अनुशासन पर्व · अध्याय 39
जगत् का प्रलय और अधिदैवत
सनत्कुमार नारद को अपना उपदेश आगे सुनाते हैं। वे अधःस्रोत, तिर्यक्स्रोत और ऊर्ध्वस्रोत सृष्टियों के ईश्वर बताते हैं, फिर कल्प के अन्त में कालाग्नि द्वारा जगत् के दहन और पृथ्वी से जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, अहंकार और अन्त में स्वयं ब्रह्मा तक एक-एक तत्त्व के अगले में लीन होने का वर्णन करते हैं। इसके बाद वे पाँचों महाभूतों, कर्मेन्द्रियों तथा मन, बुद्धि और अहंकार के अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव रूप गिनाते हैं, और अव्यक्त के सृजन और संहार की उपमा सूर्य की किरणों, लहरों और कछुए से देते हैं। अन्त में भीष्म इसे सुनने का फल बताते हैं।
सनत्कुमार उवाच
श्लोक 1 (13.39.1)
अधःस्रोतसि सर्गे च तिर्यक्स्रोतसि चैव हि । एताभ्यामीश्वरं विन्द्यादूर्ध्वस्रोतस्तथैव च ॥
adhaḥsrotasi sarge ca tiryaksrotasi caiva hi | etābhyāmīśvaraṃ vindyādūrdhvasrotastathaiva ca
अधःस्रोत सृष्टि में, तिर्यक्स्रोत सृष्टि में और उसी प्रकार ऊर्ध्वस्रोत में भी: इनके द्वारा ईश्वर को जानना चाहिए।
श्लोक 2 (13.39.2)
कर्मेन्द्रियाणां पञ्चानामीश्वरो बुद्धिगोचरः । बुद्धीन्द्रियाणामपि तु ईश्वरो मन उच्यते ॥
karmendriyāṇāṃ pañcānāmīśvaro buddhigocaraḥ | buddhīndriyāṇāmapi tu īśvaro mana ucyate
पाँच कर्मेन्द्रियों का ईश्वर बुद्धि में विचरने वाला है; ज्ञानेन्द्रियों का ईश्वर मन कहा जाता है।
श्लोक 3 (13.39.3)
मनसः पञ्चभूतानि सगुणान्याहुरीश्वरम् । भूतानामीश्वरं विद्याद्ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ॥
manasaḥ pañcabhūtāni saguṇānyāhurīśvaram | bhūtānāmīśvaraṃ vidyādbrahmāṇaṃ parameṣṭhinam
पाँच भूतों का, उनके गुणों सहित, ईश्वर मन को कहा गया है; और भूतों का ईश्वर परमेष्ठी ब्रह्मा को जानो।
श्लोक 4 (13.39.4)
भवान्हि कुशलश्चैव धर्मेष्वेषु परेषु वै । कालाग्निरह्नः कल्पान्ते जगद्दहति चांशुभिः ॥
bhavānhi kuśalaścaiva dharmeṣveṣu pareṣu vai | kālāgnirahnaḥ kalpānte jagaddahati cāṃśubhiḥ
तुम इन परम धर्मों में कुशल हो। कल्प के अन्त में कालाग्नि अपनी किरणों से दिन में जगत् को जला देती है।
श्लोक 5 (13.39.5)
ततः सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । महाभूतानि दग्धानि स्वां योनिं गमितानि वै ॥
tataḥ sarvāṇi bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | mahābhūtāni dagdhāni svāṃ yoniṃ gamitāni vai
तब सब चर-अचर प्राणी और महाभूत जल जाते हैं और अपने मूल में पहुँचा दिए जाते हैं।
श्लोक 6 (13.39.6)
कूर्मपृष्ठनिभा भूमिर्निर्दग्धकुशकण्टका । निर्वृक्षा निस्तृणा चैव दग्धा कालाग्निना तदा ॥
kūrmapṛṣṭhanibhā bhūmirnirdagdhakuśakaṇṭakā | nirvṛkṣā nistṛṇā caiva dagdhā kālāgninā tadā
कछुए की पीठ के समान पृथ्वी, जिसके कुश और काँटे जल चुके हैं, वृक्षहीन और तृणहीन होकर कालाग्नि से जल जाती है।
श्लोक 7 (13.39.7)
जगत्प्रलीनं जगति जगच्चापि प्रलीयते । नष्टगन्धा तदा सूक्ष्मा जलमेवाभवत्तदा ॥
jagatpralīnaṃ jagati jagaccāpi pralīyate | naṣṭagandhā tadā sūkṣmā jalamevābhavattadā
जगत् प्रलीन होकर जगत् में लीन होता है और जगत् भी विलीन हो जाता है। तब गन्ध नष्ट होकर वह सूक्ष्म हो गया और केवल जल रह गया।
श्लोक 8 (13.39.8)
ततो मयूखजालेन सूर्यस्त्वापीयते जलम् । रसात्मा लीयते चार्के तथा ब्राह्मणसत्तम ॥
tato mayūkhajālena sūryastvāpīyate jalam | rasātmā līyate cārke tathā brāhmaṇasattama
तब सूर्य अपनी किरणों के समूह से जल पी लेता है, और रसरूप तत्त्व सूर्य में लीन हो जाता है, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ।
श्लोक 9 (13.39.9)
अन्तरिक्षगतान्भूतान्प्रदहत्यनलस्तदा । अग्निभूतं तदा व्योम भवतीत्यभिचक्षते ॥
antarikṣagatānbhūtānpradahatyanalastadā | agnibhūtaṃ tadā vyoma bhavatītyabhicakṣate
तब अग्नि अन्तरिक्ष में स्थित प्राणियों को जला देती है, और आकाश अग्निमय हो जाता है, ऐसा कहा जाता है।
श्लोक 10 (13.39.10)
तं तथा विस्फुरद्वह्निं वायुर्जरयते महान् । महता बलवेगेन आदत्ते तं हि भानुमान् ॥
taṃ tathā visphuradvahniṃ vāyurjarayate mahān | mahatā balavegena ādatte taṃ hi bhānumān
उस दहकती अग्नि को महान् वायु पचा लेता है, और तेजस्वी सूर्य उसे बड़े बल और वेग से ग्रहण कर लेता है।
श्लोक 11 (13.39.11)
वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते यदा । प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु तिष्ठति नानदत् ॥
vāyorapi guṇaṃ sparśamākāśaṃ grasate yadā | praśāmyati tadā vāyuḥ khaṃ tu tiṣṭhati nānadat
जब आकाश वायु के गुण स्पर्श को भी निगल लेता है, तब वायु शान्त हो जाता है और आकाश बिना किसी ध्वनि के रह जाता है।
श्लोक 12 (13.39.12)
तस्य तं निनदं शब्दमादत्ते वै मनस्तदा । स शब्दगुणहीनात्मा तिष्ठते मूर्तिमांस्तु वै ॥
tasya taṃ ninadaṃ śabdamādatte vai manastadā | sa śabdaguṇahīnātmā tiṣṭhate mūrtimāṃstu vai
तब मन उसकी ध्वनि, उसके शब्द को ग्रहण कर लेता है; शब्द-गुण से हीन होकर वह रूपवान् होकर रहता है।
श्लोक 13 (13.39.13)
भुङ्क्ते च स तदा व्योम मनस्तात दिगात्मकम् । व्योमात्मनि विनष्टे तु सङ्कल्पात्मा विवर्धते ॥
bhuṅkte ca sa tadā vyoma manastāta digātmakam | vyomātmani vinaṣṭe tu saṅkalpātmā vivardhate
तब हे तात, दिशारूप मन आकाश को भोग लेता है; और आकाश के नष्ट होने पर सङ्कल्परूप तत्त्व बढ़ता है।
श्लोक 14 (13.39.14)
सङ्कल्पात्मानमादत्ते चित्तं वै स्वेन तेजसा । चित्तं ग्रसत्यहङ्कारस्तदा वै मुनिसत्तम ॥
saṅkalpātmānamādatte cittaṃ vai svena tejasā | cittaṃ grasatyahaṅkārastadā vai munisattama
चित्त अपने तेज से सङ्कल्परूप को ग्रहण कर लेता है; तब हे मुनिश्रेष्ठ, अहंकार चित्त को निगल लेता है।
श्लोक 15 (13.39.15)
विनष्टे च तदा चित्ते अहङ्कारोऽभवन्महान् । अहङ्कारं तदादत्ते महान्ब्रह्मा प्रजापतिः ॥
vinaṣṭe ca tadā citte ahaṅkāro'bhavanmahān | ahaṅkāraṃ tadādatte mahānbrahmā prajāpatiḥ
चित्त के नष्ट होने पर महान् अहंकार प्रकट होता है, और तब महान् ब्रह्मा प्रजापति अहंकार को ग्रहण कर लेते हैं।
श्लोक 16 (13.39.16)
अभिमाने विनष्टे तु महान्ब्रह्मा विराजते । तं तदा त्रिषु लोकेषु मूर्तिष्वेवाग्रमूर्तिजम् ॥
abhimāne vinaṣṭe tu mahānbrahmā virājate | taṃ tadā triṣu lokeṣu mūrtiṣvevāgramūrtijam
अभिमान के नष्ट होने पर महान् ब्रह्मा प्रकाशित होते हैं; तब तीनों लोकों में मूर्तियों में प्रथम मूर्ति के रूप में उत्पन्न उन्हें—
श्लोक 17 (13.39.17)
येन विश्वमिदं कृत्स्नं निर्मितं वै गुणार्थिना । मूर्तं जलेचरमपि व्यवसायगुणात्मकम् । ग्रसिष्णुर्भगवान्ब्रह्मा व्यक्ताव्यक्तमसंशयम् ॥
yena viśvamidaṃ kṛtsnaṃ nirmitaṃ vai guṇārthinā | mūrtaṃ jalecaramapi vyavasāyaguṇātmakam | grasiṣṇurbhagavānbrahmā vyaktāvyaktamasaṃśayam
जिसने गुणों के लिए यह सारा विश्व बनाया, जो मूर्तिमान, जल में विचरने वाला और निश्चय-गुण वाला है, वह भगवान् ब्रह्मा व्यक्त और अव्यक्त को निःसन्देह निगल लेगा।
श्लोक 18 (13.39.18)
एषोऽव्ययस्य प्रलयो मया ते परिकीर्तितः । अध्यात्ममधिभूतं च अधिदैवं च श्रूयताम् ॥
eṣo'vyayasya pralayo mayā te parikīrtitaḥ | adhyātmamadhibhūtaṃ ca adhidaivaṃ ca śrūyatām
इस प्रकार मैंने तुमसे अव्यय का प्रलय कहा। अब अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव सुनो।
श्लोक 19 (13.39.19)
आकाशं प्रथमं भूतं श्रोत्रमध्यात्मं शब्दोधिभूतं दिशोधिदैवतं ॥
ākāśaṃ prathamaṃ bhūtaṃ śrotramadhyātmaṃ śabdodhibhūtaṃ diśodhidaivataṃ
आकाश पहला भूत है; श्रोत्र उसका अध्यात्म, शब्द अधिभूत और दिशाएँ अधिदैवत हैं।
श्लोक 20 (13.39.20)
वायुर्द्वितीयं भूतं त्वगध्यात्मं स्पर्शोधिभूतं विद्युदधिदैवतं स्यात् ॥
vāyurdvitīyaṃ bhūtaṃ tvagadhyātmaṃ sparśodhibhūtaṃ vidyudadhidaivataṃ syāt
वायु दूसरा भूत है; त्वचा अध्यात्म, स्पर्श अधिभूत और विद्युत् अधिदैवत है।
श्लोक 21 (13.39.21)
ज्योतिस्तृतीयं भूतं चक्षुरध्यात्मं रूपमधिभूतं सूर्योधिदैवतं स्यात् ॥
jyotistṛtīyaṃ bhūtaṃ cakṣuradhyātmaṃ rūpamadhibhūtaṃ sūryodhidaivataṃ syāt
तेज तीसरा भूत है; नेत्र अध्यात्म, रूप अधिभूत और सूर्य अधिदैवत है।
श्लोक 22 (13.39.22)
आपश्चतुर्थं भूतं जिह्वाध्यात्मं रसोधिभूतं वरुणोधिदैवतं स्यात् ॥
āpaścaturthaṃ bhūtaṃ jihvādhyātmaṃ rasodhibhūtaṃ varuṇodhidaivataṃ syāt
जल चौथा भूत है; जिह्वा अध्यात्म, रस अधिभूत और वरुण अधिदैवत है।
श्लोक 23 (13.39.23)
पृथिवी पञ्चमं भूतं ध्राणमध्यात्मं गन्धोधिभूतं वायुरधिदैवतं स्यात् ॥
pṛthivī pañcamaṃ bhūtaṃ dhrāṇamadhyātmaṃ gandhodhibhūtaṃ vāyuradhidaivataṃ syāt
पृथ्वी पाँचवाँ भूत है; घ्राण अध्यात्म, गन्ध अधिभूत और वायु अधिदैवत है।
श्लोक 24 (13.39.24)
पाञ्चभौतिकमेतच्चतुष्टयं वर्णितम्। अत ऊर्ध्वमिन्द्रियमनुवर्णयिष्यामः ॥
pāñcabhautikametaccatuṣṭayaṃ varṇitam | ata ūrdhvamindriyamanuvarṇayiṣyāmaḥ
पाँच भूतों से सम्बन्धित यह चतुष्टय वर्णित हुआ। इसके आगे हम इन्द्रियों का वर्णन करेंगे।
श्लोक 25 (13.39.25)
पादावध्यात्मं गन्तव्यमधिभूतं विष्णुरधिदैवतं स्यात् ॥
pādāvadhyātmaṃ gantavyamadhibhūtaṃ viṣṇuradhidaivataṃ syāt
पाद अध्यात्म हैं, गन्तव्य अधिभूत और विष्णु अधिदैवत हैं।
श्लोक 26 (13.39.26)
हस्तावध्यात्मं कर्तव्यमधिभूतमिन्द्रोऽधिदैवतं स्यात् ॥
hastāvadhyātmaṃ kartavyamadhibhūtamindro'dhidaivataṃ syāt
हाथ अध्यात्म हैं, कर्तव्य अधिभूत और इन्द्र अधिदैवत हैं।
श्लोक 27 (13.39.27)
पायुरध्यात्मं विसर्गोऽधिभूतं मित्रोऽधिदैवतं स्यात् ॥
pāyuradhyātmaṃ visargo'dhibhūtaṃ mitro'dhidaivataṃ syāt
गुदा अध्यात्म है, विसर्ग अधिभूत और मित्र अधिदैवत हैं।
श्लोक 28 (13.39.28)
उपस्थोऽध्यात्ममानन्दोऽधिभूतं प्रजापतिरधिदैवतं स्यात् ॥
upastho'dhyātmamānando'dhibhūtaṃ prajāpatiradhidaivataṃ syāt
उपस्थ अध्यात्म है, आनन्द अधिभूत और प्रजापति अधिदैवत हैं।
श्लोक 29 (13.39.29)
वागध्यात्मं वक्तव्यमधिभूतमग्निरधिदैवतं स्यात् ॥
vāgadhyātmaṃ vaktavyamadhibhūtamagniradhidaivataṃ syāt
वाणी अध्यात्म है, वक्तव्य अधिभूत और अग्नि अधिदैवत हैं।
श्लोक 30 (13.39.30)
मनोऽध्यात्मं मन्तव्यमधिभूतं चन्द्रमा अधिदैवतं स्यात् ॥
mano'dhyātmaṃ mantavyamadhibhūtaṃ candramā adhidaivataṃ syāt
मन अध्यात्म है, मन्तव्य अधिभूत और चन्द्रमा अधिदैवत हैं।
श्लोक 31 (13.39.31)
अहङ्कारोऽध्यात्ममभिमानोऽधिभूतं विरिञ्चोऽधिदैवतं स्यात् ॥
ahaṅkāro'dhyātmamabhimāno'dhibhūtaṃ viriñco'dhidaivataṃ syāt
अहंकार अध्यात्म है, अभिमान अधिभूत और विरिञ्चि अधिदैवत हैं।
श्लोक 32 (13.39.32)
बुद्धिरध्यात्मं व्यवसायोऽधिभूतं ब्रह्माधिदैवतं स्यात् ॥
buddhiradhyātmaṃ vyavasāyo'dhibhūtaṃ brahmādhidaivataṃ syāt
बुद्धि अध्यात्म है, निश्चय अधिभूत और ब्रह्मा अधिदैवत हैं।
श्लोक 33 (13.39.33)
एवमव्यक्तो भगवान्सकृत्कृत्स्नान्कुरुते सम्हरते च। कस्मात्क्रीडार्थम् ॥
evamavyakto bhagavānsakṛtkṛtsnānkurute samharate ca | kasmātkrīḍārtham
इस प्रकार भगवान् अव्यक्त एक साथ सबको रचता है और समेट लेता है। किसलिए? क्रीड़ा के लिए।
श्लोक 34 (13.39.34)
यथाऽऽदित्योऽंशुजालं क्षिपति सम्हरते च एवमव्यक्तो गुणान्सृजति सम्हरते च ॥
yathā''dityo'ṃśujālaṃ kṣipati samharate ca evamavyakto guṇānsṛjati samharate ca
जैसे सूर्य किरणों का समूह फैलाता है और समेट लेता है, वैसे ही अव्यक्त गुणों को रचता और समेटता है।
श्लोक 35 (13.39.35)
यथाऽर्णवादूर्मिमालानिचयश्चोर्ध्वमुत्तिष्ठते सम्हरते च । यथा चान्तरिक्षादभ्रमाकाशमुत्तिष्ठति स्तनितगर्जितोन्मिश्रं तद्वत्तत्रैव प्रणाशात् । एवमव्यक्तो गुणान्सृजति सम्हरति च ॥
yathā'rṇavādūrmimālānicayaścordhvamuttiṣṭhate samharate ca | yathā cāntarikṣādabhramākāśamuttiṣṭhati stanitagarjitonmiśraṃ tadvattatraiva praṇāśāt | evamavyakto guṇānsṛjati samharati ca
जैसे समुद्र से लहरों की माला ऊपर उठती है और फिर लौट जाती है, और जैसे अन्तरिक्ष से बादल आकाश में उठता है, गर्जन और गड़गड़ाहट से मिला हुआ, और वहीं विलीन हो जाता है, वैसे ही अव्यक्त गुणों को रचता और समेटता है।
श्लोक 36 (13.39.36)
यथा कूर्मोऽङ्गानि कामात्प्रसारयते पुनश्च प्रवेशयति एवमव्यक्तो भगवान्लोकान्प्रकाशयति प्रवेशयते च ॥
yathā kūrmo'ṅgāni kāmātprasārayate punaśca praveśayati evamavyakto bhagavānlokānprakāśayati praveśayate ca
जैसे कछुआ इच्छा से अपने अङ्ग फैलाता है और फिर भीतर खींच लेता है, वैसे ही भगवान् अव्यक्त लोकों को प्रकट करता और भीतर खींच लेता है।
श्लोक 37 (13.39.37)
एवं चेतनश्च भगवान्पञ्चविंशः शुचिस्तेनाधिष्ठिता प्रकृतिश्चेतयति नित्यं सहधर्मा च। भगवतोऽव्यक्तस्य क्रियावतोक्रियावतश्च प्रकृतिः क्रियावानजरामरः क्षेत्रज्ञो नारायणाख्यः पुरुषः ॥
evaṃ cetanaśca bhagavānpañcaviṃśaḥ śucistenādhiṣṭhitā prakṛtiścetayati nityaṃ sahadharmā ca | bhagavato'vyaktasya kriyāvatokriyāvataśca prakṛtiḥ kriyāvānajarāmaraḥ kṣetrajño nārāyaṇākhyaḥ puruṣaḥ
इस प्रकार चेतन भगवान्, पचीसवाँ, शुद्ध पुरुष अधिष्ठाता है; उससे अधिष्ठित प्रकृति अपने स्वभाव सहित नित्य चेतना को जगाती है। क्रियावान् और अक्रियावान् भगवान् अव्यक्त की प्रकृति है; प्रकृति क्रियावती है, और जरा-मरण से रहित क्षेत्रज्ञ नारायण नाम का पुरुष है।
भीष्म उवाच
श्लोक 38 (13.39.38)
इत्येतन्नारदायोक्तं कुमारेण च धीमता । एतच्छ्रुत्वा द्विजो राजन्सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥
ityetannāradāyoktaṃ kumāreṇa ca dhīmatā | etacchrutvā dvijo rājansarvayajñaphalaṃ labhet
यही बुद्धिमान कुमार ने नारद से कहा था। इसे सुनकर, हे राजन्, ब्राह्मण सब यज्ञों का फल पाता है।