अनुशासन पर्व · अध्याय 264
कृष्ण द्वारा दुर्वासा के क्रोध और वरदान का वर्णन
युधिष्ठिर कृष्ण से ब्राह्मण-पूजा का फल पूछते हैं। कृष्ण वह कथा सुनाते हैं जो उन्होंने अपने पुत्र प्रद्युम्न को बताई थी: उग्र मुनि दुर्वासा उनके घर में रहे, उन्होंने घर का सामान जला दिया, कृष्ण और रुक्मिणी को खीर से लिप्त किया और रुक्मिणी को रथ में घोड़े की तरह जोता; कृष्ण के बिना क्रोध किए सब सह लेने पर दुर्वासा ने उन्हें वर दिया, सब कुछ पहले जैसा कर दिया और रुक्मिणी को अटल कीर्ति का आशीर्वाद दिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.264.1)
ब्रूहि ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं त्वं मधुसूदन । वेत्ता त्वमस्य चार्थस्य वेद त्वां हि पितामहः ॥
brūhi brāhmaṇapūjāyāṃ vyuṣṭiṃ tvaṃ madhusūdana | vettā tvamasya cārthasya veda tvāṃ hi pitāmahaḥ
हे मधुसूदन, ब्राह्मणों की पूजा का फल बताइए। आप इस विषय के जानने वाले हैं, और पितामह भी आपको जानते हैं।
वासुदेव उवाच
श्लोक 2 (13.264.2)
शृणुष्वावहितो राजन्द्विजानां भरतर्षभ । यथातत्त्वेन वदतो गुणान्वै कुरुसत्तम ॥
śṛṇuṣvāvahito rājandvijānāṃ bharatarṣabha | yathātattvena vadato guṇānvai kurusattama
हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, हे कुरुश्रेष्ठ, मैं ब्राह्मणों के गुण यथार्थ रूप से कहता हूँ; ध्यान से सुनो।
श्लोक 3 (13.264.3)
द्वारवत्यां समासीनं पुरा मां कुरुनन्दन । प्रद्युम्नः परिपप्रच्छ ब्राह्मणैः परिकोपितः ॥
dvāravatyāṃ samāsīnaṃ purā māṃ kurunandana | pradyumnaḥ paripapraccha brāhmaṇaiḥ parikopitaḥ
हे कुरुनन्दन, पूर्वकाल में जब मैं द्वारका में बैठा था, तब कुछ ब्राह्मणों से क्रुद्ध हुए प्रद्युम्न ने मुझसे पूछा:
प्रद्युम्न उवाच
श्लोक 4 (13.264.4)
किं फलं ब्राह्मणेष्वस्ति पूजायां मधुसूदन । ईश्वरत्वं कुतस्तेषामिहैव च परत्र च ॥
kiṃ phalaṃ brāhmaṇeṣvasti pūjāyāṃ madhusūdana | īśvaratvaṃ kutasteṣāmihaiva ca paratra ca
हे मधुसूदन, ब्राह्मणों की पूजा में क्या फल है? उनका ऐश्वर्य कहाँ से आता है, यहाँ भी और परलोक में भी?
श्लोक 5 (13.264.5)
सदा द्विजातीन्सम्पूज्य किं फलं तत्र मानद । एतद्ब्रूहि स्फुटं सर्वं सुमहान्संशयोऽत्र मे ॥
sadā dvijātīnsampūjya kiṃ phalaṃ tatra mānada | etadbrūhi sphuṭaṃ sarvaṃ sumahānsaṃśayo'tra me
हे मानद, द्विजों की सदा पूजा करने से क्या फल मिलता है? यह सब मुझे स्पष्ट बताइए; इस विषय में मुझे बहुत बड़ा संशय है।
वासुदेव उवाच
श्लोक 6 (13.264.6)
इत्युक्ते वचने तस्मिन्प्रद्युम्नेन तथा त्वहम् । प्रत्यब्रवं महाराज यत्तच्छृणु समाहितः ॥
ityukte vacane tasminpradyumnena tathā tvaham | pratyabravaṃ mahārāja yattacchṛṇu samāhitaḥ
हे महाराज, प्रद्युम्न के ऐसा कहने पर मैंने जो उत्तर दिया, उसे ध्यान से सुनो।
श्लोक 7 (13.264.7)
व्युष्टिं ब्राह्मणपूजायां रौक्मिणेय निबोध मे । एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥
vyuṣṭiṃ brāhmaṇapūjāyāṃ raukmiṇeya nibodha me | ete hi somarājāna īśvarāḥ sukhaduḥkhayoḥ
हे रुक्मिणीपुत्र, मुझसे ब्राह्मणों की पूजा का फल जानो। ये सोम को राजा मानने वाले हैं और सुख-दुःख के स्वामी हैं।
श्लोक 8 (13.264.8)
अस्मिँल्लोके रौक्मिणेय तथाऽमुष्मिंश्च पुत्रक । ब्राह्मणप्रमुखं सौम्यं न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥
asmim̐lloke raukmiṇeya tathā'muṣmiṃśca putraka | brāhmaṇapramukhaṃ saumyaṃ na me'trāsti vicāraṇā
हे रुक्मिणीपुत्र, हे पुत्र, इस लोक में और परलोक में भी सारा कल्याण ब्राह्मणों के नेतृत्व में है; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 9 (13.264.9)
ब्राह्मणप्रभवं सौख्यमायुः कीर्तिर्यशो बलम् । लोका लोकेश्वराश्चैव सर्वे ब्राह्मणपूजकाः ॥
brāhmaṇaprabhavaṃ saukhyamāyuḥ kīrtiryaśo balam | lokā lokeśvarāścaiva sarve brāhmaṇapūjakāḥ
सुख, आयु, कीर्ति, यश और बल ब्राह्मणों से उत्पन्न होते हैं; सब लोक और लोकेश्वर भी ब्राह्मणों की पूजा करने वाले हैं।
श्लोक 10 (13.264.10)
त्रिवर्गे चापवर्गे च यशःश्रीरोगशान्तिषु । देवतापितृपूजासु सन्तोष्याश्चैव नो द्विजाः ॥
trivarge cāpavarge ca yaśaḥśrīrogaśāntiṣu | devatāpitṛpūjāsu santoṣyāścaiva no dvijāḥ
त्रिवर्ग में और मोक्ष में, यश, लक्ष्मी, आरोग्य और शान्ति में, तथा देवताओं और पितरों की पूजा में हमें द्विजों को ही प्रसन्न रखना चाहिए।
श्लोक 11 (13.264.11)
तान्कथं वै नाद्रियेयमीश्वरोस्मीति पुत्रक । मा ते मन्युर्महाबाहो भवत्वत्र द्विजान्प्रति ॥
tānkathaṃ vai nādriyeyamīśvarosmīti putraka | mā te manyurmahābāho bhavatvatra dvijānprati
हे पुत्र, "मैं ईश्वर हूँ" ऐसा सोचकर मैं उनका आदर कैसे न करूँ? हे महाबाहो, ब्राह्मणों के प्रति तुम्हारे मन में क्रोध न हो।
श्लोक 12 (13.264.12)
ब्राह्मणा हि महद्भूतमस्मिँल्लोके परत्र च । भस्म कुर्युर्जगदिदं क्रुद्धाः प्रत्यक्षदर्शिनः ॥
brāhmaṇā hi mahadbhūtamasmim̐lloke paratra ca | bhasma kuryurjagadidaṃ kruddhāḥ pratyakṣadarśinaḥ
इस लोक और परलोक में ब्राह्मण महान् शक्ति हैं; क्रुद्ध होने पर वे सब कुछ प्रत्यक्ष देखने वाले इस जगत् को भस्म कर सकते हैं।
श्लोक 13 (13.264.13)
हन्युस्तेऽपि सृजेयुश्च लोकान्लोकेश्वरांस्तथा । कथं तेषु न वर्तेरन्सम्यग्ज्ञानात्सुतेजसः ॥
hanyuste'pi sṛjeyuśca lokānlokeśvarāṃstathā | kathaṃ teṣu na varteransamyagjñānātsutejasaḥ
वे संहार भी कर सकते हैं और अन्य लोकों तथा लोकेश्वरों की सृष्टि भी। सम्यक् ज्ञान से इतने तेजस्वी उन ब्राह्मणों के साथ कोई उचित व्यवहार क्यों न करे?
श्लोक 14 (13.264.14)
अवसन्मद्गृहे तात ब्राह्मणो हरिपिङ्गलः । चीरवासा बिल्वदण्डी दीर्घश्मश्रुः कृशो महान् ॥
avasanmadgṛhe tāta brāhmaṇo haripiṅgalaḥ | cīravāsā bilvadaṇḍī dīrghaśmaśruḥ kṛśo mahān
हे तात, मेरे घर में एक भूरे-पीले रंग के ब्राह्मण रहे: वे चीर पहने, बिल्वदण्ड धारण किए, लम्बी दाढ़ी वाले, दुबले और बहुत ऊँचे थे।
श्लोक 15 (13.264.15)
दीर्घेभ्यश्च मनुष्येभ्यः प्रमाणादधिको भुवि । स स्वैरं चरते लोकान्ये दिव्या ये च मानुषाः ॥
dīrghebhyaśca manuṣyebhyaḥ pramāṇādadhiko bhuvi | sa svairaṃ carate lokānye divyā ye ca mānuṣāḥ
वे ऊँचे मनुष्यों से भी ऊँचे थे, पृथ्वी पर सब माप से अधिक। वे अपनी इच्छा से दिव्य और मानव, दोनों लोकों में विचरते थे।
श्लोक 16 (13.264.16)
इमां गाथां गायमानश्चत्वरेषु सभासु च । दुर्वाससं वासयेत्को ब्राह्मणं सत्कृतं गृहे ॥
imāṃ gāthāṃ gāyamānaścatvareṣu sabhāsu ca | durvāsasaṃ vāsayetko brāhmaṇaṃ satkṛtaṃ gṛhe
चौराहों और सभाओं में वे यह गाथा गाया करते थे: "कौन सत्कारपूर्वक ब्राह्मण दुर्वासा को अपने घर में ठहराएगा?"
दुर्वासा उवाच
श्लोक 17 (13.264.17)
रोषणः सर्वभूतानां सूक्ष्मेऽप्यपकृते कृते । परिभाषां च मे श्रुत्वा को नु दद्यात्प्रतिश्रयम् ॥
roṣaṇaḥ sarvabhūtānāṃ sūkṣme'pyapakṛte kṛte | paribhāṣāṃ ca me śrutvā ko nu dadyātpratiśrayam
"मैं सब प्राणियों पर क्रोधी हूँ, छोटे-से अपराध पर भी। मेरी शर्त सुनकर भला कौन मुझे आश्रय देगा?"
वासुदेव उवाच
श्लोक 18 (13.264.18)
यो मां कश्चिद्वासयीत न स मां कोपयेदिति । यस्मान्नाद्रियते कश्चित्ततोऽहं समवासयम् ॥
yo māṃ kaścidvāsayīta na sa māṃ kopayediti | yasmānnādriyate kaścittato'haṃ samavāsayam
"जो कोई मुझे ठहराए, वह मुझे क्रुद्ध न करे।" क्योंकि कोई उनका आदर नहीं करता था, इसलिए मैंने उन्हें ठहरा लिया।
श्लोक 19 (13.264.19)
स सम्भुङ्क्ते सहस्राणां बहूनामन्नमेकदा । एकदा सोल्पकं भुङ्क्ते न चैवैति पुनर्गृहान् ॥
sa sambhuṅkte sahasrāṇāṃ bahūnāmannamekadā | ekadā solpakaṃ bhuṅkte na caivaiti punargṛhān
कभी वे एक ही बार में कई हज़ार लोगों का अन्न खा जाते; कभी बहुत थोड़ा खाते, और फिर घर नहीं लौटते।
श्लोक 20 (13.264.20)
अकस्माच्च प्रहसति तथाऽकस्मात्प्ररोदिति । न चास्य वयसा तुल्यः पृथिव्यामभवत्तदा ॥
akasmācca prahasati tathā'kasmātpraroditi | na cāsya vayasā tulyaḥ pṛthivyāmabhavattadā
वे अचानक हँस पड़ते और अचानक रो पड़ते; उस समय पृथ्वी पर आयु में उनके समान कोई नहीं था।
श्लोक 21 (13.264.21)
अथ स्वावसथं गत्वा सशय्यास्तरणानि च । अदहत्स महातेजास्ततश्चाभ्यपतत्स्वयम् ॥
atha svāvasathaṃ gatvā saśayyāstaraṇāni ca | adahatsa mahātejāstataścābhyapatatsvayam
फिर वे अपने निवास में गए और शय्याओं तथा बिछौनों को जला दिया; और तब स्वयं झपटते हुए लौट आए।
श्लोक 22 (13.264.22)
अथ मामब्रवीद्भूयः स मुनिः संशितव्रतः । कृष्ण पायसमिच्छामि भोक्तुमित्येव सत्वरः ॥
atha māmabravīdbhūyaḥ sa muniḥ saṃśitavrataḥ | kṛṣṇa pāyasamicchāmi bhoktumityeva satvaraḥ
तब कठोर व्रत वाले उन मुनि ने फिर बड़ी शीघ्रता से मुझसे कहा: "कृष्ण, मैं खीर खाना चाहता हूँ।"
श्लोक 23 (13.264.23)
तदैव तु मया तस्य चित्तज्ञेन गृहे जनः । सर्वाण्यन्नानि पानानि भक्ष्याश्चोच्चावचास्तथा ॥
tadaiva tu mayā tasya cittajñena gṛhe janaḥ | sarvāṇyannāni pānāni bhakṣyāścoccāvacāstathā
उनके मन की बात जानकर मैंने पहले ही घर के लोगों को सब प्रकार के अन्न, पेय और ऊँचे-नीचे भक्ष्य पदार्थों के विषय में आदेश दे रखा था:
श्लोक 24 (13.264.24)
भवन्तु सत्कृतानीह पूर्वमेव प्रचोदितः । ततोऽहं ज्वलमानं वै पायसं प्रत्यवेदयम् ॥
bhavantu satkṛtānīha pūrvameva pracoditaḥ | tato'haṃ jvalamānaṃ vai pāyasaṃ pratyavedayam
"यहाँ सब कुछ सत्कारपूर्वक तैयार रहे।" घर के लोगों से यह पहले ही कह दिया गया था। तब मैंने उन्हें जलती-सी गरम खीर अर्पित की।
श्लोक 25 (13.264.25)
तं भुक्त्वैव स तु क्षिप्रं ततो वचनमब्रवीत् । क्षिप्रमङ्गानि लिम्पस्व पायसेनेति स स्म ह ॥
taṃ bhuktvaiva sa tu kṣipraṃ tato vacanamabravīt | kṣipramaṅgāni limpasva pāyaseneti sa sma ha
उसे खाते ही उन्होंने तुरन्त कहा: "शीघ्र ही इस खीर को अपने अंगों पर लेप लो।"
श्लोक 26 (13.264.26)
अविमृश्यैव च ततः कृतवानस्मि तत्तथा । तेनोच्छिष्टेन गात्राणि शरीरं च समालिपम् ॥
avimṛśyaiva ca tataḥ kṛtavānasmi tattathā | tenocchiṣṭena gātrāṇi śarīraṃ ca samālipam
बिना विचारे मैंने वैसा ही किया, और उस जूठी खीर से अपने अंगों और शरीर का लेप कर लिया।
श्लोक 27 (13.264.27)
स ददर्श तदाऽभ्याशे मातरं ते शुभाननाम् । तामपि स्मयमानां स पायसेनाभ्यलेपयत् ॥
sa dadarśa tadā'bhyāśe mātaraṃ te śubhānanām | tāmapi smayamānāṃ sa pāyasenābhyalepayat
तब उन्होंने पास ही तुम्हारी सुन्दर मुख वाली माता को देखा; और मुस्कुराती हुई उन्हें भी खीर से लिप्त कर दिया।
श्लोक 28 (13.264.28)
मुनिः पायसदिग्धाङ्गीं रथे तूर्णमयोजयत् । तमारुद्य रथं चैव निर्ययौ स गृहान्मम ॥
muniḥ pāyasadigdhāṅgīṃ rathe tūrṇamayojayat | tamārudya rathaṃ caiva niryayau sa gṛhānmama
मुनि ने खीर से लिप्त अंगों वाली उन्हें शीघ्र रथ में जोत दिया; और रथ पर चढ़कर वे मेरे घर से निकल पड़े।
श्लोक 29 (13.264.29)
अग्निवर्णो ज्वलन्धीमान्स द्विजो रथधुर्यवत् । प्रतोदेनातुदद्बालां रुक्मिणीं मम पश्यतः ॥
agnivarṇo jvalandhīmānsa dvijo rathadhuryavat | pratodenātudadbālāṃ rukmiṇīṃ mama paśyataḥ
अग्नि के समान वर्ण वाले, दीप्तिमान् और बुद्धिमान् उन ब्राह्मण ने मेरे देखते-देखते, रथ के घोड़े की तरह जुती हुई बाला रुक्मिणी को कोड़े से मारा।
श्लोक 30 (13.264.30)
न च मे स्तोकमप्यासीद्दुःखमीर्ष्याकृतं तदा । तथा स राजमार्गेण महता निर्ययौ बहिः ॥
na ca me stokamapyāsīdduḥkhamīrṣyākṛtaṃ tadā | tathā sa rājamārgeṇa mahatā niryayau bahiḥ
और उस समय मुझे तनिक भी दुःख या ईर्ष्या नहीं हुई। इस प्रकार वे बड़े राजमार्ग से नगर के बाहर चले गए।
श्लोक 31 (13.264.31)
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं दाशार्हा जातमन्यवः । तत्राजल्पन्मिथः केचित्समाभाष्य परस्परम् ॥
taddṛṣṭvā mahadāścaryaṃ dāśārhā jātamanyavaḥ | tatrājalpanmithaḥ kecitsamābhāṣya parasparam
वह महान् आश्चर्य देखकर दाशार्ह क्रोधित हो उठे, और उनमें से कुछ आपस में बातचीत करके कहने लगे:
दाशार्हा ऊचुः
श्लोक 32 (13.264.32)
ब्राह्मणा एव जायेरन्नान्यो वर्णः कथञ्चन । को ह्येनां रथमास्थाय जीवेदन्यः पुमानिह ॥
brāhmaṇā eva jāyerannānyo varṇaḥ kathañcana | ko hyenāṃ rathamāsthāya jīvedanyaḥ pumāniha
"ब्राह्मण ही जन्म लें, कोई और वर्ण किसी प्रकार नहीं! भला ऐसे रथ पर चढ़कर और कौन पुरुष जीवित रह सकता है?"
श्लोक 33 (13.264.33)
आशीविषविषं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णतरो द्विजः । ब्रह्माहिविषदिग्धस्य नास्ति कश्चिच्चिकित्सकः ॥
āśīviṣaviṣaṃ tīkṣṇaṃ tatastīkṣṇataro dvijaḥ | brahmāhiviṣadigdhasya nāsti kaściccikitsakaḥ
"विषधर सर्प का विष तीक्ष्ण होता है, पर ब्राह्मण उससे भी अधिक तीक्ष्ण है। ब्राह्मण-सर्प के विष से लिप्त मनुष्य का कोई चिकित्सक नहीं होता।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 34 (13.264.34)
तस्मिन्व्रजति दुर्धर्षे प्रास्खलद्रुक्मिणी पथि । अमर्षयंस्तथा श्रीमान्स्मितपूर्वमचोदयत् ॥
tasminvrajati durdharṣe prāskhaladrukmiṇī pathi | amarṣayaṃstathā śrīmānsmitapūrvamacodayat
उन दुर्धर्ष के चलते समय रुक्मिणी मार्ग में लड़खड़ा गईं; वह सहन न करते हुए श्रीमान् मुनि ने मुस्कराकर उन्हें हाँक दिया।
श्लोक 35 (13.264.35)
ततः परमसंक्रुद्धो रथात्प्रस्कन्द्य स द्विजः । पदातिरुत्पथेनैव प्राद्रवद्दक्षिणामुखः ॥
tataḥ paramasaṃkruddho rathātpraskandya sa dvijaḥ | padātirutpathenaiva prādravaddakṣiṇāmukhaḥ
तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर वे ब्राह्मण रथ से कूद पड़े और पैदल ही मार्ग छोड़कर दक्षिण की ओर दौड़ चले।
श्लोक 36 (13.264.36)
तमुत्पथेन धावन्तमन्वधावं द्विजोत्तमम् । तथैव पायसादिग्धः प्रसीद भगवन्निति ॥
tamutpathena dhāvantamanvadhāvaṃ dvijottamam | tathaiva pāyasādigdhaḥ prasīda bhagavanniti
मार्ग छोड़कर भागते हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मण के पीछे मैं भी खीर से लिप्त ही दौड़ा और बोला, "हे भगवन्, प्रसन्न हों!"
श्लोक 37 (13.264.37)
ततो विलोक्य तेजस्वी ब्राह्मणो मामुवाच ह । जितः क्रोधस्त्वया कृष्ण प्रकृत्यैव महाभुज ॥
tato vilokya tejasvī brāhmaṇo māmuvāca ha | jitaḥ krodhastvayā kṛṣṇa prakṛtyaiva mahābhuja
तब तेजस्वी ब्राह्मण ने मुझे देखकर कहा: "हे कृष्ण, हे महाबाहो, तुमने स्वभाव से ही क्रोध को जीत लिया है।"
दुर्वासा उवाच
श्लोक 38 (13.264.38)
न तेऽपराधमिह वै दृष्टवानस्मि सुव्रत । प्रीतोस्मि तव गोविन्द वृणु कामान्यथेप्सितान् ॥
na te'parādhamiha vai dṛṣṭavānasmi suvrata | prītosmi tava govinda vṛṇu kāmānyathepsitān
"हे सुव्रत, मैंने यहाँ तुम्हारा कोई अपराध नहीं देखा। हे गोविन्द, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; जैसे चाहो वैसे वर माँगो।"
श्लोक 39 (13.264.39)
प्रसन्नस्य च मे तात पश्य व्युष्टिं यथाविधाम् ॥
prasannasya ca me tāta paśya vyuṣṭiṃ yathāvidhām
"और हे तात, देखो कि मेरे प्रसन्न होने पर कैसा फल मिलता है।"
श्लोक 40 (13.264.40)
यावदेव मनुष्याणामन्ने भावो भविष्यति । यथैवान्ने तथा तेषां त्वयि भावो भविष्यति ॥
yāvadeva manuṣyāṇāmanne bhāvo bhaviṣyati | yathaivānne tathā teṣāṃ tvayi bhāvo bhaviṣyati
"जब तक मनुष्यों का अन्न में प्रेम रहेगा, तब तक जैसे अन्न में, वैसे ही तुममें उनका प्रेम रहेगा।"
श्लोक 41 (13.264.41)
यावच्च पुण्या लोकेषु त्वयि कीर्तिर्भविष्यति । त्रिषु लोकेषु तावच्च वैशिष्ट्यं प्रतिपत्स्यसे । सुप्रियः सर्वलोकस्य भविष्यसि जनार्दन ॥
yāvacca puṇyā lokeṣu tvayi kīrtirbhaviṣyati | triṣu lokeṣu tāvacca vaiśiṣṭyaṃ pratipatsyase | supriyaḥ sarvalokasya bhaviṣyasi janārdana
"जब तक लोकों में तुम्हारी पवित्र कीर्ति रहेगी, तब तक तीनों लोकों में तुम श्रेष्ठता पाओगे, और हे जनार्दन, तुम सारे संसार के प्रिय होगे।"
श्लोक 42 (13.264.42)
यत्ते भिन्नं च दग्धं च यच्च किञ्चिद्विनाशितम् । सर्वं तथैव द्रष्टासि विशिष्टं जनार्दन ॥
yatte bhinnaṃ ca dagdhaṃ ca yacca kiñcidvināśitam | sarvaṃ tathaiva draṣṭāsi viśiṣṭaṃ janārdana
"हे जनार्दन, तुम्हारा जो कुछ टूटा, जला या नष्ट हुआ है, उस सबको तुम वैसा ही, या उससे भी उत्तम देखोगे।"
श्लोक 43 (13.264.43)
यावदेतत्प्रलिप्तं ते गात्रेषु मधुसूदन । अतो मृत्युभयं नास्ति यावदिच्छसि चाच्युत ॥
yāvadetatpraliptaṃ te gātreṣu madhusūdana | ato mṛtyubhayaṃ nāsti yāvadicchasi cācyuta
"हे मधुसूदन, जब तक तुम्हारे अंगों पर यह लेप रहेगा, तब तक, हे अच्युत, जितना चाहो उतने समय तक तुम्हें मृत्यु का भय नहीं रहेगा।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 44 (13.264.44)
न तु पादतले लिप्ते तस्मात्ते मृत्युरत्र वै । नैतन्मे प्रियमित्येवं स मां प्रीतोऽब्रवीत्तदा ॥
na tu pādatale lipte tasmātte mṛtyuratra vai | naitanme priyamityevaṃ sa māṃ prīto'bravīttadā
"किन्तु तुम्हारे तलवे लिप्त नहीं हुए, इसलिए उसी स्थान से तुम्हारी मृत्यु होगी। यह मुझे प्रिय नहीं लगा" — ऐसा प्रसन्न होकर उन्होंने तब मुझसे कहा।
श्लोक 45 (13.264.45)
इत्युक्तोऽहं शरीरं स्वं ददर्श श्रीसमायुतम् ॥
ityukto'haṃ śarīraṃ svaṃ dadarśa śrīsamāyutam
यह कहे जाने पर मैंने अपने शरीर को श्री से युक्त देखा।
श्लोक 46 (13.264.46)
रुक्मिणीं चाब्रवीत्प्रीतः सर्वस्त्रीणां वरं यशः । कीर्तिं चानुत्तमां लोके समवाप्स्यसि शोभने ॥
rukmiṇīṃ cābravītprītaḥ sarvastrīṇāṃ varaṃ yaśaḥ | kīrtiṃ cānuttamāṃ loke samavāpsyasi śobhane
प्रसन्न होकर उन्होंने रुक्मिणी से कहा: "सब स्त्रियों में तुम्हारा यश श्रेष्ठ होगा, और हे शोभने, तुम संसार में अनुपम कीर्ति पाओगी।"
दुर्वासा उवाच
श्लोक 47 (13.264.47)
न त्वां जरा वा रोगो वा वैवर्ण्यं चापि भामिनि । स्प्रक्ष्यन्ति पुण्यगन्धा च कृष्णमाराधयिष्यसि ॥
na tvāṃ jarā vā rogo vā vaivarṇyaṃ cāpi bhāmini | sprakṣyanti puṇyagandhā ca kṛṣṇamārādhayiṣyasi
"हे भामिनी, न बुढ़ापा, न रोग, न विवर्णता तुम्हें छुएगी; तुम पुण्य सुगन्ध से युक्त रहोगी और कृष्ण की आराधना करोगी।"
श्लोक 48 (13.264.48)
षोडशानां सहस्राणां वधूनां केशवस्य ह । वरिष्ठा च सलोक्या च केशवस्य भविष्यसि ॥
ṣoḍaśānāṃ sahasrāṇāṃ vadhūnāṃ keśavasya ha | variṣṭhā ca salokyā ca keśavasya bhaviṣyasi
"केशव की सोलह हज़ार वधुओं में तुम श्रेष्ठ होगी, और उन्हीं के लोक में उनके साथ रहोगी।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 49 (13.264.49)
तव मातरमित्युक्त्वा ततो मां पुनरब्रवीत् । प्रस्थितः सुमहातेजा दुर्वासाऽग्निरिव ज्वलन् ॥
tava mātaramityuktvā tato māṃ punarabravīt | prasthitaḥ sumahātejā durvāsā'gniriva jvalan
तुम्हारी माता के विषय में यह कहकर अग्नि के समान जलते हुए महातेजस्वी दुर्वासा, प्रस्थान करते हुए, मुझसे फिर बोले:
श्लोक 50 (13.264.50)
एषैव ते बुद्धिरस्तु ब्राह्मणान्प्रति केशव । इत्युक्त्वा स तदा पुत्र तत्रैवान्तरधीयत ॥
eṣaiva te buddhirastu brāhmaṇānprati keśava | ityuktvā sa tadā putra tatraivāntaradhīyata
"हे केशव, ब्राह्मणों के प्रति तुम्हारी यही भक्ति बनी रहे।" हे पुत्र, यह कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 51 (13.264.51)
तस्मिन्नन्तर्हिते चाहमुपांशु व्रतमाचरम् । यत्किञ्चिद्ब्राह्मणो ब्रूयात्सर्वं कुर्यामिति प्रभो ॥
tasminnantarhite cāhamupāṃśu vratamācaram | yatkiñcidbrāhmaṇo brūyātsarvaṃ kuryāmiti prabho
उनके अन्तर्धान होने पर मैंने चुपचाप यह व्रत लिया: "हे प्रभो, ब्राह्मण जो कुछ भी कहे, मैं वह सब करूँगा।"
श्लोक 52 (13.264.52)
एतद्व्रतमहं कृत्वा मात्रा ते सह पुत्रक । ततः परमहृष्टात्मा प्राविशं गृहमेव च ॥
etadvratamahaṃ kṛtvā mātrā te saha putraka | tataḥ paramahṛṣṭātmā prāviśaṃ gṛhameva ca
हे पुत्र, यह व्रत लेकर तुम्हारी माता के साथ मैं अत्यन्त प्रसन्न मन से अपने घर में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 53 (13.264.53)
प्रविष्टमात्रश्च गृहे सर्वं पश्यामि तन्नवम् । यद्भिन्नं यच्च वै दग्धं तेन विप्रेण पुत्रक ॥
praviṣṭamātraśca gṛhe sarvaṃ paśyāmi tannavam | yadbhinnaṃ yacca vai dagdhaṃ tena vipreṇa putraka
हे पुत्र, घर में प्रवेश करते ही मैंने देखा कि उस ब्राह्मण ने जो कुछ तोड़ा या जलाया था, वह सब फिर नया हो गया है।
श्लोक 54 (13.264.54)
ततोऽहं विस्मयं प्राप्तः सर्वं दृष्ट्वा नवं दृढम् । अपूजयं च मनसा रौक्मिणेय सदा द्विजान् ॥
tato'haṃ vismayaṃ prāptaḥ sarvaṃ dṛṣṭvā navaṃ dṛḍham | apūjayaṃ ca manasā raukmiṇeya sadā dvijān
हे रुक्मिणीपुत्र, तब सब कुछ नया और दृढ़ देखकर मुझे आश्चर्य हुआ, और तभी से मैं मन से द्विजों की सदा पूजा करने लगा।
श्लोक 55 (13.264.55)
इत्यहं रौक्मिणेयस्य पृच्छतो भरतर्षभ । माहात्म्यं द्विजमुख्यस्य सर्वमाख्यातवांस्तदा ॥
ityahaṃ raukmiṇeyasya pṛcchato bharatarṣabha | māhātmyaṃ dvijamukhyasya sarvamākhyātavāṃstadā
हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार रुक्मिणीपुत्र के पूछने पर मैंने उन श्रेष्ठ ब्राह्मण की सारी महिमा उसे कह सुनाई।
श्लोक 56 (13.264.56)
तथा त्वमपि कौन्तेय ब्राह्मणान्सततं प्रभो । पूजयस्व महाभागान्वाग्भिर्दानैश्च नित्यदा ॥
tathā tvamapi kaunteya brāhmaṇānsatataṃ prabho | pūjayasva mahābhāgānvāgbhirdānaiśca nityadā
हे कुन्तीपुत्र, हे प्रभो, इसी प्रकार तुम भी सदा महाभाग ब्राह्मणों का वाणी और दान से नित्य सम्मान करो।
श्लोक 57 (13.264.57)
एवं व्युष्टिमहं प्राप्तो ब्राह्मणस्य प्रसादजाम् । यच्च मामाह भीष्मोऽयं तत्सत्यं भरतर्षभ ॥
evaṃ vyuṣṭimahaṃ prāpto brāhmaṇasya prasādajām | yacca māmāha bhīṣmo'yaṃ tatsatyaṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार मैंने ब्राह्मण की कृपा से उत्पन्न फल पाया। और भीष्म ने जो मुझसे कहा है, वह सत्य है।