अनुशासन पर्व · अध्याय 40
ब्रह्मा द्वारा देवताओं को गरुड़ और नारायण की कथा
युधिष्ठिर पूछते हैं कि जो द्विज अग्नियों को अपने भीतर स्थापित करके रखते हैं, उनकी क्या गति होती है। भीष्म एक प्राचीन आख्यान सुनाते हैं: असुरों द्वारा देवताओं के मारे जाने पर ब्रह्मा उन्हें लेकर नारायण की स्तुति करते हैं; नारायण गरुड़ पर प्रकट होकर असुरों का संहार करते हैं और अन्तर्धान हो जाते हैं। देवताओं के पूछने पर ब्रह्मा बताते हैं कि ऋषियों ने कभी गरुड़ से नारायण के विषय में प्रश्न किया था, और गरुड़ अपने वरदान, पिता कश्यप के उपदेश तथा कश्यप से कहे गए भगवान के वचनों का वर्णन करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.40.1)
आत्मन्यग्नौ समाधाय य एते कुरुनन्दन । द्विजातयो व्रतोपेता जपयज्ञपरायणाः ॥
ātmanyagnau samādhāya ya ete kurunandana | dvijātayo vratopetā japayajñaparāyaṇāḥ
युधिष्ठिर ने कहा: हे कुरुनन्दन, जो द्विज व्रतों का पालन करते हैं, जप को ही यज्ञ मानकर उसमें लगे रहते हैं और जिन्होंने अग्नियों को अपने भीतर स्थापित कर लिया है,
श्लोक 2 (13.40.2)
यजन्त्यारम्भयज्ञैश्च मानसं यज्ञमास्थिताः । अग्निभ्यश्च परं नास्ति येषामेषोऽव्यवस्थितः ॥
yajantyārambhayajñaiśca mānasaṃ yajñamāsthitāḥ | agnibhyaśca paraṃ nāsti yeṣāmeṣo'vyavasthitaḥ
जो आरम्भ-यज्ञों से यजन करते हैं और मानस यज्ञ का आश्रय लिए रहते हैं, तथा जिनके लिए अग्नियों से बढ़कर कुछ नहीं है, ऐसा ही जिनका निश्चित नियम है,
श्लोक 3 (13.40.3)
तेषां गतिर्महाप्राज्ञ कीदृशी किम्पराश्च ते । एतदिच्छामि तत्वेन त्वत्तः श्रोतुं पितामह ॥
teṣāṃ gatirmahāprājña kīdṛśī kimparāśca te | etadicchāmi tatvena tvattaḥ śrotuṃ pitāmaha
हे महाप्राज्ञ, उनकी गति कैसी होती है और उनका परम लक्ष्य क्या है? हे पितामह, मैं यह आपसे यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (13.40.4)
अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । वैकुण्ठस्य च संवादं सुपर्णस्य च भारत ॥
atra te vartayiṣyāmi itihāsaṃ purātanam | vaikuṇṭhasya ca saṃvādaṃ suparṇasya ca bhārata
भीष्म ने कहा: हे भारत, इस विषय में मैं तुम्हें एक पुराना इतिहास सुनाऊँगा, वैकुण्ठ और सुपर्ण का संवाद।
श्लोक 5 (13.40.5)
अमृतस्य समुत्पत्तौ देवानामसुरैः सह । षष्टिवर्षसहस्राणि दैवासुरमवर्तत ॥
amṛtasya samutpattau devānāmasuraiḥ saha | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi daivāsuramavartata
जब अमृत की उत्पत्ति हो रही थी, तब देवताओं और असुरों का युद्ध साठ हज़ार वर्षों तक चलता रहा।
श्लोक 6 (13.40.6)
तत्र देवास्तु दैतेयैर्वध्यन्ते भृशदारुणैः । त्रातारं नाधिगच्छन्ति वध्यमाना महासुरैः ॥
tatra devāstu daiteyairvadhyante bhṛśadāruṇaiḥ | trātāraṃ nādhigacchanti vadhyamānā mahāsuraiḥ
वहाँ अत्यन्त भयंकर दैत्य देवताओं का वध कर रहे थे, और महान् असुरों से मारे जाते हुए देवताओं को कोई रक्षक नहीं मिला।
श्लोक 7 (13.40.7)
आर्तास्ते देवदेवेशं प्रपन्नाः शरणैषिणः । पितामहं महाप्राज्ञं वध्यमानाः सुरेतरैः ॥
ārtāste devadeveśaṃ prapannāḥ śaraṇaiṣiṇaḥ | pitāmahaṃ mahāprājñaṃ vadhyamānāḥ suretaraiḥ
देवशत्रुओं के द्वारा मारे जाते हुए वे पीड़ित देवता शरण की खोज में देवों के देव, महाप्राज्ञ पितामह की शरण में गए।
श्लोक 8 (13.40.8)
ता दृष्ट्वा देवता ब्रह्मा सम्भ्रान्तेन्द्रियमानसः । वैकुण्ठं शरणं देवं प्रतिपेदे च तैः सह ॥
tā dṛṣṭvā devatā brahmā sambhrāntendriyamānasaḥ | vaikuṇṭhaṃ śaraṇaṃ devaṃ pratipede ca taiḥ saha
देवताओं को देखकर ब्रह्मा का मन और इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं, और वे उनके साथ देव वैकुण्ठ की शरण में गए।
श्लोक 9 (13.40.9)
ततः स देवैः सहितः पद्मयोनिर्नरेश्वर । तुष्टाव प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणमनामयम् ॥
tataḥ sa devaiḥ sahitaḥ padmayonirnareśvara | tuṣṭāva prāñjalirbhūtvā nārāyaṇamanāmayam
हे नरेश्वर, तब पद्मयोनि ब्रह्मा ने देवताओं के साथ हाथ जोड़कर निर्दोष नारायण की स्तुति की।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 10 (13.40.10)
त्वद्रूपचिन्तनान्नाम्नां स्मरणादर्चनादपि । तपोयोगादिभिश्चैव श्रेयो यान्ति मनीषिणः ॥
tvadrūpacintanānnāmnāṃ smaraṇādarcanādapi | tapoyogādibhiścaiva śreyo yānti manīṣiṇaḥ
आपके रूप का चिन्तन करके, आपके नामों का स्मरण करके और आपकी अर्चना करके, तथा तप और योग आदि से भी, मनीषी जन परम कल्याण को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 11 (13.40.11)
भक्तवत्सल पद्माक्ष परमेश्वर पापहन् । परमात्माऽविकाराद्य नारायण नमोऽस्तु ते ॥
bhaktavatsala padmākṣa parameśvara pāpahan | paramātmā'vikārādya nārāyaṇa namo'stu te
हे भक्तवत्सल, कमलनयन, परमेश्वर, पापहारी, परमात्मा, अविकारी आदिदेव नारायण, आपको नमस्कार है।
श्लोक 12 (13.40.12)
नमस्ते सर्वलोकादे सर्वात्मामितविक्रम । सर्वभूतभविष्येश सर्वभूतमहेश्वर ॥
namaste sarvalokāde sarvātmāmitavikrama | sarvabhūtabhaviṣyeśa sarvabhūtamaheśvara
हे सब लोकों के आदि, सबके आत्मा, अपार पराक्रम वाले, सब भूतों और भविष्य के स्वामी, सब प्राणियों के महेश्वर, आपको नमस्कार है।
श्लोक 13 (13.40.13)
देवानामपि देवस्त्वं सर्वविद्यापरायणः । जगद्वीजसमाहार जगतः परमो ह्यसि ॥
devānāmapi devastvaṃ sarvavidyāparāyaṇaḥ | jagadvījasamāhāra jagataḥ paramo hyasi
आप देवताओं के भी देव हैं, सब विद्याओं के परम आश्रय हैं, जगत् के बीज को समेट लेने वाले हैं और जगत् से परे हैं।
श्लोक 14 (13.40.14)
त्रायस्व देवता वीर दानवाद्यैः सुपीडिताः । लोकांश्च लोकपालांश्च ऋषींश्च जयतांवर ॥
trāyasva devatā vīra dānavādyaiḥ supīḍitāḥ | lokāṃśca lokapālāṃśca ṛṣīṃśca jayatāṃvara
हे वीर, हे विजयी पुरुषों में श्रेष्ठ, दानव आदि से अत्यन्त पीड़ित देवताओं की, लोकों की, लोकपालों की और ऋषियों की रक्षा कीजिए।
श्लोक 15 (13.40.15)
वेदाः साङ्गोपनिषदः सरहस्याः ससङ्ग्रहाः । सोङ्काराः सवषट्काराः प्राहुस्त्वां यज्ञमुत्तमम् ॥
vedāḥ sāṅgopaniṣadaḥ sarahasyāḥ sasaṅgrahāḥ | soṅkārāḥ savaṣaṭkārāḥ prāhustvāṃ yajñamuttamam
अंगों और उपनिषदों सहित, रहस्यों और संग्रहों सहित, ओंकार और वषट्कार सहित वेद आपको परम यज्ञ कहते हैं।
श्लोक 16 (13.40.16)
पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम् । तपस्विनां तपश्चैव दैवतं देवतास्वपि ॥
pavitrāṇāṃ pavitraṃ ca maṅgalānāṃ ca maṅgalam | tapasvināṃ tapaścaiva daivataṃ devatāsvapi
आप पवित्र करने वालों को भी पवित्र करने वाले हैं, मंगलों के भी मंगल हैं, तपस्वियों के तप हैं और देवताओं में भी परम देवता हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (13.40.17)
एवमादिपुरस्कारैर्ऋक्सामयजुषां गणैः । वैकुण्ठं तुष्टुवुर्देवाः सर्वे ब्रह्मर्षिभिः सह ॥
evamādipuraskārairṛksāmayajuṣāṃ gaṇaiḥ | vaikuṇṭhaṃ tuṣṭuvurdevāḥ sarve brahmarṣibhiḥ saha
इस प्रकार आरम्भ करके ऋक्, साम और यजुः मन्त्रों के समूहों से सब देवताओं ने ब्रह्मर्षियों के साथ वैकुण्ठ की स्तुति की।
श्लोक 18 (13.40.18)
ततोऽन्तरिक्षे वागासीन्मेघगम्भीरनिस्वना । जेष्यध्वं दानवान्यूयं मयैव सह सङ्गरे ॥
tato'ntarikṣe vāgāsīnmeghagambhīranisvanā | jeṣyadhvaṃ dānavānyūyaṃ mayaiva saha saṅgare
तब आकाश में मेघ के समान गम्भीर गर्जना वाली वाणी हुई: "तुम लोग युद्ध में मेरे ही साथ रहकर दानवों को जीतोगे।"
श्लोक 19 (13.40.19)
ततो देवगणानां च दानवानां च युध्यताम् । प्रादुरासीन्महातेजाः शार्ङ्गचक्रगदाधरः ॥
tato devagaṇānāṃ ca dānavānāṃ ca yudhyatām | prādurāsīnmahātejāḥ śārṅgacakragadādharaḥ
तब देवगणों और दानवों के युद्ध करते समय शार्ङ्ग धनुष, चक्र और गदा धारण करने वाले महातेजस्वी भगवान प्रकट हुए।
श्लोक 20 (13.40.20)
सुपर्णपृष्ठमास्थाय तेजसा प्रदहन्निव । व्यधमद्दानवान्सर्वान्बाहुद्रविणतेजसा ॥
suparṇapṛṣṭhamāsthāya tejasā pradahanniva | vyadhamaddānavānsarvānbāhudraviṇatejasā
सुपर्ण की पीठ पर बैठकर, मानो अपने तेज से जलाते हुए, उन्होंने अपनी भुजाओं के बल और तेज से सब दानवों का संहार कर दिया।
श्लोक 21 (13.40.21)
तं समासाद्य समरे दैत्यदानवपुङ्गवाः । व्यनश्यन्त महाराज पतङ्गा इव पावकम् ॥
taṃ samāsādya samare daityadānavapuṅgavāḥ | vyanaśyanta mahārāja pataṅgā iva pāvakam
हे महाराज, युद्ध में उनके सामने आए दैत्य और दानव श्रेष्ठ आग में पतंगों की तरह नष्ट हो गए।
श्लोक 22 (13.40.22)
स विजित्यासुरान्सर्वान्दानवांश्च महामतिः । पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत ॥
sa vijityāsurānsarvāndānavāṃśca mahāmatiḥ | paśyatāmeva devānāṃ tatraivāntaradhīyata
सब असुरों और दानवों को जीतकर वे महामति देवताओं के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 23 (13.40.23)
तं दृष्ट्वान्तर्हितं देवा विष्णुं देवामितद्युतिम् । विस्मयोत्फुल्लनयना ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ॥
taṃ dṛṣṭvāntarhitaṃ devā viṣṇuṃ devāmitadyutim | vismayotphullanayanā brahmāṇamidamabruvan
अमित तेज वाले देव विष्णु को अन्तर्धान हुआ देखकर देवताओं की आँखें विस्मय से खिल उठीं और उन्होंने ब्रह्मा से यह कहा।
देवा ऊचुः
श्लोक 24 (13.40.24)
भगवन्सर्वलोकेश सर्वलोकपितामह । इदमत्यद्भुतं वृत्तं तन्नः शंसितुमर्हसि ॥
bhagavansarvalokeśa sarvalokapitāmaha | idamatyadbhutaṃ vṛttaṃ tannaḥ śaṃsitumarhasi
हे भगवन्, सब लोकों के स्वामी, सब लोकों के पितामह, आप हमें इस अत्यन्त अद्भुत घटना के विषय में बताइए।
श्लोक 25 (13.40.25)
दैवासुरेऽस्मिन्सङ्ग्रामे त्राता येन वयं विभो । एतद्विज्ञातुमिच्छामः कुतोसौ कश्च तत्वतः ॥
daivāsure'sminsaṅgrāme trātā yena vayaṃ vibho | etadvijñātumicchāmaḥ kutosau kaśca tatvataḥ
हे विभो, इस देवासुर संग्राम में जिसने हमें बचाया, हम यह जानना चाहते हैं कि वह कहाँ से आए और वास्तव में कौन हैं।
श्लोक 26 (13.40.26)
कोऽयमस्मान्परित्राय तूष्णीमेव यथागतम् । प्रतिप्रयातो दिव्यात्मा तं नः शंसितुमर्हसि ॥
ko'yamasmānparitrāya tūṣṇīmeva yathāgatam | pratiprayāto divyātmā taṃ naḥ śaṃsitumarhasi
जो हमारी रक्षा करके चुपचाप जैसे आए थे वैसे ही लौट गए, ये दिव्य स्वरूप वाले कौन हैं? आप हमें उनके विषय में बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 27 (13.40.27)
एवमुक्तः सुरैः सर्वैर्वचनं वचनार्थवित् । उवाच पद्मनाभस्य पूर्वरूपं प्रति प्रभो ॥
evamuktaḥ suraiḥ sarvairvacanaṃ vacanārthavit | uvāca padmanābhasya pūrvarūpaṃ prati prabho
सब देवताओं के इस प्रकार कहने पर वचनों का अर्थ जानने वाले ब्रह्मा ने, हे प्रभो, पद्मनाभ के आदि स्वरूप के विषय में कहा।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 28 (13.40.28)
न ह्येनं वेद तत्वेन भुवनं भुवनेश्वरम् । सङ्ख्यातुं नैव चात्मानं निर्गुणं गुणिनां वरम् ॥
na hyenaṃ veda tatvena bhuvanaṃ bhuvaneśvaram | saṅkhyātuṃ naiva cātmānaṃ nirguṇaṃ guṇināṃ varam
भुवनों का स्वामी जैसा वह वास्तव में है, उसे संसार नहीं जानता; गुणहीन होकर भी गुणवानों में श्रेष्ठ उस आत्मा की गणना भी नहीं की जा सकती।
श्लोक 29 (13.40.29)
अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । सुपर्णस्य च संवादमृषीणां चापि देवताः ॥
atra te vartayiṣyāmi itihāsaṃ purātanam | suparṇasya ca saṃvādamṛṣīṇāṃ cāpi devatāḥ
हे देवताओ, इस विषय में मैं तुम्हें एक पुराना इतिहास सुनाऊँगा, सुपर्ण और ऋषियों का संवाद।
श्लोक 30 (13.40.30)
पुरा ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धाश्च भुवनेश्वरम् । आश्रित्य हिमवत्पृष्ठे चक्रिरे विविधाः कथाः ॥
purā brahmarṣayaścaiva siddhāśca bhuvaneśvaram | āśritya himavatpṛṣṭhe cakrire vividhāḥ kathāḥ
पूर्वकाल में हिमालय के एक शिखर पर ब्रह्मर्षियों और सिद्धों ने भुवनेश्वर का आश्रय लेकर नाना प्रकार की कथाएँ कीं।
श्लोक 31 (13.40.31)
तेषां कथयतां तत्र कथान्ते पततां वरः । प्रादुरासीन्महातेजा वाहश्चक्रगदाभृतः ॥
teṣāṃ kathayatāṃ tatra kathānte patatāṃ varaḥ | prādurāsīnmahātejā vāhaścakragadābhṛtaḥ
वहाँ उनके कथा कहते समय, कथा के अन्त में पक्षियों में श्रेष्ठ, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान के महातेजस्वी वाहन प्रकट हुए।
श्लोक 32 (13.40.32)
स तानृषीन्समासाद्य विनयावनताननः । अवतीर्य महावीर्यस्तानृषीनभिजग्मिवान् ॥
sa tānṛṣīnsamāsādya vinayāvanatānanaḥ | avatīrya mahāvīryastānṛṣīnabhijagmivān
विनय से मुख झुकाए हुए उस महाबलशाली ने उन ऋषियों के पास पहुँचकर नीचे उतरकर उनका अभिवादन किया।
श्लोक 33 (13.40.33)
अभ्यर्चितः स ऋषिभिः स्वागतेन महाबलः । उपाविशत तेजस्वी भूमौ वेगवतां वरः ॥
abhyarcitaḥ sa ṛṣibhiḥ svāgatena mahābalaḥ | upāviśata tejasvī bhūmau vegavatāṃ varaḥ
ऋषियों ने स्वागत करके उनका सत्कार किया, और वेगवानों में श्रेष्ठ उस तेजस्वी महाबली ने भूमि पर आसन ग्रहण किया।
श्लोक 34 (13.40.34)
तमासीनं महात्मानं वैनतेयं महाद्युतिम् । ऋषयः परिपप्रच्छुर्महात्मानस्तपस्विनः ॥
tamāsīnaṃ mahātmānaṃ vainateyaṃ mahādyutim | ṛṣayaḥ paripapracchurmahātmānastapasvinaḥ
वहाँ बैठे हुए उन महात्मा और महातेजस्वी वैनतेय से महात्मा तपस्वी ऋषियों ने प्रश्न किया।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 35 (13.40.35)
कौतूहलं वैनतेय परं नो हृदि वर्तते । तस्य नान्योस्ति वक्तेह त्वामृते पन्नगाशन ॥
kautūhalaṃ vainateya paraṃ no hṛdi vartate | tasya nānyosti vakteha tvāmṛte pannagāśana
"हे वैनतेय, हमारे हृदय में एक बड़ी जिज्ञासा है, और हे सर्पभक्षी, यहाँ आपके सिवा उसे बताने वाला कोई नहीं है।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 36 (13.40.36)
तदाख्यातमिहेच्छामो भवता प्रश्नमुत्तमम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच प्राञ्जलिर्विनतासुतः ॥
tadākhyātamihecchāmo bhavatā praśnamuttamam | evamuktaḥ pratyuvāca prāñjalirvinatāsutaḥ
हम चाहते हैं कि आप इस उत्तम प्रश्न का उत्तर दें।" ऐसा कहे जाने पर विनता के पुत्र ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया।
सुपर्ण उवाच
श्लोक 37 (13.40.37)
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मां ब्रह्मर्षिसत्तमाः । प्रष्टव्यं प्रष्टुमिच्छन्ति प्रीतिमन्तोऽनसूयकाः ॥
dhanyo'smyanugṛhīto'smi yanmāṃ brahmarṣisattamāḥ | praṣṭavyaṃ praṣṭumicchanti prītimanto'nasūyakāḥ
"हे ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ, मैं धन्य हूँ और अनुगृहीत हूँ कि आप प्रेमपूर्वक, ईर्ष्या से रहित होकर मुझसे पूछने योग्य बात पूछना चाहते हैं।
श्लोक 38 (13.40.38)
किं मया ब्रूत वक्तव्यं कार्यं च वदतां वराः । यूयं हि मां यथायुक्तं सर्वं वै प्रष्टुमर्हथ ॥
kiṃ mayā brūta vaktavyaṃ kāryaṃ ca vadatāṃ varāḥ | yūyaṃ hi māṃ yathāyuktaṃ sarvaṃ vai praṣṭumarhatha
बताइए, मुझे क्या कहना है और क्या करना है, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ। आप मुझसे यथोचित रूप से सब कुछ पूछ सकते हैं।"
ब्रह्मोवाच
श्लोक 39 (13.40.39)
नमस्कृत्वा ह्यनन्ताय ततस्ते ऋषिसत्तमाः । प्रष्टुं प्रचक्रमुस्तत्र वैनतेयं महाबलम् ॥
namaskṛtvā hyanantāya tataste ṛṣisattamāḥ | praṣṭuṃ pracakramustatra vainateyaṃ mahābalam
तब उन श्रेष्ठ ऋषियों ने अनन्त को नमस्कार करके महाबली वैनतेय से प्रश्न करना आरम्भ किया।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 40 (13.40.40)
देवदेवं महात्मानं नारायणमनामयम् । भवानुपास्ते वरदं कुतोऽसौ कश्च तत्वतः ॥
devadevaṃ mahātmānaṃ nārāyaṇamanāmayam | bhavānupāste varadaṃ kuto'sau kaśca tatvataḥ
"देवों के देव, महात्मा, निर्दोष, वरदाता नारायण की जिनकी आप उपासना करते हैं, वे कहाँ से हैं और वास्तव में कौन हैं?
श्लोक 41 (13.40.41)
प्रकृतिर्विकृतिर्वाऽस्य कीदृशी क्वनु संस्थितिः । एतद्भवन्तं पृच्छामो देवोऽयं क्व कृतालयः ॥
prakṛtirvikṛtirvā'sya kīdṛśī kvanu saṃsthitiḥ | etadbhavantaṃ pṛcchāmo devo'yaṃ kva kṛtālayaḥ
उनकी प्रकृति या विकृति कैसी है और उनकी स्थिति कहाँ है? हम आपसे यही पूछते हैं कि इन देव का निवास कहाँ है?
श्लोक 42 (13.40.42)
एष भक्तप्रियो देवः प्रियभक्तस्तथैव च । त्वं प्रियश्चास्य भक्तश्च नान्यः काश्यप विद्यते ॥
eṣa bhaktapriyo devaḥ priyabhaktastathaiva ca | tvaṃ priyaścāsya bhaktaśca nānyaḥ kāśyapa vidyate
ये देव भक्तों के प्रिय हैं और अपने भक्तों को प्रिय मानते हैं; हे काश्यप, आप उनके प्रिय भी हैं और भक्त भी, ऐसा दूसरा कोई नहीं है।
श्लोक 43 (13.40.43)
मुष्णन्निव मनश्चक्षूंष्यविभाव्यतनुर्विभुः । अनादिमध्यनिधनो न विद्मैनं कुतो ह्यसौ ॥
muṣṇanniva manaścakṣūṃṣyavibhāvyatanurvibhuḥ | anādimadhyanidhano na vidmainaṃ kuto hyasau
जो विभु मन और नेत्रों को मानो चुराता है, जिसका शरीर जाना नहीं जा सकता, जिसका न आदि है, न मध्य, न अन्त, उसे हम नहीं जानते कि वह कहाँ से है।
श्लोक 44 (13.40.44)
वेदेष्वपि च विश्वात्मा गीयते न च विद्महे । तत्वतस्तत्वभूतात्मा विभुर्नित्यः सनातनः ॥
vedeṣvapi ca viśvātmā gīyate na ca vidmahe | tatvatastatvabhūtātmā vibhurnityaḥ sanātanaḥ
वेदों में भी विश्वात्मा का गान होता है, फिर भी हम उन्हें नहीं जानते; वे तत्त्वतः तत्त्व के आत्मस्वरूप, विभु, नित्य और सनातन हैं।
श्लोक 45 (13.40.45)
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । गुणाश्चैषां यथासङ्ख्यं भावाभावौ तथैव च ॥
pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam | guṇāścaiṣāṃ yathāsaṅkhyaṃ bhāvābhāvau tathaiva ca
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवीं ज्योति, उनके गुण क्रम से, तथा भाव और अभाव भी,
श्लोक 46 (13.40.46)
तमः सत्वं रजश्चैव भावाश्चैव तदात्मकाः । मनो बुद्धिश्च तेजश्च बुद्धिगम्यानि तत्वतः । जायन्ते तात तस्माद्धि तिष्ठते तेष्वसौ विभुः ॥
tamaḥ satvaṃ rajaścaiva bhāvāścaiva tadātmakāḥ | mano buddhiśca tejaśca buddhigamyāni tatvataḥ | jāyante tāta tasmāddhi tiṣṭhate teṣvasau vibhuḥ
तम, सत्त्व और रज, और उन्हीं के स्वरूप वाले भाव, मन, बुद्धि और तेज, जो तत्त्वतः बुद्धि से ही जाने जा सकते हैं, हे तात, ये उन्हीं से उत्पन्न होते हैं और वे विभु इन्हीं में स्थित हैं।
श्लोक 47 (13.40.47)
सञ्चिन्त्य बहुधा बुद्ध्या नाध्यवस्यामहे परम् । तस्य देवस्य तत्वेन तन्नः शंस यथातथम् ॥
sañcintya bahudhā buddhyā nādhyavasyāmahe param | tasya devasya tatvena tannaḥ śaṃsa yathātatham
बुद्धि से अनेक प्रकार से विचार करने पर भी हम उस परम को निश्चित नहीं कर पाते। इसलिए उन देव के विषय में हमें यथार्थ रूप से, जैसा है वैसा बताइए।
श्लोक 48 (13.40.48)
एतमेव परं प्रश्नं कौतूहलसमन्विताः । एवं भवन्तं पृच्छामस्तन्नः शंसितुमर्हसि ॥
etameva paraṃ praśnaṃ kautūhalasamanvitāḥ | evaṃ bhavantaṃ pṛcchāmastannaḥ śaṃsitumarhasi
जिज्ञासा से भरकर हम आपसे यही परम प्रश्न पूछ रहे हैं; आप हमें बताइए।"
सुपर्ण उवाच
श्लोक 49 (13.40.49)
स्थूलतो यस्तु भगवांस्तेनैव स्वेन हेतुना । त्रैलोक्यस्य तु रक्षार्थं दृश्यते रूपमास्थितः ॥
sthūlato yastu bhagavāṃstenaiva svena hetunā | trailokyasya tu rakṣārthaṃ dṛśyate rūpamāsthitaḥ
सुपर्ण ने कहा: जो भगवान स्थूल रूप में दिखाई देते हैं, वे अपने ही किसी कारण से तीनों लोकों की रक्षा के लिए वह रूप धारण करके दिखाई देते हैं।
श्लोक 50 (13.40.50)
मया तु महदाश्चर्यं पुरा दृष्टं सनातने । देवे श्रीवत्सनिलये तच्छृणुध्वमशेषतः ॥
mayā tu mahadāścaryaṃ purā dṛṣṭaṃ sanātane | deve śrīvatsanilaye tacchṛṇudhvamaśeṣataḥ
मैंने पहले सनातन देव श्रीवत्सधारी में एक बड़ा आश्चर्य देखा था; उसे आप सम्पूर्ण रूप में सुनिए।
श्लोक 51 (13.40.51)
न स्म शक्यो मया वेत्तुं न भवद्भिः कथञ्चन । यथा मां प्राह भगवांस्तथा तच्छ्रूयतां मम ॥
na sma śakyo mayā vettuṃ na bhavadbhiḥ kathañcana | yathā māṃ prāha bhagavāṃstathā tacchrūyatāṃ mama
न मैं इसे जान सकता था, न आप किसी प्रकार जान सकते हैं; जैसा भगवान ने मुझसे कहा था, वैसा ही आप सुनिए।
श्लोक 52 (13.40.52)
मयाऽमृतं देवतानां मिषतामृषिसत्तमाः । हृतं विपाट्य तद्यन्त्रं विद्राव्यामृतरक्षिणः ॥
mayā'mṛtaṃ devatānāṃ miṣatāmṛṣisattamāḥ | hṛtaṃ vipāṭya tadyantraṃ vidrāvyāmṛtarakṣiṇaḥ
हे ऋषिश्रेष्ठो, देवताओं के देखते-देखते मैंने उस यन्त्र को फाड़कर और अमृत के रक्षकों को भगाकर अमृत हर लिया था,
श्लोक 53 (13.40.53)
देवता विमुखीकृत्य सेन्द्राः समरुतो मृधे । उन्मथ्याशु गिरींश्चैव विक्षोभ्य च महोदधिं ॥
devatā vimukhīkṛtya sendrāḥ samaruto mṛdhe | unmathyāśu girīṃścaiva vikṣobhya ca mahodadhiṃ
इन्द्र और मरुद्गणों सहित देवताओं को युद्ध में विमुख करके, पर्वतों को शीघ्र उखाड़कर और महासागर को मथकर।
श्लोक 54 (13.40.54)
तं दृष्ट्वा मम विक्रान्तं वागुवाचाशरीरिणी । प्रीतोऽस्मि ते वैनतेय कर्मणाऽनेन सुव्रत । अवृथा तेऽस्तु मद्वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
taṃ dṛṣṭvā mama vikrāntaṃ vāguvācāśarīriṇī | prīto'smi te vainateya karmaṇā'nena suvrata | avṛthā te'stu madvākyaṃ brūhi kiṃ karavāṇi te
मेरे उस पराक्रम को देखकर एक अशरीरी वाणी बोली: "हे सुव्रत वैनतेय, तुम्हारे इस कर्म से मैं प्रसन्न हूँ। मेरा वचन निष्फल न हो; कहो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?"
श्लोक 55 (13.40.55)
तामेवंवादिनीं वाचमहं प्रत्युक्तवांस्तदा । ज्ञातुमिच्छामि कस्त्वं हि ततो मे दास्यसे वरम् । प्रकृतिर्विकृतिर्वा त्वं देवो वा दानवोऽपि वा ॥
tāmevaṃvādinīṃ vācamahaṃ pratyuktavāṃstadā | jñātumicchāmi kastvaṃ hi tato me dāsyase varam | prakṛtirvikṛtirvā tvaṃ devo vā dānavo'pi vā
ऐसा कहने वाली उस वाणी को मैंने तब उत्तर दिया: "मैं जानना चाहता हूँ कि तुम कौन हो; तब तुम मुझे वर दोगे। तुम प्रकृति हो या विकृति, देवता हो या दानव?"
श्लोक 56 (13.40.56)
ततो जलदगम्भीरं प्रहस्य वदतांवरः । उवाच वरदः प्रीतः काले त्वं माऽभिवेत्स्यसि ॥
tato jaladagambhīraṃ prahasya vadatāṃvaraḥ | uvāca varadaḥ prītaḥ kāle tvaṃ mā'bhivetsyasi
तब वरदाता, वक्ताओं में श्रेष्ठ उसने प्रसन्न होकर मेघ के समान गम्भीर स्वर में हँसकर कहा: "समय आने पर तुम मुझे जान लोगे।"
नारायण उवाच
श्लोक 57 (13.40.57)
वाहनं भव मे साधो वरं दद्मि तवोत्तमम् । न ते वीर्येण सदृशः कश्चिल्लोके भविष्यति ॥
vāhanaṃ bhava me sādho varaṃ dadmi tavottamam | na te vīryeṇa sadṛśaḥ kaścilloke bhaviṣyati
"हे साधु, तुम मेरे वाहन बनो; मैं तुम्हें उत्तम वर देता हूँ: संसार में कोई भी बल में तुम्हारे समान नहीं होगा।
श्लोक 58 (13.40.58)
पतङ्ग पततांश्रेष्ठ न देवो नापि दानवः । मत्सखित्वमनुप्राप्तो दुर्धर्षश्च भविष्यसि ॥
pataṅga patatāṃśreṣṭha na devo nāpi dānavaḥ | matsakhitvamanuprāpto durdharṣaśca bhaviṣyasi
हे पतंग, पक्षियों में श्रेष्ठ, तुम न देव हो, न दानव; मेरी मित्रता पाकर तुम अजेय हो जाओगे।"
सुपर्ण उवाच
श्लोक 59 (13.40.59)
तमब्रवं देवदेवं मामेवंवादिनं परम् । प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणम्य शिरसा विभुम् ॥
tamabravaṃ devadevaṃ māmevaṃvādinaṃ param | prayataḥ prāñjalirbhūtvā praṇamya śirasā vibhum
इस प्रकार बोलने वाले उन परम देवाधिदेव विभु को मैंने संयत होकर, हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर प्रणाम किया और कहा:
श्लोक 60 (13.40.60)
एवमेतन्महाबाहो सर्वमेतद्भविष्यति । वाहनं ते भविष्यामि यथा वदति मां भवान् ॥
evametanmahābāho sarvametadbhaviṣyati | vāhanaṃ te bhaviṣyāmi yathā vadati māṃ bhavān
"हे महाबाहो, ऐसा ही हो; यह सब होगा। जैसा आप मुझसे कहते हैं, मैं आपका वाहन बनूँगा।
श्लोक 61 (13.40.61)
मम चापि महाबुद्धे निश्चयं श्रूयतामिति । ध्वजस्तेऽहं भविष्यामि रथस्थस्य न संशयः ॥
mama cāpi mahābuddhe niścayaṃ śrūyatāmiti | dhvajaste'haṃ bhaviṣyāmi rathasthasya na saṃśayaḥ
हे महाबुद्धे, मेरा भी निश्चय सुनिए: जब आप रथ पर स्थित होंगे, तब मैं आपकी ध्वजा बनूँगा, इसमें संदेह नहीं।"
श्लोक 62 (13.40.62)
तथास्त्विति स मामुक्त्वा भूयः प्राह महामनाः । न ते गतिविघातोऽद्य भविष्यत्यमृतं विना ॥
tathāstviti sa māmuktvā bhūyaḥ prāha mahāmanāḥ | na te gativighāto'dya bhaviṣyatyamṛtaṃ vinā
"ऐसा ही हो" कहकर उस महामना ने मुझसे फिर कहा: "अमृत के बिना भी अब तुम्हारी गति में कोई बाधा नहीं पड़ेगी।"
श्लोक 63 (13.40.63)
एवं कृत्वा तु समयं देवदेवः सनातनः । मामुक्त्वा साधयस्वेति यथाऽभिप्रायतो गतः ॥
evaṃ kṛtvā tu samayaṃ devadevaḥ sanātanaḥ | māmuktvā sādhayasveti yathā'bhiprāyato gataḥ
इस प्रकार संधि करके सनातन देवाधिदेव मुझसे "अपना कार्य सिद्ध करो" कहकर अपनी इच्छा से चले गए।
श्लोक 64 (13.40.64)
ततोऽहं कृतसंवादो येन केनापि सत्तमाः । कौतूहलसमाविष्टः पितरं कश्यपं गतः ॥
tato'haṃ kṛtasaṃvādo yena kenāpi sattamāḥ | kautūhalasamāviṣṭaḥ pitaraṃ kaśyapaṃ gataḥ
तब, हे सज्जनो, किसी अज्ञात के साथ ऐसा संवाद करके कुतूहल से भरा हुआ मैं अपने पिता कश्यप के पास गया।
श्लोक 65 (13.40.65)
सोऽहं पितरमासाद्य प्रणिपत्याभिवाद्य च । सर्वमेतद्यथातथ्यमुक्तवान्पितुरन्तिके ॥
so'haṃ pitaramāsādya praṇipatyābhivādya ca | sarvametadyathātathyamuktavānpiturantike
पिता के पास पहुँचकर मैंने प्रणाम और अभिवादन किया और उनके सामने यह सब जैसा हुआ था वैसा ही कह सुनाया।
श्लोक 66 (13.40.66)
श्रुत्वा तु भगवान्मह्यं ध्यानमेवान्वपद्यत । स मुहूर्तमिव ध्यात्वा मामाह वदतां वरः ॥
śrutvā tu bhagavānmahyaṃ dhyānamevānvapadyata | sa muhūrtamiva dhyātvā māmāha vadatāṃ varaḥ
सुनकर भगवान कश्यप ध्यान में डूब गए। क्षण भर विचार करके उन वक्ताओं में श्रेष्ठ ने मुझसे कहा:
कश्यप उवाच
श्लोक 67 (13.40.67)
धन्योऽस्यनुगृहीतश्च यत्त्वं तेन महात्मना । संवादं कृतवांस्तात गुह्येन परमात्मना ॥
dhanyo'syanugṛhītaśca yattvaṃ tena mahātmanā | saṃvādaṃ kṛtavāṃstāta guhyena paramātmanā
हे तात, तुम धन्य और अनुगृहीत हो कि तुमने उन महात्मा, गुह्य परमात्मा के साथ संवाद किया।
श्लोक 68 (13.40.68)
स्थूलदृश्यः स भगवांस्तेन तेनैव हेतुना । दृश्यतेऽव्यक्तरूपस्थः प्रधानप्रभवाप्ययः ॥
sthūladṛśyaḥ sa bhagavāṃstena tenaiva hetunā | dṛśyate'vyaktarūpasthaḥ pradhānaprabhavāpyayaḥ
वे भगवान स्थूल रूप में दिखाई देते हैं, और उसी कारण अव्यक्त रूप में स्थित होने पर भी दिखाई देते हैं; वे प्रधान की उत्पत्ति और लय के कारण हैं।
श्लोक 69 (13.40.69)
मया हि स महातेजा नान्ययोगसमाधिना । तपसोग्रेण तेजस्वी तोषितस्तपसांनिधिः ॥
mayā hi sa mahātejā nānyayogasamādhinā | tapasogreṇa tejasvī toṣitastapasāṃnidhiḥ
क्योंकि मैंने उन महातेजस्वी तपोनिधि को किसी दूसरे योग या समाधि से नहीं, बल्कि उग्र तप से प्रसन्न किया था।
श्लोक 70 (13.40.70)
ततो मे दर्शयामास तोषयन्निव पुत्रक । श्वेतपीतारुणनिभः कद्रूकपिलपिङ्गलः ॥
tato me darśayāmāsa toṣayanniva putraka | śvetapītāruṇanibhaḥ kadrūkapilapiṅgalaḥ
तब, हे पुत्र, मानो मुझे प्रसन्न करते हुए उन्होंने मुझे अपना रूप दिखाया: श्वेत, पीत और अरुण आभा वाला, भूरा, कपिल और पिंगल,
श्लोक 71 (13.40.71)
रक्तनीलासितनिभः सहस्रोदरपाणिमान् । द्विसाहस्रमहावक्त्र एकाक्षः शतलोचनः ॥
raktanīlāsitanibhaḥ sahasrodarapāṇimān | dvisāhasramahāvaktra ekākṣaḥ śatalocanaḥ
लाल, नीले और काले रंग वाला, सहस्र उदरों और हाथों वाला, दो हज़ार बड़े मुखों वाला, एक नेत्र वाला और सौ नेत्रों वाला।
श्लोक 72 (13.40.72)
अनिष्पन्दा निराहाराः समानाः सूर्यतेजसा । तमुपासन्ति परमं गुह्यमक्षरमव्ययम् ॥
aniṣpandā nirāhārāḥ samānāḥ sūryatejasā | tamupāsanti paramaṃ guhyamakṣaramavyayam
निश्चल, निराहार और सूर्य के समान तेज वाले जन उन परम, गुह्य, अक्षर और अव्यय की उपासना करते हैं।
श्लोक 73 (13.40.73)
समासाद्य तु तं विश्वमहं मूर्ध्ना प्रणम्य च । ऋग्यजुःसामभिः स्तुत्वा शरण्यं शरणं गतः ॥
samāsādya tu taṃ viśvamahaṃ mūrdhnā praṇamya ca | ṛgyajuḥsāmabhiḥ stutvā śaraṇyaṃ śaraṇaṃ gataḥ
उन विश्वरूप के पास पहुँचकर मैंने सिर झुकाकर प्रणाम किया, ऋक्, यजुः और साम मन्त्रों से उनकी स्तुति की और उन शरण देने योग्य की शरण ली।
श्लोक 74 (13.40.74)
महामेघौघधीरेण स्वरेण जयतांवरः । आभाष्य पुत्रपुत्रेति इदमाह धृतं वचः ॥
mahāmeghaughadhīreṇa svareṇa jayatāṃvaraḥ | ābhāṣya putraputreti idamāha dhṛtaṃ vacaḥ
महामेघसमूह के समान धीर स्वर में उन विजयियों में श्रेष्ठ ने "पुत्र, पुत्र" कहकर मुझे सम्बोधित किया और ये दृढ़ वचन कहे:
नारायण उवाच
श्लोक 75 (13.40.75)
त्वयाऽभ्युदयकामेन तपश्चीर्णं महामुने । अमुक्तस्त्वं समासङ्गैरविमुक्तोऽद्य पश्यसि ॥
tvayā'bhyudayakāmena tapaścīrṇaṃ mahāmune | amuktastvaṃ samāsaṅgairavimukto'dya paśyasi
हे महामुनि, तुमने अभ्युदय की कामना से तप किया है। सांसारिक आसक्तियों से मुक्त न होते हुए भी, अविमुक्त रहकर, तुम आज मुझे देख रहे हो।
श्लोक 76 (13.40.76)
यदा सङ्गैर्विमुक्तश्च गतमोहो गतस्पृहः । भविष्यसि सदा ब्रह्म मामनुध्यास्यसे द्विज ॥
yadā saṅgairvimuktaśca gatamoho gataspṛhaḥ | bhaviṣyasi sadā brahma māmanudhyāsyase dvija
जब तुम आसक्तियों से मुक्त, मोह और स्पृहा से रहित हो जाओगे, तब तुम सदा ब्रह्म हो जाओगे और, हे द्विज, मेरा ध्यान करोगे।
श्लोक 77 (13.40.77)
ऐकान्तिकीं मतिं कृत्वा मद्भक्तो मत्परायणः । ज्ञास्यसे मां ततो ब्रह्मन्वीतमोहश्च तत्वतः ॥
aikāntikīṃ matiṃ kṛtvā madbhakto matparāyaṇaḥ | jñāsyase māṃ tato brahmanvītamohaśca tatvataḥ
एकान्त मति करके, मेरे भक्त और मेरे परायण होकर, हे ब्राह्मण, तब तुम मोह से रहित होकर मुझे यथार्थ रूप में जानोगे।
कश्यप उवाच
श्लोक 78 (13.40.78)
तेन त्वं कृतसंवादः स्वतः सर्वहितैषिणा । विश्वरूपेण देवेन पुरुषेण महात्मना । तमेवाराधय क्षिप्रं तमाराध्य न सीदसि ॥
tena tvaṃ kṛtasaṃvādaḥ svataḥ sarvahitaiṣiṇā | viśvarūpeṇa devena puruṣeṇa mahātmanā | tamevārādhaya kṣipraṃ tamārādhya na sīdasi
उन्हीं सबके हित की इच्छा रखने वाले, विश्वरूप देव, महात्मा पुरुष के साथ तुमने स्वयं संवाद किया है। उन्हीं की शीघ्र आराधना करो; उनकी आराधना करके तुम दुःख में नहीं डूबोगे।
सुपर्ण उवाच
श्लोक 79 (13.40.79)
सोऽहमेवं भगवता पित्रा ब्रह्मर्षिसत्तमाः । अनुनीतो यथान्यायं स्वमेव भवनं गतः ॥
so'hamevaṃ bhagavatā pitrā brahmarṣisattamāḥ | anunīto yathānyāyaṃ svameva bhavanaṃ gataḥ
हे ब्रह्मर्षिश्रेष्ठो, इस प्रकार अपने पिता भगवान से यथोचित रूप से समझाए जाने पर मैं अपने ही निवास को लौट गया।