अनुशासन पर्व · अध्याय 27
ब्रह्मा का गरुड़ को अग्नि बुझाने का उपाय बताना
गरुड़ पर्वत-शिखर पर हाथी और कछुए को खाता है, उनका रक्त पीता है और बल पाकर इन्द्र के भवन की ओर जाता है, जहाँ अमृत के चारों ओर जलती अग्नि को देखता है। उससे भयभीत होकर वह ब्रह्मा के पास जाता है, अपना उद्देश्य बताता है और अग्नि को पार करने का उपाय पूछता है। ब्रह्मा मुस्कुराकर कहते हैं कि अग्नि दूध और घी से शान्त होती है; वह उस पर मक्खन या दूध डाले और बिना जले आगे बढ़ जाए।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.27.1)
हत्वा तं पक्षिशार्दूलः कुविन्दानां जनं व्रती । उपोपविश्य शैलाग्रे भक्षयामास तावुभौ । वारणं कच्छपं चैव संहृष्टः स पतत्रिराट् ॥
hatvā taṃ pakṣiśārdūlaḥ kuvindānāṃ janaṃ vratī | upopaviśya śailāgre bhakṣayāmāsa tāvubhau | vāraṇaṃ kacchapaṃ caiva saṃhṛṣṭaḥ sa patatrirāṭ
कुविन्दों के उस समूह को मारकर व्रती पक्षिशार्दूल पर्वत-शिखर पर बैठ गया, और उस पक्षिराज ने अत्यन्त हर्ष से हाथी और कछुए, दोनों को खा लिया।
श्लोक 2 (13.27.2)
तयोः स रुधिरं पीत्वा मेदसी च परन्तप । संहृष्टः यततांश्रेष्ठो लब्ध्वा बलमनुत्तमम् । जगाम देवराजस्य भवनं पन्नगाशनः ॥
tayoḥ sa rudhiraṃ pītvā medasī ca parantapa | saṃhṛṣṭaḥ yatatāṃśreṣṭho labdhvā balamanuttamam | jagāma devarājasya bhavanaṃ pannagāśanaḥ
हे परंतप, उन दोनों का रक्त और चर्बी पीकर, हर्षित होकर, अनुपम बल पाकर वह उद्यमियों में श्रेष्ठ सर्पभक्षी देवराज इन्द्र के भवन की ओर गया।
श्लोक 3 (13.27.3)
तं प्रणम्य महात्मानं पावकं विस्फुलिङ्गिनम् । रात्रिदिवं प्रज्वलितं रक्षार्थममृतस्य ह ॥
taṃ praṇamya mahātmānaṃ pāvakaṃ visphuliṅginam | rātridivaṃ prajvalitaṃ rakṣārthamamṛtasya ha
अमृत की रक्षा के लिए रात-दिन जलती, चिंगारियाँ बिखेरती उस महात्मा अग्नि को प्रणाम करके,
श्लोक 4 (13.27.4)
तं दृष्ट्वा विहगेन्द्रस्य भयं तीव्रमुपाविशत् । न तु तोयान्न रक्षिभ्यो भयमस्योपपद्यते ॥
taṃ dṛṣṭvā vihagendrasya bhayaṃ tīvramupāviśat | na tu toyānna rakṣibhyo bhayamasyopapadyate
उसे देखकर पक्षिराज के मन में तीव्र भय समा गया; पर जल से या रक्षकों से उसे भय नहीं हुआ।
श्लोक 5 (13.27.5)
पक्षित्वमात्मनो दृष्ट्वा ज्वलन्तं च हुताशनम् । पितामहमथो गत्वा ददर्श भुजगाशनः ॥
pakṣitvamātmano dṛṣṭvā jvalantaṃ ca hutāśanam | pitāmahamatho gatvā dadarśa bhujagāśanaḥ
अपने केवल पक्षी होने का विचार करके और जलती हुई अग्नि को देखकर सर्पभक्षी पितामह ब्रह्मा के पास गया और उनके दर्शन किए।
श्लोक 6 (13.27.6)
तं प्रणम्य महात्मानं गरुडः प्रयताञ्जलिः । प्रोवाच तदसन्दिग्धं वचनं पन्नगेश्वरः ॥
taṃ praṇamya mahātmānaṃ garuḍaḥ prayatāñjaliḥ | provāca tadasandigdhaṃ vacanaṃ pannageśvaraḥ
हाथ जोड़े हुए गरुड़ ने उन महात्मा को प्रणाम किया और, सर्पों पर प्रभुत्व रखने वाले उसने, ये निस्संकोच वचन कहे।
गरुड उवाच
श्लोक 7 (13.27.7)
उद्यतं गुरुकृत्ये मां भगवन्धर्मनिश्चितम् । विमोक्षणार्थं मातुर्हि दासभावादनिन्दितम् ॥
udyataṃ gurukṛtye māṃ bhagavandharmaniścitam | vimokṣaṇārthaṃ māturhi dāsabhāvādaninditam
"भगवन्, मुझे माता के प्रति कर्तव्य में उद्यत, धर्म में दृढ़ और निर्दोष जानिए, जो अपनी माता को दासता से छुड़ाने के लिए तत्पर है।
श्लोक 8 (13.27.8)
कद्रूसकाशममृतं मयाहर्तव्यमीश्वर । तदा मे जननी देव दासभावात्प्रमोक्ष्यते ॥
kadrūsakāśamamṛtaṃ mayāhartavyamīśvara | tadā me jananī deva dāsabhāvātpramokṣyate
हे ईश्वर, मुझे कद्रू के पास अमृत पहुँचाना है; तभी, हे देव, मेरी माता दासता से मुक्त होगी।
श्लोक 9 (13.27.9)
तत्रामृतं प्रज्वलितो नित्यमीश्वर रक्षति । हिरण्यरेता भगवान्पाकशासनशासनात् ॥
tatrāmṛtaṃ prajvalito nityamīśvara rakṣati | hiraṇyaretā bhagavānpākaśāsanaśāsanāt
वहाँ हे ईश्वर, स्वर्णरेता भगवान अग्नि, पाकशासन इन्द्र की आज्ञा से, सदा जलते हुए अमृत की रक्षा करते हैं।
श्लोक 10 (13.27.10)
तत्र मे देवदेवेश भयं तीव्रमथाविशत् । ज्वलन्तं पावकं दृष्ट्वा पक्षित्वं चात्मनः प्रभो ॥
tatra me devadeveśa bhayaṃ tīvramathāviśat | jvalantaṃ pāvakaṃ dṛṣṭvā pakṣitvaṃ cātmanaḥ prabho
हे देवदेवेश, वहाँ जलती अग्नि को देखकर और अपने पक्षी होने का विचार करके, हे प्रभो, मेरे मन में तीव्र भय समा गया।
श्लोक 11 (13.27.11)
समतिक्रमितुं शक्यः कथं स्यात्पावको मया । तस्याभ्युपायं वरद वक्तुमीशोऽसि मे प्रभो ॥
samatikramituṃ śakyaḥ kathaṃ syātpāvako mayā | tasyābhyupāyaṃ varada vaktumīśo'si me prabho
मैं उस अग्नि को कैसे पार कर सकूँगा? हे वरदाता, हे प्रभो, उसका उपाय मुझे बताने में आप समर्थ हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (13.27.12)
तमब्रवीन्महाभाग तप्यमानं विहङ्गमम् । अग्नेः संशमनोपायमुत्स्मयन्स पुनःपुनः ॥
tamabravīnmahābhāga tapyamānaṃ vihaṅgamam | agneḥ saṃśamanopāyamutsmayansa punaḥpunaḥ
हे महाभाग, बार-बार मुस्कुराते हुए ब्रह्मा ने चिन्तित पक्षी को अग्नि को शान्त करने का उपाय बताया।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 13 (13.27.13)
पयसा शाम्यते वत्स सर्पिषा च हुताशनः । शरीरस्थोऽपि भूतानां किं पुनः प्रज्वलन्भुवि ॥
payasā śāmyate vatsa sarpiṣā ca hutāśanaḥ | śarīrastho'pi bhūtānāṃ kiṃ punaḥ prajvalanbhuvi
"वत्स, अग्नि दूध और घी से शान्त होती है — प्राणियों के शरीर में रहने वाली अग्नि भी; फिर पृथ्वी पर जलती अग्नि की तो बात ही क्या!
श्लोक 14 (13.27.14)
नवनीतं पयो वाऽपि पावके त्वं समादधेः । ततो गच्छ यथाकामं न त्वा धक्ष्यति पावकः ॥
navanītaṃ payo vā'pi pāvake tvaṃ samādadheḥ | tato gaccha yathākāmaṃ na tvā dhakṣyati pāvakaḥ
तुम अग्नि पर मक्खन या दूध डाल दो; फिर जहाँ चाहो जाओ। अग्नि तुम्हें नहीं जलाएगी।"