अनुशासन पर्व · अध्याय 34
भङ्गास्वन का स्त्री बनना: किसका सुख अधिक है
युधिष्ठिर पूछते हैं कि स्त्री-पुरुष के संयोग में किसे अधिक सुख मिलता है। भीष्म निःसन्तान राजा भङ्गास्वन की कथा सुनाते हैं, जिसने इन्द्र के अप्रिय अग्निष्टुत यज्ञ का अनुष्ठान किया। इन्द्र शिकार के समय उसे भ्रमित कर देते हैं, सरोवर में स्नान करते ही वह स्त्री बन जाता है, एक तपस्वी से सौ और पुत्र पाता है, और ब्राह्मण का वेश धरे इन्द्र उसके दो सौ पुत्रों को आपस में लड़वा देते हैं। तब इन्द्र प्रकट होकर वर देते हैं, और वह स्त्री ही बने रहना चुनती है, क्योंकि संयोग में स्त्री का सुख अधिक होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.34.1)
स्त्रीपुंसयोः सम्प्रयोगे स्पर्शः कस्याधिको भवेत् । एतस्मिन्संशये राजन्यथावद्वक्तुमर्हसि ॥
strīpuṃsayoḥ samprayoge sparśaḥ kasyādhiko bhavet | etasminsaṃśaye rājanyathāvadvaktumarhasi
स्त्री और पुरुष के संयोग में किसके स्पर्श का सुख अधिक होता है? हे राजन्, इस संशय के विषय में आप यथार्थ रूप से बताने की कृपा करें।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.34.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । भङ्गास्वनेन शक्रस्य यथा वैरमभूत्पुरा ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | bhaṅgāsvanena śakrasya yathā vairamabhūtpurā
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं कि प्राचीन काल में भङ्गास्वन का इन्द्र के साथ वैर कैसे हुआ।
श्लोक 3 (13.34.3)
पुरा भङ्गास्वनो नाम राजर्षिरतिधार्मिकः । अपुत्रः पुरुषव्याघ्र पुत्रार्थं यज्ञमाहरत् ॥
purā bhaṅgāsvano nāma rājarṣiratidhārmikaḥ | aputraḥ puruṣavyāghra putrārthaṃ yajñamāharat
पूर्वकाल में भङ्गास्वन नाम के एक अत्यन्त धर्मात्मा राजर्षि थे। हे पुरुषव्याघ्र, वे निःसन्तान थे, इसलिए उन्होंने पुत्र के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया।
श्लोक 4 (13.34.4)
अग्निष्टुतं स राजर्षिरिन्द्रद्विष्टं महाबलः । प्रायश्चित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते ॥
agniṣṭutaṃ sa rājarṣirindradviṣṭaṃ mahābalaḥ | prāyaścitteṣu martyānāṃ putrakāmeṣu ceṣyate
उन महाबली राजर्षि ने अग्निष्टुत यज्ञ किया, जो इन्द्र को अप्रिय है और पुत्र की कामना करने वाले मनुष्यों के प्रायश्चित्त-कर्मों में विहित है।
श्लोक 5 (13.34.5)
इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञं महाभागः सुरेश्वरः । अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्नियतात्मनः । न चैवास्यान्तरं राजन्स ददर्श महात्मनः ॥
indro jñātvā tu taṃ yajñaṃ mahābhāgaḥ sureśvaraḥ | antaraṃ tasya rājarṣeranvicchanniyatātmanaḥ | na caivāsyāntaraṃ rājansa dadarśa mahātmanaḥ
महाभाग देवेश्वर इन्द्र को उस यज्ञ का पता चला, तो वे उस संयमी राजर्षि की कोई कमजोरी खोजने लगे; परन्तु हे राजन्, उन महात्मा में उन्हें कोई कमजोरी दिखाई नहीं दी।
श्लोक 6 (13.34.6)
कस्य चित्त्वथ कालस्य मृगयां गतवान्नृपः । इदमन्तरमित्येव शक्रो नृपममोहयत् ॥
kasya cittvatha kālasya mṛgayāṃ gatavānnṛpaḥ | idamantaramityeva śakro nṛpamamohayat
कुछ समय बीतने पर राजा शिकार खेलने गया। 'यही अवसर है' ऐसा सोचकर इन्द्र ने राजा को मोहित कर दिया।
श्लोक 7 (13.34.7)
एकाश्वेन च राजर्षिर्भ्रान्त इन्द्रेण मोहितः । न दिशोऽविन्दत नृपः क्षुत्पिपासार्दितस्तदा ॥
ekāśvena ca rājarṣirbhrānta indreṇa mohitaḥ | na diśo'vindata nṛpaḥ kṣutpipāsārditastadā
इन्द्र द्वारा मोहित किया हुआ वह राजर्षि एक ही घोड़े पर भटकता रहा; भूख और प्यास से पीड़ित राजा को दिशाओं का ज्ञान न रहा।
श्लोक 8 (13.34.8)
इतश्चेतश्च धावन्वै श्रमतृष्णार्दितो नृप । सरोऽपश्यत्सुरुचिरं पूर्णं परमवारिणा ॥
itaścetaśca dhāvanvai śramatṛṣṇārdito nṛpa | saro'paśyatsuruciraṃ pūrṇaṃ paramavāriṇā
इधर-उधर दौड़ते हुए, थकान और प्यास से व्याकुल राजा ने उत्तम जल से भरा हुआ एक अत्यन्त सुन्दर सरोवर देखा।
श्लोक 9 (13.34.9)
सोऽवगाह्य सरस्तात पाययामास वाजिनम् ॥
so'vagāhya sarastāta pāyayāmāsa vājinam
हे तात, उसने सरोवर में उतरकर अपने घोड़े को पानी पिलाया।
श्लोक 10 (13.34.10)
अथ पीतोदकं सोऽश्वं वृक्षे बद्ध्वा नृपोत्तमः । अवगाह्य ततः स्नातस्तत्र स्त्रीत्वमवाप्तवान् ॥
atha pītodakaṃ so'śvaṃ vṛkṣe baddhvā nṛpottamaḥ | avagāhya tataḥ snātastatra strītvamavāptavān
फिर जब घोड़ा पानी पी चुका, तो उस श्रेष्ठ राजा ने उसे एक वृक्ष से बाँध दिया और सरोवर में उतरकर स्नान किया; वहीं वह स्त्री बन गया।
श्लोक 11 (13.34.11)
आत्मानं स्त्रीकृतं दृष्ट्वा व्रीडितो नृपसत्तमः । चिन्तानुगतसर्वात्मा व्याकुलेन्द्रियचेतनः ॥
ātmānaṃ strīkṛtaṃ dṛṣṭvā vrīḍito nṛpasattamaḥ | cintānugatasarvātmā vyākulendriyacetanaḥ
अपने को स्त्री बना हुआ देखकर वह श्रेष्ठ राजा लज्जित हो गया; उसका सारा मन चिन्ता में डूब गया और उसकी इन्द्रियाँ तथा चेतना व्याकुल हो उठीं।
श्लोक 12 (13.34.12)
आरोहिष्ये कथं त्वश्वं कथं यास्यामि वै पुरम् । इष्टेनाग्निष्टुता चापि पुत्राणां शतमौरसम् ॥
ārohiṣye kathaṃ tvaśvaṃ kathaṃ yāsyāmi vai puram | iṣṭenāgniṣṭutā cāpi putrāṇāṃ śatamaurasam
'मैं घोड़े पर कैसे चढ़ूँगा? अपने नगर को कैसे जाऊँगा? मेरे किए हुए अग्निष्टुत यज्ञ से मेरे अपने शरीर से उत्पन्न सौ महाबली पुत्र हुए हैं।
श्लोक 13 (13.34.13)
जातं महाबलानां मे तान्प्रवक्ष्यामि किन्न्वहम् । दारेषु चात्मकीयेषु पौरजानपदेषु च ॥
jātaṃ mahābalānāṃ me tānpravakṣyāmi kinnvaham | dāreṣu cātmakīyeṣu paurajānapadeṣu ca
उनसे, अपनी पत्नियों से और नगर तथा जनपद के लोगों से मैं क्या कहूँगा?
श्लोक 14 (13.34.14)
मृदुत्वं च तनुत्वं च पराधीनत्वमेव च । हासभावादि लावण्यं स्त्रीगुणाद्वा कुतूहलम् । स्त्रीगुणा ऋषिभिः प्रोक्ता धर्मतत्त्वार्थदर्शिभिः ॥
mṛdutvaṃ ca tanutvaṃ ca parādhīnatvameva ca | hāsabhāvādi lāvaṇyaṃ strīguṇādvā kutūhalam | strīguṇā ṛṣibhiḥ proktā dharmatattvārthadarśibhiḥ
कोमलता, सुकुमारता और पराधीनता; हास-भाव आदि, लावण्य और कुतूहल: ये स्त्री के गुण हैं, जैसा धर्म के तत्त्व और अर्थ को देखने वाले ऋषियों ने कहा है।
श्लोक 15 (13.34.15)
व्यायामः कर्कशत्वं च वीर्यं च पुरुषे गुणाः ॥
vyāyāmaḥ karkaśatvaṃ ca vīryaṃ ca puruṣe guṇāḥ
परिश्रम, कठोरता और पराक्रम पुरुष के गुण हैं।
श्लोक 16 (13.34.16)
पौरुषं विप्रनष्टं स्त्रीत्वं केनापि मेऽभवत् । स्त्रीभावात्पुनरश्वं तं कथमारोढुमुत्सहे ॥
pauruṣaṃ vipranaṣṭaṃ strītvaṃ kenāpi me'bhavat | strībhāvātpunaraśvaṃ taṃ kathamāroḍhumutsahe
'मेरा पुरुषत्व सर्वथा नष्ट हो गया है; किसी कारण मुझे स्त्रीत्व प्राप्त हो गया है। स्त्री-भाव में आकर अब उस घोड़े पर फिर कैसे चढ़ने का साहस करूँ?'
श्लोक 17 (13.34.17)
महता त्वथ खेदेन आरुह्याश्वं नराधिपः । पुनरायात्पुरं तात स्त्रीभूतो नृपसत्तमः ॥
mahatā tvatha khedena āruhyāśvaṃ narādhipaḥ | punarāyātpuraṃ tāta strībhūto nṛpasattamaḥ
फिर बड़े कष्ट से घोड़े पर चढ़कर वह श्रेष्ठ राजा, स्त्री-रूप में ही, हे तात, नगर को लौट आया।
श्लोक 18 (13.34.18)
पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च पौरजानपदाश्च ते । किन्न्विदं त्विति विज्ञाय विस्मयं परमं गताः ॥
putrā dārāśca bhṛtyāśca paurajānapadāśca te | kinnvidaṃ tviti vijñāya vismayaṃ paramaṃ gatāḥ
उसके पुत्र, पत्नियाँ, सेवक तथा नगर और जनपद के लोग, 'यह क्या है?' ऐसा सोचकर बड़े विस्मय में पड़ गए।
श्लोक 19 (13.34.19)
अथोवाच स राजर्षिः स्त्रीभूतो वदतांवरः । मृगयामस्मि निर्यातो बलैः परिवृतो दृढम् । उद्भान्तः प्राविशं घोरामटवीं दैवमोहितः ॥
athovāca sa rājarṣiḥ strībhūto vadatāṃvaraḥ | mṛgayāmasmi niryāto balaiḥ parivṛto dṛḍham | udbhāntaḥ prāviśaṃ ghorāmaṭavīṃ daivamohitaḥ
तब वक्ताओं में श्रेष्ठ उस स्त्री-रूप राजर्षि ने कहा: 'मैं सेना से घिरा हुआ शिकार के लिए निकला था; दैव से मोहित होकर भटकता हुआ मैं एक भयंकर वन में जा पहुँचा।
स्त्र्युवाच
श्लोक 20 (13.34.20)
अटव्यां च सुघोरायां तृष्णार्तो नष्टचेतनः । सरः सुरुचिरप्रख्यमपश्यं पक्षिभिर्वृतम् ॥
aṭavyāṃ ca sughorāyāṃ tṛṣṇārto naṣṭacetanaḥ | saraḥ suruciraprakhyamapaśyaṃ pakṣibhirvṛtam
उस अत्यन्त भयंकर वन में प्यास से व्याकुल और अचेत होकर मैंने पक्षियों से भरा हुआ एक अति सुन्दर सरोवर देखा।
श्लोक 21 (13.34.21)
तत्रावगाढः स्त्रीभूतो व्यक्तं दैवान्न संशयः । अतृप्त एव पुत्राणां दाराणां च धनस्य च ॥
tatrāvagāḍhaḥ strībhūto vyaktaṃ daivānna saṃśayaḥ | atṛpta eva putrāṇāṃ dārāṇāṃ ca dhanasya ca
वहाँ स्नान करते ही मैं स्त्री हो गया, यह निश्चय ही दैव की बात है, इसमें सन्देह नहीं; और पुत्रों, पत्नियों तथा धन की ओर से मेरी तृप्ति नहीं हुई।'
भीष्म उवाच
श्लोक 22 (13.34.22)
नामगोत्राणि चाभाष्य दाराणां मन्त्रिणां तथा । आह पुत्रांस्ततः सोऽथ स्त्रीभूतः पार्थिवोत्तमः । सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रकाः ॥
nāmagotrāṇi cābhāṣya dārāṇāṃ mantriṇāṃ tathā | āha putrāṃstataḥ so'tha strībhūtaḥ pārthivottamaḥ | samprītyā bhujyatāṃ rājyaṃ vanaṃ yāsyāmi putrakāḥ
अपनी पत्नियों और मन्त्रियों को अपना नाम और गोत्र बताकर वह श्रेष्ठ राजा, जो अब स्त्री हो चुका था, पुत्रों से बोला: 'हे पुत्रो, तुम सब प्रेम से राज्य का भोग करो; मैं वन को जाऊँगा।'
श्लोक 23 (13.34.23)
स पुत्राणां शतं राजा अभिषिच्य वनं गतः । गत्वा चैवाश्रमं सा तु तापसं प्रत्यपद्यत ॥
sa putrāṇāṃ śataṃ rājā abhiṣicya vanaṃ gataḥ | gatvā caivāśramaṃ sā tu tāpasaṃ pratyapadyata
राजा अपने सौ पुत्रों का अभिषेक करके वन को चला गया। आश्रम में पहुँचकर उस स्त्री ने एक तपस्वी को पति रूप में स्वीकार कर लिया।
श्लोक 24 (13.34.24)
तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम् । अथ साऽऽदाय तान्सर्वान्पूर्वपुत्रानभाषत ॥
tāpasenāsya putrāṇāmāśrameṣvabhavacchatam | atha sā''dāya tānsarvānpūrvaputrānabhāṣata
उस तपस्वी से आश्रमों में उसके सौ पुत्र उत्पन्न हुए। फिर वह उन सबको लेकर अपने पहले के पुत्रों से बोली।
श्लोक 25 (13.34.25)
पुरुषत्वे सुता यूयं स्त्रीत्वे चेमे शतं सुताः । एकत्र भुज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रकाः ॥
puruṣatve sutā yūyaṃ strītve ceme śataṃ sutāḥ | ekatra bhujyatāṃ rājyaṃ bhrātṛbhāvena putrakāḥ
'पुरुष-रूप में तुम मेरे पुत्र थे, और स्त्री-रूप में ये सौ मेरे पुत्र हैं। हे पुत्रो, तुम सब भाई-भाई की तरह मिलकर राज्य का भोग करो।'
श्लोक 26 (13.34.26)
सहिता भ्रातरस्तेऽथ राज्यं बुभुजिरे तदा ॥
sahitā bhrātaraste'tha rājyaṃ bubhujire tadā
तब वे भाई साथ-साथ राज्य का भोग करने लगे।
श्लोक 27 (13.34.27)
तान्दृष्ट्वा भ्रातृभावेन भुञ्जानान्राज्यमुत्तमम् । चिन्तयामास देवेन्द्रो मन्युनाऽथ परिप्लुतः । उपकारोऽस्य राजर्षेः कृतो नापकृतं मया ॥
tāndṛṣṭvā bhrātṛbhāvena bhuñjānānrājyamuttamam | cintayāmāsa devendro manyunā'tha pariplutaḥ | upakāro'sya rājarṣeḥ kṛto nāpakṛtaṃ mayā
उन्हें भाइयों की तरह मिलकर उस उत्तम राज्य का भोग करते देखकर देवेन्द्र क्रोध से भर गए और सोचने लगे: 'मैंने इस राजर्षि का उपकार ही किया है, अपकार नहीं किया।'
श्लोक 28 (13.34.28)
ततो ब्राह्मणरूपेण देवराजः शतक्रतुः । भेदयामास तान्गत्वा नगरं वै नृपात्मजान् ॥
tato brāhmaṇarūpeṇa devarājaḥ śatakratuḥ | bhedayāmāsa tāngatvā nagaraṃ vai nṛpātmajān
तब देवराज शतक्रतु ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और नगर में जाकर राजकुमारों में फूट डाल दी।
शक्र उवाच
श्लोक 29 (13.34.29)
भ्रातृणां नास्ति सौभ्रात्रं येऽप्येकस्य पितुः सुताः । कश्यपस्य सुराश्चैव असुराश्च सुतास्तथा ॥
bhrātṛṇāṃ nāsti saubhrātraṃ ye'pyekasya pituḥ sutāḥ | kaśyapasya surāścaiva asurāśca sutāstathā
'भाइयों में सच्चा भाईचारा नहीं होता, चाहे वे एक ही पिता के पुत्र हों। देवता और असुर भी तो कश्यप के ही पुत्र थे।
श्लोक 30 (13.34.30)
राज्यहेतोर्विवदिताः कश्यपस्य सुरासुराः । यूयं भङ्गास्वनापत्यास्तापसस्येतरे सुताः ॥
rājyahetorvivaditāḥ kaśyapasya surāsurāḥ | yūyaṃ bhaṅgāsvanāpatyāstāpasasyetare sutāḥ
राज्य के लिए कश्यप के पुत्र देवता और असुर आपस में झगड़े थे। तुम भङ्गास्वन की सन्तान हो, और दूसरे उस तपस्वी के पुत्र हैं।'
भीष्म उवाच
श्लोक 31 (13.34.31)
युष्माकं भेदितास्ते तु युद्धेऽन्योन्यमपातयन् । तच्छ्रुत्वा तापसी चापि संतप्ता प्ररुरोद ह ॥
yuṣmākaṃ bheditāste tu yuddhe'nyonyamapātayan | tacchrutvā tāpasī cāpi saṃtaptā praruroda ha
इस प्रकार फूट डाले जाने पर तुममें से वे आपस में युद्ध करके एक-दूसरे को मार गिराने लगे। यह सुनकर वह तपस्वी की पत्नी भी सन्तप्त होकर रोने लगी।
श्लोक 32 (13.34.32)
ब्राह्मणच्छद्मनाऽभ्येत्य तामिन्द्रोऽथान्वपृच्छत । केन दुःखेन संतप्ता रोदिषि त्वं वरानने ॥
brāhmaṇacchadmanā'bhyetya tāmindro'thānvapṛcchata | kena duḥkhena saṃtaptā rodiṣi tvaṃ varānane
ब्राह्मण का वेश बनाकर इन्द्र ने उसके पास जाकर पूछा: 'हे सुन्दर मुख वाली, तुम किस दुःख से सन्तप्त होकर रो रही हो?'
श्लोक 33 (13.34.33)
ब्राह्मणं तं ततो दृष्ट्वा सा स्त्री करुणमब्रवीत् । पुत्राणां द्वे शते ब्रह्मन्कालेन विनिपातिते ॥
brāhmaṇaṃ taṃ tato dṛṣṭvā sā strī karuṇamabravīt | putrāṇāṃ dve śate brahmankālena vinipātite
उस ब्राह्मण को देखकर उस स्त्री ने करुण स्वर में कहा: 'हे ब्राह्मण, काल के द्वारा मेरे दो सौ पुत्र मारे गए हैं।
स्त्र्युवाच
श्लोक 34 (13.34.34)
अहं राजाऽभवं विप्र तत्र पूर्वं शतं मम । समुत्पन्नं सुरूपाणां पुत्राणां ब्राह्मणोत्तम ॥
ahaṃ rājā'bhavaṃ vipra tatra pūrvaṃ śataṃ mama | samutpannaṃ surūpāṇāṃ putrāṇāṃ brāhmaṇottama
हे ब्राह्मण, पहले मैं राजा था, और उस जन्म में मेरे सौ सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुए थे, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ।
श्लोक 35 (13.34.35)
कदाचिन्मृगयां यात उद्भ्रान्तो गहने वने । अवगाढश्च सरसि स्त्रीभूतो ब्राह्मणोत्तम ॥
kadācinmṛgayāṃ yāta udbhrānto gahane vane | avagāḍhaśca sarasi strībhūto brāhmaṇottama
एक बार शिकार के लिए जाकर मैं घने वन में भटक गई, और सरोवर में डुबकी लगाते ही मैं स्त्री हो गई, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ।
श्लोक 36 (13.34.36)
पुत्रान्राज्ये प्रतिष्ठाप्य वनमस्मि ततो गतः ॥
putrānrājye pratiṣṭhāpya vanamasmi tato gataḥ
तब अपने पुत्रों को राज्य पर बिठाकर मैं वन को चली गई।
श्लोक 37 (13.34.37)
स्त्रियाश्च मे पुत्रशतं तापसेन महात्मना । आश्रमे जनितं ब्रह्मन्नीतं तन्नगरं मया ॥
striyāśca me putraśataṃ tāpasena mahātmanā | āśrame janitaṃ brahmannītaṃ tannagaraṃ mayā
वहाँ उन महात्मा तपस्वी से आश्रम में मुझे भी सौ पुत्र हुए, हे ब्राह्मण, और उन्हें मैं नगर में ले आई।
श्लोक 38 (13.34.38)
तेषां च वैरमुत्पन्नं कालयोगेन वै द्विज । एतच्छोचाम्यहं ब्रह्मन्दैवेन समभिप्लुता ॥
teṣāṃ ca vairamutpannaṃ kālayogena vai dvija | etacchocāmyahaṃ brahmandaivena samabhiplutā
हे द्विज, काल के योग से उनमें वैर उत्पन्न हो गया। इसी का मुझे शोक है, हे ब्राह्मण; मैं दैव से अभिभूत हूँ।'
भीष्म उवाच
श्लोक 39 (13.34.39)
इन्द्रस्तां दुःखितां दृष्ट्वा अब्रवीत्परुषं वचः ॥
indrastāṃ duḥkhitāṃ dṛṣṭvā abravītparuṣaṃ vacaḥ
उसे इस प्रकार दुखी देखकर इन्द्र ने उससे कठोर वचन कहे।
शक्र उवाच
श्लोक 40 (13.34.40)
पुरा सुदुःसहं भद्रे मम दुःखं त्वया कृतम् । इन्द्रद्विष्टेन यजता मामनाहूय धिष्ठितम् । इन्द्रोऽहमस्मि दुर्बुद्धे वैरं ते पातितं मया ॥
purā suduḥsahaṃ bhadre mama duḥkhaṃ tvayā kṛtam | indradviṣṭena yajatā māmanāhūya dhiṣṭhitam | indro'hamasmi durbuddhe vairaṃ te pātitaṃ mayā
'हे भद्रे, पहले तुमने मुझे अत्यन्त असह्य दुःख दिया था: इन्द्र को अप्रिय यज्ञ करते हुए तुमने मुझे आमन्त्रित किए बिना उसे सम्पन्न किया। हे दुर्बुद्धे, मैं इन्द्र हूँ; तुम्हारे उस वैर का फल मैंने तुम्हीं पर गिराया है।'
भीष्म उवाच
श्लोक 41 (13.34.41)
इन्द्रं दृष्ट्वा तु राजर्षिः पादयोः शिरसा गतः । प्रसीद त्रिदशश्रेष्ठ पुत्रकामेन स क्रतुः । इष्टस्त्रिदशशार्दूल तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ॥
indraṃ dṛṣṭvā tu rājarṣiḥ pādayoḥ śirasā gataḥ | prasīda tridaśaśreṣṭha putrakāmena sa kratuḥ | iṣṭastridaśaśārdūla tatra me kṣantumarhasi
इन्द्र को देखकर राजर्षि ने उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया: 'हे देवश्रेष्ठ, प्रसन्न हों! वह यज्ञ पुत्र की कामना से किया गया था; हे देवताओं में सिंह, उसके लिए आप मुझे क्षमा करें।'
श्लोक 42 (13.34.42)
प्रणिपातेन तस्येन्द्रः परितुष्टो वरं ददौ ॥
praṇipātena tasyendraḥ parituṣṭo varaṃ dadau
उसके प्रणाम से सन्तुष्ट होकर इन्द्र ने वर देना चाहा।
शक्र उवाच
श्लोक 43 (13.34.43)
पुत्रास्ते कतमे राजञ्जीवन्त्वेतत्प्रचक्ष्व मे । स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः पुरुषस्याथ येऽभवन् ॥
putrāste katame rājañjīvantvetatpracakṣva me | strībhūtasya hi ye jātāḥ puruṣasyātha ye'bhavan
'हे राजन्, तुम्हारे कौन-से पुत्र जीवित हों? यह मुझे बताओ: जो तुम्हें स्त्री बन जाने पर हुए, या जो पुरुष-रूप में हुए थे?'
भीष्म उवाच
श्लोक 44 (13.34.44)
तापसी तु ततः शक्रमुवाच प्रयताञ्जलिः । स्त्रीभूतस्य हि ये पुत्रास्ते मे जीवन्तु वासव ॥
tāpasī tu tataḥ śakramuvāca prayatāñjaliḥ | strībhūtasya hi ye putrāste me jīvantu vāsava
तब तपस्विनी ने हाथ जोड़कर इन्द्र से कहा: 'हे वासव, स्त्री बन जाने पर जो मेरे पुत्र हुए, वे जीवित हो जाएँ।'
श्लोक 45 (13.34.45)
इन्द्रस्तु विस्मितो दृष्ट्वा स्त्रियं पप्रच्छ तां पुनः । पुरुषोत्पादिता ये ते कथं द्वेष्याः सुतास्तव ॥
indrastu vismito dṛṣṭvā striyaṃ papraccha tāṃ punaḥ | puruṣotpāditā ye te kathaṃ dveṣyāḥ sutāstava
विस्मित होकर इन्द्र ने उस स्त्री को देखा और फिर पूछा: 'पुरुष-रूप में तुमसे जो पुत्र उत्पन्न हुए, वे तुम्हें अप्रिय क्यों हैं?
शक्र उवाच
श्लोक 46 (13.34.46)
स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः स्नेहस्तेभ्योऽधिकः कथम् । कारणं श्रोतुमिच्छामि तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥
strībhūtasya hi ye jātāḥ snehastebhyo'dhikaḥ katham | kāraṇaṃ śrotumicchāmi tanme vaktumihārhasi
जो स्त्री बनने पर उत्पन्न हुए, उन पर तुम्हारा स्नेह अधिक क्यों है? मैं कारण सुनना चाहता हूँ; तुम मुझे बताओ।'
स्त्र्युवाच
श्लोक 47 (13.34.47)
स्त्रियास्त्वभ्यधिकः स्नेहो न तथा पुरुषस्य वै । तस्मात्ते शक्र जीवन्तु ये जाताः स्त्रीकृतस्य वै ॥
striyāstvabhyadhikaḥ sneho na tathā puruṣasya vai | tasmātte śakra jīvantu ye jātāḥ strīkṛtasya vai
'स्त्री का स्नेह अधिक होता है, पुरुष का वैसा नहीं होता। इसलिए, हे शक्र, जो पुत्र स्त्री बने हुए मुझसे उत्पन्न हुए हैं, वे जीवित रहें।'
भीष्म उवाच
श्लोक 48 (13.34.48)
एवमुक्तस्ततस्त्विन्द्रः प्रीतो वाक्यमुवाच ह । सर्व एवेह जीवन्तु पुत्रास्ते सत्यवादिनि ॥
evamuktastatastvindraḥ prīto vākyamuvāca ha | sarva eveha jīvantu putrāste satyavādini
यह सुनकर इन्द्र प्रसन्न हुए और बोले: 'हे सत्यवादिनी, तुम्हारे सभी पुत्र जीवित हो जाएँ।
शक्र उवाच
श्लोक 49 (13.34.49)
वरं च वृणु राजेन्द्र यं त्वमिच्छसि सुव्रत । पुरुषत्वमथ स्त्रीत्वं मत्तो यदभिकाङ्क्षसे ॥
varaṃ ca vṛṇu rājendra yaṃ tvamicchasi suvrata | puruṣatvamatha strītvaṃ matto yadabhikāṅkṣase
और हे राजेन्द्र, हे सुव्रत, जो चाहो वह वर माँग लो: पुरुषत्व या स्त्रीत्व, जो मुझसे चाहो।'
स्त्र्युवाच
श्लोक 50 (13.34.50)
स्त्रीत्वमेव वृणे शक्र पुंस्त्वं नेच्छामि वासव । एवमुक्तस्तु देवेन्द्रस्तां स्त्रियं प्रत्युवाच ह ॥
strītvameva vṛṇe śakra puṃstvaṃ necchāmi vāsava | evamuktastu devendrastāṃ striyaṃ pratyuvāca ha
'हे शक्र, मैं स्त्रीत्व ही चुनती हूँ; हे वासव, मुझे पुरुषत्व नहीं चाहिए।' ऐसा कहे जाने पर देवेन्द्र ने उस स्त्री से कहा:
भीष्म उवाच
श्लोक 51 (13.34.51)
पुरुषत्वं कथं त्यक्त्वा स्त्रीत्वं रोचयसे विभो । एवमुक्तः प्रत्युवाच स्त्रीभूतो राजसत्तमः ॥
puruṣatvaṃ kathaṃ tyaktvā strītvaṃ rocayase vibho | evamuktaḥ pratyuvāca strībhūto rājasattamaḥ
'हे विभो, पुरुषत्व छोड़कर तुम स्त्रीत्व को क्यों पसन्द करती हो?' ऐसा कहे जाने पर स्त्री बने हुए उस राजश्रेष्ठ ने उत्तर दिया:
स्त्र्युवाच
श्लोक 52 (13.34.52)
स्त्रियाः पुरुषसंयोगे प्रीतिरभ्यधिका सदा । एतस्मात्कारणाच्छक्र स्त्रीत्वमेव वृणोम्यहम् ॥
striyāḥ puruṣasaṃyoge prītirabhyadhikā sadā | etasmātkāraṇācchakra strītvameva vṛṇomyaham
'पुरुष के संयोग में स्त्री को सदा अधिक प्रीति होती है। इसी कारण, हे शक्र, मैं स्त्रीत्व ही चुनती हूँ।
श्लोक 53 (13.34.53)
रमे चाधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम । स्त्रीभावेन हि तुष्यामि गम्यतां त्रिदशाधिप ॥
rame cādhikaṃ strītve satyaṃ vai devasattama | strībhāvena hi tuṣyāmi gamyatāṃ tridaśādhipa
हे देवश्रेष्ठ, सच तो यह है कि स्त्रीत्व में मुझे अधिक आनन्द मिलता है। मैं स्त्री-भाव से ही सन्तुष्ट हूँ; हे देवाधिप, आप जा सकते हैं।'
भीष्म उवाच
श्लोक 54 (13.34.54)
एवमस्त्विति चोक्त्वा तामापृच्छ्य त्रिदिवं गतः । एवं स्त्रिया महाराज अधिका प्रीतिरुच्यते ॥
evamastviti coktvā tāmāpṛcchya tridivaṃ gataḥ | evaṃ striyā mahārāja adhikā prītirucyate
'ऐसा ही हो' कहकर और उससे विदा लेकर इन्द्र स्वर्ग को चले गए। इस प्रकार, हे महाराज, स्त्री की प्रीति अधिक बताई जाती है।