अनुशासन पर्व · अध्याय 268
सज्जन और दुर्जन के लक्षण
युधिष्ठिर पूछते हैं कि धर्म की निन्दा करने वाले और उसका पालन करने वाले कहाँ जाते हैं। भीष्म बताते हैं कि पहले नरक में और दूसरे स्वर्ग में जाते हैं, फिर सज्जनों के आचरण का वर्णन करते हैं: वृद्धों, अतिथियों और निर्बलों के प्रति शिष्टता, सत्य (बहुला गौ के उदाहरण सहित), गौओं और ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा, तथा भोजन, वाणी और व्यवहार के नियम। अन्त में वे सिखाते हैं कि छिपाया हुआ पाप बढ़ता है, जबकि स्वीकार किया और प्रायश्चित्त से धोया हुआ पाप नष्ट हो जाता है, और धर्म का आचरण दिखावे के बिना करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.268.1)
ये च धर्ममसूयन्ते ये चैनं पर्युपासते । ब्रवीतु मे भवानेतत्क्व ते गच्छन्ति तादृशाः ॥
ye ca dharmamasūyante ye cainaṃ paryupāsate | bravītu me bhavānetatkva te gacchanti tādṛśāḥ
जो लोग धर्म में दोष निकालते हैं और जो उसकी उपासना करते हैं, हे पितामह, आप मुझे बताइए कि ऐसे लोग कहाँ जाते हैं?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.268.2)
रजसा तमसा चैव समवस्तीर्णचेतसः । नरकं प्रतिपद्यन्ते धर्मविद्वेषिणो जनाः ॥
rajasā tamasā caiva samavastīrṇacetasaḥ | narakaṃ pratipadyante dharmavidveṣiṇo janāḥ
जिनके चित्त रजोगुण और तमोगुण से ढके हुए हैं और जो धर्म से द्वेष रखते हैं, वे लोग नरक में जाते हैं।
श्लोक 3 (13.268.3)
ये तु धर्मं महाराज सततं पर्युपासते । सत्यार्जवपराः सन्तस्ते वै स्वर्गभुजो नराः ॥
ye tu dharmaṃ mahārāja satataṃ paryupāsate | satyārjavaparāḥ santaste vai svargabhujo narāḥ
परन्तु हे महाराज, जो लोग सत्य और सरलता में लगे रहकर निरन्तर धर्म की उपासना करते हैं, वे सज्जन हैं और वे ही मनुष्य स्वर्ग का सुख भोगते हैं।
श्लोक 4 (13.268.4)
धर्म एव रतिस्तेषामाचार्योपासनाद्भवेत् । देवलोकं प्रपद्यन्ते ये धर्मं पर्युपासते ॥
dharma eva ratisteṣāmācāryopāsanādbhavet | devalokaṃ prapadyante ye dharmaṃ paryupāsate
उनका आनन्द धर्म में ही होता है, जो गुरु की सेवा से प्राप्त होता है। जो धर्म की उपासना करते हैं, वे देवलोक को जाते हैं।
श्लोक 5 (13.268.5)
मनुष्या यदि वा देवाः शरीरमुपताप्य वै । धर्मिणः सुखमेधन्ते लोभद्वेषविवर्जिताः ॥
manuṣyā yadi vā devāḥ śarīramupatāpya vai | dharmiṇaḥ sukhamedhante lobhadveṣavivarjitāḥ
चाहे मनुष्य हों या देवता, जो धर्मात्मा लोभ और द्वेष से रहित होते हैं, वे तप से शरीर को तपाकर सुख में बढ़ते हैं।
श्लोक 6 (13.268.6)
प्रथमं ब्रह्मणः पुत्रं धर्ममाहुर्मनीषिणः । धर्मिणः पर्युपासन्ते फलं पक्वमिवाशिनः ॥
prathamaṃ brahmaṇaḥ putraṃ dharmamāhurmanīṣiṇaḥ | dharmiṇaḥ paryupāsante phalaṃ pakvamivāśinaḥ
ज्ञानी लोग धर्म को ब्रह्मा का प्रथम पुत्र कहते हैं। धर्मात्मा लोग उसका सेवन वैसे ही करते हैं जैसे लोग पके हुए फल का आनन्द लेते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 7 (13.268.7)
असाधोः कीदृशं शीलं साधोश्चैव तु कीदृशम् । ब्रवीतु मे भवानेतत्सन्तोऽसन्तश्च कीदृशाः ॥
asādhoḥ kīdṛśaṃ śīlaṃ sādhoścaiva tu kīdṛśam | bravītu me bhavānetatsanto'santaśca kīdṛśāḥ
दुष्ट का आचरण कैसा होता है और सज्जन का कैसा? आप मुझे बताइए कि सज्जन कौन हैं और दुर्जन कौन?
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (13.268.8)
दुराधाराश्च दुर्धर्षा दुर्मुखाश्चाप्यसाधवः । साधवः शीलसम्पन्नाः शिष्टाचारस्य लक्षणम् ॥
durādhārāśca durdharṣā durmukhāścāpyasādhavaḥ | sādhavaḥ śīlasampannāḥ śiṣṭācārasya lakṣaṇam
दुष्ट लोग दुराचारी, उद्धत और कटुभाषी होते हैं; सज्जन शीलवान होते हैं। यही सदाचार का लक्षण है।
श्लोक 9 (13.268.9)
राजमार्गे गवां मध्ये जनमध्ये च धर्मिणः । नोपसेचन्ति राजेन्द्र सर्गं मूत्रपुरीषयोः ॥
rājamārge gavāṃ madhye janamadhye ca dharmiṇaḥ | nopasecanti rājendra sargaṃ mūtrapurīṣayoḥ
हे राजेन्द्र, धर्मात्मा लोग राजमार्ग पर, गौओं के बीच और जनसमूह के बीच मल-मूत्र का त्याग नहीं करते।
श्लोक 10 (13.268.10)
पञ्चानां यजनं कृत्वा शेषमश्नन्ति साधवः । न जल्पन्ति च भुञ्जाना न निद्रान्त्यार्द्रपाणयः ॥
pañcānāṃ yajanaṃ kṛtvā śeṣamaśnanti sādhavaḥ | na jalpanti ca bhuñjānā na nidrāntyārdrapāṇayaḥ
सज्जन पाँचों (देवता, पितर, प्राणी, अतिथि और कुटुम्बीजन) की पूजा करके जो शेष बचता है, उसे खाते हैं। वे भोजन करते समय बातचीत नहीं करते और गीले हाथ लिए सोते नहीं।
श्लोक 11 (13.268.11)
चित्रभानुमपां देवं गोष्ठं चैव चतुष्पथम् । ब्राह्मणं धार्मिकं वृद्धं ये कुर्वन्ति प्रदक्षिणम् ॥
citrabhānumapāṃ devaṃ goṣṭhaṃ caiva catuṣpatham | brāhmaṇaṃ dhārmikaṃ vṛddhaṃ ye kurvanti pradakṣiṇam
जो लोग अग्नि, जल के देवता, गोशाला, चौराहे और वृद्ध धर्मात्मा ब्राह्मण की दाहिनी ओर से परिक्रमा करते हैं,
श्लोक 12 (13.268.12)
वृद्धानां भारतप्तानां स्त्रीणां बालातुरस्य च । ब्राह्मणानां गवां राज्ञां पन्थानं ददते च ये ॥
vṛddhānāṃ bhārataptānāṃ strīṇāṃ bālāturasya ca | brāhmaṇānāṃ gavāṃ rājñāṃ panthānaṃ dadate ca ye
और जो मार्ग में वृद्धों, बोझ से थके हुओं, स्त्रियों, बालक और रोगी, तथा ब्राह्मणों, गौओं और राजाओं को रास्ता दे देते हैं,
श्लोक 13 (13.268.13)
अतिथीनां च सर्वेषां प्रेष्याणां स्वजनस्य च । सामान्यं भोजनं कुर्यात्स्वयं नाग्र्यशनं व्रजेत् ॥
atithīnāṃ ca sarveṣāṃ preṣyāṇāṃ svajanasya ca | sāmānyaṃ bhojanaṃ kuryātsvayaṃ nāgryaśanaṃ vrajet
और जो सब अतिथियों, सेवकों और अपने परिजनों के लिए भोजन सबके साथ बाँटकर करते हैं और स्वयं पहले खाने नहीं बैठते,
श्लोक 14 (13.268.14)
न सत्यार्जवधर्मस्य तुल्यमन्यच्च विद्यते । बहुला नाम गौस्तेन गतिमग्र्यां गता किल ॥
na satyārjavadharmasya tulyamanyacca vidyate | bahulā nāma gaustena gatimagryāṃ gatā kila
सत्य और सरलता के समान दूसरा कुछ नहीं है। कहा जाता है कि इन्हीं के बल से बहुला नाम की गौ ने उत्तम गति पाई।
श्लोक 15 (13.268.15)
मुनिशापाद्द्विजः कश्चिद्व्याघ्रतां समुपागतः । बहुलां भक्षणरुचिरास्वाद्य शपथेन तु ॥
muniśāpāddvijaḥ kaścidvyāghratāṃ samupāgataḥ | bahulāṃ bhakṣaṇarucirāsvādya śapathena tu
कोई ब्राह्मण मुनि के शाप से बाघ बन गया था। उसे बहुला को खाने की रुचि थी और उसने उसे अपने वश में कर लिया, परन्तु एक शपथ के कारण ही।
श्लोक 16 (13.268.16)
विमुच्य पीतवत्सां तां दृष्ट्वा स्मृत्वा पुरातनम् । जगाम लोकानमलान्सा स्वराष्ट्रं तथा पुनः ॥
vimucya pītavatsāṃ tāṃ dṛṣṭvā smṛtvā purātanam | jagāma lokānamalānsā svarāṣṭraṃ tathā punaḥ
बछड़े को दूध पिला चुकी उस गौ को उसने छोड़ दिया; उसे देखकर और पुरानी बात याद करके वह निर्मल लोकों को गई और फिर अपने देश को भी लौट आई।
श्लोक 17 (13.268.17)
तस्मात्सत्यार्जवरतो राजन्राष्ट्रं समानवम् । तारयित्वा सुखं स्वर्गं गन्तासि भरतर्षभ ॥
tasmātsatyārjavarato rājanrāṣṭraṃ samānavam | tārayitvā sukhaṃ svargaṃ gantāsi bharatarṣabha
इसलिए हे राजन्, सत्य और सरलता में लगे रहकर, अपने राष्ट्र को प्रजा सहित तारकर, हे भरतश्रेष्ठ, तुम सुखपूर्वक स्वर्ग जाओगे।
श्लोक 18 (13.268.18)
तथा शरणकामानां गोप्ता स्यात्स्वागतप्रदः ॥
tathā śaraṇakāmānāṃ goptā syātsvāgatapradaḥ
इसी प्रकार शरण चाहने वालों का रक्षक बने और उनका स्वागत करने वाला हो।
श्लोक 19 (13.268.19)
सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं देवनिर्मितम् । नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासविधिर्हि सः ॥
sāyaṃ prātarmanuṣyāṇāmaśanaṃ devanirmitam | nāntarā bhojanaṃ dṛṣṭamupavāsavidhirhi saḥ
देवताओं ने मनुष्यों का भोजन सायंकाल और प्रातःकाल निश्चित किया है; बीच में भोजन करना विहित नहीं देखा गया, क्योंकि यही उपवास का विधान है।
श्लोक 20 (13.268.20)
होमकाले यथा वह्निः काले होमं प्रतीक्षते । ऋतुकाले तथाऽऽधानं पितरश्च प्रतीक्षते । नान्यदा गच्छते यस्तु ब्रह्मचर्यं च तत्स्मृतम् ॥
homakāle yathā vahniḥ kāle homaṃ pratīkṣate | ṛtukāle tathā''dhānaṃ pitaraśca pratīkṣate | nānyadā gacchate yastu brahmacaryaṃ ca tatsmṛtam
जैसे अग्नि होम के समय उचित काल में आहुति की प्रतीक्षा करती है, वैसे ही ऋतुकाल में पितर गर्भाधान की प्रतीक्षा करते हैं; और जो पुरुष किसी दूसरे समय पत्नी के पास नहीं जाता, उसे भी ब्रह्मचर्य ही कहा गया है।
श्लोक 21 (13.268.21)
अमृतं ब्राह्मणा गाव इत्येतत्त्रयमेकतः । तस्माद्गोब्राह्मणान्नित्यमर्चयेत यथाविधि ॥
amṛtaṃ brāhmaṇā gāva ityetattrayamekataḥ | tasmādgobrāhmaṇānnityamarcayeta yathāvidhi
अमृत, ब्राह्मण और गौएँ—ये तीनों एक ही हैं। इसलिए गौओं और ब्राह्मणों की सदा विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 22 (13.268.22)
यजुषां संस्कृतं मांसमुपभुञ्जन्न दुष्यति । पृष्ठमांसं वृथामांसं पुत्रमांसं च तत्समम् ॥
yajuṣāṃ saṃskṛtaṃ māṃsamupabhuñjanna duṣyati | pṛṣṭhamāṃsaṃ vṛthāmāṃsaṃ putramāṃsaṃ ca tatsamam
यजुर्मन्त्र से संस्कार किया हुआ मांस खाने वाला दोषी नहीं होता। पीठ का मांस, व्यर्थ खाया हुआ मांस और पुत्र का मांस—ये तीनों समान हैं।
श्लोक 23 (13.268.23)
स्वदेशे परदेशे वाऽप्यतिथिं नोपवासयेत् । कर्म वै सफलं कृत्वा गुरुणां प्रतिपादयेत् ॥
svadeśe paradeśe vā'pyatithiṃ nopavāsayet | karma vai saphalaṃ kṛtvā guruṇāṃ pratipādayet
अपने देश में हो या परदेश में, अतिथि को कभी भूखा न रहने दे। अपने कर्म को सफल करके उसे गुरुजनों को अर्पित करे।
श्लोक 24 (13.268.24)
गुरुभ्यस्त्वासनं देयमभिवाद्याभिपूज्य च । गुरुमभ्यर्च्य वर्धन्ते आयुषा यशसा श्रिया ॥
gurubhyastvāsanaṃ deyamabhivādyābhipūjya ca | gurumabhyarcya vardhante āyuṣā yaśasā śriyā
गुरुजनों को प्रणाम और पूजन करके आसन देना चाहिए। गुरुओं की पूजा करने से मनुष्य आयु, यश और लक्ष्मी में बढ़ते हैं।
श्लोक 25 (13.268.25)
वृद्धान्नाभिभवेज्जातु न चैतान्प्रेषयेदिति । नासीनः स्यात्स्थितेष्वेवमायुरस्य न रिष्यते ॥
vṛddhānnābhibhavejjātu na caitānpreṣayediti | nāsīnaḥ syātsthiteṣvevamāyurasya na riṣyate
वह वृद्धों को कभी नीचा न दिखाए और उन्हें आज्ञा देकर न भेजे; जब वे खड़े हों तब स्वयं बैठा न रहे। ऐसा करने से उसकी आयु क्षीण नहीं होती।
श्लोक 26 (13.268.26)
न नग्नामीक्षते नारीं न नग्नान्पुरुषानपि । मैथुनं सततं गुप्तं तपश्चैव समाचरेत् ॥
na nagnāmīkṣate nārīṃ na nagnānpuruṣānapi | maithunaṃ satataṃ guptaṃ tapaścaiva samācaret
वह नग्न स्त्री को न देखे, न नग्न पुरुषों को; मैथुन को सदा गुप्त रखे और तप का आचरण करे।
श्लोक 27 (13.268.27)
तीर्थानां गुरवस्तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचि । दर्शनानां परं ज्ञानं सन्तोषः परमं सुखम् ॥
tīrthānāṃ guravastīrthaṃ śucīnāṃ hṛdayaṃ śuci | darśanānāṃ paraṃ jñānaṃ santoṣaḥ paramaṃ sukham
तीर्थों में गुरुजन ही तीर्थ हैं; पवित्र वस्तुओं में हृदय पवित्र है; दर्शनों में परम ज्ञान श्रेष्ठ है; और सन्तोष ही परम सुख है।
श्लोक 28 (13.268.28)
सायं प्रातश्च वृद्धानां शृणुयात्पुष्कला गिरः । श्रुतमाप्नोति हि नरः सततं वृद्धसेवया ॥
sāyaṃ prātaśca vṛddhānāṃ śṛṇuyātpuṣkalā giraḥ | śrutamāpnoti hi naraḥ satataṃ vṛddhasevayā
सायं और प्रातः वृद्धजनों की समृद्ध वाणी सुने; वृद्धों की निरन्तर सेवा से मनुष्य शास्त्र-ज्ञान पाता है।
श्लोक 29 (13.268.29)
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् । यच्छेद्वाङ्मनसी नित्यमिन्द्रियाणि तथैव च ॥
svādhyāye bhojane caiva dakṣiṇaṃ pāṇimuddharet | yacchedvāṅmanasī nityamindriyāṇi tathaiva ca
स्वाध्याय और भोजन के समय दाहिना हाथ बाहर (यज्ञोपवीत को दाएँ हाथ के नीचे से) रखे, और वाणी, मन तथा इन्द्रियों को सदा संयम में रखे।
श्लोक 30 (13.268.30)
संस्कृतं पायसं नित्यं यावकं कृसरं हविः । अष्टकाः पितृदैवत्या ग्रहाणामभिपूजनम् ॥
saṃskṛtaṃ pāyasaṃ nityaṃ yāvakaṃ kṛsaraṃ haviḥ | aṣṭakāḥ pitṛdaivatyā grahāṇāmabhipūjanam
खीर, यावक, कृसर और हवि सदा विधिपूर्वक तैयार करे; अष्टका श्राद्ध पितरों और देवताओं के लिए हैं; और ग्रहों का पूजन करना चाहिए।
श्लोक 31 (13.268.31)
श्मश्रुकर्मणि मङ्गल्यं क्षुतानामभिनन्दनम् । व्याधितानां च सर्वेषामायुषामभिनन्दनम् ॥
śmaśrukarmaṇi maṅgalyaṃ kṣutānāmabhinandanam | vyādhitānāṃ ca sarveṣāmāyuṣāmabhinandanam
दाढ़ी बनवाते समय मंगलवचन कहे; छींकने वालों का अभिनन्दन करे; और सब रोगियों को दीर्घायु की शुभकामना दे।
श्लोक 32 (13.268.32)
न जातु त्वमिति ब्रूयादापन्नोपि महत्तरम् । त्वंकारो वा वधो वेति विद्वत्सु न विशिष्यते । अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत् ॥
na jātu tvamiti brūyādāpannopi mahattaram | tvaṃkāro vā vadho veti vidvatsu na viśiṣyate | avarāṇāṃ samānānāṃ śiṣyāṇāṃ ca samācaret
संकट में पड़ा हुआ भी मनुष्य अपने से बड़े को कभी “तू” न कहे; क्योंकि विद्वानों में “तू” कहना और वध करना एक समान माना जाता है। छोटों, बराबर वालों और शिष्यों के साथ वह ऐसा व्यवहार कर सकता है।
श्लोक 33 (13.268.33)
पापमाचरते नित्यं हृदयं पापकर्मणाम् । ज्ञानपूर्वकृतं कर्म च्छादयन्ते ह्यसाधवः ॥
pāpamācarate nityaṃ hṛdayaṃ pāpakarmaṇām | jñānapūrvakṛtaṃ karma cchādayante hyasādhavaḥ
पापकर्म करने वालों का हृदय सदा पाप में ही लगा रहता है; दुष्ट लोग जान-बूझकर किए हुए कर्म को छिपाते हैं।
श्लोक 34 (13.268.34)
ज्ञानपूर्वं विनश्यन्ति गूहमाना महाजने । न मां मनुष्याः पश्यन्ति न मां पश्यन्ति देवताः ॥
jñānapūrvaṃ vinaśyanti gūhamānā mahājane | na māṃ manuṣyāḥ paśyanti na māṃ paśyanti devatāḥ
जो उसे लोगों से छिपाते हैं, वे जानते हुए भी नष्ट होते हैं, यह सोचकर कि “न मनुष्य मुझे देखते हैं, न देवता देखते हैं।”
श्लोक 35 (13.268.35)
पापेनाभिहितः पापः पापमेवाभिजायते ॥
pāpenābhihitaḥ pāpaḥ pāpamevābhijāyate
पाप से मारा गया पापी फिर पाप में ही जन्म लेता है।
श्लोक 36 (13.268.36)
यथा वार्धुषिको वृद्धिं दिनभेदे प्रतीक्षते । धर्मेण पिहितं पापं धर्ममेवाभिवर्धयेत् ॥
yathā vārdhuṣiko vṛddhiṃ dinabhede pratīkṣate | dharmeṇa pihitaṃ pāpaṃ dharmamevābhivardhayet
जैसे ब्याजखोर निश्चित दिन आने पर अपने ब्याज की प्रतीक्षा करता है, वैसे ही धर्म से ढके हुए पाप के साथ मनुष्य धर्म को ही बढ़ाता रहे।
श्लोक 37 (13.268.37)
यथा लवणमम्भोभिराप्लुतं प्रविलीयते । प्रायश्चित्तहतं पापं तथा सद्यः प्रणश्यति ॥
yathā lavaṇamambhobhirāplutaṃ pravilīyate | prāyaścittahataṃ pāpaṃ tathā sadyaḥ praṇaśyati
जैसे पानी में डाला गया नमक घुल जाता है, वैसे ही प्रायश्चित्त से आहत पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है।
श्लोक 38 (13.268.38)
तस्मात्पापं न गूहेत गूहमानं विवर्धते । कृत्वा तु साधुष्वाख्यायाधर्मं प्रशमयन्त्युत ॥
tasmātpāpaṃ na gūheta gūhamānaṃ vivardhate | kṛtvā tu sādhuṣvākhyāyādharmaṃ praśamayantyuta
इसलिए पाप को छिपाना नहीं चाहिए; छिपाने से वह बढ़ता है। सज्जनों को अधर्म बता देने पर लोग उसे शान्त कर लेते हैं।
श्लोक 39 (13.268.39)
आशया सञ्चितं द्रव्यं स्वकाले नोपभुज्यते । अन्ये चैतत्प्रपद्यन्ते वियोगे तस्य देहिनः ॥
āśayā sañcitaṃ dravyaṃ svakāle nopabhujyate | anye caitatprapadyante viyoge tasya dehinaḥ
आशा से जोड़ा हुआ धन समय पर भोगा नहीं जाता; उस देहधारी के चले जाने पर दूसरे लोग उसे ले लेते हैं।
श्लोक 40 (13.268.40)
तद्धर्मसाधनं नित्यं सङ्कल्पाद्धनमार्जयेत् । मननं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः । तस्मात्सर्वाणि भूतानि धर्ममेव समासते ॥
taddharmasādhanaṃ nityaṃ saṅkalpāddhanamārjayet | mananaṃ sarvabhūtānāṃ dharmamāhurmanīṣiṇaḥ | tasmātsarvāṇi bhūtāni dharmameva samāsate
वह धन धर्म का साधन है; दृढ़ संकल्प से मनुष्य सदा धन कमाए। ज्ञानी लोग धर्म को सब प्राणियों के मन का विषय कहते हैं; इसलिए सब प्राणी धर्म का ही आश्रय लेते हैं।
श्लोक 41 (13.268.41)
एक एव चरेद्धर्मं न धर्मध्वजिको भवेत् । धर्मवाणिजका ह्येते ये धर्ममुपभुञ्जते ॥
eka eva careddharmaṃ na dharmadhvajiko bhavet | dharmavāṇijakā hyete ye dharmamupabhuñjate
मनुष्य अकेला ही धर्म का आचरण करे, धर्म की ध्वजा फहराने वाला न बने। जो धर्म को भोगते हैं, वे धर्म के व्यापारी हैं।
श्लोक 42 (13.268.42)
अर्चेद्देवानदम्भेन सेवेताऽमायया गुरून् । धनं निदध्यात्पात्रेषु परत्रार्थं समावृतम् ॥
arceddevānadambhena sevetā'māyayā gurūn | dhanaṃ nidadhyātpātreṣu paratrārthaṃ samāvṛtam
बिना दम्भ के देवताओं की पूजा करे और बिना छल के गुरुजनों की सेवा करे; परलोक के लिए धन को सुरक्षित रखकर सुपात्रों में स्थापित करे।