अनुशासन पर्व · अध्याय 260
वायु द्वारा अगस्त्य और वसिष्ठ के पराक्रम का वर्णन
वायु चुप बैठे राजा से आगे कहते हैं। असुरों से हारकर और अपने यज्ञ छिन जाने पर जब देवताओं ने अगस्त्य से सहायता माँगी, तब उन्होंने अपने तेज से दानवों को जला दिया; केवल पृथ्वी पर रहने वालों को छोड़ दिया, ताकि उनका तप क्षीण न हो। फिर वायु बताते हैं कि जब आदित्य यज्ञ कर रहे थे और ब्रह्मा से वर पाए हुए सरोवर में डुबकी लगाकर बार-बार जी उठने वाले बलिन नामक दानवों ने उन पर आक्रमण किया, तब वसिष्ठ ने देवताओं की रक्षा की: उन्होंने सबको जला डाला और गंगा को लाकर उस सरोवर को तोड़ दिया, जो सरयू बन गया। प्रत्येक कथा के अन्त में ब्राह्मण से श्रेष्ठ किसी क्षत्रिय का नाम बताने की चुनौती है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.260.1)
इत्युक्तः स नृपस्तूष्णीमभूद्वायुस्ततोऽब्रवीत् । शृणु राजन्नगस्त्यस्य महात्म्यं ब्राह्मणस्य ह ॥
ityuktaḥ sa nṛpastūṣṇīmabhūdvāyustato'bravīt | śṛṇu rājannagastyasya mahātmyaṃ brāhmaṇasya ha
ऐसा कहे जाने पर राजा चुप हो गया, तब वायु ने कहा: “हे राजन्, ब्राह्मण अगस्त्य की महिमा सुनो।”
वायुरुवाच
श्लोक 2 (13.260.2)
असुरैर्निर्जिता देवा निरुत्साहाश्च ते कृताः । यज्ञाश्चैषां हृताः सर्वे पितॄणां च स्वधास्तथा ॥
asurairnirjitā devā nirutsāhāśca te kṛtāḥ | yajñāścaiṣāṃ hṛtāḥ sarve pitṝṇāṃ ca svadhāstathā
असुरों ने देवताओं को जीत लिया और उनका उत्साह तोड़ दिया; उनके सारे यज्ञ छीन लिए गए, और पितरों की स्वधाएँ भी।
श्लोक 3 (13.260.3)
कर्मेज्या मानवानां च दानवैर्हैहयर्षभ । भ्रष्टैश्वर्यास्ततो देवाश्चेरुः पृथ्वीमिति श्रुतिः ॥
karmejyā mānavānāṃ ca dānavairhaihayarṣabha | bhraṣṭaiśvaryāstato devāśceruḥ pṛthvīmiti śrutiḥ
हे हैहयश्रेष्ठ, दानवों ने मनुष्यों के कर्म और यज्ञ भी छीन लिए। तब ऐश्वर्य से भ्रष्ट हुए देवता पृथ्वी पर विचरने लगे—ऐसा श्रुतिवचन है।
श्लोक 4 (13.260.4)
ततः कदाचित्ते राजन्दीप्तमादित्यवर्चसम् । ददृशुस्तेजसा युक्तमगस्त्यं विपुलव्रतम् ॥
tataḥ kadācitte rājandīptamādityavarcasam | dadṛśustejasā yuktamagastyaṃ vipulavratam
तब एक बार, हे राजन्, उन्होंने महाव्रती अगस्त्य को देखा, जो सूर्य के समान तेज से युक्त होकर दीप्त हो रहे थे।
श्लोक 5 (13.260.5)
अभिवाद्य तु तं देवाः पृष्ट्वा कुशलमेव च । इदमूचुर्महात्मानं वाक्यं काले जनाधिप ॥
abhivādya tu taṃ devāḥ pṛṣṭvā kuśalameva ca | idamūcurmahātmānaṃ vākyaṃ kāle janādhipa
देवताओं ने उन्हें प्रणाम किया और कुशल पूछकर, हे जनाधिप, उचित समय पर उन महात्मा से यह बात कही।
देवा ऊचुः
श्लोक 6 (13.260.6)
दानवैर्युधि भग्नाः स्म तथैश्वर्याच्च भ्रंशिताः । तदस्मान्नो भयात्तीव्रात्त्राहि त्वं मुनिपुङ्गव ॥
dānavairyudhi bhagnāḥ sma tathaiśvaryācca bhraṃśitāḥ | tadasmānno bhayāttīvrāttrāhi tvaṃ munipuṅgava
“दानवों ने युद्ध में हमें तोड़ दिया है और हमारे ऐश्वर्य से हमें गिरा दिया है। इसलिए, हे मुनिश्रेष्ठ, इस भयंकर भय से हमारी रक्षा कीजिए।”
वायुरुवाच
श्लोक 7 (13.260.7)
इत्युक्तः स तदा देवैरगस्त्यः कुपितोऽभवत् । प्रजज्वाल च तेजस्वी कालाग्निरिव संक्षये ॥
ityuktaḥ sa tadā devairagastyaḥ kupito'bhavat | prajajvāla ca tejasvī kālāgniriva saṃkṣaye
देवताओं के ऐसा कहने पर अगस्त्य क्रुद्ध हुए, और वे तेजस्वी मुनि युगान्त की कालाग्नि के समान जल उठे।
श्लोक 8 (13.260.8)
तेन दीप्तांशुजालेन निर्दग्धा दानवास्तदा । अन्तरिक्षान्महाराज निपेतुस्ते सहस्रशः ॥
tena dīptāṃśujālena nirdagdhā dānavāstadā | antarikṣānmahārāja nipetuste sahasraśaḥ
उस दीप्त किरणों के जाल से दानव जल गए, और हे महाराज, वे हजारों की संख्या में आकाश से गिर पड़े।
श्लोक 9 (13.260.9)
दह्यमानास्तु ते दैत्यास्तस्यागस्त्यस्य तेजसा । उभौ लोकौ परित्यज्य गताः काष्ठां तु दक्षिणाम् ॥
dahyamānāstu te daityāstasyāgastyasya tejasā | ubhau lokau parityajya gatāḥ kāṣṭhāṃ tu dakṣiṇām
अगस्त्य के तेज से जलते हुए वे दैत्य दोनों लोकों को छोड़कर दक्षिण दिशा में चले गए।
श्लोक 10 (13.260.10)
बलिस्तु यजते यज्ञमश्वमेधं महीं गतः । येऽन्ये स्वस्था महीस्थाश्च ते न दग्धा महासुराः ॥
balistu yajate yajñamaśvamedhaṃ mahīṃ gataḥ | ye'nye svasthā mahīsthāśca te na dagdhā mahāsurāḥ
परन्तु बलि पृथ्वी पर चले गए थे और अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। जो अन्य महान् असुर सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर रहते थे, वे नहीं जले।
श्लोक 11 (13.260.11)
त्यक्तलोकाः पुनः प्राप्ताः सुरैः शान्तभयैर्नृप । अथैनमब्रुवन्देवा भूमिष्ठानसुराञ्जहि ॥
tyaktalokāḥ punaḥ prāptāḥ suraiḥ śāntabhayairnṛpa | athainamabruvandevā bhūmiṣṭhānasurāñjahi
हे राजन्, भय शान्त हो जाने पर देवताओं ने अपने छोड़े हुए लोक फिर पा लिए। तब उन्होंने उनसे कहा, “पृथ्वी पर रहने वाले असुरों को मार डालिए।”
श्लोक 12 (13.260.12)
इत्युक्तः प्राह देवान्स न शक्तोस्मि महीगतान् । दग्धुं तपो हि क्षीयेन्मे न धक्ष्यामीति पार्थिव ॥
ityuktaḥ prāha devānsa na śaktosmi mahīgatān | dagdhuṃ tapo hi kṣīyenme na dhakṣyāmīti pārthiva
ऐसा कहे जाने पर उन्होंने देवताओं से कहा, “पृथ्वी पर गए हुओं को मैं जला नहीं सकता; मेरा तप क्षीण हो जाएगा। मैं उन्हें नहीं जलाऊँगा,” हे राजन्।
श्लोक 13 (13.260.13)
एवं दग्धा भगवता दानवाः स्वेन तेजसा । अगस्त्येन तदा राजंस्तपसा भावितात्मना ॥
evaṃ dagdhā bhagavatā dānavāḥ svena tejasā | agastyena tadā rājaṃstapasā bhāvitātmanā
हे राजन्, इस प्रकार तप से शुद्ध आत्मा वाले भगवान् अगस्त्य ने अपने ही तेज से दानवों को जला डाला।
श्लोक 14 (13.260.14)
ईदृशश्चाप्यगस्त्यो हि कथितस्ते मयाऽनघ । ब्रवीम्यन्यं ब्रूहि वा त्वमगस्त्यात्क्षत्रियं वरम् ॥
īdṛśaścāpyagastyo hi kathitaste mayā'nagha | bravīmyanyaṃ brūhi vā tvamagastyātkṣatriyaṃ varam
“हे निष्पाप, मैंने तुम्हें ऐसे अगस्त्य का वर्णन सुनाया। मैं कहता हूँ—किसी और को बताओ, अथवा अगस्त्य से श्रेष्ठ किसी क्षत्रिय का नाम लो।”
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (13.260.15)
इत्युक्तः स तदा तूष्णीमभूद्वायुस्ततोऽब्रवीत् । शृणु राजन्वसिष्ठस्य मुख्यं कर्म यशस्विनः ॥
ityuktaḥ sa tadā tūṣṇīmabhūdvāyustato'bravīt | śṛṇu rājanvasiṣṭhasya mukhyaṃ karma yaśasvinaḥ
ऐसा कहे जाने पर वह चुप हो गया, तब वायु ने कहा: “हे राजन्, यशस्वी वसिष्ठ का प्रमुख कर्म सुनो।”
वायुरुवाच
श्लोक 16 (13.260.16)
वैखानसविधानेन गङ्गातीरं समाश्रिताः । आदित्याः सत्रमासन्त सरो वैखानसं प्रति । वसिष्ठं मनसा गत्वा ज्ञात्वा तत्त्वस्य गोचरम् ॥
vaikhānasavidhānena gaṅgātīraṃ samāśritāḥ | ādityāḥ satramāsanta saro vaikhānasaṃ prati | vasiṣṭhaṃ manasā gatvā jñātvā tattvasya gocaram
वैखानस विधि के अनुसार गंगा के तट पर बसे हुए आदित्यों ने वैखानस सरोवर के पास यज्ञ-सत्र किया; मन से वसिष्ठ के पास जाकर उन्होंने तत्त्व की पहुँच को जान लिया था।
श्लोक 17 (13.260.17)
यजमानांस्तु तान्दृष्ट्वा सर्वान्दीक्षानुकर्शितान् । हन्तुमैच्छन्त शैलाभा बलिनो नाम दानवाः ॥
yajamānāṃstu tāndṛṣṭvā sarvāndīkṣānukarśitān | hantumaicchanta śailābhā balino nāma dānavāḥ
दीक्षा से कृश हुए उन सब यजमानों को देखकर पर्वत जैसे विशालकाय बलिन नामक दानव उन्हें मार डालना चाहने लगे।
श्लोक 18 (13.260.18)
अदूरात्तु ततस्तेषां ब्रह्मदत्तवरं सरः । हता हता वै तत्रैते जीवन्त्याप्लुत्य दानवाः ॥
adūrāttu tatasteṣāṃ brahmadattavaraṃ saraḥ | hatā hatā vai tatraite jīvantyāplutya dānavāḥ
उनके निकट ही ब्रह्मा से वरदान पाया हुआ एक सरोवर था; बार-बार मारे जाने पर भी वे दानव उसमें डुबकी लगाकर जी उठते थे।
श्लोक 19 (13.260.19)
ते प्रगृह्य महाघोरान्पर्वतान्परिघान्द्रुमान् । विक्षोभयन्तः सलिलमुत्थितं शतयोजनम् ॥
te pragṛhya mahāghorānparvatānparighāndrumān | vikṣobhayantaḥ salilamutthitaṃ śatayojanam
उन्होंने भयंकर पर्वत, परिघ और वृक्ष उठाकर जल को मथ डाला, जो सौ योजन ऊँचा उठ गया।
श्लोक 20 (13.260.20)
अभ्यद्रवन्त देवांस्ते सहस्राणि दशैव हि । ततस्तैरर्दिता देवाः शरणं वासवं ययुः ॥
abhyadravanta devāṃste sahasrāṇi daśaiva hi | tatastairarditā devāḥ śaraṇaṃ vāsavaṃ yayuḥ
वे दस हजार ही देवताओं पर टूट पड़े; उनसे पीड़ित होकर देवता वासव (इन्द्र) की शरण में गए।
श्लोक 21 (13.260.21)
स च तैर्व्यथितः शक्रो वसिष्ठं शरणं ययौ । ततोऽभयं ददौ तेभ्यो वसिष्ठो भगवानृषिः ॥
sa ca tairvyathitaḥ śakro vasiṣṭhaṃ śaraṇaṃ yayau | tato'bhayaṃ dadau tebhyo vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ
उनसे व्यथित होकर शक्र वसिष्ठ की शरण में गए; तब भगवान् ऋषि वसिष्ठ ने उन्हें अभय दे दिया।
श्लोक 22 (13.260.22)
तदा तान्दुःखितान्ज्ञात्वा आनृशंस्यपरो मुनिः । अयत्नेनादहत्सर्वाञ्ज्वलता स्वेन तेजसा ॥
tadā tānduḥkhitānjñātvā ānṛśaṃsyaparo muniḥ | ayatnenādahatsarvāñjvalatā svena tejasā
तब उन्हें दुःखी जानकर करुणा में तत्पर मुनि ने अपने प्रज्वलित तेज से बिना प्रयास उन सबको जला डाला।
श्लोक 23 (13.260.23)
कैलासं प्रस्थितां चैव नदीं गङ्गां महातपाः । आनयत्तत्सरो दिव्यं तया भिन्नं च तत्सरः ॥
kailāsaṃ prasthitāṃ caiva nadīṃ gaṅgāṃ mahātapāḥ | ānayattatsaro divyaṃ tayā bhinnaṃ ca tatsaraḥ
तब उन महातपस्वी ने कैलास की ओर जाती हुई गंगा नदी को उस दिव्य सरोवर तक पहुँचा दिया, और उसके द्वारा वह सरोवर टूट गया।
श्लोक 24 (13.260.24)
सरो भिन्नं तया नद्या सरयूः सा ततोऽभवत् । हताश्च बलिनो यत्र स देशे बलिनोऽभवत् ॥
saro bhinnaṃ tayā nadyā sarayūḥ sā tato'bhavat | hatāśca balino yatra sa deśe balino'bhavat
उस नदी से टूटा हुआ वह सरोवर तभी से सरयू बन गया; और जहाँ बलिन मारे गए थे, वह प्रदेश बलिन कहलाने लगा।
श्लोक 25 (13.260.25)
एवं सेन्द्रा वसिष्ठेन रक्षितास्त्रिदिवौकसः । ब्रह्मदत्तवराश्चैव हता दैत्या महात्मना ॥
evaṃ sendrā vasiṣṭhena rakṣitāstridivaukasaḥ | brahmadattavarāścaiva hatā daityā mahātmanā
इस प्रकार इन्द्र सहित स्वर्गवासी वसिष्ठ द्वारा रक्षित हुए, और ब्रह्मा से वर पाए हुए दैत्य उन महात्मा द्वारा मार डाले गए।
श्लोक 26 (13.260.26)
एतत्कर्म वसिष्ठस्य कथितं हि मयाऽनघ । ब्रवीम्यन्यं ब्रूहि वा त्वं वसिष्ठात्क्षत्रियं वरम् ॥
etatkarma vasiṣṭhasya kathitaṃ hi mayā'nagha | bravīmyanyaṃ brūhi vā tvaṃ vasiṣṭhātkṣatriyaṃ varam
“हे निष्पाप, मैंने तुम्हें वसिष्ठ का यह कर्म सुनाया। मैं कहता हूँ—किसी और को बताओ, अथवा वसिष्ठ से श्रेष्ठ किसी क्षत्रिय का नाम लो।”