye dvijānaham

तीनों लोकों में कोई भी, चाहे देवता हो या मनुष्य, मुझे मेरे राज्य से नहीं हटा सकता; इसलिए मैं ब्राह्मणों को जीत लूँगा।

श्लोक 22 (13.257.22)

अद्य ब्रह्मोत्तरं लोकं करिष्ये क्षत्रियोत्तरम् । नहि मे संयुगे कश्चित्सोढुमुत्सहते बलम् ॥

adya brahmottaraṃ lokaṃ kariṣye kṣatriyottaram | nahi me saṃyuge kaścitsoḍhumutsahate balam

आज मैं इस लोक को, जो ब्राह्मण-प्रधान है, क्षत्रिय-प्रधान कर दूँगा। युद्ध में कोई भी मेरे बल को सह नहीं सकता।"

भीष्म उवाच

श्लोक 23 (13.257.23)

अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा वित्रस्ताऽभून्निशाचरी । अथैनमन्तरिक्षस्थस्ततो वायुरभाषत ॥

arjunasya vacaḥ śrutvā vitrastā'bhūnniśācarī | athainamantarikṣasthastato vāyurabhāṣata

अर्जुन की बात सुनकर वह रात्रि में विचरने वाली भयभीत हो गई; तब आकाश में स्थित वायु ने उससे कहा।

वायुरुवाच

श्लोक 24 (13.257.24)

त्यजैनं कलुषं भावं ब्राह्मणेभ्यो नमस्कुरु । एतेषां कुर्वतः पापं राष्ट्रक्षोभो भविष्यति ॥

tyajainaṃ kaluṣaṃ bhāvaṃ brāhmaṇebhyo namaskuru | eteṣāṃ kurvataḥ pāpaṃ rāṣṭrakṣobho bhaviṣyati

"इस दूषित भाव को त्याग दो और ब्राह्मणों को नमस्कार करो। उनके प्रति पाप करने से तुम्हारे राज्य में उपद्रव होगा।

श्लोक 25 (13.257.25)

अथ च त्वां महीपाल शमयिष्यन्ति वै द्विजाः । निरसिष्यन्ति ते राष्ट्राद्धतोत्साहा महाबलाः ॥

atha ca tvāṃ mahīpāla śamayiṣyanti vai dvijāḥ | nirasiṣyanti te rāṣṭrāddhatotsāhā mahābalāḥ

अथवा हे महीपाल! ब्राह्मण तुम्हें शान्त कर देंगे; या वे महाबली, हतोत्साह होकर, तुम्हें राज्य से निकाल देंगे।"

भीष्म उवाच

श्लोक 26 (13.257.26)

तं राजा कस्त्वमित्याह ततस्तं प्राह मारुतः । वायुर्वै देवदूतोस्मि हितं त्वां प्रब्रवीम्यहम् ॥

taṃ rājā kastvamityāha tatastaṃ prāha mārutaḥ | vāyurvai devadūtosmi hitaṃ tvāṃ prabravīmyaham

राजा ने उससे पूछा, "तुम कौन हो?" तब वायु ने उससे कहा: "मैं वायु हूँ, देवताओं का दूत, और तुम्हारे हित की बात कह रहा हूँ।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 27 (13.257.27)

अहो त्वयाऽयं विप्रेषु भक्तिरागः प्रदर्शितः । यादृशं पृथिवीभूतं तादृशं ब्रूहि मे द्विजम् ॥

aho tvayā'yaṃ vipreṣu bhaktirāgaḥ pradarśitaḥ | yādṛśaṃ pṛthivībhūtaṃ tādṛśaṃ brūhi me dvijam

"अहो! आपने ब्राह्मणों के प्रति कैसी महान् भक्ति दिखाई है! तो जैसी पृथ्वी है, वैसे किसी ब्राह्मण के विषय में मुझे बताइए।

श्लोक 28 (13.257.28)

वायोर्वा सदृशं किञ्चिद्ब्रूहि त्वं ब्राह्मणोत्तमम् । अपां वै सदृशं वह्नेः सूर्यस्य नभसोऽपि वा ॥

vāyorvā sadṛśaṃ kiñcidbrūhi tvaṃ brāhmaṇottamam | apāṃ vai sadṛśaṃ vahneḥ sūryasya nabhaso'pi vā

अथवा वायु के समान किसी उत्तम ब्राह्मण के विषय में बताइए; जल, अग्नि, सूर्य या आकाश के समान भी।"

अध्याय 256अध्याय-सूचीअध्याय 258