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अनुशासन पर्व · अध्याय 38

सनत्कुमार और नारद: नौ सर्ग

युधिष्ठिर पूछते हैं कि जन्म-मरण में पीड़ित प्राणी दुःख से कैसे छूटें। भीष्म ब्रह्मा के पुत्रों का वर्णन करते हैं, जिनमें सनत्कुमार और सात महर्षि हैं, और फिर सनत्कुमार तथा नारद का संवाद सुनाते हैं। नारद अव्यक्त की उत्पत्ति और लय तथा परम पुरुष के विषय में पूछते हैं। सनत्कुमार नारायण का नाम बताते हैं और नौ सर्गों का क्रम कहते हैं, साथ ही ब्रह्मा के दिन-रात का परिमाण, पाँच महाभूत, इन्द्रियाँ और मन, और अन्त में चौबीस तत्त्वों की गणना।

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.38.1)

क्लिश्यमानेषु भूतेषु जातीमरणसागरे । यत्प्राप्य क्लेशं नाप्नोति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

kliśyamāneṣu bhūteṣu jātīmaraṇasāgare | yatprāpya kleśaṃ nāpnoti tanme brūhi pitāmaha

जन्म और मरण के सागर में प्राणी क्लेश पा रहे हैं। हे पितामह, मुझे वह बताइए जिसे पाकर मनुष्य क्लेश नहीं पाता।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.38.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सनत्कुमारस्य सतः संवादं नारदस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | sanatkumārasya sataḥ saṃvādaṃ nāradasya ca

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, पवित्र सनत्कुमार और नारद का संवाद।

श्लोक 3 (13.38.3)

सनत्कुमारो भगवान्ब्रह्मपुत्रो महायशाः । पूर्वजातास्त्रयस्तस्य कथ्यन्ते ब्रह्मवादिनः ॥

sanatkumāro bhagavānbrahmaputro mahāyaśāḥ | pūrvajātāstrayastasya kathyante brahmavādinaḥ

भगवान् सनत्कुमार ब्रह्मा के पुत्र और महायशस्वी थे; उनसे पहले उत्पन्न तीन ब्रह्मवादी बताए जाते हैं—

श्लोक 4 (13.38.4)

सनकः सनन्दनश्चैव तृतीयश्च सनातनः । जातमात्राश्च ते सर्वे प्रतिबुद्धा इति श्रुतिः ॥

sanakaḥ sanandanaścaiva tṛtīyaśca sanātanaḥ | jātamātrāśca te sarve pratibuddhā iti śrutiḥ

सनक, सनन्दन और तीसरे सनातन। ये सब जन्मते ही जाग्रत थे, ऐसा श्रुति का वचन है।

श्लोक 5 (13.38.5)

चतुर्थश्चैव तेषां स भगवान्योगवित्तमः । सनत्कुमार इति वै कथयन्ति महर्षयः ॥

caturthaścaiva teṣāṃ sa bhagavānyogavittamaḥ | sanatkumāra iti vai kathayanti maharṣayaḥ

उनमें चौथे वे भगवान् थे, जो योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ थे, जिन्हें महर्षि सनत्कुमार कहते हैं।

श्लोक 6 (13.38.6)

हैरण्यगर्भः स मुनिर्वसिष्ठः पञ्चमः स्मृतः । षष्ठः स्थाणुः स भगवानमेयात्मा त्रिशूलधृत् ॥

hairaṇyagarbhaḥ sa munirvasiṣṭhaḥ pañcamaḥ smṛtaḥ | ṣaṣṭhaḥ sthāṇuḥ sa bhagavānameyātmā triśūladhṛt

हिरण्यगर्भ से उत्पन्न मुनि वसिष्ठ पाँचवें माने गए हैं; छठे स्थाणु हैं, अमेयात्मा त्रिशूलधारी भगवान्।

श्लोक 7 (13.38.7)

ततोऽपरे समुत्पन्नाः पावकादारुणे क्रतौ । मनसा स्वयंभुवो हीमे मरीचिप्रमुखास्तथा ॥

tato'pare samutpannāḥ pāvakādāruṇe kratau | manasā svayaṃbhuvo hīme marīcipramukhāstathā

फिर भयंकर यज्ञ में अग्नि से अन्य उत्पन्न हुए, जो स्वयम्भू के मन से जन्मे थे: मरीचि और उनके साथी।

श्लोक 8 (13.38.8)

भृगुर्मरीचेरनुजो भृगोरप्यङ्गिरास्तथा । अनुजोङ्गिरसोऽथात्रिः पुलस्त्योत्रेस्तथाऽनुजः ॥

bhṛgurmarīceranujo bhṛgorapyaṅgirāstathā | anujoṅgiraso'thātriḥ pulastyotrestathā'nujaḥ

भृगु मरीचि के छोटे भाई हैं, उनके बाद अङ्गिरा; अङ्गिरा के छोटे अत्रि और अत्रि के छोटे पुलस्त्य हैं।

श्लोक 9 (13.38.9)

पुलस्त्यस्यानुजो विद्वान्पुलहो नु महाद्युतिः । पठ्यन्ते ब्रह्मजा ह्येते विद्वद्भिरमितौजसः ॥

pulastyasyānujo vidvānpulaho nu mahādyutiḥ | paṭhyante brahmajā hyete vidvadbhiramitaujasaḥ

पुलस्त्य के छोटे भाई विद्वान् और महातेजस्वी पुलह हैं। विद्वान् इन्हें ब्रह्मा के पुत्र और अपार बलशाली कहकर पढ़ते हैं।

श्लोक 10 (13.38.10)

सर्वमेतन्महाराज कुर्वन्नादिगुरुर्महान् । प्रभुर्विभुरनन्तश्रीर्ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

sarvametanmahārāja kurvannādigururmahān | prabhurvibhuranantaśrīrbrahmā lokapitāmahaḥ

हे महाराज, यह सब आदि गुरु महान् प्रभु, विभु और अनन्त शोभा वाले लोकपितामह ब्रह्मा ने किया।

श्लोक 11 (13.38.11)

मूर्तिमन्तोऽमृतीभूतास्तेजसाऽतितपोन्विताः । सनकप्रभृतयस्तत्र ये च प्राप्ताः परं पदम् । कृत्स्नं क्षयमनुप्राप्य विमुक्ता मूर्तिबन्धनात् ॥

mūrtimanto'mṛtībhūtāstejasā'titaponvitāḥ | sanakaprabhṛtayastatra ye ca prāptāḥ paraṃ padam | kṛtsnaṃ kṣayamanuprāpya vimuktā mūrtibandhanāt

मूर्तिमान् होकर भी अमर हुए, तेज और तप से सम्पन्न सनक आदि, जिन्होंने परम पद पाया, शरीर के पूर्ण क्षय को प्राप्त होकर देह के बन्धन से मुक्त हो गए।

श्लोक 12 (13.38.12)

सनत्कुमारस्तु विभुर्योगमास्थाय योगवित् । त्रीँल्लोकानचरच्छश्वदैश्वर्येण परेण हि ॥

sanatkumārastu vibhuryogamāsthāya yogavit | trīm̐llokānacaracchaśvadaiśvaryeṇa pareṇa hi

किन्तु योगवेत्ता विभु सनत्कुमार योग का आश्रय लेकर परम ऐश्वर्य के साथ सदा तीनों लोकों में विचरते रहे।

श्लोक 13 (13.38.13)

रुद्रश्चाप्यष्टगुणितं योगं प्राप्तो महायशाः । सूक्ष्ममष्टगुणं राजन्नितरे नृपसत्तम ॥

rudraścāpyaṣṭaguṇitaṃ yogaṃ prāpto mahāyaśāḥ | sūkṣmamaṣṭaguṇaṃ rājannitare nṛpasattama

महायशस्वी रुद्र ने भी अष्टगुण योग प्राप्त किया; हे नृपश्रेष्ठ, दूसरों ने भी सूक्ष्म अष्टगुण योग पाया।

श्लोक 14 (13.38.14)

मरीचिप्रमुखास्तात सर्वे सृष्ट्यर्थमेव ते । नियुक्ता राजशार्दूल तेषां सृष्टिं शृणुष्व मे ॥

marīcipramukhāstāta sarve sṛṣṭyarthameva te | niyuktā rājaśārdūla teṣāṃ sṛṣṭiṃ śṛṇuṣva me

हे तात, मरीचि आदि सब सृष्टि के लिए ही नियुक्त हुए थे, हे राजशार्दूल। उनकी सृष्टि मुझसे सुनो।

श्लोक 15 (13.38.15)

सप्त ब्रह्मण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः । सर्वे वेदेषु चैवोक्ताः खिलेषु च न संशयः ॥

sapta brahmaṇa ityete purāṇe niścayaṃ gatāḥ | sarve vedeṣu caivoktāḥ khileṣu ca na saṃśayaḥ

ये सात ब्रह्मा के पुत्र पुराण में निश्चित किए गए हैं; वेदों में और खिलों में भी इनका कथन है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 16 (13.38.16)

इतिहासपुराणे च श्रुतिरेषा सनातनी । ब्राह्मणा वरदानेतान्प्राहुर्वेदान्तपारगाः ॥

itihāsapurāṇe ca śrutireṣā sanātanī | brāhmaṇā varadānetānprāhurvedāntapāragāḥ

इतिहास और पुराण में भी यही सनातन श्रुति है; वेदान्त के पारगामी ब्राह्मण इन्हें वरदाता कहते हैं।

श्लोक 17 (13.38.17)

एतेषां पितरस्तात पुत्रा इत्यनुचक्षते । गणाः सप्त महाराज मूर्तयोऽमूर्तयस्तथा ॥

eteṣāṃ pitarastāta putrā ityanucakṣate | gaṇāḥ sapta mahārāja mūrtayo'mūrtayastathā

हे तात, इनके पितर इनके पुत्र कहे जाते हैं। हे महाराज, सात गण हैं, कुछ मूर्त और कुछ अमूर्त।

श्लोक 18 (13.38.18)

पितॄणां चैव राजेन्द्र पुत्रा देवा इति श्रुतिः । देवैर्व्याप्ता इमे लोका इत्येवमनुशुश्रुम ॥

pitṝṇāṃ caiva rājendra putrā devā iti śrutiḥ | devairvyāptā ime lokā ityevamanuśuśruma

और हे राजेन्द्र, देवता पितरों के पुत्र हैं, ऐसी श्रुति है। हमने सुना है कि ये लोक देवताओं से व्याप्त हैं।

श्लोक 19 (13.38.19)

कृष्णद्वैपायनाच्चैव देवस्थानात्तथैव च । देवलाच्च नरश्रेष्ठ काश्यपाच्च मया श्रुतम् ॥

kṛṣṇadvaipāyanāccaiva devasthānāttathaiva ca | devalācca naraśreṣṭha kāśyapācca mayā śrutam

यह मैंने कृष्ण द्वैपायन से, देवस्थान से, हे नरश्रेष्ठ देवल से और काश्यप से सुना है;

श्लोक 20 (13.38.20)

गौतमादपि कौण्डिन्याद्भारद्वाजात्तथैव च । मार्कण्डेयात्तथैवैतदृषेर्देवमतादपि ॥

gautamādapi kauṇḍinyādbhāradvājāttathaiva ca | mārkaṇḍeyāttathaivaitadṛṣerdevamatādapi

गौतम, कौण्डिन्य और भारद्वाज से भी, मार्कण्डेय से और ऋषि देवमत से भी।

श्लोक 21 (13.38.21)

पित्रा च मम राजेन्द्र श्राद्धकाले प्रभाषितम् । परं रहस्यं वेदान्तं प्रियं हि परमात्मनः ॥

pitrā ca mama rājendra śrāddhakāle prabhāṣitam | paraṃ rahasyaṃ vedāntaṃ priyaṃ hi paramātmanaḥ

हे राजेन्द्र, मेरे पिता ने भी श्राद्ध के समय मुझसे यह कहा था: यह परम रहस्य है, वेदान्त है और परमात्मा को प्रिय है।

श्लोक 22 (13.38.22)

अतः परं प्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छसि भारतः । तदिहैकमनोबुद्धिः शृणुष्वावहितो नृप । स्वायंभुवस्य संवादं नारदस्य च धीमतः ॥

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi yanmāṃ pṛcchasi bhārataḥ | tadihaikamanobuddhiḥ śṛṇuṣvāvahito nṛpa | svāyaṃbhuvasya saṃvādaṃ nāradasya ca dhīmataḥ

अब, हे भारत, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो वह मैं कहूँगा। हे राजन्, एकाग्र मन और बुद्धि से सावधान होकर सुनो: स्वयम्भू-पुत्र सनत्कुमार और बुद्धिमान नारद का संवाद।

श्लोक 23 (13.38.23)

सनत्कुमारो भगवान्दिव्यं जज्वाल तेजसा । अङ्गुष्ठमात्रो भूत्वा वै विचचार महाद्युतिः ॥

sanatkumāro bhagavāndivyaṃ jajvāla tejasā | aṅguṣṭhamātro bhūtvā vai vicacāra mahādyutiḥ

भगवान् सनत्कुमार दिव्य तेज से जगमगाते थे; अँगूठे के बराबर रूप लेकर वे महातेजस्वी विचरते थे।

श्लोक 24 (13.38.24)

स कदाचिन्महाभागो मेरुपृष्ठं समागमत् । नारदेन नरश्रेष्ठ मुनिना ब्रह्मवादिना ॥

sa kadācinmahābhāgo merupṛṣṭhaṃ samāgamat | nāradena naraśreṣṭha muninā brahmavādinā

एक बार वे महाभाग मेरु के शिखर पर आए, जहाँ ब्रह्मवेत्ता मुनि नारद उनसे मिले, हे नरश्रेष्ठ।

श्लोक 25 (13.38.25)

जिज्ञासमानावन्योन्यं सकाशे ब्रह्मणस्ततः । ब्रह्म भागवतौ तात परमार्थार्थचिन्तकौ ॥

jijñāsamānāvanyonyaṃ sakāśe brahmaṇastataḥ | brahma bhāgavatau tāta paramārthārthacintakau

एक-दूसरे को जानने की इच्छा से वे दोनों तब ब्रह्मा के समीप थे, हे तात, ब्रह्म के भक्त और परमार्थ का चिन्तन करने वाले।

श्लोक 26 (13.38.26)

मतिमान्मतिमच्छ्रेष्ठं बुद्धिमान्बुद्धिमत्तरम् । क्षेत्रवित्क्षेत्रविच्छ्रेष्ठं ज्ञानविज्ज्ञानमत्तमम् ॥

matimānmatimacchreṣṭhaṃ buddhimānbuddhimattaram | kṣetravitkṣetravicchreṣṭhaṃ jñānavijjñānamattamam

बुद्धिमान ने बुद्धिमानों में श्रेष्ठ से, मेधावी ने उससे भी अधिक मेधावी से, क्षेत्रज्ञ ने क्षेत्रज्ञों में श्रेष्ठ से और ज्ञानी ने ज्ञानियों में सर्वोत्तम से—

श्लोक 27 (13.38.27)

सनत्कुमारं तत्वज्ञं भगवन्तमरिंदम । लोकविल्लोकविच्छ्रेष्ठमात्मविच्चात्मवित्तमम् । सर्ववेदार्थकुशलं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥

sanatkumāraṃ tatvajñaṃ bhagavantamariṃdama | lokavillokavicchreṣṭhamātmaviccātmavittamam | sarvavedārthakuśalaṃ sarvaśāstraviśāradam

सनत्कुमार से, जो तत्त्वज्ञ और भगवान् हैं, हे अरिन्दम; लोकों के ज्ञाता और ऐसे ज्ञाताओं में श्रेष्ठ, आत्मज्ञ और आत्मज्ञों में सर्वोत्तम, सब वेदों के अर्थ में कुशल और सब शास्त्रों में निपुण हैं—

श्लोक 28 (13.38.28)

साङ्ख्ययोगं च यो वेद पाणावामलकं यथा । नारदोऽथ नरश्रेष्ठ तं पप्रच्छ महाद्युतिः ॥

sāṅkhyayogaṃ ca yo veda pāṇāvāmalakaṃ yathā | nārado'tha naraśreṣṭha taṃ papraccha mahādyutiḥ

जो साङ्ख्य और योग को हथेली पर रखे आँवले के समान जानते थे। तब महातेजस्वी नारद ने, हे नरश्रेष्ठ, उनसे प्रश्न किया।

नारद उवाच

श्लोक 29 (13.38.29)

त्रयोविंशतितत्वस्य अव्यक्तस्य महामुने । प्रभवं चाप्ययं चैव श्रोतुमिच्छामि तत्वतः ॥

trayoviṃśatitatvasya avyaktasya mahāmune | prabhavaṃ cāpyayaṃ caiva śrotumicchāmi tatvataḥ

हे महामुने, तेईस तत्त्वों वाले अव्यक्त की उत्पत्ति और लय मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ,

श्लोक 30 (13.38.30)

अध्यात्ममधिभूतं च अधिदैवं तथैव च । कालसङ्ख्याश्च सर्गं च स्रष्टारं पुरुषं प्रभुम् ॥

adhyātmamadhibhūtaṃ ca adhidaivaṃ tathaiva ca | kālasaṅkhyāśca sargaṃ ca sraṣṭāraṃ puruṣaṃ prabhum

अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव, काल की गणना और सृष्टि, तथा सृष्टा पुरुष प्रभु के विषय में,

श्लोक 31 (13.38.31)

यं विश्वमुपजीवन्ति येन सर्वमिदं ततम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

yaṃ viśvamupajīvanti yena sarvamidaṃ tatam | yaṃ prāpya na nivartante tadbhavānvaktumarhati

जिस पर समस्त जगत् जीता है, जिससे यह सब व्याप्त है, और जिसे पाकर लोग लौटते नहीं—उसके विषय में आप मुझे बताने योग्य हैं।

सनत्कुमार उवाच

श्लोक 32 (13.38.32)

यं विश्वमुपजीवन्ति यमाहुः पुरुषं परम् । तं वै शृणु महाबुद्धे नारायणमनामयम् ॥

yaṃ viśvamupajīvanti yamāhuḥ puruṣaṃ param | taṃ vai śṛṇu mahābuddhe nārāyaṇamanāmayam

हे महाबुद्धे, सुनो, जिस पर विश्व जीता है और जिसे परम पुरुष कहते हैं, वह रोगरहित नारायण है।

श्लोक 33 (13.38.33)

एष नारायणो नाम यं विश्वमुपजीवति । एष स्रष्टा विधाता च भर्ता पालयिता प्रभुः ॥

eṣa nārāyaṇo nāma yaṃ viśvamupajīvati | eṣa sraṣṭā vidhātā ca bhartā pālayitā prabhuḥ

यही नारायण नाम वाला है, जिस पर विश्व जीता है। यही सृष्टा, विधाता, भर्ता, पालक और प्रभु है।

श्लोक 34 (13.38.34)

प्राप्यैनं न निवर्तन्ते यतयोऽध्यात्मचिन्तकाः । एतावदेव वक्तव्यं मया नारद पृच्छते ॥

prāpyainaṃ na nivartante yatayo'dhyātmacintakāḥ | etāvadeva vaktavyaṃ mayā nārada pṛcchate

अध्यात्म का चिन्तन करने वाले यति उसे पाकर नहीं लौटते। हे नारद, तुम्हारे पूछने पर मुझे बस इतना ही कहना है।

श्लोक 35 (13.38.35)

परं न वेद्मि तत्सर्गं यावांश्चायं यथाप्यहम् । श्रूयतामानुपूर्व्येण न च सर्गः प्रयत्नतः ॥

paraṃ na vedmi tatsargaṃ yāvāṃścāyaṃ yathāpyaham | śrūyatāmānupūrvyeṇa na ca sargaḥ prayatnataḥ

इसके आगे मैं उस सृष्टि को नहीं जानता कि वह कितनी विस्तृत है, उतना ही जितना स्वयं जानता हूँ। इसे क्रम से सुना जाए, सृष्टि के वर्णन में प्रयत्न की अति न हो।

श्लोक 36 (13.38.36)

यथा कालपरीमाणं तत्वानामृषिसत्तम । अध्यात्ममधिभूतं च अधिदैवं तथैव च । कालसंख्यां च सर्गं च सर्वमेव महामुने ॥

yathā kālaparīmāṇaṃ tatvānāmṛṣisattama | adhyātmamadhibhūtaṃ ca adhidaivaṃ tathaiva ca | kālasaṃkhyāṃ ca sargaṃ ca sarvameva mahāmune

हे ऋषिश्रेष्ठ, तत्त्वों के काल का परिमाण, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव, काल की गणना और सृष्टि, हे महामुने, सब कुछ—

श्लोक 37 (13.38.37)

तमसः कुर्वतः सर्गं तामसो ह्यभिधीयते । ब्रह्मविद्भिर्द्विजैर्नित्यं नित्यमध्यात्मचिन्तकैः ॥

tamasaḥ kurvataḥ sargaṃ tāmaso hyabhidhīyate | brahmavidbhirdvijairnityaṃ nityamadhyātmacintakaiḥ

जब वह तमस् की सृष्टि करता है तब ब्रह्म को जानने वाले और सदा आत्मचिन्तन करने वाले द्विज उसे तामस कहते हैं।

श्लोक 38 (13.38.38)

पर्यायनामान्येतस्य कथयन्ति मनीषिणः । तानि ते सम्प्रवक्ष्यामि तदिहैकमनाः शृणु ॥

paryāyanāmānyetasya kathayanti manīṣiṇaḥ | tāni te sampravakṣyāmi tadihaikamanāḥ śṛṇu

मनीषी उसके पर्यायवाची नाम बताते हैं। वे मैं तुम्हें कहूँगा; यहाँ एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 39 (13.38.39)

महार्णवोऽर्णवश्चैव सलिलं च गुणास्तथा । वेदास्तपांसि यज्ञाश्च धर्माश्च भगवान्विभुः । प्राणः सांवर्तकोग्निश्च व्योम कालस्तथैव च ॥

mahārṇavo'rṇavaścaiva salilaṃ ca guṇāstathā | vedāstapāṃsi yajñāśca dharmāśca bhagavānvibhuḥ | prāṇaḥ sāṃvartakogniśca vyoma kālastathaiva ca

महार्णव और अर्णव, सलिल, गुण, वेद, तप, यज्ञ, धर्म, भगवान् विभु, प्राण, संवर्तक अग्नि, व्योम और काल।

श्लोक 40 (13.38.40)

नामान्येतानि ब्रह्मर्षे शरीरस्येश्वरस्य वै । कीर्तितानि द्विजश्रेष्ठ मया शास्त्रानुसारतः ॥

nāmānyetāni brahmarṣe śarīrasyeśvarasya vai | kīrtitāni dvijaśreṣṭha mayā śāstrānusārataḥ

हे ब्रह्मर्षे, ये ईश्वर के शरीर के नाम हैं। हे द्विजश्रेष्ठ, मैंने शास्त्र के अनुसार इन्हें कहा है।

श्लोक 41 (13.38.41)

चतुर्युगसहस्राणि चतुर्युगमरिंदम । प्राहुः कल्पसहस्रं वै ब्राह्मणास्तत्वदर्शिनः ॥

caturyugasahasrāṇi caturyugamariṃdama | prāhuḥ kalpasahasraṃ vai brāhmaṇāstatvadarśinaḥ

हे अरिन्दम, चार युगों के हज़ार चक्र: इसे तत्त्वदर्शी ब्राह्मण हज़ार कल्प कहते हैं।

श्लोक 42 (13.38.42)

दशकल्पसहस्राणि अव्ययस्य महानिशा । तथैव दिवसं प्राहुर्योगाः सांख्याश्च तत्वतः ॥

daśakalpasahasrāṇi avyayasya mahāniśā | tathaiva divasaṃ prāhuryogāḥ sāṃkhyāśca tatvataḥ

दस हज़ार कल्प अव्यय की महारात्रि हैं, और उतना ही उसका दिन है, ऐसा योगी और साङ्ख्य वाले यथार्थ रूप से कहते हैं।

श्लोक 43 (13.38.43)

निशासुप्तोथ भगवान्क्षपान्ते प्रत्यबुध्यत । पश्चाद्बुद्ध्वा ससर्जापस्तासु वीर्यमवासृजत् ॥

niśāsuptotha bhagavānkṣapānte pratyabudhyata | paścādbuddhvā sasarjāpastāsu vīryamavāsṛjat

रात भर सोए हुए भगवान् रात के अन्त में जागे। जागकर उन्होंने जल की सृष्टि की और उसमें अपना वीर्य डाला।

श्लोक 44 (13.38.44)

तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । अहंकृत्वा ततस्तस्मिन्ससर्ज प्रभुरीश्वरः ॥

tadaṇḍamabhavaddhaimaṃ sahasrāṃśusamaprabham | ahaṃkṛtvā tatastasminsasarja prabhurīśvaraḥ

वह सहस्र किरणों वाले सूर्य के समान चमकता सोने का अण्डा बन गया। अहंकार को रचकर प्रभु ईश्वर ने उसमें सृष्टि की—

श्लोक 45 (13.38.45)

हिरण्यगर्भं विश्वात्मा ब्रह्माणं जलवन्मुनिम् । भूतभव्यभविष्यस्य कर्तारमनघं विभुम् । मूर्तिमन्तं महात्मानं विश्वशम्भुं स्वयंभुवम् ॥

hiraṇyagarbhaṃ viśvātmā brahmāṇaṃ jalavanmunim | bhūtabhavyabhaviṣyasya kartāramanaghaṃ vibhum | mūrtimantaṃ mahātmānaṃ viśvaśambhuṃ svayaṃbhuvam

हिरण्यगर्भ को, जो विश्वात्मा है, ब्रह्मा को, जलवासी मुनि को, भूत, वर्तमान और भविष्य के कर्ता को, निष्पाप विभु को, मूर्तिमान महात्मा को, विश्वशम्भु स्वयम्भू को।

श्लोक 46 (13.38.46)

अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिषां नरम् । चक्रे तिरोधां भगवानेतत्कृत्वा महायशाः ॥

aṇimā laghimā prāptirīśāno jyotiṣāṃ naram | cakre tirodhāṃ bhagavānetatkṛtvā mahāyaśāḥ

यह करके महायशस्वी भगवान्, जो अणिमा, लघिमा, प्राप्ति और ईशित्व से सम्पन्न और ज्योतियों में श्रेष्ठ पुरुष हैं, अदृश्य हो गए।

श्लोक 47 (13.38.47)

एतस्यापि निशामाहुर्वेदवेदाङ्गपारगाः । पञ्चकल्पसहस्राणि अहरेतावदेव च ॥

etasyāpi niśāmāhurvedavedāṅgapāragāḥ | pañcakalpasahasrāṇi aharetāvadeva ca

उसकी भी रात्रि वेद और वेदाङ्ग के पारगामी बताते हैं: पाँच हज़ार कल्प, और उतना ही दिन।

श्लोक 48 (13.38.48)

स सर्गं कुरुते ब्रह्मा तामसश्चानुपूर्व्यशः । सृजते ह त्वहंकारं परमेष्ठिनमव्ययम् ॥

sa sargaṃ kurute brahmā tāmasaścānupūrvyaśaḥ | sṛjate ha tvahaṃkāraṃ parameṣṭhinamavyayam

ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, तामस सृष्टि क्रम से, और अहंकार को रचते हैं जो परमेष्ठी और अविनाशी है।

श्लोक 49 (13.38.49)

अहङ्कारेणैव लोका व्याप्ताः साहंकृतेन वै । येनाविष्टानि भूतानि मज्जन्त्यव्यक्तसागरे ॥

ahaṅkāreṇaiva lokā vyāptāḥ sāhaṃkṛtena vai | yenāviṣṭāni bhūtāni majjantyavyaktasāgare

लोक अहंकार से और अहंभाव से व्याप्त हैं; उससे आविष्ट प्राणी अव्यक्त के सागर में डूबते हैं।

श्लोक 50 (13.38.50)

देवर्षिदानवनरा यक्षगन्धर्वकिन्नराः । उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति ऊर्ध्वाधस्तिर्यगेव च ॥

devarṣidānavanarā yakṣagandharvakinnarāḥ | unmajjanti nimajjanti ūrdhvādhastiryageva ca

देवता, ऋषि, दानव, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर ऊपर, नीचे और तिरछे उठते और डूबते हैं।

श्लोक 51 (13.38.51)

एतस्यापि निशामाहुस्तृतीयामथ कुर्वतः । त्रीणि कल्पसहस्राणि अहरेतावदेव तु ॥

etasyāpi niśāmāhustṛtīyāmatha kurvataḥ | trīṇi kalpasahasrāṇi aharetāvadeva tu

जब वह तीसरी सृष्टि करता है, तब उसकी भी रात्रि कहते हैं: तीन हज़ार कल्प, और उतना ही दिन।

श्लोक 52 (13.38.52)

अहङ्कारस्तु सृजति महाभूतानि पञ्च वै । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥

ahaṅkārastu sṛjati mahābhūtāni pañca vai | pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam

अहंकार पाँच महाभूत रचता है: पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवीं ज्योति।

श्लोक 53 (13.38.53)

एतेषां गुणतत्वानि पञ्च प्राहुर्द्विजातयः । शब्दे स्पर्शे च रूपे च रसे गन्धे तथैव च ॥

eteṣāṃ guṇatatvāni pañca prāhurdvijātayaḥ | śabde sparśe ca rūpe ca rase gandhe tathaiva ca

द्विज इनके पाँच गुण बताते हैं: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में।

श्लोक 54 (13.38.54)

गुणेष्वेतेष्वभिरताः पङ्कलग्ना इव द्विपाः । नोत्तिष्ठन्त्यवशीभूताः सक्ता अव्यक्तसागरे ॥

guṇeṣveteṣvabhiratāḥ paṅkalagnā iva dvipāḥ | nottiṣṭhantyavaśībhūtāḥ saktā avyaktasāgare

इन गुणों में रमे हुए लोग कीचड़ में फँसे हाथियों की तरह उठ नहीं पाते; विवश होकर वे अव्यक्त के सागर में चिपके रहते हैं।

श्लोक 55 (13.38.55)

एतेषामिह वै सर्गं चतुर्थमिह कुर्वतः । चतुर्युगसहस्रे वै अहोरात्रास्तथैव च ॥

eteṣāmiha vai sargaṃ caturthamiha kurvataḥ | caturyugasahasre vai ahorātrāstathaiva ca

जब वह यहाँ चौथी सृष्टि करता है, तब उसका परिमाण हज़ार चतुर्युग है, और दिन-रात भी उतने ही।

श्लोक 56 (13.38.56)

अनन्त इति विख्यातः पञ्चमः सर्ग उच्यते । इन्द्रियाणि दशैकं च यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥

ananta iti vikhyātaḥ pañcamaḥ sarga ucyate | indriyāṇi daśaikaṃ ca yathāśrutinidarśanāt

पाँचवीं सृष्टि अनन्त नाम से प्रसिद्ध कही जाती है; वह ग्यारह इन्द्रियाँ हैं, जैसा श्रुति के निदर्शन से जाना जाता है।

श्लोक 57 (13.38.57)

मनः सर्वमिदं तात विश्वं सर्वमिदं जगत् । न तथान्यानि भूतानि बलवन्ति यथा मनः ॥

manaḥ sarvamidaṃ tāta viśvaṃ sarvamidaṃ jagat | na tathānyāni bhūtāni balavanti yathā manaḥ

हे तात, मन ही यह सब है, यह समस्त विश्व और जगत्। दूसरे भूत मन के समान बलवान् नहीं हैं।

श्लोक 58 (13.38.58)

एतस्यापि ह वै सर्गं षष्ठमाहुर्द्विजातयः । अहः कल्पसहस्रं वै रात्रिरेतावती तथा ॥

etasyāpi ha vai sargaṃ ṣaṣṭhamāhurdvijātayaḥ | ahaḥ kalpasahasraṃ vai rātriretāvatī tathā

द्विज उसकी भी छठी सृष्टि बताते हैं; उसका दिन हज़ार कल्प का है और रात भी उतनी ही।

श्लोक 59 (13.38.59)

ऊर्ध्वस्रोतस्तु वै सर्गं सप्तमं ब्रह्मणो विदुः । अष्टमं चाप्यधःस्रोतस्तिर्यक्तु नवमः स्मृतः ॥

ūrdhvasrotastu vai sargaṃ saptamaṃ brahmaṇo viduḥ | aṣṭamaṃ cāpyadhaḥsrotastiryaktu navamaḥ smṛtaḥ

ब्रह्मा की सातवीं सृष्टि को वे ऊर्ध्वस्रोत जानते हैं; आठवीं अधःस्रोत है; और नौवीं तिर्यक् स्रोत कही गई है।

श्लोक 60 (13.38.60)

एतानि नव सर्गाणि तत्वानि च महामुने । चतुर्विंशतितत्वानि तत्वसंख्यानि तेऽनघ ॥

etāni nava sargāṇi tatvāni ca mahāmune | caturviṃśatitatvāni tatvasaṃkhyāni te'nagha

हे महामुने, ये नौ सृष्टियाँ और तत्त्व हैं; हे निष्पाप, तत्त्वों की गणना चौबीस है।

श्लोक 61 (13.38.61)

सर्वस्य प्रभवः पूर्वमुक्तो नारायणः प्रभुः । अव्ययः प्रभवश्चैव अव्यक्तस्य महामुने । प्रवक्ष्याम्यपरं तत्वं यस्य यस्येश्वरश्च यः ॥

sarvasya prabhavaḥ pūrvamukto nārāyaṇaḥ prabhuḥ | avyayaḥ prabhavaścaiva avyaktasya mahāmune | pravakṣyāmyaparaṃ tatvaṃ yasya yasyeśvaraśca yaḥ

हे महामुने, पहले सबके उद्गम के रूप में प्रभु नारायण कहे गए, जो अव्यय हैं और अव्यक्त के भी उद्गम हैं। अब मैं दूसरे तत्त्व का वर्णन करूँगा, कि किसका ईश्वर कौन है।

श्लोक 62 (13.38.62)

अध्यात्ममधिभूतं च अधिदैवं तथैव च । यथाश्रुतं यथादृष्टं तत्वतो वै निबोध मे ॥

adhyātmamadhibhūtaṃ ca adhidaivaṃ tathaiva ca | yathāśrutaṃ yathādṛṣṭaṃ tatvato vai nibodha me

अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव: जैसा मैंने सुना और देखा है, वैसा यथार्थ रूप से मुझसे सुनो।

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