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अनुशासन पर्व · अध्याय 28

गरुड़ का अमृत-हरण और इन्द्र का वज्र

गरुड़ की कथा आगे बढ़ाते हुए भीष्म बताते हैं कि पितामह की सलाह पर गरुड़ मक्खन से अमृत की रखवाली करने वाली अग्नि को शान्त करते हैं, रक्षकों को गिराते हैं, जाल को फोड़ते हैं और अमृत ले उड़ते हैं। इन्द्र वज्र लेकर उनका पीछा करते हैं; गरुड़ वज्र का मान रखते हुए अपना एक पंख छोड़ देते हैं और ऋषि उन्हें सुपर्ण कहकर पुकारते हैं।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.28.1)

पितामहवचः श्रुत्वा गरुडः पततांवरः । जगाम गोकुलं किञ्चिन्नवनीतजिहीर्षया ॥

pitāmahavacaḥ śrutvā garuḍaḥ patatāṃvaraḥ | jagāma gokulaṃ kiñcinnavanītajihīrṣayā

पितामह की बात सुनकर पक्षियों में श्रेष्ठ गरुड़ कुछ मक्खन ले आने की इच्छा से गोकुल की ओर गए।

श्लोक 2 (13.28.2)

नवनीतं तथाऽपश्यन्मथितं कलशे स्थितम् । तदादाय ततोऽगच्छद्यतस्तद्रक्ष्यतेऽमृतम् ॥

navanītaṃ tathā'paśyanmathitaṃ kalaśe sthitam | tadādāya tato'gacchadyatastadrakṣyate'mṛtam

वहाँ उन्होंने घड़े में रखा हुआ मथा हुआ मक्खन देखा। उसे लेकर वे उस स्थान की ओर चले जहाँ अमृत की रखवाली की जा रही थी।

श्लोक 3 (13.28.3)

स तत्र गत्वा पतगस्तिर्यक्तोयं महाबलः । हुताशनमपक्रम्य नवनीतमपातयत् ॥

sa tatra gatvā patagastiryaktoyaṃ mahābalaḥ | hutāśanamapakramya navanītamapātayat

वह महाबली पक्षी वहाँ पहुँचकर जल के ऊपर तिरछा उड़ा, अग्नि से हट गया और उस पर मक्खन गिरा दिया।

श्लोक 4 (13.28.4)

सोऽर्चिष्मान्मन्दवेगोऽभूत्सर्पिषा तेन तर्पितः । धूमकेतुर्न जज्वाल धूममेव ससर्ज ह ॥

so'rciṣmānmandavego'bhūtsarpiṣā tena tarpitaḥ | dhūmaketurna jajvāla dhūmameva sasarja ha

उस घी से तृप्त होकर वह ज्वालामय अग्नि मन्द वेग वाली हो गई। धूम-केतु अग्नि जली नहीं, उसने केवल धुआँ ही छोड़ा।

श्लोक 5 (13.28.5)

तमतीत्याशु गरुडो हृष्टात्मा जातवेदसम् । रक्षांसि समतिक्रामत्पक्षवातेन पातयन् ॥

tamatītyāśu garuḍo hṛṣṭātmā jātavedasam | rakṣāṃsi samatikrāmatpakṣavātena pātayan

उस अग्नि को पार कर प्रसन्न मन वाले गरुड़ ने फिर राक्षसों को लाँघा और अपने पंखों की हवा से उन्हें गिराते चले।

श्लोक 6 (13.28.6)

ते पतन्ति शिरोभिश्च जानुभिश्चरणैस्तथा । उत्सृज्य शस्त्रावरणं पक्षिपक्षसमाहताः ॥

te patanti śirobhiśca jānubhiścaraṇaistathā | utsṛjya śastrāvaraṇaṃ pakṣipakṣasamāhatāḥ

पक्षी के पंखों की मार खाकर वे अपने शस्त्र और कवच छोड़कर सिर के बल, घुटनों के बल और पैरों के बल गिर पड़े।

श्लोक 7 (13.28.7)

उत्प्लुत्य चावृतान्नागान्हत्वा चक्रं व्यतीत्य च । अरान्तरेण शिरसा भित्त्वा जालं समाद्रवत् ॥

utplutya cāvṛtānnāgānhatvā cakraṃ vyatītya ca | arāntareṇa śirasā bhittvā jālaṃ samādravat

उछलकर उन्होंने घेरा बाँधे हुए नागों को मार डाला, चक्र को पार किया और उसके अरों के बीच से सिर से जाल को फोड़कर आगे बढ़ चले।

श्लोक 8 (13.28.8)

स भित्त्वा शिरसा जालं वज्रवेगसमो बली । उज्जहार ततः शीघ्रममृतं भुजगाशनः ॥

sa bhittvā śirasā jālaṃ vajravegasamo balī | ujjahāra tataḥ śīghramamṛtaṃ bhujagāśanaḥ

वज्र के समान वेग वाले उस बली सर्पभक्षी ने सिर से जाल को तोड़कर तुरन्त अमृत निकाल लिया।

श्लोक 9 (13.28.9)

तदादायाद्रवच्छीघ्रं गरुडः श्वसनो यथा । अथ सन्नाहमकरोद्वृत्रहा विबुधैः सह ॥

tadādāyādravacchīghraṃ garuḍaḥ śvasano yathā | atha sannāhamakarodvṛtrahā vibudhaiḥ saha

उसे लेकर गरुड़ वायु की तरह तेज़ दौड़े। तब वृत्रहन्ता इन्द्र ने देवताओं के साथ कवच धारण किया।

श्लोक 10 (13.28.10)

ततो मातलिसंयुक्तं हरिभिः स्वर्णमालिभिः । आरुरोह रथं शीघ्रं सूर्याग्निसमतेजसम् ॥

tato mātalisaṃyuktaṃ haribhiḥ svarṇamālibhiḥ | āruroha rathaṃ śīghraṃ sūryāgnisamatejasam

फिर वे मातलि से जुते हुए, सुनहरी मालाओं वाले घोड़ों के, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी रथ पर शीघ्र सवार हुए।

श्लोक 11 (13.28.11)

सोऽभ्यद्रवत्पक्षिराजं वृत्रहा पाकशासनः । उद्यम्य निशितं वज्रं वज्रहस्तो महाबलः ॥

so'bhyadravatpakṣirājaṃ vṛtrahā pākaśāsanaḥ | udyamya niśitaṃ vajraṃ vajrahasto mahābalaḥ

वज्रधारी, महाबली वृत्रहन्ता पाकशासन ने तीखा वज्र उठाकर पक्षिराज पर धावा बोला।

श्लोक 12 (13.28.12)

तथैव गरुडो राजन्वज्रहस्तं समाद्रवत् । ततो वै मातलिं प्राह शीघ्रं वाहय वाजिनः ॥

tathaiva garuḍo rājanvajrahastaṃ samādravat | tato vai mātaliṃ prāha śīghraṃ vāhaya vājinaḥ

हे राजन्, गरुड़ भी उस वज्रधारी की ओर वैसे ही झपटे। तब इन्द्र ने मातलि से कहा, "घोड़ों को शीघ्र हाँको।"

श्लोक 13 (13.28.13)

अथ दिव्यं महाघोरं गरुडाय ससर्ज ह । वज्रं सहस्रनयनस्तिग्मवेगपराक्रमः ॥

atha divyaṃ mahāghoraṃ garuḍāya sasarja ha | vajraṃ sahasranayanastigmavegaparākramaḥ

तब सहस्र नेत्रों वाले, तीखे वेग और पराक्रम वाले इन्द्र ने गरुड़ पर वह दिव्य और अत्यन्त भयंकर वज्र छोड़ा।

श्लोक 14 (13.28.14)

उत्सिसृक्षन्तमाज्ञाय वज्रं वै त्रिदशेश्वरम् । तूर्णं वेगपरो भूत्वा जगाम पततांवरः ॥

utsisṛkṣantamājñāya vajraṃ vai tridaśeśvaram | tūrṇaṃ vegaparo bhūtvā jagāma patatāṃvaraḥ

देवेश्वर को वज्र छोड़ने के लिए उद्यत जानकर पक्षियों में श्रेष्ठ गरुड़ ने और अधिक वेग पकड़ा और शीघ्र आगे निकल गए।

श्लोक 15 (13.28.15)

पितामहनिसर्गेण ज्ञात्वा लब्धवरः खगः । आयुधानां वरं वज्रमथ शक्रमुवाच ह ॥

pitāmahanisargeṇa jñātvā labdhavaraḥ khagaḥ | āyudhānāṃ varaṃ vajramatha śakramuvāca ha

पितामह के विधान से यह जानकर कि वज्र आयुधों में श्रेष्ठ है, वर पाए हुए उस पक्षी ने इन्द्र से कहा।

गरुड उवाच

श्लोक 16 (13.28.16)

वृत्रहन्नेष वज्रस्ते वरो लब्धः पितामहात् । अतः सम्मानमाकाङ्क्षन्मुञ्चाम्येकं तनूरुहम् ॥

vṛtrahanneṣa vajraste varo labdhaḥ pitāmahāt | ataḥ sammānamākāṅkṣanmuñcāmyekaṃ tanūruham

"हे वृत्रहन्ता, यह वज्र आपको पितामह से वर में मिला है। इसलिए उसका मान रखने की इच्छा से मैं अपना एक पंख छोड़ता हूँ।"

श्लोक 17 (13.28.17)

एतेनायुधराजेन यदि शक्तोऽसि वृत्रहन् । हन्यास्त्वं परया शक्त्या गच्छाम्यहमनामयः ॥

etenāyudharājena yadi śakto'si vṛtrahan | hanyāstvaṃ parayā śaktyā gacchāmyahamanāmayaḥ

हे वृत्रहन्ता, यदि आप समर्थ हों तो इस आयुधराज से अपनी पूरी शक्ति लगाकर प्रहार कीजिए; मैं निर्विघ्न चला जाऊँगा।"

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (13.28.18)

तत्तु तूर्णं तदा वज्रं स्वेन वेगेन भारत । जघान परया शक्त्या न चैनमदहद्भृशम् ॥

tattu tūrṇaṃ tadā vajraṃ svena vegena bhārata | jaghāna parayā śaktyā na cainamadahadbhṛśam

हे भारत, तब उस वज्र ने अपने वेग से पूरी शक्ति के साथ चोट की, पर उसने उन्हें अधिक नहीं जलाया।

श्लोक 19 (13.28.19)

ततो देवर्षयो राजन्गच्छन्तो वै विहायसा । दृष्ट्वा वज्रं विषक्तं तं पक्षिपर्णेऽब्रुवन्वचः ॥

tato devarṣayo rājangacchanto vai vihāyasā | dṛṣṭvā vajraṃ viṣaktaṃ taṃ pakṣiparṇe'bruvanvacaḥ

हे राजन्, तभी आकाश-मार्ग से जाते हुए देवर्षियों ने उस पक्षी के पंख में वज्र को अटका हुआ देखकर ये वचन कहे।

देवर्षय ऊचुः

श्लोक 20 (13.28.20)

सुपर्णः पक्षिगरुडो यस्य पर्णे वरायुधम् । विषक्तं देवराजस्य वृत्रहन्तुः सनातनम् ॥

suparṇaḥ pakṣigaruḍo yasya parṇe varāyudham | viṣaktaṃ devarājasya vṛtrahantuḥ sanātanam

"यह सुपर्ण, पक्षी गरुड़ है, जिसके पंख में देवराज वृत्रहन्ता का वह श्रेष्ठ और सनातन आयुध अटक गया है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 21 (13.28.21)

एवं सुपर्णो विहगो वैनतेयः प्रतापवान् । ऋषयस्तं विजानन्ति चाग्नेयं वैष्णवं पुनः ॥

evaṃ suparṇo vihago vainateyaḥ pratāpavān | ṛṣayastaṃ vijānanti cāgneyaṃ vaiṣṇavaṃ punaḥ

इस प्रकार प्रतापी सुपर्ण, विनता के पुत्र उस पक्षी को ऋषि अग्नि-सम्बन्धी और फिर विष्णु-सम्बन्धी भी जानते हैं।

श्लोक 22 (13.28.22)

वेदाभिष्टुतमत्यर्थं स्वर्गमार्गफलप्रदम् । तनुपर्णं सुपर्णस्य जगृहुर्बर्हिणस्तथा ॥

vedābhiṣṭutamatyarthaṃ svargamārgaphalapradam | tanuparṇaṃ suparṇasya jagṛhurbarhiṇastathā

वेदों में अत्यन्त स्तुत और स्वर्ग-मार्ग का फल देने वाले सुपर्ण के उस शरीर-पंख को मोरों ने भी उठा लिया।

श्लोक 23 (13.28.23)

मयूरा विस्मिताः सर्वे आद्रवन्ति स्म वज्रिणम् ॥

mayūrā vismitāḥ sarve ādravanti sma vajriṇam

सब मोर विस्मित होकर वज्रधारी की ओर दौड़ पड़े।

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