अनुशासन पर्व · अध्याय 270
काल, धर्म और विश्वास
भीष्म कर्म में काल की भूमिका बताते हैं: काल प्राणियों की बुद्धि में प्रवेश करके धर्म और अधर्म को प्रवृत्त करता है, इसलिए सत्कर्म करने वाला विश्वास रख सकता है और दुष्कर्म करने वाला नहीं। काल से रक्षित धर्म को अधर्म छू नहीं सकता, और धर्म के द्वारा ले जाया गया मनुष्य परम पद पाता है। अन्त में वे कहते हैं कि धर्म के पालन से कोई वंचित नहीं है, क्योंकि सब प्राणी एक-से तत्त्वों से बने हैं, और पशु-योनि में भी सज्जनों का गुरु लोक ही है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.270.1)
कार्यते यच्च क्रियते सच्चासच्च कृताकृतम् । तत्राश्वसीत सत्कृत्वा असत्कृत्वा न विश्वसेत् ॥
kāryate yacca kriyate saccāsacca kṛtākṛtam | tatrāśvasīta satkṛtvā asatkṛtvā na viśvaset
जो कराया जाता है और जो किया जाता है, अच्छा या बुरा, किया हुआ या न किया हुआ—उसमें सत्कर्म करके मनुष्य विश्वास रखे, और दुष्कर्म करके विश्वास न करे।
श्लोक 2 (13.270.2)
काल एवान्तराशक्तिर्निग्रहानुग्रहौ ददत् । बुद्धिमाविश्य भूतानां धर्माधर्मौ प्रवर्तते ॥
kāla evāntarāśaktirnigrahānugrahau dadat | buddhimāviśya bhūtānāṃ dharmādharmau pravartate
काल ही भीतर की शक्ति है, जो निग्रह और अनुग्रह दोनों देता है; प्राणियों की बुद्धि में प्रवेश करके वही धर्म और अधर्म को प्रवृत्त करता है।
श्लोक 3 (13.270.3)
यदा त्वस्य भवेद्बुद्धिर्धर्मार्थस्य प्रदर्शनात् । तदाश्वसीत धर्मात्माऽदृढबुद्धिर्न विश्वसेत् ॥
yadā tvasya bhavedbuddhirdharmārthasya pradarśanāt | tadāśvasīta dharmātmā'dṛḍhabuddhirna viśvaset
जब धर्म का फल देखकर मनुष्य की बुद्धि ऐसी हो जाती है, तब धर्मात्मा उस पर विश्वास करे; जिसकी बुद्धि दृढ़ नहीं है, वह विश्वास न करे।
श्लोक 4 (13.270.4)
एतावन्मात्रमेतद्धि भूतानां प्राज्ञलक्षणम् । कालयुक्तोऽप्युभयविच्छेषं युक्तं समाचरेत् ॥
etāvanmātrametaddhi bhūtānāṃ prājñalakṣaṇam | kālayukto'pyubhayaviccheṣaṃ yuktaṃ samācaret
प्राणियों में बुद्धिमान का इतना ही लक्षण है: काल के अधीन होते हुए भी दोनों पक्षों को जानने वाला मनुष्य शेष के विषय में जो उचित है, वही करे।
श्लोक 5 (13.270.5)
यथा ह्युपस्थितैश्वर्याः पूजयन्ति नरा जनान् । एवमेवात्मनाऽऽत्मानं पूजयन्तीह धार्मिकाः ॥
yathā hyupasthitaiśvaryāḥ pūjayanti narā janān | evamevātmanā''tmānaṃ pūjayantīha dhārmikāḥ
जैसे ऐश्वर्य प्राप्त होने पर लोग दूसरे मनुष्यों का सत्कार करते हैं, वैसे ही इस लोक में धर्मात्मा लोग अपने आप से अपने आपका सम्मान करते हैं।
श्लोक 6 (13.270.6)
भावशुद्धिस्तु तपसा देवतानां च पूजया । सनातनेन शुद्ध्या च श्रुतदानजपैरपि । न ह्यशुद्धस्तु तां दद्याद्धर्मकाले कथञ्चन ॥
bhāvaśuddhistu tapasā devatānāṃ ca pūjayā | sanātanena śuddhyā ca śrutadānajapairapi | na hyaśuddhastu tāṃ dadyāddharmakāle kathañcana
भाव की शुद्धि तप से, देवताओं की पूजा से, सनातन शुद्धि से तथा शास्त्रश्रवण, दान और जप से होती है। जो अशुद्ध है, वह धर्म के समय उसे किसी प्रकार अर्पित न करे।
श्लोक 7 (13.270.7)
न ह्यधर्मतया धर्मं दद्यात्कालः कथञ्चन । तस्माद्विशुद्धमात्मानं जानीयाद्धर्मचारिणम् ॥
na hyadharmatayā dharmaṃ dadyātkālaḥ kathañcana | tasmādviśuddhamātmānaṃ jānīyāddharmacāriṇam
काल धर्म को अधर्म के रूप में कभी नहीं देगा। इसलिए मनुष्य अपने को शुद्ध और धर्म का आचरण करने वाला जाने।
श्लोक 8 (13.270.8)
स्प्रष्टुमप्यसमर्थो हि ज्वलन्तमिव पावकम् । अधर्मः सन्ततो धर्मं कालेन परिरक्षितम् ॥
spraṣṭumapyasamartho hi jvalantamiva pāvakam | adharmaḥ santato dharmaṃ kālena parirakṣitam
अधर्म चाहे सर्वत्र फैला हो, काल से रक्षित धर्म को छू तक नहीं सकता, जैसे जलती हुई अग्नि को कोई छू नहीं सकता।
श्लोक 9 (13.270.9)
कार्यावेतौ हि धर्मेण धर्मो हि विजयावहः । त्रयाणामपि लोकानामालोकः कारणं भवेत् ॥
kāryāvetau hi dharmeṇa dharmo hi vijayāvahaḥ | trayāṇāmapi lokānāmālokaḥ kāraṇaṃ bhavet
ये दोनों धर्म से सिद्ध करने योग्य हैं, क्योंकि धर्म विजय दिलाने वाला है; और वह तीनों लोकों के लिए प्रकाश का कारण होता है।
श्लोक 10 (13.270.10)
न तु कश्चिन्नयेत्प्राज्ञो गृहीत्वैव करे नरम् । ऊह्यमानस्तु धर्मेण प्राप्नुयात्परमच्युतम् । विश्वास एव कर्तव्यो बहुधर्मे शुभच्छले ॥
na tu kaścinnayetprājño gṛhītvaiva kare naram | ūhyamānastu dharmeṇa prāpnuyātparamacyutam | viśvāsa eva kartavyo bahudharme śubhacchale
कोई बुद्धिमान किसी मनुष्य को हाथ पकड़कर नहीं ले जाता; पर धर्म के द्वारा ले जाया जाता हुआ मनुष्य परम अविनाशी पद को पा लेता है। अनेक रूपों वाले धर्म में, उसके शुभ आवरण में भी, विश्वास ही करना चाहिए।
श्लोक 11 (13.270.11)
शूद्रोऽहं नाधिकारो मे चातुराश्रम्यसेवने । इति विज्ञानमपरे नात्मन्युपदधत्युत ॥
śūdro'haṃ nādhikāro me cāturāśramyasevane | iti vijñānamapare nātmanyupadadhatyuta
“मैं शूद्र हूँ, चारों आश्रमों के पालन में मेरा अधिकार नहीं है”—ऐसा विचार दूसरे लोग अपने ऊपर नहीं लेते।
श्लोक 12 (13.270.12)
विशेषेण च वक्ष्यामि चातुर्वर्ण्यस्य लिङ्गतः । पञ्चभूतशरीराणां सर्वेषां सदृशात्मनाम् ॥
viśeṣeṇa ca vakṣyāmi cāturvarṇyasya liṅgataḥ | pañcabhūtaśarīrāṇāṃ sarveṣāṃ sadṛśātmanām
और मैं चारों वर्णों के लक्षणों के आधार पर, पाँच भूतों के शरीर वाले और समान आत्मा वाले सब प्राणियों के विषय में विशेष रूप से कहूँगा।
श्लोक 13 (13.270.13)
लोकधर्मे च धर्मे च विशेषकरणं कृतम् । यथैकत्वं पुनर्यान्ति प्राणिनस्तत्र विस्तरः ॥
lokadharme ca dharme ca viśeṣakaraṇaṃ kṛtam | yathaikatvaṃ punaryānti prāṇinastatra vistaraḥ
लोकाचार और धर्म में भेद किया गया है; प्राणी फिर किस प्रकार एकता को प्राप्त होते हैं, उस विषय में विस्तार से कहना है।
श्लोक 14 (13.270.14)
अध्रुवो हि कथं लोकः स्मृतो धर्मः कथं ध्रुवः । यत्र कालो ध्रुवस्तात तत्र धर्मः सनातनः ॥
adhruvo hi kathaṃ lokaḥ smṛto dharmaḥ kathaṃ dhruvaḥ | yatra kālo dhruvastāta tatra dharmaḥ sanātanaḥ
लोक को अनित्य माना जाता है, तो धर्म नित्य कैसे है? हे तात, जहाँ काल नित्य है, वहाँ धर्म सनातन है।
श्लोक 15 (13.270.15)
सर्वेषां तुल्यदेहानां सर्वेषां सदृशात्मनाम् । कालो धर्मेण संयुक्तः शेष एव स्वयं गुरुः ॥
sarveṣāṃ tulyadehānāṃ sarveṣāṃ sadṛśātmanām | kālo dharmeṇa saṃyuktaḥ śeṣa eva svayaṃ guruḥ
समान शरीर वाले और समान आत्मा वाले सब प्राणियों के लिए काल धर्म से जुड़ा हुआ है; जो शेष रहता है, वही स्वयं गुरु है।
श्लोक 16 (13.270.16)
एवं सति न दोषोऽस्ति भूतानां धर्मसेवने । तिर्यग्योनावपि सतां लोक एव मतो गुरुः ॥
evaṃ sati na doṣo'sti bhūtānāṃ dharmasevane | tiryagyonāvapi satāṃ loka eva mato guruḥ
ऐसा होने पर प्राणियों के लिए धर्म का सेवन करने में कोई दोष नहीं है; पशु-योनि में भी सज्जनों के लिए लोक ही गुरु माना गया है।