Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 43

भगवान् का गरुड को अपने चतुर्विध स्वरूप का उपदेश

भगवान् गरुड के प्रश्नों का उत्तर देते हैं: सरोवर में दीखने वाली अग्नियाँ और वेद-पाठ करती वाणियाँ उन संयमी उपासकों की हैं जिन्होंने अपना ज्ञान और यज्ञ उन्हीं को अर्पित किया है। वे बताते हैं कि उन्होंने लोकों के हित के लिए अपने को चार रूपों में बाँटा है (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, तथा ब्रह्मा, शिव, स्कन्द), कि गरुड ने जो स्थूल रूप देखा वह सूक्ष्म का द्वार मात्र है, और कि वे ज्ञान, अहिंसा तथा अनन्य भक्ति से प्राप्त होते हैं। गरुड को अपना भक्त बने रहने का आदेश देकर वे अन्तर्धान हो जाते हैं और गरुड ऋषियों के सामने अपना वृत्तान्त समाप्त करते हैं।

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44

भगवानुवाच

श्लोक 1 (13.43.1)

मां न देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः । विदुस्तत्वेन सत्वस्थं सूक्ष्मात्मानमवस्थितम् ॥

māṃ na devā na gandharvā nāsurā na ca rākṣasāḥ | vidustatvena satvasthaṃ sūkṣmātmānamavasthitam

न देवता, न गन्धर्व, न असुर और न राक्षस ही मुझे यथार्थ रूप में जानते हैं, जो मैं सत्त्व में स्थित, सूक्ष्म आत्मा वाला और सर्वत्र अवस्थित हूँ।

श्लोक 2 (13.43.2)

चतुर्धाऽहं विभक्तात्मा लोकानां हितकाम्यया । भूतभव्यभविष्यादिरनादिर्विश्वकृत्तमः ॥

caturdhā'haṃ vibhaktātmā lokānāṃ hitakāmyayā | bhūtabhavyabhaviṣyādiranādirviśvakṛttamaḥ

लोकों के हित की कामना से मैंने अपने को चार भागों में बाँटा है। मैं भूत, वर्तमान और भविष्य का आदि हूँ, स्वयं अनादि और विश्व का सर्वश्रेष्ठ रचयिता हूँ।

श्लोक 3 (13.43.3)

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च चेतश्च तमः सत्वं रजस्तथा ॥

pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam | mano buddhiśca cetaśca tamaḥ satvaṃ rajastathā

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवीं अग्नि; मन, बुद्धि और चित्त; तमस्, सत्त्व और रजस्;

श्लोक 4 (13.43.4)

प्रकृतिर्विकृतिश्चैव विद्याविद्ये शुभाशुभे । मत्त एतानि जायन्ते नाहमेभ्यः कथञ्चन ॥

prakṛtirvikṛtiścaiva vidyāvidye śubhāśubhe | matta etāni jāyante nāhamebhyaḥ kathañcana

प्रकृति और विकृति, विद्या और अविद्या, शुभ और अशुभ—ये सब मुझसे उत्पन्न होते हैं, पर मैं इनमें से किसी से किसी प्रकार उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 5 (13.43.5)

यत्किंचिच्छ्रेयसा युक्तं श्रेयस्करमनुत्तमम् । धर्मयुक्तं च पुण्यं च सोऽहमस्मि निरामयः ॥

yatkiṃcicchreyasā yuktaṃ śreyaskaramanuttamam | dharmayuktaṃ ca puṇyaṃ ca so'hamasmi nirāmayaḥ

जो कुछ कल्याण से युक्त है, जो कल्याणकारी और सर्वोत्तम है, जो धर्म और पुण्य से युक्त है, वह मैं ही हूँ, सब रोगों-दोषों से रहित।

श्लोक 6 (13.43.6)

यत्स्वभावात्मतत्वज्ञैः कारणैरुपलक्ष्यते । अनादिमध्यनिधनः सोन्तरात्माऽस्मि शाश्वतः ॥

yatsvabhāvātmatatvajñaiḥ kāraṇairupalakṣyate | anādimadhyanidhanaḥ sontarātmā'smi śāśvataḥ

स्वभाव और आत्मतत्त्व को जानने वाले जिसे कारणों के द्वारा पहचानते हैं, जो आदि, मध्य और अन्त से रहित अन्तरात्मा है, वह मैं सनातन हूँ।

श्लोक 7 (13.43.7)

यत्तु मे परमं गुह्यं रूपं सूक्ष्मार्थदर्शिभिः । गृह्यते सूक्ष्मभावज्ञैः सोऽविभाव्योस्मि शाश्वतः ॥

yattu me paramaṃ guhyaṃ rūpaṃ sūkṣmārthadarśibhiḥ | gṛhyate sūkṣmabhāvajñaiḥ so'vibhāvyosmi śāśvataḥ

और मेरा जो परम गुह्य रूप सूक्ष्म अर्थ देखने वाले, सूक्ष्म भावों के जानने वालों द्वारा ग्रहण किया जाता है, वह मैं अचिन्त्य और सनातन हूँ।

श्लोक 8 (13.43.8)

तत्तु मे परमं गुह्यं येन व्याप्तमिदं जगत् । सोहङ्गतः सर्वसत्वः सर्वस्य प्रभवोऽव्ययः ॥

tattu me paramaṃ guhyaṃ yena vyāptamidaṃ jagat | sohaṅgataḥ sarvasatvaḥ sarvasya prabhavo'vyayaḥ

वही मेरा परम गुह्य रूप है, जिससे यह जगत् व्याप्त है; मैं सब प्राणियों में प्रविष्ट हूँ, सबका उद्गम और अविनाशी हूँ।

श्लोक 9 (13.43.9)

मत्तो जायन्ति भूतानि मया धार्यन्त्यहर्निशम् । मय्येव विलयं यान्ति प्रलये पन्नगाशन ॥

matto jāyanti bhūtāni mayā dhāryantyaharniśam | mayyeva vilayaṃ yānti pralaye pannagāśana

मुझसे प्राणी उत्पन्न होते हैं, मेरे द्वारा रात-दिन धारण किए जाते हैं और प्रलय में मुझमें ही लीन हो जाते हैं, हे सर्पभक्षी।

श्लोक 10 (13.43.10)

यो मां यथा वेदयति तथा तस्यास्मि काश्यप । मनोबुद्धिगतः श्रेयो विदधामि विहङ्गम ॥

yo māṃ yathā vedayati tathā tasyāsmi kāśyapa | manobuddhigataḥ śreyo vidadhāmi vihaṅgama

जो मुझे जिस प्रकार जानता है, हे कश्यपपुत्र, मैं उसके लिए वैसा ही हूँ; उसके मन और बुद्धि में स्थित होकर, हे पक्षी, मैं उसका कल्याण विधान करता हूँ।

श्लोक 11 (13.43.11)

मां तु ज्ञातुं कृता बुद्धिर्भवता पक्षिसत्तम । शृणु योऽहं यतश्चाहं यदर्थश्चाहमुद्यतः ॥

māṃ tu jñātuṃ kṛtā buddhirbhavatā pakṣisattama | śṛṇu yo'haṃ yataścāhaṃ yadarthaścāhamudyataḥ

हे पक्षिश्रेष्ठ, तुमने मुझे जानने का निश्चय किया है। सुनो कि मैं कौन हूँ, कहाँ से हूँ और किस प्रयोजन से उद्यत हूँ।

श्लोक 12 (13.43.12)

ये केचिन्नियतात्मानस्त्रेताग्निपरमार्चिताः । अग्निकार्यपरा नित्यं जपहोमपरायणाः ॥

ye kecinniyatātmānastretāgniparamārcitāḥ | agnikāryaparā nityaṃ japahomaparāyaṇāḥ

जो भी संयतात्मा हैं, तीनों अग्नियों को परम मानकर पूजते हैं, नित्य अग्निकर्म में लगे रहते हैं और जप तथा होम में तत्पर हैं,

श्लोक 13 (13.43.13)

आत्मन्यग्नीन्समाधाय नियता नियतेन्द्रियाः । अनन्यमनसस्ते मां सर्वे वै समुपासते ॥

ātmanyagnīnsamādhāya niyatā niyatendriyāḥ | ananyamanasaste māṃ sarve vai samupāsate

जिन्होंने अग्नियों को अपने भीतर स्थापित कर लिया है, जो नियमित और जितेन्द्रिय हैं और जिनका मन अनन्य है—वे सब सचमुच मेरी उपासना करते हैं।

श्लोक 14 (13.43.14)

यजन्तो जपयज्ञैर्मां मानसैश्च सुसंयताः । अग्नीनभ्युद्ययुः शश्वदग्निष्वेवाभिसंश्रिताः ॥

yajanto japayajñairmāṃ mānasaiśca susaṃyatāḥ | agnīnabhyudyayuḥ śaśvadagniṣvevābhisaṃśritāḥ

जप-यज्ञों और मानसिक यज्ञों से मेरा यजन करते हुए, भली-भाँति संयत होकर, वे सदा अग्नियों की ओर उन्मुख हुए हैं और अग्नियों में ही आश्रित रहे हैं।

श्लोक 15 (13.43.15)

अनन्यकार्याः शुचयो नित्यमग्निपरायणाः । य एवंबुद्धयो धीरास्ते मां गच्छन्ति तादृशाः ॥

ananyakāryāḥ śucayo nityamagniparāyaṇāḥ | ya evaṃbuddhayo dhīrāste māṃ gacchanti tādṛśāḥ

जिनका कोई दूसरा कार्य नहीं, जो पवित्र हैं, सदा अग्नि में तत्पर रहते हैं—ऐसी बुद्धि वाले वे धीर पुरुष जैसे हैं वैसे ही मुझे प्राप्त होते हैं।

श्लोक 16 (13.43.16)

अकामहतसङ्कल्पा ज्ञाने नित्यं समाहिताः । आत्मन्यग्निं समाधाय निराहारा निराशिषः ॥

akāmahatasaṅkalpā jñāne nityaṃ samāhitāḥ | ātmanyagniṃ samādhāya nirāhārā nirāśiṣaḥ

जिनके संकल्प कामना से अभिहत नहीं होते, जो ज्ञान में सदा एकाग्र हैं, जिन्होंने अग्नि को आत्मा में स्थापित कर लिया है, जो निराहार और आशारहित हैं,

श्लोक 17 (13.43.17)

विषयेषु निरारम्भा विमुक्ता ज्ञानचक्षुषः । अनन्यमनसो धीराः स्वभावनियमान्विताः ॥

viṣayeṣu nirārambhā vimuktā jñānacakṣuṣaḥ | ananyamanaso dhīrāḥ svabhāvaniyamānvitāḥ

जो विषयों में कोई आरम्भ नहीं करते, विमुक्त हैं, जिनके नेत्र ज्ञान के हैं, जिनका मन अनन्य है, जो धीर हैं और अपने स्वभाव के नियमों से युक्त हैं—

श्लोक 18 (13.43.18)

यत्तद्वियति दृष्टं तत्सरः पद्मोत्पलायुतम् । तत्राग्नयः सन्निहिता दीप्यन्ते स्म निरिन्धनाः ॥

yattadviyati dṛṣṭaṃ tatsaraḥ padmotpalāyutam | tatrāgnayaḥ sannihitā dīpyante sma nirindhanāḥ

आकाश में जो कमलों और नील-कमलों से भरा सरोवर दिखाई दिया था, उसमें अग्नियाँ एक साथ स्थित हैं और बिना ईंधन के दीप्त होती हैं।

श्लोक 19 (13.43.19)

ज्ञानामलाशयास्तस्मिन्ये च चन्द्रांशुनिर्मलाः । उपासीना गृणन्तोऽग्निमस्पष्टाक्षरभाषिणः । आकाङ्क्षमाणाः शुचयस्तेष्वग्निषु विहङ्गम ॥

jñānāmalāśayāstasminye ca candrāṃśunirmalāḥ | upāsīnā gṛṇanto'gnimaspaṣṭākṣarabhāṣiṇaḥ | ākāṅkṣamāṇāḥ śucayasteṣvagniṣu vihaṅgama

उसमें ज्ञान से निर्मल अन्तःकरण वाले, चन्द्रकिरणों-से उज्ज्वल वे लोग हैं जो उपासना में बैठे, अस्पष्ट अक्षरों में अग्नि का गान करते हुए, हे पक्षी, उन अग्नियों के समीप पवित्र और अभिलाषी हैं।

श्लोक 20 (13.43.20)

ये मया भावितात्मानो मय्येवाभिरताः सदा । उपासते च मामेव ज्योतिर्भूता निरामयाः ॥

ye mayā bhāvitātmāno mayyevābhiratāḥ sadā | upāsate ca māmeva jyotirbhūtā nirāmayāḥ

जिनकी आत्मा को मैंने भावित किया है, जो सदा मुझमें ही रमे रहते हैं और केवल मेरी उपासना करते हैं, वे ज्योतिर्मय और निरामय हो गए हैं।

श्लोक 21 (13.43.21)

तैर्हि तत्रैव वस्तव्यं नीरागादिभिरच्युतैः । निराहारा ह्यनिष्पन्दाश्चन्द्रांशुसदृशप्रभाः ॥

tairhi tatraiva vastavyaṃ nīrāgādibhiracyutaiḥ | nirāhārā hyaniṣpandāścandrāṃśusadṛśaprabhāḥ

उन्हें वहीं निवास करना है—रागरहित, अच्युत, निराहार, निश्चल और चन्द्रकिरणों के समान प्रभा वाले,

श्लोक 22 (13.43.22)

निर्मला निरहङ्कारा निरालम्बा निराशिषः । मद्भक्ताः सततं तेवै भक्तांस्तानपि चाप्यहम् ॥

nirmalā nirahaṅkārā nirālambā nirāśiṣaḥ | madbhaktāḥ satataṃ tevai bhaktāṃstānapi cāpyaham

निर्मल, अहंकाररहित, निरालम्ब और आशारहित—वे सदा मेरे भक्त हैं, और उन भक्तों का मैं भी भक्त हूँ।

श्लोक 23 (13.43.23)

चतुर्धाऽहं विभक्तात्मा चरामि जगतो हितः । लोकानां धारणार्थाय विधानं विदधामि च ॥

caturdhā'haṃ vibhaktātmā carāmi jagato hitaḥ | lokānāṃ dhāraṇārthāya vidhānaṃ vidadhāmi ca

चार रूपों में विभक्त होकर मैं जगत् के हित के लिए विचरता हूँ और लोकों को धारण करने के लिए विधान रचता हूँ।

श्लोक 24 (13.43.24)

यथावत्तदशेषेण श्रोतुमर्हति मे भवान् ॥

yathāvattadaśeṣeṇa śrotumarhati me bhavān

यह सब आप मुझसे पूरा-पूरा और जैसा है वैसा सुनने योग्य हैं।

श्लोक 25 (13.43.25)

एका मूर्तिर्निर्गुणाख्या योगं परममास्थिता । द्वितीया सृजते तात भूतग्रामं चराचरम् ॥

ekā mūrtirnirguṇākhyā yogaṃ paramamāsthitā | dvitīyā sṛjate tāta bhūtagrāmaṃ carācaram

एक मूर्ति, जिसे निर्गुण कहा जाता है, परम योग में स्थित है; दूसरी, हे तात, चर-अचर प्राणिसमूह की सृष्टि करती है।

श्लोक 26 (13.43.26)

सृष्टं संहरते चैका जगत्स्थावरजङ्गमम् । ज्ञातात्मनिष्ठा क्षपयन्मोहयन्तीव मायया । क्षपयन्ती मोहयति आत्मनिष्ठा स्वमायया ॥

sṛṣṭaṃ saṃharate caikā jagatsthāvarajaṅgamam | jñātātmaniṣṭhā kṣapayanmohayantīva māyayā | kṣapayantī mohayati ātmaniṣṭhā svamāyayā

एक और रचे हुए स्थावर-जंगम जगत् का संहार करती है: आत्मा को जानकर आत्मनिष्ठ हुई वह नष्ट करती और मानो माया से मोहित भी करती है; नष्ट करती हुई वह आत्मनिष्ठ रहकर अपनी ही माया से मोहित करती है।

श्लोक 27 (13.43.27)

चतुर्थी मे महामूर्तिर्जगद्वृद्धिं ददाति सा । रक्षते चापि नियता सोहमस्मि नभश्चर ॥

caturthī me mahāmūrtirjagadvṛddhiṃ dadāti sā | rakṣate cāpi niyatā sohamasmi nabhaścara

मेरी चौथी महामूर्ति जगत् की वृद्धि करती है और स्थिर रहकर रक्षा भी करती है; मैं वही हूँ, हे नभश्चर।

श्लोक 28 (13.43.28)

मया सर्वमिदं व्याप्तं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । अहं सर्वजगद्बीजं सर्वत्रगतिरव्ययः ॥

mayā sarvamidaṃ vyāptaṃ mayi sarvaṃ pratiṣṭhitam | ahaṃ sarvajagadbījaṃ sarvatragatiravyayaḥ

यह सब मुझसे व्याप्त है और सब कुछ मुझमें प्रतिष्ठित है। मैं सारे जगत् का बीज, सर्वत्र गति और अविनाशी हूँ।

श्लोक 29 (13.43.29)

यानि तान्यग्निहोत्राणि ये च चन्द्रांशुराशयः । गृणन्ति वेदं सततं तेष्वग्निषु विहङ्गम ॥

yāni tānyagnihotrāṇi ye ca candrāṃśurāśayaḥ | gṛṇanti vedaṃ satataṃ teṣvagniṣu vihaṅgama

वे जो अग्निहोत्र की अग्नियाँ हैं और चन्द्रकिरणों जैसी आभा के वे पुंज जो उन अग्नियों में निरन्तर वेद का गान करते हैं, हे पक्षी,

श्लोक 30 (13.43.30)

क्रमेण मां समायान्ति सुखिनो ज्ञानसंयुताः । तेषामहं तपो दीप्तं तेजः सम्यक्समाहितम् । नित्यं ते मयि वर्तन्ते तेषु चाहमतन्द्रितः ॥

krameṇa māṃ samāyānti sukhino jñānasaṃyutāḥ | teṣāmahaṃ tapo dīptaṃ tejaḥ samyaksamāhitam | nityaṃ te mayi vartante teṣu cāhamatandritaḥ

वे समय आने पर सुखी और ज्ञान से युक्त होकर मुझे प्राप्त होते हैं। उनका प्रदीप्त तप और भली-भाँति एकत्र तेज मैं हूँ; वे सदा मुझमें रहते हैं और मैं निरालस्य होकर उनमें।

श्लोक 31 (13.43.31)

सर्वतो मुक्तसङ्गेन मय्यनन्यसमाधिना । शक्यः समासादयितुमहं वै ज्ञानचक्षुषा ॥

sarvato muktasaṅgena mayyananyasamādhinā | śakyaḥ samāsādayitumahaṃ vai jñānacakṣuṣā

जो सब ओर से आसक्ति छोड़ चुका है और अनन्य समाधि से मुझमें लगा है, वही ज्ञान-चक्षु से मुझे पा सकता है।

श्लोक 32 (13.43.32)

मां स्थूलदर्शनं विद्धि जगतः कार्यकारणम् । मत्तश्च सम्प्रसूतान्वै विद्धि लोकान्सदैवतान् ॥

māṃ sthūladarśanaṃ viddhi jagataḥ kāryakāraṇam | mattaśca samprasūtānvai viddhi lokānsadaivatān

मुझे स्थूल दर्शन जानो, जो जगत् का कार्य और कारण है; और जान लो कि देवताओं सहित सब लोक मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 33 (13.43.33)

मया चापि चतुर्धात्मा विभक्तः प्राणिषु स्थितः । आत्मभूतो वासुदेवो ह्यनिरुद्धो मतौ स्थितः ॥

mayā cāpi caturdhātmā vibhaktaḥ prāṇiṣu sthitaḥ | ātmabhūto vāsudevo hyaniruddho matau sthitaḥ

मेरे ही द्वारा चार भागों में बँटा हुआ आत्मा प्राणियों में स्थित है: आत्मरूप वासुदेव, बुद्धि में स्थित अनिरुद्ध,

श्लोक 34 (13.43.34)

सङ्कर्षणोऽहङ्कारे च प्रद्युम्नो मनसि स्थितः । अन्यथा च चतुर्धा यत्सम्यक्त्वं श्रोतुमर्हसि ॥

saṅkarṣaṇo'haṅkāre ca pradyumno manasi sthitaḥ | anyathā ca caturdhā yatsamyaktvaṃ śrotumarhasi

अहंकार में संकर्षण, मन में स्थित प्रद्युम्न। और एक दूसरा चतुर्विध विभाजन भी है, जिसे तुम्हें ठीक-ठीक सुनना चाहिए।

श्लोक 35 (13.43.35)

यत्तत्पद्ममभूत्पूर्वं तत्र ब्रह्मा व्यजायत । ब्रह्मणश्चापि सम्भूतः शिव इत्यवधार्यताम् ॥

yattatpadmamabhūtpūrvaṃ tatra brahmā vyajāyata | brahmaṇaścāpi sambhūtaḥ śiva ityavadhāryatām

जो कमल पहले उत्पन्न हुआ था, उसी में ब्रह्मा का जन्म हुआ। और ब्रह्मा से शिव भी उत्पन्न हुए—ऐसा समझ लो।

श्लोक 36 (13.43.36)

शिवात्स्कन्दः संबभूव एतत्सृष्टिचतुष्टयम् । दैत्यदानवदर्पघ्नमेवं मां विद्धि नित्यशः ॥

śivātskandaḥ saṃbabhūva etatsṛṣṭicatuṣṭayam | daityadānavadarpaghnamevaṃ māṃ viddhi nityaśaḥ

शिव से स्कन्द उत्पन्न हुए—यह चार प्रकार की सृष्टि है। इस प्रकार मुझे सदा दैत्यों और दानवों के दर्प का नाशक जानो।

श्लोक 37 (13.43.37)

दैत्यदानवरक्षोभिर्यदा धर्मः प्रपीड्यते । तदाऽहं धर्मवृद्ध्यर्थं मूर्तिमान्भविताऽऽशुग ॥

daityadānavarakṣobhiryadā dharmaḥ prapīḍyate | tadā'haṃ dharmavṛddhyarthaṃ mūrtimānbhavitā''śuga

जब दैत्य, दानव और राक्षस धर्म को पीड़ित करते हैं, तब धर्म की वृद्धि के लिए मैं शरीर धारण करता हूँ, हे शीघ्रगामी।

श्लोक 38 (13.43.38)

वेदव्रतपरा ये तु धीरा निश्चितबुद्धयः । योगिनो योगयुक्ताश्च ते मां पश्यन्ति नान्यथा ॥

vedavrataparā ye tu dhīrā niścitabuddhayaḥ | yogino yogayuktāśca te māṃ paśyanti nānyathā

जो वेद-व्रतों में तत्पर, निश्चित बुद्धि वाले धीर योगी और योग में लगे हैं, वे मुझे देखते हैं, अन्य प्रकार से नहीं।

श्लोक 39 (13.43.39)

पञ्चभिः सम्प्रयुक्तोऽहं विप्रयुक्तश्च पञ्चभिः । वर्तमानश्च तेष्वेवं निवृत्तश्चैव तेष्वहम् ॥

pañcabhiḥ samprayukto'haṃ viprayuktaśca pañcabhiḥ | vartamānaśca teṣvevaṃ nivṛttaścaiva teṣvaham

मैं पाँच से संयुक्त हूँ और पाँच से वियुक्त; इसी प्रकार मैं उनमें विद्यमान भी हूँ और उनसे निवृत्त भी।

श्लोक 40 (13.43.40)

ये विदुर्जातसङ्कल्पास्ते मां पश्यन्ति तादृशाः ॥

ye vidurjātasaṅkalpāste māṃ paśyanti tādṛśāḥ

जो दृढ़ संकल्प वाले होकर जानते हैं, वे मुझे वैसा ही देखते हैं जैसा मैं हूँ।

श्लोक 41 (13.43.41)

स्वं वायुरापो ज्योतिश्च पृथिवी चेति पञ्चमम् । तदात्मकोऽस्मि विज्ञेयो न चान्योस्मीति निश्चितम् ॥

svaṃ vāyurāpo jyotiśca pṛthivī ceti pañcamam | tadātmako'smi vijñeyo na cānyosmīti niścitam

आकाश, वायु, जल, अग्नि और पाँचवीं पृथ्वी—मैं उसी स्वरूप वाला जानने योग्य हूँ, और मैं इससे भिन्न नहीं हूँ, यह निश्चित है।

श्लोक 42 (13.43.42)

वर्तमानमतीतं च पञ्चवर्गेषु निश्चलम् । शब्दस्पर्शेषु रूपेषु रसगन्धेषु चाप्यहम् ॥

vartamānamatītaṃ ca pañcavargeṣu niścalam | śabdasparśeṣu rūpeṣu rasagandheṣu cāpyaham

वर्तमान और अतीत में मैं पाँचों वर्गों में निश्चल हूँ: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में भी।

श्लोक 43 (13.43.43)

रजस्तमोभ्यामाविष्टा येषां बुद्धिरनिश्चिता । ते न पश्यन्ति मे तत्वं तपसा महता ह्यपि ॥

rajastamobhyāmāviṣṭā yeṣāṃ buddhiraniścitā | te na paśyanti me tatvaṃ tapasā mahatā hyapi

रजस् और तमस् से घिरी जिनकी बुद्धि अस्थिर है, वे महान् तप से भी मेरे तत्त्व को नहीं देख पाते।

श्लोक 44 (13.43.44)

नोपवासैर्न नियमैर्न व्रतैर्विविधैरपि । द्रष्टुं वा वेदितुं वाऽपि न शक्या परमा गतिः ॥

nopavāsairna niyamairna vratairvividhairapi | draṣṭuṃ vā vedituṃ vā'pi na śakyā paramā gatiḥ

न उपवासों से, न नियमों से, न अनेक प्रकार के व्रतों से परम गति को देखा या जाना जा सकता है।

श्लोक 45 (13.43.45)

महामोहार्थपङ्के तु निमग्नानां गतिर्हरिः । एकान्तिनो ध्यानपरा यतिभावाद्व्रजन्ति माम् ॥

mahāmohārthapaṅke tu nimagnānāṃ gatirhariḥ | ekāntino dhyānaparā yatibhāvādvrajanti mām

महामोह के विषय-रूपी कीचड़ में डूबे हुओं की गति हरि हैं; एकान्त भक्त, ध्यान में तत्पर, संन्यासी भाव से मुझे प्राप्त होते हैं।

श्लोक 46 (13.43.46)

सत्वयुक्ता मतिर्येषां केवलाऽऽत्मविनिश्चिता । ते पश्यन्ति स्वमात्मानं परमात्मानमव्ययम् ॥

satvayuktā matiryeṣāṃ kevalā''tmaviniścitā | te paśyanti svamātmānaṃ paramātmānamavyayam

सत्त्व से युक्त जिनकी बुद्धि केवल आत्मा में निश्चित है, वे अपने ही अविनाशी परमात्मा को देखते हैं।

श्लोक 47 (13.43.47)

अहिंसा सर्वभूतेषु तेष्ववस्थितमार्जवम् । तेष्वेव च समाधाय सम्यगेति च मामजम् ॥

ahiṃsā sarvabhūteṣu teṣvavasthitamārjavam | teṣveva ca samādhāya samyageti ca māmajam

सब प्राणियों के प्रति अहिंसा और उनमें स्थित सरलता; इन्हीं में मन लगाकर मनुष्य सम्यक् रूप से मुझ अजन्मा को प्राप्त होता है।

श्लोक 48 (13.43.48)

यदेतत्परमं गुह्यमाख्यानं परमाद्भुतम् । यत्नेन तदशेषेण यथावच्छ्रोतुमर्हसि ॥

yadetatparamaṃ guhyamākhyānaṃ paramādbhutam | yatnena tadaśeṣeṇa yathāvacchrotumarhasi

यह परम गुह्य और अत्यन्त अद्भुत आख्यान है; इसे तुम्हें प्रयत्न से, पूरा और यथावत् सुनना चाहिए।

श्लोक 49 (13.43.49)

ये त्वग्निहोत्रनियता जपयज्ञपरायणाः । ते मामुपासते शश्वद्यांस्तांस्त्वं दृष्टवानसि ॥

ye tvagnihotraniyatā japayajñaparāyaṇāḥ | te māmupāsate śaśvadyāṃstāṃstvaṃ dṛṣṭavānasi

जो अग्निहोत्र में नियमित हैं और जप-यज्ञ में तत्पर हैं, वे सदा मेरी उपासना करते हैं—वे ही जिन्हें तुमने देखा।

श्लोक 50 (13.43.50)

शास्त्रदृष्टविधानज्ञा असक्ताः क्वचिदन्यथा । शक्योऽहं वेदितुं तैस्तु यन्मे परममव्ययम् ॥

śāstradṛṣṭavidhānajñā asaktāḥ kvacidanyathā | śakyo'haṃ vedituṃ taistu yanme paramamavyayam

जो शास्त्र-दृष्ट विधानों को जानते हैं और कहीं अन्यथा आसक्त नहीं हैं, वे मेरे उस परम अविनाशी रूप को जान सकते हैं।

श्लोक 51 (13.43.51)

ये तु सांख्यं च योगं च ज्ञात्वाऽप्यधृतनिश्चयाः । न ते गच्छन्ति कुशलाः परां गतिमनुत्तमाम् ॥

ye tu sāṃkhyaṃ ca yogaṃ ca jñātvā'pyadhṛtaniścayāḥ | na te gacchanti kuśalāḥ parāṃ gatimanuttamām

पर जो सांख्य और योग को जानकर भी दृढ़ निश्चय से रहित हैं, ऐसे चतुर लोग परम, अनुत्तम गति को नहीं पाते।

श्लोक 52 (13.43.52)

तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रसन्नात्माऽऽत्मविच्छुचिः । आसादयति तद्ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचति ॥

tasmājjñānena śuddhena prasannātmā''tmavicchuciḥ | āsādayati tadbrahma yatra gatvā na śocati

इसलिए शुद्ध ज्ञान से, प्रसन्न चित्त, आत्मज्ञ और पवित्र होकर मनुष्य उस ब्रह्म को पाता है जिसे पाकर वह शोक नहीं करता।

श्लोक 53 (13.43.53)

शुद्धाभिजनसम्पन्नाः श्रद्धायुक्तेन चेतसा । मद्भक्त्या च द्विजश्रेष्ठा गच्छन्ति परमां गतिं ॥

śuddhābhijanasampannāḥ śraddhāyuktena cetasā | madbhaktyā ca dvijaśreṣṭhā gacchanti paramāṃ gatiṃ

शुद्ध कुल में उत्पन्न, श्रद्धा से युक्त चित्त वाले और मेरी भक्ति करने वाले, हे द्विजश्रेष्ठ, परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 54 (13.43.54)

यद्गुह्यं परमं बुद्धेरलिङ्गग्रहणं च यत् । तत्सूक्ष्मं गृह्यते विप्रैर्यतिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥

yadguhyaṃ paramaṃ buddheraliṅgagrahaṇaṃ ca yat | tatsūkṣmaṃ gṛhyate viprairyatibhistattvadarśibhiḥ

जो बुद्धि का परम गुह्य है और जो चिह्नरहित का ग्रहण है, उस सूक्ष्म को तत्त्वदर्शी ब्राह्मण और यति ग्रहण करते हैं।

श्लोक 55 (13.43.55)

न वायुः पवते तत्र न तस्मिञ्ज्योतिषां गतिः । न चापः पृथिवी चैव नाकाशं न मनोगतिः ॥

na vāyuḥ pavate tatra na tasmiñjyotiṣāṃ gatiḥ | na cāpaḥ pṛthivī caiva nākāśaṃ na manogatiḥ

वहाँ वायु नहीं चलती, उसमें ज्योतिर्मण्डलों की गति नहीं है; न जल है, न पृथ्वी, न आकाश, न मन की गति।

श्लोक 56 (13.43.56)

तस्माच्चैतानि सर्वाणि प्रजायन्ते विहङ्गम । सर्वेभ्यश्च स तेभ्यश्च प्रभवत्यमलो विभुः ॥

tasmāccaitāni sarvāṇi prajāyante vihaṅgama | sarvebhyaśca sa tebhyaśca prabhavatyamalo vibhuḥ

फिर भी, हे पक्षी, उसी से ये सब उत्पन्न होते हैं; और वह निर्मल, सर्वव्यापी प्रभु इन सबका उद्गम है।

श्लोक 57 (13.43.57)

स्थूलदर्शनमेतन्मे यद्दृष्टं भवताऽनघ । एतत्सूक्ष्मस्य तद्द्वारं कार्याणां कारणं त्वहम् ॥

sthūladarśanametanme yaddṛṣṭaṃ bhavatā'nagha | etatsūkṣmasya taddvāraṃ kāryāṇāṃ kāraṇaṃ tvaham

मेरा यह स्थूल दर्शन, जो हे निष्पाप, तुमने देखा, सूक्ष्म का द्वार है; और कार्यों का कारण मैं हूँ।

श्लोक 58 (13.43.58)

दृष्टो वै भवता तस्मात्सरस्यमितविक्रम । ब्रह्मणो यदहोरात्रसङ्ख्याभिज्ञैर्विभाव्यते ॥

dṛṣṭo vai bhavatā tasmātsarasyamitavikrama | brahmaṇo yadahorātrasaṅkhyābhijñairvibhāvyate

इसीलिए, हे अपरिमित पराक्रम वाले, तुमने मुझे उस सरोवर में देखा, उस काल में जिसे ब्रह्मा के अहोरात्र की गणना जानने वाले आँकते हैं।

श्लोक 59 (13.43.59)

एष कालस्त्वया तत्र सरस्यहमुपागतः । मां यज्ञमाहुर्यज्ञज्ञा वेदं वेदविदो जनाः । मुनयश्चापि मामेव जपयज्ञं प्रचक्षते ॥

eṣa kālastvayā tatra sarasyahamupāgataḥ | māṃ yajñamāhuryajñajñā vedaṃ vedavido janāḥ | munayaścāpi māmeva japayajñaṃ pracakṣate

वही वह काल था जब तुम उस सरोवर में मेरे पास आए। यज्ञ को जानने वाले मुझे यज्ञ कहते हैं, वेद को जानने वाले मुझे वेद कहते हैं, और मुनि भी मुझे ही जप-यज्ञ कहते हैं।

श्लोक 60 (13.43.60)

वक्ता मन्ता रसयिता घ्राता द्रष्टा प्रदर्शकः । बोद्धा बोधयिता चाहं गन्ता श्रोता चिदात्मकः ॥

vaktā mantā rasayitā ghrātā draṣṭā pradarśakaḥ | boddhā bodhayitā cāhaṃ gantā śrotā cidātmakaḥ

मैं वक्ता, मनन करने वाला, रस लेने वाला, सूँघने वाला, द्रष्टा, दिखाने वाला, जानने वाला और जनाने वाला, चलने वाला और सुनने वाला हूँ—चैतन्य-स्वरूप।

श्लोक 61 (13.43.61)

मामिष्ट्वा स्वर्गमायान्ति तथा चाप्नुवते महत् । ज्ञात्वा मामेव चैवान्ते निःसङ्गेनान्तरात्मना ॥

māmiṣṭvā svargamāyānti tathā cāpnuvate mahat | jñātvā māmeva caivānte niḥsaṅgenāntarātmanā

मेरा यजन करके वे स्वर्ग जाते हैं और महान् फल पाते हैं; और अन्त में अनासक्त अन्तरात्मा से मुझे ही जानकर वे मुझे प्राप्त होते हैं।

श्लोक 62 (13.43.62)

अहं तेजो द्विजातीनां मम तेजो द्विजातयः । मम यस्तेजसो देहः सोग्निरित्यवगम्यताम् ॥

ahaṃ tejo dvijātīnāṃ mama tejo dvijātayaḥ | mama yastejaso dehaḥ sognirityavagamyatām

मैं द्विजों का तेज हूँ और द्विज मेरा तेज हैं; मेरे तेज से बना जो शरीर है, उसे अग्नि समझो।

श्लोक 63 (13.43.63)

प्राणपालः शरीरेऽहं योगिनामहमीश्वरः । सांख्यानामिदमेवाग्रे मयि सर्वमिदं जगत् ॥

prāṇapālaḥ śarīre'haṃ yogināmahamīśvaraḥ | sāṃkhyānāmidamevāgre mayi sarvamidaṃ jagat

मैं शरीर में प्राणों का पालक हूँ, योगियों का ईश्वर हूँ; सांख्यों का यही आदि तत्त्व है: मुझमें यह सारा जगत् है।

श्लोक 64 (13.43.64)

धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चैवार्जवं जपम् । तमः सत्वं रजश्चैव कर्मजं च भवाप्ययम् ॥

dharmamarthaṃ ca kāmaṃ ca mokṣaṃ caivārjavaṃ japam | tamaḥ satvaṃ rajaścaiva karmajaṃ ca bhavāpyayam

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, सरलता और जप; तमस्, सत्त्व और रजस्; कर्म से उत्पन्न होने वाला, तथा उत्पत्ति और लय।

श्लोक 65 (13.43.65)

स तदाऽहं तथारूपस्त्वया दृष्टः सनातनः । ततस्त्वहं परतरः शक्यः कालेन वेदितुम् ॥

sa tadā'haṃ tathārūpastvayā dṛṣṭaḥ sanātanaḥ | tatastvahaṃ parataraḥ śakyaḥ kālena veditum

उस समय तुमने मुझे उसी रूप में सनातन देखा। किन्तु उससे भी परे मैं उच्चतर हूँ, जिसे समय आने पर ही जाना जा सकता है।

श्लोक 66 (13.43.66)

मम यत्परमं गुह्यं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् । तदेवं परमो गुह्यो देवो नारायणो हरिः । न तच्छक्यं भुजङ्गारे वेत्तुमभ्युदयान्वितैः ॥

mama yatparamaṃ guhyaṃ śāśvataṃ dhruvamavyayam | tadevaṃ paramo guhyo devo nārāyaṇo hariḥ | na tacchakyaṃ bhujaṅgāre vettumabhyudayānvitaiḥ

मेरा जो परम गुह्य, शाश्वत, ध्रुव और अविनाशी रूप है, वही परम गुह्य देव नारायण हरि है। हे सर्पारि, सांसारिक उन्नति में लगे लोग उसे नहीं जान सकते।

श्लोक 67 (13.43.67)

निरारम्भनमस्कारा निराशीर्बन्धनास्तथा । गच्छन्ति तं महात्मानः परं ब्रह्म सनातनम् ॥

nirārambhanamaskārā nirāśīrbandhanāstathā | gacchanti taṃ mahātmānaḥ paraṃ brahma sanātanam

सांसारिक आरम्भों और नमस्कारों से रहित तथा आशा के बन्धनों से मुक्त वे महात्मा उस परम सनातन ब्रह्म के पास जाते हैं।

श्लोक 68 (13.43.68)

स्थूलोऽहमेवं विहग त्वया दृष्टस्तथाऽनघ । एतच्चापि न वेत्त्यन्यस्त्वामृते पन्नगाशन ॥

sthūlo'hamevaṃ vihaga tvayā dṛṣṭastathā'nagha | etaccāpi na vettyanyastvāmṛte pannagāśana

इस प्रकार, हे पक्षी, हे निष्पाप, तुमने मुझे स्थूल रूप में देखा है; और हे पन्नगभक्षी, तुम्हारे सिवा यह भी कोई और नहीं जानता।

श्लोक 69 (13.43.69)

मा मतिस्तव गान्नाशमेषा गतिरनुत्तमा । मद्भक्तो भव नित्यं त्वं ततो वेत्स्यसि मे पदम् ॥

mā matistava gānnāśameṣā gatiranuttamā | madbhakto bhava nityaṃ tvaṃ tato vetsyasi me padam

तुम्हारी बुद्धि नष्ट न हो; यही सर्वोत्तम गति है। तुम सदा मेरे भक्त रहो; तब मेरे पद को जान जाओगे।

श्लोक 70 (13.43.70)

एतत्ते सर्वमाख्यातं रहस्यं दिव्यमानुषम् । एतच्छ्रेयः परं चैतत्पन्थानं विद्धि मोक्षिणाम् ॥

etatte sarvamākhyātaṃ rahasyaṃ divyamānuṣam | etacchreyaḥ paraṃ caitatpanthānaṃ viddhi mokṣiṇām

यह सब तुम्हें बता दिया गया—यह दिव्य और मानुष रहस्य है; जानो कि यही परम कल्याण है और यही मोक्ष चाहने वालों का मार्ग है।

सुपर्ण उवाच

श्लोक 71 (13.43.71)

एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत । पश्यतो मे महायोगी जगामात्मगतिर्गतिम् ॥

evamuktvā sa bhagavāṃstatraivāntaradhīyata | paśyato me mahāyogī jagāmātmagatirgatim

यह कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गए; मेरे देखते-देखते वे महायोगी अपनी ही आत्मा की गति को चले गए।

श्लोक 72 (13.43.72)

एतदेवंविधं तस्य महिमानं महात्मनः । अच्युतस्याप्रमेयस्य दृष्टवानस्मि यत्पुरा ॥

etadevaṃvidhaṃ tasya mahimānaṃ mahātmanaḥ | acyutasyāprameyasya dṛṣṭavānasmi yatpurā

उन महात्मा, अच्युत और अप्रमेय की ऐसी ही महिमा मैंने बहुत पहले देखी थी।

श्लोक 73 (13.43.73)

एतद्वः सर्वमाख्यातं चेष्टितं तस्य धीमतः । मयाऽनुभूतं प्रत्यक्षं दृष्ट्वा चाद्भुतकर्मणः ॥

etadvaḥ sarvamākhyātaṃ ceṣṭitaṃ tasya dhīmataḥ | mayā'nubhūtaṃ pratyakṣaṃ dṛṣṭvā cādbhutakarmaṇaḥ

उन बुद्धिमान् प्रभु की यह सब लीला तुम्हें सुना दी गई, जिसे मैंने स्वयं अनुभव किया और उन अद्भुतकर्मा को प्रत्यक्ष देखा।

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44