अनुशासन पर्व · अध्याय 30
सियार और वानर: ब्राह्मण को दी गई प्रतिज्ञा
युधिष्ठिर पूछते हैं कि जो लोग ब्राह्मणों को देने की प्रतिज्ञा करके नहीं देते उनका क्या होता है। भीष्म बताते हैं कि ऐसे मनुष्य का सारा पुण्य नष्ट हो जाता है, और सियार तथा वानर का प्राचीन संवाद सुनाते हैं, जो पहले मनुष्य रूप में मित्र थे और अपने वर्तमान जन्मों का कारण एक अधूरी प्रतिज्ञा और ब्राह्मण के धन का हरण बताते हैं। वे उपदेश देते हैं कि ब्राह्मणों से की गई प्रतिज्ञा निभाई जाए, उनका धन कभी न लिया जाए, और ब्राह्मण को दिया दान स्वर्ग दिलाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.30.1)
ब्राह्मणानां तु ये लोके प्रतिश्रुत्य पितामह । न प्रयच्छन्ति लोभात्ते के भवन्ति महामते ॥
brāhmaṇānāṃ tu ye loke pratiśrutya pitāmaha | na prayacchanti lobhātte ke bhavanti mahāmate
हे पितामह, जो लोग संसार में ब्राह्मणों को देने की प्रतिज्ञा करके भी लोभ से नहीं देते, हे महामति, उनकी क्या गति होती है?
श्लोक 2 (13.30.2)
एतन्मे तत्वतो ब्रूहि धर्मे धर्मभृतांवर । प्रतिश्रुत्य दुरात्मानो न प्रयच्छन्ति ये नराः ॥
etanme tatvato brūhi dharme dharmabhṛtāṃvara | pratiśrutya durātmāno na prayacchanti ye narāḥ
हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, यह मुझे धर्म की दृष्टि से ठीक-ठीक बताइए, कि जो दुष्ट मनुष्य प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, उनका क्या होता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.30.3)
यो न दद्यात्प्रतिश्रुत्य स्वल्पं वा यदि वा बहु । आशास्तस्य हताः सर्वाः क्लीबस्येव प्रजाफलम् ॥
yo na dadyātpratiśrutya svalpaṃ vā yadi vā bahu | āśāstasya hatāḥ sarvāḥ klībasyeva prajāphalam
जो मनुष्य थोड़ा या बहुत देने की प्रतिज्ञा करके नहीं देता, उसकी सारी आशाएँ नष्ट हो जाती हैं, जैसे नपुंसक की सन्तान-फल की आशा।
श्लोक 4 (13.30.4)
यां रात्रिं जायते पापो यां च रात्रिं विनश्यति । एतस्मिन्नन्तरे यद्यत्सुकृतं तस्य भारत ॥
yāṃ rātriṃ jāyate pāpo yāṃ ca rātriṃ vinaśyati | etasminnantare yadyatsukṛtaṃ tasya bhārata
हे भारत, जिस रात पापी जन्म लेता है और जिस रात मरता है, इन दोनों के बीच उसने जो-जो पुण्य किया हो,
श्लोक 5 (13.30.5)
यच्च तस्य हुतं किञ्चिद्दत्तं वा भरतर्षभ । तपस्तप्तमथो वाऽपि सर्वं तस्योपहन्यते ॥
yacca tasya hutaṃ kiñciddattaṃ vā bharatarṣabha | tapastaptamatho vā'pi sarvaṃ tasyopahanyate
हे भरतश्रेष्ठ, जो कुछ उसने हवन किया हो, दान दिया हो या तप किया हो, वह सब नष्ट हो जाता है।
श्लोक 6 (13.30.6)
अथैतद्वचनं प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जनाः । निशाम्य भरतश्रेष्ठ बुद्ध्या परमयुक्तया ॥
athaitadvacanaṃ prāhurdharmaśāstravido janāḥ | niśāmya bharataśreṣṭha buddhyā paramayuktayā
हे भरतश्रेष्ठ, धर्मशास्त्र के जानने वाले लोग उत्तम और युक्त बुद्धि से विचार करके यह बात कहते हैं।
श्लोक 7 (13.30.7)
अपि चोदाहरन्तीमं धर्मशास्त्रविदो जनाः । अश्वानां श्यामकर्णानां सहस्रेण स मुच्यते ॥
api codāharantīmaṃ dharmaśāstravido janāḥ | aśvānāṃ śyāmakarṇānāṃ sahasreṇa sa mucyate
धर्मशास्त्र के जानने वाले लोग यह भी कहते हैं कि श्याम कानों वाले एक हज़ार घोड़ों के दान से वह छूटता है।
श्लोक 8 (13.30.8)
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सृगालस्य च संवादं वानरस्य च भारत ॥
atraivodāharantīmamitihāsaṃ purātanam | sṛgālasya ca saṃvādaṃ vānarasya ca bhārata
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, हे भारत, एक सियार और एक वानर का संवाद।
श्लोक 9 (13.30.9)
तौ सखायौ पुरा ह्यास्तां मानुषत्वे परंतप । अन्यां योनिं समापन्नौ सृगालीं वानरीं तथा । सम्भाषणात्ततः सख्यं तत्रतत्र परस्परम् ॥
tau sakhāyau purā hyāstāṃ mānuṣatve paraṃtapa | anyāṃ yoniṃ samāpannau sṛgālīṃ vānarīṃ tathā | sambhāṣaṇāttataḥ sakhyaṃ tatratatra parasparam
हे परंतप, वे दोनों पहले मनुष्य जन्म में मित्र थे। फिर दूसरी योनियों में जाकर एक सियार हुआ और दूसरा वानर; और बातचीत करते हुए वहाँ-वहाँ उनकी मित्रता बनी रही।
श्लोक 10 (13.30.10)
ततः परासून्खादन्तं सृगालं वानरोऽब्रवीत् । श्मशानमध्ये सम्प्रेक्ष्य पूर्वजातिमनुस्मरन् ॥
tataḥ parāsūnkhādantaṃ sṛgālaṃ vānaro'bravīt | śmaśānamadhye samprekṣya pūrvajātimanusmaran
तब श्मशान के बीच मुर्दों को खाते हुए सियार को देखकर, अपने पूर्व जन्म को स्मरण करते हुए वानर ने उससे कहा।
वानर उवाच
श्लोक 11 (13.30.11)
किं त्वया पापकं पूर्वं कृतं कर्म सुदारुणम् । यस्त्वं श्मशाने मृतकान्पूतिकानत्सि कुत्सितान् ॥
kiṃ tvayā pāpakaṃ pūrvaṃ kṛtaṃ karma sudāruṇam | yastvaṃ śmaśāne mṛtakānpūtikānatsi kutsitān
"तुमने पहले कौन-सा अत्यन्त भयंकर पाप-कर्म किया था, कि तुम श्मशान में सड़े हुए, घृणित शवों को खाते हो?"
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (13.30.12)
एवमुक्तः प्रत्युवाच सृगालो वानरं तदा । ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य न मया तदुपाहृतम् ॥
evamuktaḥ pratyuvāca sṛgālo vānaraṃ tadā | brāhmaṇasya pratiśrutya na mayā tadupāhṛtam
ऐसा कहे जाने पर सियार ने वानर को उत्तर दिया, "मैंने एक ब्राह्मण को देने की प्रतिज्ञा की थी, पर उसे वह वस्तु नहीं दी।
सृगाल उवाच
श्लोक 13 (13.30.13)
तत्कृते पापिकां योनिमापन्नोस्मि प्लवङ्गम । तस्मादेवंविधं भक्ष्यं भक्षयामि बुभुक्षितः ॥
tatkṛte pāpikāṃ yonimāpannosmi plavaṅgama | tasmādevaṃvidhaṃ bhakṣyaṃ bhakṣayāmi bubhukṣitaḥ
हे वानर, उसी के कारण मैं इस पापमय योनि में आ पड़ा हूँ; इसीलिए भूखा होकर मैं ऐसा भोजन खाता हूँ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 14 (13.30.14)
सृगालो वानरं प्राह पुनरेव नरोत्तम । किं त्वया पातकं कर्म कृतं येनासि वानरः ॥
sṛgālo vānaraṃ prāha punareva narottama | kiṃ tvayā pātakaṃ karma kṛtaṃ yenāsi vānaraḥ
हे नरश्रेष्ठ, सियार ने फिर वानर से कहा, "तुमने कौन-सा पाप-कर्म किया था जिससे तुम वानर बने?"
वानर उवाच
श्लोक 15 (13.30.15)
स चाप्याह फलाहारो ब्राह्मणानां प्लवङ्गमः । तस्मान्न ब्राह्मणस्वं तु हर्त्तव्यं विदुषा सदा । सीमाविवादे मोक्तव्यं दातव्यं च प्रतिश्रुतम् ॥
sa cāpyāha phalāhāro brāhmaṇānāṃ plavaṅgamaḥ | tasmānna brāhmaṇasvaṃ tu harttavyaṃ viduṣā sadā | sīmāvivāde moktavyaṃ dātavyaṃ ca pratiśrutam
उस फल खाने वाले वानर ने भी उत्तर दिया: "इसलिए विद्वान को ब्राह्मण का धन कभी नहीं लेना चाहिए; सीमा के विवाद में भी छोड़ देना चाहिए, और जो देने की प्रतिज्ञा की हो वह देना चाहिए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 16 (13.30.16)
इत्येतद्ब्रुवतो राजन्ब्राह्मणस्य मया श्रुतम् । कथां कथयतः पुण्यां धर्मज्ञस्य पुरातनीम् ॥
ityetadbruvato rājanbrāhmaṇasya mayā śrutam | kathāṃ kathayataḥ puṇyāṃ dharmajñasya purātanīm
हे राजन्, यह कथा मैंने एक ब्राह्मण के मुख से सुनी थी, जो धर्म का जानने वाला था और यह पवित्र प्राचीन कथा सुना रहा था।
श्लोक 17 (13.30.17)
श्रुतं चापि मया भूयः कृष्णस्यापि विशांपते । कथां कथयतः पूर्वं ब्राह्मणं प्रति पाण्डव ॥
śrutaṃ cāpi mayā bhūyaḥ kṛṣṇasyāpi viśāṃpate | kathāṃ kathayataḥ pūrvaṃ brāhmaṇaṃ prati pāṇḍava
हे राजन्, मैंने कृष्ण के मुख से भी, एक ब्राह्मण के प्रति पहले कही जाती हुई कथा सुनी है, हे पाण्डव।
श्लोक 18 (13.30.18)
न हर्तव्यं विप्रधनं क्षन्तव्यं तेषु नित्यशः । बालाश्च नावमन्तव्या दरिद्राः कृपणा अपि ॥
na hartavyaṃ vipradhanaṃ kṣantavyaṃ teṣu nityaśaḥ | bālāśca nāvamantavyā daridrāḥ kṛpaṇā api
ब्राह्मणों का धन नहीं लेना चाहिए, उनके प्रति सदा क्षमा रखनी चाहिए; बालकों का, और दरिद्र तथा दीन लोगों का भी अपमान नहीं करना चाहिए।
श्लोक 19 (13.30.19)
एवमेव च मां नित्यं ब्राह्मणाः संदिशन्ति वै । प्रतिश्रुतं भवेद्देयं नाशा कार्या द्विजोत्तमे ॥
evameva ca māṃ nityaṃ brāhmaṇāḥ saṃdiśanti vai | pratiśrutaṃ bhaveddeyaṃ nāśā kāryā dvijottame
ब्राह्मण मुझे भी सदा यही उपदेश देते हैं: जो प्रतिज्ञा की हो वह देनी चाहिए; श्रेष्ठ द्विज की आशा को व्यर्थ नहीं करना चाहिए।
श्लोक 20 (13.30.20)
ब्राह्मणो ह्याशया पूर्वं कृतया पृथिवीपते । सुसमिद्धो यथा दीप्तः पावकस्तद्विधः स्मृतः ॥
brāhmaṇo hyāśayā pūrvaṃ kṛtayā pṛthivīpate | susamiddho yathā dīptaḥ pāvakastadvidhaḥ smṛtaḥ
हे पृथ्वीपति, जब किसी ब्राह्मण के मन में पहले से आशा जगाई गई हो, तो वह भली-भाँति प्रज्वलित, दीप्त अग्नि के समान माना गया है।
श्लोक 21 (13.30.21)
यं निरीक्षेत सङ्क्रुद्ध आशया पूर्वजातया । प्रदहेच्च हितं राजन्कक्षमक्षय्यभुग्यथा ॥
yaṃ nirīkṣeta saṅkruddha āśayā pūrvajātayā | pradahecca hitaṃ rājankakṣamakṣayyabhugyathā
पहले जगी हुई आशा के कारण क्रुद्ध होकर वह जिसे देख ले, हे राजन्, वह उसके कल्याण को उसी प्रकार भस्म कर देता है जैसे अग्नि सूखी घास को।
श्लोक 22 (13.30.22)
स एव हि यदा तुष्टो वचसा प्रतिनन्दति । भवत्यगदसंकाशो विषये तस्य भारत ॥
sa eva hi yadā tuṣṭo vacasā pratinandati | bhavatyagadasaṃkāśo viṣaye tasya bhārata
वही जब प्रसन्न होकर वचन से अभिनन्दन करता है, हे भारत, तब वह उस मनुष्य के राज्य में औषध के समान हितकारी हो जाता है।
श्लोक 23 (13.30.23)
पुत्रान्पौत्रान्पशूंश्चैव बान्धवान्सचिवांस्तथा । पुरं जनपदं चैव शान्तिरिष्टेन पोषयेत् ॥
putrānpautrānpaśūṃścaiva bāndhavānsacivāṃstathā | puraṃ janapadaṃ caiva śāntiriṣṭena poṣayet
पुत्रों, पौत्रों, पशुओं, बन्धुओं और मन्त्रियों को, तथा नगर और जनपद को भी वह शान्ति और कल्याण से पुष्ट करता है।
श्लोक 24 (13.30.24)
एतद्धि परमं तेजो ब्राह्मणस्येह दृश्यते । सहस्रकिरणस्येव सवितुर्धरणीतले ॥
etaddhi paramaṃ tejo brāhmaṇasyeha dṛśyate | sahasrakiraṇasyeva saviturdharaṇītale
यही ब्राह्मण का परम तेज यहाँ दिखाई देता है, जैसे पृथ्वी पर सहस्र किरणों वाले सूर्य का।
श्लोक 25 (13.30.25)
तस्माद्दातव्यमेवेह प्रतिश्रुत्य युधिष्ठिर । यदीच्छेच्छोभनां जातिं प्राप्तुं भरतसत्तम ॥
tasmāddātavyameveha pratiśrutya yudhiṣṭhira | yadīcchecchobhanāṃ jātiṃ prāptuṃ bharatasattama
इसलिए, हे युधिष्ठिर, हे भरतश्रेष्ठ, यदि कोई अच्छा जन्म पाना चाहता है तो जो देने की प्रतिज्ञा की हो वह यहाँ अवश्य देना चाहिए।
श्लोक 26 (13.30.26)
ब्राह्मणस्य हि दत्तेन ध्रुवं स्वर्गो ह्यनुत्तमः । शक्यः प्राप्तुं विशेषेण दानं हि महती क्रिया ॥
brāhmaṇasya hi dattena dhruvaṃ svargo hyanuttamaḥ | śakyaḥ prāptuṃ viśeṣeṇa dānaṃ hi mahatī kriyā
ब्राह्मण को दिए हुए दान से निश्चय ही सर्वोत्तम स्वर्ग पाया जा सकता है, विशेषकर; क्योंकि दान एक महान कर्म है।
श्लोक 27 (13.30.27)
इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा । तस्माद्दानानि देयानि ब्राह्मणेभ्यो विजानता ॥
ito dattena jīvanti devatāḥ pitarastathā | tasmāddānāni deyāni brāhmaṇebhyo vijānatā
यहाँ से दिए हुए दान से देवता और पितर जीते हैं; इसलिए समझदार मनुष्य को ब्राह्मणों को दान देना चाहिए।
श्लोक 28 (13.30.28)
महद्धि भरतश्रेष्ठ ब्राह्मणस्तीर्थमुच्यते । वेलायां न तु कस्यां चिद्गच्छेद्विप्रो ह्यपूजितः ॥
mahaddhi bharataśreṣṭha brāhmaṇastīrthamucyate | velāyāṃ na tu kasyāṃ cidgacchedvipro hyapūjitaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, ब्राह्मण को महान तीर्थ कहा जाता है; कोई ब्राह्मण किसी भी समय बिना सत्कार पाए न लौटे।