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अनुशासन पर्व · अध्याय 269

भाग्य, प्रयत्न और कर्म का फल

युधिष्ठिर देखते हैं कि मनुष्य प्रयत्न करके भी असफल होते हैं और बिना प्रयत्न के भी सफल, और पूछते हैं कि लाभ-हानि किससे तय होती है। भीष्म उत्तर देते हैं कि जिसका उद्योग धन नहीं देता वह तप का आश्रय ले, क्योंकि बिना बोया कुछ नहीं उगता; दान, वृद्धसेवा और अहिंसा से धन, बुद्धि और दीर्घायु मिलती है; और हर प्राणी का सुख-दुःख उसके जन्म और स्वभाव के अनुसार होता है, इसलिए युधिष्ठिर स्थिर रहें।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.269.1)

नाभागधेयः प्राप्नोति धनं सुबलवानपि । भागधेयान्वितस्त्वर्थान्कृशो बालश्च विन्दति ॥

nābhāgadheyaḥ prāpnoti dhanaṃ subalavānapi | bhāgadheyānvitastvarthānkṛśo bālaśca vindati

जिसका भाग्य नहीं है, वह कितना ही बलवान क्यों न हो, धन नहीं पाता; पर भाग्यवान मनुष्य दुर्बल या बालक होने पर भी धन पा लेता है।

श्लोक 2 (13.269.2)

नालाभकाले लभते प्रयत्नेऽपि कृते सति । लाभकालेऽप्रयत्नेन लभते विपुलं धनम् ॥

nālābhakāle labhate prayatne'pi kṛte sati | lābhakāle'prayatnena labhate vipulaṃ dhanam

लाभ का समय न हो तो प्रयत्न करने पर भी मनुष्य कुछ नहीं पाता; और लाभ का समय हो तो बिना प्रयत्न के ही बहुत धन पा लेता है।

श्लोक 3 (13.269.3)

कृतयत्नाफलाश्चैव दृश्यन्ते शतशो नराः । अयत्नेनैधमानाश्च दृश्यन्ते बहवो जनाः ॥

kṛtayatnāphalāścaiva dṛśyante śataśo narāḥ | ayatnenaidhamānāśca dṛśyante bahavo janāḥ

सैकड़ों मनुष्य ऐसे दिखाई देते हैं जिनके प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं, और बहुत-से लोग बिना प्रयत्न के ही उन्नति करते दिखाई देते हैं।

श्लोक 4 (13.269.4)

यदि यत्नो भवेन्मर्त्यः स सर्वं फलमाप्नुयात् । नालभ्यं चोपलभ्येत नृणां भरतसत्तम ॥

yadi yatno bhavenmartyaḥ sa sarvaṃ phalamāpnuyāt | nālabhyaṃ copalabhyeta nṛṇāṃ bharatasattama

यदि प्रयत्न ही सब कुछ होता, तो मनुष्य सब फल पा लेता; और हे भरतश्रेष्ठ, मनुष्यों के लिए कुछ भी अप्राप्य न रहता।

श्लोक 5 (13.269.5)

प्रयत्नं कृतवन्तोपि दृश्यन्ते ह्यफला नराः । मार्गत्यागशतैरर्थानमार्गश्चापरः सुखी ॥

prayatnaṃ kṛtavantopi dṛśyante hyaphalā narāḥ | mārgatyāgaśatairarthānamārgaścāparaḥ sukhī

प्रयत्न करने वाले भी निष्फल दिखाई देते हैं; और कोई दूसरा सैकड़ों बार मार्ग छोड़कर धन पा लेता है और मार्ग से हटकर भी सुखी रहता है।

श्लोक 6 (13.269.6)

अकार्यमसकृत्कृत्वा दृश्यन्ते ह्यधना नराः । धनयुक्ताः स्वकर्मस्था दृश्यन्ते चापरेऽधनाः ॥

akāryamasakṛtkṛtvā dṛśyante hyadhanā narāḥ | dhanayuktāḥ svakarmasthā dṛśyante cāpare'dhanāḥ

जो बार-बार न करने योग्य काम करते हैं, ऐसे लोग निर्धन दिखाई देते हैं; कुछ लोग अपने कर्म में लगे रहकर धनवान दिखते हैं और कुछ दूसरे निर्धन।

श्लोक 7 (13.269.7)

अधीत्य नीतिशास्त्राणि नीतियुक्तो न दृश्यते । अनभिज्ञश्च साचिव्यं गमितः केन हेतुना ॥

adhītya nītiśāstrāṇi nītiyukto na dṛśyate | anabhijñaśca sācivyaṃ gamitaḥ kena hetunā

नीतिशास्त्रों को पढ़कर भी कोई मनुष्य नीतिमान नहीं दिखाई देता, और कोई अनजान मंत्रीपद पर पहुँचा दिया जाता है—इसका क्या कारण है?

श्लोक 8 (13.269.8)

विद्यायुक्तो ह्यविद्यश्च धनवान्दुर्मतिस्तथा । यदि विद्यामुपाश्रित्य नरः सुखमवाप्नुयात् ॥

vidyāyukto hyavidyaśca dhanavāndurmatistathā | yadi vidyāmupāśritya naraḥ sukhamavāpnuyāt

कोई विद्या से युक्त होकर भी अविद्वान-सा रहता है, और धनी मनुष्य भी बुद्धिहीन होता है। यदि मनुष्य विद्या का आश्रय लेकर सुख पा सकता,

श्लोक 9 (13.269.9)

न विद्वान्विद्यया हीनं वृत्त्यर्थमुपसंश्रयेत् । यथा पिपासां जयति पुरुषः प्राप्य वै जलम् ॥

na vidvānvidyayā hīnaṃ vṛttyarthamupasaṃśrayet | yathā pipāsāṃ jayati puruṣaḥ prāpya vai jalam

तो विद्वान मनुष्य अपनी जीविका के लिए विद्याहीन के पास न जाता। जैसे जल पाकर मनुष्य प्यास को जीत लेता है,

श्लोक 10 (13.269.10)

इष्टार्थो विद्यया ह्येव न विद्यां प्रजहेन्नरः ॥

iṣṭārtho vidyayā hyeva na vidyāṃ prajahennaraḥ

वैसे ही विद्या से अपना अभीष्ट पा चुका मनुष्य विद्या को कभी न छोड़े।

श्लोक 11 (13.269.11)

नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि । तृणाग्रेणापि संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥

nāprāptakālo mriyate viddhaḥ śaraśatairapi | tṛṇāgreṇāpi saṃspṛṣṭaḥ prāptakālo na jīvati

जिसका समय नहीं आया, वह सैकड़ों बाणों से बिंधकर भी नहीं मरता; और जिसका समय आ गया, वह घास की नोक के स्पर्श से भी जीवित नहीं रहता।

भीष्म उवाच

श्लोक 12 (13.269.12)

ईहमानः समारम्भान्यदि नासादयेद्धनम् । उग्रं तपः समारोहेन्न ह्यनुप्तं प्ररोहति ॥

īhamānaḥ samārambhānyadi nāsādayeddhanam | ugraṃ tapaḥ samārohenna hyanuptaṃ prarohati

यदि मनुष्य उद्योग करने पर भी धन न पाए, तो उसे कठोर तप का आश्रय लेना चाहिए; क्योंकि बिना बोया हुआ कुछ नहीं उगता।

श्लोक 13 (13.269.13)

दानेन भोगी भवति मेधावी वृद्धसेवया । अहिंसया च दीर्घायुरिति प्राहुर्मनीषिणः ॥

dānena bhogī bhavati medhāvī vṛddhasevayā | ahiṃsayā ca dīrghāyuriti prāhurmanīṣiṇaḥ

दान से मनुष्य भोगवान होता है, वृद्धों की सेवा से बुद्धिमान और अहिंसा से दीर्घायु—ऐसा ज्ञानी लोग कहते हैं।

श्लोक 14 (13.269.14)

तस्माद्दद्यान्न याचेत पूजयेद्धार्मिकानपि । सुभाषी प्रियकृच्छान्तः सर्वसत्वाविहिंसकः ॥

tasmāddadyānna yāceta pūjayeddhārmikānapi | subhāṣī priyakṛcchāntaḥ sarvasatvāvihiṃsakaḥ

इसलिए मनुष्य दे, माँगे नहीं, और धर्मात्माओं का आदर करे; वह मधुर बोलने वाला, प्रिय करने वाला, शान्त और किसी प्राणी की हिंसा न करने वाला हो।

श्लोक 15 (13.269.15)

यदा प्रमाणं प्रसवः स्वभावश्च सुखासुखे । दंशकीटपिपीलानां स्थिरो भव युधिष्ठिर ॥

yadā pramāṇaṃ prasavaḥ svabhāvaśca sukhāsukhe | daṃśakīṭapipīlānāṃ sthiro bhava yudhiṣṭhira

जब डाँस, कीट और चींटियों तक के लिए भी जन्म का कारण और अपना स्वभाव ही सुख-दुःख का प्रमाण है, तो हे युधिष्ठिर, तुम स्थिर बने रहो।

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