अनुशासन पर्व · अध्याय 26
गरुड़ का हाथी और कछुए को पकड़ना
कश्यप गरुड़ को बताते हैं कि हाथी और कछुआ सरोवर पर लड़ते हैं और जब कछुआ बाहर निकल आए तथा हाथी असावधान हो, तब दोनों को एक साथ पकड़ा जा सकता है। गरुड़ युद्ध करते उन दोनों को पकड़कर अपने नखों से मार डालता है और खाने के लिए स्थान खोजता उड़ चलता है। वह एक विशाल वृक्ष की विशाल शाखा पर बैठता है, जो ऋषियों के समूह के ऊपर टूटने लगती है; वह उसे लेकर उड़ जाता है और ऋषि उसका नाम गरुड़ रखते हैं। एक दिव्य वाणी उसे समुद्र के किनारे कुविन्दों के बीच शाखा गिराने को कहती है, जिससे छत्तीस जनपद नष्ट हो जाते हैं।
गरुड उवाच
श्लोक 1 (13.26.1)
कथं तौ भगवञ्शक्यौ मया वारणकच्छपौ । युगपद्ग्रहीतुं तं मे त्वमुपायं वक्तुमर्हसि ॥
kathaṃ tau bhagavañśakyau mayā vāraṇakacchapau | yugapadgrahītuṃ taṃ me tvamupāyaṃ vaktumarhasi
"भगवन्, मैं हाथी और कछुए को एक साथ कैसे पकड़ सकता हूँ? मुझे उसका उपाय बताइए।"
कश्यप उवाच
श्लोक 2 (13.26.2)
योद्धुकामे गजे तस्मिन्मुहूर्तं स जलेचरः । उत्तिष्ठति जलात्तूर्णं योद्धुकामः पुनःपुनः ॥
yoddhukāme gaje tasminmuhūrtaṃ sa jalecaraḥ | uttiṣṭhati jalāttūrṇaṃ yoddhukāmaḥ punaḥpunaḥ
"जब वह हाथी लड़ना चाहता है, तब जल में रहने वाला वह कछुआ भी लड़ने की इच्छा से बार-बार थोड़ी देर के लिए शीघ्र जल से ऊपर उठता है।
श्लोक 3 (13.26.3)
जलजं निर्गतं तात प्रमत्तं चैव वारणम् । ग्रहीष्यसि पतङ्गेश नान्यो योगोऽत्र विद्यते ॥
jalajaṃ nirgataṃ tāta pramattaṃ caiva vāraṇam | grahīṣyasi pataṅgeśa nānyo yogo'tra vidyate
पुत्र, पक्षियों के स्वामी, जब जलचर बाहर निकल आएगा और हाथी असावधान होगा, तब तुम उन्हें पकड़ लोगे; यहाँ दूसरा कोई उपाय नहीं है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (13.26.4)
इत्येवमुक्तो विहगस्तद्गत्वा वनमुत्तमम् । ददर्श वारणेन्द्रं तं मेघाचलसमप्रभम् ॥
ityevamukto vihagastadgatvā vanamuttamam | dadarśa vāraṇendraṃ taṃ meghācalasamaprabham
ऐसा कहे जाने पर वह पक्षी उस उत्तम वन में गया और मेघ-पर्वत जैसी कान्ति वाले उस गजराज को देखा।
श्लोक 5 (13.26.5)
तां स नागो गिरेर्वीथिं सम्प्राप्त इव भारत । स तं दृष्ट्वा महाभागः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥
tāṃ sa nāgo girervīthiṃ samprāpta iva bhārata | sa taṃ dṛṣṭvā mahābhāgaḥ samprahṛṣṭatanūruhaḥ
हे भारत, वह हाथी पर्वत के उस मार्ग पर अभी पहुँचा ही था; उसे देखकर वह महाभाग पक्षी रोमांचित हो उठा।
श्लोक 6 (13.26.6)
बिभक्षयिषतो राजन्दारुणस्य महात्मनः । मातङ्गं कच्छपं चैव प्रहर्षः सुमहानभूत् ॥
bibhakṣayiṣato rājandāruṇasya mahātmanaḥ | mātaṅgaṃ kacchapaṃ caiva praharṣaḥ sumahānabhūt
हे राजन्, हाथी और कछुए को खाने की इच्छा रखने वाले उस भयंकर महात्मा को बड़ा हर्ष हुआ।
श्लोक 7 (13.26.7)
अथ वेगेन महता खेचरः स महाबलः । सङ्कुच्य सर्वगात्राणि कृच्छ्रेणैवान्वपद्यत ॥
atha vegena mahatā khecaraḥ sa mahābalaḥ | saṅkucya sarvagātrāṇi kṛcchreṇaivānvapadyata
तब वह महाबली आकाशचारी पक्षी अपने सारे अंग समेटकर बड़े वेग से, परिश्रम के साथ आगे बढ़ा।
श्लोक 8 (13.26.8)
तथा गत्वा तमध्वानं वारणप्रवरो बली । निशश्वास महाश्वासः श्रमाद्विश्रमणाय च ॥
tathā gatvā tamadhvānaṃ vāraṇapravaro balī | niśaśvāsa mahāśvāsaḥ śramādviśramaṇāya ca
उस मार्ग से चलकर बलवान गजश्रेष्ठ ने थकान के कारण विश्राम के लिए भारी साँस ली।
श्लोक 9 (13.26.9)
तस्य निश्वासवातेन मदगन्धेन चैव ह । उदतिष्ठन्महाकूर्मो वारणप्रतिषेधकः ॥
tasya niśvāsavātena madagandhena caiva ha | udatiṣṭhanmahākūrmo vāraṇapratiṣedhakaḥ
उसकी साँस की हवा और मद की गन्ध से हाथी का विरोधी महाकूर्म ऊपर उठ आया।
श्लोक 10 (13.26.10)
तयोः सुतुमुलं युद्धं ददर्श पतगेश्वरः । कच्छपेन्द्रद्विरदयोरिन्द्रप्रह्रादयोरिव ॥
tayoḥ sutumulaṃ yuddhaṃ dadarśa patageśvaraḥ | kacchapendradviradayorindraprahrādayoriva
पक्षीराज ने उन दोनों, कच्छपराज और हाथी, का इन्द्र और प्रह्लाद जैसा भीषण युद्ध देखा।
श्लोक 11 (13.26.11)
स्पृशन्तमग्रहस्तेन तोयं वारणयूथपम् । दन्तैर्नखैश्च जलजो वारयामास भारत ॥
spṛśantamagrahastena toyaṃ vāraṇayūthapam | dantairnakhaiśca jalajo vārayāmāsa bhārata
हे भारत, सूँड़ के अग्रभाग से जल को छूते हुए उस हाथियों के नायक को जलचर कछुए ने दाँतों और नखों से रोका।
श्लोक 12 (13.26.12)
जलजं वारणोऽप्येवं चरणैः पुष्करेण च । प्रत्यषेधन्निमज्जन्तमुन्मज्जन्तं तथैव च ॥
jalajaṃ vāraṇo'pyevaṃ caraṇaiḥ puṣkareṇa ca | pratyaṣedhannimajjantamunmajjantaṃ tathaiva ca
और हाथी ने भी उसी प्रकार पैरों और सूँड़ से, डुबकी लगाते और ऊपर आते कछुए को रोका।
श्लोक 13 (13.26.13)
मुहूर्तमभवद्युद्धं तयोर्भीमप्रदर्शनम् । अथ तस्माज्जलाद्राजन्कच्छपः स्थलमास्थितः ॥
muhūrtamabhavadyuddhaṃ tayorbhīmapradarśanam | atha tasmājjalādrājankacchapaḥ sthalamāsthitaḥ
एक क्षण तक उन दोनों का युद्ध भयानक दिखाई देता रहा। फिर, हे राजन्, वह कछुआ जल से निकलकर स्थल पर आ गया।
श्लोक 14 (13.26.14)
स तु नागः प्रभग्नोऽपि पिपासुर्न न्यवर्तत । तोयगृध्नुः शनैस्तर्षादपासर्पत पृष्ठतः ॥
sa tu nāgaḥ prabhagno'pi pipāsurna nyavartata | toyagṛdhnuḥ śanaistarṣādapāsarpata pṛṣṭhataḥ
पर वह हाथी हार जाने पर भी प्यासा होने के कारण लौटा नहीं; पानी की चाह में वह प्यास के मारे धीरे-धीरे पीछे हटता गया।
श्लोक 15 (13.26.15)
तं दृष्ट्वा जलजस्तूर्णमपसर्पन्तमाहवात् । अभिदुद्राव वेगेन वज्रपाणिरिवासुरम् ॥
taṃ dṛṣṭvā jalajastūrṇamapasarpantamāhavāt | abhidudrāva vegena vajrapāṇirivāsuram
उसे युद्ध से पीछे हटते देखकर वह जलचर शीघ्र ही वेग से उस पर टूट पड़ा, जैसे वज्रधारी इन्द्र असुर पर टूट पड़ता है।
श्लोक 16 (13.26.16)
तं रोषात्स्थलमुत्तीर्णमसम्प्राप्तं गजोत्तमम् । उभावेव समस्तौ तु जग्राह विनतासुतः ॥
taṃ roṣātsthalamuttīrṇamasamprāptaṃ gajottamam | ubhāveva samastau tu jagrāha vinatāsutaḥ
क्रोध में विनता-पुत्र ने दोनों को एक साथ पकड़ लिया — स्थल पर आए हुए कछुए को और उस श्रेष्ठ हाथी को, जिस तक वह अभी नहीं पहुँचा था।
श्लोक 17 (13.26.17)
चरणेन तु सव्येन जग्राह स गजोत्तमम् । प्रस्पन्दमानं बलवान्दक्षिणेन तु कच्छपम् ॥
caraṇena tu savyena jagrāha sa gajottamam | praspandamānaṃ balavāndakṣiṇena tu kacchapam
उस बलवान ने बाएँ पैर से श्रेष्ठ हाथी को और दाहिने पैर से छटपटाते हुए कछुए को पकड़ा।
श्लोक 18 (13.26.18)
उत्पपात ततस्तूर्णं पन्नगेन्द्रनिषूदनः । दिवं खं च समुत्पत्य पक्षाभ्यामपराजितः ॥
utpapāta tatastūrṇaṃ pannagendraniṣūdanaḥ | divaṃ khaṃ ca samutpatya pakṣābhyāmaparājitaḥ
तब सर्पराजों का संहार करने वाला वह अपराजित पक्षी शीघ्र उड़ा और अपने दोनों पंखों से स्वर्ग तथा आकाश में ऊँचा उठ गया।
श्लोक 19 (13.26.19)
तेन चोत्पतता तूर्णं सङ्गृहीतौ नखैर्भृशम् । वज्रगर्भैः सुनिशितैः प्राणांस्तूर्णं मुमोचतुः ॥
tena cotpatatā tūrṇaṃ saṅgṛhītau nakhairbhṛśam | vajragarbhaiḥ suniśitaiḥ prāṇāṃstūrṇaṃ mumocatuḥ
उड़ते हुए उस पक्षी के वज्र जैसे कठोर तीखे नखों में कसकर पकड़े जाने से उन दोनों ने शीघ्र प्राण त्याग दिए।
श्लोक 20 (13.26.20)
तौ गृह्य बलवांस्तूर्णं स्रस्तपादशिरोधरौ । विवल्गन्निव खे क्रीडन्खेचरोऽभिजगाम ह ॥
tau gṛhya balavāṃstūrṇaṃ srastapādaśirodharau | vivalganniva khe krīḍankhecaro'bhijagāma ha
पैर और गर्दन ढीली पड़ चुके उन दोनों को पकड़े हुए वह बलवान आकाशचारी मानो आकाश में उछलता-खेलता हुआ आगे बढ़ा।
श्लोक 21 (13.26.21)
अत्तुकामस्ततो वीरः पृथिव्यां पृथिवीपते । निरैक्षत न चापश्यद्द्रुमं पर्याप्तमासितुम् ॥
attukāmastato vīraḥ pṛthivyāṃ pṛthivīpate | niraikṣata na cāpaśyaddrumaṃ paryāptamāsitum
हे पृथ्वीपति, उन्हें खाने की इच्छा से उस वीर ने पृथ्वी पर चारों ओर देखा, पर बैठने के लिए पर्याप्त बड़ा कोई वृक्ष उसे नहीं दिखा।
श्लोक 22 (13.26.22)
नैमिषं त्वथ सम्प्राप्य देवारण्यं महाद्युतिः । अपश्यत द्रुमं कञ्चिच्छाखास्कन्धसमावृतम् ॥
naimiṣaṃ tvatha samprāpya devāraṇyaṃ mahādyutiḥ | apaśyata drumaṃ kañcicchākhāskandhasamāvṛtam
तब देवारण्य नैमिष में पहुँचकर उस महातेजस्वी ने शाखाओं और तने से भरा एक वृक्ष देखा।
श्लोक 23 (13.26.23)
हिमवच्छिखरप्रख्यं योजनद्वयमुच्छ्रितम् । परिणाहेन राजेन्द्र नल्वमात्रं समन्ततः ॥
himavacchikharaprakhyaṃ yojanadvayamucchritam | pariṇāhena rājendra nalvamātraṃ samantataḥ
वह हिमालय के शिखर के समान था, दो योजन ऊँचा, और हे राजेन्द्र, चारों ओर से एक नल्व के घेरे वाला।
श्लोक 24 (13.26.24)
तस्य शाखाऽभवत्काचिदायता पञ्चयोजनम् । दृढमूला दृढस्कन्धा वज्रपत्रसमाचिता ॥
tasya śākhā'bhavatkācidāyatā pañcayojanam | dṛḍhamūlā dṛḍhaskandhā vajrapatrasamācitā
उसकी एक शाखा पाँच योजन तक फैली हुई थी, दृढ़ मूल और दृढ़ तने वाली, वज्र जैसे कठोर पत्तों से भरी।
श्लोक 25 (13.26.25)
तत्रोपविष्टः सहसा वैनतेयो निगृह्य तौ । अत्तुकामस्ततः शाखा तस्य वेगादवापतत् ॥
tatropaviṣṭaḥ sahasā vainateyo nigṛhya tau | attukāmastataḥ śākhā tasya vegādavāpatat
उन दोनों को पकड़े हुए वैनतेय वहाँ अचानक बैठ गया और उन्हें खाना चाहता था; तभी उसके वेग से वह शाखा टूटकर गिरने लगी।
श्लोक 26 (13.26.26)
तां पतन्तीमभिप्रेक्ष्य प्रेक्ष्य चर्षिगणानधः । आसीनान्वसुभिः सार्धं सत्रेण जगतीपते ॥
tāṃ patantīmabhiprekṣya prekṣya carṣigaṇānadhaḥ | āsīnānvasubhiḥ sārdhaṃ satreṇa jagatīpate
हे पृथ्वीपति, उसने उस गिरती शाखा को देखा और नीचे वसुओं के साथ सत्र में बैठे ऋषियों के समूहों को भी देखा।
श्लोक 27 (13.26.27)
वैखानसान्नाम यतीन्वालखिल्यगणानपि । तत्र भीराविशत्तस्य पतगेन्द्रस्य भारत ॥
vaikhānasānnāma yatīnvālakhilyagaṇānapi | tatra bhīrāviśattasya patagendrasya bhārata
उनमें वैखानस नाम के यति थे और वालखिल्यों के समूह भी। हे भारत, वहाँ उस पक्षिराज के मन में भय समा गया।
श्लोक 28 (13.26.28)
तान्दृष्ट्वा स यतींस्तत्र समासीनान्सुरैः सह । तुण्डेन गृह्य तां शाखामुत्पपात खगेश्वरः । तौ च पक्षी भुजङ्गाशो व्योम्नि क्रीडन्निवाव्रजत् ॥
tāndṛṣṭvā sa yatīṃstatra samāsīnānsuraiḥ saha | tuṇḍena gṛhya tāṃ śākhāmutpapāta khageśvaraḥ | tau ca pakṣī bhujaṅgāśo vyomni krīḍannivāvrajat
देवताओं के साथ बैठे उन यतियों को देखकर पक्षिराज उस शाखा को चोंच से पकड़कर उड़ गया; और सर्पों को खाने वाला वह पक्षी उन दोनों को लिए आकाश में मानो खेलता हुआ आगे बढ़ा।
श्लोक 29 (13.26.29)
तं दृष्ट्वा गुरुसम्भारं प्रगृह्योत्पतितं खगम् । ऋषयस्तेऽब्रुवन्सर्वे गरुडोऽयमिति स्म ह । न त्वन्यः क्षमते कश्चिद्यथाऽयं वीर्यवान्खगः ॥
taṃ dṛṣṭvā gurusambhāraṃ pragṛhyotpatitaṃ khagam | ṛṣayaste'bruvansarve garuḍo'yamiti sma ha | na tvanyaḥ kṣamate kaścidyathā'yaṃ vīryavānkhagaḥ
उस विशाल भार को उठाकर उड़ते पक्षी को देखकर सब ऋषियों ने कहा, "यह गरुड़ है; इस पराक्रमी पक्षी की तरह दूसरा कोई यह भार नहीं सह सकता।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 30 (13.26.30)
असौ गच्छति धर्मात्मा गुरुभारसमन्वितः । अयं क्रीडन्निवाकाशे तस्माद्गरुड एव सः ॥
asau gacchati dharmātmā gurubhārasamanvitaḥ | ayaṃ krīḍannivākāśe tasmādgaruḍa eva saḥ
"यह धर्मात्मा बहुत भारी बोझ उठाए जा रहा है, फिर भी मानो आकाश में खेल रहा है; इसलिए यह सचमुच गरुड़ ही है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 31 (13.26.31)
एवं ते समयं सर्वे वसवश्च दिवौकसः । अकार्षुः पक्षिराजस्य गरुडेत्येव नाम ह ॥
evaṃ te samayaṃ sarve vasavaśca divaukasaḥ | akārṣuḥ pakṣirājasya garuḍetyeva nāma ha
इस प्रकार उन सबने, वसुओं और स्वर्गवासियों के साथ, ठहराया कि पक्षिराज का नाम गरुड़ ही हो।
श्लोक 32 (13.26.32)
स पक्षी पृथिवीं सर्वां परिधावंस्ततस्ततः । मुमुक्षुः शाखिनः शाखां न स्म देशमपश्यत ॥
sa pakṣī pṛthivīṃ sarvāṃ paridhāvaṃstatastataḥ | mumukṣuḥ śākhinaḥ śākhāṃ na sma deśamapaśyata
वह पक्षी उस वृक्ष की शाखा को छोड़ने की इच्छा से सारी पृथ्वी पर इधर-उधर दौड़ता रहा, पर उसे कोई स्थान नहीं मिला।
श्लोक 33 (13.26.33)
स वाचमशृणोद्दिव्यामुपर्युपरि जल्पतः । देवदूतस्य विस्पष्टमाभाष्य गरुडेति च ॥
sa vācamaśṛṇoddivyāmuparyupari jalpataḥ | devadūtasya vispaṣṭamābhāṣya garuḍeti ca
उसने ऊपर से बोलती हुई एक दिव्य वाणी सुनी — किसी देवदूत की, जो स्पष्ट शब्दों में "गरुड़!" कहकर उसे पुकार रही थी।
देवदूत उवाच
श्लोक 34 (13.26.34)
वैनतेय कुविन्देषु समुद्रान्ते महाबल । पात्यतां शाखिनः शाखा न हि ते धर्मनिश्चयाः ॥
vainateya kuvindeṣu samudrānte mahābala | pātyatāṃ śākhinaḥ śākhā na hi te dharmaniścayāḥ
"हे महाबली वैनतेय, समुद्र के किनारे कुविन्दों के बीच इस वृक्ष की शाखा गिरा दो; क्योंकि वे धर्म में दृढ़ नहीं हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 35 (13.26.35)
तच्छ्रुत्वा गरुडस्तूर्णं जगाम लवणाम्भसः । उद्देशं यत्र ते मन्दाः कुविन्दाः पापकर्मिणः ॥
tacchrutvā garuḍastūrṇaṃ jagāma lavaṇāmbhasaḥ | uddeśaṃ yatra te mandāḥ kuvindāḥ pāpakarmiṇaḥ
यह सुनकर गरुड़ शीघ्र ही खारे समुद्र के उस प्रदेश में गया जहाँ वे मूर्ख और पापकर्मी कुविन्द रहते थे।
श्लोक 36 (13.26.36)
ततो गत्वा ततः शाखां मुमोच पततांवरः । तया हता जनपदास्तदा षट्त्रिंशतो नृप ॥
tato gatvā tataḥ śākhāṃ mumoca patatāṃvaraḥ | tayā hatā janapadāstadā ṣaṭtriṃśato nṛpa
वहाँ जाकर पक्षियों में श्रेष्ठ उसने शाखा छोड़ दी, और हे राजन्, उससे उस समय छत्तीस जनपद नष्ट हो गए।
श्लोक 37 (13.26.37)
स देशो राजशार्दूल ख्यातः परमदारुणः । शाखापतग इत्येव कुविन्दानां महात्मनाम् ॥
sa deśo rājaśārdūla khyātaḥ paramadāruṇaḥ | śākhāpataga ityeva kuvindānāṃ mahātmanām
हे राजशार्दूल, वह प्रदेश अत्यन्त भयंकर प्रसिद्ध हुआ और महात्मा कुविन्दों का 'शाखापतग' (जहाँ शाखा गिरी) कहलाता है।