अनुशासन पर्व · अध्याय 259
वायु द्वारा कश्यप और उचथ्य की कथा
वायु राजा को उपदेश देते रहते हैं। जब राजा अंग पृथ्वी को ब्राह्मणों को दक्षिणा में देना चाहते थे, तब पृथ्वी दुःखी होकर भाग चली; कश्यप उसमें प्रविष्ट हुए और तीस हजार दिव्य वर्षों तक स्वयं पृथ्वी बने रहे, इसीलिए वह काश्यपी कहलाती है। फिर वायु उचथ्य की कथा कहते हैं, जिनकी पत्नी भद्रा, सोम की पुत्री, को वरुण हर ले गए थे: उचथ्य ने जल पी लिया, उस प्रदेश को ऊसर बना दिया, सरस्वती को मरुभूमि की ओर भेज दिया, और इस प्रकार वरुण को भद्रा लौटाने पर विवश किया। प्रत्येक कथा के अन्त में वायु राजा को चुनौती देते हैं कि वह ब्राह्मण से श्रेष्ठ किसी क्षत्रिय का नाम बताए।
वायुरुवाच
श्लोक 1 (13.259.1)
इमां भूमिं द्विजातिभ्यो दित्सुर्वै दक्षिणां पुरा । अङ्गो नाम नृपो राजंस्ततश्चिन्तां मही ययौ ॥
imāṃ bhūmiṃ dvijātibhyo ditsurvai dakṣiṇāṃ purā | aṅgo nāma nṛpo rājaṃstataścintāṃ mahī yayau
हे राजन्, पूर्वकाल में अंग नाम के एक राजा ने यह पृथ्वी द्विजों को दक्षिणा में देना चाहा; इस पर पृथ्वी चिन्ता में पड़ गई।
श्लोक 2 (13.259.2)
धारिणीं सर्वभूतानामयं प्राप्य वरो नृपः । कथमिच्छति मां दातुं द्विजेभ्यो ब्रह्मणः सुताम् ॥
dhāriṇīṃ sarvabhūtānāmayaṃ prāpya varo nṛpaḥ | kathamicchati māṃ dātuṃ dvijebhyo brahmaṇaḥ sutām
‘सब प्राणियों को धारण करने वाली मुझको पाकर यह श्रेष्ठ राजा, ब्रह्मा की पुत्री मुझको, ब्राह्मणों को कैसे दे देना चाहता है?’
श्लोक 3 (13.259.3)
साहं त्यक्त्वा गमिष्यामि भूमित्वं ब्रह्मणः पदम् । अयं सराष्ट्रो नृपतिर्मार्भूदिति ततोऽगमत् ॥
sāhaṃ tyaktvā gamiṣyāmi bhūmitvaṃ brahmaṇaḥ padam | ayaṃ sarāṣṭro nṛpatirmārbhūditi tato'gamat
‘तब मैं भूमि-भाव को छोड़कर ब्रह्मा के धाम को चली जाऊँगी; यह राजा अपने राष्ट्र सहित न रहे।’ ऐसा सोचकर वह चली गई।
श्लोक 4 (13.259.4)
ततस्तां कश्यपो दृष्ट्वा व्रजन्तीं पृथिवीं तदा । प्रविवेश महीं सद्यो युक्तात्मा सुसमाहितः ॥
tatastāṃ kaśyapo dṛṣṭvā vrajantīṃ pṛthivīṃ tadā | praviveśa mahīṃ sadyo yuktātmā susamāhitaḥ
तब पृथ्वी को जाते देखकर कश्यप, संयत चित्त और पूर्ण समाधि में स्थित होकर, तुरन्त पृथ्वी में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 5 (13.259.5)
ऋद्धा सा सर्वतो जज्ञे तृणौषधिसमन्विता । धर्मोत्तरा नष्टभया भूमिरासीत्ततो नृप ॥
ṛddhā sā sarvato jajñe tṛṇauṣadhisamanvitā | dharmottarā naṣṭabhayā bhūmirāsīttato nṛpa
हे राजन्, तब पृथ्वी सब ओर से समृद्ध हो गई; वह तृण और ओषधियों से भरी, धर्म में प्रधान और भयरहित हो गई।
श्लोक 6 (13.259.6)
एवं वर्षसहस्राणि दिव्यानि विपुलव्रतः । त्रिंशतं कश्यपो राजन्भूमिरासीदतन्द्रितः ॥
evaṃ varṣasahasrāṇi divyāni vipulavrataḥ | triṃśataṃ kaśyapo rājanbhūmirāsīdatandritaḥ
इस प्रकार, हे राजन्, महाव्रती कश्यप तीस हजार दिव्य वर्षों तक अथक रहकर पृथ्वी बने रहे।
श्लोक 7 (13.259.7)
अथागम्य महाराजन्नमस्कृत्य च कश्यपम् । पृथिवी काश्यपी जज्ञे सुता तस्य महात्मनः ॥
athāgamya mahārājannamaskṛtya ca kaśyapam | pṛthivī kāśyapī jajñe sutā tasya mahātmanaḥ
तब, हे महाराज, पृथ्वी ने आकर कश्यप को प्रणाम किया और उन महात्मा की पुत्री काश्यपी हो गई।
श्लोक 8 (13.259.8)
एष राजन्नीदृशो वै ब्राह्मणः कश्यपोऽभवत् । अन्यं प्रब्रूहि वा त्वं च कश्यपात्क्षत्रियं वरम् ॥
eṣa rājannīdṛśo vai brāhmaṇaḥ kaśyapo'bhavat | anyaṃ prabrūhi vā tvaṃ ca kaśyapātkṣatriyaṃ varam
“हे राजन्, कश्यप ऐसे ब्राह्मण थे। अब तुम किसी और का नाम लो, अथवा कश्यप से श्रेष्ठ किसी क्षत्रिय को बताओ।”
श्लोक 9 (13.259.9)
तूष्णीं बभूव नृपतिः पवनस्त्वब्रवीद्वचः । शृणु राजन्नुचथ्यस्य जातस्याङ्गिरसे कुले ॥
tūṣṇīṃ babhūva nṛpatiḥ pavanastvabravīdvacaḥ | śṛṇu rājannucathyasya jātasyāṅgirase kule
राजा चुप हो गया, तब वायु ने कहा: “हे राजन्, अंगिरा के कुल में उत्पन्न उचथ्य की कथा सुनो।”
श्लोक 10 (13.259.10)
भद्रा सोमस्य दुहिता रूपेण परमा मता । तस्यास्तुल्यं पतिं सोम उचथ्यं समपश्यत ॥
bhadrā somasya duhitā rūpeṇa paramā matā | tasyāstulyaṃ patiṃ soma ucathyaṃ samapaśyata
सोम की पुत्री भद्रा रूप में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। सोम ने उसके योग्य पति के रूप में उचथ्य को देखा।
श्लोक 11 (13.259.11)
सा च तीव्रं तपस्तेपे महाभागा यशस्विनी । उचथ्यं तु महाभागं तत्कृते वरयत्तदा ॥
sā ca tīvraṃ tapastepe mahābhāgā yaśasvinī | ucathyaṃ tu mahābhāgaṃ tatkṛte varayattadā
उस यशस्विनी और महाभाग्यवती कन्या ने कठोर तप किया, और उसी उद्देश्य से तब उसने महाभाग उचथ्य को वरण किया।
श्लोक 12 (13.259.12)
तत आहूय चोचथ्यं ददामीति यशस्विनीम् । भार्यार्थे स च जग्राह विधिवद्भूरिदक्षिणः ॥
tata āhūya cocathyaṃ dadāmīti yaśasvinīm | bhāryārthe sa ca jagrāha vidhivadbhūridakṣiṇaḥ
तब सोम ने उचथ्य को बुलाकर “मैं देता हूँ” कहते हुए उस यशस्विनी कन्या को दे दिया, और प्रचुर दक्षिणा देने वाले उचथ्य ने विधिपूर्वक उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
श्लोक 13 (13.259.13)
तां त्वकामयत श्रीमान्वरुणः पूर्वमेव ह । स चागम्य वनप्रस्थं यमुनायां जहार ताम् ॥
tāṃ tvakāmayata śrīmānvaruṇaḥ pūrvameva ha | sa cāgamya vanaprasthaṃ yamunāyāṃ jahāra tām
परन्तु श्रीमान् वरुण उसे पहले से ही चाहते थे; उन्होंने वन में आकर यमुना के तट पर उसका हरण कर लिया।
श्लोक 14 (13.259.14)
जलेश्वरस्तु हृत्वा तामनयत्स्वपुरं प्रति । परमाद्भुतसङ्काशं षट्सहस्रशतह्रदम् ॥
jaleśvarastu hṛtvā tāmanayatsvapuraṃ prati | paramādbhutasaṅkāśaṃ ṣaṭsahasraśatahradam
उसे हरकर जलेश्वर वरुण अपने नगर को ले गए, जो परम अद्भुत शोभा वाला था और जिसमें छह हजार सौ सरोवर थे।
श्लोक 15 (13.259.15)
न हि रम्यतरं किञ्चित्तस्मादन्यत्पुरोत्तमम् । प्रासादैरप्सरोभिश्च दिव्यैः कामैश्च शोभितम् ॥
na hi ramyataraṃ kiñcittasmādanyatpurottamam | prāsādairapsarobhiśca divyaiḥ kāmaiśca śobhitam
उस श्रेष्ठ नगर से बढ़कर कोई रमणीय नगर नहीं था; वह महलों, अप्सराओं और दिव्य भोगों से सुशोभित था।
श्लोक 16 (13.259.16)
तत्र देवस्तया सार्धं रेमे राजञ्जलेश्वरः । तदाख्यातमुचथ्याय ततः पत्न्यवमर्दनम् ॥
tatra devastayā sārdhaṃ reme rājañjaleśvaraḥ | tadākhyātamucathyāya tataḥ patnyavamardanam
हे राजन्, वहाँ देव जलेश्वर उसके साथ रमण करने लगे। तब उचथ्य को अपनी पत्नी के साथ हुए इस अपमान की सूचना मिली।
श्लोक 17 (13.259.17)
तच्छ्रुत्वा नारदात्सर्वमुचथ्यो नारदं तदा । प्रोवाच गच्छ ब्रूहि त्वं वरुणं परुषं वचः ॥
tacchrutvā nāradātsarvamucathyo nāradaṃ tadā | provāca gaccha brūhi tvaṃ varuṇaṃ paruṣaṃ vacaḥ
नारद से यह सब सुनकर उचथ्य ने तब नारद से कहा, “जाओ, और वरुण से मेरी ओर से कठोर वचन कहो।”
उचथ्य उवाच
श्लोक 18 (13.259.18)
मद्वाक्यान्मुञ्च मे भार्यां कस्मात्तां हृतवानसि । लोकपालोसि लोकानां न लोकस्य विलोपकः ॥
madvākyānmuñca me bhāryāṃ kasmāttāṃ hṛtavānasi | lokapālosi lokānāṃ na lokasya vilopakaḥ
“मेरे कहने से मेरी पत्नी को छोड़ दो। तुमने उसे क्यों हर लिया? तुम लोकों के रक्षक हो, संसार को लूटने वाले नहीं।”
वायुरुवाच
श्लोक 19 (13.259.19)
सोमेन दत्ता भार्या मे त्वया चापहृताद्य वै । इत्युक्तो वचनात्तस्य नारदेन जलेश्वरः ॥
somena dattā bhāryā me tvayā cāpahṛtādya vai | ityukto vacanāttasya nāradena jaleśvaraḥ
“सोम ने मुझे पत्नी दी थी, और आज तुमने उसे हर लिया है।” उचथ्य के वचन से नारद ने जलेश्वर वरुण से इस प्रकार कहा:
श्लोक 20 (13.259.20)
मुञ्च भार्यामुचथ्यस्य कस्मात्त्वं हृतवानसि । इति श्रुत्वा वचस्तस्य सोऽथ तं वरुणोऽब्रवीत् ॥
muñca bhāryāmucathyasya kasmāttvaṃ hṛtavānasi | iti śrutvā vacastasya so'tha taṃ varuṇo'bravīt
“उचथ्य की पत्नी को छोड़ दो; तुमने उसे क्यों हर लिया?” उसके ये वचन सुनकर वरुण ने उससे कहा।
श्लोक 21 (13.259.21)
ममैषा सुप्रिया भार्या नैनामुत्स्रष्टुमुत्सहे । इत्युक्तो वरुणेनाथ नारदः प्राप्य तं मुनिम् । उचथ्यमब्रवीद्वाक्यं नातिहृष्टमना इव ॥
mamaiṣā supriyā bhāryā naināmutsraṣṭumutsahe | ityukto varuṇenātha nāradaḥ prāpya taṃ munim | ucathyamabravīdvākyaṃ nātihṛṣṭamanā iva
“यह मेरी अत्यन्त प्रिय पत्नी है; मैं इसे छोड़ नहीं सकता।” वरुण के ऐसा कहने पर नारद उन मुनि के पास गए और कुछ अप्रसन्न-से मन से उचथ्य से बोले।
नारद उवाच
श्लोक 22 (13.259.22)
गले गृहीत्वा क्षिप्तोस्मि वरुणेन महामुने । न प्रयच्छति ते भार्यां यत्ते कार्यं कुरुष्व तत् ॥
gale gṛhītvā kṣiptosmi varuṇena mahāmune | na prayacchati te bhāryāṃ yatte kāryaṃ kuruṣva tat
“हे महामुने, वरुण ने मुझे गले से पकड़कर फेंक दिया। वे आपकी पत्नी को नहीं लौटाते; आपको जो करना हो, कीजिए।”
वायुरुवाच
श्लोक 23 (13.259.23)
नारदस्य वचः श्रुत्वा क्रुद्धः प्राज्वलदङ्गिराः । अपिबत्तेजसा वारि विष्टभ्य सुमहातपाः ॥
nāradasya vacaḥ śrutvā kruddhaḥ prājvaladaṅgirāḥ | apibattejasā vāri viṣṭabhya sumahātapāḥ
नारद की बात सुनकर अंगिरा के वंशज क्रोध से जल उठे, और उन महातपस्वी ने अपने तेज से जल को रोककर उसे पी लिया।
श्लोक 24 (13.259.24)
पीयमाने तु सर्वस्मिंस्तोयेऽपि सलिलेश्वरः । सुहृद्भिर्भिक्षमाणोऽपि नैवामुञ्चत तां तदा ॥
pīyamāne tu sarvasmiṃstoye'pi salileśvaraḥ | suhṛdbhirbhikṣamāṇo'pi naivāmuñcata tāṃ tadā
सारा जल पिया जा रहा था, फिर भी मित्रों के विनती करने पर भी जलेश्वर ने उस समय उसे नहीं छोड़ा।
श्लोक 25 (13.259.25)
ततः क्रुद्धोऽब्रवीद्भूमिमुचथ्यो ब्राह्मणोत्तमः । दर्शय स्वस्थलं भद्रे षट्सहस्रशतह्रदम् ॥
tataḥ kruddho'bravīdbhūmimucathyo brāhmaṇottamaḥ | darśaya svasthalaṃ bhadre ṣaṭsahasraśatahradam
तब ब्राह्मणश्रेष्ठ उचथ्य ने क्रोध में पृथ्वी से कहा, “हे भद्रे, छह हजार सौ सरोवरों वाला अपना स्थल दिखाओ।”
श्लोक 26 (13.259.26)
ततस्तदीरणं जातं समुद्रस्यावसर्पतः । तस्माद्देशान्नदीं चैव प्रोवाचासौ द्विजोत्तमः ॥
tatastadīraṇaṃ jātaṃ samudrasyāvasarpataḥ | tasmāddeśānnadīṃ caiva provācāsau dvijottamaḥ
तब समुद्र के हट जाने से वह स्थान ऊसर हो गया; और उस प्रदेश से द्विजश्रेष्ठ ने नदी से भी कहा:
उचथ्य उवाच
श्लोक 27 (13.259.27)
अदृश्या गच्छ भीरु त्वं सरस्वति मरून्प्रति । अपुण्य एष भवतु देशस्त्यक्तस्त्वया शुभे ॥
adṛśyā gaccha bhīru tvaṃ sarasvati marūnprati | apuṇya eṣa bhavatu deśastyaktastvayā śubhe
“हे भीरु सरस्वति, तुम अदृश्य होकर मरुस्थलों की ओर चली जाओ; और हे शुभे, तुम्हारे द्वारा त्यागा हुआ यह देश पुण्यहीन हो जाए।”
वायुरुवाच
श्लोक 28 (13.259.28)
ततश्चूर्णीकृते देशे भद्रामादाय वारिपः । अददाच्छरणं गत्वा भार्यामाङ्गिरसाय वै ॥
tataścūrṇīkṛte deśe bhadrāmādāya vāripaḥ | adadāccharaṇaṃ gatvā bhāryāmāṅgirasāya vai
उस प्रदेश के चूर्ण हो जाने पर जलाधिप वरुण भद्रा को लेकर शरण में गए और उन्होंने उसे अंगिरा के वंशज को लौटा दिया।
श्लोक 29 (13.259.29)
प्रतिगृह्य तु तां भार्यामुचथ्यः सुमनाऽभवत् । मुमोच च जगद्दुःखान्मरुतश्चैव निर्मलाः ॥
pratigṛhya tu tāṃ bhāryāmucathyaḥ sumanā'bhavat | mumoca ca jagadduḥkhānmarutaścaiva nirmalāḥ
अपनी पत्नी को पाकर उचथ्य प्रसन्न हो गए; उन्होंने जगत् को दुःख से मुक्त किया, और वायुएँ भी निर्मल हो गईं।
श्लोक 30 (13.259.30)
ततः स लब्ध्वा तां भार्यां वरुणं प्राह धर्मवित् । उचथ्यः सुमहातेजा यत्तच्छृणु नराधिप ॥
tataḥ sa labdhvā tāṃ bhāryāṃ varuṇaṃ prāha dharmavit | ucathyaḥ sumahātejā yattacchṛṇu narādhipa
तब पत्नी को पाकर धर्मज्ञ और महातेजस्वी उचथ्य ने वरुण से जो कहा, हे नरेश्वर, वह सुनो।
श्लोक 31 (13.259.31)
मयैषा तपसा प्राप्ता क्रोशतस्ते जलाधिप । इत्युक्त्वा तामुपादाय स्वमेव भवनं ययौ ॥
mayaiṣā tapasā prāptā krośataste jalādhipa | ityuktvā tāmupādāya svameva bhavanaṃ yayau
“हे जलाधिप, तुम्हारे चिल्लाते रहने पर भी मैंने इसे तप से प्राप्त किया है।” यह कहकर वे उसे लेकर अपने ही भवन को चले गए।
श्लोक 32 (13.259.32)
एष राजन्नीदृशो वै उचथ्यो ब्राह्मणर्षभः । ब्रवीमि हान्यं ब्रूहि त्वमुचथ्यात्क्षत्रियं वरम् ॥
eṣa rājannīdṛśo vai ucathyo brāhmaṇarṣabhaḥ | bravīmi hānyaṃ brūhi tvamucathyātkṣatriyaṃ varam
“हे राजन्, ब्राह्मणों में श्रेष्ठ उचथ्य ऐसे थे। मैं कहता हूँ—किसी और को बताओ, उचथ्य से श्रेष्ठ किसी क्षत्रिय का नाम लो।”