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अनुशासन पर्व · अध्याय 29

गरुड़ द्वारा माता की मुक्ति और इन्द्र को अमृत की वापसी

इन्द्र वज्र के संघर्ष से लौट जाते हैं और गरुड़ अमृत लेकर कद्रू के पास जाते हैं, जो विनता को दासीपन से मुक्त घोषित करती है। फिर गरुड़ वह अमृत इन्द्र को लौटा देते हैं; इन्द्र, देवता और ऋषि प्रसन्न होते हैं और इन्द्र मुस्कराकर कहते हैं कि शूर के पुत्र के घर में हृषीकेश जन्म लेंगे और गरुड़ भी उसमें भाग लेंगे। भीष्म सुपर्ण की कथा समाप्त करते हैं।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.29.1)

ततो वज्रं सहस्राक्षो दृष्ट्वा सक्तं वरायुधम् । ऋषींश्च दृष्ट्वा सहसा सुपर्णमिदमब्रवीत् ॥

tato vajraṃ sahasrākṣo dṛṣṭvā saktaṃ varāyudham | ṛṣīṃśca dṛṣṭvā sahasā suparṇamidamabravīt

तब सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र ने अपने श्रेष्ठ आयुध को अटका हुआ देखा और ऋषियों को भी देखा, और अचानक सुपर्ण से यह कहा।

इन्द्र उवाच

श्लोक 2 (13.29.2)

न ते सुपर्ण पश्यामि प्रभावं तेन योधये । इत्युक्ते न मया रक्षा शक्या कर्तुमतोऽन्यथा । इदं वज्रं मया सार्धं निवृत्तं हि यथागतम् ॥

na te suparṇa paśyāmi prabhāvaṃ tena yodhaye | ityukte na mayā rakṣā śakyā kartumato'nyathā | idaṃ vajraṃ mayā sārdhaṃ nivṛttaṃ hi yathāgatam

हे सुपर्ण, मुझे तुम्हारा प्रभाव दिखाई नहीं देता, इसीलिए मैं तुमसे युद्ध करता हूँ। ऐसा कहे जाने पर मैं किसी और प्रकार से रक्षा नहीं कर सकता। यह वज्र मेरे साथ जैसे आया था वैसे ही लौट गया है।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.29.3)

ततः सहस्रनयने निवृत्ते गरुडस्तथा । कद्रूमभ्यगमत्तूर्णममृतं गृह्य भारत ॥

tataḥ sahasranayane nivṛtte garuḍastathā | kadrūmabhyagamattūrṇamamṛtaṃ gṛhya bhārata

सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र के लौट जाने पर गरुड़ भी अमृत लेकर तुरन्त कद्रू के पास गए, हे भारत।

गरुड उवाच

श्लोक 4 (13.29.4)

तदाहृतं मया शीघ्रममृतं जननीकृते । अदासी सा भवत्वद्य विनता धर्मचारिणी ॥

tadāhṛtaṃ mayā śīghramamṛtaṃ jananīkṛte | adāsī sā bhavatvadya vinatā dharmacāriṇī

मैं अपनी माता के लिए वह अमृत शीघ्र ले आया हूँ। धर्म का पालन करने वाली विनता आज से दासी न रहे।

कद्रूरुवाच

श्लोक 5 (13.29.5)

स्वागतं स्वाहृतं चेदममृतं विनतात्मज । अदासी जननी तेऽद्य पुत्र कामवशा शुभा ॥

svāgataṃ svāhṛtaṃ cedamamṛtaṃ vinatātmaja | adāsī jananī te'dya putra kāmavaśā śubhā

हे विनतापुत्र, स्वागत है; यह अमृत तुमने भली-भाँति लाया है। आज तुम्हारी माता दासी नहीं रही, पुत्र; वह मंगलमयी अपनी इच्छा के वश में है।

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (13.29.6)

एवमुक्ते तदा सा च सम्प्राप्ता विनता गृहम् ॥

evamukte tadā sā ca samprāptā vinatā gṛham

ऐसा कहे जाने पर विनता भी अपने घर लौट आईं।

श्लोक 7 (13.29.7)

उपनीय यथान्यायं विहगो बलिनांवरः । स्मृत्वा निकृत्या विजयं मातुः सम्प्रतिपद्य च ॥

upanīya yathānyāyaṃ vihago balināṃvaraḥ | smṛtvā nikṛtyā vijayaṃ mātuḥ sampratipadya ca

उसे यथोचित रूप से लाकर, बलवानों में श्रेष्ठ उस पक्षी ने अपनी माता की छल से हुई हार को स्मरण कर और उसे मन में बिठाकर,

श्लोक 8 (13.29.8)

वधं च भुजगेन्द्राणां ये वालास्तस्य वाजिनः । बभूवुरसितप्रख्या निकृत्या वै जितं त्वया ॥

vadhaṃ ca bhujagendrāṇāṃ ye vālāstasya vājinaḥ | babhūvurasitaprakhyā nikṛtyā vai jitaṃ tvayā

और उन सर्पराजों के वध को भी, जो उस घोड़े के बाल बनकर उसे काला दिखाने लगे थे: "छल से तुमने जीत पाई है।"

श्लोक 9 (13.29.9)

तामुवाच ततो न्याय्यं विहगो बलिनांवरः । उज्जहारामृतं तूर्णमुत्पपात च रंहसा ॥

tāmuvāca tato nyāyyaṃ vihago balināṃvaraḥ | ujjahārāmṛtaṃ tūrṇamutpapāta ca raṃhasā

तब बलवानों में श्रेष्ठ उस पक्षी ने उससे न्यायोचित बात कही; फिर उसने तुरन्त अमृत उठा लिया और बड़े वेग से ऊपर उड़ गया।

श्लोक 10 (13.29.10)

तद्गृहीत्वाऽमृतं तूर्णं प्रयान्तमपराजितम् । कद्रूर्भुजङ्गजननी सुपर्णमिदमब्रवीत् ॥

tadgṛhītvā'mṛtaṃ tūrṇaṃ prayāntamaparājitam | kadrūrbhujaṅgajananī suparṇamidamabravīt

वह अमृत लेकर अपराजित गरुड़ तुरन्त जाने लगे, तब सर्पों की माता कद्रू ने सुपर्ण से यह कहा:

कद्रूरुवाच

श्लोक 11 (13.29.11)

किमर्थं वैनतेय त्वमाहृत्यामृतमुत्तमम् । पुनर्हरसि दुर्बुद्धे मा जातु वृजिनं कृथाः ॥

kimarthaṃ vainateya tvamāhṛtyāmṛtamuttamam | punarharasi durbuddhe mā jātu vṛjinaṃ kṛthāḥ

हे विनतापुत्र, उत्तम अमृत लाकर तुम उसे फिर क्यों ले जा रहे हो, दुर्बुद्धि? कभी ऐसा अनुचित कर्म मत करो!

सुपर्ण उवाच

श्लोक 12 (13.29.12)

अमृताहरणं मेऽद्य यत्कृतं जननीकृते । भवत्या वचनादेतदाहरामृतमित्युत ॥

amṛtāharaṇaṃ me'dya yatkṛtaṃ jananīkṛte | bhavatyā vacanādetadāharāmṛtamityuta

माता के लिए आज मैंने जो अमृत का हरण किया, वह आपके कहने से ही किया था कि "अमृत ले आओ।"

श्लोक 13 (13.29.13)

आहृतं तदिदं शीघ्रं मुक्ता च जननी मम । हराम्येष पुनस्तत्र यत एतन्मयाऽऽहृतम् ॥

āhṛtaṃ tadidaṃ śīghraṃ muktā ca jananī mama | harāmyeṣa punastatra yata etanmayā''hṛtam

वह शीघ्र ले आया गया और मेरी माता मुक्त हो गई। अब मैं इसे वहीं फिर ले जाता हूँ जहाँ से मैं इसे लाया था।

श्लोक 14 (13.29.14)

यदि मां भवती ब्रूयादमृतं मे च दीयताम् । तथा कुर्यां न वा कुर्यां न हि त्वममृतक्षमा । मया धर्मेण सत्येन विनता च समुद्धृता ॥

yadi māṃ bhavatī brūyādamṛtaṃ me ca dīyatām | tathā kuryāṃ na vā kuryāṃ na hi tvamamṛtakṣamā | mayā dharmeṇa satyena vinatā ca samuddhṛtā

यदि आप मुझसे कहें कि "अमृत मुझे दे दो," तो मैं वैसा करूँ भी और न भी करूँ; क्योंकि आप अमृत के योग्य नहीं हैं। धर्म और सत्य से मैंने विनता का उद्धार किया है।

भीष्म उवाच

श्लोक 15 (13.29.15)

ततो गत्वाऽथ गरुडः पुरन्दरमुवाच ह । इदं मया वृत्रहन्तर्हृतं तेऽमृतमुत्तमम् । मात्रर्थे हि तथैवेदं गृहाणामृतमाहृतम् ॥

tato gatvā'tha garuḍaḥ purandaramuvāca ha | idaṃ mayā vṛtrahantarhṛtaṃ te'mṛtamuttamam | mātrarthe hi tathaivedaṃ gṛhāṇāmṛtamāhṛtam

तब गरुड़ जाकर पुरन्दर से बोले: "हे वृत्रहन्ता, आपका यह उत्तम अमृत मैं ले गया था। माता के लिए ही इसे लाया गया था; लाया हुआ यह अमृत आप वापस ले लीजिए।

गरुड उवाच

श्लोक 16 (13.29.16)

माता च मम देवेश दासीत्वमुपजग्मुषी । भुजङ्गमानां मातुर्वै सा मुक्ताऽमृतदर्शनात् ॥

mātā ca mama deveśa dāsītvamupajagmuṣī | bhujaṅgamānāṃ māturvai sā muktā'mṛtadarśanāt

हे देवेश, मेरी माता सर्पों की माता की दासी हो गई थी; अमृत को देखते ही वह मुक्त हो गई।"

भीष्म उवाच

श्लोक 17 (13.29.17)

एतच्छ्रुत्वा सहस्राक्षः सुपर्णमनुमन्यते । उवाच च मुदा युक्तो दिष्ट्यादिष्ट्येति वासवः ॥

etacchrutvā sahasrākṣaḥ suparṇamanumanyate | uvāca ca mudā yukto diṣṭyādiṣṭyeti vāsavaḥ

यह सुनकर सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र ने सुपर्ण की बात का अनुमोदन किया और आनन्द से भरकर वासव बोले, "भाग्य से, भाग्य से!"

श्लोक 18 (13.29.18)

ऋषयो ये सहस्राक्षमुपासन्ति सुरैः सह । ते सर्वे च मुदा युक्ता विश्वेदेवास्तथैव च ॥

ṛṣayo ye sahasrākṣamupāsanti suraiḥ saha | te sarve ca mudā yuktā viśvedevāstathaiva ca

देवताओं के साथ सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र की उपासना करने वाले जो ऋषि हैं, वे सब और विश्वेदेव भी आनन्द से भर उठे।

श्लोक 19 (13.29.19)

ततस्तमृषयः सर्वे देवाश्च भरतर्षभ । ऊचुः पुरन्दरं हृष्टा गरुडो लभतां वरम् ॥

tatastamṛṣayaḥ sarve devāśca bharatarṣabha | ūcuḥ purandaraṃ hṛṣṭā garuḍo labhatāṃ varam

तब हे भरतश्रेष्ठ, सब ऋषि और देवता प्रसन्न होकर पुरन्दर से बोले, "गरुड़ को वर मिले।"

श्लोक 20 (13.29.20)

ततः शचीपतिर्वाक्यमुवाच प्रहसन्निव । जनिष्यति हृषीकेशः स्वयमेवैष पक्षिराट् ॥

tataḥ śacīpatirvākyamuvāca prahasanniva | janiṣyati hṛṣīkeśaḥ svayamevaiṣa pakṣirāṭ

तब शचीपति ने मानो मुस्कराते हुए कहा, "हृषीकेश स्वयं जन्म लेंगे, और यह पक्षिराज भी स्वयं उनके साथ।

इन्द्र उवाच

श्लोक 21 (13.29.21)

केशवः पुण्डरीकाक्षः शूरपुत्रस्य वेश्मनि । स्वयं धर्मस्य रक्षार्थं विभज्य भुजगाशनः ॥

keśavaḥ puṇḍarīkākṣaḥ śūraputrasya veśmani | svayaṃ dharmasya rakṣārthaṃ vibhajya bhujagāśanaḥ

कमलनयन केशव शूर के पुत्र के घर में, धर्म की रक्षा के लिए स्वयं जन्म लेंगे; और सर्पभक्षी गरुड़ भी अपना अंश बाँटकर।"

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (13.29.22)

एष ते पाण्डवश्रेष्ठ गरुडोऽथ पतत्रिराट् । सुपर्णो वैनतेयश्च कीर्तितो भद्रमस्तु ते ॥

eṣa te pāṇḍavaśreṣṭha garuḍo'tha patatrirāṭ | suparṇo vainateyaśca kīrtito bhadramastu te

हे पाण्डवश्रेष्ठ, यह पक्षिराज गरुड़ हैं, जिन्हें सुपर्ण और वैनतेय भी कहा जाता है। आपका कल्याण हो।

श्लोक 23 (13.29.23)

तदेतद्भरतश्रेष्ठ मयाऽऽख्यानं प्रकीर्तितम् । सुपर्णस्य महाबाहो किं भूयः कथयामि ते ॥

tadetadbharataśreṣṭha mayā''khyānaṃ prakīrtitam | suparṇasya mahābāho kiṃ bhūyaḥ kathayāmi te

हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार मैंने सुपर्ण की यह कथा कह सुनाई। हे महाबाहु, अब और क्या सुनाऊँ?

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30