अनुशासन पर्व · अध्याय 31
शूद्र तपस्वी और हँसने वाला राजा
युधिष्ठिर पूछते हैं कि मित्रता से नीच जन्म वाले को उपदेश देने वाला दोषी होता है या नहीं। भीष्म हिमालय के एक आश्रम के पास तप करने वाले शूद्र की कथा सुनाते हैं, जिसे एक अतिथि ऋषि ने पितृकार्य की विधि बताई थी; अगले जन्म में वह शूद्र राजा और ऋषि उसका पुरोहित होता है, और राजा पुराने उपदेश के कारण उस पर हँसता है। पुरोहित दान देकर शुद्ध होता है, और भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि ब्राह्मण को नीच वर्ण वालों को उपदेश नहीं देना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.31.1)
मित्रसौहार्दयोगेन उपदेशं करोति यः । जात्याऽधरस्य राजर्षे दोषस्तस्य भवेन्न वा ॥
mitrasauhārdayogena upadeśaṃ karoti yaḥ | jātyā'dharasya rājarṣe doṣastasya bhavenna vā
हे राजर्षि, जो मनुष्य मित्रता और सद्भाव से प्रेरित होकर जन्म से नीच वर्ण के किसी व्यक्ति को उपदेश देता है, उसे दोष लगता है या नहीं?
श्लोक 2 (13.31.2)
एतदिच्छामि तत्त्वेन व्याख्यातुं वै पितामह । सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य यत्र मुह्यन्ति मानवाः ॥
etadicchāmi tattvena vyākhyātuṃ vai pitāmaha | sūkṣmā gatirhi dharmasya yatra muhyanti mānavāḥ
हे पितामह, मैं इसे ठीक-ठीक समझना चाहता हूँ; क्योंकि धर्म की गति सूक्ष्म है और उसमें मनुष्य भ्रम में पड़ जाते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.31.3)
अत्र ते वर्तयिष्यामि शृणु राजन्यथाक्रमम् । मदुक्तं वचनं राजन्यथान्यायं यथागमम् । ऋषीणां वदतां पूर्वं श्रुतमासीद्यथा पुरा ॥
atra te vartayiṣyāmi śṛṇu rājanyathākramam | maduktaṃ vacanaṃ rājanyathānyāyaṃ yathāgamam | ṛṣīṇāṃ vadatāṃ pūrvaṃ śrutamāsīdyathā purā
हे राजन्, इस विषय में मैं तुम्हें क्रम से बताता हूँ, सुनो। प्राचीन काल में ऋषियों के बोलते समय जो सुना गया था, वही मैं कहूँगा। हे राजन्, मेरा यह कथन न्याय और परम्परा के अनुकूल है।
श्लोक 4 (13.31.4)
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कस्य चित् । उपदेशे महान्दोष उपाध्यायस्य भाष्यते ॥
upadeśo na kartavyo jātihīnasya kasya cit | upadeśe mahāndoṣa upādhyāyasya bhāṣyate
जन्म से हीन किसी भी व्यक्ति को उपदेश नहीं देना चाहिए; ऐसा उपदेश देने पर उपदेशक को बड़ा दोष लगता है, यह कहा गया है।
श्लोक 5 (13.31.5)
नाध्यापयेच्छूद्रमिह तथा नैव च याजयेत् । निदर्शनमिदं राजञ्शृणु मे भरतर्षभ ॥
nādhyāpayecchūdramiha tathā naiva ca yājayet | nidarśanamidaṃ rājañśṛṇu me bharatarṣabha
यहाँ शूद्र को न पढ़ाना चाहिए और न उसके लिए यज्ञ कराना चाहिए। हे भरतश्रेष्ठ, इसका एक दृष्टान्त मुझसे सुनो।
श्लोक 6 (13.31.6)
दुरुक्तवचने राजन्यथापूर्वं युधिष्ठिर । ब्रह्माश्रमपदे वृत्तं पार्श्वे हिमवतः शुभे ॥
duruktavacane rājanyathāpūrvaṃ yudhiṣṭhira | brahmāśramapade vṛttaṃ pārśve himavataḥ śubhe
हे युधिष्ठिर, अनुचित उपदेश के विषय में पूर्वकाल में जो घटना हुई थी, वह हिमालय के एक सुन्दर पार्श्व में स्थित ब्रह्माश्रम में घटी थी।
श्लोक 7 (13.31.7)
तत्राश्रमपदं पुण्यं नानावृक्षगणायुतम् । नानागुल्मलताकीर्णं मृगद्विजनिषेवितम् । सिद्धचारणसंघुष्टं रम्यं पुष्पितकाननम् ॥
tatrāśramapadaṃ puṇyaṃ nānāvṛkṣagaṇāyutam | nānāgulmalatākīrṇaṃ mṛgadvijaniṣevitam | siddhacāraṇasaṃghuṣṭaṃ ramyaṃ puṣpitakānanam
वहाँ एक पवित्र आश्रम था, जो अनेक प्रकार के वृक्षसमूहों से घिरा था, नाना झाड़ियों और लताओं से भरा था, मृगों और पक्षियों का निवास था, सिद्धों और चारणों के घोष से गूँजता था, रमणीय था और जिसके वन फूलों से खिले थे।
श्लोक 8 (13.31.8)
व्रतिभिर्बहुभिः कीर्णं तापसैरुपशोभितम् । ब्राह्मणैश्च महाभागैः सूर्यज्वलनसन्निभैः ॥
vratibhirbahubhiḥ kīrṇaṃ tāpasairupaśobhitam | brāhmaṇaiśca mahābhāgaiḥ sūryajvalanasannibhaiḥ
वह आश्रम अनेक व्रतधारियों से भरा था, तपस्वियों से शोभित था, और सूर्य तथा अग्नि के समान तेजस्वी महाभाग ब्राह्मणों से युक्त था।
श्लोक 9 (13.31.9)
नियमव्रतसम्पन्नैः समाकीर्णं तपस्विभिः । दीक्षितैर्भरतश्रेष्ठ यताहारैः कृतात्मभिः ॥
niyamavratasampannaiḥ samākīrṇaṃ tapasvibhiḥ | dīkṣitairbharataśreṣṭha yatāhāraiḥ kṛtātmabhiḥ
वह नियम और व्रत से सम्पन्न तपस्वियों से भरा था। हे भरतश्रेष्ठ, वे दीक्षित, परिमित आहार करने वाले और आत्मसंयमी थे।
श्लोक 10 (13.31.10)
वेदाध्ययनघोषैश्च नादितं भरतर्षभ । वालखिल्यैश्च बहुभिर्यतिभिश्च निषेवितम् ॥
vedādhyayanaghoṣaiśca nāditaṃ bharatarṣabha | vālakhilyaiśca bahubhiryatibhiśca niṣevitam
हे भरतश्रेष्ठ, वह आश्रम वेदाध्ययन की ध्वनि से गूँजता था और अनेक वालखिल्यों तथा यतियों से सेवित था।
श्लोक 11 (13.31.11)
तत्र कश्चित्समुत्साहं कृत्वा शूद्रो दयान्वितः । आगतो ह्याश्रमपदं पूजितश्च तपस्विभिः ॥
tatra kaścitsamutsāhaṃ kṛtvā śūdro dayānvitaḥ | āgato hyāśramapadaṃ pūjitaśca tapasvibhiḥ
वहाँ एक दयालु शूद्र दृढ़ संकल्प करके उस आश्रम में आया और तपस्वियों ने उसका सत्कार किया।
श्लोक 12 (13.31.12)
तांस्तु दृष्ट्वा मुनिगणान्देवकल्पान्महौजसः । विविधां वहतो दीक्षां सम्प्राहृष्यत भारत ॥
tāṃstu dṛṣṭvā munigaṇāndevakalpānmahaujasaḥ | vividhāṃ vahato dīkṣāṃ samprāhṛṣyata bhārata
देवताओं के समान महातेजस्वी उन मुनिसमूहों को नाना प्रकार की दीक्षा धारण किए देखकर, हे भारत, वह बहुत हर्षित हुआ।
श्लोक 13 (13.31.13)
अथास्य बुद्धिरभवत्तापस्ये भरतर्षभ । ततोऽब्रवीत्कुलपतिं पादौ सङ्गृह्य भारत ॥
athāsya buddhirabhavattāpasye bharatarṣabha | tato'bravītkulapatiṃ pādau saṅgṛhya bhārata
तब, हे भरतश्रेष्ठ, उसके मन में तपस्या की इच्छा जागी, और हे भारत, उसने कुलपति के चरण पकड़कर कहा।
शूद्र उवाच
श्लोक 14 (13.31.14)
भवत्प्रसादादिच्छामि धर्मं चर्तुं द्विजर्षभ । तस्मादभिगतं त्वं मां प्रव्राजयितुमर्हसि ॥
bhavatprasādādicchāmi dharmaṃ cartuṃ dvijarṣabha | tasmādabhigataṃ tvaṃ māṃ pravrājayitumarhasi
हे द्विजश्रेष्ठ, आपकी कृपा से मैं धर्म का आचरण करना चाहता हूँ। मैं आपकी शरण में आया हूँ, इसलिए आप मुझे प्रव्रज्या दीजिए।
श्लोक 15 (13.31.15)
वर्णावरोऽहं भगवञ्शूद्रो जात्याऽस्मि सत्तम । शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय प्रसीद मे ॥
varṇāvaro'haṃ bhagavañśūdro jātyā'smi sattama | śuśrūṣāṃ kartumicchāmi prapannāya prasīda me
हे भगवन्, मैं नीच वर्ण का हूँ, जन्म से शूद्र हूँ, हे सत्तम। मैं सेवा करना चाहता हूँ; मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझ पर कृपा कीजिए।
कुलपतिरुवाच
श्लोक 16 (13.31.16)
न शक्यमिह शूद्रेण लिङ्गमाश्रित्य वर्तितुम् । आस्यतां यदि ते बुद्धिः शुश्रूषानिरतो भव ॥
na śakyamiha śūdreṇa liṅgamāśritya vartitum | āsyatāṃ yadi te buddhiḥ śuśrūṣānirato bhava
शूद्र संन्यासी का चिह्न धारण करके यहाँ नहीं रह सकता। यदि तुम्हारी इच्छा हो तो यहीं रहो और सेवा में लगे रहो।
श्लोक 17 (13.31.17)
शुश्रूषया पराँल्लोकानवाप्स्यसि न संशयः ॥
śuśrūṣayā parām̐llokānavāpsyasi na saṃśayaḥ
सेवा से तुम उत्तम लोकों को प्राप्त करोगे, इसमें संशय नहीं।
भीष्म उवाच
श्लोक 18 (13.31.18)
एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोऽचिन्तयन्नृप । कथमत्र मया कार्यं श्रद्धा धर्मपरा च मे ॥
evamuktastu muninā sa śūdro'cintayannṛpa | kathamatra mayā kāryaṃ śraddhā dharmaparā ca me
मुनि के ऐसा कहने पर, हे राजन्, उस शूद्र ने सोचा: "अब मुझे यहाँ क्या करना चाहिए? मेरी श्रद्धा तो धर्म में ही लगी है।"
श्लोक 19 (13.31.19)
विज्ञातमेवं भवतु करिष्ये प्रियमात्मनः । गत्वाऽऽश्रमपदाद्दूरमुटजं कृतवांस्तु सः ॥
vijñātamevaṃ bhavatu kariṣye priyamātmanaḥ | gatvā''śramapadāddūramuṭajaṃ kṛtavāṃstu saḥ
"यह निश्चय हो गया; मैं वही करूँगा जो मुझे प्रिय है।" ऐसा सोचकर वह आश्रम से दूर जाकर एक कुटिया बनाकर रहने लगा।
श्लोक 20 (13.31.20)
तत्र वेदीं च भूमिं च देवतायतनानि च । निवेश्य भरतश्रेष्ठ नियमस्थोऽभवन्मुनिः ॥
tatra vedīṃ ca bhūmiṃ ca devatāyatanāni ca | niveśya bharataśreṣṭha niyamastho'bhavanmuniḥ
हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ उसने वेदी, भूमि और देवमन्दिर स्थापित किए, और वह मुनि नियमों में स्थित हो गया।
श्लोक 21 (13.31.21)
अभिषेकांश्च नियमान्देवतायतनेषु च । बलिं च कृत्वा हुत्वा च देवतां चाप्यपूजयत् ॥
abhiṣekāṃśca niyamāndevatāyataneṣu ca | baliṃ ca kṛtvā hutvā ca devatāṃ cāpyapūjayat
वह स्नान और नियमों का पालन करता, देवमन्दिरों में बलि अर्पित करता, हवन करता और देवता की पूजा करता था।
श्लोक 22 (13.31.22)
सङ्कल्पनियमोपेतः फलाहारो जितेन्द्रियः । नित्यं सन्निहिताभिस्तु ओषधीभिः फलैस्तथा ॥
saṅkalpaniyamopetaḥ phalāhāro jitendriyaḥ | nityaṃ sannihitābhistu oṣadhībhiḥ phalaistathā
संकल्प और नियम से युक्त, फलाहारी और जितेन्द्रिय होकर वह सदा औषधियाँ और फल अपने पास रखता था,
श्लोक 23 (13.31.23)
अतिथीन्पूजयामास यथावत्समुपागतान् । एवं हि सुमहान्कालो व्यत्यक्रामत तस्य वै ॥
atithīnpūjayāmāsa yathāvatsamupāgatān | evaṃ hi sumahānkālo vyatyakrāmata tasya vai
और जो अतिथि आते, उनका यथोचित सत्कार करता था। इस प्रकार उसका बहुत लम्बा समय बीत गया।
श्लोक 24 (13.31.24)
अथास्य मुनिरागच्छत्सङ्गत्या वै तमाश्रमम् । सम्पूज्य स्वागतेनर्षिं विधिवत्समतोषयत् ॥
athāsya munirāgacchatsaṅgatyā vai tamāśramam | sampūjya svāgatenarṣiṃ vidhivatsamatoṣayat
तब संयोग से वह मुनि उसके आश्रम में आया; शूद्र ने स्वागत से उसका सम्मान किया और विधिपूर्वक उसे सन्तुष्ट किया।
श्लोक 25 (13.31.25)
अनुकूलाः कथाः कृत्वा यथागतमपृच्छत । ऋषिः परमतेजस्वी धर्मात्मा संशितव्रतः ॥
anukūlāḥ kathāḥ kṛtvā yathāgatamapṛcchata | ṛṣiḥ paramatejasvī dharmātmā saṃśitavrataḥ
अनुकूल बातें करके उस परम तेजस्वी, धर्मात्मा और दृढ़व्रत ऋषि ने उससे सारा वृत्तान्त पूछा।
श्लोक 26 (13.31.26)
एवं सुबहुशस्तस्य शूद्रस्य भरतर्षभ । सोऽगच्छदाश्रममृषिः शूद्रं द्रष्टुं नरर्षभः ॥
evaṃ subahuśastasya śūdrasya bharatarṣabha | so'gacchadāśramamṛṣiḥ śūdraṃ draṣṭuṃ nararṣabhaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार वह नरश्रेष्ठ ऋषि उस शूद्र को देखने के लिए बहुत बार उसके आश्रम में गया।
श्लोक 27 (13.31.27)
अथ तं तापसं शूद्रः सोऽब्रवीद्भरतर्षभ । पितृकार्यं करिष्यामि तत्र मेऽनुग्रहं कुरु ॥
atha taṃ tāpasaṃ śūdraḥ so'bravīdbharatarṣabha | pitṛkāryaṃ kariṣyāmi tatra me'nugrahaṃ kuru
तब, हे भरतश्रेष्ठ, उस शूद्र ने तपस्वी से कहा: "मैं पितृकार्य करना चाहता हूँ; उसमें आप मुझ पर अनुग्रह कीजिए।"
श्लोक 28 (13.31.28)
बाढमित्येव तं विप्र उवाच भरतर्षभ । शुचिर्भूत्वा स शूद्रस्तु तस्यर्षेः पाद्यमानयत् ॥
bāḍhamityeva taṃ vipra uvāca bharatarṣabha | śucirbhūtvā sa śūdrastu tasyarṣeḥ pādyamānayat
"ठीक है," उस ब्राह्मण ने उत्तर दिया, हे भरतश्रेष्ठ। शूद्र ने शुद्ध होकर उस ऋषि के चरण धोने के लिए जल लाया।
श्लोक 29 (13.31.29)
अथ दर्भांश्च वन्यांश्च ओषधीर्भरतर्षभ । पवित्रमासनं चैव बृसीं च समुपानयत् ॥
atha darbhāṃśca vanyāṃśca oṣadhīrbharatarṣabha | pavitramāsanaṃ caiva bṛsīṃ ca samupānayat
फिर वह कुश, वन की औषधियाँ, पवित्र आसन और घास का आसन-गद्दा ले आया।
श्लोक 30 (13.31.30)
अथ दक्षिणमावृत्य बृसीं चरमशैर्षिकीम् । कृतामन्यायतो दृष्ट्वा तं शूद्रमृषिरब्रवीत् ॥
atha dakṣiṇamāvṛtya bṛsīṃ caramaśairṣikīm | kṛtāmanyāyato dṛṣṭvā taṃ śūdramṛṣirabravīt
तब दाहिनी ओर घूमकर और यह देखकर कि आसन-गद्दा अनुचित रीति से, पश्चिम की ओर सिर करके बिछाया गया है, ऋषि ने उस शूद्र से कहा।
श्लोक 31 (13.31.31)
कुरुष्वैतां पूर्वशीर्षां भवांश्चोदङ्मुखः शुचिः । स च तत्कृतवाञ्शूद्रः सर्वं यदृषिरब्रवीत् ॥
kuruṣvaitāṃ pūrvaśīrṣāṃ bhavāṃścodaṅmukhaḥ śuciḥ | sa ca tatkṛtavāñśūdraḥ sarvaṃ yadṛṣirabravīt
"इसे पूर्व की ओर सिर करके बिछाओ, और तुम शुद्ध होकर उत्तर की ओर मुख करके बैठो।" शूद्र ने वह सब वैसा ही किया जैसा ऋषि ने कहा था।
श्लोक 32 (13.31.32)
यथोपदिष्टं मेधावी दर्भार्घादि यथातथम् । हव्यकव्यविधिं कृत्स्नमुक्तं तेन तपस्विना ॥
yathopadiṣṭaṃ medhāvī darbhārghādi yathātatham | havyakavyavidhiṃ kṛtsnamuktaṃ tena tapasvinā
उस बुद्धिमान ने बताई गई रीति के अनुसार कुश, अर्घ्य आदि सब ठीक-ठीक किया; देवों और पितरों के निमित्त हव्य-कव्य की सम्पूर्ण विधि उस तपस्वी ने उसे बता दी।
श्लोक 33 (13.31.33)
ऋषिणा पितृकार्येषु सदा धर्मपथे स्थितः । पितृकार्ये कृते चापि विसृष्टः स जगाम ह ॥
ṛṣiṇā pitṛkāryeṣu sadā dharmapathe sthitaḥ | pitṛkārye kṛte cāpi visṛṣṭaḥ sa jagāma ha
इस प्रकार पितृकार्यों में सदा धर्म के मार्ग पर स्थित रहने वाले उस शूद्र को ऋषि ने उपदेश दिया; और पितृकार्य पूरा होने पर विदा किए जाने पर वह ऋषि चला गया।
श्लोक 34 (13.31.34)
अथ दीर्घस्य कालस्य स तप्यञ्शूद्रतापसः । वने पञ्चत्वमगमत्सुकृतेन च तेन वै । अजायत महाराज वंशे स च महाद्युतिः ॥
atha dīrghasya kālasya sa tapyañśūdratāpasaḥ | vane pañcatvamagamatsukṛtena ca tena vai | ajāyata mahārāja vaṃśe sa ca mahādyutiḥ
बहुत समय बाद तपस्या करता हुआ वह शूद्र तपस्वी वन में मर गया, और उस पुण्य के फल से, हे महाराज, वह एक वंश में महातेजस्वी रूप से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 35 (13.31.35)
तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप ह । पुरोहितकुले विप्रः स जातोऽस्य वशानुगः ॥
tathaiva sa ṛṣistāta kāladharmamavāpa ha | purohitakule vipraḥ sa jāto'sya vaśānugaḥ
हे तात, उसी प्रकार वह ऋषि भी काल-धर्म को प्राप्त हुआ और पुरोहितों के कुल में ब्राह्मण होकर उत्पन्न हुआ, जो उस राजा के वश में रहने वाला था।
श्लोक 36 (13.31.36)
एवं तौ तत्र सम्भूतावुभौ शूद्रमुनी तदा । क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ ॥
evaṃ tau tatra sambhūtāvubhau śūdramunī tadā | krameṇa vardhitau cāpi vidyāsu kuśalāvubhau
इस प्रकार वे दोनों, शूद्र और मुनि, वहाँ उत्पन्न हुए और समय के साथ बड़े हुए; दोनों ही विद्याओं में कुशल थे।
श्लोक 37 (13.31.37)
अथर्ववेदे वेदे च बभूवर्षिः सुनिष्ठितः । कल्पप्रयोगे चोत्पन्ने ज्योतिषे च परं गतः । साङ्ख्ये चैव परा प्रीतिस्तस्य चैवं व्यवर्धत ॥
atharvavede vede ca babhūvarṣiḥ suniṣṭhitaḥ | kalpaprayoge cotpanne jyotiṣe ca paraṃ gataḥ | sāṅkhye caiva parā prītistasya caivaṃ vyavardhata
वह ऋषि अथर्ववेद तथा अन्य वेदों में निष्णात हुआ, कल्पसूत्रों के प्रयोग में और ज्योतिष में पारंगत हुआ, और साङ्ख्य में भी उसकी बड़ी रुचि बढ़ती गई।
श्लोक 38 (13.31.38)
पितर्युपरते चापि कृतशौचस्तु पार्थिवः । अभिषिक्तः प्रकृतिभी राजपुत्रः स पार्थिवः ॥
pitaryuparate cāpi kṛtaśaucastu pārthivaḥ | abhiṣiktaḥ prakṛtibhī rājaputraḥ sa pārthivaḥ
पिता के मरने पर और अन्त्येष्टि-कर्म पूरा करके उस राजपुत्र का प्रजा ने राजा के रूप में अभिषेक किया।
श्लोक 39 (13.31.39)
अभिषिक्तेन स ऋषिरभिषिक्तः पुरोहितः ॥
abhiṣiktena sa ṛṣirabhiṣiktaḥ purohitaḥ
अभिषिक्त राजा के साथ वह ऋषि भी पुरोहित के रूप में अभिषिक्त हुआ।
श्लोक 40 (13.31.40)
स तं पुरोधाय सुखमवसद्भरतर्षभः । राज्यं शशास धर्मेण प्रजाश्च परिपालयन् ॥
sa taṃ purodhāya sukhamavasadbharatarṣabhaḥ | rājyaṃ śaśāsa dharmeṇa prajāśca paripālayan
उसे पुरोहित बनाकर वह भरतश्रेष्ठ सुखपूर्वक रहा और प्रजा का पालन करते हुए धर्म के अनुसार राज्य करता रहा।
श्लोक 41 (13.31.41)
पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकार्येषु चासकृत् । उत्स्मयन्प्राहसच्चापि दृष्ट्वा राजा पुरोहितम् । एवं स बहुशो राजन्पुरोधसमुपाहसत् ॥
puṇyāhavācane nityaṃ dharmakāryeṣu cāsakṛt | utsmayanprāhasaccāpi dṛṣṭvā rājā purohitam | evaṃ sa bahuśo rājanpurodhasamupāhasat
पुण्याहवाचन में सदा, और धर्मकार्यों में बार-बार, राजा पुरोहित को देखकर मुसकराता और हँस भी पड़ता था। इस प्रकार, हे राजन्, उसने बहुत बार पुरोहित का उपहास किया।
श्लोक 42 (13.31.42)
लक्षयित्वा पुरोधास्तु बहुशस्तं नराधिपम् । उत्स्मयन्तं च सततं दृष्ट्वा तं मन्युमानभूत् ॥
lakṣayitvā purodhāstu bahuśastaṃ narādhipam | utsmayantaṃ ca satataṃ dṛṣṭvā taṃ manyumānabhūt
पुरोहित ने देखा कि राजा बार-बार और लगातार उसे देखकर मुसकराता है, और वह क्रोधित हो गया।
श्लोक 43 (13.31.43)
अथ शून्ये पुरोधास्तु सह राज्ञा समागतः । कथाभिरनुकूलाभी राजानं चाभिरामयत् ॥
atha śūnye purodhāstu saha rājñā samāgataḥ | kathābhiranukūlābhī rājānaṃ cābhirāmayat
फिर एकान्त में पुरोहित राजा से मिला और अनुकूल बातों से उसे प्रसन्न किया।
श्लोक 44 (13.31.44)
ततोऽब्रवीन्नरेन्द्रं स पुरोधा भरतर्षभ । वरमिच्छाम्यहं त्वेकं त्वया दत्तं महाद्युते ॥
tato'bravīnnarendraṃ sa purodhā bharatarṣabha | varamicchāmyahaṃ tvekaṃ tvayā dattaṃ mahādyute
तब उस पुरोहित ने राजा से कहा, हे भरतश्रेष्ठ: "हे महाद्युति, मैं आपसे एक वर माँगना चाहता हूँ।"
राजोवाच
श्लोक 45 (13.31.45)
वराणां ते शतं दद्यां किं बतैकं द्विजोत्तम । स्नेहाच्च बहुमानाच्च नास्त्यदेयं हि मे तव ॥
varāṇāṃ te śataṃ dadyāṃ kiṃ bataikaṃ dvijottama | snehācca bahumānācca nāstyadeyaṃ hi me tava
मैं तुम्हें सौ वर दे सकता हूँ, हे द्विजोत्तम, केवल एक की बात ही क्या? स्नेह और आदर के कारण मेरे लिए तुम्हें अदेय कुछ भी नहीं है।
पुरोहित उवाच
श्लोक 46 (13.31.46)
एकं वै वरमिच्छामि यदि तुष्टोऽसि पार्थिव । प्रतिजानीहि तावत्त्वं सत्यं यद्वद नानृतम् ॥
ekaṃ vai varamicchāmi yadi tuṣṭo'si pārthiva | pratijānīhi tāvattvaṃ satyaṃ yadvada nānṛtam
हे राजन्, यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं केवल एक वर चाहता हूँ। पहले आप प्रतिज्ञा कीजिए कि आप सत्य कहेंगे, असत्य नहीं।
भीष्म उवाच
श्लोक 47 (13.31.47)
बाढमित्येव तं राजा प्रत्युवाच युधिष्ठिर । यदि ज्ञास्यामि वक्ष्यामि अजानन्न तु संवदे ॥
bāḍhamityeva taṃ rājā pratyuvāca yudhiṣṭhira | yadi jñāsyāmi vakṣyāmi ajānanna tu saṃvade
हे युधिष्ठिर, राजा ने उसे उत्तर दिया: "ऐसा ही हो। यदि मैं जानूँगा तो बताऊँगा; यदि नहीं जानता तो कुछ नहीं कहूँगा।"
पुरोहित उवाच
श्लोक 48 (13.31.48)
पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकृत्येषु चासकृत् । शान्तिहोमेषु च सदा किं त्वं हससि वीक्ष्य मां ॥
puṇyāhavācane nityaṃ dharmakṛtyeṣu cāsakṛt | śāntihomeṣu ca sadā kiṃ tvaṃ hasasi vīkṣya māṃ
पुण्याहवाचन में सदा, धर्मकार्यों में बार-बार और शान्ति-होमों में भी, आप मुझे देखकर क्यों हँसते हैं?
श्लोक 49 (13.31.49)
सव्रीडं वै भवति हि मनो मे हसता त्वया । कामया शापितो राजन्नान्यथावक्तुमर्हसि ॥
savrīḍaṃ vai bhavati hi mano me hasatā tvayā | kāmayā śāpito rājannānyathāvaktumarhasi
आपके हँसने से मेरा मन लज्जा से भर जाता है। हे राजन्, मैं अपनी कामना की शपथ से आपको बाँधता हूँ; आपको अन्यथा उत्तर नहीं देना चाहिए।
श्लोक 50 (13.31.50)
भाव्यं हि कारणेनात्र न ते हास्यमकारणम् । कौतूहलं मे सुभृशं तत्त्वेन कथयस्व मे ॥
bhāvyaṃ hi kāraṇenātra na te hāsyamakāraṇam | kautūhalaṃ me subhṛśaṃ tattvena kathayasva me
इसमें अवश्य कोई कारण होगा; आपकी हँसी बिना कारण नहीं हो सकती। मुझे बहुत कौतूहल है; ठीक-ठीक बताइए।
राजोवाच
श्लोक 51 (13.31.51)
एवमुक्ते त्वया विप्र यदवाच्यं भवेदपि । अवश्यमेव वक्तव्यं शृणुष्वैकमना द्विज ॥
evamukte tvayā vipra yadavācyaṃ bhavedapi | avaśyameva vaktavyaṃ śṛṇuṣvaikamanā dvija
हे विप्र, आपके ऐसा कहने पर जो नहीं कहना चाहिए वह भी अवश्य कहना होगा। हे द्विज, एकाग्र मन से सुनिए।
श्लोक 52 (13.31.52)
पूर्वदेहे यथा वृत्तं तन्निबोध द्विजोत्तम । जातिं स्मराम्यहं ब्रह्मन्नवधानेन मे शृणु ॥
pūrvadehe yathā vṛttaṃ tannibodha dvijottama | jātiṃ smarāmyahaṃ brahmannavadhānena me śṛṇu
हे द्विजोत्तम, पूर्वजन्म में जो हुआ वह सुनिए। हे ब्रह्मन्, मुझे अपना पूर्वजन्म याद है; ध्यान से सुनिए।
श्लोक 53 (13.31.53)
शूद्रोऽहमभवं पूर्वं तपसे कृतनिश्चयः । ऋषिरुग्रतपास्त्वं च तदाऽभूर्द्विजसत्तम ॥
śūdro'hamabhavaṃ pūrvaṃ tapase kṛtaniścayaḥ | ṛṣirugratapāstvaṃ ca tadā'bhūrdvijasattama
पूर्वजन्म में मैं तपस्या का निश्चय किए हुए शूद्र था; और हे द्विजश्रेष्ठ, तब आप उग्र तप वाले ऋषि थे।
श्लोक 54 (13.31.54)
प्रीयता हि तदा ब्रह्मन्ममानुग्रहबुद्धिना । पितृकार्ये त्वया पूर्वमुपदेशः कृतोऽनघ ॥
prīyatā hi tadā brahmanmamānugrahabuddhinā | pitṛkārye tvayā pūrvamupadeśaḥ kṛto'nagha
हे ब्रह्मन्, तब आपने प्रसन्न होकर और मुझ पर अनुग्रह करने की बुद्धि से, हे निष्पाप, पितृकार्य के विषय में मुझे उपदेश दिया था —
श्लोक 55 (13.31.55)
वृस्यां दर्भेषु हव्ये च कव्ये च मुनिसत्तम । एतेन कर्मदोषेण पुरोधास्त्वमजायथाः ॥
vṛsyāṃ darbheṣu havye ca kavye ca munisattama | etena karmadoṣeṇa purodhāstvamajāyathāḥ
आसन-गद्दे, कुश, देवताओं के हव्य और पितरों के कव्य के विषय में, हे मुनिश्रेष्ठ। उसी कर्मदोष से आप पुरोहित होकर उत्पन्न हुए।
श्लोक 56 (13.31.56)
अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम् । मत्कृतस्योपदेशस्य त्वयाऽवाप्तमिदं फलम् ॥
ahaṃ rājā ca viprendra paśya kālasya paryayam | matkṛtasyopadeśasya tvayā'vāptamidaṃ phalam
मैं राजा हूँ, और हे विप्रेन्द्र, आप पुरोहित हैं; काल का फेर देखिए। मुझे जो उपदेश आपने दिया था, उसका यह फल आपको मिला है।
श्लोक 57 (13.31.57)
एतस्मात्कारणाद्ब्रह्मन्प्रहसे त्वां द्विजोत्तम । न त्वां परिभवन्ब्रह्मनप्रहसामि गुरुर्भवान् ॥
etasmātkāraṇādbrahmanprahase tvāṃ dvijottama | na tvāṃ paribhavanbrahmanaprahasāmi gururbhavān
हे द्विजोत्तम, इसी कारण मैं आप पर हँसता हूँ; आपका अनादर करके नहीं हँसता, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं।
श्लोक 58 (13.31.58)
विपर्ययेण मे मन्युस्तेन सन्तप्यते मनः । जातिं स्मराम्यहं तुभ्यमतस्त्वां प्रहसामि वै ॥
viparyayeṇa me manyustena santapyate manaḥ | jātiṃ smarāmyahaṃ tubhyamatastvāṃ prahasāmi vai
इस उलटफेर से मेरा मन दुःख से सन्तप्त होता है; आपके विषय में पूर्वजन्म को स्मरण करता हूँ, इसलिए आप पर हँसता हूँ।
श्लोक 59 (13.31.59)
एवं तवोग्रं हि तप उपदेशेन नाशितम् । पुरोहितत्वमुत्सृज्य यतस्व त्वं पुनर्भवे ॥
evaṃ tavograṃ hi tapa upadeśena nāśitam | purohitatvamutsṛjya yatasva tvaṃ punarbhave
इस प्रकार उस उपदेश से आपका उग्र तप नष्ट हो गया। पुरोहित का पद छोड़कर आप अपने अगले जन्म के लिए यत्न कीजिए।
श्लोक 60 (13.31.60)
इतस्त्वमधमामन्यां मा योनिं प्राप्स्यसे द्विज । गृह्यतां द्रविणं विप्र पूतात्मा भव सत्तम ॥
itastvamadhamāmanyāṃ mā yoniṃ prāpsyase dvija | gṛhyatāṃ draviṇaṃ vipra pūtātmā bhava sattama
हे द्विज, इसके बाद आप किसी अन्य निम्न योनि में न जाएँ। हे विप्र, धन ग्रहण कीजिए और हे सत्तम, पवित्र आत्मा वाले बनिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 61 (13.31.61)
ततो विसृष्टो राज्ञा तु विप्रो दानान्यनेकशः । ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं भूमिं ग्रामांश्च सर्वशः ॥
tato visṛṣṭo rājñā tu vipro dānānyanekaśaḥ | brāhmaṇebhyo dadau vittaṃ bhūmiṃ grāmāṃśca sarvaśaḥ
तब राजा से विदा पाकर उस ब्राह्मण ने ब्राह्मणों को अनेक प्रकार से दान दिए: धन, भूमि और गाँव, चारों ओर।
श्लोक 62 (13.31.62)
कृच्छ्राणि चीर्त्वा च ततो यथोक्तानि द्विजोत्तमैः । तीर्थानि चापि गत्वा वै दानानि विविधानि च ॥
kṛcchrāṇi cīrtvā ca tato yathoktāni dvijottamaiḥ | tīrthāni cāpi gatvā vai dānāni vividhāni ca
फिर उसने श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा बताए गए कृच्छ्र-व्रत किए, तीर्थों में गया और नाना प्रकार के दान दिए।
श्लोक 63 (13.31.63)
दत्त्वा गाश्चैव विप्रेभ्यः पूतात्माऽभवदात्मवान् । तमेव चाश्रमं गत्वा चचार विपुलं तपः ॥
dattvā gāścaiva viprebhyaḥ pūtātmā'bhavadātmavān | tameva cāśramaṃ gatvā cacāra vipulaṃ tapaḥ
ब्राह्मणों को गायें देकर वह पवित्र आत्मा वाला और आत्मवान् हो गया। उसी आश्रम में लौटकर उसने विपुल तप किया।
श्लोक 64 (13.31.64)
ततः सिद्धिं परां प्राप्तो ब्राह्मणो राजसत्तम । सम्मतश्चाभवत्तेषामाश्रमे तन्निवासिनाम् ॥
tataḥ siddhiṃ parāṃ prāpto brāhmaṇo rājasattama | sammataścābhavatteṣāmāśrame tannivāsinām
तब वह ब्राह्मण, हे राजाओं में श्रेष्ठ, परम सिद्धि को प्राप्त हुआ और उस आश्रम में रहने वालों का माननीय हो गया।
श्लोक 65 (13.31.65)
एवं प्राप्तो महत्कृच्छ्रमृषिः सन्नृपसत्तम । ब्राह्मणेन न वक्तव्यं तस्माद्वर्णावरे जने ॥
evaṃ prāpto mahatkṛcchramṛṣiḥ sannṛpasattama | brāhmaṇena na vaktavyaṃ tasmādvarṇāvare jane
हे नृपश्रेष्ठ, इस प्रकार उस ऋषि को बड़ा कष्ट भोगना पड़ा। इसलिए ब्राह्मण को नीच वर्ण के लोगों को उपदेश नहीं देना चाहिए।
श्लोक 66 (13.31.66)
वर्जयेदुपदेशं च सदैव ब्राह्मणो नृप । उपदेशं हि कुर्वाणो द्विजः कृच्छ्रमवाप्नुयात् ॥
varjayedupadeśaṃ ca sadaiva brāhmaṇo nṛpa | upadeśaṃ hi kurvāṇo dvijaḥ kṛcchramavāpnuyāt
हे राजन्, ब्राह्मण को सदा उपदेश देने से बचना चाहिए; उपदेश देने वाला द्विज कष्ट पाता है।
श्लोक 67 (13.31.67)
नेषितव्यं सदा वाचा द्विजेन नृपसत्तम । न च प्रवक्तव्यमिह किञ्चिद्वर्णावरे नरे ॥
neṣitavyaṃ sadā vācā dvijena nṛpasattama | na ca pravaktavyamiha kiñcidvarṇāvare nare
हे नृपश्रेष्ठ, ब्राह्मण को ऐसी बात वाणी से कभी नहीं चाहनी चाहिए, और नीच वर्ण के मनुष्य से यहाँ कुछ भी नहीं कहना चाहिए।
श्लोक 68 (13.31.68)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजातयः । एतेषु कथयन्राजन्ब्राह्मणो न प्रदुष्यति ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāstrayo varṇā dvijātayaḥ | eteṣu kathayanrājanbrāhmaṇo na praduṣyati
हे राजन्, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — ये तीन द्विज वर्ण हैं; इनसे कुछ कहने में ब्राह्मण दोषी नहीं होता।
श्लोक 69 (13.31.69)
तस्मात्सद्भिर्न वक्तव्यं कस्यचित्किंचिदग्रतः । सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य दुर्ज्ञेया ह्यकृतात्मभिः ॥
tasmātsadbhirna vaktavyaṃ kasyacitkiṃcidagrataḥ | sūkṣmā gatirhi dharmasya durjñeyā hyakṛtātmabhiḥ
इसलिए सज्जनों को किसी के सामने बिना सोचे कुछ भी नहीं कहना चाहिए। धर्म की गति सूक्ष्म है और अपरिपक्व आत्मा वालों के लिए दुर्जेय है।
श्लोक 70 (13.31.70)
तस्मान्मौनेन मुनयो दीक्षां कुर्वन्ति चादृताः । दुरुक्तस्य भयाद्राजन्नाभाषन्ते च किञ्चन ॥
tasmānmaunena munayo dīkṣāṃ kurvanti cādṛtāḥ | duruktasya bhayādrājannābhāṣante ca kiñcana
इसी कारण मुनि आदरपूर्वक मौन रहकर दीक्षा लेते हैं; हे राजन्, अनुचित वचन के भय से वे कुछ भी नहीं बोलते।
श्लोक 71 (13.31.71)
धार्मिका गुणसम्पन्नाः सत्यार्जवसमन्विताः । दुरुक्तवाचाभिहितैः प्राप्नुवन्तीह दुष्कृतम् ॥
dhārmikā guṇasampannāḥ satyārjavasamanvitāḥ | duruktavācābhihitaiḥ prāpnuvantīha duṣkṛtam
सत्य और सरलता से युक्त, गुणों से सम्पन्न धर्मात्मा लोग भी अनुचित वाणी से कहे गए वचनों के कारण यहाँ पाप के भागी होते हैं।
श्लोक 72 (13.31.72)
उपदेशो न कर्तव्यो ह्यज्ञात्वा यस्यकस्य चित् । उपदेशाद्धि तत्पापं ब्राह्मणः समवाप्नुयात् ॥
upadeśo na kartavyo hyajñātvā yasyakasya cit | upadeśāddhi tatpāpaṃ brāhmaṇaḥ samavāpnuyāt
बिना जाने किसी को भी उपदेश नहीं देना चाहिए; उपदेश के कारण ब्राह्मण उस पाप को प्राप्त होता है।
श्लोक 73 (13.31.73)
विमृश्य तस्मात्प्राज्ञेन वक्तव्यं धर्ममिच्छता । सत्यानृतेन हि कृत उपदेशो हिनस्ति हि ॥
vimṛśya tasmātprājñena vaktavyaṃ dharmamicchatā | satyānṛtena hi kṛta upadeśo hinasti hi
इसलिए धर्म की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान को विचार करके ही बोलना चाहिए; सत्य और असत्य के मेल से दिया गया उपदेश हानि पहुँचाता है।
श्लोक 74 (13.31.74)
वक्तव्यमिह पृष्टेन विनिश्चयविपर्ययम् । स चोपदेशः कर्तव्यो येन धर्ममवाप्नुयात् ॥
vaktavyamiha pṛṣṭena viniścayaviparyayam | sa copadeśaḥ kartavyo yena dharmamavāpnuyāt
पूछे जाने पर यहाँ बोलना चाहिए, पर यह सोचकर कि निश्चय का उलटा परिणाम भी हो सकता है; और वही उपदेश देना चाहिए जिससे पूछने वाला धर्म को प्राप्त हो।
श्लोक 75 (13.31.75)
एतत्ते सर्वमाख्यातमुपदेशकृते मया । महान्क्लेशो हि भवति तस्मान्नोपदिशेदिह ॥
etatte sarvamākhyātamupadeśakṛte mayā | mahānkleśo hi bhavati tasmānnopadiśediha
उपदेश के विषय में यह सब मैंने तुम्हें बता दिया। इससे बड़ा कष्ट होता है, इसलिए यहाँ उपदेश नहीं देना चाहिए।