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अनुशासन पर्व · अध्याय 263

भीष्म का युधिष्ठिर को कृष्ण के पास भेजना

युधिष्ठिर पूछते हैं कि ब्राह्मणों की पूजा का क्या फल है। भीष्म अपने बल और इन्द्रियों को क्षीण होता देख कहते हैं कि इसे कृष्ण समझाएँगे, और फिर कृष्ण की विस्तार से स्तुति करते हैं: वे जगत् के रचयिता और धारणकर्ता हैं, वराह हैं, सूर्य हैं, संवत्सर और उसके विभाग हैं, पंचमहाभूत हैं, तथा वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के चतुर्व्यूह रूप हैं।

अध्याय 262अध्याय-सूचीअध्याय 264

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.263.1)

ब्राह्मणानर्चसे राजन्सततं संशितव्रतान् । कं तु धर्मोदयं दृष्ट्वा तानर्चसि जनाधिप ॥

brāhmaṇānarcase rājansatataṃ saṃśitavratān | kaṃ tu dharmodayaṃ dṛṣṭvā tānarcasi janādhipa

हे राजन्, आप कठोर व्रत वाले ब्राह्मणों का निरन्तर सम्मान करते हैं। हे नरेश्वर, उनमें धर्म की कौन-सी उन्नति देखकर आप उनकी पूजा करते हैं?

श्लोक 2 (13.263.2)

कां वा ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्ट्वा महाव्रत । तानर्चसि महाबाहो सर्वमेतद्वदस्व मे ॥

kāṃ vā brāhmaṇapūjāyāṃ vyuṣṭiṃ dṛṣṭvā mahāvrata | tānarcasi mahābāho sarvametadvadasva me

अथवा हे महाव्रती, हे महाबाहो, ब्राह्मणों की पूजा का कौन-सा फल देखकर आप उनकी पूजा करते हैं? यह सब मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.263.3)

एष ते केशवः सर्वमाख्यास्यति महामतिः । व्युष्टिं ब्राह्मणपूजायां दृष्ट्वा व्युष्टिं महाव्रत ॥

eṣa te keśavaḥ sarvamākhyāsyati mahāmatiḥ | vyuṣṭiṃ brāhmaṇapūjāyāṃ dṛṣṭvā vyuṣṭiṃ mahāvrata

ये महाबुद्धिमान् केशव तुम्हें सब कुछ बताएँगे। हे महाव्रती, ब्राह्मणों की पूजा का फल इन्होंने स्वयं देखा है, वही ये तुम्हें समझाएँगे।

श्लोक 4 (13.263.4)

बलं श्रोत्रे वाङ्मनश्चक्षुषी च । ज्ञानं तथा न विशुद्धं ममाद्य । देहन्यासो नातिचिरान्मतो मे । न चातितूर्णं सविताऽद्य याति ॥

balaṃ śrotre vāṅmanaścakṣuṣī ca | jñānaṃ tathā na viśuddhaṃ mamādya | dehanyāso nāticirānmato me | na cātitūrṇaṃ savitā'dya yāti

आज मेरा बल, मेरे कान, वाणी, मन और आँखें, तथा मेरा ज्ञान भी निर्मल नहीं रहा। मुझे लगता है कि देह छोड़ने का समय अब दूर नहीं है, और आज सूर्य भी बहुत शीघ्र नहीं चल रहा।

श्लोक 5 (13.263.5)

उक्ता धर्मा ये पुराणे महान्तो । राजन्विप्राणां क्षत्रियाणां विशां च । येये शूद्राणां धर्ममुपासते ते । तानेव कृष्णादुपशिक्षस्व पार्थः ॥

uktā dharmā ye purāṇe mahānto | rājanviprāṇāṃ kṣatriyāṇāṃ viśāṃ ca | yeye śūdrāṇāṃ dharmamupāsate te | tāneva kṛṣṇādupaśikṣasva pārthaḥ

हे राजन्, पुराण में ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के जो महान् धर्म कहे गए हैं, और जिन्हें शूद्रों के धर्म का पालन करने वाले निभाते हैं, उन सबको तुम कृष्ण से ही सीखो, हे पार्थ।

श्लोक 6 (13.263.6)

अहं ह्येनं वेद्मि तत्त्वेन कृष्णं । योऽयं हि यच्चास्य बलं पुराणम् । अमेयात्मा केशवः कौरवेन्द्र । सोयं धर्मं वक्ष्यति सर्वमेतत् ॥

ahaṃ hyenaṃ vedmi tattvena kṛṣṇaṃ | yo'yaṃ hi yaccāsya balaṃ purāṇam | ameyātmā keśavaḥ kauravendra | soyaṃ dharmaṃ vakṣyati sarvametat

मैं इन कृष्ण को यथार्थ रूप से जानता हूँ, कि ये कौन हैं और इनका पुरातन बल क्या है। हे कुरुश्रेष्ठ, केशव अपरिमेय आत्मा वाले हैं; वे ही यह सारा धर्म तुम्हें बताएँगे।

श्लोक 7 (13.263.7)

कृष्णः पृथ्वीमसृजत्स्वं दिवं च । कृष्णस्य देहान्मेदिनी सम्बभूव । वराहोऽयं भीमबलः पुराणः । स पर्वतान्व्यसृजद्वै दिशश्च ॥

kṛṣṇaḥ pṛthvīmasṛjatsvaṃ divaṃ ca | kṛṣṇasya dehānmedinī sambabhūva | varāho'yaṃ bhīmabalaḥ purāṇaḥ | sa parvatānvyasṛjadvai diśaśca

कृष्ण ने पृथ्वी और अपने स्वर्ग की सृष्टि की; कृष्ण के शरीर से ही पृथ्वी उत्पन्न हुई। यही वह भयंकर बल वाले पुरातन वराह हैं; उन्होंने पर्वतों और दिशाओं की रचना की।

श्लोक 8 (13.263.8)

अस्माद्वायुश्चान्तरिक्षं दिवं च । दिशश्चतस्रो विदिशश्चतस्रः । सृष्टिस्तथैवेयमनुप्रसूता । स निर्ममे विश्वमिदं पुराणः ॥

asmādvāyuścāntarikṣaṃ divaṃ ca | diśaścatasro vidiśaścatasraḥ | sṛṣṭistathaiveyamanuprasūtā | sa nirmame viśvamidaṃ purāṇaḥ

इन्हीं से वायु, अन्तरिक्ष और स्वर्ग हुए, चार दिशाएँ और चार उपदिशाएँ हुईं। इसी प्रकार यह सृष्टि भी उन्हीं से उत्पन्न हुई; उन पुरातन पुरुष ने इस सारे विश्व की रचना की।

श्लोक 9 (13.263.9)

अस्य नाभ्यां पुष्करं सम्प्रसूतं । यत्रोत्पन्नः स्वयमेवामितौजाः । येनाच्छिन्नं तत्तमः पार्थ घोरं । यत्र तिष्ठन्त्यर्णवास्तच्छयानाः ॥

asya nābhyāṃ puṣkaraṃ samprasūtaṃ | yatrotpannaḥ svayamevāmitaujāḥ | yenācchinnaṃ tattamaḥ pārtha ghoraṃ | yatra tiṣṭhantyarṇavāstacchayānāḥ

इनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ, जिसमें अमित तेज वाले ब्रह्मा स्वयं प्रकट हुए। हे पार्थ, उन्हीं ने उस घोर अन्धकार को चीर डाला, जिसमें समुद्र सोये पड़े हैं।

श्लोक 10 (13.263.10)

कृते युगे धर्म आसीत्समग्र- । स्त्रेताकाले यज्ञमनुप्रपन्नः । बलं त्वासीद्द्वापरे पार्थ कृष्णः । कलौ त्वधर्मः क्षितिमेवाजगाम ॥

kṛte yuge dharma āsītsamagra- | stretākāle yajñamanuprapannaḥ | balaṃ tvāsīddvāpare pārtha kṛṣṇaḥ | kalau tvadharmaḥ kṣitimevājagāma

कृतयुग में धर्म पूर्ण था; त्रेता में वह यज्ञ में प्रवृत्त हुआ। हे पार्थ, द्वापर में बल रहा, और स्वयं कृष्ण भी; पर कलियुग में अधर्म पृथ्वी पर छा गया।

श्लोक 11 (13.263.11)

स एव पूर्वं निजघान दैत्या- । न्स एव देवश्च बभूव सम्राट् । स भूतानां भावनो भूतभव्यः । स विश्वस्यास्य जगतश्चाभिगोप्ताः ॥

sa eva pūrvaṃ nijaghāna daityā- | nsa eva devaśca babhūva samrāṭ | sa bhūtānāṃ bhāvano bhūtabhavyaḥ | sa viśvasyāsya jagataścābhigoptāḥ

पूर्वकाल में उन्होंने ही दैत्यों का वध किया और वे ही सम्राट् देवता हुए। वे प्राणियों के उत्पत्तिकर्ता हैं, भूत और भविष्य सब वही हैं, और इस सम्पूर्ण जगत् के रक्षक हैं।

श्लोक 12 (13.263.12)

यदा धर्मो ग्लाति वंशे सुराणां । तदा कृष्णो जायते मानुषेषु । धर्मे स्थित्वा स तु वै भावितात्मा । परांश्च लोकानपराश्च पाति ॥

yadā dharmo glāti vaṃśe surāṇāṃ | tadā kṛṣṇo jāyate mānuṣeṣu | dharme sthitvā sa tu vai bhāvitātmā | parāṃśca lokānaparāśca pāti

जब देवताओं के वंश में धर्म क्षीण होने लगता है, तब कृष्ण मनुष्यों में जन्म लेते हैं। धर्म में स्थित वे शुद्धात्मा परलोकों और इस लोक, दोनों की रक्षा करते हैं।

श्लोक 13 (13.263.13)

त्याज्यांस्त्यक्त्वा चासुराणां वधेन । कार्याकार्ये कारणं चैव पाति । कृतं करिष्यत्क्रियते च देवो । राहुं सोमं विद्धि च शक्रमेनम् ॥

tyājyāṃstyaktvā cāsurāṇāṃ vadhena | kāryākārye kāraṇaṃ caiva pāti | kṛtaṃ kariṣyatkriyate ca devo | rāhuṃ somaṃ viddhi ca śakramenam

त्याज्य को छोड़कर, असुरों का वध करके, वे करने और न करने योग्य कर्मों के आधार की रक्षा करते हैं। वे देव जो हो चुका, जो होगा और जो हो रहा है, सबके कर्ता हैं; उन्हें ही राहु, सोम और इस शक्र के रूप में जानो।

श्लोक 14 (13.263.14)

स विश्वकर्मा स हि विश्वरूपः । स विश्वबुग्विश्वसृग्विश्वजिच्च । स शूलभृच्छोणितभृत्कराल- । स्तं कर्मभिर्विदितं वै स्तुवन्ति ॥

sa viśvakarmā sa hi viśvarūpaḥ | sa viśvabugviśvasṛgviśvajicca | sa śūlabhṛcchoṇitabhṛtkarāla- | staṃ karmabhirviditaṃ vai stuvanti

वे विश्वकर्मा हैं और विश्वरूप हैं; वे सब कुछ जानने वाले, सबके रचयिता और सबको जीतने वाले हैं। वे शूलधारी हैं, रक्त धारण करने वाले हैं, भयंकर हैं; इस प्रकार लोग उनके कर्मों से उन्हें जानकर उनकी स्तुति करते हैं।

श्लोक 15 (13.263.15)

तं गन्धर्वाणामप्सरसां च नित्य- । मुपतिष्ठन्ते विबुधानां शतानि । तं राक्षसाश्च परिसंवदन्ति । राजन्यानां स विजिगीषुरेकः ॥

taṃ gandharvāṇāmapsarasāṃ ca nitya- | mupatiṣṭhante vibudhānāṃ śatāni | taṃ rākṣasāśca parisaṃvadanti | rājanyānāṃ sa vijigīṣurekaḥ

गन्धर्व और अप्सराएँ नित्य उनकी सेवा में रहते हैं, और सैकड़ों देवता भी; राक्षस भी उनके चारों ओर वार्तालाप करते हैं। राजाओं में वे अकेले ही विजय की इच्छा रखने वाले हैं।

श्लोक 16 (13.263.16)

तमध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति । रथन्तरे सामगाश्च स्तुवन्ति । तं ब्राह्मणा ब्रह्ममन्त्रैः स्तुवन्ति । तस्मै हविरध्वर्यवः कल्पयन्ति ॥

tamadhvare śaṃsitāraḥ stuvanti | rathantare sāmagāśca stuvanti | taṃ brāhmaṇā brahmamantraiḥ stuvanti | tasmai haviradhvaryavaḥ kalpayanti

यज्ञ में शंसिता ऋत्विज् उनकी स्तुति करते हैं; रथन्तर साम में सामगान करने वाले उनकी स्तुति करते हैं; ब्राह्मण वेदमन्त्रों से उनकी स्तुति करते हैं, और अध्वर्यु उन्हीं के लिए हवि तैयार करते हैं।

श्लोक 17 (13.263.17)

स पौराणीं ब्रह्मगुहां प्रविष्टो । महीसत्रं भारताग्रे ददर्श । स चैव गामुद्दधाराग्र्यकर्मा । विक्षोभ्य दैत्यानुरगान्दानवांश्च ॥

sa paurāṇīṃ brahmaguhāṃ praviṣṭo | mahīsatraṃ bhāratāgre dadarśa | sa caiva gāmuddadhārāgryakarmā | vikṣobhya daityānuragāndānavāṃśca

प्राचीन ब्रह्मगुहा में प्रवेश करके उन्होंने, हे भारत, आरम्भ में पृथ्वी का जल में डूबना देखा। और श्रेष्ठ कर्म करने वाले उन्होंने दैत्यों, सर्पों और दानवों को विचलित करके पृथ्वी का उद्धार किया।

श्लोक 18 (13.263.18)

तं घोषार्थे गीर्भिरिन्द्राः स्तुवन्ति । स चापीशो भारतैकः पशूनाम् । तस्य भक्षान्विविधान्वेदयन्ति । तमेवाजौ वाहनं वेदयन्ति ॥

taṃ ghoṣārthe gīrbhirindrāḥ stuvanti | sa cāpīśo bhārataikaḥ paśūnām | tasya bhakṣānvividhānvedayanti | tamevājau vāhanaṃ vedayanti

गोपों की बस्ती के लिए इन्द्रगण वाणियों से उनकी स्तुति करते हैं, और हे भारत, वे ही अकेले सब प्राणियों के स्वामी हैं। लोग उनके अनेक प्रकार के भोज्य अंश बताते हैं, और युद्ध में उन्हें ही विजय दिलाने वाला वाहन घोषित करते हैं।

श्लोक 19 (13.263.19)

तस्यान्तरिक्षं पृथिवी दिवं च । सर्वं वशे तिष्ठति शाश्वतस्य । स कुम्भे रेतः ससृजे सुराणां । यत्रोत्पन्नमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥

tasyāntarikṣaṃ pṛthivī divaṃ ca | sarvaṃ vaśe tiṣṭhati śāśvatasya | sa kumbhe retaḥ sasṛje surāṇāṃ | yatrotpannamṛṣimāhurvasiṣṭham

अन्तरिक्ष, पृथ्वी और स्वर्ग, सब कुछ उन शाश्वत के वश में रहता है। उन्होंने देवताओं का वीर्य घड़े में डाला, जिससे, कहते हैं, ऋषि वसिष्ठ उत्पन्न हुए।

श्लोक 20 (13.263.20)

स मातरिश्वा विभुरश्ववाजी । स रश्मिवान्सविता चादिदेवः । तेनासुरा विजिताः सर्व एव । तद्विक्रान्तैर्विजितानीह त्रीणि ॥

sa mātariśvā vibhuraśvavājī | sa raśmivānsavitā cādidevaḥ | tenāsurā vijitāḥ sarva eva | tadvikrāntairvijitānīha trīṇi

वे ही मातरिश्वा (वायु) हैं, सर्वव्यापी और अश्व के समान वेगवान्; वे ही किरणों वाले सविता, आदिदेव हैं। उन्हीं ने सब असुरों को जीता, और उनके डगों से ये तीनों लोक जीते गए।

श्लोक 21 (13.263.21)

स देवानां मानुषाणां पितॄणां । तमेवाहुर्यज्ञविदां वितानम् । स एव कालं विभजन्नुदेति । तस्योत्तरं दक्षिणं चायने द्वे ॥

sa devānāṃ mānuṣāṇāṃ pitṝṇāṃ | tamevāhuryajñavidāṃ vitānam | sa eva kālaṃ vibhajannudeti | tasyottaraṃ dakṣiṇaṃ cāyane dve

वे देवताओं, मनुष्यों और पितरों की आत्मा हैं; यज्ञ जानने वाले उन्हें ही यज्ञ का विस्तार कहते हैं। वे ही काल का विभाजन करते हुए उदित होते हैं, और उत्तर तथा दक्षिण, दोनों अयन उन्हीं के हैं।

श्लोक 22 (13.263.22)

तस्यैवोर्ध्वं तिर्यगधश्चरन्ति । गभस्तयो मेदिनीं भासयन्तः । तं ब्राह्मणा वेदविदो जुषन्ति । तस्यादित्यो गामुपयुज्य भाति ॥

tasyaivordhvaṃ tiryagadhaścaranti | gabhastayo medinīṃ bhāsayantaḥ | taṃ brāhmaṇā vedavido juṣanti | tasyādityo gāmupayujya bhāti

उनकी किरणें ऊपर, तिरछे और नीचे चलती हैं और पृथ्वी को प्रकाशित करती हैं। वेदज्ञ ब्राह्मण उनकी सेवा करते हैं, और सूर्य पृथ्वी से रस लेकर चमकता है।

श्लोक 23 (13.263.23)

स मासिमास्यध्वरकृद्विधत्ते । तमध्वरे वेदविदः पठन्ति । स एवोक्तश्चक्रमिदं त्रिनाभि । सप्ताश्वयुक्तं वहते वै त्रिधामा ॥

sa māsimāsyadhvarakṛdvidhatte | tamadhvare vedavidaḥ paṭhanti | sa evoktaścakramidaṃ trinābhi | saptāśvayuktaṃ vahate vai tridhāmā

वे ही महीने-महीने यज्ञ का विधान करते हैं, और यज्ञ में वेदज्ञ उन्हीं का पाठ करते हैं। वे ही तीन नाभियों वाले, सात अश्वों से जुते इस चक्र के रूप में कहे गए हैं, जिसे तीन तेजों वाले वे धारण करके चलाते हैं।

श्लोक 24 (13.263.24)

महातेजाः सर्वगः सर्वसिंहः । कृष्णो लोकान्धारयते तथैकः । अश्नन्ननश्नंश्च तथैव धीरः । कृष्णं सदा पार्थ कर्तारमेहि ॥

mahātejāḥ sarvagaḥ sarvasiṃhaḥ | kṛṣṇo lokāndhārayate tathaikaḥ | aśnannanaśnaṃśca tathaiva dhīraḥ | kṛṣṇaṃ sadā pārtha kartāramehi

महातेजस्वी, सर्वव्यापी, सबमें सिंह के समान, अकेले कृष्ण ही लोकों को धारण करते हैं। वे खाते हुए भी और न खाते हुए भी समान रूप से अटल रहते हैं। हे पार्थ, तुम सदा कृष्ण की ओर, उन कर्ता की ओर, मुड़ो।

श्लोक 25 (13.263.25)

स एकदा कक्षगतो महात्मा । तुष्टो विभुः खाण्डवे धूमकेतुः । स राक्षसानुरगांश्चावजित्य । सर्वत्रगः सर्वमग्नौ जुहोति ॥

sa ekadā kakṣagato mahātmā | tuṣṭo vibhuḥ khāṇḍave dhūmaketuḥ | sa rākṣasānuragāṃścāvajitya | sarvatragaḥ sarvamagnau juhoti

एक बार वे महात्मा खाण्डव वन की सूखी झाड़ियों में गए; सन्तुष्ट, सर्वव्यापी धूमकेतु अग्नि ने राक्षसों और सर्पों को जीतकर, सर्वत्र जाते हुए, सब कुछ अग्नि में आहुति कर दिया।

श्लोक 26 (13.263.26)

स एव पार्थाय श्वेतमश्वं प्रायच्छ- । त्स एवाश्वानथ सर्वांश्चकार । सबन्धुरस्तस्य रथस्त्रिचक्र- । स्त्रिवृच्छिराश्चतुरश्वस्त्रिनाभिः ॥

sa eva pārthāya śvetamaśvaṃ prāyaccha- | tsa evāśvānatha sarvāṃścakāra | sabandhurastasya rathastricakra- | strivṛcchirāścaturaśvastrinābhiḥ

उन्हीं ने पार्थ को श्वेत अश्व दिया, और उन्होंने ही सब घोड़े बनाए। उनका रथ सुगठित था, तीन पहियों, तीन शिखरों, चार घोड़ों और तीन नाभियों वाला।

श्लोक 27 (13.263.27)

स विहायो व्यदधात्पञ्चनाभिः । स निर्ममे गां दिवमन्तरिक्षम् । सोऽरण्यानि व्यसृजत्पर्वतांश्च । हृषीकेशोऽमितदीप्ताग्नितेजाः ॥

sa vihāyo vyadadhātpañcanābhiḥ | sa nirmame gāṃ divamantarikṣam | so'raṇyāni vyasṛjatparvatāṃśca | hṛṣīkeśo'mitadīptāgnitejāḥ

पाँच नाभियों वाले उन्होंने आकाश को सजाया; उन्होंने पृथ्वी, स्वर्ग और अन्तरिक्ष की रचना की। अपार दीप्त अग्नि के तेज वाले हृषीकेश ने वनों और पर्वतों को रचा।

श्लोक 28 (13.263.28)

अलङ्घयद्वै सरितो जिघांस- । ञ्शक्रं वज्रं प्रहरन्तं निरास । स महेन्द्रः स्तूयते वै महाध्वरे । विप्रैरेको ऋक्सहस्रैः पुराणैः ॥

alaṅghayadvai sarito jighāṃsa- | ñśakraṃ vajraṃ praharantaṃ nirāsa | sa mahendraḥ stūyate vai mahādhvare | vipraireko ṛksahasraiḥ purāṇaiḥ

प्रहार करने की इच्छा से उन्होंने नदियों को उमड़ा दिया, और वज्र चलाते हुए शक्र को परास्त किया। वे ही महेन्द्र हैं, जिनकी महायज्ञ में ब्राह्मण हज़ारों पुरातन ऋचाओं से अकेले स्तुति करते हैं।

श्लोक 29 (13.263.29)

दुर्वासा वै तेन नान्येन शक्यो । गृहे राजन्वासयितुं महौजाः । तमेवाहुर्ऋषिमेकं पुराणं । स विश्वकृद्विदधात्यात्मभावान् ॥

durvāsā vai tena nānyena śakyo | gṛhe rājanvāsayituṃ mahaujāḥ | tamevāhurṛṣimekaṃ purāṇaṃ | sa viśvakṛdvidadhātyātmabhāvān

हे राजन्, उनके सिवा कोई और महातेजस्वी दुर्वासा को घर में नहीं बसा सकता था। उन्हें ही वे एकमात्र पुरातन ऋषि कहते हैं; वे विश्व के रचयिता हैं और अपने ही भावों का विधान करते हैं।

श्लोक 30 (13.263.30)

वेदांश्च यो वेदयतेऽधिदेवो । विधींश्च यश्चाश्रयते पुराणान् । कामे वेदे लौकिके यत्फलं च । विष्वक्सेनः सर्वमेतत्प्रतीहि ॥

vedāṃśca yo vedayate'dhidevo | vidhīṃśca yaścāśrayate purāṇān | kāme vede laukike yatphalaṃ ca | viṣvaksenaḥ sarvametatpratīhi

जो अधिदेव वेदों को प्रकट करते हैं और पुरातन विधियों का आश्रय लेते हैं, और काम, वेद तथा लोकव्यवहार में जो भी फल है, उस सबको तुम विष्वक्सेन ही जानो।

श्लोक 31 (13.263.31)

ज्योतींषि शुक्लानि हि सर्वलोके । त्रयो लोका लोकपालास्त्रयश्च । त्रयोऽग्रयो व्याहृतयश्च तिस्रः । सर्वे देवा देवकीपुत्र एव ॥

jyotīṃṣi śuklāni hi sarvaloke | trayo lokā lokapālāstrayaśca | trayo'grayo vyāhṛtayaśca tisraḥ | sarve devā devakīputra eva

सब लोकों की उज्ज्वल ज्योतियाँ, तीन लोक और तीन लोकपाल, तीन अग्नियाँ और तीन व्याहृतियाँ; सब देवता देवकीपुत्र ही हैं।

श्लोक 32 (13.263.32)

संवत्सरः स ऋतुः सोऽर्धमासः । सोऽहोरात्रः स कला वै स काष्ठाः । मात्रा मुहूर्ताश्च लवाः क्षणाश्च । विष्वक्सेनः सर्वमेतत्प्रतीहि ॥

saṃvatsaraḥ sa ṛtuḥ so'rdhamāsaḥ | so'horātraḥ sa kalā vai sa kāṣṭhāḥ | mātrā muhūrtāśca lavāḥ kṣaṇāśca | viṣvaksenaḥ sarvametatpratīhi

वे ही संवत्सर हैं, वे ऋतु हैं, वे अर्धमास हैं; वे ही अहोरात्र, कला और काष्ठा हैं; मात्रा, मुहूर्त, लव और क्षण भी वे ही हैं। यह सब विष्वक्सेन ही है, ऐसा जानो।

श्लोक 33 (13.263.33)

चन्द्रादित्यौ ग्रहनक्षत्रताराः । सर्वाणि दर्शान्यथ पौर्णमासम् । नक्षत्रयोगा ऋतवश्च पार्थ । विष्वक्सेनात्सर्वमेतत्प्रसूतम् ॥

candrādityau grahanakṣatratārāḥ | sarvāṇi darśānyatha paurṇamāsam | nakṣatrayogā ṛtavaśca pārtha | viṣvaksenātsarvametatprasūtam

चन्द्रमा और सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारे, सब अमावस्याएँ और पूर्णिमा, नक्षत्रों के योग और ऋतुएँ, हे पार्थ, यह सब विष्वक्सेन से ही उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 34 (13.263.34)

रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च । साध्या विश्वे मरुतां षड्गणाश्च । प्रजापतिर्देवमातादितिश्च । सर्वे कृष्णादृषयश्चैव सप्त ॥

rudrādityā vasavo'thāśvinau ca | sādhyā viśve marutāṃ ṣaḍgaṇāśca | prajāpatirdevamātāditiśca | sarve kṛṣṇādṛṣayaścaiva sapta

रुद्र, आदित्य, वसु और दोनों अश्विनीकुमार, साध्य, विश्वेदेव और मरुतों के छह गण, प्रजापति और देवमाता अदिति, तथा सातों ऋषि, ये सब कृष्ण से ही हैं।

श्लोक 35 (13.263.35)

वायुर्भूत्वा विक्षिपते च विश्व- । मग्निर्भूत्वा दहते विश्वरूपः । आपो भूत्वा मज्जयते च सर्वं । ब्रह्म भूत्वा सृजते विश्वसङ्घान् ॥

vāyurbhūtvā vikṣipate ca viśva- | magnirbhūtvā dahate viśvarūpaḥ | āpo bhūtvā majjayate ca sarvaṃ | brahma bhūtvā sṛjate viśvasaṅghān

वायु बनकर वे विश्व को बिखेर देते हैं; अग्नि बनकर विश्वरूप वे उसे जला देते हैं; जल बनकर वे सब कुछ डुबो देते हैं; ब्रह्मा बनकर वे विश्व के समूहों की सृष्टि करते हैं।

श्लोक 36 (13.263.36)

वेद्यं च यद्वेदयते च वेद्यं । विधिश्च यश्च श्रयते विधेयम् । धर्मे च वेदे च बले च सर्वं । चराचरं केशवं त्वं प्रतीहि ॥

vedyaṃ ca yadvedayate ca vedyaṃ | vidhiśca yaśca śrayate vidheyam | dharme ca vede ca bale ca sarvaṃ | carācaraṃ keśavaṃ tvaṃ pratīhi

जो जानने योग्य है और जो उसे जनाता है, जो विधि है और जो विधि पर आश्रित कर्तव्य है, धर्म, वेद और बल में, सारे चराचर में, उस सबको तुम केशव ही समझो।

श्लोक 37 (13.263.37)

ज्योतिर्भूतः परमोसौ पुरस्ता- । त्प्रकाशते यत्प्रभया विश्वरूपः । अपः सृष्ट्वा सर्वभूतात्मयोनिः । पुराऽकरोत्सर्वमेवाथ विश्वम् ॥

jyotirbhūtaḥ paramosau purastā- | tprakāśate yatprabhayā viśvarūpaḥ | apaḥ sṛṣṭvā sarvabhūtātmayoniḥ | purā'karotsarvamevātha viśvam

वे परम पुरुष ज्योतिर्मय हैं, जो आदि में प्रकाशित होते हैं, जिनकी प्रभा से विश्वरूप चमकता है; सब प्राणियों की आत्मा के उत्पत्तिस्थान वे जल की सृष्टि करके, पूर्व में उन्होंने ही इस सारे विश्व को रचा।

श्लोक 38 (13.263.38)

ऋतूनुत्पातान्विविधान्यद्भुतानि । मेघान्विद्युत्सर्वमैरावतं च । सर्वं कृष्णात्स्थावरं जङ्गमं च । विश्वात्मानं विष्णुमेनं प्रतीहि ॥

ṛtūnutpātānvividhānyadbhutāni | meghānvidyutsarvamairāvataṃ ca | sarvaṃ kṛṣṇātsthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca | viśvātmānaṃ viṣṇumenaṃ pratīhi

ऋतुएँ, उत्पात, नाना प्रकार के अद्भुत दृश्य, मेघ, बिजली और ऐरावत भी, सब स्थावर और जंगम कृष्ण से ही हैं। इन्हें तुम विश्वात्मा विष्णु जानो।

श्लोक 39 (13.263.39)

विश्वावासं निर्गुणं वासुदेवं । सङ्कर्षणं जीवभूतं वदन्ति । ततः प्रद्युम्नमनिरुद्धं चतुर्थ- । माज्ञापयत्यात्मयोनिर्महात्मा ॥

viśvāvāsaṃ nirguṇaṃ vāsudevaṃ | saṅkarṣaṇaṃ jīvabhūtaṃ vadanti | tataḥ pradyumnamaniruddhaṃ caturtha- | mājñāpayatyātmayonirmahātmā

सबके आवास, निर्गुण को वासुदेव कहा जाता है, और संकर्षण को जीवरूप; तब आत्मयोनि महात्मा प्रद्युम्न को और चौथे अनिरुद्ध को आज्ञा देते हैं।

श्लोक 40 (13.263.40)

स पञ्चधा पञ्चगुणोपपन्नं । सञ्चोदयन्विश्वमिदं सिसृक्षुः । ततश्चकारावनिमारुतौ च । खं ज्योतिरम्भश्च तथैव पार्थ ॥

sa pañcadhā pañcaguṇopapannaṃ | sañcodayanviśvamidaṃ sisṛkṣuḥ | tataścakārāvanimārutau ca | khaṃ jyotirambhaśca tathaiva pārtha

इस विश्व की सृष्टि करने की इच्छा से उन्होंने पाँच प्रकार से, पाँच गुणों से युक्त करके इसे प्रेरित किया। तब हे पार्थ, उन्होंने पृथ्वी और वायु, आकाश, अग्नि और जल बनाए।

श्लोक 41 (13.263.41)

स स्थावरं जङ्गमं चैवमेत- । च्चतुर्विधं लोकमिमं च कृत्वा । ततो भूमिं व्यदधात्पञ्चबीजां । द्यावापृथिव्यग्निरथाम्बुवायू ॥

sa sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caivameta- | ccaturvidhaṃ lokamimaṃ ca kṛtvā | tato bhūmiṃ vyadadhātpañcabījāṃ | dyāvāpṛthivyagnirathāmbuvāyū

इस प्रकार स्थावर और जंगम, चार प्रकार के इस लोक को रचकर उन्होंने फिर पाँच बीजों वाली भूमि का विधान किया: द्यावा-पृथिवी, अग्नि, फिर जल और वायु।

श्लोक 42 (13.263.42)

ततो देवानसुरान्मानुषांश्च । लोकानृषींश्चाथ पितॄन्प्रजाश्च । समासेन विविधान्प्राणिलोका- । न्सर्वान्सदा भूतपतिः सिसृक्षुः ॥

tato devānasurānmānuṣāṃśca | lokānṛṣīṃścātha pitṝnprajāśca | samāsena vividhānprāṇilokā- | nsarvānsadā bhūtapatiḥ sisṛkṣuḥ

तब सदा सृष्टि की इच्छा रखने वाले भूतपति ने देवताओं, असुरों और मनुष्यों को, लोकों, ऋषियों, पितरों और प्रजाओं को रचा: संक्षेप में, प्राणियों के सब नाना लोकों को।

श्लोक 43 (13.263.43)

शुभाशुभं स्थावरं जङ्गमं च । विष्वक्सेनात्सर्वमेतत्प्रतीहि । यद्वर्तते यच्च भविष्यतीह । सर्वं ह्येतत्केशवं त्वं प्रतीहि ॥

śubhāśubhaṃ sthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca | viṣvaksenātsarvametatpratīhi | yadvartate yacca bhaviṣyatīha | sarvaṃ hyetatkeśavaṃ tvaṃ pratīhi

शुभ और अशुभ, स्थावर और जंगम, इस सबको विष्वक्सेन से उत्पन्न जानो। जो वर्तमान है और जो आगे होगा, उस सबको तुम केशव ही जानो।

श्लोक 44 (13.263.44)

मृत्युश्चैव प्राणिनामन्तकाले । साक्षात्कृष्णः केशवो देहभाजाम् । भूतं च यच्चेह न विद्म किञ्चि- । द्विष्वक्सेनात्सर्वमेतत्प्रतीहि ॥

mṛtyuścaiva prāṇināmantakāle | sākṣātkṛṣṇaḥ keśavo dehabhājām | bhūtaṃ ca yacceha na vidma kiñci- | dviṣvaksenātsarvametatpratīhi

अन्त समय में प्राणियों के लिए वे ही मृत्यु हैं, देहधारियों के लिए साक्षात् कृष्ण केशव; और जो कुछ यहाँ है जिसे हम बिलकुल नहीं जानते, उस सबको विष्वक्सेन से ही जानो।

श्लोक 45 (13.263.45)

यत्प्रशस्तं च लोकेषु पुण्यं यच्च शुभाशुभम् । तत्सर्वं केशवोऽचिन्त्यो विपरीतमतः परम् ॥

yatpraśastaṃ ca lokeṣu puṇyaṃ yacca śubhāśubham | tatsarvaṃ keśavo'cintyo viparītamataḥ param

लोकों में जो प्रशंसित है, जो पुण्य है, जो शुभ या अशुभ है, वह सब अचिन्त्य केशव ही हैं; और उनसे परे जो कुछ माना जाता है, वह इसके विपरीत है।

श्लोक 46 (13.263.46)

एतादृशः केशवोऽतश्च भूयो । नारायणः परमश्चाव्ययश्च । मध्याद्यन्तस्य जगतस्तस्थुषश्च । बुभूषतां प्रभवश्चाव्ययश्च ॥

etādṛśaḥ keśavo'taśca bhūyo | nārāyaṇaḥ paramaścāvyayaśca | madhyādyantasya jagatastasthuṣaśca | bubhūṣatāṃ prabhavaścāvyayaśca

ऐसे हैं केशव; और इससे भी बढ़कर वे परम और अव्यय नारायण हैं। वे जगत् और स्थावर वस्तुओं के आदि, मध्य और अन्त हैं, और जो होना चाहते हैं उनके उत्पत्ति और लय के कारण हैं।

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