अनुशासन पर्व · अध्याय 41
गरुड़ का नारायण के पीछे अन्धकार और अग्नि में प्रवेश
गरुड़ ऋषियों को अपना वृत्तान्त आगे सुनाते हैं। नारायण के दर्शन की लालसा से वे बदरी जाकर उनकी स्तुति करते हैं; भगवान विशाल पीपल के नीचे प्रकट होकर चल पड़ते हैं और गरुड़ उनके पीछे उस महान् अग्नि के पास से, जहाँ शम्भु तप कर रहे हैं, सूर्यहीन अन्धकार में पहुँचते हैं। घबराए हुए गरुड़ के पुकारने पर भगवान अन्धकार दूर करते हैं और गरुड़ को स्वयंप्रकाश जनों का तेजोमय लोक दिखाई देता है। फिर एक ज्वलन्त, ईंधनरहित अग्नि में प्रवेश करते समय गरुड़ रक्षा की प्रार्थना करते हैं; भगवान उन्हें आश्वस्त करते हैं और कहते हैं कि आसक्तिहीन ज्ञानी ही उन्हें जानते हैं, और भक्त होने के कारण गरुड़ उन्हें स्थूल रूप में जानेंगे।
सुपर्ण उवाच
श्लोक 1 (13.41.1)
सोऽहमामन्त्र्य पितरं तद्भावगतमानसः । स्वमेवालयमासाद्य तमेवार्थमचिन्तयम् ॥
so'hamāmantrya pitaraṃ tadbhāvagatamānasaḥ | svamevālayamāsādya tamevārthamacintayam
सुपर्ण ने कहा: पिता से आज्ञा लेकर, उसी भाव में मन लगाए हुए मैं अपने ही निवास पर पहुँचा और उसी विषय का चिन्तन करता रहा।
श्लोक 2 (13.41.2)
तद्भावगतभावात्मा तद्भूतगतमानसः । गोविन्दं चिन्तयन्नासे शाश्वतं परमव्ययम् ॥
tadbhāvagatabhāvātmā tadbhūtagatamānasaḥ | govindaṃ cintayannāse śāśvataṃ paramavyayam
उसी भाव में लीन आत्मा और मन वाला मैं शाश्वत, परम और अव्यय गोविन्द का चिन्तन करता हुआ रहा।
श्लोक 3 (13.41.3)
धृतं बभूव हृदयं नारायणदिदृक्षया । सोऽहं वेगं समास्थाय मनोमारुतवेगवान् । रम्यां विशालां बदरीं गतो नारायणाश्रमम् ॥
dhṛtaṃ babhūva hṛdayaṃ nārāyaṇadidṛkṣayā | so'haṃ vegaṃ samāsthāya manomārutavegavān | ramyāṃ viśālāṃ badarīṃ gato nārāyaṇāśramam
नारायण को देखने की इच्छा से मेरा हृदय व्याकुल हो गया। मन और वायु के समान वेग धारण करके मैं रमणीय, विशाल बदरी में, नारायण के आश्रम में पहुँचा।
श्लोक 4 (13.41.4)
ततस्तत्र हरिं दृष्ट्वा जगतः प्रभवं विभुम् । गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं प्रणतः शिरसा हरिम् । ऋग्यजुस्सामभिश्चैनं तुष्टाव परया मुदा ॥
tatastatra hariṃ dṛṣṭvā jagataḥ prabhavaṃ vibhum | govindaṃ puṇḍarīkākṣaṃ praṇataḥ śirasā harim | ṛgyajussāmabhiścainaṃ tuṣṭāva parayā mudā
वहाँ मैंने जगत् के आदि कारण, विभु, कमलनयन गोविन्द हरि को सिर झुकाकर प्रणाम किया और परम आनन्द से ऋक्, यजुः और साम मन्त्रों द्वारा उनकी स्तुति की।
श्लोक 5 (13.41.5)
अथापश्यं सुविपुलमश्वत्थं देवसंश्रयम् ॥
athāpaśyaṃ suvipulamaśvatthaṃ devasaṃśrayam
तब मैंने देवताओं के आश्रय एक अत्यन्त विशाल पीपल का वृक्ष देखा।
श्लोक 6 (13.41.6)
चतुर्द्विगुणपीनांसः शङ्खचक्रगदाधरः । प्रादुर्बभूव पुरुषः पीतवासाः सनातनः । मध्याह्नार्कप्रतीकाशस्तेजसा भासयन्दिशः ॥
caturdviguṇapīnāṃsaḥ śaṅkhacakragadādharaḥ | prādurbabhūva puruṣaḥ pītavāsāḥ sanātanaḥ | madhyāhnārkapratīkāśastejasā bhāsayandiśaḥ
वहाँ पीले वस्त्र धारण किए हुए सनातन पुरुष प्रकट हुए, जिनके कन्धे पुष्ट थे और चार का दुगुना, अर्थात् आठ थे, जो शंख, चक्र और गदा धारण किए थे और दोपहर के सूर्य के समान अपने तेज से दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे।
श्लोक 7 (13.41.7)
संस्तुतः संविदं कृत्वा व्रजेति श्रेयसे रतः । प्रागुदीचीं दिशं देवः प्रतस्थे पुरुषोत्तमः । दिशश्च विदिशश्चैव भासयन्स्वेन तेजसा ॥
saṃstutaḥ saṃvidaṃ kṛtvā vrajeti śreyase rataḥ | prāgudīcīṃ diśaṃ devaḥ pratasthe puruṣottamaḥ | diśaśca vidiśaścaiva bhāsayansvena tejasā
मेरी स्तुति से प्रसन्न होकर और मुझसे संकेत करके, सदा कल्याण में रत पुरुषोत्तम देव ने "जाओ" कहा और अपने तेज से दिशाओं और उपदिशाओं को प्रकाशित करते हुए उत्तर-पूर्व की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 8 (13.41.8)
तमहं पुरुषं दिव्यं व्रजन्तममितौजसम् । अनुवव्राज वेगेन शनैर्गच्छन्तमव्ययम् ॥
tamahaṃ puruṣaṃ divyaṃ vrajantamamitaujasam | anuvavrāja vegena śanairgacchantamavyayam
अमित तेज वाले उन दिव्य पुरुष के जाते समय मैं वेग से उनके पीछे चला, वे अव्यय धीरे-धीरे जा रहे थे।
श्लोक 9 (13.41.9)
योजनानां सहस्राणि षष्टिमष्टौ तथा शतम् । तथा शतसहस्रं च शतं द्विगुणमेव च ॥
yojanānāṃ sahasrāṇi ṣaṣṭimaṣṭau tathā śatam | tathā śatasahasraṃ ca śataṃ dviguṇameva ca
साठ और आठ हज़ार और सौ योजन, तथा एक लाख और दुगुने सौ योजन तक,
श्लोक 10 (13.41.10)
स गत्वा दीर्घमध्वानमपश्यमहमद्भुतम् । महान्तं पावकं दीप्तमर्चिष्मन्तमनिन्धनम् ॥
sa gatvā dīrghamadhvānamapaśyamahamadbhutam | mahāntaṃ pāvakaṃ dīptamarciṣmantamanindhanam
इतना लम्बा मार्ग तय करके मैंने एक अद्भुत दृश्य देखा: एक बड़ी जलती हुई आग, ज्वालाओं से भरी और बिना ईंधन की।
श्लोक 11 (13.41.11)
शतयोजनविस्तीर्णं तस्माद्द्विगुणमायतम् । विवेश स महायोगी पावकं पावकद्युतिः ॥
śatayojanavistīrṇaṃ tasmāddviguṇamāyatam | viveśa sa mahāyogī pāvakaṃ pāvakadyutiḥ
वह सौ योजन चौड़ी और उससे दुगुनी लम्बी थी; अग्नि के समान तेजस्वी उन महायोगी ने उसमें प्रवेश किया।
श्लोक 12 (13.41.12)
तत्र शंभुस्तपस्तेपे महादेवः सहोमया । स तेन संविदं कृत्वा पावकं समतिक्रमत् ॥
tatra śaṃbhustapastepe mahādevaḥ sahomayā | sa tena saṃvidaṃ kṛtvā pāvakaṃ samatikramat
वहाँ उमा के साथ शम्भु महादेव तप कर रहे थे। उनसे संकेत करके भगवान उस अग्नि को पार कर गए।
श्लोक 13 (13.41.13)
श्रमाभिभूतेन मया कथञ्चिदनुगम्यते ॥
śramābhibhūtena mayā kathañcidanugamyate
थकान से व्याकुल होकर भी मैं जैसे-तैसे उनके पीछे चलता रहा।
श्लोक 14 (13.41.14)
गत्वा स दीर्घमध्वानं भास्करेणावभासितम् । अभास्करममर्यादं विवेश सुमहत्तमः ॥
gatvā sa dīrghamadhvānaṃ bhāskareṇāvabhāsitam | abhāskaramamaryādaṃ viveśa sumahattamaḥ
सूर्य के प्रकाश से आलोकित लम्बा मार्ग तय करके उन्होंने सूर्यहीन, असीम और महान् अन्धकार में प्रवेश किया।
श्लोक 15 (13.41.15)
अथ दृष्टिः प्रतिहता मम तत्र बभूव ह । यथास्वभावं भूतात्मा विवेश स महाद्युतिः ॥
atha dṛṣṭiḥ pratihatā mama tatra babhūva ha | yathāsvabhāvaṃ bhūtātmā viveśa sa mahādyutiḥ
तब वहाँ मेरी दृष्टि रुक गई; सब भूतों के आत्मा उन महातेजस्वी ने अपने स्वभाव के अनुसार उसमें प्रवेश किया।
श्लोक 16 (13.41.16)
ततोऽहमभवं मूढो जडान्धबधिरोपमः । दिशश्च विदिशश्चैव न विजज्ञे तमोवृतः ॥
tato'hamabhavaṃ mūḍho jaḍāndhabadhiropamaḥ | diśaśca vidiśaścaiva na vijajñe tamovṛtaḥ
तब मैं मूढ़ हो गया, मानो जड़, अन्धा और बहरा; अन्धकार से घिरा हुआ मैं दिशाओं और उपदिशाओं को नहीं पहचान सका।
श्लोक 17 (13.41.17)
अविजानन्नहं किञ्चित्तस्मिंस्तमसि संवृते । ससंभ्रान्तेन मनसा व्यथां परमिकां गतः ॥
avijānannahaṃ kiñcittasmiṃstamasi saṃvṛte | sasaṃbhrāntena manasā vyathāṃ paramikāṃ gataḥ
उस घिरे हुए अन्धकार में कुछ भी न जानते हुए, घबराए हुए मन से मैं अत्यन्त व्यथा में पड़ गया।
श्लोक 18 (13.41.18)
सोऽहं प्रपन्नः शरणं देवदेवं सनातनम् । प्राञ्जलिर्मनसा भूत्वा वाक्यमेतत्तदोक्तवान् ॥
so'haṃ prapannaḥ śaraṇaṃ devadevaṃ sanātanam | prāñjalirmanasā bhūtvā vākyametattadoktavān
मैंने सनातन देवाधिदेव की शरण ली और मन से हाथ जोड़कर तब ये वचन कहे।
श्लोक 19 (13.41.19)
भगवन्भूतभव्येश भवद्भूतकृदव्यय । शरणं सम्प्रपन्नं मां त्रातुमर्हस्यरिंदम ॥
bhagavanbhūtabhavyeśa bhavadbhūtakṛdavyaya | śaraṇaṃ samprapannaṃ māṃ trātumarhasyariṃdama
"हे भगवन्, भूत और भविष्य के स्वामी, भूतों के अविनाशी कर्ता, शत्रुओं का दमन करने वाले, शरण में आए हुए मेरी आप रक्षा कीजिए।
श्लोक 20 (13.41.20)
अहं तु तत्त्वजिज्ञासुः कोऽसि कस्यासि कुत्र वा । सम्प्राप्तः पदवीं देव स मां संत्रातुमर्हसि ॥
ahaṃ tu tattvajijñāsuḥ ko'si kasyāsi kutra vā | samprāptaḥ padavīṃ deva sa māṃ saṃtrātumarhasi
मैं तत्त्व को जानना चाहता हूँ: आप कौन हैं, किसके हैं और कहाँ के हैं? हे देव, मैं आपके मार्ग पर आ पहुँचा हूँ; आप मुझे बचाइए।"
श्लोक 21 (13.41.21)
आविर्भूतः पुराणात्मा मामेहीति सनातनः । ततोऽपरान्ततो देवो विश्वस्य गतिरात्मवान् । मोहयामास मां तत्र दुर्विभाव्यवपुर्विभुः ॥
āvirbhūtaḥ purāṇātmā māmehīti sanātanaḥ | tato'parāntato devo viśvasya gatirātmavān | mohayāmāsa māṃ tatra durvibhāvyavapurvibhuḥ
सनातन पुराण पुरुष प्रकट हुए और बोले, "मेरे पास आओ।" तब उस दूसरी ओर से विश्व की गति, आत्मवान्, दुर्बोध रूप वाले उन विभु देव ने मुझे वहाँ मोहित कर दिया।
श्लोक 22 (13.41.22)
स्वभावमात्मनस्तत्र दर्शयन्स्वयमात्मना । श्रमं मे जनयामास भयं चाभयदः प्रभुः ॥
svabhāvamātmanastatra darśayansvayamātmanā | śramaṃ me janayāmāsa bhayaṃ cābhayadaḥ prabhuḥ
वहाँ अपने स्वभाव को स्वयं प्रकट करते हुए अभय देने वाले प्रभु ने मुझमें थकान और भय उत्पन्न कर दिया।
श्लोक 23 (13.41.23)
खिन्न इत्येव मां मत्वा भगवानव्ययोऽच्युतः । शब्देनाश्वासयामास जगाहे च तमो महत् ॥
khinna ityeva māṃ matvā bhagavānavyayo'cyutaḥ | śabdenāśvāsayāmāsa jagāhe ca tamo mahat
मुझे थका हुआ समझकर अविनाशी भगवान अच्युत ने शब्द से मुझे आश्वस्त किया और फिर उस महान् अन्धकार में आगे बढ़ गए।
श्लोक 24 (13.41.24)
अहं तमेवानुगतः श्रमालसपदश्चरन् । मनसा देवदेवेशं ध्यातुं समुपचक्रमे ॥
ahaṃ tamevānugataḥ śramālasapadaścaran | manasā devadeveśaṃ dhyātuṃ samupacakrame
मैं उन्हीं के पीछे थकान से मन्द पदों से चलता रहा और मन से देवों के देव के ध्यान में लग गया।
श्लोक 25 (13.41.25)
तथागतं तु मां ज्ञात्वा भगवानमितद्युतिः । तमः प्रणाशयामास ममानुग्रहकाङ्क्षया ॥
tathāgataṃ tu māṃ jñātvā bhagavānamitadyutiḥ | tamaḥ praṇāśayāmāsa mamānugrahakāṅkṣayā
मुझे ऐसी दशा में जानकर अमित तेज वाले भगवान ने मुझ पर कृपा करने की इच्छा से अन्धकार को नष्ट कर दिया।
श्लोक 26 (13.41.26)
ततः प्रनष्टे तमसि तमहं दीप्ततेजसम् । अपश्यं तेजसा व्याप्तं मध्याह्न इव भास्करम् ॥
tataḥ pranaṣṭe tamasi tamahaṃ dīptatejasam | apaśyaṃ tejasā vyāptaṃ madhyāhna iva bhāskaram
अन्धकार के नष्ट होने पर मैंने देखा कि वे दीप्तिमान तेज वाले हैं और दोपहर के सूर्य के समान तेज से व्याप्त हैं।
श्लोक 27 (13.41.27)
स्वयंप्रभांश्च पुरुषान्स्त्रियश्च परमाद्भुताः । अपश्यमहमव्यग्रस्तस्मिन्देशे सहस्रशः ॥
svayaṃprabhāṃśca puruṣānstriyaśca paramādbhutāḥ | apaśyamahamavyagrastasmindeśe sahasraśaḥ
उस स्थान में मैंने शान्त भाव से हज़ारों स्वयंप्रकाश, परम अद्भुत स्त्री-पुरुषों को देखा।
श्लोक 28 (13.41.28)
न तत्र द्योतते सूर्यो नक्षत्राणि तथैव च । न तत्र चन्द्रमा भाति न वायुर्वाति पांसुलः ॥
na tatra dyotate sūryo nakṣatrāṇi tathaiva ca | na tatra candramā bhāti na vāyurvāti pāṃsulaḥ
वहाँ सूर्य नहीं चमकता, न नक्षत्र; वहाँ चन्द्रमा नहीं दमकता और धूल भरी वायु नहीं बहती।
श्लोक 29 (13.41.29)
तत्र तूर्याण्यनेकानि गीतानि मधुराणि च । अदृश्यानि मनोज्ञानि श्रूयन्ते सर्वतोदिशम् ॥
tatra tūryāṇyanekāni gītāni madhurāṇi ca | adṛśyāni manojñāni śrūyante sarvatodiśam
वहाँ अनेक वाद्य और मधुर गीत, अदृश्य होते हुए भी मनोहर, सब दिशाओं से सुनाई देते हैं।
श्लोक 30 (13.41.30)
स्रवन्ति वैडूर्यलताः पद्मोत्पलझषाकुलाः । मुक्तासिकतवप्राश्च सरितो निर्मलोदकाः ॥
sravanti vaiḍūryalatāḥ padmotpalajhaṣākulāḥ | muktāsikatavaprāśca sarito nirmalodakāḥ
वहाँ वैदूर्य की लताओं वाली, कमलों, कुमुदों और मछलियों से भरी, मोतियों की रेत के तटों वाली निर्मल जल की नदियाँ बहती हैं।
श्लोक 31 (13.41.31)
अगतिस्तत्र देवानामसुराणां तथैव च । गन्धर्वनागयक्षाणां राक्षसानां तथैव च ॥
agatistatra devānāmasurāṇāṃ tathaiva ca | gandharvanāgayakṣāṇāṃ rākṣasānāṃ tathaiva ca
वहाँ देवताओं और असुरों की, तथा गन्धर्वों, नागों, यक्षों और राक्षसों की भी पहुँच नहीं है।
श्लोक 32 (13.41.32)
स्वयंप्रभास्तत्र नरा दृश्यन्तेऽद्भुतदर्शनाः । येषां न देवतास्तुल्याः प्रभाभिर्भावितात्मनाम् ॥
svayaṃprabhāstatra narā dṛśyante'dbhutadarśanāḥ | yeṣāṃ na devatāstulyāḥ prabhābhirbhāvitātmanām
वहाँ अद्भुत दर्शन वाले स्वयंप्रकाश मनुष्य दिखाई देते हैं, जिन शुद्धात्माओं की प्रभा के समान देवता भी नहीं हैं।
श्लोक 33 (13.41.33)
स च तानप्यतिक्रम्य दैवतैरपि पूजितः । विवेश ज्वलनं दीप्तमनिन्धनमनौपमम् ॥
sa ca tānapyatikramya daivatairapi pūjitaḥ | viveśa jvalanaṃ dīptamanindhanamanaupamam
देवताओं से भी पूजित वे उन्हें भी पार करके एक दीप्त, ईंधनरहित, अनुपम अग्नि में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 34 (13.41.34)
ज्वालाभिर्मां प्रविष्टं च ज्वलन्तं सर्वतोदिशम् । दैत्यदानवरक्षोभिर्दैवतैश्चापि दुस्सहम् ॥
jvālābhirmāṃ praviṣṭaṃ ca jvalantaṃ sarvatodiśam | daityadānavarakṣobhirdaivataiścāpi dussaham
मैं भी ज्वालाओं में प्रविष्ट हुआ, जो सब ओर जल रही थीं और दैत्यों, दानवों, राक्षसों और देवताओं के लिए भी असह्य थीं।
श्लोक 35 (13.41.35)
ज्वालामालिनमासाद्य तमग्निमहमव्ययम् । अविषह्यतमं मत्वा मनसेदमचिन्तयम् ॥
jvālāmālinamāsādya tamagnimahamavyayam | aviṣahyatamaṃ matvā manasedamacintayam
ज्वालाओं की माला वाली उस अव्यय अग्नि के पास पहुँचकर, उसे अत्यन्त असह्य मानकर, मैंने मन में यह विचार किया:
श्लोक 36 (13.41.36)
मया हि समरेष्वग्निरनेकेषु महाद्युतिः । प्रविष्टश्चापविद्धश्च न च मां दग्धवान्क्वचित् ॥
mayā hi samareṣvagniranekeṣu mahādyutiḥ | praviṣṭaścāpaviddhaśca na ca māṃ dagdhavānkvacit
"अनेक युद्धों में मैंने महातेजस्वी अग्नि में प्रवेश किया और उसे दूर फेंक दिया, फिर भी उसने कभी मुझे नहीं जलाया।
श्लोक 37 (13.41.37)
अयं च दुस्सहः शश्वत्तेजसाऽतिहुताशनः । अत्यादित्यप्रकाशार्चिरनलो दीप्यते महान् ॥
ayaṃ ca dussahaḥ śaśvattejasā'tihutāśanaḥ | atyādityaprakāśārciranalo dīpyate mahān
किन्तु यह अग्नि सदा असह्य है, अपने तेज से अग्नि को भी लाँघ जाती है; सूर्य से भी अधिक प्रकाश की लपटों वाली यह महान् अग्नि जल रही है।"
श्लोक 38 (13.41.38)
स तथा दह्यमानोऽपि तेजसा दीप्तवर्चसा । प्रपन्नः शरणं देवं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
sa tathā dahyamāno'pi tejasā dīptavarcasā | prapannaḥ śaraṇaṃ devaṃ śaṅkhacakragadādharam
उसके दीप्त तेज से इस प्रकार जलता हुआ भी मैंने शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले देव की शरण ली।
श्लोक 39 (13.41.39)
भक्तश्चानुगतश्चेति त्रातुमर्हसि मां विभो । यथा मां न दहेदग्निः सद्यो देव तथा कुरु ॥
bhaktaścānugataśceti trātumarhasi māṃ vibho | yathā māṃ na dahedagniḥ sadyo deva tathā kuru
"मैं आपका भक्त और अनुगामी हूँ, इसलिए हे विभो, आप मेरी रक्षा कीजिए। हे देव, ऐसा कीजिए कि यह अग्नि मुझे तुरन्त न जलाए।"
श्लोक 40 (13.41.40)
एवं विलपमानस्य ज्ञात्वा मे वचनं प्रभुः । मा भैरिति वचः प्राह मेघगम्भीरनिस्वनः ॥
evaṃ vilapamānasya jñātvā me vacanaṃ prabhuḥ | mā bhairiti vacaḥ prāha meghagambhīranisvanaḥ
मुझे इस प्रकार विलाप करते देख और मेरे वचन सुनकर प्रभु ने मेघ के समान गम्भीर स्वर में कहा, "मत डरो।"
श्लोक 41 (13.41.41)
स मामाश्वास्य वचनं प्राहेदं भगवान्विभुः । मम त्वं विदितः सौम्य यथावत्तत्वदर्शने ॥
sa māmāśvāsya vacanaṃ prāhedaṃ bhagavānvibhuḥ | mama tvaṃ viditaḥ saumya yathāvattatvadarśane
मुझे आश्वस्त करके सर्वव्यापी भगवान ने ये वचन कहे: "हे सौम्य, तुम्हारी तत्त्वदृष्टि को मैं यथावत् जानता हूँ।
नारायण उवाच
श्लोक 42 (13.41.42)
ज्ञापितश्चापि यत्पित्रा तच्चापि विदितं महत् । वैनतेय ममाप्येवमहं वेद्यः कथञ्चन ॥
jñāpitaścāpi yatpitrā taccāpi viditaṃ mahat | vainateya mamāpyevamahaṃ vedyaḥ kathañcana
तुम्हारे पिता ने जो तुम्हें बताया, वह महान् बात भी मुझे ज्ञात है। हे वैनतेय, इसी प्रकार मैं भी किसी भी प्रकार कठिनता से ही जाना जा सकता हूँ।
श्लोक 43 (13.41.43)
महदेतत्स्वरूपं मे न ते वेद्यं कथञ्चन । मां हि विन्दन्ति विद्वांसो ये ज्ञाने परिनिष्ठिताः । निर्ममा निरहङ्कारा निराशीर्बन्धनायुताः ॥
mahadetatsvarūpaṃ me na te vedyaṃ kathañcana | māṃ hi vindanti vidvāṃso ye jñāne pariniṣṭhitāḥ | nirmamā nirahaṅkārā nirāśīrbandhanāyutāḥ
मेरा यह महान् स्वरूप तुम किसी प्रकार नहीं जान सकते। मुझे वे विद्वान् प्राप्त करते हैं जो ज्ञान में पूर्ण रूप से स्थित हैं, जो ममता और अहंकार से रहित हैं और आशा के बन्धनों से मुक्त हैं।
श्लोक 44 (13.41.44)
भवांस्तु सततं भक्तो मन्मनाः पक्षिसत्तम । स्थूलंमां वेत्स्यसे तस्माज्जगतः कारणेस्थितम् ॥
bhavāṃstu satataṃ bhakto manmanāḥ pakṣisattama | sthūlaṃmāṃ vetsyase tasmājjagataḥ kāraṇesthitam
किन्तु हे पक्षिश्रेष्ठ, तुम सदा मेरे भक्त हो और मुझमें मन लगाए रहते हो; इसलिए तुम मुझे स्थूल रूप में जानोगे, जो जगत् के कारण के रूप में स्थित है।"