अनुशासन पर्व · अध्याय 265
कृष्ण द्वारा रुद्र की महिमा का वर्णन
युधिष्ठिर कृष्ण से पूछते हैं कि शंकर के अंश दुर्वासा की कृपा से उन्हें जो ज्ञान मिला, उसे तथा महादेव की महिमा और उनके नामों को समझाएँ। शिव को प्रणाम करके कृष्ण बताते हैं कि रुद्र ने किस प्रकार दक्ष के यज्ञ को बेधा और देवताओं ने उन्हें प्रसन्न किया, कैसे देवताओं से बने बाण से उन्होंने असुरों के तीनों पुर भस्म किए और इन्द्र की भुजा को स्तम्भित कर दिया। वे यह भी कहते हैं कि स्वयं शिव ब्राह्मण दुर्वासा के रूप में द्वारका में उनके घर रहे, और अन्त में महादेव को सब कुछ बताते हुए कहते हैं कि उनके गुण कहे नहीं जा सकते।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.265.1)
दुर्वाससः प्रसादात्ते शंकरांशस्य माधव । अवाप्तमिह विज्ञानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
durvāsasaḥ prasādātte śaṃkarāṃśasya mādhava | avāptamiha vijñānaṃ tanme vyākhyātumarhasi
हे माधव! शंकर के अंश दुर्वासा की कृपा से आपने यहाँ जो विशेष ज्ञान प्राप्त किया, उसे मुझे समझाइए।
श्लोक 2 (13.265.2)
महाभाग्यं च यत्तस्य नामानि च महात्मनः । तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि सर्वं मतिमतांवर ॥
mahābhāgyaṃ ca yattasya nāmāni ca mahātmanaḥ | tattvato jñātumicchāmi sarvaṃ matimatāṃvara
हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! उन महात्मा की महिमा और उनके नाम भी मैं यथार्थ रूप से, सब कुछ जानना चाहता हूँ।
वासुदेव उवाच
श्लोक 3 (13.265.3)
हन्त ते कीर्तयिष्यामि नमस्कृत्य कपर्दिने । यदवाप्तं मया राजञ्श्रेयो यच्चार्जितं यशः ॥
hanta te kīrtayiṣyāmi namaskṛtya kapardine | yadavāptaṃ mayā rājañśreyo yaccārjitaṃ yaśaḥ
हे राजन्! अच्छा, जटाधारी शिव को प्रणाम करके मैं आपको बताऊँगा कि मैंने कौन-सा कल्याण पाया और कौन-सा यश अर्जित किया।
श्लोक 4 (13.265.4)
प्रयतः प्रातरुत्थाय यस्त्वधीयेद्विशाम्पते । प्राञ्जलिः शतरुद्रीयं नास्य किञ्चन दुर्लभम् ॥
prayataḥ prātarutthāya yastvadhīyedviśāmpate | prāñjaliḥ śatarudrīyaṃ nāsya kiñcana durlabham
हे राजन्! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध भाव से हाथ जोड़े हुए शतरुद्रीय का पाठ करता है, उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।
श्लोक 5 (13.265.5)
शिवः सर्वगतो रुद्रः स्रष्टा यस्तं शृणुष्व मे । प्रजापतिस्तमसृजत्तमसोऽन्ते महातपाः । शङ्करस्त्वसृजत्तात प्रजाः स्थावरजङ्गमाः ॥
śivaḥ sarvagato rudraḥ sraṣṭā yastaṃ śṛṇuṣva me | prajāpatistamasṛjattamaso'nte mahātapāḥ | śaṅkarastvasṛjattāta prajāḥ sthāvarajaṅgamāḥ
शिव, सर्वव्यापी रुद्र, ही स्रष्टा हैं; उनके विषय में मुझसे सुनिए। महातपस्वी प्रजापति ने अन्धकार के अन्त में उन्हें उत्पन्न किया। हे तात! और शंकर ने स्थावर तथा जंगम सब प्राणियों की सृष्टि की।
श्लोक 6 (13.265.6)
नास्ति किञ्चित्परं भूतं महादेवाद्विशाम्पते । इह त्रिष्वपि लोकेषु भूतानां प्रभवो हि सः ॥
nāsti kiñcitparaṃ bhūtaṃ mahādevādviśāmpate | iha triṣvapi lokeṣu bhūtānāṃ prabhavo hi saḥ
हे राजन्! महादेव से बढ़कर कोई प्राणी नहीं है; क्योंकि इन तीनों लोकों में समस्त प्राणियों की उत्पत्ति उन्हीं से है।
श्लोक 7 (13.265.7)
न चैवोत्सहते स्थातुं कश्चिदग्रे महात्मनः । न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
na caivotsahate sthātuṃ kaścidagre mahātmanaḥ | na hi bhūtaṃ samaṃ tena triṣu lokeṣu vidyate
उन महात्मा के सामने कोई ठहर नहीं सकता; तीनों लोकों में उनके समान कोई प्राणी नहीं है।
श्लोक 8 (13.265.8)
गन्धेनापि हि सङ्ग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः । विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च ॥
gandhenāpi hi saṅgrāme tasya kruddhasya śatravaḥ | visaṃjñā hatabhūyiṣṭhā vepanti ca patanti ca
युद्ध में क्रुद्ध हुए उनकी गन्ध मात्र से शत्रु संज्ञाहीन हो जाते हैं; उनमें से अधिकांश मारे जाते हैं, और शेष काँपते तथा गिर पड़ते हैं।
श्लोक 9 (13.265.9)
घोरं च निनदं तस्य पर्जन्यनिनदोपमम् । श्रुत्वा विशीर्येद्धृदयं देवानामपि संयुगे । यं चाक्ष्णा घोररूपेण पश्येद्दग्धः पतेदधः ॥
ghoraṃ ca ninadaṃ tasya parjanyaninadopamam | śrutvā viśīryeddhṛdayaṃ devānāmapi saṃyuge | yaṃ cākṣṇā ghorarūpeṇa paśyeddagdhaḥ patedadhaḥ
मेघ की गर्जना के समान उनका भयंकर नाद सुनकर युद्ध में देवताओं के भी हृदय फट जाएँ; और वे अपनी भयानक दृष्टि से जिसे देख लें, वह जलकर नीचे गिर पड़ता है।
श्लोक 10 (13.265.10)
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न पन्नगाः । कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागताः ॥
na surā nāsurā loke na gandharvā na pannagāḥ | kupite sukhamedhante tasminnapi guhāgatāḥ
उनके कुपित होने पर न देवता, न असुर, न गन्धर्व, न नाग इस लोक में सुखी रह पाते हैं, चाहे वे गुफाओं में ही क्यों न जा छिपे हों।
श्लोक 11 (13.265.11)
प्रजापतेश्च दक्षस्य यजतो वितते क्रतौ । विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भयस्तु भवस्तदा ॥
prajāpateśca dakṣasya yajato vitate kratau | vivyādha kupito yajñaṃ nirbhayastu bhavastadā
जब प्रजापति दक्ष का यज्ञ पूरे विधान से चल रहा था, तब कुपित और निर्भय भव (शिव) ने उस यज्ञ को बेध डाला।
श्लोक 12 (13.265.12)
धनुषा वाणमुत्सृज्य सुघोरं विननाद च ॥
dhanuṣā vāṇamutsṛjya sughoraṃ vinanāda ca
धनुष से बाण छोड़कर उन्होंने अत्यन्त भयंकर गर्जना की।
श्लोक 13 (13.265.13)
ते न शर्म कुतः शान्तिं विषादं लेभिरे सुराः । विद्धे च सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ॥
te na śarma kutaḥ śāntiṃ viṣādaṃ lebhire surāḥ | viddhe ca sahasā yajñe kupite ca maheśvare
यज्ञ के अचानक बिंध जाने और महेश्वर के कुपित हो जाने पर देवताओं को न सुख मिला, न शान्ति कहाँ से मिलती? वे विषाद में पड़ गए।
श्लोक 14 (13.265.14)
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः । बभूवुरवशाः पार्थ विषेदुश्च सुरासुराः ॥
tena jyātalaghoṣeṇa sarve lokāḥ samākulāḥ | babhūvuravaśāḥ pārtha viṣeduśca surāsurāḥ
हे पार्थ! उनकी प्रत्यंचा और करतल के उस घोष से सारे लोक व्याकुल हो उठे; देवता और असुर दोनों विवश होकर विषाद में डूब गए।
श्लोक 15 (13.265.15)
आपश्चुक्षुभिरे चैव चकम्पे च वसुन्धरः । व्यद्रवन्गिरयश्चापि द्यौः पफाल च सर्वशः ॥
āpaścukṣubhire caiva cakampe ca vasundharaḥ | vyadravangirayaścāpi dyauḥ paphāla ca sarvaśaḥ
जल क्षुब्ध हो उठे, पृथ्वी काँप उठी, पर्वत भाग खड़े हुए और आकाश चारों ओर से फट गया।
श्लोक 16 (13.265.16)
अन्धेन तमसा लोकाः प्रावृता न चकाशिरे । प्रनष्टा ज्योतिषां भाश्च सह सूर्येण भारत ॥
andhena tamasā lokāḥ prāvṛtā na cakāśire | pranaṣṭā jyotiṣāṃ bhāśca saha sūryeṇa bhārata
हे भारत! अन्धकार से ढके हुए लोक प्रकाशित नहीं हुए; सूर्य सहित सब ज्योतियों की आभा नष्ट हो गई।
श्लोक 17 (13.265.17)
भृशं भीतास्ततः शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च । ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च हितैषिणः ॥
bhṛśaṃ bhītāstataḥ śāntiṃ cakruḥ svastyayanāni ca | ṛṣayaḥ sarvabhūtānāmātmanaśca hitaiṣiṇaḥ
तब सब प्राणियों और अपना हित चाहने वाले ऋषियों ने अत्यन्त भयभीत होकर शान्तिकर्म और स्वस्तिवाचन किए।
श्लोक 18 (13.265.18)
ततः सोऽभ्यद्रवद्देवान्रुद्रो रौद्रपराक्रमः । भगस्य नयने क्रुद्धः प्रहारेण व्यशातयत् ॥
tataḥ so'bhyadravaddevānrudro raudraparākramaḥ | bhagasya nayane kruddhaḥ prahāreṇa vyaśātayat
तब भयंकर पराक्रम वाले रुद्र ने क्रोध में देवताओं पर धावा बोला और एक प्रहार से भग की आँखें नष्ट कर दीं।
श्लोक 19 (13.265.19)
पूषणं चाभिदुद्राव घोरेण वपुषाऽन्वितः । पुरोडाशं भक्षयतो दशनान्वै व्यशातयत् ॥
pūṣaṇaṃ cābhidudrāva ghoreṇa vapuṣā'nvitaḥ | puroḍāśaṃ bhakṣayato daśanānvai vyaśātayat
भयानक रूप धारण करके उन्होंने पूषा पर भी आक्रमण किया और पुरोडाश खाते हुए उनके दाँत तोड़ दिए।
श्लोक 20 (13.265.20)
ततः प्रणेमुर्देवास्ते वेपमानाः स्म शङ्करम् । पुनश्च सन्दधे रुद्रो दीप्तं सुनिशितं शरम् ॥
tataḥ praṇemurdevāste vepamānāḥ sma śaṅkaram | punaśca sandadhe rudro dīptaṃ suniśitaṃ śaram
तब काँपते हुए देवताओं ने शंकर को प्रणाम किया; और रुद्र ने फिर अपना प्रज्वलित, तीक्ष्ण बाण धनुष पर चढ़ाया।
श्लोक 21 (13.265.21)
रुद्रस्य विक्रमं दृष्ट्वा भीता देवाः सहर्षिभिः । ततः प्रसादयामासुः शर्वं ते विबुधोत्तमाः ॥
rudrasya vikramaṃ dṛṣṭvā bhītā devāḥ saharṣibhiḥ | tataḥ prasādayāmāsuḥ śarvaṃ te vibudhottamāḥ
रुद्र का पराक्रम देखकर ऋषियों सहित देवता भयभीत हो गए, और उन श्रेष्ठ देवताओं ने शर्व को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया।
श्लोक 22 (13.265.22)
जेपुश्च शतरुद्रीयं देवाः कृत्वाञ्जलिं तदा । संस्तूयमानस्त्रिदशैः प्रससाद महेश्वरः ॥
jepuśca śatarudrīyaṃ devāḥ kṛtvāñjaliṃ tadā | saṃstūyamānastridaśaiḥ prasasāda maheśvaraḥ
तब देवताओं ने हाथ जोड़कर शतरुद्रीय का जप किया; देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर महेश्वर प्रसन्न हो गए।
श्लोक 23 (13.265.23)
रुद्रस्य भागं यज्ञे च विशिष्टं ते त्वकल्पयन् । भयेन त्रिदशा राजञ्शरणं च प्रपेदिरे ॥
rudrasya bhāgaṃ yajñe ca viśiṣṭaṃ te tvakalpayan | bhayena tridaśā rājañśaraṇaṃ ca prapedire
उन्होंने यज्ञ में रुद्र के लिए विशिष्ट भाग निश्चित किया, और हे राजन्! भयभीत देवताओं ने उनकी शरण ली।
श्लोक 24 (13.265.24)
तेन चैव हि तुष्टेन स यज्ञः सन्धितोऽभवत् । यद्यच्चापहृतं तत्र तत्तथैवान्वजीवयत् ॥
tena caiva hi tuṣṭena sa yajñaḥ sandhito'bhavat | yadyaccāpahṛtaṃ tatra tattathaivānvajīvayat
इससे सन्तुष्ट होकर उन्होंने उस यज्ञ को फिर जोड़ दिया; और वहाँ जो-जो नष्ट या हर लिया गया था, उसे ज्यों-का-त्यों जीवित कर दिया।
श्लोक 25 (13.265.25)
असुराणां पुराण्यासंस्त्रीणि वीर्यवतां दिवि । आयसं राजतं चैव सौवर्णमपि चापरम् ॥
asurāṇāṃ purāṇyāsaṃstrīṇi vīryavatāṃ divi | āyasaṃ rājataṃ caiva sauvarṇamapi cāparam
आकाश में बलशाली असुरों के तीन नगर थे: एक लोहे का, एक चाँदी का और दूसरा सोने का।
श्लोक 26 (13.265.26)
नाशकत्तानि मघवा भेत्तुं सर्वायुधैरपि । अथ सर्वेऽमरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः ॥
nāśakattāni maghavā bhettuṃ sarvāyudhairapi | atha sarve'marā rudraṃ jagmuḥ śaraṇamarditāḥ
इन्द्र सब अस्त्रों से भी उन्हें भेद न सके। तब पीड़ित हुए सभी देवता रुद्र की शरण में गए।
श्लोक 27 (13.265.27)
तत ऊचुर्महात्मानो देवाः सर्वे समागताः । रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु ॥
tata ūcurmahātmāno devāḥ sarve samāgatāḥ | rudra raudrā bhaviṣyanti paśavaḥ sarvakarmasu
तब एकत्र हुए सब महात्मा देवताओं ने कहा: "हे रुद्र! सब कर्मों में पशु आपके ही होंगे।
श्लोक 28 (13.265.28)
जहि दैत्यान्सह पुरैर्लोकांस्त्रायस्व मानद । स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा कृत्वा विष्णुं शरोत्तमम् ॥
jahi daityānsaha purairlokāṃstrāyasva mānada | sa tathoktastathetyuktvā kṛtvā viṣṇuṃ śarottamam
दैत्यों को उनके पुरों सहित नष्ट कीजिए और लोकों की रक्षा कीजिए, हे मान देने वाले!" ऐसा कहे जाने पर उन्होंने "ऐसा ही हो" कहकर विष्णु को उत्तम बाण बनाया।
श्लोक 29 (13.265.29)
शल्यमग्निं तथा कृत्वा पुङ्खं वैवस्वतं यमम् । ओङ्कारं च धनुः सर्वाञ्ज्यां च सावित्रिमुत्तमां ॥
śalyamagniṃ tathā kṛtvā puṅkhaṃ vaivasvataṃ yamam | oṅkāraṃ ca dhanuḥ sarvāñjyāṃ ca sāvitrimuttamāṃ
अग्नि को बाण का फल और वैवस्वत यम को उसका पंख बनाकर, ओंकार को धनुष और परम सावित्री को उसकी प्रत्यंचा बनाकर,
श्लोक 30 (13.265.30)
ब्रह्माणं सारथिं कृत्वा विनियुज्य च सर्वशः । त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि बिभेद सः ॥
brahmāṇaṃ sārathiṃ kṛtvā viniyujya ca sarvaśaḥ | triparvaṇā triśalyena tena tāni bibheda saḥ
और ब्रह्मा को सारथि बनाकर तथा सबको यथास्थान नियुक्त करके, उन्होंने तीन गाँठों और तीन फलों वाले उस बाण से उन नगरों को भेद डाला।
श्लोक 31 (13.265.31)
शरेणादित्यवर्णेन कालाग्निसमतेजसा । तेऽसुराः सपुरास्तत्र दग्धा रुद्रेण भारत ॥
śareṇādityavarṇena kālāgnisamatejasā | te'surāḥ sapurāstatra dagdhā rudreṇa bhārata
हे भारत! सूर्य के समान वर्ण और कालाग्नि के समान तेज वाले उस बाण से रुद्र ने वहाँ उन असुरों को उनके पुरों सहित भस्म कर दिया।
श्लोक 32 (13.265.32)
तं चैवाङ्कगतं दृष्ट्वा बालं पञ्चशिखं पुनः । उमा जिज्ञासमाना वै कोऽयमित्यब्रवीत्तदा ॥
taṃ caivāṅkagataṃ dṛṣṭvā bālaṃ pañcaśikhaṃ punaḥ | umā jijñāsamānā vai ko'yamityabravīttadā
तब उमा ने अपनी गोद में बैठे उस पाँच शिखाओं वाले बालक को देखकर जानना चाहा और पूछा, "यह कौन है?"
श्लोक 33 (13.265.33)
असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः । सवज्रं स्तम्भयामास तं बाहुं परिघोपमम् ॥
asūyataśca śakrasya vajreṇa prahariṣyataḥ | savajraṃ stambhayāmāsa taṃ bāhuṃ parighopamam
असूया से भरे इन्द्र जब वज्र से प्रहार करने ही वाले थे, तब उन्होंने परिघ के समान उस भुजा को वज्र सहित स्तम्भित कर दिया।
श्लोक 34 (13.265.34)
न संयुयुधिरे चैव देवास्तं भुवनेश्वरम् । सप्रजापतयः सर्वे तस्मिन्मुमुहुरीश्वरे ॥
na saṃyuyudhire caiva devāstaṃ bhuvaneśvaram | saprajāpatayaḥ sarve tasminmumuhurīśvare
देवताओं ने उन भुवनेश्वर से युद्ध नहीं किया; प्रजापतियों सहित सभी उन ईश्वर के विषय में मोहित हो गए।
श्लोक 35 (13.265.35)
ततो ध्यात्वा च भगवान्ब्रह्मा तममितौजसम् । अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तमुमापतिम् ॥
tato dhyātvā ca bhagavānbrahmā tamamitaujasam | ayaṃ śreṣṭha iti jñātvā vavande tamumāpatim
तब भगवान् ब्रह्मा ने ध्यान करके उन अमित तेजस्वी को पहचाना और "ये ही श्रेष्ठ हैं" ऐसा जानकर उन उमापति को प्रणाम किया।
श्लोक 36 (13.265.36)
ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः । बभूव स तदा बालः प्रययौ तु यथापुरम् ॥
tataḥ prasādayāmāsurumāṃ rudraṃ ca te surāḥ | babhūva sa tadā bālaḥ prayayau tu yathāpuram
तब देवताओं ने उमा और रुद्र को प्रसन्न किया; और वे तब बालक हो गए तथा पहले की भाँति चले गए।
श्लोक 37 (13.265.37)
स चापि ब्राह्मणो भूत्वा दुर्वासा नाम वीर्यवान् । द्वारवत्यां मम गृहे चिरं कालमुपावसत् ॥
sa cāpi brāhmaṇo bhūtvā durvāsā nāma vīryavān | dvāravatyāṃ mama gṛhe ciraṃ kālamupāvasat
वही पराक्रमी शिव दुर्वासा नामक ब्राह्मण होकर द्वारका में मेरे घर में बहुत समय तक रहे।
श्लोक 38 (13.265.38)
विप्रकारान्प्रयुङ्क्ते स्म सुबहून्मम वेश्मनि । तानुदारतया चाहं चक्षमे चातिदुःसहान् ॥
viprakārānprayuṅkte sma subahūnmama veśmani | tānudāratayā cāhaṃ cakṣame cātiduḥsahān
मेरे घर में उन्होंने मुझे बहुत प्रकार से कष्ट पहुँचाया, और मैंने उदारता से उन अत्यन्त असह्य कष्टों को सह लिया।
श्लोक 39 (13.265.39)
स वै रुद्रः स च शिवः सोग्निः सर्वः स सर्वजित् । स चैवेन्द्रश्च वायुश्च सोऽश्विनौ स च विद्युतः ॥
sa vai rudraḥ sa ca śivaḥ sogniḥ sarvaḥ sa sarvajit | sa caivendraśca vāyuśca so'śvinau sa ca vidyutaḥ
वे ही रुद्र हैं, वे ही शिव हैं, वे ही अग्नि हैं, वे ही सर्व और सर्वजित् हैं; वे ही इन्द्र और वायु हैं, वे ही दोनों अश्विनीकुमार हैं और वे ही विद्युत् हैं।
श्लोक 40 (13.265.40)
स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः । स कालः सोन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि च ॥
sa candramāḥ sa ceśānaḥ sa sūryo varuṇaśca saḥ | sa kālaḥ sontako mṛtyuḥ sa yamo rātryahāni ca
वे ही चन्द्रमा हैं, वे ही ईशान हैं, वे ही सूर्य और वरुण हैं; वे ही काल, अन्तक, मृत्यु, यम और रात-दिन हैं।
श्लोक 41 (13.265.41)
मासार्धमासा ऋतवः सन्ध्ये संवत्सरश्च सः । स धाता स विधाता च विश्वकर्मा स सर्ववित् ॥
māsārdhamāsā ṛtavaḥ sandhye saṃvatsaraśca saḥ | sa dhātā sa vidhātā ca viśvakarmā sa sarvavit
वे ही मास और पक्ष, ऋतुएँ, दोनों सन्ध्याएँ और संवत्सर हैं; वे ही धाता और विधाता हैं, वे ही विश्वकर्मा और सर्वज्ञ हैं।
श्लोक 42 (13.265.42)
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव दिशोऽथ प्रदिशस्तथा । विश्वमूर्तिरमेयात्मा भगवान्परमद्युतिः ॥
nakṣatrāṇi grahāścaiva diśo'tha pradiśastathā | viśvamūrtirameyātmā bhagavānparamadyutiḥ
वे ही नक्षत्र और ग्रह हैं, वे ही दिशाएँ और उपदिशाएँ हैं; वे विश्वरूप, अमेयात्मा और परम तेजस्वी भगवान् हैं।
श्लोक 43 (13.265.43)
एकधा च द्विधा चैव बहुधा च स एव हि । शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा ॥
ekadhā ca dvidhā caiva bahudhā ca sa eva hi | śatadhā sahasradhā caiva tathā śatasahasradhā
वे ही एक रूप, दो रूप और अनेक रूप हैं; वे ही सौ, हजार और लाख रूपों वाले हैं।
श्लोक 44 (13.265.44)
ईदृशः स महादेवो भूयश्च भगवानतः । न हि शक्या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥
īdṛśaḥ sa mahādevo bhūyaśca bhagavānataḥ | na hi śakyā guṇā vaktumapi varṣaśatairapi
महादेव ऐसे हैं, और भगवान् इससे भी बढ़कर हैं; सैकड़ों वर्षों में भी उनके गुणों का वर्णन नहीं किया जा सकता।