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अनुशासन पर्व · अध्याय 32

श्री रुक्मिणी को अपने निवास-स्थान बताती हैं

युधिष्ठिर पूछते हैं कि श्री किस प्रकार के पुरुष और स्त्री में निवास करती हैं। भीष्म बताते हैं कि नारायण की गोद में बैठी श्री को देखकर रुक्मिणी ने यही पूछा था, और श्री का उत्तर: वे कुशल, कृतज्ञ, संयमी और धर्मनिष्ठ पुरुषों में, सद्गुणी और पतिव्रता स्त्रियों में, उन स्वच्छ घरों में जहाँ अग्नि, देवता और ब्राह्मणों का सम्मान होता है, और सबसे बढ़कर नारायण में रहती हैं; आलसी, अविश्वासी, झगड़ालू और फूहड़ को वे त्याग देती हैं।

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.32.1)

कीदृशे पुरुषे तात स्त्रीषु भरतर्षभ । श्रीः पद्मा वसते नित्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

kīdṛśe puruṣe tāta strīṣu bharatarṣabha | śrīḥ padmā vasate nityaṃ tanme brūhi pitāmaha

हे तात, हे भरतश्रेष्ठ, पद्मा श्री किस प्रकार के पुरुष में और किन स्त्रियों में सदा निवास करती हैं? हे पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.32.2)

अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं यथाश्रुतम् । रुक्मिणी देवकीपुत्रसन्निधौ पर्यपृच्छत ॥

atra te varṇayiṣyāmi yathāvṛttaṃ yathāśrutam | rukmiṇī devakīputrasannidhau paryapṛcchata

इस विषय में मैं तुम्हें वैसा ही बताता हूँ जैसा हुआ और जैसा सुना है: रुक्मिणी ने देवकीपुत्र के समीप यह प्रश्न पूछा था।

श्लोक 3 (13.32.3)

नारायणस्याङ्कगतां ज्वलन्तीं । दृष्ट्वा श्रियं पद्मसमानवक्त्राम् । कौतूहलाद्विस्मितचारुनेत्रा । पप्रच्छ माता मकरध्वजस्य ॥

nārāyaṇasyāṅkagatāṃ jvalantīṃ | dṛṣṭvā śriyaṃ padmasamānavaktrām | kautūhalādvismitacārunetrā | papraccha mātā makaradhvajasya

नारायण की गोद में बैठी, कमल के समान मुखवाली, तेजस्वी श्री को देखकर, मकरध्वज (कामदेव) की माता रुक्मिणी ने सुन्दर नेत्र विस्मय से फैलाकर कौतूहल से पूछा:

रुक्मिण्युवाच

श्लोक 4 (13.32.4)

कानीह भूतान्युपसेवसे त्वं । सन्तिष्ठसे कानि च सेवसे त्वम् । तानि त्रिलोकेश्वरभूतकान्ते । तत्त्वेन मे ब्रूहि महर्षिकन्ये ॥

kānīha bhūtānyupasevase tvaṃ | santiṣṭhase kāni ca sevase tvam | tāni trilokeśvarabhūtakānte | tattvena me brūhi maharṣikanye

तुम किन प्राणियों की सेवा करती हो, किनमें निवास करती हो और किनकी सेवा करती हो? हे त्रिलोकेश्वर की प्रिया, हे महर्षि की पुत्री, यह मुझे ठीक-ठीक बताओ।

भीष्म उवाच

श्लोक 5 (13.32.5)

एवं तदा श्रीरभिभाष्यमाणा । देव्या समक्षं गरुडध्वजस्य । उवाच वाक्यं मधुराभिधानं । मनोहरं चन्द्रमुखी प्रसन्ना ॥

evaṃ tadā śrīrabhibhāṣyamāṇā | devyā samakṣaṃ garuḍadhvajasya | uvāca vākyaṃ madhurābhidhānaṃ | manoharaṃ candramukhī prasannā

देवी रुक्मिणी के इस प्रकार पूछने पर, गरुडध्वज (विष्णु) के सामने, चन्द्रमुखी और प्रसन्न श्री ने मधुर और मनोहर वचन कहे।

श्रीरुवाच

श्लोक 6 (13.32.6)

वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे । दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने । अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे । जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्वे ॥

vasāmi nityaṃ subhage pragalbhe | dakṣe nare karmaṇi vartamāne | akrodhane devapare kṛtajñe | jitendriye nityamudīrṇasatve

हे सुभगे, मैं सदा उस साहसी और कुशल पुरुष में रहती हूँ जो अपने कर्म में लगा रहता है; जो क्रोधहीन, देवताओं में श्रद्धा रखने वाला, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय और सदा सत्त्व से भरा हुआ है।

श्लोक 7 (13.32.7)

नाकर्मशीले पुरुषे वसामि । न नास्तिके साङ्करिके कृतघ्ने । न भिन्नवृत्ते न नृशंसवृत्ते । न चाविनीते न गुरुष्वसूयके ॥

nākarmaśīle puruṣe vasāmi | na nāstike sāṅkarike kṛtaghne | na bhinnavṛtte na nṛśaṃsavṛtte | na cāvinīte na guruṣvasūyake

मैं कर्म न करने वाले पुरुष में नहीं रहती, न नास्तिक में, न उपद्रव फैलाने वाले में, न कृतघ्न में; न टूटे आचरण वाले में, न क्रूर आचरण वाले में, न अविनीत में, और न गुरुजनों से डाह करने वाले में।

श्लोक 8 (13.32.8)

ये चाल्पतेजोबलसत्त्वमानाः । क्लिश्यन्ति कुप्यन्ति च यत्रतत्र । न चैव तिष्ठामि तथाविधेषु । नरेषु सङ्गुप्तमनोरथेषु ॥

ye cālpatejobalasattvamānāḥ | kliśyanti kupyanti ca yatratatra | na caiva tiṣṭhāmi tathāvidheṣu | nareṣu saṅguptamanoratheṣu

जिनमें तेज, बल, सत्त्व और स्वाभिमान थोड़ा है, जो जहाँ-तहाँ कष्ट पाते और क्रोध करते हैं, और जिनके मनोरथ छिपे रहते हैं, ऐसे मनुष्यों में मैं नहीं ठहरती।

श्लोक 9 (13.32.9)

यश्चात्मनि प्रार्थयते न किञ्चिद् । यश्च स्वभावोपहतान्तरात्मा । तेष्वल्पसन्तोषरतेषु नित्यं । नरेषु नाहं निवसामि सम्यक् ॥

yaścātmani prārthayate na kiñcid | yaśca svabhāvopahatāntarātmā | teṣvalpasantoṣarateṣu nityaṃ | nareṣu nāhaṃ nivasāmi samyak

जो अपने लिए कुछ नहीं माँगता, जिसका अन्तःकरण अपने स्वभाव से बिगड़ा हुआ है, और जो सदा थोड़े में सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे मनुष्यों में मैं ठीक प्रकार से निवास नहीं करती।

श्लोक 10 (13.32.10)

वसामि धर्मशीलेषु धर्मज्ञेषु महात्मसु । वृद्धसेविषु दान्तेषु सत्वज्ञेषु महात्मसु ॥

vasāmi dharmaśīleṣu dharmajñeṣu mahātmasu | vṛddhaseviṣu dānteṣu satvajñeṣu mahātmasu

मैं धर्मशील, धर्म को जानने वाले महात्माओं में रहती हूँ; वृद्धों की सेवा करने वाले, संयमी और तत्त्व को जानने वाले महात्माओं में रहती हूँ।

श्लोक 11 (13.32.11)

अवन्ध्यकालेषु सदा दानशौचरतेषु च । ब्रह्मचर्यतपोज्ञानगोद्विजातिप्रियेषु च ॥

avandhyakāleṣu sadā dānaśaucarateṣu ca | brahmacaryatapojñānagodvijātipriyeṣu ca

जिनका समय कभी निष्फल नहीं जाता, जो सदा दान और शुद्धि में लगे रहते हैं, और जो ब्रह्मचर्य, तप, ज्ञान, गौओं और ब्राह्मणों से प्रेम करते हैं,

श्लोक 12 (13.32.12)

स्त्रीषु कान्तासु शान्तासु देवद्विजपरासु च । विशुद्धगृहभाण्डासु गोधान्याभिरतासु च ॥

strīṣu kāntāsu śāntāsu devadvijaparāsu ca | viśuddhagṛhabhāṇḍāsu godhānyābhiratāsu ca

और उन स्त्रियों में जो सुन्दर और शान्त हैं, देवताओं और ब्राह्मणों में लगी रहती हैं, जिनके घर के बर्तन शुद्ध रहते हैं और जो गौओं तथा अन्न में रुचि रखती हैं।

श्लोक 13 (13.32.13)

स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु । वृद्धोपसेवानिरते च दान्ते । कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे । क्षान्तासु दान्तासु तथाबलासु । सत्यस्वभावार्जवसंयुतासु । वसामि देवद्विजपूजिकासु ॥

svadharmaśīleṣu ca dharmavitsu | vṛddhopasevānirate ca dānte | kṛtātmani kṣāntipare samarthe | kṣāntāsu dāntāsu tathābalāsu | satyasvabhāvārjavasaṃyutāsu | vasāmi devadvijapūjikāsu

मैं उनमें रहती हूँ जो अपने धर्म में लगे हैं और धर्म को जानते हैं; वृद्धों की सेवा में रत संयमी पुरुष में; संस्कारित आत्मा वाले, क्षमाशील और समर्थ पुरुष में; क्षमाशील और संयमी स्त्रियों में; सत्य-स्वभाव और सरलता से युक्त स्त्रियों में; और देवताओं तथा ब्राह्मणों की पूजा करने वालों में मैं निवास करती हूँ।

श्लोक 14 (13.32.14)

प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं । सदा च भर्तुः प्रतिकूलवादिनीम् । परस्य वेश्माभिरतामलज्जाम् । एवंविधां स्त्रीं परिवर्जयामि ॥

prakīrṇabhāṇḍāmanavekṣyakāriṇīṃ | sadā ca bhartuḥ pratikūlavādinīm | parasya veśmābhiratāmalajjām | evaṃvidhāṃ strīṃ parivarjayāmi

जो स्त्री घर के बर्तन बिखेरे रखती है, बिना सोचे काम करती है, सदा पति के प्रतिकूल बोलती है, दूसरों के घर में रमती है और निर्लज्ज है, ऐसी स्त्री को मैं छोड़ देती हूँ।

श्लोक 15 (13.32.15)

लोलामदक्षामवलेपिनीं च । व्यपेतशौचां कलहप्रियां च । निद्राभिभूतां सततं शयानाम् । एवंविधां स्त्रीं परिवर्जयामि ॥

lolāmadakṣāmavalepinīṃ ca | vyapetaśaucāṃ kalahapriyāṃ ca | nidrābhibhūtāṃ satataṃ śayānām | evaṃvidhāṃ strīṃ parivarjayāmi

चंचल, अकुशल, घमण्डी, शुद्धि से रहित, झगड़ालू, नींद से दबी हुई और सदा पड़ी रहने वाली ऐसी स्त्री को मैं त्याग देती हूँ।

श्लोक 16 (13.32.16)

सत्यासु नित्यं प्रियदर्शनासु । सौभाग्ययुक्तासु गुणान्वितासु । वसामि नारीषु पतिव्रतासु । कल्याणशीलासु विभूषितासु ॥

satyāsu nityaṃ priyadarśanāsu | saubhāgyayuktāsu guṇānvitāsu | vasāmi nārīṣu pativratāsu | kalyāṇaśīlāsu vibhūṣitāsu

मैं उन स्त्रियों में रहती हूँ जो सत्यनिष्ठ, सदा देखने में प्रिय, सौभाग्य और गुणों से युक्त, पतिव्रता, कल्याणशील और सजी-सँवरी रहती हैं।

श्लोक 17 (13.32.17)

यानेषु कन्यासु विभूषणेषु । यज्ञेषु मेघेषु च वृष्टिमत्सु । वसामि फुल्लासु च पद्मिनीषु । नक्षत्रवीथीषु च शारदीषु ॥

yāneṣu kanyāsu vibhūṣaṇeṣu | yajñeṣu megheṣu ca vṛṣṭimatsu | vasāmi phullāsu ca padminīṣu | nakṣatravīthīṣu ca śāradīṣu

मैं वाहनों में, कन्याओं में, आभूषणों में, यज्ञों में, वर्षा वाले मेघों में, खिले हुए कमल-सरोवरों में और शरद् की तारा-वीथियों में निवास करती हूँ।

श्लोक 18 (13.32.18)

गजेषु गोष्ठेषु तथाऽऽसनेषु । सरःसु फुल्लोत्पलपङ्कजेषु । नदीषु हंसस्वननादितासु । क्रौञ्चावघुष्टस्वरशोभितासु ॥

gajeṣu goṣṭheṣu tathā''saneṣu | saraḥsu phullotpalapaṅkajeṣu | nadīṣu haṃsasvananāditāsu | krauñcāvaghuṣṭasvaraśobhitāsu

हाथियों में, गोशालाओं में और आसनों में; खिले कमल और कुमुदों वाले सरोवरों में; हंसों की ध्वनि से गूँजती और क्रौंच पक्षियों की पुकार से शोभित नदियों में।

श्लोक 19 (13.32.19)

विकीर्णकूलद्रुमराजितासु । तपस्विसिद्धद्विजसेवितासु । वसामि नित्यं सुबहूदकासु । सिंहैर्गजैश्चाकुलितोदकासु ॥

vikīrṇakūladrumarājitāsu | tapasvisiddhadvijasevitāsu | vasāmi nityaṃ subahūdakāsu | siṃhairgajaiścākulitodakāsu

जिनके बिखरे तटों पर वृक्ष शोभित हैं और जिनका सेवन तपस्वी, सिद्ध और ब्राह्मण करते हैं, ऐसी भरपूर जल वाली नदियों में, जिनका जल सिंहों और हाथियों से हिल उठता है, मैं सदा निवास करती हूँ।

श्लोक 20 (13.32.20)

मत्ते गजे गोवृषभे नरेन्द्रे । सिंहासने सत्पुरुषेषु नित्यम् ॥

matte gaje govṛṣabhe narendre | siṃhāsane satpuruṣeṣu nityam

मतवाले हाथी में, गोवृषभ में, राजा में, सिंहासन में और सदा सत्पुरुषों में।

श्लोक 21 (13.32.21)

यस्मिञ्जनो हव्यभुजं जुहोति । गोब्राह्मणं चार्चति देवताश्च । काले च पुष्पैर्बलयः क्रियन्ते । तस्मिन्गृहे नित्यमुपैमि वासम् ॥

yasmiñjano havyabhujaṃ juhoti | gobrāhmaṇaṃ cārcati devatāśca | kāle ca puṣpairbalayaḥ kriyante | tasmingṛhe nityamupaimi vāsam

जिस घर में मनुष्य अग्नि में हवन करता है, गौ, ब्राह्मण और देवताओं की पूजा करता है, और ठीक समय पर फूलों से बलि अर्पित की जाती है, उस घर में मैं सदा निवास करती हूँ।

श्लोक 22 (13.32.22)

स्वाध्यायनित्येषु सदा द्विजेषु । क्षत्रे च धर्माभिरते सदैव । वैश्ये च कृष्याभिरते वसामि । शूद्रे च शुश्रूषणनित्ययुक्ते ॥

svādhyāyanityeṣu sadā dvijeṣu | kṣatre ca dharmābhirate sadaiva | vaiśye ca kṛṣyābhirate vasāmi | śūdre ca śuśrūṣaṇanityayukte

मैं सदा स्वाध्याय में लगे रहने वाले ब्राह्मणों में, धर्म में अनुरक्त क्षत्रिय में, खेती में लगे वैश्य में और सेवा में नित्य लगे शूद्र में निवास करती हूँ।

श्लोक 23 (13.32.23)

नारायणे त्वेकमना वसामि । सर्वेण भावेन शरीरभूता । तस्मिन्हि धर्मः सुमहान्निविष्टो । ब्रह्मण्यता चात्र तथा प्रियत्वम् ॥

nārāyaṇe tvekamanā vasāmi | sarveṇa bhāvena śarīrabhūtā | tasminhi dharmaḥ sumahānniviṣṭo | brahmaṇyatā cātra tathā priyatvam

मैं एकाग्र मन से नारायण में निवास करती हूँ, अपने सम्पूर्ण भाव से उनके साथ शरीरधारी होकर। उनमें महान् धर्म स्थित है, और ब्राह्मणों के प्रति भक्ति तथा प्रियता भी।

श्लोक 24 (13.32.24)

नाहं शरीरेण वसामि देवि । नैवं मया शक्यमिहाभिधातुम् । भावेन यस्मिन्निवसामि पुंसि । स वर्धते धर्मयशोर्थकामैः ॥

nāhaṃ śarīreṇa vasāmi devi | naivaṃ mayā śakyamihābhidhātum | bhāvena yasminnivasāmi puṃsi | sa vardhate dharmayaśorthakāmaiḥ

हे देवि, मैं शरीर से निवास नहीं करती, और यहाँ ऐसा कहना भी सम्भव नहीं। जिस पुरुष में मैं भाव से निवास करती हूँ, वह धर्म, यश, अर्थ और काम से बढ़ता है।

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