अनुशासन पर्व · अध्याय 37
नित्य पुरुष और संसार की अनित्यता
भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि ब्रह्मा और देवता तथा प्राचीन काल के सभी ज्ञानी भी चले गए, इसलिए संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। केवल निर्वाण नाम की प्रकृति और उससे परे नित्य पुरुष अचल हैं। वे बताते हैं कि धर्म आदियुग में कैसे दीप्त था और कलियुग तक कैसे क्षीण हुआ, और युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे नारायण को परब्रह्म जानें, कर्म, ध्यान और नामकीर्तन से उनकी उपासना करें और उस पद को पाएँ जहाँ से लौटना नहीं होता।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.37.1)
सदृशं राजशार्दूल वृत्तस्य च कुलस्य च ॥
sadṛśaṃ rājaśārdūla vṛttasya ca kulasya ca
हे राजाओं में सिंह, यह तुम्हारे आचरण और कुल के अनुरूप ही है—
श्लोक 2 (13.37.2)
को राज्यं विपुलं गृह्य स्फीताकारं पुनर्महत् । निर्जितारातिसामन्तं देवराज्योपमं सुखम् ॥
ko rājyaṃ vipulaṃ gṛhya sphītākāraṃ punarmahat | nirjitārātisāmantaṃ devarājyopamaṃ sukham
कौन ऐसा है जो विशाल, समृद्ध और महान राज्य को पाकर, जिसके शत्रु और पड़ोसी सामन्त जीत लिए गए हों और जो देवराज के राज्य के समान सुखदायी हो,
श्लोक 3 (13.37.3)
राज्ये राज्यगुणा ये च तान्व्युदस्य नराधिप । दोषं पश्यति राजेन्द्र देहेऽस्मिन्पाञ्चभौतिके ॥
rājye rājyaguṇā ye ca tānvyudasya narādhipa | doṣaṃ paśyati rājendra dehe'sminpāñcabhautike
राज्य के गुणों को छोड़कर, हे नरेश, पाँच भूतों से बने इस देह में केवल दोष ही देखेगा, हे राजेन्द्र?
श्लोक 4 (13.37.4)
अतिक्रान्तास्त्वया राजन्वृत्तेन प्रपितामहाः । धर्मो विग्रहवान्धीरो विदुरश्च महायशाः ॥
atikrāntāstvayā rājanvṛttena prapitāmahāḥ | dharmo vigrahavāndhīro viduraśca mahāyaśāḥ
हे राजन्, समय के साथ तुम्हारे प्रपितामह चले गए, और धीर तथा महायशस्वी विदुर भी, जो मूर्तिमान धर्म थे।
श्लोक 5 (13.37.5)
सञ्जयश्च महातेजा ये चान्ये दिव्यदर्शनाः । प्रवृत्तज्ञानसम्पन्नास्तत्वज्ञानविदो नृप ॥
sañjayaśca mahātejā ye cānye divyadarśanāḥ | pravṛttajñānasampannāstatvajñānavido nṛpa
और महातेजस्वी सञ्जय तथा अन्य दिव्य दृष्टि वाले भी, जो लोक की प्रवृत्ति के ज्ञान से सम्पन्न और तत्त्वज्ञानी थे, हे राजन्।
श्लोक 6 (13.37.6)
तेऽतिक्रान्ता महाराज ब्रह्माद्याः ससुरासुराः । अनित्यं दुःखसंतप्तं जगदेतन्न संशयः ॥
te'tikrāntā mahārāja brahmādyāḥ sasurāsurāḥ | anityaṃ duḥkhasaṃtaptaṃ jagadetanna saṃśayaḥ
हे महाराज, वे सब चले गए, और देवताओं तथा असुरों सहित ब्रह्मा आदि भी चले गए। यह जगत् अनित्य और दुःख से सन्तप्त है, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 7 (13.37.7)
एवमेतान्महाबाहो ब्रह्माद्यान्ससुरासुरान् । अनित्यान्सततं पश्य मनुष्यादिषु का कथा ॥
evametānmahābāho brahmādyānsasurāsurān | anityānsatataṃ paśya manuṣyādiṣu kā kathā
हे महाबाहो, इसी प्रकार देवों और असुरों सहित ब्रह्मा आदि को भी सदा अनित्य देखो; फिर मनुष्य आदि की तो बात ही क्या?
श्लोक 8 (13.37.8)
नित्यां तु प्रकृतीमाह याऽसौ प्रसवधर्मिणी । अरूपिणीमनिर्देश्यामकृतां पुरुषातिगाम् ॥
nityāṃ tu prakṛtīmāha yā'sau prasavadharmiṇī | arūpiṇīmanirdeśyāmakṛtāṃ puruṣātigām
किन्तु प्रकृति को नित्य कहा गया है, जो प्रसव के स्वभाव वाली है, अरूप, अनिर्देश्य, अकृत और पुरुष से परे है।
श्लोक 9 (13.37.9)
तामत्यन्तसुखां सौम्यां निर्वाणमिति संज्ञिताम् । आहुर्ब्रह्मर्षयो ह्याद्यां भुवि चैव महर्षयः ॥
tāmatyantasukhāṃ saumyāṃ nirvāṇamiti saṃjñitām | āhurbrahmarṣayo hyādyāṃ bhuvi caiva maharṣayaḥ
वह अत्यन्त सुखमयी और सौम्य है, उसे निर्वाण नाम से कहा जाता है; ब्रह्मर्षि और पृथ्वी के महर्षि उसे आदि तत्त्व बताते हैं।
श्लोक 10 (13.37.10)
तया पुरुषरूपिण्या धर्मप्रकृतिकोऽनघ । स यात्येव हि निर्वाणं यत्तत्प्रकृतिसंज्ञितम् ॥
tayā puruṣarūpiṇyā dharmaprakṛtiko'nagha | sa yātyeva hi nirvāṇaṃ yattatprakṛtisaṃjñitam
हे निष्पाप, पुरुष का रूप धारण करने वाली उसी के द्वारा धर्मस्वभाव वाला मनुष्य निश्चय ही उस निर्वाण को प्राप्त होता है जो प्रकृति नाम से कहा जाता है।
श्लोक 11 (13.37.11)
स एष प्राकृतो धर्मो भ्राजत्यादियुगे नृप । विकारधर्माः शेषेषु युगेषु भरतर्षभ । भ्राजन्तेऽभ्यधिकं वीर संसारपथगोचराः ॥
sa eṣa prākṛto dharmo bhrājatyādiyuge nṛpa | vikāradharmāḥ śeṣeṣu yugeṣu bharatarṣabha | bhrājante'bhyadhikaṃ vīra saṃsārapathagocarāḥ
हे राजन्, यह प्राकृत धर्म आदियुग में प्रकाशित होता है। हे भरतश्रेष्ठ, शेष युगों में विकार के धर्म, जो संसार के मार्ग में चलने वाले हैं, हे वीर, अधिक प्रकाशित होते हैं।
श्लोक 12 (13.37.12)
प्रकृतीनां च सर्वासामकृता प्रकृतिः स्मृता । एवं प्रकृतिधर्मा हि वरां प्रकृतिमाश्रिता ॥
prakṛtīnāṃ ca sarvāsāmakṛtā prakṛtiḥ smṛtā | evaṃ prakṛtidharmā hi varāṃ prakṛtimāśritā
सब प्रकृतियों में अकृत प्रकृति को श्रेष्ठ कहा गया है। इस प्रकार धर्मस्वभाव वाले लोग उस श्रेष्ठ प्रकृति का आश्रय लेकर
श्लोक 13 (13.37.13)
पश्यन्ति परमां लोके दृष्टादृष्टानुदर्शिनीम् । सत्वादियुगपर्यन्ते त्रेतायुगसमुद्भवे ॥
paśyanti paramāṃ loke dṛṣṭādṛṣṭānudarśinīm | satvādiyugaparyante tretāyugasamudbhave
उस परम को देखते हैं, जो दृष्ट और अदृष्ट दोनों को देखने वाली है; यह सत्त्वप्रधान युग के अन्त में, त्रेतायुग के उदय के समय होता है।
श्लोक 14 (13.37.14)
कामं कामयमानेषु ब्राह्मणेषु तिरोहितः । कुपथेषु तु धर्मेषु प्रादुर्भूतेषु कौरव । जातो मन्दप्रचारो हि धर्मः कलियुगे नृप ॥
kāmaṃ kāmayamāneṣu brāhmaṇeṣu tirohitaḥ | kupatheṣu tu dharmeṣu prādurbhūteṣu kaurava | jāto mandapracāro hi dharmaḥ kaliyuge nṛpa
काम की इच्छा करने वाले ब्राह्मणों में वह तिरोहित हो गया, और जब धर्मों में कुमार्ग प्रकट हो गए, तब हे कौरव, कलियुग में धर्म मन्द गति वाला हो गया, हे राजन्।
श्लोक 15 (13.37.15)
नित्यस्तु पुरुषो ज्ञेयो विश्वरूपो निरञ्जनः । ब्रह्माद्या अपि देवाश्च यं सदा पर्युपासते ॥
nityastu puruṣo jñeyo viśvarūpo nirañjanaḥ | brahmādyā api devāśca yaṃ sadā paryupāsate
पुरुष को नित्य, विश्वरूप और निरञ्जन जानना चाहिए, जिसकी उपासना ब्रह्मा आदि देवता भी सदा करते हैं।
श्लोक 16 (13.37.16)
तं च नारायणं विद्धि परं ब्रह्मेति शाश्वतम् । तत्कर्म कुरु कायेन ध्यायस्व मनसा च तम् ॥
taṃ ca nārāyaṇaṃ viddhi paraṃ brahmeti śāśvatam | tatkarma kuru kāyena dhyāyasva manasā ca tam
उसे नारायण जानो, जो शाश्वत परब्रह्म है। शरीर से उसी का कर्म करो और मन से उसका ध्यान करो,
श्लोक 17 (13.37.17)
कीर्तयस्व च तन्नाम वाचा सर्वत्र भूपते । तत्पदं प्राप्नुहि प्राप्यं शाश्वतं चापुनर्भवम् ॥
kīrtayasva ca tannāma vācā sarvatra bhūpate | tatpadaṃ prāpnuhi prāpyaṃ śāśvataṃ cāpunarbhavam
और हे भूपते, वाणी से सर्वत्र उसका नाम कीर्तन करो। उस प्राप्य पद को प्राप्त करो, जो शाश्वत है और जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 18 (13.37.18)
इत्येतद्विष्णुमाश्रित्य संसारग्रहमोक्षणम् । कथितं ते महाबाहो किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
ityetadviṣṇumāśritya saṃsāragrahamokṣaṇam | kathitaṃ te mahābāho kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
इस प्रकार विष्णु का आश्रय लेकर संसार रूपी ग्राह से छूटने का उपाय मैंने तुमसे कहा, हे महाबाहो। अब और क्या सुनना चाहते हो?