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अनुशासन पर्व · अध्याय 33

वत्सनाभ और धर्म: कृतघ्नों का प्रायश्चित्त

युधिष्ठिर कृतघ्नों के प्रायश्चित्त और गति के विषय में पूछते हैं। भीष्म बताते हैं कि वे दीर्घकाल तक नरक भोगते हैं और कीड़ों-मकोड़ों की योनि में जन्म लेते हैं, फिर ऋषि वत्सनाभ की कथा कहते हैं, जिन्हें धर्म ने भैंसे का रूप लेकर इन्द्र की वर्षा से बचाया; उन्हें साधारण पशु समझ लेने की कृतघ्नता के प्रायश्चित्त में उन्होंने प्राण त्यागने का निश्चय किया। धर्म उन्हें मेरु पर रोककर उनके त्याग की प्रशंसा करते हैं और लौट आने को कहते हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.33.1)

प्रायश्चित्तं कृतघ्नानां प्रतिब्रूहि पितामह । मातॄः पितॄन्गुरुंश्चैव येऽवमन्यन्ति मोहिताः ॥

prāyaścittaṃ kṛtaghnānāṃ pratibrūhi pitāmaha | mātṝḥ pitṝnguruṃścaiva ye'vamanyanti mohitāḥ

हे पितामह, कृतघ्नों का प्रायश्चित्त बताइए: उन लोगों का जो मोह में पड़कर माता, पिता और गुरुओं का अपमान करते हैं,

श्लोक 2 (13.33.2)

ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपाः । तेषां गतिं महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्वतः ॥

ye cāpyanye pare tāta kṛtaghnā nirapatrapāḥ | teṣāṃ gatiṃ mahābāho śrotumicchāmi tatvataḥ

और उनका भी जो दूसरे कृतघ्न और निर्लज्ज हैं, हे तात। हे महाबाहो, मैं उनकी गति यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.33.3)

कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वतीः समाः । मातापितृगुरूणां च ये न तिष्ठन्ति शासने । क्रिमिकीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च ॥

kṛtaghnānāṃ gatistāta narake śāśvatīḥ samāḥ | mātāpitṛgurūṇāṃ ca ye na tiṣṭhanti śāsane | krimikīṭapipīleṣu jāyante sthāvareṣu ca

हे तात, कृतघ्नों की गति शाश्वत वर्षों तक नरक है; और जो माता, पिता और गुरुओं के शासन में नहीं रहते, वे कीड़ों, पतंगों और चींटियों में तथा स्थावर योनियों में जन्म लेते हैं।

श्लोक 4 (13.33.4)

दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्भवः । अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ॥

durlabho hi punasteṣāṃ mānuṣye punarudbhavaḥ | atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam

उनके लिए फिर मनुष्य-जन्म पाना कठिन है। इस विषय में लोग यह पुरानी कथा सुनाते हैं।

श्लोक 5 (13.33.5)

वत्सनाभो महाप्राज्ञो महर्षिः संशितव्रतः । वल्मीकभूतो ब्रह्मर्षिस्तप्यते सुमहत्तपः ॥

vatsanābho mahāprājño maharṣiḥ saṃśitavrataḥ | valmīkabhūto brahmarṣistapyate sumahattapaḥ

वत्सनाभ नाम के एक महाबुद्धिमान, दृढ़व्रत ब्रह्मर्षि थे, जो अपने चारों ओर दीमक की बाँबी बन जाने पर भी घोर तप करते थे।

श्लोक 6 (13.33.6)

तस्मिंश्च तप्यति तपो वासवो भरतर्षभ । ववर्ष सुमहद्वर्षं सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ॥

tasmiṃśca tapyati tapo vāsavo bharatarṣabha | vavarṣa sumahadvarṣaṃ savidyutstanayitnumān

जब वे तप कर रहे थे, तब हे भरतश्रेष्ठ, इन्द्र ने बिजली और गर्जना के साथ भारी वर्षा की।

श्लोक 7 (13.33.7)

तत्र सप्ताहवर्षं तु मुमुचे पाकशासनः । निमीलिताक्षस्तद्वर्षं प्रत्यगृह्यत वै द्विजः ॥

tatra saptāhavarṣaṃ tu mumuce pākaśāsanaḥ | nimīlitākṣastadvarṣaṃ pratyagṛhyata vai dvijaḥ

वहाँ पाकशासन इन्द्र ने सात दिन तक वर्षा की, और उस ब्राह्मण ने आँखें बन्द करके उस वर्षा को सहा।

श्लोक 8 (13.33.8)

तस्मिन्पतति वर्षे तु शीतवातसमन्विते । विशीर्णध्वस्तशिखरो वल्मीकोऽशनिताडितः ॥

tasminpatati varṣe tu śītavātasamanvite | viśīrṇadhvastaśikharo valmīko'śanitāḍitaḥ

ठंडी और हवा से भरी उस वर्षा के गिरते समय वज्र से आहत वह बाँबी, जिसकी चोटी टूट-फूट गई थी, बिखर गई।

श्लोक 9 (13.33.9)

ताड्यमाने ततस्तस्मिन्वत्सनाभे महात्मनि । कारुण्यात्तस्य धर्मः स्वमानृशंस्यमथाकरोत् ॥

tāḍyamāne tatastasminvatsanābhe mahātmani | kāruṇyāttasya dharmaḥ svamānṛśaṃsyamathākarot

जब महात्मा वत्सनाभ पर यों प्रहार हो रहा था, तब धर्म ने उन पर करुणा करके अपनी दयालुता प्रकट की।

श्लोक 10 (13.33.10)

चिन्तयानस्य ब्रह्मर्षिं तपन्तमतिधार्मिकम् । अनुरूपा मतिः क्षिप्रमुपजाता स्वभावजा ॥

cintayānasya brahmarṣiṃ tapantamatidhārmikam | anurūpā matiḥ kṣipramupajātā svabhāvajā

उस अत्यन्त धर्मनिष्ठ तपस्वी ब्रह्मर्षि का चिन्तन करते हुए धर्म के मन में अपने स्वभाव से उपजा हुआ एक उचित विचार शीघ्र ही आया।

श्लोक 11 (13.33.11)

स्वं रूपं माहिषं कृत्वा सुमहान्तं मनोहरम् । रक्षार्थं वत्सनाभस्य चतुष्पादुपरिस्थितः ॥

svaṃ rūpaṃ māhiṣaṃ kṛtvā sumahāntaṃ manoharam | rakṣārthaṃ vatsanābhasya catuṣpāduparisthitaḥ

अपना रूप विशाल और मनोहर भैंसे का बनाकर वे वत्सनाभ की रक्षा के लिए चार पैरों पर उनके ऊपर खड़े हो गए।

श्लोक 12 (13.33.12)

यदा त्वपगतं वर्षं वृष्टिवातसमन्वितम् । ततो महिषरूपेण धर्मो धर्मभृतांवर । शनैर्वल्मीकमुत्सृज्य प्राद्रवद्भरतर्षभ ॥

yadā tvapagataṃ varṣaṃ vṛṣṭivātasamanvitam | tato mahiṣarūpeṇa dharmo dharmabhṛtāṃvara | śanairvalmīkamutsṛjya prādravadbharatarṣabha

जब आँधी और झड़ी के साथ वह वर्षा थम गई, तब हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, धर्म भैंसे के रूप में धीरे से बाँबी को छोड़कर दौड़ गए, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 13 (13.33.13)

स्थितेऽस्मिन्वृष्टिसम्पाते वीक्षते स्म महातपाः । दिशश्च विपुलास्तत्र गिरीणां शिखराणि च ॥

sthite'sminvṛṣṭisampāte vīkṣate sma mahātapāḥ | diśaśca vipulāstatra girīṇāṃ śikharāṇi ca

वर्षा के रुक जाने पर महातपस्वी ने चारों ओर देखा, तो विशाल दिशाएँ और पर्वतों की चोटियाँ दिखाई दीं।

श्लोक 14 (13.33.14)

दृष्ट्वा च पृथिवीं सर्वां सलिलेन परिप्लुताम् । जलाशयान्स तान्दृष्ट्वा विप्रः प्रमुदितोऽभवत् ॥

dṛṣṭvā ca pṛthivīṃ sarvāṃ salilena pariplutām | jalāśayānsa tāndṛṣṭvā vipraḥ pramudito'bhavat

सारी पृथ्वी को जल में डूबी देखकर और जलाशयों को देखकर वह ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ।

श्लोक 15 (13.33.15)

अचिन्तयद्विस्मितश्च वर्षात्केनाभिरक्षितः । ततोऽपश्यत्स महिषमवस्थितमदूरतः ॥

acintayadvismitaśca varṣātkenābhirakṣitaḥ | tato'paśyatsa mahiṣamavasthitamadūrataḥ

उसने विस्मित होकर सोचा: "वर्षा से मेरी रक्षा किसने की?" तब उसने थोड़ी ही दूर पर खड़े एक भैंसे को देखा।

श्लोक 16 (13.33.16)

तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सलः ॥

tiryagyonāvapi kathaṃ dṛśyate dharmavatsalaḥ

"पशु-योनि में भी धर्म से प्रेम करने वाला कैसे दिखाई देता है?"

श्लोक 17 (13.33.17)

अतो नु भद्रमहिषः शिलापट्टमवस्थितः । पीवरश्चैव बल्यश्च बहुमांसो भवेदयम् ॥

ato nu bhadramahiṣaḥ śilāpaṭṭamavasthitaḥ | pīvaraścaiva balyaśca bahumāṃso bhavedayam

"तो यह कोई सुन्दर भैंसा शिला पर खड़ा है, मोटा, बलवान और बहुत मांसल।"

श्लोक 18 (13.33.18)

तस्य बुद्धिरियं जाता धर्मसंसक्तजा मुनेः । कृतघ्ना नरकं यान्ति ये च विश्वस्तघातिनः ॥

tasya buddhiriyaṃ jātā dharmasaṃsaktajā muneḥ | kṛtaghnā narakaṃ yānti ye ca viśvastaghātinaḥ

धर्म में आसक्त उस मुनि के मन में यह विचार आया: "कृतघ्न नरक में जाते हैं, और वे भी जो विश्वास करने वालों का वध करते हैं।"

श्लोक 19 (13.33.19)

निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथञ्चन । ऋते प्राणपरित्यागाद्धर्मज्ञानां वचो यथा ॥

niṣkṛtiṃ naiva paśyāmi kṛtaghnānāṃ kathañcana | ṛte prāṇaparityāgāddharmajñānāṃ vaco yathā

"कृतघ्नों के लिए मुझे प्राण त्यागने के सिवा और कोई प्रायश्चित्त किसी प्रकार दिखाई नहीं देता; ऐसा ही धर्म जानने वालों का कथन है।"

श्लोक 20 (13.33.20)

अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम् । कृतघ्नतां च सम्प्राप्य मरणान्ता च निष्कृतिः ॥

akṛtvā bharaṇaṃ pitroradattvā gurudakṣiṇām | kṛtaghnatāṃ ca samprāpya maraṇāntā ca niṣkṛtiḥ

"माता-पिता का भरण-पोषण न करके, गुरु को दक्षिणा न देकर और कृतघ्न होकर, प्रायश्चित्त मृत्यु पर ही समाप्त होता है।"

श्लोक 21 (13.33.21)

आकाङ्क्षायामुपेक्षायां चोपपातकमुत्तमम् । तस्मात्प्राणान्परित्यक्ष्ये प्रायश्चित्तार्थमित्युत ॥

ākāṅkṣāyāmupekṣāyāṃ copapātakamuttamam | tasmātprāṇānparityakṣye prāyaścittārthamityuta

"जो सहायता की आशा रखता है, उसकी उपेक्षा करना उपपातकों में सबसे बड़ा है। इसलिए मैं प्रायश्चित्त के लिए प्राण त्याग दूँगा।"

श्लोक 22 (13.33.22)

स मेरुशिखरं गत्वा निःसङ्गेनान्तरात्मना । प्रायश्चित्तं कर्तुकामः शरीरं त्यक्तुमुद्यतः । निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित् ॥

sa meruśikharaṃ gatvā niḥsaṅgenāntarātmanā | prāyaścittaṃ kartukāmaḥ śarīraṃ tyaktumudyataḥ | nigṛhītaśca dharmātmā haste dharmeṇa dharmavit

अनासक्त मन से वे मेरु के शिखर पर गए; प्रायश्चित्त करने की इच्छा से वे शरीर त्यागने को उद्यत थे, पर धर्मात्मा और धर्म को जानने वाले धर्म ने उनका हाथ पकड़ लिया।

धर्म उवाच

श्लोक 23 (13.33.23)

वत्सनाभ महाप्राज्ञ बहुवर्षशतायुष । परितुष्टोस्मि त्यागेन निस्सङ्गेन तथाऽऽत्मनः ॥

vatsanābha mahāprājña bahuvarṣaśatāyuṣa | parituṣṭosmi tyāgena nissaṅgena tathā''tmanaḥ

"हे महाप्राज्ञ वत्सनाभ, तुम सैकड़ों वर्ष जियो। अपने ही प्रति तुम्हारे इस निःसंग त्याग से मैं प्रसन्न हूँ।"

श्लोक 24 (13.33.24)

एवं धर्मभृतः सर्वे विमृशन्ति कृताकृतम् । न कश्चिद्वत्सनाभस्य यस्य नोपहतं मनः ॥

evaṃ dharmabhṛtaḥ sarve vimṛśanti kṛtākṛtam | na kaścidvatsanābhasya yasya nopahataṃ manaḥ

"इस प्रकार धर्म को धारण करने वाले सभी लोग किए और न किए हुए का विचार करते हैं। हे वत्सनाभ, ऐसा कोई नहीं जिसका मन आहत न हुआ हो।"

श्लोक 25 (13.33.25)

यश्चानवद्यश्चरति शक्तो धर्मं च सर्वशः । निवर्तस्व महाप्राज्ञ पूतात्मा ह्यसि शाश्वतः ॥

yaścānavadyaścarati śakto dharmaṃ ca sarvaśaḥ | nivartasva mahāprājña pūtātmā hyasi śāśvataḥ

"जो निर्दोष रहकर सब प्रकार से धर्म का आचरण करने में समर्थ है, हे महाप्राज्ञ, तुम लौट आओ; तुम पवित्र आत्मा हो और शाश्वत हो।"

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