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अनुशासन पर्व · अध्याय 42

गरुड का प्रभु के पीछे अग्नियों के सरोवर तक जाना

गरुड एकत्र ऋषियों को सुनाते हैं कि भगवान् से अभय पाकर वे उनके पीछे-पीछे आकाश-मार्ग से एक ऐसे सरोवर पर पहुँचे जहाँ हजारों यज्ञ-अग्नियाँ जल रही थीं और अदृश्य वाणियाँ वेदों का पाठ कर रही थीं। देवता के ओझल हो जाने पर वे व्याकुल होकर उन्हें खोजते रहे, तभी हजारों गरुडों ने उन्हें घेर लिया; तब उन्होंने नारायण की नामावली से लम्बी स्तुति की। एक मंगलमयी वाणी ने उन्हें निर्भय किया, उन्होंने नर-नारायण के आश्रम में देवता के दर्शन किए और उनसे इस आश्चर्य का रहस्य बताने की प्रार्थना की।

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

सुपर्ण उवाच

श्लोक 1 (13.42.1)

एवं दत्ताभयस्तेन ततोऽहमृषिसत्तमाः । नष्टखेदश्रमभयः क्षणेन ह्यभवं तदा ॥

evaṃ dattābhayastena tato'hamṛṣisattamāḥ | naṣṭakhedaśramabhayaḥ kṣaṇena hyabhavaṃ tadā

हे ऋषिश्रेष्ठो, इस प्रकार उनसे अभय पाकर मैं उसी क्षण शोक, थकान और भय से मुक्त हो गया।

श्लोक 2 (13.42.2)

स शनैर्याति भगवान्गत्या लघुपराक्रमः । अहं तु सुमहावेगमास्थायानुव्रजामि तम् ॥

sa śanairyāti bhagavāngatyā laghuparākramaḥ | ahaṃ tu sumahāvegamāsthāyānuvrajāmi tam

वे भगवान् हल्की और सहज चाल से धीरे-धीरे चल रहे थे; और मैं बड़े वेग से उनके पीछे-पीछे चलता गया।

श्लोक 3 (13.42.3)

स गत्वा दीर्घमध्वानमाकाशममितद्युतिः । मनसाऽप्यगमं देवमाससादात्मतत्ववित् ॥

sa gatvā dīrghamadhvānamākāśamamitadyutiḥ | manasā'pyagamaṃ devamāsasādātmatatvavit

आत्मतत्त्व को जानने वाले, अपरिमित तेज वाले वे देवता आकाश में बहुत दूर तक गए; और मैं भी मन की गति से चलकर उन देवता के पास जा पहुँचा।

श्लोक 4 (13.42.4)

अथ देवः समासाद्य मनसः सदृशं जवम् । मोहयित्वा च मां तत्र क्षणेनान्तरधीयत ॥

atha devaḥ samāsādya manasaḥ sadṛśaṃ javam | mohayitvā ca māṃ tatra kṣaṇenāntaradhīyata

तब वे देवता मन के समान वेग पाकर मुझे वहीं मोह में डालकर क्षणभर में अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 5 (13.42.5)

तत्राम्बुधरधीरेण भोशब्देनानुनादिना । अयं भोऽहमिति प्राह वाक्यं वाक्यविशारदः ॥

tatrāmbudharadhīreṇa bhośabdenānunādinā | ayaṃ bho'hamiti prāha vākyaṃ vākyaviśāradaḥ

वहाँ मेघ के समान गम्भीर और गूँजती हुई वाणी में उन वाक्य-निपुण ने पुकारा, "अरे! मैं यहाँ हूँ।"

श्लोक 6 (13.42.6)

शब्दानुसारी तु ततस्तं देशमहमाव्रजम् । तत्रापश्यं ततश्चाहं श्रीमद्धंसयुतं सरः ॥

śabdānusārī tu tatastaṃ deśamahamāvrajam | tatrāpaśyaṃ tataścāhaṃ śrīmaddhaṃsayutaṃ saraḥ

उस ध्वनि के पीछे चलकर मैं उस स्थान पर पहुँचा और वहाँ हंसों से शोभित एक सुन्दर सरोवर देखा।

श्लोक 7 (13.42.7)

स तत्सरः समासाद्य भगवानात्मवित्तमः । भोशब्दप्रतिसृष्टेन स्वरेण प्रतिवादिना ॥

sa tatsaraḥ samāsādya bhagavānātmavittamaḥ | bhośabdapratisṛṣṭena svareṇa prativādinā

उस सरोवर पर पहुँचकर आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान् ने "अरे!" की पुकार का उत्तर प्रतिध्वनि करती हुई वाणी से दिया,

श्लोक 8 (13.42.8)

विवेश देवः स्वां योनिं मामिदं चाभ्यभाषत । विशस्व सलिलं सौम्य सुखमत्र वसामहे ॥

viveśa devaḥ svāṃ yoniṃ māmidaṃ cābhyabhāṣata | viśasva salilaṃ saumya sukhamatra vasāmahe

और वे देवता अपनी योनि जल में प्रविष्ट हो गए तथा मुझसे यह बोले, "हे सौम्य, जल में प्रवेश करो; यहाँ हम सुखपूर्वक रहेंगे।"

श्लोक 9 (13.42.9)

ततश्च प्राविशं तत्र सह तेन महात्मना । दृष्टवानद्भुततरं तस्मिन्सरसि भास्वताम् ॥

tataśca prāviśaṃ tatra saha tena mahātmanā | dṛṣṭavānadbhutataraṃ tasminsarasi bhāsvatām

तब मैं उन महात्मा के साथ उसमें प्रविष्ट हुआ और उस सरोवर में तेजस्वियों के बीच एक और भी अद्भुत दृश्य देखा:

श्लोक 10 (13.42.10)

अग्नीनामप्रणीतानामिद्धानामिन्धनैर्विना । दीप्तानामाज्यसिक्तानां स्थानेष्वर्चिष्मतां सदा ॥

agnīnāmapraṇītānāmiddhānāmindhanairvinā | dīptānāmājyasiktānāṃ sthāneṣvarciṣmatāṃ sadā

ऐसी अग्नियाँ, जिन्हें विधिपूर्वक प्रणीत नहीं किया गया था, फिर भी जो बिना ईंधन के प्रज्वलित थीं, घी से सिंची हुई-सी दहक रही थीं और अपने कुण्डों में सदा दीप्त रहती थीं।

श्लोक 11 (13.42.11)

दीप्तिस्तेषामनाज्यानां प्राप्ताज्यानामिवाभवत् । अनिद्धानामिव सतामिद्धानामिव भास्वताम् ॥

dīptisteṣāmanājyānāṃ prāptājyānāmivābhavat | aniddhānāmiva satāmiddhānāmiva bhāsvatām

घी न होने पर भी उनकी दीप्ति ऐसी थी मानो घी डाला गया हो; बिना जलाए भी वे जली हुई-सी लगती थीं और खूब चमक रही थीं।

श्लोक 12 (13.42.12)

अथाहं वरदं देवं नापश्यं तत्र सङ्गतम् । ततः सम्मोहमापन्नो विषादमगमं परम् ॥

athāhaṃ varadaṃ devaṃ nāpaśyaṃ tatra saṅgatam | tataḥ sammohamāpanno viṣādamagamaṃ param

पर वहाँ मुझे वरदाता देवता कहीं दिखाई नहीं दिए, और मैं मोह में पड़कर गहरे विषाद में डूब गया।

श्लोक 13 (13.42.13)

अपश्यं चाग्निहोत्राणि शतशोऽथ सहस्रशः । विधिना सम्प्रणीतानि धिष्ण्येष्वाज्यवतां तदा ॥

apaśyaṃ cāgnihotrāṇi śataśo'tha sahasraśaḥ | vidhinā sampraṇītāni dhiṣṇyeṣvājyavatāṃ tadā

मैंने वहाँ घी देने वालों के कुण्डों पर विधि से स्थापित सैकड़ों-हजारों अग्निहोत्र की अग्नियाँ देखीं।

श्लोक 14 (13.42.14)

असंमृष्टतलाश्चैव वेदीः कुसुमसंस्तृताः । कुशपद्मोत्पलासङ्गाः कलशांश्च हिरण्मयान् ॥

asaṃmṛṣṭatalāścaiva vedīḥ kusumasaṃstṛtāḥ | kuśapadmotpalāsaṅgāḥ kalaśāṃśca hiraṇmayān

मैंने ऐसी वेदियाँ देखीं जिनके तल को बुहारने की आवश्यकता नहीं थी, जो फूलों से बिछी थीं और कुश, कमल तथा नीलकमलों से सजी थीं, और सोने के कलश भी देखे।

श्लोक 15 (13.42.15)

अग्निहोत्राणि चित्राणि शतशोऽथ सहस्रशः । अग्निहोत्राय योग्यानि यानि द्रव्याणि कानिचित् । तानि चात्र समृद्धानि दृष्टवानस्म्यनेकशः ॥

agnihotrāṇi citrāṇi śataśo'tha sahasraśaḥ | agnihotrāya yogyāni yāni dravyāṇi kānicit | tāni cātra samṛddhāni dṛṣṭavānasmyanekaśaḥ

सैकड़ों-हजारों विचित्र अग्निहोत्र की अग्नियाँ, और अग्निहोत्र के योग्य जो भी सामग्री होती है, वह सब मैंने वहाँ भरपूर और अनेक बार देखी।

श्लोक 16 (13.42.16)

मनोहृद्यतमश्चाग्निः सुरभिः पुण्यलक्षणः । आज्यगन्धो मनोग्राही घ्राणचक्षुस्सुखावहः ॥

manohṛdyatamaścāgniḥ surabhiḥ puṇyalakṣaṇaḥ | ājyagandho manogrāhī ghrāṇacakṣussukhāvahaḥ

वहाँ की अग्नि हृदय को अत्यन्त प्रिय, सुगन्धित और पुण्य के लक्षणों से युक्त थी; उसमें घी की गन्ध थी, वह मन को बाँध लेती थी और नाक तथा आँखों को सुख देती थी।

श्लोक 17 (13.42.17)

तेषां तत्राग्निहोत्राणामीडितानां सहस्रशः । समीपे त्वद्भुततममपश्यमहमव्ययम् ॥

teṣāṃ tatrāgnihotrāṇāmīḍitānāṃ sahasraśaḥ | samīpe tvadbhutatamamapaśyamahamavyayam

स्तुति किए जाते हुए उन हजारों अग्निहोत्रों के समीप मैंने एक परम अद्भुत, अविनाशी वस्तु देखी।

श्लोक 18 (13.42.18)

चन्द्रांशुकाशशुभ्राणां तुषारोद्भेदवर्चसाम् । विमलादित्यभासानां स्थण्डिलानि सहस्रशः । दृष्टान्यग्निसमीपे तु द्युतिमन्ति महान्ति च ॥

candrāṃśukāśaśubhrāṇāṃ tuṣārodbhedavarcasām | vimalādityabhāsānāṃ sthaṇḍilāni sahasraśaḥ | dṛṣṭānyagnisamīpe tu dyutimanti mahānti ca

अग्नियों के समीप हजारों विशाल और तेजस्वी स्थण्डिल (यज्ञ-भूमियाँ) दिखाई दिए, जो चन्द्रकिरणों और काश के फूलों के समान श्वेत थे, पिघलते पाले की-सी आभा वाले थे और निर्मल सूर्य के समान चमकते थे।

श्लोक 19 (13.42.19)

एषु चाग्निसमीपेषु शुश्राव सुपदाक्षराः । प्रभावान्तरितानां तु प्रस्पष्टाक्षरभाषिणाम् । ऋग्यजुःसामगानां च मधुराः सुस्वरा गिरः ॥

eṣu cāgnisamīpeṣu śuśrāva supadākṣarāḥ | prabhāvāntaritānāṃ tu praspaṣṭākṣarabhāṣiṇām | ṛgyajuḥsāmagānāṃ ca madhurāḥ susvarā giraḥ

इन अग्नियों के पास मैंने ऋग्, यजुः और साम का गान करने वालों की मधुर और सुरीली वाणियाँ सुनीं, जो अपने तेज से ढके होने पर भी सुन्दर पदों और अत्यन्त स्पष्ट अक्षरों में बोल रहे थे।

श्लोक 20 (13.42.20)

सुसंमृष्टतलैस्तैस्तु बृहद्भिर्दीप्ततेजसैः । पावकैः पावितात्माहमभवं लघुविक्रमः ॥

susaṃmṛṣṭatalaistaistu bṛhadbhirdīptatejasaiḥ | pāvakaiḥ pāvitātmāhamabhavaṃ laghuvikramaḥ

निर्मल तल वाली, देदीप्यमान तेज से भरी उन विशाल अग्नियों से मेरा अन्तःकरण पवित्र हो गया और मैं हल्का तथा द्रुतगामी हो गया।

श्लोक 21 (13.42.21)

ततोऽहं तेषु धिष्ण्येषु ज्वलमानेषु यज्वनाम् । तं देशं प्रणमित्वाऽथ अन्वेष्टुमुपचक्रमे ॥

tato'haṃ teṣu dhiṣṇyeṣu jvalamāneṣu yajvanām | taṃ deśaṃ praṇamitvā'tha anveṣṭumupacakrame

तब यजमानों के उन जलते हुए कुण्डों के बीच उस स्थान को प्रणाम करके मैं उन्हें खोजने लगा।

श्लोक 22 (13.42.22)

तान्यनेकसहस्राणि पर्यटंस्तु महाजवात् । अपश्यमानस्तं देवं ततोऽहं व्यथितोऽभवम् ॥

tānyanekasahasrāṇi paryaṭaṃstu mahājavāt | apaśyamānastaṃ devaṃ tato'haṃ vyathito'bhavam

उन अनेक हजारों के बीच बड़े वेग से घूमते हुए भी जब मैं उन देवता को न देख सका, तो मैं व्यथित हो उठा।

श्लोक 23 (13.42.23)

ततस्तेष्वग्निहोत्रेषु ज्वलत्सु विमलार्चिषु । भानुमत्सु न पश्यामि देवदेवं सनातनम् ॥

tatasteṣvagnihotreṣu jvalatsu vimalārciṣu | bhānumatsu na paśyāmi devadevaṃ sanātanam

निर्मल ज्वालाओं वाले, सूर्य के समान दीप्त उन जलते हुए अग्निहोत्रों में मुझे सनातन देवाधिदेव दिखाई नहीं दिए।

श्लोक 24 (13.42.24)

ततोऽहं तानि दीप्तानि परीय व्यस्थितेन्द्रियः । नान्तं तेषां प्रपश्यामि खेदश्च सहसाभवत् ॥

tato'haṃ tāni dīptāni parīya vyasthitendriyaḥ | nāntaṃ teṣāṃ prapaśyāmi khedaśca sahasābhavat

तब व्याकुल इन्द्रियों के साथ उन दीप्त अग्नियों की परिक्रमा करते हुए भी मुझे उनका अन्त नहीं दिखा, और अचानक मुझे थकान हो आई।

श्लोक 25 (13.42.25)

विसृत्य सर्वतो दृष्टिं भयमोहसमन्वितः । श्रमं परममापन्नश्चिन्तयानस्त्वचेतनः ॥

visṛtya sarvato dṛṣṭiṃ bhayamohasamanvitaḥ | śramaṃ paramamāpannaścintayānastvacetanaḥ

चारों ओर दृष्टि दौड़ाते हुए, भय और मोह से घिरा, अत्यन्त थकान से चूर, मैं सोचता हुआ लगभग अचेत-सा खड़ा रहा।

श्लोक 26 (13.42.26)

तस्मिन्न खलु वर्तेऽहं लोके यत्रैतदीदृशम् । ऋग्यजुस्सामनिर्घोषः श्रूयते न च दृश्यते ॥

tasminna khalu varte'haṃ loke yatraitadīdṛśam | ṛgyajussāmanirghoṣaḥ śrūyate na ca dṛśyate

"निश्चय ही मैं उस लोक में नहीं हूँ जहाँ ऐसा होता है कि ऋग्, यजुः और साम की ध्वनि सुनाई दे और कुछ दिखाई न दे।

श्लोक 27 (13.42.27)

न च पश्यामि तं देवं येनाहमिह चोदितः । एवं चिन्तासमापन्नः प्रध्यातुमुपचक्रमे ॥

na ca paśyāmi taṃ devaṃ yenāhamiha coditaḥ | evaṃ cintāsamāpannaḥ pradhyātumupacakrame

और जिन देवता ने मुझे यहाँ भेजा, उन्हें भी मैं नहीं देख पा रहा।" इस प्रकार चिन्ता में डूबकर मैं ध्यान करने लगा।

श्लोक 28 (13.42.28)

ततश्चिन्तयतो मह्यं मोहेनाविष्टचेतसः । महाशब्दः प्रादुरासीत्सुभृशं मे व्यथाकरः ॥

tataścintayato mahyaṃ mohenāviṣṭacetasaḥ | mahāśabdaḥ prādurāsītsubhṛśaṃ me vyathākaraḥ

तब इस प्रकार सोचते हुए, मोह से ग्रस्त चित्त वाले मेरे सामने एक बहुत बड़ा शब्द उठा, जो मुझे अत्यन्त पीड़ा देने वाला था।

श्लोक 29 (13.42.29)

अथाहं सहसा तत्र शृणोमि विपुलध्वनिम् । अपश्यं च सुपर्णानां सहस्राण्ययुतानि च ॥

athāhaṃ sahasā tatra śṛṇomi vipuladhvanim | apaśyaṃ ca suparṇānāṃ sahasrāṇyayutāni ca

तभी अचानक मैंने वहाँ एक विशाल कोलाहल सुना और हजारों-दस-दस हजार सुपर्णों (गरुडों) को देखा।

श्लोक 30 (13.42.30)

अभ्यद्रवन्त मामेव विपुलद्युतिरंहसः । तेषामहं प्रभावेण सर्वथैवावरोऽभवम् ॥

abhyadravanta māmeva vipuladyutiraṃhasaḥ | teṣāmahaṃ prabhāveṇa sarvathaivāvaro'bhavam

अपार तेज और वेग वाले वे मुझ पर ही टूट पड़े; उनके प्रभाव से मैं सर्वथा हीन हो गया।

श्लोक 31 (13.42.31)

सोऽहं समन्ततः सर्वैः सुपर्णैरतितेजसैः । दृष्ट्वाऽऽत्मानं परिगतं सम्भ्रमं परमं गतः ॥

so'haṃ samantataḥ sarvaiḥ suparṇairatitejasaiḥ | dṛṣṭvā''tmānaṃ parigataṃ sambhramaṃ paramaṃ gataḥ

अत्यन्त तेजस्वी उन सब सुपर्णों से अपने को चारों ओर घिरा देखकर मैं अति घबरा गया।

श्लोक 32 (13.42.32)

विनयावनतो भूत्वा नमश्चक्रे महात्मने । अनादिनिधनायैभिर्नामभिः परमात्मने ॥

vinayāvanato bhūtvā namaścakre mahātmane | anādinidhanāyaibhirnāmabhiḥ paramātmane

विनय से झुककर मैंने आदि और अन्त से रहित उन महात्मा परमात्मा को इन नामों से नमस्कार किया:

श्लोक 33 (13.42.33)

नारायणाय शुद्धाय शाश्वताय ध्रुवाय च । भूतभव्यभवेशाय शिवाय शिवमूर्तये ॥

nārāyaṇāya śuddhāya śāśvatāya dhruvāya ca | bhūtabhavyabhaveśāya śivāya śivamūrtaye

शुद्ध, शाश्वत और अचल नारायण को नमस्कार; भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी को, कल्याणस्वरूप शिव को, शिवमूर्ति को;

श्लोक 34 (13.42.34)

शिवयोनेः शिवाद्याय शिवपूज्यतमाय च । घोररूपाय महते युगान्तकरणाय च ॥

śivayoneḥ śivādyāya śivapūjyatamāya ca | ghorarūpāya mahate yugāntakaraṇāya ca

कल्याणों की योनि को, कल्याणों में आदि को, कल्याणमय जनों के परम पूज्य को; घोर रूप वाले, महान्, युगान्त करने वाले को;

श्लोक 35 (13.42.35)

विश्वाय विश्वदेवाय विश्वेशाय महात्मने । सहस्रोदरपादाय सहस्रनयनाय च ॥

viśvāya viśvadevāya viśveśāya mahātmane | sahasrodarapādāya sahasranayanāya ca

विश्व को, विश्वदेव को, विश्वेश्वर को, महात्मा को; हजार उदर और चरणों वाले, हजार नेत्रों वाले को;

श्लोक 36 (13.42.36)

सहस्रबाहवे चैव सहस्रवदनाय च । शुचिश्रवाय महते ऋतुसंवत्सराय च ॥

sahasrabāhave caiva sahasravadanāya ca | śuciśravāya mahate ṛtusaṃvatsarāya ca

हजार भुजाओं और हजार मुखों वाले को; पवित्र कीर्ति वाले, महान्, ऋतुओं सहित संवत्सर-रूप को;

श्लोक 37 (13.42.37)

ऋग्यजुःसामवक्त्राय अथर्वशिरसे नमः । हृषीकेशाय कृष्णाय द्रुहिणोरुक्रमाय च ॥

ṛgyajuḥsāmavaktrāya atharvaśirase namaḥ | hṛṣīkeśāya kṛṣṇāya druhiṇorukramāya ca

ऋग्, यजुः और साम जिनके मुख हैं, उन अथर्वशिरा को नमस्कार; हृषीकेश को, कृष्ण को, द्रुहिण और उरुक्रम को;

श्लोक 38 (13.42.38)

बृहद्वेगाय तार्क्ष्याय वराहायैकशृङ्गिणे । शिपिविष्टाय सत्याय हरयेऽथ शिखण्डिने ॥

bṛhadvegāya tārkṣyāya varāhāyaikaśṛṅgiṇe | śipiviṣṭāya satyāya haraye'tha śikhaṇḍine

महावेग वाले को, तार्क्ष्य को, वराह को, एकशृंग को; शिपिविष्ट को, सत्य को, हरि को, शिखण्डी को;

श्लोक 39 (13.42.39)

हुताशायोर्ध्ववक्त्राय रौद्रानीकाय साधवे । सिन्धवे सिन्धुवर्षघ्ने देवानां सिन्धवे नमः ॥

hutāśāyordhvavaktrāya raudrānīkāya sādhave | sindhave sindhuvarṣaghne devānāṃ sindhave namaḥ

हुताश (हव्यभोजी) को, ऊर्ध्वमुख को, रौद्र सेना वाले को, साधु को; सिन्धु को, सिन्धु की वर्षा को नष्ट करने वाले को, देवताओं के सिन्धु को नमस्कार।

श्लोक 40 (13.42.40)

गरुत्मते त्रिनेत्राय सुधर्माय वृषाकृते । सम्म्राडुग्रे संकृतये विरजे सम्भवे भवे ॥

garutmate trinetrāya sudharmāya vṛṣākṛte | sammrāḍugre saṃkṛtaye viraje sambhave bhave

गरुत्मान् को, त्रिनेत्र को, सुधर्मा को, वृषाकृति को; सम्राट् को, उग्र को, संकृति को, विरज को, सम्भव को, भव को;

श्लोक 41 (13.42.41)

वृषाय वृषरूपाय विभवे भूर्भुवाय च । दीप्तसृष्टाय यज्ञाय स्थिराय स्थविराय च ॥

vṛṣāya vṛṣarūpāya vibhave bhūrbhuvāya ca | dīptasṛṣṭāya yajñāya sthirāya sthavirāya ca

वृष को, वृषरूप को, विभु को, भूः और भुवः-रूप को; दीप्त सृष्टि वाले को, यज्ञ को, स्थिर को, पुरातन को;

श्लोक 42 (13.42.42)

अच्युताय तुषाराय वीराय च समाय च । जिष्णवे पुरुहूताय वसिष्ठाय वराय च ॥

acyutāya tuṣārāya vīrāya ca samāya ca | jiṣṇave puruhūtāya vasiṣṭhāya varāya ca

अच्युत को, तुषार को, वीर को, सम को; जिष्णु को, पुरुहूत को, वसिष्ठ को, श्रेष्ठ को;

श्लोक 43 (13.42.43)

सत्येशाय सुरेशाय हरयेऽथ शिखण्डिने । बर्हिषाय वरेण्याय वसवे विश्ववेधसे ॥

satyeśāya sureśāya haraye'tha śikhaṇḍine | barhiṣāya vareṇyāya vasave viśvavedhase

सत्य के स्वामी को, देवताओं के स्वामी को, हरि को, शिखण्डी को; बर्हिष को, वरेण्य को, वसु को, विश्व के विधाता को;

श्लोक 44 (13.42.44)

किरीटिने सुकेशाय वासुदेवाय शुष्मिणे । बृहदुक्थ्यसुषेणाय युग्ये दुन्दुभये तथा ॥

kirīṭine sukeśāya vāsudevāya śuṣmiṇe | bṛhadukthyasuṣeṇāya yugye dundubhaye tathā

किरीटधारी को, सुन्दर केशों वाले को, वासुदेव को, बलवान् को; बृहदुक्थ्य को, सुषेण को, युग्य को तथा दुन्दुभि को;

श्लोक 45 (13.42.45)

भयेसखाय विभवे भरद्वाजेऽभयाय च । भास्कराय च चन्द्राय पद्मनाभाय भूरिणे ॥

bhayesakhāya vibhave bharadvāje'bhayāya ca | bhāskarāya ca candrāya padmanābhāya bhūriṇe

भय में मित्र रूप को, विभु को, भरद्वाज को, अभय को; भास्कर को, चन्द्र को, पद्मनाभ को, भूरि (बहुल) को;

श्लोक 46 (13.42.46)

पुनर्वसुभृतत्वाय जीवप्रभविषाय च । वषट्काराय स्वाहाय स्वधाय निधनाय च ॥

punarvasubhṛtatvāya jīvaprabhaviṣāya ca | vaṣaṭkārāya svāhāya svadhāya nidhanāya ca

पुनर्वसु को, भरण-पोषण करने वाले को, जीवन के उद्भव और सामर्थ्य को; वषट्कार को, स्वाहा को, स्वधा को, निधन (लय) को;

श्लोक 47 (13.42.47)

ऋचे च यजुषे साम्ने त्रैलोक्यपतये नमः । श्रीपद्मायात्मसदृशे धरणीधारिणे परे ॥

ṛce ca yajuṣe sāmne trailokyapataye namaḥ | śrīpadmāyātmasadṛśe dharaṇīdhāriṇe pare

ऋक् को, यजुः को, साम को, तीनों लोकों के स्वामी को नमस्कार; श्री और पद्म से युक्त, आत्मा के समान, पृथ्वी को धारण करने वाले परम को;

श्लोक 48 (13.42.48)

सौम्यासौम्यस्वरूपाय सौम्ये सुमनसे नमः । विश्वाय च सुविश्वाय विश्वरूपधराय च ॥

saumyāsaumyasvarūpāya saumye sumanase namaḥ | viśvāya ca suviśvāya viśvarūpadharāya ca

सौम्य और असौम्य दोनों रूप वाले को, सौम्य और सुमना को नमस्कार; विश्व को, सुविश्व को, विश्वरूप धारण करने वाले को;

श्लोक 49 (13.42.49)

केशवाय सुकेशाय रश्मिकेशाय भूरिणे । हिरण्यगर्भाय नमः सौम्याय वृषरूपिणे ॥

keśavāya sukeśāya raśmikeśāya bhūriṇe | hiraṇyagarbhāya namaḥ saumyāya vṛṣarūpiṇe

केशव को, सुकेश को, किरणरूपी केशों वाले को, भूरि को; हिरण्यगर्भ को नमस्कार; सौम्य, वृषरूपी को;

श्लोक 50 (13.42.50)

नारायणाग्र्यवपुषे पुरुहूताय वज्रिणे । वर्मिणे वृषसेनाय धर्मसेनाय रोधसे । मुनये ज्वरमुक्ताय ज्वराधिपतये नमः ॥

nārāyaṇāgryavapuṣe puruhūtāya vajriṇe | varmiṇe vṛṣasenāya dharmasenāya rodhase | munaye jvaramuktāya jvarādhipataye namaḥ

नारायण के श्रेष्ठ शरीर वाले को, पुरुहूत को, वज्रधारी को; कवचधारी को, वृषसेन को, धर्मसेन को, रोधस् (अवरोधक) को; ज्वर से मुक्त मुनि को, ज्वरों के अधिपति को नमस्कार।

श्लोक 51 (13.42.51)

अनेत्राय त्रिनेत्राय पिङ्गलाय विधर्मिणे । तपोब्रह्मनिधानाय युगपर्यायिणे नमः ॥

anetrāya trinetrāya piṅgalāya vidharmiṇe | tapobrahmanidhānāya yugaparyāyiṇe namaḥ

नेत्रहीन को, त्रिनेत्र को, पिंगल को, विधर्मी (विलक्षण धर्म वाले) को; तप और ब्रह्म के निधान को, युगों के साथ चक्र की भाँति घूमने वाले को नमस्कार;

श्लोक 52 (13.42.52)

शरणाय शरण्याय भक्तेष्टशरणाय च । नमः सर्वभवेशाय भूतभव्यभवाय च ॥

śaraṇāya śaraṇyāya bhakteṣṭaśaraṇāya ca | namaḥ sarvabhaveśāya bhūtabhavyabhavāya ca

शरण को, शरण देने योग्य को, भक्तों की इच्छाओं के आश्रय को; सब भवों के स्वामी को, भूत और भविष्य-रूप को नमस्कार।

श्लोक 53 (13.42.53)

पाहि मां देवदेवेश कोप्यजोसि सनातनः । एवं गतोस्मि शरणं शरण्यं ब्रह्मयोनिनम् ॥

pāhi māṃ devadeveśa kopyajosi sanātanaḥ | evaṃ gatosmi śaraṇaṃ śaraṇyaṃ brahmayoninam

"हे देवदेवेश, मेरी रक्षा कीजिए; आप अजन्मा और सनातन हैं, कोई अनिर्वचनीय सत्ता। इस प्रकार मैं शरण देने योग्य, ब्रह्मा के उद्गम-स्थल आपकी शरण में आया हूँ।"

श्लोक 54 (13.42.54)

स्तव्यं स्तवं स्तुतवतस्तत्तमो मे प्रणश्यतु । भयं च मे व्यपगतं पक्षिणोऽन्तर्हिताऽभवन् ॥

stavyaṃ stavaṃ stutavatastattamo me praṇaśyatu | bhayaṃ ca me vyapagataṃ pakṣiṇo'ntarhitā'bhavan

स्तुति के योग्य उन प्रभु की वह स्तुति गा लेने पर मेरा वह अन्धकार नष्ट हो गया; मेरा भय दूर हो गया और वे पक्षी अदृश्य हो गए।

श्लोक 55 (13.42.55)

शृणोमि च गिरं दिव्यामन्तर्धानगतां शिवाम् । मा भैर्गरुत्मन्दान्तोसि पुनः सेन्द्रान्दिवौकसः । स्वं चैव भवनं गत्वा द्रक्ष्यसे पुत्रबान्धवान् ॥

śṛṇomi ca giraṃ divyāmantardhānagatāṃ śivām | mā bhairgarutmandāntosi punaḥ sendrāndivaukasaḥ | svaṃ caiva bhavanaṃ gatvā drakṣyase putrabāndhavān

तब जहाँ वे अन्तर्धान हुए थे, वहाँ से मैंने एक दिव्य और मंगलमयी वाणी सुनी: "डरो मत, गरुत्मान्, तुम संयमी हो। इन्द्र सहित स्वर्गवासियों को तुम फिर देखोगे, और अपने भवन लौटकर पुत्रों तथा बन्धुओं को भी देखोगे।"

श्लोक 56 (13.42.56)

ततस्तस्मिन्क्षणेनैव सहसैव महाद्युतिः । प्रत्यदृश्यत तेजस्वी पुरस्तात्स ममान्तिके ॥

tatastasminkṣaṇenaiva sahasaiva mahādyutiḥ | pratyadṛśyata tejasvī purastātsa mamāntike

तभी उसी क्षण वे महातेजस्वी, तेजस्वी देव अचानक मेरे समीप सामने प्रकट हो गए।

श्लोक 57 (13.42.57)

समागम्य ततस्तेन शिवेन परमात्मना । अपश्यं चाहमायान्तं नरनारायणाश्रमे । चतुर्द्विगुणविन्यासं तं च देवं सनातनम् ॥

samāgamya tatastena śivena paramātmanā | apaśyaṃ cāhamāyāntaṃ naranārāyaṇāśrame | caturdviguṇavinyāsaṃ taṃ ca devaṃ sanātanam

उन कल्याणस्वरूप परमात्मा से मिलकर मैंने उन सनातन देव को नर-नारायण के आश्रम में आते देखा, जो चार और दुगुने (आठ) विन्यास वाले थे।

श्लोक 58 (13.42.58)

यजतस्तानृषीन्देवान्वदतो ध्यायतो मुनीन् । युक्तान्सिद्धान्नैष्ठिकांश्च जपतो यजतो गृहे ॥

yajatastānṛṣīndevānvadato dhyāyato munīn | yuktānsiddhānnaiṣṭhikāṃśca japato yajato gṛhe

मैंने उन ऋषियों को देखा जो देवताओं का यजन करते, पाठ करते और ध्यान लगाते थे; समाहित चित्त वाले मुनि, सिद्ध और आजीवन ब्रह्मचारी, जो अपने आश्रमों में जप और यज्ञ करते थे।

श्लोक 59 (13.42.59)

पुष्पपूरपरिक्षिप्तं धूपितं दीपितं हुतम् । वन्दितं सिक्तसम्मृष्टं नरनारायणाश्रमम् ॥

puṣpapūraparikṣiptaṃ dhūpitaṃ dīpitaṃ hutam | vanditaṃ siktasammṛṣṭaṃ naranārāyaṇāśramam

नर-नारायण का वह आश्रम फूलों के ढेरों से बिछा था, धूप से सुवासित था, दीपों से जगमगा रहा था, आहुतियों से पवित्र था, वन्दित था और जल से सींचा तथा झाड़ा-बुहारा गया था।

श्लोक 60 (13.42.60)

तदद्भुतमहं दृष्ट्वा विस्मितोस्मि तदाऽनघाः । जगाम शिरसा देवं प्रयतेनान्तरात्मना ॥

tadadbhutamahaṃ dṛṣṭvā vismitosmi tadā'naghāḥ | jagāma śirasā devaṃ prayatenāntarātmanā

हे निष्पापो, उस अद्भुत दृश्य को देखकर मैं विस्मित हो गया और संयत अन्तःकरण से मैंने देवता को सिर झुकाया।

श्लोक 61 (13.42.61)

तदत्यद्भुतसङ्कासं किमेतदिति चिन्तयन् । नाध्यगच्छं परं दिव्यं तस्य सर्वभवात्मनः ॥

tadatyadbhutasaṅkāsaṃ kimetaditi cintayan | nādhyagacchaṃ paraṃ divyaṃ tasya sarvabhavātmanaḥ

"यह इतना अद्भुत क्या है?" यह सोचते हुए मैं उन सर्वभूतात्मा की परम दिव्य प्रकृति को समझ न सका।

श्लोक 62 (13.42.62)

प्रणिपत्य सुदुर्धर्षं पुनः पुनरुदीक्ष्य च । शिरस्यञ्जलिमाधाय विस्मयोत्फुल्ललोचनः । अवोचं तमदीनार्थं श्रेष्ठानां श्रेष्ठमुत्तमम् ॥

praṇipatya sudurdharṣaṃ punaḥ punarudīkṣya ca | śirasyañjalimādhāya vismayotphullalocanaḥ | avocaṃ tamadīnārthaṃ śreṣṭhānāṃ śreṣṭhamuttamam

उन दुर्धर्ष को प्रणाम करके, बार-बार उनकी ओर देखते हुए, सिर पर हाथ जोड़े और विस्मय से फैली आँखों से मैंने उन अक्षीण प्रयोजन वाले, श्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ, परमोत्तम से कहा:

श्लोक 63 (13.42.63)

नमस्ते भगवन्देव भूतभव्यभवत्प्रभो । यदेतदद्भुतं देव मया दृष्टं त्वदाश्रयम् ॥

namaste bhagavandeva bhūtabhavyabhavatprabho | yadetadadbhutaṃ deva mayā dṛṣṭaṃ tvadāśrayam

"हे भगवन्, हे देव, भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी, आपको नमस्कार। हे देव, आपके आश्रय में जो यह अद्भुत मैंने देखा है,

श्लोक 64 (13.42.64)

अनादिमध्यपर्यन्तं किं तच्छंसितुमर्हसि । यदि जानासि मां भक्तं यदि वाऽनुग्रहो मयि । शंस सर्वमशेषेण श्रोतव्यं यदि चेन्मया ॥

anādimadhyaparyantaṃ kiṃ tacchaṃsitumarhasi | yadi jānāsi māṃ bhaktaṃ yadi vā'nugraho mayi | śaṃsa sarvamaśeṣeṇa śrotavyaṃ yadi cenmayā

जिसका न आदि है, न मध्य, न अन्त, वह क्या है? आप मुझे बताने की कृपा करें। यदि आप मुझे अपना भक्त जानते हैं, यदि मुझ पर आपका अनुग्रह है, तो यदि मेरे सुनने योग्य हो तो सब कुछ पूरा-पूरा बताइए।

श्लोक 65 (13.42.65)

स्वभावस्तव दुर्ज्ञेयः प्रादुर्भावो भवस्य च । भवद्भूतभविष्येश सर्वथा गहनं भवान् ॥

svabhāvastava durjñeyaḥ prādurbhāvo bhavasya ca | bhavadbhūtabhaviṣyeśa sarvathā gahanaṃ bhavān

आपका स्वभाव जान पाना कठिन है, और भव (सत्ता) का प्रादुर्भाव भी; हे भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी, आप सब प्रकार से अगम्य हैं।

श्लोक 66 (13.42.66)

ब्रूहि सर्वमशेषेण तदाश्चर्यं महामुने । किं तदत्यद्भुतं वृत्तं तेष्वग्निषु समन्ततः ॥

brūhi sarvamaśeṣeṇa tadāścaryaṃ mahāmune | kiṃ tadatyadbhutaṃ vṛttaṃ teṣvagniṣu samantataḥ

हे महामुने, उस आश्चर्य को पूरा-पूरा बताइए: उन अग्नियों के चारों ओर वह अत्यन्त अद्भुत घटना क्या थी?

श्लोक 67 (13.42.67)

कानि तान्यग्निहोत्राणि केषां शब्दः श्रुतो मया । शृण्वतां ब्रह्म सततमदृश्यानां महात्मनाम् ॥

kāni tānyagnihotrāṇi keṣāṃ śabdaḥ śruto mayā | śṛṇvatāṃ brahma satatamadṛśyānāṃ mahātmanām

वे अग्निहोत्र कौन-से थे, और किनकी वाणी मैंने सुनी, जो उन अदृश्य महात्माओं के मुख से निरन्तर वेद-पाठ कर रही थी?

श्लोक 68 (13.42.68)

एतन्मे भगवन्कृष्ण ब्रूहि सर्वमशेषतः । गृणन्त्यग्निसमीपेषु के च ते ब्रह्मराशयः ॥

etanme bhagavankṛṣṇa brūhi sarvamaśeṣataḥ | gṛṇantyagnisamīpeṣu ke ca te brahmarāśayaḥ

हे भगवन् कृष्ण, यह सब मुझे पूरा-पूरा बताइए: अग्नियों के समीप जो गान कर रहे हैं, वे ब्रह्म-तेज के पुंज कौन हैं?"

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