अनुशासन पर्व · अध्याय 45
उपमन्यु और महादेव की कृपा का कृष्ण द्वारा वर्णन
युधिष्ठिर भीष्म से महादेव के नाम और महिमा पूछते हैं, और भीष्म उन्हें सबसे अच्छी तरह जानने वाले कृष्ण से कहने को कहते हैं। कृष्ण बताते हैं कि जब जाम्बवती ने पुत्र माँगा, तब वे हिमालय पर उपमन्यु के आश्रम गए। उपमन्यु ने उन्हें अनेक भक्तों पर शिव की कृपा सुनाई और फिर अपने बचपन की कथा कही: दूध की उनकी चाह, माता का शिव की शरण लेने का उपदेश, उनकी तपस्या, और इन्द्र का रूप धरकर शिव द्वारा उनकी परीक्षा। उपमन्यु नामों की लड़ी से शिव की स्तुति करते हैं, और शिव प्रकट होकर उन्हें वर देते हैं। फिर कृष्ण स्वयं तप करते हैं, उमा सहित शिव के दर्शन पाते हैं, उनकी स्तुति करते हैं, और उन्हें आठ वर देने को कहा जाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.45.1)
पितामह महेशाय नामान्याचक्ष्व शम्भवे । विदुषे विश्वमायाय महाभाग्यं च तत्वतः ॥
pitāmaha maheśāya nāmānyācakṣva śambhave | viduṣe viśvamāyāya mahābhāgyaṃ ca tatvataḥ
पितामह, सर्वज्ञ और विश्व की माया के स्वामी महेश शम्भु के नाम बताइए, और उनकी महिमा भी यथार्थ रूप से कहिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.45.2)
सुरासुरगुरो देव विष्णो त्वं वक्तुमर्हसि । शिवाय शिवरूपाय यन्माऽपृच्छद्युधिष्ठिरः ॥
surāsuraguro deva viṣṇo tvaṃ vaktumarhasi | śivāya śivarūpāya yanmā'pṛcchadyudhiṣṭhiraḥ
हे देव विष्णु, आप सुर और असुर दोनों के गुरु हैं; शुभरूप शिव के विषय में जो कुछ युधिष्ठिर ने मुझसे पूछा है, उसे कहने के योग्य आप ही हैं।
श्लोक 3 (13.45.3)
नाम्नां सहस्रं देवस्य तण्डिना ब्रह्मवादिना । निवेदितं ब्रह्मलोके ब्रह्मणो यत्पुराऽभवत् ॥
nāmnāṃ sahasraṃ devasya taṇḍinā brahmavādinā | niveditaṃ brahmaloke brahmaṇo yatpurā'bhavat
ब्रह्मवेत्ता तण्डी ने ब्रह्मलोक में उस देवता के हजार नाम प्रकट किए थे, जैसे वे पूर्वकाल में ब्रह्मा के पास थे।
श्लोक 4 (13.45.4)
द्वैपायनप्रभृतयस्तथा चेमे तपोधनाः । ऋषयः सुव्रता दान्ताः शृण्वन्तु गदतस्तव ॥
dvaipāyanaprabhṛtayastathā ceme tapodhanāḥ | ṛṣayaḥ suvratā dāntāḥ śṛṇvantu gadatastava
द्वैपायन आदि तथा ये तप ही जिनका धन है, दृढ़ व्रत वाले और संयमी ऋषि भी आपके कहते समय सुनें।
श्लोक 5 (13.45.5)
ध्रुवाय नन्दिने होत्रे गोप्त्रे विश्वसृजेऽग्नये । महाभाग्यं विभोर्ब्रूहि मुण्डिनेऽथ कपर्दिने ॥
dhruvāya nandine hotre goptre viśvasṛje'gnaye | mahābhāgyaṃ vibhorbrūhi muṇḍine'tha kapardine
ध्रुव, नन्दी, होता, रक्षक, विश्व के रचयिता, अग्नि, मुण्डी और कपर्दी, इन रूपों वाले सर्वव्यापी प्रभु की महिमा कहिए।
वासुदेव उवाच
श्लोक 6 (13.45.6)
न गतिः कर्मणां शक्या वेत्तुमीशस्य तत्त्वतः । हिरण्यगर्भप्रमुखा देवाः सेन्द्रा महर्षयः ॥
na gatiḥ karmaṇāṃ śakyā vettumīśasya tattvataḥ | hiraṇyagarbhapramukhā devāḥ sendrā maharṣayaḥ
ईश्वर के कर्मों की गति को यथार्थ रूप से जानना सम्भव नहीं है। इन्द्र सहित हिरण्यगर्भ आदि प्रमुख देवता और महर्षि भी
श्लोक 7 (13.45.7)
न विदुर्यस्य निधनमादिं वा सूक्ष्मदर्शिनः । स कथं नाममात्रेण शक्यो ज्ञातुं सतां गतिः ॥
na viduryasya nidhanamādiṃ vā sūkṣmadarśinaḥ | sa kathaṃ nāmamātreṇa śakyo jñātuṃ satāṃ gatiḥ
जिसका अन्त या आदि नहीं जानते, यद्यपि वे सूक्ष्मदर्शी हैं। फिर सज्जनों की परम गति उस प्रभु को केवल नामों के द्वारा कैसे जाना जा सकता है?
श्लोक 8 (13.45.8)
तस्याहमसुरघ्नस्य कांश्चिद्भगवतो गुणान् । भवतां कीर्तयिष्यामि व्रतेशाय यथातथम् ॥
tasyāhamasuraghnasya kāṃścidbhagavato guṇān | bhavatāṃ kīrtayiṣyāmi vrateśāya yathātatham
असुरों का संहार करने वाले, व्रतों के स्वामी उन भगवान् के कुछ गुण मैं आप लोगों को ज्यों-के-त्यों सुनाऊँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (13.45.9)
एवमुक्त्वा तु भगवान्गुणांस्तस्य महात्मनः । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा कथयामास धीमतः ॥
evamuktvā tu bhagavānguṇāṃstasya mahātmanaḥ | upaspṛśya śucirbhūtvā kathayāmāsa dhīmataḥ
ऐसा कहकर भगवान् ने आचमन किया और पवित्र होकर उन बुद्धिमान् महात्मा के गुणों का वर्णन आरम्भ किया।
वासुदेव उवाच
श्लोक 10 (13.45.10)
शुश्रूषध्वं ब्राह्मणेन्द्रास्त्वं च तात युधिष्ठिर । त्वं चापगेय नामानि निशामय जगत्पतेः ॥
śuśrūṣadhvaṃ brāhmaṇendrāstvaṃ ca tāta yudhiṣṭhira | tvaṃ cāpageya nāmāni niśāmaya jagatpateḥ
हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, सुनिए; प्रिय युधिष्ठिर, तुम भी सुनो; और हे गंगापुत्र, तुम भी जगत्पति के नाम सुनो।
श्लोक 11 (13.45.11)
यदवाप्तं च मे पूर्वं साम्बहेतोः सुदुष्करम् । यथावद्भगवान्दृष्टो मया पूर्वं समाधिना ॥
yadavāptaṃ ca me pūrvaṃ sāmbahetoḥ suduṣkaram | yathāvadbhagavāndṛṣṭo mayā pūrvaṃ samādhinā
साम्ब के लिए मैंने पूर्वकाल में अत्यन्त कठिन साधना से जो प्राप्त किया, और जिस प्रकार समाधि में मैंने भगवान् के दर्शन किए, वह सुनिए।
श्लोक 12 (13.45.12)
शम्बरे निहते पूर्वं रौक्मिणेयेन धीमता । अतीते द्वादशे वर्षे जाम्बवत्यब्रवीद्धि माम् ॥
śambare nihate pūrvaṃ raukmiṇeyena dhīmatā | atīte dvādaśe varṣe jāmbavatyabravīddhi mām
बुद्धिमान् रुक्मिणीपुत्र प्रद्युम्न के हाथों शम्बर के मारे जाने के बाद जब बारहवाँ वर्ष बीत गया, तब जाम्बवती ने मुझसे कहा।
श्लोक 13 (13.45.13)
प्रद्युम्नचारुदेष्णादीन्रुक्मिण्या वीक्ष्य पुत्रकान् । पुत्रार्थिनी मामुपेत्य वाक्यमाह युधिष्ठिर ॥
pradyumnacārudeṣṇādīnrukmiṇyā vīkṣya putrakān | putrārthinī māmupetya vākyamāha yudhiṣṭhira
रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न, चारुदेष्ण आदि को देखकर पुत्र की इच्छा से वह मेरे पास आई और हे युधिष्ठिर, यह बात बोली।
जाम्बवत्युवाच
श्लोक 14 (13.45.14)
शूरं बलवतां श्रेष्ठं कान्तरूपमकल्मषम् । आत्मतुल्यं मम सुतं प्रयच्छाच्युत माचिरम् ॥
śūraṃ balavatāṃ śreṣṭhaṃ kāntarūpamakalmaṣam | ātmatulyaṃ mama sutaṃ prayacchācyuta māciram
हे अच्युत, मुझे शीघ्र ही अपने समान पुत्र दीजिए, जो शूर, बलवानों में श्रेष्ठ, सुन्दर रूप वाला और निष्कलंक हो।
श्लोक 15 (13.45.15)
न हि तेऽप्राप्यमस्तीह त्रिषु लोकेषु किञ्चन । लोकान्सृजेस्त्वमपरानिच्छन्यदुकुलोद्वह ॥
na hi te'prāpyamastīha triṣu lokeṣu kiñcana | lokānsṛjestvamaparānicchanyadukulodvaha
तीनों लोकों में आपके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है; हे यदुकुल के उद्धारक, यदि आप चाहें तो दूसरे लोकों की भी सृष्टि कर सकते हैं।
श्लोक 16 (13.45.16)
त्वया द्वादशवर्षाणि व्रतीभूतेन शुष्यता । आराध्य पशुभर्तारं रुक्मिण्यां जनिताः सुताः ॥
tvayā dvādaśavarṣāṇi vratībhūtena śuṣyatā | ārādhya paśubhartāraṃ rukmiṇyāṃ janitāḥ sutāḥ
आपने बारह वर्ष तक व्रत धारण करके सूखते हुए पशुपति की आराधना की, और तब रुक्मिणी से आपके पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 17 (13.45.17)
चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेशो यशोधरः । चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः सम्भुरेव च ॥
cārudeṣṇaḥ sucāruśca cāruveśo yaśodharaḥ | cāruśravāścāruyaśāḥ pradyumnaḥ sambhureva ca
चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेश, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयशा, प्रद्युम्न और शम्भु।
श्लोक 18 (13.45.18)
यथा ते जनिताः पुत्रा रुक्मिण्यां चारुविक्रमाः । तथा ममापि तनयं प्रयच्छ मधुसूदन ॥
yathā te janitāḥ putrā rukmiṇyāṃ cāruvikramāḥ | tathā mamāpi tanayaṃ prayaccha madhusūdana
जैसे रुक्मिणी से आपके सुन्दर पराक्रम वाले पुत्र उत्पन्न हुए, वैसे ही हे मधुसूदन, मुझे भी पुत्र दीजिए।
वासुदेव उवाच
श्लोक 19 (13.45.19)
इत्येवं चोदितो देव्या तामवोचं सुमध्यमाम् । अनुजानीहि मां राज्ञि करिष्ये वचनं तव ॥
ityevaṃ codito devyā tāmavocaṃ sumadhyamām | anujānīhi māṃ rājñi kariṣye vacanaṃ tava
रानी के इस प्रकार प्रेरित करने पर मैंने उस सुन्दर कटि वाली से कहा, ‘हे रानी, मुझे आज्ञा दो; मैं तुम्हारा कहा करूँगा।’
श्लोक 20 (13.45.20)
सा च मामब्रवीद्गच्छ शिवाय विजयाय च । ब्रह्मा शिवः काश्यपश्च नद्यो देवा मनोऽनुगाः ॥
sā ca māmabravīdgaccha śivāya vijayāya ca | brahmā śivaḥ kāśyapaśca nadyo devā mano'nugāḥ
और उसने मुझसे कहा: जाइए, कल्याण और विजय के लिए। ब्रह्मा, शिव, कश्यप, नदियाँ, देवता और मन का अनुसरण करने वाले,
जाम्बवत्युवाच
श्लोक 21 (13.45.21)
क्षेत्रौषध्यो यज्ञवाहाश्छन्दास्यृषिगणाध्वराः । समुद्रा दक्षिणा स्तोभा ऋक्षाणि पितरो ग्रहाः ॥
kṣetrauṣadhyo yajñavāhāśchandāsyṛṣigaṇādhvarāḥ | samudrā dakṣiṇā stobhā ṛkṣāṇi pitaro grahāḥ
क्षेत्र और औषधियाँ, यज्ञ के वाहक, छन्द, ऋषिगण, यज्ञ, समुद्र, दक्षिणाएँ, स्तोभ, नक्षत्र, पितर और ग्रह,
श्लोक 22 (13.45.22)
देवपत्न्यो देवकन्या देवमातर एव च । मन्वन्तराणि गावश्च चन्द्रमाः सविता हरिः ॥
devapatnyo devakanyā devamātara eva ca | manvantarāṇi gāvaśca candramāḥ savitā hariḥ
देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ, देवमाताएँ, मन्वन्तर, गौएँ, चन्द्रमा, सूर्य और हरि,
श्लोक 23 (13.45.23)
सावित्री ब्रह्मविद्या च ऋतवो वत्सरास्तथा । क्षणा लवा मुहूर्ताश्च निमेषा युगपर्ययाः ॥
sāvitrī brahmavidyā ca ṛtavo vatsarāstathā | kṣaṇā lavā muhūrtāśca nimeṣā yugaparyayāḥ
सावित्री, ब्रह्मविद्या, ऋतुएँ, वर्ष, क्षण, लव, मुहूर्त, निमेष और युगों के चक्र,
श्लोक 24 (13.45.24)
रक्षन्तु सर्वत्र गतं त्वां यादव सुखाय च । अरिष्टं गच्छ पन्थानमप्रमत्तो भवानघ ॥
rakṣantu sarvatra gataṃ tvāṃ yādava sukhāya ca | ariṣṭaṃ gaccha panthānamapramatto bhavānagha
ये सब, हे यादव, जहाँ-जहाँ आप जाएँ वहाँ आपकी रक्षा करें और आपको सुख दें। हे निष्पाप, निर्विघ्न मार्ग से जाइए और सावधान रहिए।
वासुदेव उवाच
श्लोक 25 (13.45.25)
एवं कृतस्वस्त्ययनस्तयाऽहं । ततोऽभ्यनुज्ञाय नरेन्द्रपुत्रीम् । पितुः समीपं नरसत्तमस्य । मातुश्च राज्ञश्च तथाऽऽहुकस्य ॥
evaṃ kṛtasvastyayanastayā'haṃ | tato'bhyanujñāya narendraputrīm | pituḥ samīpaṃ narasattamasya | mātuśca rājñaśca tathā''hukasya
इस प्रकार उसके द्वारा स्वस्तिवाचन किए जाने पर मैंने उस राजकन्या से विदा ली और अपने पिता, पुरुषश्रेष्ठ, माता, राजा तथा आहुक के पास गया।
श्लोक 26 (13.45.26)
ततः समृद्धिर्भवतोऽस्त्वविघ्नम् ॥
tataḥ samṛddhirbhavato'stvavighnam
तब आपकी समृद्धि बिना किसी विघ्न के हो।
श्लोक 27 (13.45.27)
प्राप्यानुज्ञां गुरुजनादहं तार्क्ष्यमचिन्तयम् । सोवहद्धिमवन्तं मां प्राप्य चैनं व्यसर्जयम् ॥
prāpyānujñāṃ gurujanādahaṃ tārkṣyamacintayam | sovahaddhimavantaṃ māṃ prāpya cainaṃ vyasarjayam
बड़ों से आज्ञा पाकर मैंने तार्क्ष्य गरुड़ का स्मरण किया। वह मुझे हिमालय तक ले गया, वहाँ पहुँचकर मैंने उसे विदा कर दिया।
श्लोक 28 (13.45.28)
तत्राहमद्भुतान्भावानपश्यं गिरिसत्तमे । क्षेत्रं च तपसां श्रेष्ठं पश्याम्यद्भुतमुत्तमम् ॥
tatrāhamadbhutānbhāvānapaśyaṃ girisattame | kṣetraṃ ca tapasāṃ śreṣṭhaṃ paśyāmyadbhutamuttamam
वहाँ उस श्रेष्ठ पर्वत पर मैंने अद्भुत दृश्य देखे, और तपस्याओं का श्रेष्ठ क्षेत्र, एक अद्भुत और उत्तम स्थान देखा।
श्लोक 29 (13.45.29)
दिव्यं वैयाघ्रपद्यस्य उपमन्योर्महात्मनः । पूजितं देवगन्धर्वैर्ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम् ॥
divyaṃ vaiyāghrapadyasya upamanyormahātmanaḥ | pūjitaṃ devagandharvairbrāhmyā lakṣmyā samāvṛtam
वह व्याघ्रपाद के पुत्र महात्मा उपमन्यु का दिव्य आश्रम था, जो देवताओं और गन्धर्वों से पूजित और ब्रह्मतेज से परिपूर्ण था।
श्लोक 30 (13.45.30)
धवककुभकदम्बनारिकेलैः । कुरवककेतकजम्बुपाटलाभिः । वटवरुणकवत्सनाभविल्वैः । सरलकपित्थप्रियालसालतालैः ॥
dhavakakubhakadambanārikelaiḥ | kuravakaketakajambupāṭalābhiḥ | vaṭavaruṇakavatsanābhavilvaiḥ | saralakapitthapriyālasālatālaiḥ
वह धव, ककुभ, कदम्ब और नारियल के वृक्षों से; कुरवक, केतक, जामुन और पाटला से; वट, वरुणक, वत्सनाभ और बिल्व से; तथा सरल, कपित्थ, प्रियाल, साल और ताल के वृक्षों से घिरा हुआ था;
श्लोक 31 (13.45.31)
बदरीकुन्दपुन्नागैरशोकाम्रातिमुक्तकैः । मधूकैः कोविदारैश्च चम्पकैः पनसैस्तथा ॥
badarīkundapunnāgairaśokāmrātimuktakaiḥ | madhūkaiḥ kovidāraiśca campakaiḥ panasaistathā
बेर, कुन्द, पुन्नाग, अशोक, आम और अतिमुक्तक से; मधूक, कोविदार, चम्पक और कटहल के वृक्षों से;
श्लोक 32 (13.45.32)
वन्यैर्बहुविधैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युतम् । पुष्पगुल्मलताकीर्णं कदलीषण्डशोभितम् ॥
vanyairbahuvidhairvṛkṣaiḥ phalapuṣpapradairyutam | puṣpagulmalatākīrṇaṃ kadalīṣaṇḍaśobhitam
और फल-फूल देने वाले अनेक प्रकार के वन्य वृक्षों से युक्त था; वह फूलों के झुरमुटों और लताओं से भरा तथा केले के कुंजों से शोभित था।
श्लोक 33 (13.45.33)
नानाशकुनिसम्भोज्यैः फलैर्वृक्षैरलङ्कृतम् । यथास्थानविनिक्षिप्तैर्भूषितं भस्मराशिभिः ॥
nānāśakunisambhojyaiḥ phalairvṛkṣairalaṅkṛtam | yathāsthānavinikṣiptairbhūṣitaṃ bhasmarāśibhiḥ
अनेक पक्षियों के भोजन योग्य फलों वाले वृक्षों से वह अलंकृत था, और यथास्थान रखी हुई भस्म की राशियों से विभूषित था।
श्लोक 34 (13.45.34)
रुरुवानरशार्दूलसिंहद्वीपिसमाकुलम् । कुरङ्गबर्हिणाकीर्णं मार्जारभुजगावृतम् । पूगैश्च मृगजातीनां महिषर्क्षनिषेवितम् ॥
ruruvānaraśārdūlasiṃhadvīpisamākulam | kuraṅgabarhiṇākīrṇaṃ mārjārabhujagāvṛtam | pūgaiśca mṛgajātīnāṃ mahiṣarkṣaniṣevitam
वहाँ रुरु मृग, वानर, बाघ, सिंह और तेंदुए भरे थे; कुरंग और मोर बिखरे थे; बिल्लियाँ और साँप फैले थे; और मृगों के झुंड, भैंसे और रीछ वहाँ आते-जाते थे।
श्लोक 35 (13.45.35)
सकृत्प्रभिन्नैश्च गजैर्विभूषितं । प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितम् । सुपुष्पितैरम्बुधरप्रकाशै- । र्महीरुहाणां च वनैर्विचित्रैः ॥
sakṛtprabhinnaiśca gajairvibhūṣitaṃ | prahṛṣṭanānāvidhapakṣisevitam | supuṣpitairambudharaprakāśai- | rmahīruhāṇāṃ ca vanairvicitraiḥ
मद बहाते हाथियों से वह सुशोभित था, आनन्दित अनेक प्रकार के पक्षियों से सेवित था, और मेघों जैसी आभा वाले, फूलों से लदे वृक्षों के विचित्र वनों से शोभित था।
श्लोक 36 (13.45.36)
नानापुष्परजोमिश्रो गजदानाधिवासितः । दिव्यस्त्रीगीतबहुलो मारुतोऽभिमुखो ववौ ॥
nānāpuṣparajomiśro gajadānādhivāsitaḥ | divyastrīgītabahulo māruto'bhimukho vavau
अनेक फूलों के पराग से मिला, हाथियों के मद की गन्ध से बसा, दिव्य स्त्रियों के गीतों से भरा वायु मेरी ओर बह रहा था।
श्लोक 37 (13.45.37)
धारानिनादैर्विहगप्रणादैः । शुभैस्तथा बृंहितैः कुञ्जराणाम् । गीतैस्तथा किन्नराणामुदारैः । शुभैः स्वनैः सामगानां च वीर ॥
dhārāninādairvihagapraṇādaiḥ | śubhaistathā bṛṃhitaiḥ kuñjarāṇām | gītaistathā kinnarāṇāmudāraiḥ | śubhaiḥ svanaiḥ sāmagānāṃ ca vīra
वह धाराओं के निनाद, पक्षियों की चहचहाहट, हाथियों की सुन्दर चिंघाड़, किन्नरों के उदात्त गीतों और सामगान करने वालों के मधुर स्वरों से गूँज रहा था, हे वीर।
श्लोक 38 (13.45.38)
अचिन्त्यं मनसाऽप्यन्यैः सरोभिः समलङ्कृतम् । विशालैश्चाग्निशरणैर्भूषितं कुसुमावृतैः ॥
acintyaṃ manasā'pyanyaiḥ sarobhiḥ samalaṅkṛtam | viśālaiścāgniśaraṇairbhūṣitaṃ kusumāvṛtaiḥ
दूसरे लोग मन से भी उसकी कल्पना नहीं कर सकते थे; वह सरोवरों से अलंकृत और फूलों से ढके विशाल अग्निशालाओं से शोभित था।
श्लोक 39 (13.45.39)
विभूषितं पुण्यपवित्रतोयया । सदा च जुष्टं नृप जह्नुकन्यया । विभूषितं धर्मभृतां वरिष्ठै- । र्महात्मभिर्वह्निसमानकल्पैः ॥
vibhūṣitaṃ puṇyapavitratoyayā | sadā ca juṣṭaṃ nṛpa jahnukanyayā | vibhūṣitaṃ dharmabhṛtāṃ variṣṭhai- | rmahātmabhirvahnisamānakalpaiḥ
वह जह्नुकन्या गंगा के पुण्य और पवित्र जल से सुशोभित था, जो हे राजन्, सदा वहाँ विराजती थीं; और अग्नि के समान तेजस्वी, धर्मधारियों में श्रेष्ठ महात्माओं से विभूषित था।
श्लोक 40 (13.45.40)
वाय्वाहारैरम्बुपैर्जप्यनित्यैः । सम्प्रक्षालैर्योगिभिर्ध्याननित्यैः । धूमप्राशैरूष्मपैः क्षीरपैश्च । संजुष्टं च ब्राह्मणेन्द्रैः समन्तात् ॥
vāyvāhārairambupairjapyanityaiḥ | samprakṣālairyogibhirdhyānanityaiḥ | dhūmaprāśairūṣmapaiḥ kṣīrapaiśca | saṃjuṣṭaṃ ca brāhmaṇendraiḥ samantāt
चारों ओर श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ भरे थे: वायु पर रहने वाले, जल पर रहने वाले, नित्य जप करने वाले, सम्प्रक्षाल तपस्वी, नित्य ध्यान में लगे योगी, धुआँ पीने वाले, भाप पीने वाले और दूध पर रहने वाले।
श्लोक 41 (13.45.41)
गोचारिणोऽथाश्मकुट्टा दन्तोलूखलिकास्तथा । मरीचिपाः फेनपाश्च तथैव मृगचारिणः ॥
gocāriṇo'thāśmakuṭṭā dantolūkhalikāstathā | marīcipāḥ phenapāśca tathaiva mṛgacāriṇaḥ
कोई गायों के साथ विचरते थे, कोई पत्थरों से कूटकर खाते थे, कोई दाँतों को ही ओखली बनाए थे; किरणें पीने वाले, झाग पीने वाले और मृगों के साथ विचरने वाले भी थे।
श्लोक 42 (13.45.42)
अश्वत्थफलभक्षाश्च तथा ह्युदकशायिनः । चीरचर्माम्बरधरास्तथा वल्कलधारिणः ॥
aśvatthaphalabhakṣāśca tathā hyudakaśāyinaḥ | cīracarmāmbaradharāstathā valkaladhāriṇaḥ
कोई पीपल के फल खाते थे, कोई जल में सोते थे; कोई चीर और चर्म पहनते थे, और कोई वल्कल धारण करते थे।
श्लोक 43 (13.45.43)
सुदुःखान्नियमांस्तांस्तान्वहतः सुतपोधनान् । पश्यन्मुनीन्बहुविधान्प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥
suduḥkhānniyamāṃstāṃstānvahataḥ sutapodhanān | paśyanmunīnbahuvidhānpraveṣṭumupacakrame
ऐसे अत्यन्त कठिन नियमों का पालन करने वाले, तप ही जिनका धन था, उन अनेक मुनियों को देखता हुआ मैं भीतर प्रवेश करने लगा।
श्लोक 44 (13.45.44)
सुपूजितं देवगणैर्महात्मभिः । शिवादिभिर्भारतपुण्यकर्मभिः । रराज तच्चाश्रममण्डलं सदा । दिवीव राजञ्शशिमण्डलं यथा ॥
supūjitaṃ devagaṇairmahātmabhiḥ | śivādibhirbhāratapuṇyakarmabhiḥ | rarāja taccāśramamaṇḍalaṃ sadā | divīva rājañśaśimaṇḍalaṃ yathā
महात्मा देवगणों से, शिव आदि पुण्यकर्मा देवताओं से, हे भारत, सम्मानित वह आश्रम-मण्डल सदा ऐसा शोभित होता था जैसे हे राजन्, आकाश में चन्द्रमण्डल।
श्लोक 45 (13.45.45)
क्रीडन्ति सर्पैर्नकुला मृगैर्व्याघ्राश्च मित्रवत् । प्रभावाद्दीप्ततपसां सन्निकर्षान्महात्मनाम् ॥
krīḍanti sarpairnakulā mṛgairvyāghrāśca mitravat | prabhāvāddīptatapasāṃ sannikarṣānmahātmanām
दीप्त तप वाले उन महात्माओं के प्रभाव और सान्निध्य से नेवले साँपों के साथ और बाघ मृगों के साथ मित्रों की तरह खेलते थे।
श्लोक 46 (13.45.46)
तत्राश्रमपदे श्रेष्ठे सर्वभूतमनोरम । सेविते द्विजशार्दूलैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥
tatrāśramapade śreṣṭhe sarvabhūtamanorama | sevite dvijaśārdūlairvedavedāṅgapāragaiḥ
सब प्राणियों के मन को प्रिय उस श्रेष्ठ आश्रम में, जहाँ वेद-वेदांग के पारगामी ब्राह्मणश्रेष्ठ निवास करते थे,
श्लोक 47 (13.45.47)
नानानियमविख्यातैर्ऋषिभिः सुमहात्मभिः । प्रविशन्नेव चापश्यं जटाचीरधरं प्रभुम् ॥
nānāniyamavikhyātairṛṣibhiḥ sumahātmabhiḥ | praviśanneva cāpaśyaṃ jaṭācīradharaṃ prabhum
और अनेक नियमों के लिए प्रसिद्ध महात्मा ऋषियों के बीच प्रवेश करते ही मैंने जटा और वल्कल धारण किए हुए स्वामी को देखा,
श्लोक 48 (13.45.48)
तेजसा तपसा चैव दीप्यमानं यथाऽनलम् । शिष्यैरनुगतं शान्तं युवानं ब्राह्मणर्षभम् ॥
tejasā tapasā caiva dīpyamānaṃ yathā'nalam | śiṣyairanugataṃ śāntaṃ yuvānaṃ brāhmaṇarṣabham
जो तेज और तप से अग्नि के समान दीप्त थे, शान्त, युवा, ब्राह्मणों में वृषभ के समान श्रेष्ठ, और शिष्यों से घिरे हुए थे।
श्लोक 49 (13.45.49)
शिरसा वन्दमानं मामुपमन्युरभाषत ॥
śirasā vandamānaṃ māmupamanyurabhāṣata
मैंने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया तो उपमन्यु ने मुझसे कहा।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 50 (13.45.50)
स्वागतं पुण्डरीकाक्ष सफलानि तपांसि नः । यः पूज्यः पूजयसि मां द्रष्टव्यो द्रष्टुमिच्छसि ॥
svāgataṃ puṇḍarīkākṣa saphalāni tapāṃsi naḥ | yaḥ pūjyaḥ pūjayasi māṃ draṣṭavyo draṣṭumicchasi
स्वागत है, कमलनयन! हमारी तपस्याएँ सफल हो गईं। आप जो स्वयं पूज्य हैं, मेरी पूजा करते हैं; आप जो दर्शन के योग्य हैं, मुझे देखना चाहते हैं।
श्लोक 51 (13.45.51)
मनुष्यतानुवृत्त्या त्वा ज्ञात्वा तिष्ठाम सर्वगम् ॥
manuṣyatānuvṛttyā tvā jñātvā tiṣṭhāma sarvagam
यह जानकर कि आप सर्वव्यापी होकर भी मनुष्य के आचरण का अनुसरण कर रहे हैं, हम ज्यों-के-त्यों ठहरे हुए हैं।
वासुदेव उवाच
श्लोक 52 (13.45.52)
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा मृगपक्षिष्वथाग्निषु । धर्मे च शिष्यवर्गे च समपृच्छमनामयम् ॥
tamahaṃ prāñjalirbhūtvā mṛgapakṣiṣvathāgniṣu | dharme ca śiṣyavarge ca samapṛcchamanāmayam
मैंने हाथ जोड़कर उनसे मृगों और पक्षियों, अग्नियों, धर्म और शिष्यवर्ग का कुशल पूछा।
श्लोक 53 (13.45.53)
ततो मां भगवानाह साम्ना परमवल्गुना । लप्स्यसे तनयं कृष्ण आत्मतुल्यमसंशयम् ॥
tato māṃ bhagavānāha sāmnā paramavalgunā | lapsyase tanayaṃ kṛṣṇa ātmatulyamasaṃśayam
तब भगवान् उपमन्यु ने मुझसे अत्यन्त मधुर और कोमल वाणी में कहा, ‘हे कृष्ण, तुम्हें अपने समान पुत्र निश्चय ही प्राप्त होगा।’
उपमन्युरुवाच
श्लोक 54 (13.45.54)
तपः सुमहदास्थाय तोषयेशानमीश्वरम् । इह देवः सपत्नीकः समाक्रीडत्यधोक्षज ॥
tapaḥ sumahadāsthāya toṣayeśānamīśvaram | iha devaḥ sapatnīkaḥ samākrīḍatyadhokṣaja
महान् तप का आश्रय लेकर ईशान ईश्वर को प्रसन्न करो। हे अधोक्षज, यहाँ वे देव अपनी पत्नी के साथ क्रीड़ा करते रहते हैं।
श्लोक 55 (13.45.55)
इहैनं दैवतश्रेष्ठं देवाः सर्षिगणाः पुरा । तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च ॥
ihainaṃ daivataśreṣṭhaṃ devāḥ sarṣigaṇāḥ purā | tapasā brahmacaryeṇa satyena ca damena ca
यहीं पूर्वकाल में देवताओं और ऋषिगणों ने तप, ब्रह्मचर्य, सत्य और दम से देवताओं में श्रेष्ठ इन्हें प्रसन्न करके
श्लोक 56 (13.45.56)
तोषयित्वा शुभान्कामान्प्राप्तवन्तो जनार्दन । तेजसां तपसां चैव निधिः स भगवानिह ॥
toṣayitvā śubhānkāmānprāptavanto janārdana | tejasāṃ tapasāṃ caiva nidhiḥ sa bhagavāniha
मनचाहे शुभ फल पाए, हे जनार्दन। तेज और तपस्याओं का निधि वह भगवान् यहीं विराजते हैं।
श्लोक 57 (13.45.57)
शुभाशुभान्वितान्भावान्विसृजन्स क्षिपन्नपि । आस्ते देव्या सहाचिन्त्यो यं प्रार्थयसि शत्रुहन् ॥
śubhāśubhānvitānbhāvānvisṛjansa kṣipannapi | āste devyā sahācintyo yaṃ prārthayasi śatruhan
शुभ और अशुभ से युक्त भावों को रचते और समेटते हुए वह अचिन्त्य देव देवी के साथ यहीं रहते हैं; वही जिन्हें तुम चाहते हो, हे शत्रुहन्ता।
श्लोक 58 (13.45.58)
हिरण्यकशिपुर्योऽभूद्दानवो मेरुकम्पनः । तेन सर्वामरैश्वर्यं शर्वात्प्राप्तं समार्बुदम् ॥
hiraṇyakaśipuryo'bhūddānavo merukampanaḥ | tena sarvāmaraiśvaryaṃ śarvātprāptaṃ samārbudam
मेरु को कँपा देने वाला जो हिरण्यकशिपु दानव हुआ, उसने शर्व से समस्त देवताओं का ऐश्वर्य पूरे एक अर्बुद वर्ष के लिए पाया।
श्लोक 59 (13.45.59)
तस्यैव पुत्रप्रवरो दमनो नाम विश्रुतः । महादेववराच्छक्रं वर्षार्बुदमयोधयत् ॥
tasyaiva putrapravaro damano nāma viśrutaḥ | mahādevavarācchakraṃ varṣārbudamayodhayat
उसी का श्रेष्ठ पुत्र दमन नाम से प्रसिद्ध था; महादेव के वर से उसने इन्द्र से एक अर्बुद वर्ष तक युद्ध किया।
श्लोक 60 (13.45.60)
विष्णोश्चक्रं च तद्घोरं वज्रमाखण्डलस्य च । शीर्णं पुराऽभवत्तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ॥
viṣṇoścakraṃ ca tadghoraṃ vajramākhaṇḍalasya ca | śīrṇaṃ purā'bhavattāta grahasyāṅgeṣu keśava
विष्णु का वह भयंकर चक्र और इन्द्र का वज्र, हे प्रिय केशव, पूर्वकाल में उस ग्रह के अंगों पर टूटकर चूर हो गए थे।
श्लोक 61 (13.45.61)
यत्तद्भगवता पूर्वं दत्तं चक्रं तवानघ । जलान्तरचरं हत्वा दैत्यं च बलगर्वितम् ॥
yattadbhagavatā pūrvaṃ dattaṃ cakraṃ tavānagha | jalāntaracaraṃ hatvā daityaṃ ca balagarvitam
हे निष्पाप, वह चक्र जो पूर्वकाल में भगवान् ने जल के भीतर विचरने वाले, बल के गर्व से भरे दैत्य को मारकर आपको दिया था,
श्लोक 62 (13.45.62)
उत्पादितं वृषाङ्केन दीप्तज्वलनसन्निभम् । दत्तं भगवता तुभ्यं दुर्धर्षं तेजसाऽद्भुतम् ॥
utpāditaṃ vṛṣāṅkena dīptajvalanasannibham | dattaṃ bhagavatā tubhyaṃ durdharṣaṃ tejasā'dbhutam
वृषभ-ध्वज शिव ने जिसे रचा था, जो प्रज्वलित अग्नि के समान दीप्त, दुर्धर्ष और तेज में अद्भुत था, वही भगवान् ने आपको दिया।
श्लोक 63 (13.45.63)
न शक्यं द्रष्टुमन्येन वर्जयित्वा पिनाकिनम् । सुदर्शनं भवत्येवं भवेनोक्तं तदा तु तत् ॥
na śakyaṃ draṣṭumanyena varjayitvā pinākinam | sudarśanaṃ bhavatyevaṃ bhavenoktaṃ tadā tu tat
पिनाकधारी को छोड़कर दूसरा कोई उसे देख नहीं सकता। उस समय भव ने कहा था, ‘यह सुदर्शन हो।’
श्लोक 64 (13.45.64)
सुदर्शनं तदा तस्य लोके नाम प्रतिष्ठितम् । तज्जीर्णमभवत्तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ॥
sudarśanaṃ tadā tasya loke nāma pratiṣṭhitam | tajjīrṇamabhavattāta grahasyāṅgeṣu keśava
तब संसार में उसका नाम सुदर्शन प्रसिद्ध हुआ। वही चक्र, हे प्रिय केशव, ग्रह के अंगों पर घिसकर क्षीण हो गया।
श्लोक 65 (13.45.65)
ग्रहस्यातिवलस्याङ्गे वरदत्तस्य धीमतः । न शस्त्राणि वहन्त्यङ्गे चक्रवज्रशतान्यपि ॥
grahasyātivalasyāṅge varadattasya dhīmataḥ | na śastrāṇi vahantyaṅge cakravajraśatānyapi
अत्यन्त बलवान् और बुद्धिमान् ग्रह को वर मिला हुआ था; उसके शरीर पर शस्त्र, सैकड़ों चक्र और वज्र भी, टिक नहीं पाते थे।
श्लोक 66 (13.45.66)
अर्द्यमानाश्च विबुधा ग्रहेण सुबलीयसा । शिवदत्तवराञ्जघ्नुरसुरेन्द्रान्सुरा भृशम् ॥
ardyamānāśca vibudhā graheṇa subalīyasā | śivadattavarāñjaghnurasurendrānsurā bhṛśam
अत्यन्त बलवान् ग्रह से पीड़ित होकर देवताओं ने शिव से वर पाए हुए असुरेन्द्रों पर कठोर प्रहार किए।
श्लोक 67 (13.45.67)
तुष्टो विद्युत्प्रभस्यापि त्रिलोकेश्वरतां ददौ । शतं वर्षसहस्राणां सर्वलोकेश्वरोऽभवत् ॥
tuṣṭo vidyutprabhasyāpi trilokeśvaratāṃ dadau | śataṃ varṣasahasrāṇāṃ sarvalokeśvaro'bhavat
प्रसन्न होकर उन्होंने विद्युत्प्रभ को भी तीनों लोकों का आधिपत्य दिया; वह सौ हजार वर्ष तक समस्त लोकों का स्वामी रहा।
श्लोक 68 (13.45.68)
ममैवानुचरो नित्यं भवितासीति चाब्रवीत् । तथा पुत्रसहस्राणामयुतं च ददौ प्रभुः ॥
mamaivānucaro nityaṃ bhavitāsīti cābravīt | tathā putrasahasrāṇāmayutaṃ ca dadau prabhuḥ
‘तुम सदा मेरे अनुचर रहोगे,’ ऐसा प्रभु ने कहा और उसे दस हजार हजार पुत्र भी दिए।
श्लोक 69 (13.45.69)
कुशद्वीपं च स ददौ राज्येन भगवानजः । तथा शतमुखो नाम धात्रा सृष्टो महासुरः ॥
kuśadvīpaṃ ca sa dadau rājyena bhagavānajaḥ | tathā śatamukho nāma dhātrā sṛṣṭo mahāsuraḥ
अजन्मा भगवान् ने उसे राज्य के रूप में कुशद्वीप भी दिया। इसी प्रकार धाता ने शतमुख नामक एक महान् असुर रचा था,
श्लोक 70 (13.45.70)
येन वर्षशतं साग्रमात्ममांसैर्हुतोऽनलः । तं प्राह भगवांस्तुष्टः किंकरोमीति शंकरः ॥
yena varṣaśataṃ sāgramātmamāṃsairhuto'nalaḥ | taṃ prāha bhagavāṃstuṣṭaḥ kiṃkaromīti śaṃkaraḥ
जिसने पूरे सौ वर्ष तक अपने शरीर के मांस से अग्नि में आहुति दी। प्रसन्न होकर भगवान् शंकर ने उससे कहा, ‘मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?’
श्लोक 71 (13.45.71)
तं वै शतमुखः प्राह योगो भवतु मेऽद्भुतः । बलं च दैवतश्रेष्ठ शाश्वतं सम्प्रयच्छ मे ॥
taṃ vai śatamukhaḥ prāha yogo bhavatu me'dbhutaḥ | balaṃ ca daivataśreṣṭha śāśvataṃ samprayaccha me
शतमुख ने उनसे कहा, ‘मुझे अद्भुत योग प्राप्त हो, और हे देवश्रेष्ठ, मुझे शाश्वत बल प्रदान कीजिए।’
श्लोक 72 (13.45.72)
तथेति भगवानाह तस्य तद्वचनं प्रभुः । स्वायंभुवः क्रतुश्चापि पुत्रार्थमभवत्पुरा ॥
tatheti bhagavānāha tasya tadvacanaṃ prabhuḥ | svāyaṃbhuvaḥ kratuścāpi putrārthamabhavatpurā
‘ऐसा ही हो,’ भगवान् प्रभु ने उसकी वह बात मान ली। और पूर्वकाल में स्वायम्भुव क्रतु को भी पुत्र की कामना हुई।
श्लोक 73 (13.45.73)
आविश्य योगेनात्मानं त्रीणि वर्षशतान्यपि । तस्य चोपददौ पुत्रान्सहस्रं क्रतुसम्मितान् । योगेश्वरं देवगीतं वेत्थ कृष्ण न संशयः ॥
āviśya yogenātmānaṃ trīṇi varṣaśatānyapi | tasya copadadau putrānsahasraṃ kratusammitān | yogeśvaraṃ devagītaṃ vettha kṛṣṇa na saṃśayaḥ
तीन सौ वर्ष तक योग द्वारा अपने में लीन रहने पर देव ने उसे क्रतु के समान एक हजार पुत्र दिए। हे कृष्ण, आप देवताओं द्वारा गाए गए उस योगेश्वर को निःसन्देह जानते हैं।
श्लोक 74 (13.45.74)
याज्ञवल्क्य इति ख्यात ऋषिः परमधार्मिकः । आराध्य स महादेवं प्राप्तवानतुलं यशः ॥
yājñavalkya iti khyāta ṛṣiḥ paramadhārmikaḥ | ārādhya sa mahādevaṃ prāptavānatulaṃ yaśaḥ
याज्ञवल्क्य नाम से प्रसिद्ध परम धार्मिक ऋषि ने महादेव की आराधना करके अतुल यश पाया।
श्लोक 75 (13.45.75)
वेदव्यासश्च योगात्मा पराशरसुतो मुनिः । सोऽपि शंकरमाराध्य प्राप्तवानतुलं यशः ॥
vedavyāsaśca yogātmā parāśarasuto muniḥ | so'pi śaṃkaramārādhya prāptavānatulaṃ yaśaḥ
पराशर के पुत्र योगात्मा मुनि वेदव्यास ने भी शंकर की आराधना करके अतुल यश पाया।
श्लोक 76 (13.45.76)
वालखिल्या मघवता ह्यवज्ञाताः पुरा किल । तैः क्रुद्धैर्भगवान्रुद्रस्तपसा तोषितो ह्यभूत् ॥
vālakhilyā maghavatā hyavajñātāḥ purā kila | taiḥ kruddhairbhagavānrudrastapasā toṣito hyabhūt
वालखिल्य पूर्वकाल में इन्द्र द्वारा अपमानित हुए थे; क्रुद्ध होकर उन्होंने तप से भगवान् रुद्र को प्रसन्न किया।
श्लोक 77 (13.45.77)
तांश्चापि दैवतश्रेष्ठः प्राह प्रीतो जगत्पतिः । सुपर्णं सोमहर्तारं तपसोत्पादयिष्यथ ॥
tāṃścāpi daivataśreṣṭhaḥ prāha prīto jagatpatiḥ | suparṇaṃ somahartāraṃ tapasotpādayiṣyatha
देवताओं में श्रेष्ठ जगत्पति ने प्रसन्न होकर उनसे कहा, ‘तप से तुम सोम को हर लाने वाले सुपर्ण को उत्पन्न करोगे।’
श्लोक 78 (13.45.78)
महादेवस्य रोषाच्च आपो नष्टाः पुराऽभवन् । ताश्च सप्तकपालेन देवैरन्याः प्रवर्तिताः ॥
mahādevasya roṣācca āpo naṣṭāḥ purā'bhavan | tāśca saptakapālena devairanyāḥ pravartitāḥ
महादेव के क्रोध से पूर्वकाल में जल नष्ट हो गया था; तब देवताओं ने सप्तकपाल हवि से दूसरे जल प्रवाहित किए।
श्लोक 79 (13.45.79)
ततः पानीयमभवत्प्रसन्ने त्र्यम्बके भुवि । अत्रिभार्या सुतं दत्तं सोमं दुर्वाससं प्रभो ॥
tataḥ pānīyamabhavatprasanne tryambake bhuvi | atribhāryā sutaṃ dattaṃ somaṃ durvāsasaṃ prabho
फिर त्र्यम्बक के प्रसन्न होने पर पृथ्वी पर जल हुआ। अत्रि की पत्नी को प्रभु ने पुत्र दिए, सोम और दुर्वासा, हे प्रभो।
श्लोक 80 (13.45.80)
अत्रेर्भार्याऽपि भर्तारं संत्यज्य ब्रह्मवादिनी । नाहं तव मुने भूयो वशगा स्यां कथञ्चन ॥
atrerbhāryā'pi bhartāraṃ saṃtyajya brahmavādinī | nāhaṃ tava mune bhūyo vaśagā syāṃ kathañcana
अत्रि की पत्नी भी, जो ब्रह्मवादिनी थी, पति को छोड़कर बोली, ‘हे मुनि, मैं अब किसी भी प्रकार फिर आपके वश में नहीं रहूँगी।’
श्लोक 81 (13.45.81)
इत्युक्त्वा सा महादेवमगमच्छरणं किल । निराहारा भयादत्रेस्त्रीणि वर्षशतान्यपि ॥
ityuktvā sā mahādevamagamaccharaṇaṃ kila | nirāhārā bhayādatrestrīṇi varṣaśatānyapi
ऐसा कहकर वह महादेव की शरण में गई, और अत्रि के भय से तीन सौ वर्ष तक निराहार रहकर
श्लोक 82 (13.45.82)
अशेत मुसलेष्वेव प्रसादार्थं भवस्य सा । तामब्रवीद्धसन्देवो भविता वै सुतस्तव ॥
aśeta musaleṣveva prasādārthaṃ bhavasya sā | tāmabravīddhasandevo bhavitā vai sutastava
भव को प्रसन्न करने के लिए मूसलों पर ही सोती रही। तब हँसते हुए देव ने उससे कहा, ‘तुम्हारे पुत्र होगा।’
श्लोक 83 (13.45.83)
विना भर्त्रा चरुद्रेण भविष्यति न संशयः । वंशे तवैव नाम्ना तु ख्यातिं यास्यति चेप्सिताम् ॥
vinā bhartrā carudreṇa bhaviṣyati na saṃśayaḥ | vaṃśe tavaiva nāmnā tu khyātiṃ yāsyati cepsitām
बिना पति के, रुद्र को चरु अर्पित करने से, निःसन्देह यह होगा; और तुम्हारे ही वंश में वह अपने नाम से इच्छित ख्याति प्राप्त करेगा।
श्लोक 84 (13.45.84)
विकर्णश्च महादेवं तथा भक्तसुखावहम् । प्रसाद्य भगवान्सिद्धिं प्राप्तवान्मधुसूदन ॥
vikarṇaśca mahādevaṃ tathā bhaktasukhāvaham | prasādya bhagavānsiddhiṃ prāptavānmadhusūdana
विकर्ण ने भी भक्तों को सुख देने वाले महादेव को प्रसन्न करके सिद्धि पाई, हे मधुसूदन।
श्लोक 85 (13.45.85)
शाकल्यः संशितात्मा वै नववर्षशतान्यपि । आराधयामास भवं मनोयज्ञेन केशव ॥
śākalyaḥ saṃśitātmā vai navavarṣaśatānyapi | ārādhayāmāsa bhavaṃ manoyajñena keśava
तीक्ष्ण मन वाले शाकल्य ने नौ सौ वर्ष तक मानसिक यज्ञ से भव की आराधना की, हे केशव।
श्लोक 86 (13.45.86)
तं चाह भगवांस्तुष्टो ग्रन्थकारो भविष्यसि । वत्साक्षया च ते कीर्तिस्त्रैलोक्ये वै भविष्यति ॥
taṃ cāha bhagavāṃstuṣṭo granthakāro bhaviṣyasi | vatsākṣayā ca te kīrtistrailokye vai bhaviṣyati
प्रसन्न भगवान् ने उससे कहा, ‘तुम ग्रन्थकार होगे, और हे वत्स, तुम्हारी अक्षय कीर्ति तीनों लोकों में रहेगी।’
श्लोक 87 (13.45.87)
अक्षयं च कुलं तेऽस्तु महर्षिभिरलंकृतम् । भविष्यति द्विजश्रेष्ठः सूत्रकर्ता सुतस्तव ॥
akṣayaṃ ca kulaṃ te'stu maharṣibhiralaṃkṛtam | bhaviṣyati dvijaśreṣṭhaḥ sūtrakartā sutastava
तुम्हारा कुल अक्षय हो और महर्षियों से अलंकृत रहे; तुम्हारा पुत्र ब्राह्मणश्रेष्ठ सूत्रकार होगा।
श्लोक 88 (13.45.88)
सावर्णिश्चापि विख्यात ऋषिरासीत्कृते युगे । इह तेन तपस्तप्तं षष्टिवर्षशतान्यथ ॥
sāvarṇiścāpi vikhyāta ṛṣirāsītkṛte yuge | iha tena tapastaptaṃ ṣaṣṭivarṣaśatānyatha
सावर्णि भी कृतयुग में एक प्रसिद्ध ऋषि हुए; उन्होंने यहाँ छह हजार वर्ष तक तप किया।
श्लोक 89 (13.45.89)
तमाह भगवान्रुद्रः साक्षात्तुष्टोस्मि तेऽनघ । ग्रन्थकृल्लोकविख्यातो भवितास्यजरामरः ॥
tamāha bhagavānrudraḥ sākṣāttuṣṭosmi te'nagha | granthakṛllokavikhyāto bhavitāsyajarāmaraḥ
भगवान् रुद्र ने साक्षात् उससे कहा, ‘हे निष्पाप, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ; तुम लोकविख्यात ग्रन्थकार, अजर और अमर होगे।’
श्लोक 90 (13.45.90)
शक्रेण तु पुरा देवो वाराणस्यां जनार्दन । आराधितोऽभूद्भक्तेन दिग्वासा भस्मगुण्ठितः । आराध्य स महादेवं देवराज्यमवाप्तवान् ॥
śakreṇa tu purā devo vārāṇasyāṃ janārdana | ārādhito'bhūdbhaktena digvāsā bhasmaguṇṭhitaḥ | ārādhya sa mahādevaṃ devarājyamavāptavān
पूर्वकाल में, हे जनार्दन, वाराणसी में भक्त शक्र ने दिशाओं को वस्त्र बनाए, भस्म लपेटे उन देव की आराधना की थी; उन महादेव की आराधना करके उसने देवराज्य पाया।
श्लोक 91 (13.45.91)
नारदेन तु भक्त्याऽसौ भव आराधितः पुरा । तस्य तुष्टो महादेवो जगौ देवगुरुर्गुरुः ॥
nāradena tu bhaktyā'sau bhava ārādhitaḥ purā | tasya tuṣṭo mahādevo jagau devagururguruḥ
नारद ने भी पूर्वकाल में भक्ति से भव की आराधना की थी। उनसे प्रसन्न होकर देवताओं के गुरु महादेव ने कहा:
महादेव उवाच
श्लोक 92 (13.45.92)
तेजसा तपसा कीर्त्या त्वत्समो न भविष्यति । गीतेन वादितव्येन नित्यं मामनुयास्यसि ॥
tejasā tapasā kīrtyā tvatsamo na bhaviṣyati | gītena vāditavyena nityaṃ māmanuyāsyasi
तेज, तप और कीर्ति में तुम्हारे समान कोई नहीं होगा; गीत और वाद्य के साथ तुम सदा मेरे पीछे चलोगे।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 93 (13.45.93)
बाणः स्कन्दसमत्वं च कामो दर्पविमोक्षणम् । लवणोऽवध्यतामन्यैर्दशास्यश्च पुनर्बलम् । अन्तकोऽन्तमनुप्राप्तस्तस्मात्कोऽन्यः परः प्रभुः ॥
bāṇaḥ skandasamatvaṃ ca kāmo darpavimokṣaṇam | lavaṇo'vadhyatāmanyairdaśāsyaśca punarbalam | antako'ntamanuprāptastasmātko'nyaḥ paraḥ prabhuḥ
बाण ने स्कन्द की समानता पाई; काम अपने दर्प से मुक्त हुआ; लवण दूसरों के लिए अवध्य हो गया; दशानन ने फिर बल पाया; और अन्तक को भी अन्त प्राप्त हुआ। तब उनसे बढ़कर दूसरा परम प्रभु कौन है?
श्लोक 94 (13.45.94)
मयाऽपि च यथा दृष्टो देवदेवः पुरा विभो । साक्षात्पशुपतिस्तात तच्चापि शृणु माधव ॥
mayā'pi ca yathā dṛṣṭo devadevaḥ purā vibho | sākṣātpaśupatistāta taccāpi śṛṇu mādhava
और हे विभो, मैंने भी पूर्वकाल में देवदेव को कैसे देखा, साक्षात् पशुपति को, हे प्रिय माधव, वह भी सुनो।
श्लोक 95 (13.45.95)
यदर्थं च मया देवः प्रयतेन तथा विभो । आराधितो महातेजास्तच्चापि शृणु विस्तरात् ॥
yadarthaṃ ca mayā devaḥ prayatena tathā vibho | ārādhito mahātejāstaccāpi śṛṇu vistarāt
और हे विभो, मैंने संयमपूर्वक किसलिए उन महातेजस्वी देव की आराधना की, वह भी विस्तार से सुनो।
श्लोक 96 (13.45.96)
यदवाप्तं च मे पूर्वं देवदेवान्महेश्वरात् । तत्सर्वं निखिलेनाद्य कथयिष्यामि तेऽनघ ॥
yadavāptaṃ ca me pūrvaṃ devadevānmaheśvarāt | tatsarvaṃ nikhilenādya kathayiṣyāmi te'nagha
देवदेव महेश्वर से मैंने पूर्वकाल में जो कुछ पाया, वह सब हे निष्पाप, आज मैं तुम्हें पूरा-पूरा सुनाऊँगा।
श्लोक 97 (13.45.97)
पुरा कृतयुगे तात ऋषिरासीन्महायशाः । व्याघ्रपाद इति ख्यातो वेदवेदाङ्गपारगः । तस्याहमभवं पुत्रो धौम्यश्चापि ममानुजः ॥
purā kṛtayuge tāta ṛṣirāsīnmahāyaśāḥ | vyāghrapāda iti khyāto vedavedāṅgapāragaḥ | tasyāhamabhavaṃ putro dhaumyaścāpi mamānujaḥ
प्रिय, पूर्वकाल में कृतयुग में व्याघ्रपाद नाम से प्रसिद्ध एक महायशस्वी ऋषि थे, जो वेद-वेदांग के पारगामी थे। मैं उनका पुत्र था और धौम्य मेरा छोटा भाई था।
श्लोक 98 (13.45.98)
कस्यचित्त्वथ कालस्य धौम्येन सह माधव । आगच्छमाश्रमं क्रीडन्मुनीनां भावितात्मनाम् ॥
kasyacittvatha kālasya dhaumyena saha mādhava | āgacchamāśramaṃ krīḍanmunīnāṃ bhāvitātmanām
कुछ समय बाद, हे माधव, मैं धौम्य के साथ खेलता हुआ शुद्ध अन्तःकरण वाले मुनियों के आश्रम में गया।
श्लोक 99 (13.45.99)
तत्रापि च मया दृष्टा दुह्यमाना पयस्विनी । लक्षितं च मया क्षीरं स्वादुतो ह्यमृतोपमम् ॥
tatrāpi ca mayā dṛṣṭā duhyamānā payasvinī | lakṣitaṃ ca mayā kṣīraṃ svāduto hyamṛtopamam
वहाँ भी मैंने एक दुधारू गाय को दुहते देखा, और मैंने जाना कि उसका दूध स्वाद में मीठा, अमृत के समान है।
श्लोक 100 (13.45.100)
तदाप्रभृति चैवाहमरुदं मधुसूदन । दीयतां दीयतां क्षीरं मम मातरितीरितम् ॥
tadāprabhṛti caivāhamarudaṃ madhusūdana | dīyatāṃ dīyatāṃ kṣīraṃ mama mātaritīritam
उसी दिन से, हे मधुसूदन, मैं रोता रहता और कहता, ‘माँ, मुझे दूध दो, दूध दो!’
श्लोक 101 (13.45.101)
अभावाच्चैव दुग्धस्य दुःखिता जननी तदा ॥
abhāvāccaiva dugdhasya duḥkhitā jananī tadā
और दूध न होने से मेरी माता उस समय दुःखी हुई।
श्लोक 102 (13.45.102)
ततः पिष्टं समालोड्य तोयेन सह माधव । आवयोः क्षीरमित्येव पानार्थं समुपानयत् ॥
tataḥ piṣṭaṃ samāloḍya toyena saha mādhava | āvayoḥ kṣīramityeva pānārthaṃ samupānayat
तब, हे माधव, वह आटे को पानी में घोलकर ‘यह दूध है’ कहकर हम दोनों के पीने के लिए ले आई।
श्लोक 103 (13.45.103)
अथ गव्यं पयस्तात कदाचित्प्राशितं मया ॥
atha gavyaṃ payastāta kadācitprāśitaṃ mayā
फिर, प्रिय, एक बार मैंने गाय का दूध पी लिया।
श्लोक 104 (13.45.104)
पित्राऽहं यज्ञकाले हि नीतो ज्ञातिकुलं महत् । तत्र सा क्षरते देवी दिव्या गौः सुरनन्दिनी ॥
pitrā'haṃ yajñakāle hi nīto jñātikulaṃ mahat | tatra sā kṣarate devī divyā gauḥ suranandinī
यज्ञ के समय पिता मुझे एक बड़े ज्ञातिकुल में ले गए। वहाँ देवताओं को आनन्द देने वाली वह दिव्य गौ दूध दे रही थी।
श्लोक 105 (13.45.105)
तस्याहं तत्पयः पीत्वा रसेन ह्यमृतोपमम् । ज्ञात्वा क्षीरगुणांश्चैव उपलभ्य हि सम्भवम् । स च पिष्टरसस्तात न मे प्रीतिमुपावहत् ॥
tasyāhaṃ tatpayaḥ pītvā rasena hyamṛtopamam | jñātvā kṣīraguṇāṃścaiva upalabhya hi sambhavam | sa ca piṣṭarasastāta na me prītimupāvahat
अमृत जैसे रस वाला वह दूध पीकर, दूध के गुणों को जानकर और उसके उद्गम को समझकर, हे प्रिय, उस आटे के घोल से मुझे कोई प्रसन्नता नहीं हुई।
श्लोक 106 (13.45.106)
ततोऽहमब्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तदा । नेदं क्षीरोदनं मातर्यत्त्वं मे दत्तवत्यसि ॥
tato'hamabruvaṃ bālyājjananīmātmanastadā | nedaṃ kṣīrodanaṃ mātaryattvaṃ me dattavatyasi
तब बचपन के कारण मैंने अपनी माता से कहा, ‘माँ, तुमने जो मुझे दिया है, यह दूध-भात नहीं है।’
श्लोक 107 (13.45.107)
ततो मामब्रवीन्माता दुःखशोकसमन्विता । पुत्रस्नेहात्परिष्वज्य मूर्ध्नि चाघ्राय माधव ॥
tato māmabravīnmātā duḥkhaśokasamanvitā | putrasnehātpariṣvajya mūrdhni cāghrāya mādhava
तब दुःख और शोक से भरी माता ने पुत्रस्नेह से मुझे गले लगाया और, हे माधव, मेरा मस्तक सूँघकर मुझसे कहा:
मातोवाच
श्लोक 108 (13.45.108)
कुतः क्षीरोदनं वत्स मुनीनां भावितात्मनाम् । वने निवसतां नित्यं कन्दमूलफलाशिनाम् ॥
kutaḥ kṣīrodanaṃ vatsa munīnāṃ bhāvitātmanām | vane nivasatāṃ nityaṃ kandamūlaphalāśinām
बेटा, वन में सदा रहने वाले, कन्द-मूल-फल खाने वाले शुद्धात्मा मुनियों के पास दूध-भात कहाँ से आए,
श्लोक 109 (13.45.109)
आस्थितानां नदीं दिव्यां वालखिल्यैर्निषेविताम् । कुतः क्षीरं वनस्थानां मुनीनां गिरिवासिनाम् ॥
āsthitānāṃ nadīṃ divyāṃ vālakhilyairniṣevitām | kutaḥ kṣīraṃ vanasthānāṃ munīnāṃ girivāsinām
जो दिव्य नदी के तट पर, जहाँ वालखिल्य रहते हैं, बसे हैं? वनवासी, पर्वतवासी मुनियों के लिए दूध कहाँ से आए,
श्लोक 110 (13.45.110)
पावनानां वनाशानां वनाश्रमनिवासिनाम् । ग्राम्याहारनिवृत्तानामारण्यफलभोजिनाम् । नास्ति पुत्र पयोऽरण्ये सुरभीगोत्रवर्जिते ॥
pāvanānāṃ vanāśānāṃ vanāśramanivāsinām | grāmyāhāranivṛttānāmāraṇyaphalabhojinām | nāsti putra payo'raṇye surabhīgotravarjite
जो पवित्र हैं, वन का आहार करते हैं, वनाश्रमों में रहते हैं, ग्राम के आहार से निवृत्त हैं और जंगली फल खाते हैं? बेटा, जिस वन में सुरभि की सन्तान नहीं, वहाँ दूध नहीं है।
श्लोक 111 (13.45.111)
नदीगह्वरशैलेषु तीर्थेषु विविधेषु च । तपसा जप्यनित्यानां शिवो नः परमा गतिः ॥
nadīgahvaraśaileṣu tīrtheṣu vividheṣu ca | tapasā japyanityānāṃ śivo naḥ paramā gatiḥ
नदी की गुफाओं, पर्वतों और अनेक तीर्थों में तप और जप में सदा लगे रहने वाले हम लोगों की परम गति शिव हैं।
श्लोक 112 (13.45.112)
अप्रसाद्य विरूपाक्षं वरदं स्थाणुमव्ययम् । कुतः क्षीरोदनं वत्स सुखानि वसनानि च ॥
aprasādya virūpākṣaṃ varadaṃ sthāṇumavyayam | kutaḥ kṣīrodanaṃ vatsa sukhāni vasanāni ca
वर देने वाले, अविनाशी स्थाणु विरूपाक्ष को प्रसन्न किए बिना, बेटा, दूध-भात, सुख और वस्त्र कहाँ से मिलें?
श्लोक 113 (13.45.113)
तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् । तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥
taṃ prapadya sadā vatsa sarvabhāvena śaṅkaram | tatprasādācca kāmebhyaḥ phalaṃ prāpsyasi putraka
बेटा, सदा पूरे भाव से उन्हीं शंकर की शरण लो; उनकी कृपा से तुम्हें अपनी सब कामनाओं का फल मिलेगा।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 114 (13.45.114)
जनन्यास्तद्वचः श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा इदमम्बामचोदयम् ॥
jananyāstadvacaḥ śrutvā tadāprabhṛti śatruhan | prāñjaliḥ praṇato bhūtvā idamambāmacodayam
माता के वे वचन सुनकर, हे शत्रुहन्ता, उसी दिन से मैंने हाथ जोड़कर, प्रणाम करके अपनी माता से यह कहा:
श्लोक 115 (13.45.115)
कोऽयमम्ब महादेवः स कथं च प्रसीदति । कुत्र वा वसते देवो द्रष्टव्यो वा कथञ्चन ॥
ko'yamamba mahādevaḥ sa kathaṃ ca prasīdati | kutra vā vasate devo draṣṭavyo vā kathañcana
माँ, ये महादेव कौन हैं, और वे कैसे प्रसन्न होते हैं? वे देव कहाँ रहते हैं, या उनके दर्शन किस प्रकार होते हैं?
श्लोक 116 (13.45.116)
तुष्यते वा कथं शर्वो रूपं तस्य च कीदृशम् । कथं ज्ञेयः प्रसन्नो वा दर्शयेज्जननी मम ॥
tuṣyate vā kathaṃ śarvo rūpaṃ tasya ca kīdṛśam | kathaṃ jñeyaḥ prasanno vā darśayejjananī mama
शर्व कैसे प्रसन्न होते हैं, और उनका रूप कैसा है? उन्हें कैसे जाना जाए, और प्रसन्न होने पर वे कैसे दिखाई दें? यह मेरी माता मुझे दिखाएँ।
श्लोक 117 (13.45.117)
एवमुक्ता तदा कृष्ण माता मे सुतवत्सला । मूर्धन्याघ्राय गोविन्द सबाष्पाकुललोचना ॥
evamuktā tadā kṛṣṇa mātā me sutavatsalā | mūrdhanyāghrāya govinda sabāṣpākulalocanā
हे कृष्ण, ऐसा कहे जाने पर पुत्र-वत्सला मेरी माता ने, हे गोविन्द, आँसुओं से भरी आँखों से मेरा मस्तक सूँघा,
श्लोक 118 (13.45.118)
प्रमार्जन्ती च गात्राणि मम वै मधुसूदन । दैन्यमालम्ब्य जननी इदमाह सुरोत्तम ॥
pramārjantī ca gātrāṇi mama vai madhusūdana | dainyamālambya jananī idamāha surottama
और, हे मधुसूदन, मेरे अंगों को पोंछती हुई, दीनता में डूबकर मेरी माता ने, हे सुरश्रेष्ठ, यह कहा।
मातोवाच
श्लोक 119 (13.45.119)
दुर्विज्ञेयो महादेवो दुराधारो दुरन्तकः । दुराबाधश्च दुर्ग्राह्यो दुर्दृश्यो ह्यकृतात्मभिः ॥
durvijñeyo mahādevo durādhāro durantakaḥ | durābādhaśca durgrāhyo durdṛśyo hyakṛtātmabhiḥ
महादेव को जानना कठिन है, धारण करना कठिन है, उनका अन्त पाना कठिन है, उन्हें रोकना कठिन है, ग्रहण करना कठिन है, और अपरिपक्व आत्मा वालों के लिए उनका दर्शन कठिन है।
श्लोक 120 (13.45.120)
यस्य रूपाण्यनेकानि प्रवदन्ति मनीषिणः । स्थानानि च विचित्राणि प्रासादाश्चाप्यनेकशः ॥
yasya rūpāṇyanekāni pravadanti manīṣiṇaḥ | sthānāni ca vicitrāṇi prāsādāścāpyanekaśaḥ
ज्ञानी लोग उनके अनेक रूपों, अद्भुत स्थानों और असंख्य प्रासादों का वर्णन करते हैं।
श्लोक 121 (13.45.121)
को हि तत्त्वेन तद्वेद ईशस्य चरितं शुभम् । कृतवान्यानि रूपाणि देवदेवः पुरा किल । क्रीडते च तथा शर्वः प्रसीदति यथा च वै ॥
ko hi tattvena tadveda īśasya caritaṃ śubham | kṛtavānyāni rūpāṇi devadevaḥ purā kila | krīḍate ca tathā śarvaḥ prasīdati yathā ca vai
ईश के शुभ चरित्र को, देवदेव ने पूर्वकाल में जो-जो रूप धारण किए, और शर्व कैसे क्रीड़ा करते और कैसे प्रसन्न होते हैं, इन्हें यथार्थ रूप से कौन जानता है?
श्लोक 122 (13.45.122)
हृदिस्थः सर्वभूतानां विश्वरूपो महेश्वरः । भक्तानामनुकम्पार्थं दर्शनं च यथाश्रुतम् । मुनीनां ब्रुवतां दिव्यमीशानचरितं शुभम् ॥
hṛdisthaḥ sarvabhūtānāṃ viśvarūpo maheśvaraḥ | bhaktānāmanukampārthaṃ darśanaṃ ca yathāśrutam | munīnāṃ bruvatāṃ divyamīśānacaritaṃ śubham
विश्वरूप महेश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहते हैं। भक्तों पर दया करके वे दर्शन देते हैं, जैसा सुना गया है; और मुनिगण ईशान के दिव्य और शुभ चरित्र का वर्णन करते हैं।
श्लोक 123 (13.45.123)
कृतवान्यानि रूपाणि कथितानि दिवौकसैः । अनुग्रहार्थं विप्राणां शृणु वत्स समासतः ॥
kṛtavānyāni rūpāṇi kathitāni divaukasaiḥ | anugrahārthaṃ viprāṇāṃ śṛṇu vatsa samāsataḥ
बेटा, ब्राह्मणों पर कृपा करने के लिए उन्होंने जो रूप धारण किए, जैसे देवताओं ने बताए हैं, उन्हें संक्षेप में सुनो।
श्लोक 124 (13.45.124)
तानि ते कीर्तयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥
tāni te kīrtayiṣyāmi yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi
तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, उन्हें मैं तुम्हें सुनाऊँगी।
श्लोक 125 (13.45.125)
ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणां रुद्रादित्याश्विनामपि । विश्वेषामपि देवानां वपुर्धारयते भवः ॥
brahmaviṣṇusurendrāṇāṃ rudrādityāśvināmapi | viśveṣāmapi devānāṃ vapurdhārayate bhavaḥ
भव ब्रह्मा, विष्णु, देवेन्द्रों, रुद्रों, आदित्यों, अश्विनों और सब विश्वेदेवों का शरीर धारण करते हैं;
श्लोक 126 (13.45.126)
नराणां देवनारीणां तथा प्रेतपिशाचयोः । किरातशबराणां च जलजानामनेकशः ॥
narāṇāṃ devanārīṇāṃ tathā pretapiśācayoḥ | kirātaśabarāṇāṃ ca jalajānāmanekaśaḥ
मनुष्यों, देवांगनाओं, प्रेतों और पिशाचों, किरातों और शबरों तथा अनेक प्रकार के जलचरों का;
श्लोक 127 (13.45.127)
करोति भगवान्रूपमाटव्यशबराण्यपि । कूर्मो मत्स्यस्तथा शङ्खः प्रवालाङ्कुरभूषणः ॥
karoti bhagavānrūpamāṭavyaśabarāṇyapi | kūrmo matsyastathā śaṅkhaḥ pravālāṅkurabhūṣaṇaḥ
भगवान् वनवासी शबरों का भी रूप धारण करते हैं; वे कछुआ, मछली और शंख हैं, मूँगे के अंकुरों से सजे हुए;
श्लोक 128 (13.45.128)
यक्षराक्षससर्पाणां दैत्यदानवयोरपि । वपुर्धारयते देवो भूयश्च बिलवासिनाम् ॥
yakṣarākṣasasarpāṇāṃ daityadānavayorapi | vapurdhārayate devo bhūyaśca bilavāsinām
देव यक्षों, राक्षसों और सर्पों, दैत्यों और दानवों का शरीर धारण करते हैं, और बिलों में रहने वालों का भी;
श्लोक 129 (13.45.129)
व्याघ्रसिंहमृगाणां च तरक्ष्वृक्षपतत्त्रिणाम् । उलूकश्वशृगालानां रूपाणि कुरुतेऽपि च ॥
vyāghrasiṃhamṛgāṇāṃ ca tarakṣvṛkṣapatattriṇām | ulūkaśvaśṛgālānāṃ rūpāṇi kurute'pi ca
वे बाघ, सिंह और मृगों, तरक्षु, रीछ और पक्षियों, तथा उल्लू, कुत्तों और सियारों के रूप भी लेते हैं;
श्लोक 130 (13.45.130)
हंसकाकमयूराणां कृकलासकसारसाम् । रूपाणि च बलाकानां गृध्रचक्राङ्गयोरपि ॥
haṃsakākamayūrāṇāṃ kṛkalāsakasārasām | rūpāṇi ca balākānāṃ gṛdhracakrāṅgayorapi
हंस, कौए और मोर, गिरगिट और सारस, बगुले, गिद्ध और चक्रवाक के रूप भी;
श्लोक 131 (13.45.131)
करोति वा स रूपाणि धारयत्यपि पर्वतम् । गोरूपं च महादेवो हस्त्यश्वोष्ट्रखराकृतिः ॥
karoti vā sa rūpāṇi dhārayatyapi parvatam | gorūpaṃ ca mahādevo hastyaśvoṣṭrakharākṛtiḥ
वे ऐसे रूप धारण करते हैं और पर्वत को भी धारण करते हैं; महादेव गाय, हाथी, घोड़ा, ऊँट और गधे का आकार भी लेते हैं;
श्लोक 132 (13.45.132)
छागशार्दूलरूपश्च अनेकमृगरूपधृक् । अण्डजानां च दिव्यानां वपुर्धारयते भवः ॥
chāgaśārdūlarūpaśca anekamṛgarūpadhṛk | aṇḍajānāṃ ca divyānāṃ vapurdhārayate bhavaḥ
वे बकरे और बाघ का रूप धरते हैं, अनेक पशुओं के रूप धारण करते हैं; भव अण्डों से उत्पन्न दिव्य प्राणियों का शरीर भी धारण करते हैं;
श्लोक 133 (13.45.133)
दण्डी छत्री च कुण्डी च द्विजानां वारणस्तथा । षण्मुखो वै बहुमुखस्त्रिनेत्रो बहुशीर्षकः ॥
daṇḍī chatrī ca kuṇḍī ca dvijānāṃ vāraṇastathā | ṣaṇmukho vai bahumukhastrinetro bahuśīrṣakaḥ
वे दण्ड, छत्र और कमण्डलु धारण करने वाले हैं, ब्राह्मणों के रक्षक हैं; छह मुख वाले, बहुत मुख वाले, तीन नेत्रों वाले और बहुत शिरों वाले हैं;
श्लोक 134 (13.45.134)
अनेककटिपादश्च अनेकोदरवक्त्रधृत् । अनेकपाणिपार्श्वश्च अनेकगणसंवृतः ॥
anekakaṭipādaśca anekodaravaktradhṛt | anekapāṇipārśvaśca anekagaṇasaṃvṛtaḥ
अनेक कटि और पैरों वाले, अनेक उदर और मुखों वाले, अनेक हाथों और पार्श्वों वाले तथा अनेक गणों से घिरे हुए हैं;
श्लोक 135 (13.45.135)
ऋषिगन्धर्वरूपश्च सिद्धचारणरूपधृत् । भस्मपाण्डुरगात्रश्च चन्द्रार्धकृतभूषणः ॥
ṛṣigandharvarūpaśca siddhacāraṇarūpadhṛt | bhasmapāṇḍuragātraśca candrārdhakṛtabhūṣaṇaḥ
वे ऋषियों और गन्धर्वों, सिद्धों और चारणों का रूप धारण करते हैं; उनका शरीर भस्म से पाण्डुर है और अर्धचन्द्र उनका आभूषण है;
श्लोक 136 (13.45.136)
अनेकरावसंघुष्टश्चानेकस्तुतिसंस्कृतः । सर्वभूतान्तकः सर्वः सर्वलोकप्रतिष्ठितः ॥
anekarāvasaṃghuṣṭaścānekastutisaṃskṛtaḥ | sarvabhūtāntakaḥ sarvaḥ sarvalokapratiṣṭhitaḥ
वे अनेक ध्वनियों से गूँजते हैं, अनेक स्तुतियों से सुसज्जित हैं, समस्त प्राणियों के अन्तक हैं, स्वयं सब कुछ हैं और सब लोक उन्हीं में प्रतिष्ठित हैं;
श्लोक 137 (13.45.137)
सर्वलोकान्तरात्मा च सर्वगः सर्ववाद्यपि । सर्वत्र भगवान्ज्ञेयो हृदिस्थः सर्वदेहिनाम् ॥
sarvalokāntarātmā ca sarvagaḥ sarvavādyapi | sarvatra bhagavānjñeyo hṛdisthaḥ sarvadehinām
वे सब लोकों के अन्तरात्मा हैं, सर्वत्र जाने वाले हैं और सबमें बोलने वाले हैं। भगवान् को सर्वत्र ही जानना चाहिए; वे सब देहधारियों के हृदय में रहते हैं।
श्लोक 138 (13.45.138)
यो हि यं कामयेत्कामं यस्मिन्नर्थेऽर्च्यते पुनः । तत्सर्वं वेत्ति देवेशस्तं प्रपद्य यदीच्छसि ॥
yo hi yaṃ kāmayetkāmaṃ yasminnarthe'rcyate punaḥ | tatsarvaṃ vetti deveśastaṃ prapadya yadīcchasi
जो जिस कामना को चाहता है और जिस प्रयोजन से उनकी पूजा करता है, वह सब देवेश जानते हैं। यदि तुम कुछ चाहते हो तो उन्हीं की शरण लो।
श्लोक 139 (13.45.139)
नन्दते कुप्यते चापि तथा हुंकारयत्यपि । चक्री शूली गदापाणिर्मुसली खड्गपट्टसी ॥
nandate kupyate cāpi tathā huṃkārayatyapi | cakrī śūlī gadāpāṇirmusalī khaḍgapaṭṭasī
वे प्रसन्न होते हैं, क्रोध करते हैं, हुंकार भी करते हैं; वे चक्र, त्रिशूल, गदा, मूसल, खड्ग और पट्टस धारण करने वाले हैं;
श्लोक 140 (13.45.140)
भूधरो नागमौञ्जी च नागकुण्डलकुण्डली । नागयज्ञोपवीती च नागचर्मोत्तरच्छदः ॥
bhūdharo nāgamauñjī ca nāgakuṇḍalakuṇḍalī | nāgayajñopavītī ca nāgacarmottaracchadaḥ
वे पर्वतों को धारण करने वाले हैं; नाग की मेखला और नागकुण्डल पहने हैं, नाग को यज्ञोपवीत बनाए हैं और गजचर्म को उत्तरीय बनाए हैं;
श्लोक 141 (13.45.141)
हसते गायते चैव नृत्यते च मनोहरम् । वादयत्यपि वाद्यानि विचित्राणि गणैर्युतः ॥
hasate gāyate caiva nṛtyate ca manoharam | vādayatyapi vādyāni vicitrāṇi gaṇairyutaḥ
वे हँसते, गाते और मनोहर नृत्य करते हैं, और अपने गणों के साथ अनेक प्रकार के वाद्य बजाते हैं।
श्लोक 142 (13.45.142)
वल्गते जृम्भते चैव रुदते रोदयत्यपि । उन्मत्तमत्तरूपं च भाषते चापि सुस्वरः ॥
valgate jṛmbhate caiva rudate rodayatyapi | unmattamattarūpaṃ ca bhāṣate cāpi susvaraḥ
वे उछलते हैं और जम्हाई लेते हैं, स्वयं रोते हैं और दूसरों को भी रुलाते हैं; उन्मत्त और मतवाले का रूप धरकर मधुर स्वर में बोलते भी हैं।
श्लोक 143 (13.45.143)
अतीव हसते रौद्रस्त्रासयन्नयनैर्जनम् । जागर्ति चैव स्वपिति जृम्भते च यथासुखम् ॥
atīva hasate raudrastrāsayannayanairjanam | jāgarti caiva svapiti jṛmbhate ca yathāsukham
वे रौद्र रूप में खूब ठहाका लगाते हैं और अपनी आँखों से लोगों को डराते हैं; वे अपनी इच्छा से जागते हैं, सोते हैं और जम्हाई लेते हैं।
श्लोक 144 (13.45.144)
जपते जप्यते चैव तपते तप्यते पुनः । ददाति प्रतिगृह्णाति युञ्जते ध्यायतेऽपि च ॥
japate japyate caiva tapate tapyate punaḥ | dadāti pratigṛhṇāti yuñjate dhyāyate'pi ca
वे जप करते हैं और स्वयं ही जपे जाने योग्य भी हैं; तप करते हैं और स्वयं ही तप का विषय भी हैं; वे देते हैं और ग्रहण भी करते हैं; योग साधते हैं और ध्यान भी करते हैं।
श्लोक 145 (13.45.145)
वेदीमध्ये तथा यूपे गोष्ठमध्ये हुताशने । दृश्यते दृश्यते चापि बालो वृद्धो युवा तथा ॥
vedīmadhye tathā yūpe goṣṭhamadhye hutāśane | dṛśyate dṛśyate cāpi bālo vṛddho yuvā tathā
वे यज्ञवेदी के मध्य में, यज्ञस्तम्भ पर, गोशाला के बीच और अग्नि में दिखाई देते हैं; और कभी बालक, कभी वृद्ध तथा कभी युवा के रूप में दिखते हैं।
श्लोक 146 (13.45.146)
क्रीडते ऋषिकन्याभिर्ऋषिपत्नीभिरेव च । ऊर्ध्वकेशो महाशेफो नग्नो विकृतलोचनः ॥
krīḍate ṛṣikanyābhirṛṣipatnībhireva ca | ūrdhvakeśo mahāśepho nagno vikṛtalocanaḥ
वे ऋषियों की कन्याओं और ऋषियों की पत्नियों के साथ क्रीड़ा करते हैं; उनके केश ऊपर की ओर उठे हैं, वे विशाल लिंगवाले, नग्न और विकृत नेत्रोंवाले हैं।
श्लोक 147 (13.45.147)
गौरः श्यामस्तथा कृष्णः पाण्डुरो धूमलोहितः । विकृताक्षो विशालाक्षो दिग्वासाः सर्ववासकः ॥
gauraḥ śyāmastathā kṛṣṇaḥ pāṇḍuro dhūmalohitaḥ | vikṛtākṣo viśālākṣo digvāsāḥ sarvavāsakaḥ
वे गोरे, साँवले, काले, पीले और धूम्र-लोहित वर्ण के हैं; कभी विकृत नेत्रोंवाले, कभी विशाल नेत्रोंवाले; दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं और फिर भी वे सब वस्त्र धारण करनेवाले हैं।
श्लोक 148 (13.45.148)
अरूपस्याद्यरूपस्य अतिरूपाद्यरूपिणः । अनाद्यन्तमजस्यान्तं वेत्स्यते कोस्य तत्त्वतः ॥
arūpasyādyarūpasya atirūpādyarūpiṇaḥ | anādyantamajasyāntaṃ vetsyate kosya tattvataḥ
वे अरूप हैं, फिर भी आदि रूपवाले हैं; रूप से परे हैं, फिर भी आदि रूप धारण करनेवाले हैं; वे अनादि, अनन्त और अजन्मा हैं। उनके तत्त्व को, उनके अन्त को कौन जान सकेगा?
श्लोक 149 (13.45.149)
हृदि प्राणो मनो जीवो योगात्मा योगसंज्ञितः । ध्यानं तत्परमात्मा च भावग्राह्यो महेश्वरः ॥
hṛdi prāṇo mano jīvo yogātmā yogasaṃjñitaḥ | dhyānaṃ tatparamātmā ca bhāvagrāhyo maheśvaraḥ
हृदय में वे प्राण, मन और जीव हैं; वे योगात्मा हैं और योग नाम से जाने जाते हैं; वे ध्यान हैं और परमात्मा हैं; महेश्वर भाव से, भक्ति से ही ग्रहण किए जा सकते हैं।
श्लोक 150 (13.45.150)
वादको गायनश्चैव सहस्रशतलोचनः । एकवक्त्रो द्विवक्त्रश्च त्रिवक्त्रोऽनेकवक्त्रकः ॥
vādako gāyanaścaiva sahasraśatalocanaḥ | ekavaktro dvivaktraśca trivaktro'nekavaktrakaḥ
वे वाद्य बजाते और गाते हैं; उनके लाखों नेत्र हैं; वे एक मुखवाले, दो मुखवाले, तीन मुखवाले और अनेक मुखवाले हैं।
श्लोक 151 (13.45.151)
तद्भक्तस्तद्गतो नित्यं तन्निष्ठस्तत्परायणः । भज पुत्र महादेवं ततः प्राप्स्यसि चेप्सितं ॥
tadbhaktastadgato nityaṃ tanniṣṭhastatparāyaṇaḥ | bhaja putra mahādevaṃ tataḥ prāpsyasi cepsitaṃ
उसके भक्त बनो, उसी की शरण में जाओ, सदा उसी में स्थिर रहो और उसी को परम आश्रय मानो। पुत्र, महादेव की उपासना करो; तब तुम अपनी इच्छित वस्तु पाओगे।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 152 (13.45.152)
जनन्यास्तद्वचः श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् । मम भक्तिर्महादेवे नैष्ठिकी समपद्यत ॥
jananyāstadvacaḥ śrutvā tadāprabhṛti śatruhan | mama bhaktirmahādeve naiṣṭhikī samapadyata
हे शत्रुसंहारक, माता की यह बात सुनकर उसी दिन से महादेव में मेरी भक्ति अटल हो गई।
श्लोक 153 (13.45.153)
ततोऽहं तप आस्थाय तोषयामास शंकरम् । दिव्यं वर्षसहस्रं तु वामाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥
tato'haṃ tapa āsthāya toṣayāmāsa śaṃkaram | divyaṃ varṣasahasraṃ tu vāmāṅguṣṭhāgraviṣṭhitaḥ
तब मैंने तप का आश्रय लिया और बाएँ पैर के अँगूठे के अग्रभाग पर खड़े होकर एक दिव्य सहस्र वर्ष तक शंकर को प्रसन्न किया।
श्लोक 154 (13.45.154)
एकं वर्षशतं चैव फलाहारस्ततोऽभवम् । द्वितीयं शीर्णपर्णाशी तृतीयं चाम्बुभोजनः ॥
ekaṃ varṣaśataṃ caiva phalāhārastato'bhavam | dvitīyaṃ śīrṇaparṇāśī tṛtīyaṃ cāmbubhojanaḥ
पहले सौ वर्ष मैं फल खाकर रहा; दूसरे सौ वर्ष सूखे झड़े पत्ते खाकर; और तीसरे सौ वर्ष केवल जल पीकर।
श्लोक 155 (13.45.155)
शतानि सप्त चैवाहं वायुभक्षस्तदाऽभवम् । एकं वर्षसहस्रं तु दिव्यमाराधितो मया ॥
śatāni sapta caivāhaṃ vāyubhakṣastadā'bhavam | ekaṃ varṣasahasraṃ tu divyamārādhito mayā
फिर सात सौ वर्ष मैं केवल वायु पीकर रहा। इस प्रकार मैंने एक दिव्य सहस्र वर्ष तक उनकी आराधना की।
श्लोक 156 (13.45.156)
ततस्तुष्टो महादेवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः । एकभक्त इति ज्ञात्वा जिज्ञासां कुरुते तदा ॥
tatastuṣṭo mahādevaḥ sarvalokeśvaraḥ prabhuḥ | ekabhakta iti jñātvā jijñāsāṃ kurute tadā
तब सब लोकों के स्वामी महादेव प्रसन्न हुए; और यह जानकर कि मैं केवल उन्हीं का भक्त हूँ, उन्होंने मेरी परीक्षा लेने का निश्चय किया।
श्लोक 157 (13.45.157)
शक्ररूपं स कृत्वा तु सर्वैर्देवगणैर्वृतः । सहस्राक्षस्तदा भूत्वा वज्रपाणिर्महायशाः ॥
śakrarūpaṃ sa kṛtvā tu sarvairdevagaṇairvṛtaḥ | sahasrākṣastadā bhūtvā vajrapāṇirmahāyaśāḥ
शक्र का रूप धारण करके, समस्त देवगणों से घिरे हुए, वे सहस्र नेत्रोंवाले, हाथ में वज्र लिए हुए महायशस्वी इन्द्र बन गए,
श्लोक 158 (13.45.158)
सुधावदातं रक्ताक्षं स्तब्धकर्णं मदोत्कटम् । आवेष्टितकरं घोरं चतुर्दंष्ट्रं महागजम् ॥
sudhāvadātaṃ raktākṣaṃ stabdhakarṇaṃ madotkaṭam | āveṣṭitakaraṃ ghoraṃ caturdaṃṣṭraṃ mahāgajam
और अमृत के समान उजले, लाल नेत्रोंवाले, तने हुए कानोंवाले, मदमस्त, सूँड़ समेटे हुए, भयंकर और चार दाँतोंवाले एक विशाल हाथी पर बैठे हुए,
श्लोक 159 (13.45.159)
समास्थितः स भगवान्दीप्यमानः स्वतेजसा । आजगाम किरीटी तु हारकेयूरभूषितः ॥
samāsthitaḥ sa bhagavāndīpyamānaḥ svatejasā | ājagāma kirīṭī tu hārakeyūrabhūṣitaḥ
अपने ही तेज से दमकते हुए वे भगवान् मुकुट पहने, हार और बाजूबन्दों से सजे हुए आ पहुँचे —
श्लोक 160 (13.45.160)
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि । सेव्यमानोप्सरोभिश्च दिव्यगन्धर्वनादितः ॥
pāṇḍureṇātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani | sevyamānopsarobhiśca divyagandharvanāditaḥ
उनके सिर पर श्वेत छत्र तना हुआ था, अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं और दिव्य गन्धर्व उनके आगमन को गुँजा रहे थे।
श्लोक 161 (13.45.161)
ततो मामाह देवेन्द्रस्तुष्टस्तेऽहं द्विजोत्तम । वरं वृणीष्व मत्तस्त्वं यत्ते मनसि वर्तते ॥
tato māmāha devendrastuṣṭaste'haṃ dvijottama | varaṃ vṛṇīṣva mattastvaṃ yatte manasi vartate
तब देवराज ने मुझसे कहा, "हे द्विजश्रेष्ठ, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मन में जो भी हो, वह वर मुझसे माँगो।"
श्लोक 162 (13.45.162)
शक्रस्य तु वचः श्रुत्वा नाहं प्रीतमनाऽभवम् । अब्रवं च तदा कृष्ण देवराजमिदं वचः ॥
śakrasya tu vacaḥ śrutvā nāhaṃ prītamanā'bhavam | abravaṃ ca tadā kṛṣṇa devarājamidaṃ vacaḥ
शक्र की बात सुनकर मेरा मन प्रसन्न नहीं हुआ; और हे कृष्ण, तब मैंने देवराज से यह कहा —
श्लोक 163 (13.45.163)
नाहं त्वत्तो वरं काङ्क्षे नान्यस्मादपि दैवतात् । महादेवादृते सौम्य सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
nāhaṃ tvatto varaṃ kāṅkṣe nānyasmādapi daivatāt | mahādevādṛte saumya satyametadbravīmi te
"हे सौम्य, मैं महादेव को छोड़कर न तुमसे, न किसी अन्य देवता से वर चाहता हूँ। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।
श्लोक 164 (13.45.164)
सत्यंसत्यं हि नः शक्र वाक्यमेतत्सुनिश्चितम् । न यन्महेश्वरं मुक्त्वा कथाऽन्या मम रोचते ॥
satyaṃsatyaṃ hi naḥ śakra vākyametatsuniścitam | na yanmaheśvaraṃ muktvā kathā'nyā mama rocate
हे शक्र, यह हमारा वचन सर्वथा सत्य और भली-भाँति निश्चित है कि महेश्वर को छोड़कर कोई अन्य कथा मुझे नहीं रुचती।
श्लोक 165 (13.45.165)
पशुपतिवचनाद्भवामि सद्यः । कृमिरथवा तरुरप्यनेकशाखः । अपशुपतिवरप्रसादजा मे । त्रिभुवनराज्यविभूतिरप्यनिष्टा ॥
paśupativacanādbhavāmi sadyaḥ | kṛmirathavā tarurapyanekaśākhaḥ | apaśupativaraprasādajā me | tribhuvanarājyavibhūtirapyaniṣṭā
पशुपति के कहने पर मैं तुरन्त कीड़ा अथवा अनेक शाखाओंवाला वृक्ष भी बन जाऊँ; पर पशुपति से भिन्न किसी के वरदान से मिली तीनों लोकों के राज्य की विभूति भी मुझे अनिष्ट है।
श्लोक 166 (13.45.166)
जन्मश्वपाकमध्येऽ- । पि मेऽस्तु हरचरणवन्दनरतस्य । मा वाऽनीश्वरभक्तो । भवानि भवनेऽपि शक्रस्य ॥
janmaśvapākamadhye'- | pi me'stu haracaraṇavandanaratasya | mā vā'nīśvarabhakto | bhavāni bhavane'pi śakrasya
हर के चरणों की वन्दना में लगा रहूँ तो मेरा जन्म चाण्डालों के बीच भी हो जाए; पर शक्र के भवन में भी मैं ईश्वर का अभक्त न बनूँ।
श्लोक 167 (13.45.167)
वाय्वम्बुभुजोऽपि सतो । नरस्य दुःखक्षयः कुतस्तस्य । भवति हि सुरासुरगुरौ । यस्य न विश्वेश्वरे भक्तिः ॥
vāyvambubhujo'pi sato | narasya duḥkhakṣayaḥ kutastasya | bhavati hi surāsuragurau | yasya na viśveśvare bhaktiḥ
जिस मनुष्य की सुर-असुरों के गुरु विश्वेश्वर में भक्ति नहीं है, वह वायु और जल पर ही क्यों न जीता हो, उसके दुःख का अन्त कहाँ से होगा?
श्लोक 168 (13.45.168)
अलमन्याभिस्तेषां । कथाभिरप्यन्यधर्मयुक्ताभिः । येषां न क्षणमपि रुचितो । हरचरणस्मरणविच्छेदः ॥
alamanyābhisteṣāṃ | kathābhirapyanyadharmayuktābhiḥ | yeṣāṃ na kṣaṇamapi rucito | haracaraṇasmaraṇavicchedaḥ
जिन्हें हर के चरणों के स्मरण में एक क्षण का भी विच्छेद नहीं सुहाता, उनके लिए अन्य धर्मों से युक्त दूसरी कथाएँ भी बस हैं — वे व्यर्थ हैं।
श्लोक 169 (13.45.169)
हरचरणनिरतमतिना । भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य । संसारभयं न भवति । हरभक्तिरसायनं पीत्वा ॥
haracaraṇaniratamatinā | bhavitavyamanārjavaṃ yugaṃ prāpya | saṃsārabhayaṃ na bhavati | harabhaktirasāyanaṃ pītvā
इस कुटिल युग को पाकर मनुष्य को हर के चरणों में मन लगाए रखना चाहिए; क्योंकि हर-भक्ति का रसायन पी लेने पर संसार का भय नहीं रहता।
श्लोक 170 (13.45.170)
दिवसं दिवसार्धं वा मुहूर्तं वा क्षणं लवम् । न ह्यलब्धप्रसादस्य भक्तिर्भवति शङ्करे ॥
divasaṃ divasārdhaṃ vā muhūrtaṃ vā kṣaṇaṃ lavam | na hyalabdhaprasādasya bhaktirbhavati śaṅkare
जिसने शंकर की कृपा नहीं पाई, उसमें एक दिन, आधे दिन, एक मुहूर्त, एक क्षण या एक लव के लिए भी शंकर के प्रति भक्ति उत्पन्न नहीं होती।
श्लोक 171 (13.45.171)
अपि कीटः पतङ्गो वा भवेयं शङ्कराज्ञया । न तु शक्र त्वया दत्तं त्रैलोक्यमपि कामये ॥
api kīṭaḥ pataṅgo vā bhaveyaṃ śaṅkarājñayā | na tu śakra tvayā dattaṃ trailokyamapi kāmaye
शंकर की आज्ञा से मैं कीट या पतंगा भी बन जाऊँ; पर हे शक्र, तुम्हारे दिए हुए त्रिलोक को भी मैं नहीं चाहता।
श्लोक 172 (13.45.172)
श्वाऽपि महेश्वरवचना- । द्भवामि स हि नः परः कामः । त्रिदशगणराज्यमपि खलु । नेच्छाम्यमहेश्वराज्ञप्तम् ॥
śvā'pi maheśvaravacanā- | dbhavāmi sa hi naḥ paraḥ kāmaḥ | tridaśagaṇarājyamapi khalu | necchāmyamaheśvarājñaptam
महेश्वर के कहने पर मैं कुत्ता भी बन जाऊँ — यही हमारी परम कामना है; देवगणों का राज्य भी, यदि वह महेश्वर से भिन्न किसी के आदेश से मिले, तो मैं नहीं चाहता।
श्लोक 173 (13.45.173)
न नाकपृष्ठं न च देवराज्यं । न ब्रह्मलोकं न च निष्कलत्वम् । न सर्वकामानखिलान्वृणोमि । हरस्य दासत्वमहं वृणोमि ॥
na nākapṛṣṭhaṃ na ca devarājyaṃ | na brahmalokaṃ na ca niṣkalatvam | na sarvakāmānakhilānvṛṇomi | harasya dāsatvamahaṃ vṛṇomi
मैं न स्वर्ग का शिखर चुनता हूँ, न देवताओं का राज्य, न ब्रह्मलोक, न निष्कल मोक्ष, और न सम्पूर्ण कामनाओं को; मैं तो हर का दास होना ही चुनता हूँ।
श्लोक 174 (13.45.174)
यावच्छशाङ्कधवलामलबद्धमौलि- । र्न प्रीयते पशुपतिर्भगवान्ममेशः । तावज्जरामरणजन्मशताभिघातै- । र्दुःखानि देहविहितानि समुद्वहामि ॥
yāvacchaśāṅkadhavalāmalabaddhamauli- | rna prīyate paśupatirbhagavānmameśaḥ | tāvajjarāmaraṇajanmaśatābhighātai- | rduḥkhāni dehavihitāni samudvahāmi
जब तक निर्मल, श्वेत चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करनेवाले भगवान् पशुपति मुझ पर प्रसन्न नहीं होते, तब तक मैं सैकड़ों जन्म, जरा और मृत्यु के आघातों से मिलनेवाले देह-सम्बन्धी दुःख सहता रहूँगा।
श्लोक 175 (13.45.175)
दिवसकरशशाङ्कवह्निदीप्तं । त्रिभुवनसारमपारमाद्यमेकम् । अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं । जगति पुमानिह को लभेत शान्तिं ॥
divasakaraśaśāṅkavahnidīptaṃ | tribhuvanasāramapāramādyamekam | ajaramamaramaprasādya rudraṃ | jagati pumāniha ko labheta śāntiṃ
सूर्य, चन्द्र और अग्नि के समान दीप्त, तीनों लोकों के सार, अपार, आदि, एक, अजर और अमर रुद्र को प्रसन्न किए बिना इस संसार में कौन मनुष्य शान्ति पा सकता है?
श्लोक 176 (13.45.176)
धिक्तेषां धिक्तेषां । पुनरपि च धिगस्तु धिक्तेषाम् । येषां न वसति हृदये । कुपथगतिविमोक्षको रुद्रः ॥
dhikteṣāṃ dhikteṣāṃ | punarapi ca dhigastu dhikteṣām | yeṣāṃ na vasati hṛdaye | kupathagativimokṣako rudraḥ
धिक्कार है उन्हें, बार-बार धिक्कार है उन्हें, जिनके हृदय में कुमार्ग से छुड़ानेवाले रुद्र नहीं बसते!
श्लोक 177 (13.45.177)
यदि नाम जन्म भूयो । भवति मदीयैः पुनर्दोषैः । तस्मिंस्तस्मिञ्जन्मनि । भवे भवेन्मेऽक्षया भक्तिः ॥
yadi nāma janma bhūyo | bhavati madīyaiḥ punardoṣaiḥ | tasmiṃstasmiñjanmani | bhave bhavenme'kṣayā bhaktiḥ
यदि मेरे अपने दोषों से मुझे फिर जन्म लेना पड़े, तो उस-उस जन्म में भव के प्रति मेरी भक्ति अक्षय बनी रहे।"
शक्र उवाच
श्लोक 178 (13.45.178)
कः पुनर्भवने हेतुरीशे कारणकारणे । येन शर्वादृतेऽन्यस्मात्प्रसादं नाभिकाङ्क्षसि ॥
kaḥ punarbhavane heturīśe kāraṇakāraṇe | yena śarvādṛte'nyasmātprasādaṃ nābhikāṅkṣasi
कारणों के भी कारण ईश्वर के विषय में ऐसा क्या हेतु है कि तुम शर्व को छोड़कर किसी अन्य से कृपा नहीं चाहते?
उपमन्युरुवाच
श्लोक 179 (13.45.179)
सदसद्व्यक्तमव्यक्तं यमाहुर्ब्रह्मवादिनः । नित्यमेकमनेकं च वरं तस्माद्वृणीमहे ॥
sadasadvyaktamavyaktaṃ yamāhurbrahmavādinaḥ | nityamekamanekaṃ ca varaṃ tasmādvṛṇīmahe
जिन्हें ब्रह्मवादी सत् और असत्, व्यक्त और अव्यक्त, नित्य, एक और अनेक कहते हैं, उन्हीं से हम वर चुनते हैं।
श्लोक 180 (13.45.180)
अनादिमध्यपर्यन्तं ज्ञानैश्वर्यमचिन्तितम् । आत्मानं परमं यस्माद्वरं तस्माद्वृणीमहे ॥
anādimadhyaparyantaṃ jñānaiśvaryamacintitam | ātmānaṃ paramaṃ yasmādvaraṃ tasmādvṛṇīmahe
जो आदि, मध्य और अन्त से रहित हैं, जिनका ज्ञान और ऐश्वर्य अचिन्त्य है, जो परमात्मा हैं, उन्हीं से हम वर चुनते हैं।
श्लोक 181 (13.45.181)
ऐश्वर्यं सकलं यस्मादनुत्पादितमव्ययम् । अबीजाद्बीजसम्भूतं वरं तस्माद्वृणीमहे ॥
aiśvaryaṃ sakalaṃ yasmādanutpāditamavyayam | abījādbījasambhūtaṃ varaṃ tasmādvṛṇīmahe
जिनसे समस्त ऐश्वर्य उत्पन्न होता है, जो स्वयं अनुत्पन्न और अविनाशी हैं, और जिन बीजरहित से बीज की उत्पत्ति हुई, उन्हीं से हम वर चुनते हैं।
श्लोक 182 (13.45.182)
तमसः परमं ज्योतिस्तपस्तद्वृत्तिनां परम् । यं ज्ञात्वा नानुशोचन्ति वरं तस्माद्वृणीमहे ॥
tamasaḥ paramaṃ jyotistapastadvṛttināṃ param | yaṃ jñātvā nānuśocanti varaṃ tasmādvṛṇīmahe
जो अन्धकार से परे ज्योति हैं, तपस्वियों में भी परम हैं और जिन्हें जानकर लोग फिर शोक नहीं करते, उन्हीं से हम वर चुनते हैं।
श्लोक 183 (13.45.183)
भूतभावनभावज्ञं सर्वभूताभिभावनम् । सर्वगं सर्वदं देवं पूजयामि पुरंदर ॥
bhūtabhāvanabhāvajñaṃ sarvabhūtābhibhāvanam | sarvagaṃ sarvadaṃ devaṃ pūjayāmi puraṃdara
हे पुरन्दर, मैं उस देव की उपासना करता हूँ जो प्राणियों के रचयिता के भाव को भी जानते हैं, सब भूतों का पालन करते हैं, सर्वव्यापी हैं और सब कुछ देनेवाले हैं।
श्लोक 184 (13.45.184)
हेतुवादैर्विनिर्मुक्तं साङ्ख्ययोगार्थदं परम् । यमुपासन्ति तत्त्वज्ञा वरं तस्माद्वृणीमहे ॥
hetuvādairvinirmuktaṃ sāṅkhyayogārthadaṃ param | yamupāsanti tattvajñā varaṃ tasmādvṛṇīmahe
जो सब तर्क-वितर्कों से परे हैं, साङ्ख्य और योग के लक्ष्य को देनेवाले परम पुरुष हैं और जिनकी तत्त्वज्ञ उपासना करते हैं, उन्हीं से हम वर चुनते हैं।
श्लोक 185 (13.45.185)
मघवन्मघवात्मानं यं वदन्ति सुरेश्वरम् । सर्वभूतगुरुं देवं वरं तस्माद्वृणीमहे ॥
maghavanmaghavātmānaṃ yaṃ vadanti sureśvaram | sarvabhūtaguruṃ devaṃ varaṃ tasmādvṛṇīmahe
हे मघवन्, जिन्हें सुरेश्वर कहा जाता है, जो मघवा के भी आत्मा हैं, सब प्राणियों के गुरु हैं, उन्हीं देव से हम वर चुनते हैं।
श्लोक 186 (13.45.186)
यत्पूर्वमसृजद्देवं ब्रह्माणं लोकभावनम् । अण्डमाकाशमापूर्य वरं तस्माद्वृणीमहे ॥
yatpūrvamasṛjaddevaṃ brahmāṇaṃ lokabhāvanam | aṇḍamākāśamāpūrya varaṃ tasmādvṛṇīmahe
जिन्होंने आरम्भ में आकाश को अण्ड से भरकर लोकों के रचयिता ब्रह्मा देव को उत्पन्न किया, उन्हीं से हम वर चुनते हैं।
श्लोक 187 (13.45.187)
अग्निरापोऽनिलः पृथ्वी खं बुद्धिश्च मनो महान् । स्रष्टा चैषां भवेद्योऽन्यो ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥
agnirāpo'nilaḥ pṛthvī khaṃ buddhiśca mano mahān | sraṣṭā caiṣāṃ bhavedyo'nyo brūhi kaḥ parameśvarāt
अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, बुद्धि, मन और महत्तत्त्व — बताओ, इनका सृष्टा परमेश्वर के अतिरिक्त और कौन हो सकता है?
श्लोक 188 (13.45.188)
मनो मतिरहङ्कारस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । ब्रूहि चैषां भवेच्छक्र कोऽन्योस्ति परमं शिवात् ॥
mano matirahaṅkārastanmātrāṇīndriyāṇi ca | brūhi caiṣāṃ bhavecchakra ko'nyosti paramaṃ śivāt
मन, मति, अहंकार, तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ — हे शक्र, बताओ, इनके रचयिता के रूप में शिव से बढ़कर और कौन है?
श्लोक 189 (13.45.189)
स्रष्टारं भुवनस्येह वदन्तीह पितामहम् । आराध्य स तु देवेशमश्नुते महतीं श्रियम् ॥
sraṣṭāraṃ bhuvanasyeha vadantīha pitāmaham | ārādhya sa tu deveśamaśnute mahatīṃ śriyam
लोग पितामह ब्रह्मा को इस जगत् का सृष्टा कहते हैं; पर वे भी देवेश की आराधना करके ही महान् श्री पाते हैं।
श्लोक 190 (13.45.190)
भगवत्युत्तमैश्वर्यं ब्रह्मविष्णुपुरोगमम् । विद्यते वै महादेवाद्ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥
bhagavatyuttamaiśvaryaṃ brahmaviṣṇupurogamam | vidyate vai mahādevādbrūhi kaḥ parameśvarāt
उस भगवान् में ही वह परम ऐश्वर्य है, जिसमें ब्रह्मा और विष्णु प्रमुख हैं; वह महादेव से ही प्राप्त होता है। बताओ, परमेश्वर से परे कौन है?
श्लोक 191 (13.45.191)
दैत्यदानवमुख्यानामाधिपत्यारिमर्दनात् । कोऽन्यः शक्नोति देवेशाद्दितेः सम्पादितुं सुतान् ॥
daityadānavamukhyānāmādhipatyārimardanāt | ko'nyaḥ śaknoti deveśādditeḥ sampādituṃ sutān
दैत्यों और दानवों के प्रमुखों पर आधिपत्य के शत्रुओं का मर्दन करने के कारण, देवेश के सिवा और कौन दिति के पुत्रों को उत्पन्न कर सकता है?
श्लोक 192 (13.45.192)
दिक्कालसूर्यतेजांसि ग्रहवाय्विन्दुतारकाः । विद्धि त्वेते महादेवाद्ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥
dikkālasūryatejāṃsi grahavāyvindutārakāḥ | viddhi tvete mahādevādbrūhi kaḥ parameśvarāt
दिशाएँ, काल, सूर्य का तेज, ग्रह, वायु, चन्द्रमा और तारे — इन सबको महादेव से ही उत्पन्न जानो। बताओ, परमेश्वर से परे कौन है?
श्लोक 193 (13.45.193)
अथोत्पत्तिविनाशे वा यज्ञस्य त्रिपुरस्य वा । दैत्यदानवमुख्यानामाधिपत्यारिमर्दनः ॥
athotpattivināśe vā yajñasya tripurasya vā | daityadānavamukhyānāmādhipatyārimardanaḥ
यज्ञ और त्रिपुर की उत्पत्ति तथा विनाश भी उन्हीं से हैं। वे दैत्यों और दानवों के प्रमुखों पर आधिपत्य के शत्रुओं का मर्दन करनेवाले हैं।
श्लोक 194 (13.45.194)
किं चात्र बहुभिः सूक्तैर्हेतुवादैः पुरंदर । सहस्रनयनं दृष्ट्वा त्वामेव सुरसत्तम ॥
kiṃ cātra bahubhiḥ sūktairhetuvādaiḥ puraṃdara | sahasranayanaṃ dṛṣṭvā tvāmeva surasattama
हे पुरन्दर, यहाँ बहुत-सी सूक्तियों और तर्कों से क्या प्रयोजन? हे देवश्रेष्ठ, सहस्र नेत्रोंवाले केवल आपको देखकर ही —
श्लोक 195 (13.45.195)
पूजितं सिद्धगन्धर्वैर्देवैश्च ऋषिभिस्तथा । देवदेवप्रसादेन तत्सर्वं कुशिकोत्तम ॥
pūjitaṃ siddhagandharvairdevaiśca ṛṣibhistathā | devadevaprasādena tatsarvaṃ kuśikottama
जो सिद्धों, गन्धर्वों, देवताओं और ऋषियों से पूजित हैं — हे कुशिकश्रेष्ठ, यह सब देवाधिदेव की कृपा से ही है।
श्लोक 196 (13.45.196)
अव्यक्तमुक्तकेशाय सर्वगस्येदमात्मकम् । चेतनाचेतनाद्येषु शक्र विद्धि महेश्वरात् ॥
avyaktamuktakeśāya sarvagasyedamātmakam | cetanācetanādyeṣu śakra viddhi maheśvarāt
यह सब उस सर्वव्यापी का ही स्वरूप है जिनके केश खुले और अव्यक्त हैं; हे शक्र, चेतन और अचेतन आदि सबमें इसे महेश्वर से ही उत्पन्न जानो।
श्लोक 197 (13.45.197)
भुवाद्येषु महान्तेषु लोकालोकान्तरेषु च । द्वीपस्थानेषु मेरोश्च विभवेष्वन्तरेषु च ॥
bhuvādyeṣu mahānteṣu lokālokāntareṣu ca | dvīpasthāneṣu merośca vibhaveṣvantareṣu ca
भूः आदि महान् लोकों में, लोकों और उनके अन्तरालों में, द्वीपों के स्थानों में, मेरु के वैभवों में और बीच के प्रदेशों में —
श्लोक 198 (13.45.198)
भगवन्मघवन्देवं वदन्ते तत्त्वदर्शिनः । यदि देवाः सुराः शक्र पश्यन्त्यन्यां भवाकृतिम् ॥
bhagavanmaghavandevaṃ vadante tattvadarśinaḥ | yadi devāḥ surāḥ śakra paśyantyanyāṃ bhavākṛtim
हे भगवन् मघवन्, तत्त्वदर्शी इन्हीं देव की बात कहते हैं। हे शक्र, यदि देवता भव के रूप से भिन्न कोई दूसरा रूप देखते,
श्लोक 199 (13.45.199)
किं न गच्छन्ति शरणं मर्दिताश्चासुरैः सुराः । अभिघातेषु देवानां सयक्षोरगरक्षसाम् ॥
kiṃ na gacchanti śaraṇaṃ marditāścāsuraiḥ surāḥ | abhighāteṣu devānāṃ sayakṣoragarakṣasām
तो असुरों से कुचले जाने पर वे किसी और की शरण में क्यों नहीं जाते — देवताओं, यक्षों, सर्पों और राक्षसों पर होनेवाले आघातों में?
श्लोक 200 (13.45.200)
परस्परविनाशेषु स्वस्थानैश्वर्यदो भवः । अन्धकस्याथ शुक्रस्य दुन्दुभेर्महिषस्य च । यक्षेन्द्रबलरक्षःसु निवातकवचेषु च । वरदानावघाताय ब्रूहि कोऽन्यो महेश्वरात् ॥
parasparavināśeṣu svasthānaiśvaryado bhavaḥ | andhakasyātha śukrasya dundubhermahiṣasya ca | yakṣendrabalarakṣaḥsu nivātakavaceṣu ca | varadānāvaghātāya brūhi ko'nyo maheśvarāt
आपसी विनाश में अपने-अपने स्थान और ऐश्वर्य को देनेवाले भव ही हैं। अन्धक, शुक्र, दुन्दुभि और महिष के विषय में, यक्षराजों की सेनाओं, राक्षसों और निवातकवचों के विषय में, वरदान देने और संहार करने के लिए महेश्वर के सिवा और कौन है? बताओ।
श्लोक 201 (13.45.201)
सुरासुरगुरोर्वक्त्रे कस्य रेतः पुरा हुतम् । कस्य वाऽन्यस्य रेतस्तद्येन हैमो गिरिः कृतः ॥
surāsuragurorvaktre kasya retaḥ purā hutam | kasya vā'nyasya retastadyena haimo giriḥ kṛtaḥ
सुर-असुरों के गुरु के मुख में पूर्वकाल में किसका वीर्य हवन किया गया था? अथवा और किसका वह वीर्य था जिससे स्वर्णमय पर्वत बना?
श्लोक 202 (13.45.202)
दिग्वासाः कीर्त्यते कोऽन्यो लोके कश्चोर्ध्वरेतसः । कस्य चार्धे स्थिता कान्ता अनङ्गः केन निर्जितः ॥
digvāsāḥ kīrtyate ko'nyo loke kaścordhvaretasaḥ | kasya cārdhe sthitā kāntā anaṅgaḥ kena nirjitaḥ
लोक में दिगम्बर किसे कहा जाता है, और ऊर्ध्वरेता कौन है? किसके अर्धांग में उसकी प्रिया स्थित है? और अनंग को किसने जीता?
श्लोक 203 (13.45.203)
ब्रूहीन्द्र परमं स्थानं कस्य देवैः प्रशस्यते । श्मशाने कस्य क्रीडार्थं नृत्ते वा कोऽभिभाष्यते ॥
brūhīndra paramaṃ sthānaṃ kasya devaiḥ praśasyate | śmaśāne kasya krīḍārthaṃ nṛtte vā ko'bhibhāṣyate
हे इन्द्र, बताओ, देवता किसके परम धाम की प्रशंसा करते हैं? श्मशान में क्रीड़ा के लिए कौन रहता है? नृत्य में किसे सम्बोधित किया जाता है?
श्लोक 204 (13.45.204)
कस्यैश्वर्यं समानं च भूतैः को वाऽपि क्रीडते । कस्य तुल्यबला देवगणाश्चैश्वर्यदर्पिताः ॥
kasyaiśvaryaṃ samānaṃ ca bhūtaiḥ ko vā'pi krīḍate | kasya tulyabalā devagaṇāścaiśvaryadarpitāḥ
किसका ऐश्वर्य भूतगणों के समान है, और उनके साथ कौन क्रीड़ा करता है? ऐश्वर्य के गर्व से भरे, समान बलवाले देवगण किसके हैं?
श्लोक 205 (13.45.205)
घुष्यते ह्यचलं स्थानं कस्य त्रैलोक्यपूजितम् । वर्षते तपते कोऽन्यो ज्वलते तेजसा च कः ॥
ghuṣyate hyacalaṃ sthānaṃ kasya trailokyapūjitam | varṣate tapate ko'nyo jvalate tejasā ca kaḥ
तीनों लोकों में पूजित किसका अचल धाम घोषित है? और कौन वर्षा करता है, कौन तपता है, कौन तेज से प्रज्वलित होता है?
श्लोक 206 (13.45.206)
कस्मादोषधिसम्पत्तिः को वा धारयते वसु । प्रकामं क्रीडते को वा त्रैलोक्ये सचराचरे ॥
kasmādoṣadhisampattiḥ ko vā dhārayate vasu | prakāmaṃ krīḍate ko vā trailokye sacarācare
ओषधियों की सम्पदा किससे आती है? धन को कौन धारण करता है? चर-अचर सहित तीनों लोकों में कौन इच्छानुसार क्रीड़ा करता है?
श्लोक 207 (13.45.207)
ज्ञानसिद्धिक्रियायोगैः सेव्यमानश्च योगिभिः । ऋषिगन्धर्वसिद्धैश्च विहितं कारणं परम् ॥
jñānasiddhikriyāyogaiḥ sevyamānaśca yogibhiḥ | ṛṣigandharvasiddhaiśca vihitaṃ kāraṇaṃ param
जिनकी सेवा योगी ज्ञान, सिद्धि और क्रियायोग से करते हैं तथा ऋषि, गन्धर्व और सिद्ध भी करते हैं, वे ही परम कारण ठहराए गए हैं।
श्लोक 208 (13.45.208)
कर्मयज्ञक्रियायोगैः सेव्यमानः सुरासुरैः । नित्यं कर्मफलैर्हीनं तमहं कारणं वदे ॥
karmayajñakriyāyogaiḥ sevyamānaḥ surāsuraiḥ | nityaṃ karmaphalairhīnaṃ tamahaṃ kāraṇaṃ vade
कर्म, यज्ञ और क्रियायोग से देवता और असुर जिनकी सेवा करते हैं, फिर भी जो सदा कर्मफलों से रहित हैं, उन्हीं को मैं कारण कहता हूँ।
श्लोक 209 (13.45.209)
स्थूलं सूक्ष्ममनौपम्यमग्राह्यं गुणगोचरम् । गुणहीनं गुणाध्यक्षं परं माहेश्वरं पदम् ॥
sthūlaṃ sūkṣmamanaupamyamagrāhyaṃ guṇagocaram | guṇahīnaṃ guṇādhyakṣaṃ paraṃ māheśvaraṃ padam
स्थूल और सूक्ष्म, अनुपम, अग्राह्य, गुणों के विषय होते हुए भी गुणहीन और गुणों के अध्यक्ष — यही महेश्वर का परम पद है।
श्लोक 210 (13.45.210)
विश्वेशं कारणगुरुं लोकालोकान्तकारणम् । भूताभूतभविष्यच्च जनकं सर्वकारणम् ॥
viśveśaṃ kāraṇaguruṃ lokālokāntakāraṇam | bhūtābhūtabhaviṣyacca janakaṃ sarvakāraṇam
वे विश्व के स्वामी हैं, कारणों के गुरु हैं, लोक और अलोक की सीमा के कारण हैं, तथा भूत, अभूत और भविष्य के जनक और सबके कारण हैं।
श्लोक 211 (13.45.211)
अक्षराक्षरमव्यक्तं विद्याविद्ये कृताकृते । धर्माधर्मौ यतः शक्र तमहं कारणं ब्रुवे ॥
akṣarākṣaramavyaktaṃ vidyāvidye kṛtākṛte | dharmādharmau yataḥ śakra tamahaṃ kāraṇaṃ bruve
अक्षर और क्षर, अव्यक्त, विद्या और अविद्या, कृत और अकृत, धर्म और अधर्म — हे शक्र, ये जिनसे उत्पन्न होते हैं, उन्हीं को मैं कारण कहता हूँ।
श्लोक 212 (13.45.212)
प्रत्यक्षमिह देवेन्द्र पश्य लिङ्गं भगाङ्कितम् । देवदेवेन रुद्रेण सृष्टिसंहारहेतुना ॥
pratyakṣamiha devendra paśya liṅgaṃ bhagāṅkitam | devadevena rudreṇa sṛṣṭisaṃhārahetunā
हे देवेन्द्र, सृष्टि और संहार के कारण देवाधिदेव रुद्र के बनाए हुए, भग से चिह्नित इस लिंग को यहीं प्रत्यक्ष देखो।
श्लोक 213 (13.45.213)
मात्रा पूर्वं ममाख्यातं कारणं लोकलक्षणम् । नास्ति चेशात्परं शक्र तं प्रपद्य यदीच्छसि ॥
mātrā pūrvaṃ mamākhyātaṃ kāraṇaṃ lokalakṣaṇam | nāsti ceśātparaṃ śakra taṃ prapadya yadīcchasi
लोक की पहचान बने उस कारण के विषय में मेरी माता ने मुझे पहले बताया था: हे शक्र, ईश से परे कुछ नहीं है। यदि तुम चाहो तो उसी की शरण लो।
श्लोक 214 (13.45.214)
प्रत्यक्षं ननु ते सुरेश विदितं संयोगलिङ्गोद्भवं । त्रैलोक्यं सविकारनिर्गुणगणं ब्रह्मादिरेतोद्भवम् । यद्ब्रह्मेन्द्रहुताशविष्णुसहिता देवाश्च दैत्येश्वरा । नान्यत्कामसहस्रकल्पितधियः शंसन्ति ईशात्परं ॥
pratyakṣaṃ nanu te sureśa viditaṃ saṃyogaliṅgodbhavaṃ | trailokyaṃ savikāranirguṇagaṇaṃ brahmādiretodbhavam | yadbrahmendrahutāśaviṣṇusahitā devāśca daityeśvarā | nānyatkāmasahasrakalpitadhiyaḥ śaṃsanti īśātparaṃ
हे सुरेश, यह तुम्हें प्रत्यक्ष और विदित है कि विकारों और गुणों के समूह से युक्त यह त्रिलोक लिंग और योनि के संयोग से, ब्रह्मा आदि के वीर्य से उत्पन्न हुआ है। हजारों कामनाओं से बँधी बुद्धिवाले ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि और विष्णु, देवता तथा दैत्येश्वर भी ईश से परे किसी और को नहीं बताते।
श्लोक 215 (13.45.215)
तं देवं सचराचरस्य जगतो व्याख्यातवेद्योत्तमं । कामार्थी वरयामि संयतमना मोक्षाय सद्यः शिवम् । हेतुभिर्वा किमन्यैस्तैरीशः कारणकारणम् । न शुश्रुम यदन्यस्य लिङ्गमभ्यर्चितं सुरैः ॥
taṃ devaṃ sacarācarasya jagato vyākhyātavedyottamaṃ | kāmārthī varayāmi saṃyatamanā mokṣāya sadyaḥ śivam | hetubhirvā kimanyaistairīśaḥ kāraṇakāraṇam | na śuśruma yadanyasya liṅgamabhyarcitaṃ suraiḥ
चर-अचर जगत् की व्याख्या करनेवाले, जानने योग्य वस्तुओं में सर्वोत्तम उन देव को — कामना रखते हुए भी मैं संयत मन से मोक्ष के लिए तुरन्त शिव को ही वरण करता हूँ। उन दूसरे तर्कों से क्या लाभ? ईश तो कारणों के भी कारण हैं; हमने नहीं सुना कि देवताओं ने किसी और के लिंग की अर्चना की हो।
श्लोक 216 (13.45.216)
कस्यान्यस्य सुरैः सर्वैर्लिङ्गं मुक्त्वा महेश्वरम् । अर्च्यतेऽर्चितपूर्वं वा ब्रूहि यद्यस्ति ते श्रुतिः ॥
kasyānyasya suraiḥ sarvairliṅgaṃ muktvā maheśvaram | arcyate'rcitapūrvaṃ vā brūhi yadyasti te śrutiḥ
महेश्वर को छोड़कर देवताओं द्वारा और किसके लिंग की पूजा की जाती है, या पहले कभी की गई है? यदि तुमने सुना हो तो बताओ।
श्लोक 217 (13.45.217)
यस्य ब्रह्मा च विष्णुश्च त्वं चापि सहदैवतैः । अर्चयध्वं सदा लिङ्गं तस्माच्छ्रेष्ठतमो हि सः ॥
yasya brahmā ca viṣṇuśca tvaṃ cāpi sahadaivataiḥ | arcayadhvaṃ sadā liṅgaṃ tasmācchreṣṭhatamo hi saḥ
क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु और तुम भी देवताओं सहित सदा उसी के लिंग की पूजा करते हो, इसलिए वही सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 218 (13.45.218)
न पद्माङ्का न चक्राङ्का न वज्राङ्का यतः प्रजाः । लिङ्गाङ्का च भगाङ्का च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ॥
na padmāṅkā na cakrāṅkā na vajrāṅkā yataḥ prajāḥ | liṅgāṅkā ca bhagāṅkā ca tasmānmāheśvarī prajā
क्योंकि प्राणी न कमल के, न चक्र के, न वज्र के चिह्न से अंकित हैं, बल्कि लिंग और भग के चिह्न से अंकित हैं; इसलिए यह सारी प्रजा माहेश्वरी है।
श्लोक 219 (13.45.219)
देव्याः कारणरूपभावजनिताः सर्वा भगाङ्काः स्त्रियो । लिङ्गेनापि हरस्य सर्वपुरुषाः प्रत्यक्षचिह्नीकृताः । योऽन्यत्कारणमीश्वरात्प्रवदते देव्या च यन्नाङ्कितं । त्रैलोक्ये सचराचरे स तु पुमान्बाह्यो भवेद्दुर्मतिः ॥
devyāḥ kāraṇarūpabhāvajanitāḥ sarvā bhagāṅkāḥ striyo | liṅgenāpi harasya sarvapuruṣāḥ pratyakṣacihnīkṛtāḥ | yo'nyatkāraṇamīśvarātpravadate devyā ca yannāṅkitaṃ | trailokye sacarācare sa tu pumānbāhyo bhaveddurmatiḥ
सब स्त्रियाँ देवी के कारणस्वरूप भाव से उत्पन्न होकर भग के चिह्न से अंकित हैं; सब पुरुष हर के लिंग से प्रत्यक्ष चिह्नित किए गए हैं। जो दुर्बुद्धि पुरुष चर-अचर सहित तीनों लोकों में ईश्वर से भिन्न किसी ऐसे कारण को बताता है जो देवी से अंकित नहीं है, वह बाहरी, बहिष्कृत है।
श्लोक 220 (13.45.220)
पुल्लिङ्गं सर्वमीशानं स्त्रीलिङ्गं विद्धि चाप्युमाम् । द्वाभ्यां तनुभ्यां व्याप्तं हि चराचरमिदं जगत् ॥
pulliṅgaṃ sarvamīśānaṃ strīliṅgaṃ viddhi cāpyumām | dvābhyāṃ tanubhyāṃ vyāptaṃ hi carācaramidaṃ jagat
जो कुछ पुल्लिंग है वह सब ईशान है और जो स्त्रीलिंग है उसे उमा जानो। यह चर-अचर सम्पूर्ण जगत् इन्हीं दो शरीरों से व्याप्त है।
श्लोक 221 (13.45.221)
तस्माद्वरमहं काङ्क्षे निधनं वाऽपि कौशिक । गच्छ वा तिष्ठ वा शक्र यथेष्टं बलसूदन ॥
tasmādvaramahaṃ kāṅkṣe nidhanaṃ vā'pi kauśika | gaccha vā tiṣṭha vā śakra yatheṣṭaṃ balasūdana
इसलिए हे कौशिक, मैं वही वर चाहता हूँ — अथवा मृत्यु भी। हे बलसूदन शक्र, चाहो तो जाओ, चाहो तो ठहरो।
श्लोक 222 (13.45.222)
काममेष वरो मेस्तु शापो वाऽथ महेश्वरात् । न चान्यां देवतां काङ्क्षे सर्वकामफलामपि ॥
kāmameṣa varo mestu śāpo vā'tha maheśvarāt | na cānyāṃ devatāṃ kāṅkṣe sarvakāmaphalāmapi
मेरा यही वर रहे, चाहे वह महेश्वर से वर मिले या शाप; मैं किसी अन्य देवता को नहीं चाहता, चाहे वह सब कामनाओं का फल देनेवाला ही क्यों न हो।
श्लोक 223 (13.45.223)
एवमुक्त्वा तु देवेन्द्रं दुःखादाकुलितेन्द्रियः । न प्रसीदति मे देवः किमेतदिति चिन्तयन् ॥
evamuktvā tu devendraṃ duḥkhādākulitendriyaḥ | na prasīdati me devaḥ kimetaditi cintayan
देवराज से ऐसा कहकर, दुःख से व्याकुल इन्द्रियोंवाला मैं सोचने लगा, "देव मुझ पर प्रसन्न क्यों नहीं हो रहे? यह क्या है?"
श्लोक 224 (13.45.224)
अथापश्यं क्षणेनैव तमेवैरावतं पुनः । हंसकुन्देन्दुसदृशं मृणालरजतप्रभम् ॥
athāpaśyaṃ kṣaṇenaiva tamevairāvataṃ punaḥ | haṃsakundendusadṛśaṃ mṛṇālarajataprabham
तब क्षण भर में मैंने फिर उसी ऐरावत को देखा, जो हंस, कुन्द और चन्द्रमा के समान उजला था और जिसकी आभा मृणाल और चाँदी जैसी थी,
श्लोक 225 (13.45.225)
वृषरूपधरं साक्षात्क्षीरोदमिव सागरम् । कृष्णपुच्छं महाकायं मधुपिङ्गललोचनम् ॥
vṛṣarūpadharaṃ sākṣātkṣīrodamiva sāgaram | kṛṣṇapucchaṃ mahākāyaṃ madhupiṅgalalocanam
जो अब साक्षात् क्षीरसागर के समान वृष का रूप धारण किए हुए था, काली पूँछ, विशाल शरीर और मधु जैसे भूरे नेत्रोंवाला,
श्लोक 226 (13.45.226)
वज्रसारमयैः शृङ्गैर्निष्टप्तकनकप्रभैः । सुतीक्ष्णैर्मृदुरक्ताग्रैरुत्किरन्तमिवावनिम् ॥
vajrasāramayaiḥ śṛṅgairniṣṭaptakanakaprabhaiḥ | sutīkṣṇairmṛduraktāgrairutkirantamivāvanim
जिसके सींग वज्र के सार से बने थे, तपाए सोने जैसी आभावाले, बहुत तीखे और कोमल लाल सिरेवाले थे, मानो वह पृथ्वी को खोद रहा हो,
श्लोक 227 (13.45.227)
जाम्बूनदेन दाम्ना च सर्वतः समलङ्कृतम् । सुवक्त्रखुरनासं च सुकर्णं सुकटीतटम् । सुपार्श्वं विपुलस्कन्धं सुरूपं चारुदर्शनम् ॥
jāmbūnadena dāmnā ca sarvataḥ samalaṅkṛtam | suvaktrakhuranāsaṃ ca sukarṇaṃ sukaṭītaṭam | supārśvaṃ vipulaskandhaṃ surūpaṃ cārudarśanam
जो सब ओर से सोने की माला से सजा था; सुन्दर मुख, खुर और नाकवाला, सुन्दर कानों, सुन्दर कटिप्रदेश और सुन्दर पार्श्वोंवाला, चौड़े कन्धोंवाला, रूपवान् और देखने में मनोहर था।
श्लोक 228 (13.45.228)
ककुदं तस्य चाभाति स्कन्धमापूर्य विष्ठितम् । तुषारगिरिकूटाभं सिताभ्रशिखरोपमम् ॥
kakudaṃ tasya cābhāti skandhamāpūrya viṣṭhitam | tuṣāragirikūṭābhaṃ sitābhraśikharopamam
उसके कन्धे को भरता हुआ ककुद् ऊँचा खड़ा शोभित हो रहा था, जो हिमालय के शिखर और श्वेत मेघ की चोटी के समान था।
श्लोक 229 (13.45.229)
तमास्थितश्च भगवान्देवदेवः सहोमया । अशोभत महादेवः पौर्णमास्यामिवोडुराट् ॥
tamāsthitaśca bhagavāndevadevaḥ sahomayā | aśobhata mahādevaḥ paurṇamāsyāmivoḍurāṭ
उस पर आरूढ़ भगवान् देवदेव महादेव उमा के साथ ऐसे शोभित हुए जैसे पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा।
श्लोक 230 (13.45.230)
किरीटं च जटाभारः सर्पाद्याभरणानि च । वज्रादिशूलमातङ्गगम्भीरस्मितमागतम् ॥
kirīṭaṃ ca jaṭābhāraḥ sarpādyābharaṇāni ca | vajrādiśūlamātaṅgagambhīrasmitamāgatam
मुकुट, जटाओं का भार, सर्प आदि आभूषण, वज्र आदि अस्त्र और त्रिशूल, हाथी और गम्भीर मुस्कान — ये सब वहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 231 (13.45.231)
तस्य तेजोभवो वह्निः समेघः स्तनयित्नुमान् । सहस्रमिव सूर्याणां सर्वमापूर्य विष्ठितः ॥
tasya tejobhavo vahniḥ sameghaḥ stanayitnumān | sahasramiva sūryāṇāṃ sarvamāpūrya viṣṭhitaḥ
उनके तेज से मेघ और गर्जन सहित एक अग्नि उत्पन्न हुई, जो सहस्र सूर्यों के समान सबको भरकर स्थित हो गई।
श्लोक 232 (13.45.232)
ईश्वरः सुमहातेजाः संवर्तक इवानलः । युगान्ते सर्वभूतानां दिधक्षुरिव चोद्यतः ॥
īśvaraḥ sumahātejāḥ saṃvartaka ivānalaḥ | yugānte sarvabhūtānāṃ didhakṣuriva codyataḥ
महातेजस्वी ईश्वर युगान्त की संवर्तक अग्नि के समान ऐसे लगे, मानो सब प्राणियों को जला डालने को उद्यत हों।
श्लोक 233 (13.45.233)
तेजसा तु तदा व्याप्तं दुर्निरीक्ष्यं समन्ततः । पुनरुद्विग्नहृदयः किमेतदिति चिन्तयम् ॥
tejasā tu tadā vyāptaṃ durnirīkṣyaṃ samantataḥ | punarudvignahṛdayaḥ kimetaditi cintayam
चारों ओर वह तेज फैल गया, जिसकी ओर देखना कठिन था; और मैं फिर व्याकुल हृदय से सोचने लगा, "यह क्या है?"
श्लोक 234 (13.45.234)
मुहूर्तमिव तत्तेजो व्याप्य सर्वा दिशो दश । प्रशान्तं च क्षणेनैव देवदेवस्य मायया ॥
muhūrtamiva tattejo vyāpya sarvā diśo daśa | praśāntaṃ ca kṣaṇenaiva devadevasya māyayā
वह तेज एक मुहूर्त भर दसों दिशाओं को भरे रहा, और फिर देवदेव की माया से क्षण भर में शान्त हो गया।
श्लोक 235 (13.45.235)
अथापश्यं स्थितं स्थाणुं भगवन्तं महेश्वरम् । सौरभेयगतं सौम्यं विधूममिव पावकम् ॥
athāpaśyaṃ sthitaṃ sthāṇuṃ bhagavantaṃ maheśvaram | saurabheyagataṃ saumyaṃ vidhūmamiva pāvakam
तब मैंने भगवान् स्थाणु महेश्वर को वृषभ पर विराजमान, सौम्य और धूमरहित अग्नि के समान खड़े देखा,
श्लोक 236 (13.45.236)
प्रशान्तमनसं देवं त्रिनेत्रमपराजितम् । सहितं चारुसर्वाङ्ग्या पार्वत्या परमेश्वरम् ॥
praśāntamanasaṃ devaṃ trinetramaparājitam | sahitaṃ cārusarvāṅgyā pārvatyā parameśvaram
शान्त चित्तवाले, त्रिनेत्र, अपराजित, परमेश्वर देव, जो सर्वांगसुन्दरी पार्वती के साथ थे।
श्लोक 237 (13.45.237)
नीलकण्ठं महात्मानमसक्तं तेजसां निधिम् । अष्टादशभुजं स्थाणुं सर्वाभरणभूषितम् ॥
nīlakaṇṭhaṃ mahātmānamasaktaṃ tejasāṃ nidhim | aṣṭādaśabhujaṃ sthāṇuṃ sarvābharaṇabhūṣitam
नीलकण्ठ, महात्मा, अनासक्त, तेजों के भण्डार, अठारह भुजाओंवाले स्थाणु, सब आभूषणों से विभूषित,
श्लोक 238 (13.45.238)
शुक्लाम्बरधरं देवं शुक्लमाल्यानुलेपनम् । शुक्लध्वजमनाधृष्यं शुक्लयज्ञोपवीतिनम् ॥
śuklāmbaradharaṃ devaṃ śuklamālyānulepanam | śukladhvajamanādhṛṣyaṃ śuklayajñopavītinam
श्वेत वस्त्र धारण किए, श्वेत माला और श्वेत अनुलेप से युक्त, श्वेत ध्वजावाले, अजेय, श्वेत यज्ञोपवीत धारण किए,
श्लोक 239 (13.45.239)
गायद्भिर्नृत्यमानैश्च वादयद्भिश्च सर्वशः । वृतं पार्श्वचरैर्दिव्यैरात्मतुल्यपराक्रमैः ॥
gāyadbhirnṛtyamānaiśca vādayadbhiśca sarvaśaḥ | vṛtaṃ pārśvacarairdivyairātmatulyaparākramaiḥ
चारों ओर से अपने ही समान पराक्रमी दिव्य पार्षदों से घिरे हुए, जो गा रहे, नाच रहे और बाजे बजा रहे थे।
श्लोक 240 (13.45.240)
बालेन्दुमुकुटं पाण्डुं शरच्चन्द्रमिवोदितम् । त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्योतं त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ॥
bālendumukuṭaṃ pāṇḍuṃ śaraccandramivoditam | tribhirnetraiḥ kṛtodyotaṃ tribhiḥ sūryairivoditaiḥ
बालचन्द्र का मुकुट पहने, शरद् ऋतु के उदित चन्द्रमा की तरह पाण्डुवर्ण, तीन नेत्रों से ऐसा प्रकाश करते हुए मानो तीन सूर्य उदित हुए हों।
श्लोक 241 (13.45.241)
सर्वविद्याधिपं देवं शरच्चन्द्रसमप्रभम् । नयनाह्लादसौम्योऽहमपश्यं परमेश्वरम् ॥
sarvavidyādhipaṃ devaṃ śaraccandrasamaprabham | nayanāhlādasaumyo'hamapaśyaṃ parameśvaram
नेत्रों के आनन्द से शान्त होकर मैंने सब विद्याओं के अधिपति, शरद् के चन्द्रमा जैसी आभावाले परमेश्वर देव को देखा।
श्लोक 242 (13.45.242)
अशोभतास्य देवस्य माला गात्रे सितप्रभे । जातरूपमयैः पद्मैर्ग्रथिता रत्नभूषिता ॥
aśobhatāsya devasya mālā gātre sitaprabhe | jātarūpamayaiḥ padmairgrathitā ratnabhūṣitā
देव के उजले शरीर पर सोने के कमलों से गुँथी हुई और रत्नों से सजी माला शोभा पा रही थी।
श्लोक 243 (13.45.243)
मूर्तिमन्ति तथाऽस्त्राणि सर्वतेजोमयानि च । मया दृष्टानि गोविन्द भवस्यामिततेजसः ॥
mūrtimanti tathā'strāṇi sarvatejomayāni ca | mayā dṛṣṭāni govinda bhavasyāmitatejasaḥ
हे गोविन्द, मैंने अमित तेजवाले भव के अस्त्रों को भी मूर्तिमान् रूप में खड़े देखा, जो सब तेजोमय थे।
श्लोक 244 (13.45.244)
इन्द्रायुधसहस्राभं धनुस्तस्य महात्मनः । पिनाकमिति विख्यातं स च वै पन्नगो महान् ॥
indrāyudhasahasrābhaṃ dhanustasya mahātmanaḥ | pinākamiti vikhyātaṃ sa ca vai pannago mahān
उन महात्मा का धनुष सहस्र इन्द्रधनुषों के समान आभावाला था और पिनाक नाम से प्रसिद्ध है; और वही एक महान् सर्प भी था,
श्लोक 245 (13.45.245)
सप्तशीर्षो महाकायस्तीक्ष्णदंष्ट्रो विषोल्वणः । ज्यावेष्टितमहाग्रीवः स्थितः पुरुषविग्रहः ॥
saptaśīrṣo mahākāyastīkṣṇadaṃṣṭro viṣolvaṇaḥ | jyāveṣṭitamahāgrīvaḥ sthitaḥ puruṣavigrahaḥ
सात फनोंवाला, विशाल शरीर, तीखी दाढ़ोंवाला, विष से भयंकर, जिसकी विशाल ग्रीवा प्रत्यंचा से लिपटी थी, और जो पुरुष के आकार में खड़ा था।
श्लोक 246 (13.45.246)
शरश्च सूर्यसङ्काशो दृष्टः पाशुपताह्वयः । सहस्रभुजजिह्वास्यो भीषणो नागविग्रहः ॥
śaraśca sūryasaṅkāśo dṛṣṭaḥ pāśupatāhvayaḥ | sahasrabhujajihvāsyo bhīṣaṇo nāgavigrahaḥ
और सूर्य के समान चमकता हुआ पाशुपत नामक बाण भी दिखाई दिया, जिसके सहस्र भुजाएँ, जिह्वाएँ और मुख थे, जो भयंकर था और नाग के आकार का था।
श्लोक 247 (13.45.247)
शङ्खशूलासिभिश्चैव पट्टसै रूपवान्स्थितः । येन च त्रिपुरं दग्ध्वा क्षणाद् भस्मीकृतं पुरा ॥
śaṅkhaśūlāsibhiścaiva paṭṭasai rūpavānsthitaḥ | yena ca tripuraṃ dagdhvā kṣaṇād bhasmīkṛtaṃ purā
वह शंख, शूल, खड्ग और पट्टिश के साथ सुन्दर रूप में खड़ा था — वही जिसके द्वारा पूर्वकाल में त्रिपुर क्षण भर में जलकर भस्म कर दिया गया था।
श्लोक 248 (13.45.248)
अद्वितीयमनिर्देश्यं सर्वभूतभयावहम् । सस्फुलिङ्गं महाकायं विसृजन्तमिवानलम् ॥
advitīyamanirdeśyaṃ sarvabhūtabhayāvaham | sasphuliṅgaṃ mahākāyaṃ visṛjantamivānalam
अद्वितीय, अनिर्देश्य, सब प्राणियों को भयभीत करनेवाला, विशाल शरीरवाला, चिनगारियाँ बिखेरता हुआ, मानो अग्नि उगल रहा हो,
श्लोक 249 (13.45.249)
एकपादं महादंष्ट्रं सहस्रशिरसोदरम् । सहस्रभुजजिह्वाक्षमुद्गिरन्तमिवानलम् ॥
ekapādaṃ mahādaṃṣṭraṃ sahasraśirasodaram | sahasrabhujajihvākṣamudgirantamivānalam
एक पैरवाला, बड़ी दाढ़ोंवाला, सहस्र शिर और उदरोंवाला, सहस्र भुजाओं, जिह्वाओं और नेत्रोंवाला, मानो अग्नि उगल रहा हो —
श्लोक 250 (13.45.250)
ब्राह्मान्नारायणाच्चैन्द्रादाग्नेयादपि वारुणात् । यद्विशिष्टं महाबाहो सर्वशस्त्रविघातनम् ॥
brāhmānnārāyaṇāccaindrādāgneyādapi vāruṇāt | yadviśiṣṭaṃ mahābāho sarvaśastravighātanam
हे महाबाहो, ब्रह्मा, नारायण, इन्द्र, अग्नि और वरुण के अस्त्रों से भी श्रेष्ठ, सब शस्त्रों को नष्ट करनेवाला,
श्लोक 251 (13.45.251)
येन तत्त्रिपुरं दग्ध्वा क्षणाद्भस्मीकृतं पुरा । शरेणैकेन गोविन्द महादेवेन लीलया ॥
yena tattripuraṃ dagdhvā kṣaṇādbhasmīkṛtaṃ purā | śareṇaikena govinda mahādevena līlayā
जिससे महादेव ने पूर्वकाल में हे गोविन्द, एक ही बाण से लीलापूर्वक त्रिपुर को क्षण भर में जलाकर भस्म कर दिया था।
श्लोक 252 (13.45.252)
निर्दहेत च यत्कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् । महेश्वरभुजोत्सृष्टं निमेषार्धान्न संशयः ॥
nirdaheta ca yatkṛtsnaṃ trailokyaṃ sacarācaram | maheśvarabhujotsṛṣṭaṃ nimeṣārdhānna saṃśayaḥ
महेश्वर की भुजा से छूटने पर वह आधे निमेष में चर-अचर सहित सारे त्रिलोक को भस्म कर सकता है — इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 253 (13.45.253)
नावध्यो यस्य लोकेऽस्मिन्ब्रह्मविष्णुसुरेष्वपि । तदहं दृष्टवांस्तत्र आश्चर्यमिदमुत्तमम् ॥
nāvadhyo yasya loke'sminbrahmaviṣṇusureṣvapi | tadahaṃ dṛṣṭavāṃstatra āścaryamidamuttamam
इस लोक में ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं में भी कोई उसके लिए अवध्य नहीं है। वह परम आश्चर्य मैंने वहाँ देखा।
श्लोक 254 (13.45.254)
गुह्यमस्त्रवरं नान्यत्तत्तुल्यमधिकं हि वा । यत्तच्छूलमिति ख्यातं सर्वलोकेषु शूलिनः ॥
guhyamastravaraṃ nānyattattulyamadhikaṃ hi vā | yattacchūlamiti khyātaṃ sarvalokeṣu śūlinaḥ
वह गुप्त और श्रेष्ठ अस्त्र है; उसके तुल्य या उससे बढ़कर दूसरा नहीं — वह शूल, जो सब लोकों में शूलधारी का शूल कहलाता है।
श्लोक 255 (13.45.255)
दारयेद्द्यां महीं कृत्स्नां शोषयेद्वा महोदधिम् । संहरेद्वा जगत्कृत्स्नं विसृष्टं शूलपाणिना ॥
dārayeddyāṃ mahīṃ kṛtsnāṃ śoṣayedvā mahodadhim | saṃharedvā jagatkṛtsnaṃ visṛṣṭaṃ śūlapāṇinā
शूलपाणि के छोड़ने पर वह आकाश और सारी पृथ्वी को चीर सकता है, महासागर को सुखा सकता है, या सारे जगत् का संहार कर सकता है।
श्लोक 256 (13.45.256)
यौवनाश्वो हतो येन मान्धाता सबलः पुरा । चक्रवर्ती महातेजास्त्रिलोकविजयी नृपः ॥
yauvanāśvo hato yena māndhātā sabalaḥ purā | cakravartī mahātejāstrilokavijayī nṛpaḥ
उसी से पूर्वकाल में युवनाश्व के पुत्र मान्धाता सेना सहित मारे गए थे — वे महातेजस्वी चक्रवर्ती राजा, जो तीनों लोकों के विजेता थे,
श्लोक 257 (13.45.257)
महाबलो महावीर्यः शक्रतुल्यपराक्रमः । करस्थेनैव गोविन्द लवणस्येह रक्षसः ॥
mahābalo mahāvīryaḥ śakratulyaparākramaḥ | karasthenaiva govinda lavaṇasyeha rakṣasaḥ
जो महाबली, महापराक्रमी और इन्द्र के समान विक्रमवाले थे — हे गोविन्द, राक्षस लवण के हाथ में रहते हुए उसी शूल से वे मारे गए थे।
श्लोक 258 (13.45.258)
तच्छूलमतितीक्ष्णाग्रं सुभीमं रोमहर्षणम् । त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा तर्जमानमिव स्थितम् ॥
tacchūlamatitīkṣṇāgraṃ subhīmaṃ romaharṣaṇam | triśikhāṃ bhrukuṭiṃ kṛtvā tarjamānamiva sthitam
वह अत्यन्त तीखी नोकवाला, अति भयंकर, रोमांच उत्पन्न करनेवाला शूल अपनी तीन शिखाओं की भृकुटी बनाकर मानो धमकाता हुआ खड़ा था,
श्लोक 259 (13.45.259)
विधूमं सार्चिषं कृष्णं कालसूर्यमिवोदितम् । सर्पहस्तमनिर्देश्यं पाशहस्तमिवान्तकम् ॥
vidhūmaṃ sārciṣaṃ kṛṣṇaṃ kālasūryamivoditam | sarpahastamanirdeśyaṃ pāśahastamivāntakam
धूमरहित पर ज्वालामय, काला, मानो काल का सूर्य उदित हुआ हो, सर्प को हाथ में लिए हुए, अनिर्देश्य, पाश हाथ में लिए अन्तक के समान।
श्लोक 260 (13.45.260)
दृष्टवानस्मि गोविन्द तदस्त्रं रुद्रसन्निधौ । परशुस्तीक्ष्णधारश्च दत्तो रामस्य यः पुरा ॥
dṛṣṭavānasmi govinda tadastraṃ rudrasannidhau | paraśustīkṣṇadhāraśca datto rāmasya yaḥ purā
हे गोविन्द, मैंने रुद्र के समीप वह अस्त्र देखा, और वह तीखी धारवाला परशु भी, जो पूर्वकाल में राम को दिया गया था —
श्लोक 261 (13.45.261)
महादेवेन तुष्टेन दत्तं भृगुसुताय च । कार्तवीर्यो हतो येन चक्रवर्ती महामृधे ॥
mahādevena tuṣṭena dattaṃ bhṛgusutāya ca | kārtavīryo hato yena cakravartī mahāmṛdhe
जिसे प्रसन्न महादेव ने भृगु के पुत्र को दिया था; जिससे चक्रवर्ती कार्तवीर्य महायुद्ध में मारा गया,
श्लोक 262 (13.45.262)
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी येन निःक्षत्रिया कृता । जामदग्न्येन गोविन्द रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥
triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivī yena niḥkṣatriyā kṛtā | jāmadagnyena govinda rāmeṇākliṣṭakarmaṇā
और जिससे हे गोविन्द, अक्लिष्टकर्मा जमदग्निपुत्र राम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया।
श्लोक 263 (13.45.263)
दीप्तधारः सुरौद्रास्यः सर्पकण्ठाग्रवेष्टितः । अभवच्छूलिनोऽभ्याशे दीप्तवह्निशतोपमः ॥
dīptadhāraḥ suraudrāsyaḥ sarpakaṇṭhāgraveṣṭitaḥ | abhavacchūlino'bhyāśe dīptavahniśatopamaḥ
तीखी धारवाला, अति भयंकर मुखवाला, कण्ठ के अग्रभाग में सर्प से लिपटा हुआ वह परशु शूली के समीप सैकड़ों जलती अग्नियों के समान स्थित था।
श्लोक 264 (13.45.264)
असङ्ख्येयानि चास्त्राणि तस्य दिव्यानि धीमतः । प्राधान्यतो मयैतानि कीर्तितानि तवानघ ॥
asaṅkhyeyāni cāstrāṇi tasya divyāni dhīmataḥ | prādhānyato mayaitāni kīrtitāni tavānagha
उन बुद्धिमान् के दिव्य अस्त्र असंख्य हैं; हे निष्पाप, मैंने तुम्हें उनमें से प्रमुख ही बताए हैं।
श्लोक 265 (13.45.265)
सव्यदेशे तु देवस्य ब्रह्मा लोकपितामहः । दिव्यं विमानमास्थाय हंसयुक्तं मनोजवम् ॥
savyadeśe tu devasya brahmā lokapitāmahaḥ | divyaṃ vimānamāsthāya haṃsayuktaṃ manojavam
देव के दाहिनी ओर लोकपितामह ब्रह्मा थे, जो हंसों से जुते मन के समान वेगवान् दिव्य विमान पर आरूढ़ थे,
श्लोक 266 (13.45.266)
वामपार्श्वगतश्चापि तथा नारायणः स्थितः । वैनतेयं समारुह्य शङ्खचक्रगदाधरः ॥
vāmapārśvagataścāpi tathā nārāyaṇaḥ sthitaḥ | vainateyaṃ samāruhya śaṅkhacakragadādharaḥ
और बाईं ओर शंख, चक्र और गदा धारण किए नारायण गरुड़ पर आरूढ़ होकर खड़े थे।
श्लोक 267 (13.45.267)
स्कन्दो मयूरमास्थाय स्थितो देव्याः समीपतः । शक्तिघण्टे समादाय द्वितीय इव पावकः ॥
skando mayūramāsthāya sthito devyāḥ samīpataḥ | śaktighaṇṭe samādāya dvitīya iva pāvakaḥ
स्कन्द मयूर पर सवार होकर देवी के समीप खड़े थे; शक्ति और घण्टा लिए हुए वे दूसरे अग्नि के समान थे।
श्लोक 268 (13.45.268)
पुरस्ताच्चैव देवस्य नन्दिं पश्याम्यवस्थितम् । शूलं विष्टभ्य तिष्ठन्तं द्वितीयमिव शङ्करम् ॥
purastāccaiva devasya nandiṃ paśyāmyavasthitam | śūlaṃ viṣṭabhya tiṣṭhantaṃ dvitīyamiva śaṅkaram
देव के सामने मैंने नन्दी को खड़े देखा, जो त्रिशूल का सहारा लिए दूसरे शंकर के समान लग रहे थे।
श्लोक 269 (13.45.269)
स्वायंभुवाद्या मनवो भृग्वाद्या ऋषयस्तथा । शक्राद्या देवताश्चैव सर्व एव समभ्ययुः ॥
svāyaṃbhuvādyā manavo bhṛgvādyā ṛṣayastathā | śakrādyā devatāścaiva sarva eva samabhyayuḥ
स्वायम्भुव आदि मनु, भृगु आदि ऋषि और शक्र आदि देवता — सब वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 270 (13.45.270)
सर्वभूतगणाश्चैव मातरो विविधाः स्थिताः । तेऽभिवाद्य महात्मानं परिवार्य समन्ततः ॥
sarvabhūtagaṇāścaiva mātaro vividhāḥ sthitāḥ | te'bhivādya mahātmānaṃ parivārya samantataḥ
सब प्राणियों के गण और अनेक मातृकाएँ वहाँ खड़ी थीं; उन्होंने उन महात्मा को प्रणाम किया और चारों ओर से उन्हें घेर लिया।
श्लोक 271 (13.45.271)
अस्तुवन्विविधैः स्तोत्रैर्महादेवं सुरास्तदा । जगन्मूर्ति महालिङ्गं तन्मध्ये स्फीतरूपिणम् ॥
astuvanvividhaiḥ stotrairmahādevaṃ surāstadā | jaganmūrti mahāliṅgaṃ tanmadhye sphītarūpiṇam
तब देवताओं ने अनेक स्तोत्रों से महादेव की स्तुति की — जो जगत् की मूर्ति, महालिंग हैं और उनके बीच विशाल रूप में प्रकट थे।
श्लोक 272 (13.45.272)
ब्रह्मा भवं तदाऽस्तौवीद्रथन्तरमुदीरयन् । ज्येष्ठसाम्ना च देवेशं जगौ नारायणस्तदा ॥
brahmā bhavaṃ tadā'stauvīdrathantaramudīrayan | jyeṣṭhasāmnā ca deveśaṃ jagau nārāyaṇastadā
तब ब्रह्मा ने रथन्तर साम का गान करते हुए भव की स्तुति की; और नारायण ने ज्येष्ठ साम से देवेश का गान किया;
श्लोक 273 (13.45.273)
गृणन्ब्रह्म परं शक्रः शतरुद्रियमुत्तमम् । ब्रह्मा नारायणश्चैव देवराजश्च कौशिकः । अशोभन्त महात्मानस्त्रयस्त्रय इवाग्नयः ॥
gṛṇanbrahma paraṃ śakraḥ śatarudriyamuttamam | brahmā nārāyaṇaścaiva devarājaśca kauśikaḥ | aśobhanta mahātmānastrayastraya ivāgnayaḥ
और शक्र ने परम ब्रह्म, उत्तम शतरुद्रिय का पाठ किया। ब्रह्मा, नारायण और कौशिक देवराज — ये तीनों महात्मा तीन अग्नियों के समान शोभित हुए।
श्लोक 274 (13.45.274)
तेषां मध्यगतो देवो रराज भगवाञ्छिवः । शरदभ्रविनिर्मुक्तः परिधिस्थ इवांशुमान् ॥
teṣāṃ madhyagato devo rarāja bhagavāñchivaḥ | śaradabhravinirmuktaḥ paridhistha ivāṃśumān
उनके बीच भगवान् शिव ऐसे शोभित हुए जैसे शरद् के मेघों से मुक्त, परिवेश में स्थित सूर्य।
श्लोक 275 (13.45.275)
अयुतानि च चन्द्रार्कानपश्यं दिवि केशव । ततोऽहमस्तुवं देवं स्तवेनानेन सुव्रत ॥
ayutāni ca candrārkānapaśyaṃ divi keśava | tato'hamastuvaṃ devaṃ stavenānena suvrata
हे केशव, मैंने आकाश में हज़ारों-हज़ार चन्द्रमा और सूर्य देखे; तब हे सुव्रत, मैंने इस स्तोत्र से देव की स्तुति की।
श्लोक 276 (13.45.276)
नमो देवाधिदेवाय महादेवाय ते नमः । शक्ररूपाय शक्राय शक्रवेषधराय च ॥
namo devādhidevāya mahādevāya te namaḥ | śakrarūpāya śakrāya śakraveṣadharāya ca
देवाधिदेव को नमस्कार; हे महादेव, आपको नमस्कार; शक्र के रूपवाले, शक्र और शक्र का वेश धारण करनेवाले को नमस्कार।
श्लोक 277 (13.45.277)
नमस्ते वज्रहस्ताय पिङ्गलायारुणाय च । पिनाकपाणये नित्यं शङ्खशूलधराय च ॥
namaste vajrahastāya piṅgalāyāruṇāya ca | pinākapāṇaye nityaṃ śaṅkhaśūladharāya ca
वज्र हाथ में धारण करनेवाले, पिंगल और अरुण वर्णवाले आपको नमस्कार; पिनाक हाथ में रखनेवाले, शंख और शूल धारण करनेवाले आपको सदा नमस्कार।
श्लोक 278 (13.45.278)
नमस्ते कृष्णवासाय कृष्णकुञ्चितमूर्धज । कृष्णाजिनोत्तरीयाय कृष्णाष्टमिरताय च ॥
namaste kṛṣṇavāsāya kṛṣṇakuñcitamūrdhaja | kṛṣṇājinottarīyāya kṛṣṇāṣṭamiratāya ca
काले वस्त्र पहननेवाले, काले घुँघराले केशोंवाले, कृष्णमृगचर्म को उत्तरीय बनानेवाले और कृष्णाष्टमी में रत रहनेवाले आपको नमस्कार।
श्लोक 279 (13.45.279)
शुक्लवर्णाय शुक्लाय शुक्लाम्बरधराय च । शुक्लभस्मावलिप्ताय शुक्लकर्मरताय च ॥
śuklavarṇāya śuklāya śuklāmbaradharāya ca | śuklabhasmāvaliptāya śuklakarmaratāya ca
श्वेत वर्णवाले, शुक्ल स्वरूप, श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले, श्वेत भस्म से लिप्त और शुक्ल कर्मों में रत रहनेवाले आपको नमस्कार।
श्लोक 280 (13.45.280)
नमोस्तु रक्तवर्णाय रक्ताम्बरधराय च । रक्तध्वजपताकाय रक्तस्रगनुलेपिने ॥
namostu raktavarṇāya raktāmbaradharāya ca | raktadhvajapatākāya raktasraganulepine
रक्त वर्णवाले, रक्त वस्त्र धारण करनेवाले, रक्त ध्वज और पताकावाले, रक्त माला और रक्त अनुलेप धारण करनेवाले आपको नमस्कार।
श्लोक 281 (13.45.281)
नमोस्तु पीतवर्णाय पीताम्बरधराय च ॥
namostu pītavarṇāya pītāmbaradharāya ca
पीले वर्ण वाले, पीले वस्त्र धारण करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 282 (13.45.282)
नमोस्तूच्छ्रितच्छत्राय किरीटवरधारिणे । अर्धहारार्दकेयूर अर्धकुण्डलकर्णिने ॥
namostūcchritacchatrāya kirīṭavaradhāriṇe | ardhahārārdakeyūra ardhakuṇḍalakarṇine
ऊँचा छत्र और श्रेष्ठ मुकुट धारण करने वाले को, जो आधा हार और आधा बाजूबन्द तथा आधा कुण्डल कान में पहने हुए हैं, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 283 (13.45.283)
नमः पवनवेगाय नमो देवाय वै नमः । सुरेन्द्राय मुनीन्द्राय महेन्द्राय नमोस्तु ते ॥
namaḥ pavanavegāya namo devāya vai namaḥ | surendrāya munīndrāya mahendrāya namostu te
वायु के समान वेग वाले को नमस्कार है, देव को नमस्कार है। देवेन्द्र, मुनीन्द्र और महेन्द्र रूप आपको नमस्कार है।
श्लोक 284 (13.45.284)
नमः पद्मार्धमालाय उत्पलैर्मिश्रिताय च । अर्धचन्दनलिप्ताय अर्धस्रगनुलेपिने ॥
namaḥ padmārdhamālāya utpalairmiśritāya ca | ardhacandanaliptāya ardhasraganulepine
जिनकी माला आधी कमलों की है और नीले कमलों से मिली हुई है, जो आधे अंग में चन्दन लगाए हैं और आधे में माला तथा अनुलेपन धारण किए हैं, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 285 (13.45.285)
नम आदित्यवक्त्राय आदित्यनयनाय च । नम आदित्यवर्णाय आदित्यप्रतिमाय च ॥
nama ādityavaktrāya ādityanayanāya ca | nama ādityavarṇāya ādityapratimāya ca
सूर्य के समान मुख और सूर्य के समान नेत्र वाले को नमस्कार है; सूर्य के समान वर्ण और सूर्य के समान रूप वाले को नमस्कार है।
श्लोक 286 (13.45.286)
नमः सोमाय सौम्याय सौम्यवक्त्रधराय च । सौम्यरूपाय मुख्याय सौम्यदंष्ट्राविभूषिणे ॥
namaḥ somāya saumyāya saumyavaktradharāya ca | saumyarūpāya mukhyāya saumyadaṃṣṭrāvibhūṣiṇe
सोम को, सौम्य को, सौम्य मुख धारण करने वाले को नमस्कार है; सौम्य रूप वाले, प्रमुख, सौम्य दाढ़ों से सुशोभित को नमस्कार है।
श्लोक 287 (13.45.287)
नमः श्यामाय गौराय अर्धपीतार्धपाण्डुरे । नारीनरशरीराय स्त्रीपुंसाय नमोस्तु ते ॥
namaḥ śyāmāya gaurāya ardhapītārdhapāṇḍure | nārīnaraśarīrāya strīpuṃsāya namostu te
श्याम को, गौर को, जो आधे पीत और आधे पाण्डुर हैं, जिनका शरीर नारी और नर दोनों का है, जो स्त्री और पुरुष दोनों रूप हैं, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 288 (13.45.288)
नमो वृषभवाहाय गजेन्द्रगमनाय च । दुर्गमाय नमस्तुभ्यमगम्यागमनाय च ॥
namo vṛṣabhavāhāya gajendragamanāya ca | durgamāya namastubhyamagamyāgamanāya ca
बैल पर चलने वाले, गजराज की चाल से चलने वाले को नमस्कार है; दुर्गम को और अगम्य स्थानों में विचरने वाले आपको नमस्कार है।
श्लोक 289 (13.45.289)
नमोस्तु गणनीताय गणवृन्दरताय च । गुणानुयातमार्गाय गणनित्यव्रताय च ॥
namostu gaṇanītāya gaṇavṛndaratāya ca | guṇānuyātamārgāya gaṇanityavratāya ca
गणों द्वारा ले जाए जाने वाले, गणसमूह में रमने वाले को नमस्कार है; जिनके मार्ग का गुण अनुसरण करते हैं और जिनका व्रत सदा गणों से जुड़ा है, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 290 (13.45.290)
नमः श्वेताभ्रवर्णाय संध्यारागप्रभाय च । अनुद्दिष्टाभिधानाय स्वरूपाय नमोस्तु ते ॥
namaḥ śvetābhravarṇāya saṃdhyārāgaprabhāya ca | anuddiṣṭābhidhānāya svarūpāya namostu te
श्वेत मेघ के वर्ण वाले, सन्ध्या की लालिमा जैसी आभा वाले को नमस्कार है; जिनका नाम बताया नहीं जा सकता और जो अपने स्वरूप में स्थित हैं, उन आपको नमस्कार है।
श्लोक 291 (13.45.291)
नमो रक्ताग्रवासाय रक्तसूत्रधराय च । रक्तमालाविचित्राय रक्ताम्बरधराय च ॥
namo raktāgravāsāya raktasūtradharāya ca | raktamālāvicitrāya raktāmbaradharāya ca
लाल किनारे के वस्त्र वाले, लाल सूत्र धारण करने वाले, लाल मालाओं से विचित्र शोभा वाले और लाल वस्त्र पहनने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 292 (13.45.292)
मणिभूषितमूर्धाय नमश्चन्द्रार्धभूषिणे । विचित्रमणिमूर्धाय कुसुमाष्टधराय च ॥
maṇibhūṣitamūrdhāya namaścandrārdhabhūṣiṇe | vicitramaṇimūrdhāya kusumāṣṭadharāya ca
जिनका मस्तक मणियों से सजा है, जो अर्धचन्द्र से विभूषित हैं, जिनका मस्तक विचित्र मणियों से युक्त है और जो आठ पुष्प धारण करते हैं, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 293 (13.45.293)
नमोऽग्निमुखनेत्राय सहस्रशशिलोचने । अग्निरूपाय कान्ताय नमोस्तु गहनाय च ॥
namo'gnimukhanetrāya sahasraśaśilocane | agnirūpāya kāntāya namostu gahanāya ca
जिनके मुख और नेत्र अग्नि हैं, जिनके नेत्र सहस्र चन्द्रमाओं के समान हैं, जो अग्निरूप और कान्तिमान हैं, उन गहन को नमस्कार है।
श्लोक 294 (13.45.294)
खचराय नमस्तुभ्यं गोचराभिरताय च । भूचराय भुवनाय अनन्ताय शिवाय च ॥
khacarāya namastubhyaṃ gocarābhiratāya ca | bhūcarāya bhuvanāya anantāya śivāya ca
आकाश में विचरने वाले, पृथ्वी पर घूमने में रमने वाले, भूमि पर चलने वाले, भुवन रूप, अनन्त और शिव आपको नमस्कार है।
श्लोक 295 (13.45.295)
नमो दिग्वाससे नित्यमधिवाससुवाससे । नमो जगन्निवासाय प्रतिपत्तिसुखाय च ॥
namo digvāsase nityamadhivāsasuvāsase | namo jagannivāsāya pratipattisukhāya ca
दिशाओं को ही वस्त्र बनाने वाले, फिर भी सदा सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित को नमस्कार है; जगत् को निवास बनाने वाले और जानने वालों को सुख देने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 296 (13.45.296)
नित्यमुद्बद्धमुकुटे महाकेयूरधारिणे । सर्पकण्ठोपहाराय विचित्राभरणाय च ॥
nityamudbaddhamukuṭe mahākeyūradhāriṇe | sarpakaṇṭhopahārāya vicitrābharaṇāya ca
सदा बँधा हुआ मुकुट पहनने वाले, बड़े बाजूबन्द धारण करने वाले, कण्ठ में सर्प का हार रखने वाले और विचित्र आभूषणों वाले को नमस्कार है।
श्लोक 297 (13.45.297)
नमस्त्रिनेत्रनेत्राय सहस्रशतलोचने । स्त्रीपुंसाय नपुंसाय नमः साङ्ख्याय योगिने ॥
namastrinetranetrāya sahasraśatalocane | strīpuṃsāya napuṃsāya namaḥ sāṅkhyāya yogine
तीन नेत्रों वाले को, लाख नेत्रों वाले को नमस्कार है; स्त्री-पुरुष रूप को, नपुंसक रूप को, साङ्ख्य को और योगी को नमस्कार है।
श्लोक 298 (13.45.298)
शंयोरभिस्रवन्ताय अथर्वाय नमोनमः । नमः सर्वार्तिनाशाय नमः शोकहराय च ॥
śaṃyorabhisravantāya atharvāya namonamaḥ | namaḥ sarvārtināśāya namaḥ śokaharāya ca
जिनसे कल्याण और सुख प्रवाहित होता है, उन अथर्व को बार-बार नमस्कार है; सब पीड़ाओं का नाश करने वाले और शोक हरने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 299 (13.45.299)
नमो मेघनिनादाय बहुमायाधराय च । बीजक्षेत्राभिपालाय स्रष्टाराय नमोनमः ॥
namo meghaninādāya bahumāyādharāya ca | bījakṣetrābhipālāya sraṣṭārāya namonamaḥ
मेघ के समान गर्जना वाले, अनेक मायाओं को धारण करने वाले, बीज और क्षेत्र के रक्षक और स्रष्टा को बार-बार नमस्कार है।
श्लोक 300 (13.45.300)
नमः सुरासुरेशाय विश्वेशाय नमोनमः । नमः पवनवेगाय नमः पवनरूपिणे ॥
namaḥ surāsureśāya viśveśāya namonamaḥ | namaḥ pavanavegāya namaḥ pavanarūpiṇe
सुरों और असुरों के स्वामी, विश्वेश्वर को बार-बार नमस्कार है। वायु के समान वेग वाले को नमस्कार है, वायुरूप को नमस्कार है।
श्लोक 301 (13.45.301)
नमः काञ्चनमालाय गिरिमालाय वै नमः । नमः सुरारिमालाय चण्डवेगाय वै नमः ॥
namaḥ kāñcanamālāya girimālāya vai namaḥ | namaḥ surārimālāya caṇḍavegāya vai namaḥ
स्वर्णमाला वाले और पर्वतमाला वाले को नमस्कार है; सुरों के शत्रुओं की माला धारण करने वाले, प्रचण्ड वेग वाले को नमस्कार है।
श्लोक 302 (13.45.302)
ब्रह्मशिरोपहर्ताय महिषघ्नाय वै नमः । नमः स्त्रीरूपधाराय यज्ञविध्वंसनाय च ॥
brahmaśiropahartāya mahiṣaghnāya vai namaḥ | namaḥ strīrūpadhārāya yajñavidhvaṃsanāya ca
ब्रह्मा का शिर हरने वाले और महिष को मारने वाले को नमस्कार है; स्त्री का रूप धारण करने वाले और यज्ञ का विध्वंस करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 303 (13.45.303)
नमस्त्रिपुरहर्ताय यज्ञविध्वंसनाय च । नमः कामाङ्गनाशाय कालदण्डधराय च ॥
namastripurahartāya yajñavidhvaṃsanāya ca | namaḥ kāmāṅganāśāya kāladaṇḍadharāya ca
त्रिपुर का नाश करने वाले और यज्ञ का विध्वंस करने वाले को नमस्कार है; काम के अंग का नाश करने वाले और कालदण्ड धारण करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 304 (13.45.304)
नमः स्कन्दविशाखाय ब्रह्मदण्डाय वै नमः । नमो भवाय शर्वाय विश्वरूपाय वै नमः ॥
namaḥ skandaviśākhāya brahmadaṇḍāya vai namaḥ | namo bhavāya śarvāya viśvarūpāya vai namaḥ
स्कन्द और विशाख रूप को, ब्रह्मदण्ड रूप को नमस्कार है; भव, शर्व और विश्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 305 (13.45.305)
ईशानाय भवघ्नाय नमोस्त्वन्धकघातिने । नमो विश्वाय मायाय चिन्त्याचिन्त्याय वै नमः ॥
īśānāya bhavaghnāya namostvandhakaghātine | namo viśvāya māyāya cintyācintyāya vai namaḥ
ईशान को, संसार का नाश करने वाले को, अन्धक का वध करने वाले को नमस्कार है; विश्वरूप को, माया को, चिन्त्य और अचिन्त्य को नमस्कार है।
श्लोक 306 (13.45.306)
त्वं नो गतिश्च श्रेष्ठश्च त्वमेव हृदयं तथा । त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः ॥
tvaṃ no gatiśca śreṣṭhaśca tvameva hṛdayaṃ tathā | tvaṃ brahmā sarvadevānāṃ rudrāṇāṃ nīlalohitaḥ
आप ही हमारी गति हैं, आप ही श्रेष्ठ हैं और आप ही हमारे हृदय हैं। सब देवताओं में आप ब्रह्मा हैं और रुद्रों में नीललोहित हैं।
श्लोक 307 (13.45.307)
आत्मा च सर्वभूतानां साङ्ख्ये पुरुष उच्यते । ऋषभस्त्वं पवित्राणां योगिनां निष्कलः शिवः ॥
ātmā ca sarvabhūtānāṃ sāṅkhye puruṣa ucyate | ṛṣabhastvaṃ pavitrāṇāṃ yogināṃ niṣkalaḥ śivaḥ
आप सब प्राणियों की आत्मा हैं; साङ्ख्य में आप पुरुष कहलाते हैं। पवित्रों में आप वृषभ हैं और योगियों में निष्कल शिव हैं।
श्लोक 308 (13.45.308)
गृहस्थस्त्वमाश्रमिणामीश्वराणां महेश्वरः । कुबेरः सर्वयक्षाणां क्रतूनां विष्णुरुच्यते ॥
gṛhasthastvamāśramiṇāmīśvarāṇāṃ maheśvaraḥ | kuberaḥ sarvayakṣāṇāṃ kratūnāṃ viṣṇurucyate
आश्रमों में आप गृहस्थ हैं, ईश्वरों में महेश्वर हैं; सब यक्षों में कुबेर हैं और यज्ञों में आप विष्णु कहे जाते हैं।
श्लोक 309 (13.45.309)
पर्वतानां भवान्मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः । वसिष्ठस्त्वमृषीणां च ग्रहाणां सूर्य उच्यते ॥
parvatānāṃ bhavānmerurnakṣatrāṇāṃ ca candramāḥ | vasiṣṭhastvamṛṣīṇāṃ ca grahāṇāṃ sūrya ucyate
पर्वतों में आप मेरु हैं, नक्षत्रों में चन्द्रमा हैं; ऋषियों में आप वसिष्ठ हैं और ग्रहों में आप सूर्य कहे जाते हैं।
श्लोक 310 (13.45.310)
आरण्यानां पशूनां च सिंहस्त्वं परमेश्वरः । ग्राम्याणां गोवृषश्चासि भवाँल्लोकप्रपूजितः ॥
āraṇyānāṃ paśūnāṃ ca siṃhastvaṃ parameśvaraḥ | grāmyāṇāṃ govṛṣaścāsi bhavām̐llokaprapūjitaḥ
वन के पशुओं में आप सिंह हैं, हे परमेश्वर; ग्राम्य पशुओं में आप बैल हैं। आप संसार से पूजित हैं।
श्लोक 311 (13.45.311)
आदित्यानां भवान्विष्णुर्वसूनां चैव पावकः । पक्षिणां वैनतेयस्त्वमनन्तो भुजगेषु च ॥
ādityānāṃ bhavānviṣṇurvasūnāṃ caiva pāvakaḥ | pakṣiṇāṃ vainateyastvamananto bhujageṣu ca
आदित्यों में आप विष्णु हैं, वसुओं में अग्नि हैं; पक्षियों में आप वैनतेय (गरुड़) हैं और सर्पों में अनन्त हैं।
श्लोक 312 (13.45.312)
सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रियम् । सनत्कुमारो योगानां साङ्ख्यानां कपिलो ह्यसि ॥
sāmavedaśca vedānāṃ yajuṣāṃ śatarudriyam | sanatkumāro yogānāṃ sāṅkhyānāṃ kapilo hyasi
वेदों में आप सामवेद हैं, यजुर्मन्त्रों में शतरुद्रिय हैं; योगियों में आप सनत्कुमार हैं और साङ्ख्यवेत्ताओं में कपिल हैं।
श्लोक 313 (13.45.313)
शक्रोसि मरुतां देव पितॄणां हव्यवाडसि । ब्रह्मलोकश्च लोकानां गतीनां मोक्ष उच्यसे ॥
śakrosi marutāṃ deva pitṝṇāṃ havyavāḍasi | brahmalokaśca lokānāṃ gatīnāṃ mokṣa ucyase
मरुतों में आप शक्र हैं, हे देव; पितरों में आप हव्यवाह हैं; लोकों में ब्रह्मलोक हैं और गतियों में आप मोक्ष कहे जाते हैं।
श्लोक 314 (13.45.314)
क्षीरोदः सागराणां च शैलानां हिमवान्गिरिः । वर्णानां ब्राह्मणश्चासि विप्राणां दीक्षितो द्विजः ॥
kṣīrodaḥ sāgarāṇāṃ ca śailānāṃ himavāngiriḥ | varṇānāṃ brāhmaṇaścāsi viprāṇāṃ dīkṣito dvijaḥ
समुद्रों में आप क्षीरसागर हैं, पर्वतों में हिमालय हैं; वर्णों में आप ब्राह्मण हैं और ब्राह्मणों में दीक्षित द्विज हैं।
श्लोक 315 (13.45.315)
आदिस्त्वमसि लोकानां संहर्ता काल एव च । यच्चान्यदपि लोके वै सर्वतेजोधिकं स्मृतम् । तत्सर्वं भगवानेव इति मे निश्चिता मतिः ॥
ādistvamasi lokānāṃ saṃhartā kāla eva ca | yaccānyadapi loke vai sarvatejodhikaṃ smṛtam | tatsarvaṃ bhagavāneva iti me niścitā matiḥ
आप लोकों के आदि हैं और संहार करने वाले काल भी आप ही हैं। संसार में और भी जो कुछ सब तेजों से बढ़कर माना जाता है, वह सब आप भगवान् ही हैं, यही मेरा निश्चित मत है।
श्लोक 316 (13.45.316)
नमस्ते भगवन्देव नमस्ते भक्तवत्सलः । योगेश्वर नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वसम्भव ॥
namaste bhagavandeva namaste bhaktavatsalaḥ | yogeśvara namaste'stu namaste viśvasambhava
हे भगवन्, हे देव, आपको नमस्कार है; हे भक्तवत्सल, आपको नमस्कार है; हे योगेश्वर, आपको नमस्कार है; हे विश्व के उत्पत्तिस्थान, आपको नमस्कार है।
श्लोक 317 (13.45.317)
प्रसीद मम भक्तस्य दीनस्य कृपणस्य च । अनैश्वर्येण युक्तस्य गतिर्भव सनातन ॥
prasīda mama bhaktasya dīnasya kṛpaṇasya ca | anaiśvaryeṇa yuktasya gatirbhava sanātana
मुझ भक्त पर प्रसन्न हों, जो दीन और दयनीय हूँ और ऐश्वर्य से रहित हूँ; हे सनातन, आप मेरी गति बनिए।
श्लोक 318 (13.45.318)
यच्चापराधं कृतवानज्ञात्वा परमेश्वर । मद्भक्त इति देवेश तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि ॥
yaccāparādhaṃ kṛtavānajñātvā parameśvara | madbhakta iti deveśa tatsarvaṃ kṣantumarhasi
हे परमेश्वर, अनजाने में मुझसे जो भी अपराध हुआ हो, हे देवेश, वह सब आप क्षमा कर दें, क्योंकि मैं आपका भक्त हूँ।
श्लोक 319 (13.45.319)
मोहितश्चास्मि देवेश त्वया रूपविपर्ययात् । नार्घ्यं तेन मया दत्तं पाद्यं चापि महेश्वर ॥
mohitaścāsmi deveśa tvayā rūpaviparyayāt | nārghyaṃ tena mayā dattaṃ pādyaṃ cāpi maheśvara
हे देवेश, आपके रूप के बदल जाने से मैं मोहित हो गया था; इसी कारण हे महेश्वर, मैंने आपको न अर्घ्य दिया और न पाद्य।
श्लोक 320 (13.45.320)
एवं स्तुत्वाऽहमीशानं पाद्यमर्घ्यं च भक्तितः । कृताञ्जलिपुटो भूत्वा सर्वं तस्मै न्यवेदयम् ॥
evaṃ stutvā'hamīśānaṃ pādyamarghyaṃ ca bhaktitaḥ | kṛtāñjalipuṭo bhūtvā sarvaṃ tasmai nyavedayam
इस प्रकार ईशान की स्तुति करके मैंने हाथ जोड़कर भक्ति से उन्हें पाद्य और अर्घ्य दिया और सब कुछ उन्हें निवेदन कर दिया।
श्लोक 321 (13.45.321)
ततः शीताम्बुसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विता । पुष्पवृष्टिः शुभा तात पपात मम मूर्धनि ॥
tataḥ śītāmbusaṃyuktā divyagandhasamanvitā | puṣpavṛṣṭiḥ śubhā tāta papāta mama mūrdhani
तब शीतल जल से मिली हुई, दिव्य सुगन्ध से भरी, शुभ पुष्पवर्षा, हे तात, मेरे मस्तक पर गिरी।
श्लोक 322 (13.45.322)
दुन्दुभिश्च तदा दिव्यस्ताडितो देवकिंकरैः । ववौ च मारुतः पुण्यः शुचिगन्धः सुखावहः ॥
dundubhiśca tadā divyastāḍito devakiṃkaraiḥ | vavau ca mārutaḥ puṇyaḥ śucigandhaḥ sukhāvahaḥ
तब देवताओं के सेवकों ने दिव्य दुन्दुभि बजाई और पवित्र, शुद्ध गन्ध वाली, सुख देने वाली वायु बहने लगी।
श्लोक 323 (13.45.323)
ततः प्रीतो महादेवः सपत्नीको वृषध्वजः । अब्रवीत्त्रिदशांस्तत्र हर्षयन्निव मां तदा ॥
tataḥ prīto mahādevaḥ sapatnīko vṛṣadhvajaḥ | abravīttridaśāṃstatra harṣayanniva māṃ tadā
तब वृषध्वज महादेव, प्रसन्न होकर, पत्नी सहित, मानो मुझे हर्षित करते हुए वहाँ देवताओं से बोले।
महादेव उवाच
श्लोक 324 (13.45.324)
पश्यध्वं त्रिदशाः सर्वे उपमन्योर्महात्मनः । मयि भक्तिं परां नित्यमेकभावादवस्थिताम् ॥
paśyadhvaṃ tridaśāḥ sarve upamanyormahātmanaḥ | mayi bhaktiṃ parāṃ nityamekabhāvādavasthitām
देवताओ, देखो, महात्मा उपमन्यु की मुझमें सदा एकभाव से स्थित परम भक्ति को।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 325 (13.45.325)
एवमुक्तास्तदा कृष्ण सुरास्ते शूलपाणिना । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे नमस्कृत्वा वृषध्वजम् ॥
evamuktāstadā kṛṣṇa surāste śūlapāṇinā | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve namaskṛtvā vṛṣadhvajam
हे कृष्ण, शूलपाणि के इस प्रकार कहने पर उन सब देवताओं ने वृषध्वज को नमस्कार किया और हाथ जोड़कर कहा:
देवा ऊचुः
श्लोक 326 (13.45.326)
भगवन्देवदेवेश लोकनाथ जगत्पते । लभतां सर्वकामेभ्यः फलं त्वत्तो द्विजोत्तमः ॥
bhagavandevadeveśa lokanātha jagatpate | labhatāṃ sarvakāmebhyaḥ phalaṃ tvatto dvijottamaḥ
हे भगवन्, देवदेवेश, लोकनाथ, जगत्पति, यह द्विजश्रेष्ठ आपसे अपनी सब कामनाओं का फल प्राप्त करे।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 327 (13.45.327)
एवमुक्तस्ततः शर्वः सुरैर्ब्रह्मादिभिस्तथा । आह मां भगवानीशः प्रहसन्निव शङ्करः ॥
evamuktastataḥ śarvaḥ surairbrahmādibhistathā | āha māṃ bhagavānīśaḥ prahasanniva śaṅkaraḥ
ब्रह्मा आदि देवताओं के इस प्रकार कहने पर भगवान् ईशान शर्व शंकर ने मानो हँसते हुए मुझसे कहा:
भगवानुवाच
श्लोक 328 (13.45.328)
वत्सोपमन्यो तृष्टोस्मि पश्य मां मुनिपुङ्गव । दृढभक्तोसि विप्रर्षे मया जिज्ञासितो ह्यसि ॥
vatsopamanyo tṛṣṭosmi paśya māṃ munipuṅgava | dṛḍhabhaktosi viprarṣe mayā jijñāsito hyasi
वत्स उपमन्यु, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; हे मुनिश्रेष्ठ, मुझे देखो। हे विप्रर्षि, तुम दृढ़ भक्त हो; मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी।
श्लोक 329 (13.45.329)
अनया चैव भक्त्या ते अत्यर्थं प्रीतिमानहम् । तस्मात्सर्वान्ददाम्यद्य कामांस्तव यथोप्सितान् ॥
anayā caiva bhaktyā te atyarthaṃ prītimānaham | tasmātsarvāndadāmyadya kāmāṃstava yathopsitān
तुम्हारी इसी भक्ति से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ; इसलिए आज मैं तुम्हारी सब इच्छित कामनाएँ पूरी करता हूँ।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 330 (13.45.330)
एवमुक्तस्य चैवाथ महादेवेन धीमता । हर्षादश्रूण्यवर्तन्त रोमहर्षस्त्वजायत ॥
evamuktasya caivātha mahādevena dhīmatā | harṣādaśrūṇyavartanta romaharṣastvajāyata
बुद्धिमान् महादेव के मुझसे इस प्रकार कहने पर हर्ष से मेरे आँसू बहने लगे और रोमाञ्च हो आया।
श्लोक 331 (13.45.331)
अब्रवं च तदा देव हर्षगद्गदया गिरा । जानुभ्यामवनीं गत्वा प्रणम्य च पुनःपुनः ॥
abravaṃ ca tadā deva harṣagadgadayā girā | jānubhyāmavanīṃ gatvā praṇamya ca punaḥpunaḥ
तब मैंने घुटनों के बल भूमि पर बैठकर बार-बार प्रणाम करके, हर्ष से गद्गद वाणी में देव से कहा:
श्लोक 332 (13.45.332)
अद्य जातो ह्यहं देव सफलं जन्म चाद्य मे । यन्मे साक्षान्महादेवः प्रसन्नस्तिष्ठतेऽग्रतः ॥
adya jāto hyahaṃ deva saphalaṃ janma cādya me | yanme sākṣānmahādevaḥ prasannastiṣṭhate'grataḥ
हे देव, आज मेरा जन्म सच में हुआ है और आज मेरा जन्म सफल हो गया, क्योंकि साक्षात् महादेव प्रसन्न होकर मेरे सामने खड़े हैं।
श्लोक 333 (13.45.333)
यं न पश्यन्ति चैवाद्धा देवा ह्यमितविक्रमम् । तमहं दृष्टवान्देवं कोऽन्यो धन्यतरो मया ॥
yaṃ na paśyanti caivāddhā devā hyamitavikramam | tamahaṃ dṛṣṭavāndevaṃ ko'nyo dhanyataro mayā
जिन अमित पराक्रम वाले देव को देवता भी वास्तव में नहीं देख पाते, उन्हें मैंने देख लिया; मुझसे अधिक धन्य कौन है?
श्लोक 334 (13.45.334)
एवं ध्यायन्ति विद्वांसः परं तत्त्वं सनातनम् । तद्विशेषमतिख्यातं यदजं ज्ञानमक्षरम् ॥
evaṃ dhyāyanti vidvāṃsaḥ paraṃ tattvaṃ sanātanam | tadviśeṣamatikhyātaṃ yadajaṃ jñānamakṣaram
इसी प्रकार विद्वान् उस परम सनातन तत्त्व का ध्यान करते हैं, जो अपनी विशेषता में प्रसिद्ध, अजन्मा, ज्ञानरूप और अक्षर है।
श्लोक 335 (13.45.335)
स एष भगवान्देवः सर्वसत्त्वादिरव्ययः । सर्वतत्त्वविधानज्ञः प्रधानपुरुषः परः ॥
sa eṣa bhagavāndevaḥ sarvasattvādiravyayaḥ | sarvatattvavidhānajñaḥ pradhānapuruṣaḥ paraḥ
ये वही भगवान् देव हैं, जो समस्त प्राणियों के आदि और अविनाशी हैं, सब तत्त्वों की व्यवस्था को जानने वाले और परम आदिपुरुष हैं।
श्लोक 336 (13.45.336)
योऽसृजद्दक्षिणादङ्गाद्ब्रह्माणं लोकसम्भवम् । वामपार्श्वात्तथा विष्णुं लोकरक्षार्थमीश्वरः ॥
yo'sṛjaddakṣiṇādaṅgādbrahmāṇaṃ lokasambhavam | vāmapārśvāttathā viṣṇuṃ lokarakṣārthamīśvaraḥ
जिन ईश्वर ने अपने दाहिने अंग से लोकों के उत्पत्तिकर्ता ब्रह्मा को रचा और बाएँ पार्श्व से लोकरक्षा के लिए विष्णु को रचा।
श्लोक 337 (13.45.337)
युगान्ते चैव सम्प्राप्ते रुद्रमीशोऽसृजत्प्रभुः । स रुद्रः संहरन्कृत्स्नं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥
yugānte caiva samprāpte rudramīśo'sṛjatprabhuḥ | sa rudraḥ saṃharankṛtsnaṃ jagatsthāvarajaṅgamam
और युग का अन्त आने पर प्रभु ईश ने रुद्र को रचा; वह रुद्र स्थावर-जङ्गम सारे जगत् को समेटते हुए,
श्लोक 338 (13.45.338)
कालो भूत्वा परं ब्रह्म याति संवर्तकानलः । युगान्ते सर्वभूतानि ग्रसन्निव व्यवस्थितः ॥
kālo bhūtvā paraṃ brahma yāti saṃvartakānalaḥ | yugānte sarvabhūtāni grasanniva vyavasthitaḥ
काल बनकर संवर्तक अग्नि के रूप में परब्रह्म को प्राप्त होता है; युग के अन्त में वह मानो सब प्राणियों को निगलता हुआ स्थित रहता है।
श्लोक 339 (13.45.339)
एष देवो महादेवो जगत्सृष्ट्वा चराचरम् । कल्पान्ते चैव सर्वेषां स्मृतिमाक्षिप्य तिष्ठति ॥
eṣa devo mahādevo jagatsṛṣṭvā carācaram | kalpānte caiva sarveṣāṃ smṛtimākṣipya tiṣṭhati
यही देव महादेव चराचर जगत् को रचकर कल्प के अन्त में सबकी स्मृति को हर लेकर स्थित रहते हैं।
श्लोक 340 (13.45.340)
सर्वगः सर्वभूतात्मा सर्वभूतभवोद्भवः । आस्ते सर्वगतो नित्यमदृश्यः सर्वदैवतैः ॥
sarvagaḥ sarvabhūtātmā sarvabhūtabhavodbhavaḥ | āste sarvagato nityamadṛśyaḥ sarvadaivataiḥ
सर्वव्यापी, सब प्राणियों के आत्मा, सब भूतों के उद्भव के भी उद्भव, वे सर्वगत होकर सदा सब देवताओं के लिए अदृश्य रहते हैं।
श्लोक 341 (13.45.341)
यदि देयो वरो मह्यं यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो । भक्तिर्भवतु मे नित्यं त्वयि देव सुरेश्वर ॥
yadi deyo varo mahyaṃ yadi tuṣṭo'si me prabho | bhaktirbhavatu me nityaṃ tvayi deva sureśvara
यदि मुझे वर देना है, यदि हे प्रभो आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो हे देव, हे सुरेश्वर, आप में मेरी भक्ति सदा बनी रहे।
श्लोक 342 (13.45.342)
अतीतानागतं चैव वर्तमानं च यद्विभो । जानीयामिति मे बुद्धिः प्रसादात्सुरसत्तम ॥
atītānāgataṃ caiva vartamānaṃ ca yadvibho | jānīyāmiti me buddhiḥ prasādātsurasattama
हे सुरश्रेष्ठ, हे विभो, आपकी कृपा से मैं भूत, भविष्य और वर्तमान को जान सकूँ, यही मेरी कामना है।
श्लोक 343 (13.45.343)
क्षीरोदनं च भुञ्जीयामक्षयं सह बान्धवैः । आश्रमे च सदाऽस्माकं सान्निध्यं परमस्तु ते ॥
kṣīrodanaṃ ca bhuñjīyāmakṣayaṃ saha bāndhavaiḥ | āśrame ca sadā'smākaṃ sānnidhyaṃ paramastu te
और मैं अपने बन्धुओं के साथ अक्षय क्षीरान्न का भोजन करूँ, तथा हमारे आश्रम में आपका परम सान्निध्य सदा बना रहे।
श्लोक 344 (13.45.344)
एवमुक्तः स मां प्राह भगवाँल्लोकपूजितः । महेश्वरो महातेजाश्चराचरगुरुः शिवः ॥
evamuktaḥ sa māṃ prāha bhagavām̐llokapūjitaḥ | maheśvaro mahātejāścarācaraguruḥ śivaḥ
ऐसा कहे जाने पर संसार से पूजित, महातेजस्वी, चराचर के गुरु भगवान् महेश्वर शिव ने मुझसे कहा:
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 345 (13.45.345)
अजरश्चामरश्चैव भव त्वं दुःखवर्जितः । यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥
ajaraścāmaraścaiva bhava tvaṃ duḥkhavarjitaḥ | yaśasvī tejasā yukto divyajñānasamanvitaḥ
तुम अजर और अमर हो जाओ, दुःख से रहित रहो; यशस्वी, तेज से युक्त और दिव्य ज्ञान से सम्पन्न हो जाओ।
श्लोक 346 (13.45.346)
ऋषीणामभिगम्यश्च मत्प्रसादाद्भविष्यसि । शीलवान्गुणसम्पन्नः सर्वज्ञः प्रियदर्शनः ॥
ṛṣīṇāmabhigamyaśca matprasādādbhaviṣyasi | śīlavānguṇasampannaḥ sarvajñaḥ priyadarśanaḥ
मेरी कृपा से तुम ऋषियों के भी गम्य होगे; तुम शीलवान्, गुणों से सम्पन्न, सर्वज्ञ और देखने में प्रिय होगे।
श्लोक 347 (13.45.347)
अक्षयं यौवनं तेऽस्तु तेजश्चैवानलोपमम् । क्षीरोदः सागरश्चैव यत्रयत्रेच्छसि प्रियम् ॥
akṣayaṃ yauvanaṃ te'stu tejaścaivānalopamam | kṣīrodaḥ sāgaraścaiva yatrayatrecchasi priyam
तुम्हारा यौवन अक्षय रहे और तेज अग्नि के समान हो; क्षीरसागर और समुद्र जहाँ-जहाँ तुम अपना प्रिय स्थान चाहो,
श्लोक 348 (13.45.348)
तत्र ते भविता कामं सान्निध्यं पयसोनिधेः । क्षीरोदनं च भुङ्क्ष्व त्वममृतेन समन्वितम् ॥
tatra te bhavitā kāmaṃ sānnidhyaṃ payasonidheḥ | kṣīrodanaṃ ca bhuṅkṣva tvamamṛtena samanvitam
वहाँ तुम्हारी इच्छा के अनुसार क्षीरसागर की उपस्थिति रहेगी; और तुम अमृत से मिले हुए क्षीरान्न का भोजन करो।
श्लोक 349 (13.45.349)
बन्धुभिः सहितः कल्पं ततो मामुपयास्यसि । अक्षया बान्धवाश्चैव कुलं गोत्रं च ते सदा ॥
bandhubhiḥ sahitaḥ kalpaṃ tato māmupayāsyasi | akṣayā bāndhavāścaiva kulaṃ gotraṃ ca te sadā
बन्धुओं के साथ तुम एक कल्प तक रहोगे, फिर मेरे पास आओगे; तुम्हारे बान्धव, कुल और गोत्र सदा अक्षय रहेंगे।
श्लोक 350 (13.45.350)
भविष्यति द्विजश्रेष्ठ मयि भक्तिश्च शाश्वती । सान्निध्यं चाश्रमे नित्यं करिष्यामि द्विजोत्तम ॥
bhaviṣyati dvijaśreṣṭha mayi bhaktiśca śāśvatī | sānnidhyaṃ cāśrame nityaṃ kariṣyāmi dvijottama
हे द्विजश्रेष्ठ, मुझमें तुम्हारी भक्ति सदा स्थिर रहेगी, और हे द्विजोत्तम, मैं तुम्हारे आश्रम में नित्य उपस्थित रहूँगा।
श्लोक 351 (13.45.351)
तिष्ठ वत्स यथाकामं नोत्कण्ठां च करिष्यति । स्मृतस्त्वया पुनर्विप्र करिष्यामि च दर्शनम् ॥
tiṣṭha vatsa yathākāmaṃ notkaṇṭhāṃ ca kariṣyati | smṛtastvayā punarvipra kariṣyāmi ca darśanam
वत्स, जैसी इच्छा हो यहीं रहो; तुम्हें कोई उत्कण्ठा नहीं होगी। हे विप्र, जब तुम फिर मेरा स्मरण करोगे, तब मैं तुम्हें दर्शन दूँगा।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 352 (13.45.352)
एवमुक्त्वा स भगवान्सूर्यकोटिसमप्रभः । ईशानः स वरान्दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥
evamuktvā sa bhagavānsūryakoṭisamaprabhaḥ | īśānaḥ sa varāndattvā tatraivāntaradhīyata
ऐसा कहकर करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले भगवान् ईशान मुझे वर देकर वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 353 (13.45.353)
एवं दृष्टो मया कृष्ण देवदेवः समाधिना । तदवाप्तं च मे सर्वं यदुक्तं तेन धीमता ॥
evaṃ dṛṣṭo mayā kṛṣṇa devadevaḥ samādhinā | tadavāptaṃ ca me sarvaṃ yaduktaṃ tena dhīmatā
इस प्रकार, हे कृष्ण, मैंने समाधि में देवदेव के दर्शन किए, और उन बुद्धिमान् ने जो कुछ कहा था वह सब मुझे प्राप्त हो गया।
श्लोक 354 (13.45.354)
प्रत्यक्षं चैव ते कृष्ण पश्य सिद्धान्व्यवस्थितान् । ऋषीन्विद्याधरान्यक्षान्गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥
pratyakṣaṃ caiva te kṛṣṇa paśya siddhānvyavasthitān | ṛṣīnvidyādharānyakṣāngandharvāpsarasastathā
और हे कृष्ण, तुम अपनी आँखों के सामने ही यहाँ स्थित सिद्धों, ऋषियों, विद्याधरों, यक्षों, गन्धर्वों और अप्सराओं को देखो।
श्लोक 355 (13.45.355)
पश्य वृक्षलतागुल्मान्सर्वपुष्पफलप्रदान् । सर्वर्तुकुसुमैर्युक्तान्सुखपत्रान्सुगन्धिनः ॥
paśya vṛkṣalatāgulmānsarvapuṣpaphalapradān | sarvartukusumairyuktānsukhapatrānsugandhinaḥ
वृक्षों, लताओं और झाड़ियों को देखो, जो सब फूल और फल देने वाली हैं, सब ऋतुओं के फूलों से भरी हैं, कोमल पत्तों वाली और सुगन्धित हैं।
श्लोक 356 (13.45.356)
सर्वमेतन्महाबाहो दिव्यभावसमन्वितम् । प्रसादाद्देवदेवस्य ईश्वरस्य महात्मनः ॥
sarvametanmahābāho divyabhāvasamanvitam | prasādāddevadevasya īśvarasya mahātmanaḥ
हे महाबाहो, यह सब दिव्य भाव से युक्त है, देवदेव महात्मा ईश्वर की कृपा से।
वासुदेव उवाच
श्लोक 357 (13.45.357)
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रत्यक्षमिव दर्शनम् । विस्मयं परमं गत्वा अब्रवं तं महामुनिम् ॥
etacchrutvā vacastasya pratyakṣamiva darśanam | vismayaṃ paramaṃ gatvā abravaṃ taṃ mahāmunim
उनकी यह बात सुनकर, जिससे दर्शन मानो प्रत्यक्ष हो उठा था, मैं परम विस्मय में भर गया और उस महामुनि से बोला:
श्लोक 358 (13.45.358)
धन्यस्त्वमसि विप्रेन्द्र कस्त्वदन्योस्ति पुण्यकृत् । यस्य देवाधिदेवस्ते सान्निध्यं कुरुतेऽऽश्रमे ॥
dhanyastvamasi viprendra kastvadanyosti puṇyakṛt | yasya devādhidevaste sānnidhyaṃ kurute''śrame
हे विप्रेन्द्र, आप धन्य हैं; आपके सिवा और कौन पुण्यात्मा है, जिसके आश्रम में देवों के भी देव अपनी उपस्थिति करते हैं?
श्लोक 359 (13.45.359)
अपि तावन्ममाप्येवं दद्यात्स भगवाञ्शिवः । दर्शनं मुनिशार्दूल प्रसादं चापि शङ्करः ॥
api tāvanmamāpyevaṃ dadyātsa bhagavāñśivaḥ | darśanaṃ muniśārdūla prasādaṃ cāpi śaṅkaraḥ
हे मुनिश्रेष्ठ, क्या वे भगवान् शिव मुझे भी इसी प्रकार अपने दर्शन और अपनी कृपा प्रदान करेंगे!
उपमन्युरुवाच
श्लोक 360 (13.45.360)
द्रक्ष्यसे पुण्डरीकाक्ष महादेवं न संशयः । अचिरेणैव कालेन यथा दृष्टो मयाऽनघ ॥
drakṣyase puṇḍarīkākṣa mahādevaṃ na saṃśayaḥ | acireṇaiva kālena yathā dṛṣṭo mayā'nagha
हे पुण्डरीकाक्ष, तुम महादेव को निःसन्देह देखोगे, और थोड़े ही समय में, जैसे हे निष्पाप, मैंने उन्हें देखा।
श्लोक 361 (13.45.361)
चक्षुषा चैव दिव्येन पश्याम्यमितविक्रमम् । षष्ठे मासि महादेवं द्रक्ष्यसे पुरुषोत्तम ॥
cakṣuṣā caiva divyena paśyāmyamitavikramam | ṣaṣṭhe māsi mahādevaṃ drakṣyase puruṣottama
मैं दिव्य नेत्र से उन अमित पराक्रमी को देखता हूँ; हे पुरुषोत्तम, छठे महीने में तुम महादेव को देखोगे।
श्लोक 362 (13.45.362)
षोडशाष्टौ वरांश्चापि प्राप्स्यसि त्वं महेश्वरात् । सपत्नीकाद्यदुश्रेष्ठ सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
ṣoḍaśāṣṭau varāṃścāpi prāpsyasi tvaṃ maheśvarāt | sapatnīkādyaduśreṣṭha satyametadbravīmi te
और हे यदुश्रेष्ठ, तुम पत्नी सहित महेश्वर से सोलह और आठ वर पाओगे; मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ।
श्लोक 363 (13.45.363)
अतीतानागतं चैव वर्तमानं च नित्यशः । विदितं मे महाबाहो प्रसादात्तस्य धीमतः ॥
atītānāgataṃ caiva vartamānaṃ ca nityaśaḥ | viditaṃ me mahābāho prasādāttasya dhīmataḥ
हे महाबाहो, उन बुद्धिमान् प्रभु की कृपा से भूत, भविष्य और वर्तमान मुझे सदा ज्ञात रहते हैं।
श्लोक 364 (13.45.364)
एतान्सहस्रशश्चान्यान्समनुध्यातवान्हरः । कस्मात्प्रसादं भगवान्न कुर्यात्तव माधव ॥
etānsahasraśaścānyānsamanudhyātavānharaḥ | kasmātprasādaṃ bhagavānna kuryāttava mādhava
हर ने ऐसे और भी सहस्रों भक्तों का स्मरण किया है; हे माधव, भगवान् आप पर कृपा क्यों न करेंगे?
श्लोक 365 (13.45.365)
त्वादृशेन हि देवानां श्लाघनीयः समागमः । ब्रह्मण्येनानृशंसेन श्रद्दधानेन चाप्युत । जप्यं तु ते प्रदास्यामि येन द्रक्ष्यसि शंकरम् ॥
tvādṛśena hi devānāṃ ślāghanīyaḥ samāgamaḥ | brahmaṇyenānṛśaṃsena śraddadhānena cāpyuta | japyaṃ tu te pradāsyāmi yena drakṣyasi śaṃkaram
आप जैसे पुरुष से मिलना देवताओं के लिए भी प्रशंसनीय है, क्योंकि आप ब्राह्मणों के भक्त, निर्दय न होने वाले और श्रद्धालु हैं। मैं आपको एक जप दूँगा, जिससे आप शंकर को देखेंगे।
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 366 (13.45.366)
अब्रवं तमहं ब्रह्मन्त्वत्प्रसादान्महामुने । द्रक्ष्ये दितिजसङ्घानां मर्दनं त्रिदशेश्वरम् ॥
abravaṃ tamahaṃ brahmantvatprasādānmahāmune | drakṣye ditijasaṅghānāṃ mardanaṃ tridaśeśvaram
मैंने उनसे कहा: हे ब्राह्मण, हे महामुनि, आपकी कृपा से मैं दिति के पुत्रों के समूहों का मर्दन करने वाले, त्रिदशेश्वर के दर्शन करूँगा।
श्लोक 367 (13.45.367)
एवं कथयतस्तस्य महादेवाश्रितां कथाम् । दिनान्यष्टौ ततो जग्मुर्मुहूर्तमिव भारत ॥
evaṃ kathayatastasya mahādevāśritāṃ kathām | dinānyaṣṭau tato jagmurmuhūrtamiva bhārata
इस प्रकार वे महादेव से जुड़ी कथा सुनाते रहे और हे भारत, आठ दिन मानो एक मुहूर्त की तरह बीत गए।
श्लोक 368 (13.45.368)
दिनेऽष्टमे तु विप्रेण दीक्षितोऽहं यथाविधि । दण्डी मुण्डी कुशी चीरी घृताक्तो मेखलीकृतः ॥
dine'ṣṭame tu vipreṇa dīkṣito'haṃ yathāvidhi | daṇḍī muṇḍī kuśī cīrī ghṛtākto mekhalīkṛtaḥ
आठवें दिन उस ब्राह्मण ने विधिपूर्वक मेरी दीक्षा की; मैं दण्ड धारण किए, मुण्डित, कुश लिए, चीर पहने, घी से लिप्त और मेखला बाँधे हुए था।
श्लोक 369 (13.45.369)
मासमेकं फलाहारो द्वितीयं सलिलाशनः । तृतीयं च चतुर्थं च पञ्चमं चानिलाशनः ॥
māsamekaṃ phalāhāro dvitīyaṃ salilāśanaḥ | tṛtīyaṃ ca caturthaṃ ca pañcamaṃ cānilāśanaḥ
एक मास मैंने फल खाकर बिताया, दूसरे मास केवल जल पिया, और तीसरे, चौथे तथा पाँचवें मास केवल वायु पर रहा।
श्लोक 370 (13.45.370)
एकपादेन तिष्ठंश्च ऊर्ध्वबाहुरतन्द्रितः । तेजः सूर्यसहस्रस्य अपश्यं दिवि भारत ॥
ekapādena tiṣṭhaṃśca ūrdhvabāhuratandritaḥ | tejaḥ sūryasahasrasya apaśyaṃ divi bhārata
एक पैर पर खड़े होकर, भुजाएँ ऊपर उठाए, बिना थके, मैंने हे भारत, आकाश में सहस्र सूर्यों का तेज देखा।
श्लोक 371 (13.45.371)
तस्य मध्यगतं चापि तेजसः पाण्डुनन्दन । इन्द्रायुधपिनद्धाङ्गं विद्युन्मालागवाक्षकम् । नीलसैलचयप्रख्यं बलाकाभूषिताम्बरम् ॥
tasya madhyagataṃ cāpi tejasaḥ pāṇḍunandana | indrāyudhapinaddhāṅgaṃ vidyunmālāgavākṣakam | nīlasailacayaprakhyaṃ balākābhūṣitāmbaram
हे पाण्डुनन्दन, उस तेज के बीच में मैंने एक आकृति देखी, जिसके अंग इन्द्रधनुषों से लिपटे थे, जिसमें बिजली की मालाएँ झरोखों जैसी थीं, जो नीले पर्वतों के समूह जैसी थी और जिसका आकाश-वस्त्र बगुलों की पंक्तियों से सजा था।
श्लोक 372 (13.45.372)
तत्र स्थितश्च भगवान्देव्या सह महाद्युतिः । तपसा तेजसा कान्त्या दीप्तया सह भार्यया ॥
tatra sthitaśca bhagavāndevyā saha mahādyutiḥ | tapasā tejasā kāntyā dīptayā saha bhāryayā
वहाँ महातेजस्वी भगवान् देवी के साथ खड़े थे, तप, तेज और कान्ति से युक्त, अपनी दीप्तिमती पत्नी के साथ।
श्लोक 373 (13.45.373)
रराज भगवांस्तत्र देव्या सह महेश्वरः । सोमेन सहितः सूर्यो यथा मेघस्थितस्तथा ॥
rarāja bhagavāṃstatra devyā saha maheśvaraḥ | somena sahitaḥ sūryo yathā meghasthitastathā
वहाँ भगवान् महेश्वर देवी के साथ ऐसे सुशोभित हुए, जैसे बादल में स्थित सूर्य चन्द्रमा के साथ शोभित होता है।
श्लोक 374 (13.45.374)
संहृष्टरोमा कौन्तेय विस्मयोत्फुल्ललोचनः । अपश्यं देवसङ्घानां गतिमार्तिहरं हरम् ॥
saṃhṛṣṭaromā kaunteya vismayotphullalocanaḥ | apaśyaṃ devasaṅghānāṃ gatimārtiharaṃ haram
हे कौन्तेय, रोमाञ्चित होकर और विस्मय से खिले हुए नेत्रों से मैंने देवसमूहों की गति और उनकी पीड़ा हरने वाले हर को देखा।
श्लोक 375 (13.45.375)
किरीटिनं गदिनं शूलपाणिं । व्याघ्राजिनं जटिलं दण्डपाणिम् । पिनाकिनं वज्रिणं तीक्ष्णदंष्ट्रं । शुभाङ्गदं व्यालयज्ञोपवीतम् ॥
kirīṭinaṃ gadinaṃ śūlapāṇiṃ | vyāghrājinaṃ jaṭilaṃ daṇḍapāṇim | pinākinaṃ vajriṇaṃ tīkṣṇadaṃṣṭraṃ | śubhāṅgadaṃ vyālayajñopavītam
किरीटधारी, गदाधारी, हाथ में त्रिशूल लिए, व्याघ्रचर्म पहने, जटाधारी, हाथ में दण्ड लिए; पिनाक और वज्र धारण किए, तीखी दाढ़ों वाले, सुन्दर बाजूबन्दों वाले और सर्प को यज्ञोपवीत बनाए हुए;
श्लोक 376 (13.45.376)
दिव्यां मालामुरसाऽनेकवर्णां । समुद्वहन्तं गुल्फदेशावलम्बाम् । चन्द्रं यथा परिविष्टं ससन्ध्यं । वर्षात्यये तद्वदपश्यमेनम् ॥
divyāṃ mālāmurasā'nekavarṇāṃ | samudvahantaṃ gulphadeśāvalambām | candraṃ yathā pariviṣṭaṃ sasandhyaṃ | varṣātyaye tadvadapaśyamenam
वक्ष पर अनेक रंगों की दिव्य माला धारण किए, जो टखनों तक लटकती थी, जैसे वर्षा के अन्त में सन्ध्या सहित घेरे में घिरा चन्द्रमा; उन्हें मैंने ऐसे ही देखा।
श्लोक 377 (13.45.377)
प्रमथानां गणैश्चैव समन्तात्परिवारितम् । शरदीव सुदुष्प्रेक्ष्यं परिविष्टं दिवाकरम् ॥
pramathānāṃ gaṇaiścaiva samantātparivāritam | śaradīva suduṣprekṣyaṃ pariviṣṭaṃ divākaram
वे चारों ओर से प्रमथगणों से घिरे थे और शरद ऋतु के घेरे में स्थित सूर्य के समान कठिनाई से देखे जा सकते थे।
श्लोक 378 (13.45.378)
एकादशशतान्येवं रुद्राणां वृषवाहनम् । अस्तुवं नियतात्मानं कर्मभिः शुभकर्मिणम् ॥
ekādaśaśatānyevaṃ rudrāṇāṃ vṛṣavāhanam | astuvaṃ niyatātmānaṃ karmabhiḥ śubhakarmiṇam
इसी प्रकार वृषवाहन के चारों ओर ग्यारह सौ रुद्र थे; और मैंने संयत चित्त से उन शुभकर्मा की उनके कर्मों के द्वारा स्तुति की।
श्लोक 379 (13.45.379)
आदित्या वसवः साध्या विश्वेदेवास्तथाऽश्विनौ । विश्वाभिः स्तुतिभिर्देवं विश्वदेवं समस्तुवन् ॥
ādityā vasavaḥ sādhyā viśvedevāstathā'śvinau | viśvābhiḥ stutibhirdevaṃ viśvadevaṃ samastuvan
आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव और दोनों अश्विनीकुमार सब प्रकार की स्तुतियों से उन विश्वदेव की स्तुति करते थे।
श्लोक 380 (13.45.380)
शतक्रतुश्च भगवान्विष्णुश्चादितिनन्दनौ । ब्रह्मा रथन्तरं साम ईरयन्ति भवान्तिके ॥
śatakratuśca bhagavānviṣṇuścāditinandanau | brahmā rathantaraṃ sāma īrayanti bhavāntike
भगवान् शतक्रतु और विष्णु, अदिति के ये दोनों पुत्र, तथा ब्रह्मा उनके समीप रथन्तर साम का गान करते थे।
श्लोक 381 (13.45.381)
योगीश्वराः सुबहवो योगदं पितरं गुरुम् । ब्रह्मर्षयश्च ससुतास्तथा देवर्षयश्च वै ॥
yogīśvarāḥ subahavo yogadaṃ pitaraṃ gurum | brahmarṣayaśca sasutāstathā devarṣayaśca vai
बहुत से योगीश्वर, पुत्रों सहित ब्रह्मर्षि और देवर्षि भी योग देने वाले उन पिता और गुरु की उपासना करते थे।
श्लोक 382 (13.45.382)
पृथिवीं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि ग्रहास्तथा । मासार्धमासा ऋतवो रात्रिः संवत्सराः क्षणाः ॥
pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca nakṣatrāṇi grahāstathā | māsārdhamāsā ṛtavo rātriḥ saṃvatsarāḥ kṣaṇāḥ
पृथ्वी और अन्तरिक्ष, नक्षत्र और ग्रह, मास और अर्धमास, ऋतुएँ, रात्रियाँ, वर्ष और क्षण;
श्लोक 383 (13.45.383)
मुहूर्ताश्च निमेषाश्च तथैव युगपर्ययाः । दिव्या राजन्नमस्यन्ति विद्याः सत्वविदस्तथा ॥
muhūrtāśca nimeṣāśca tathaiva yugaparyayāḥ | divyā rājannamasyanti vidyāḥ satvavidastathā
मुहूर्त, पलकों के झपकने के क्षण और युगों के चक्र; हे राजन्, ये दिव्य शक्तियाँ तथा विद्याएँ और तत्त्वज्ञानी उन्हें प्रणाम करते हैं।
श्लोक 384 (13.45.384)
सनत्कुमारो देवाश्च इतिहासास्तथैव च । मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥
sanatkumāro devāśca itihāsāstathaiva ca | marīciraṅgirā atriḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ
सनत्कुमार, देवगण और इतिहास, मरीचि, अङ्गिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु;
श्लोक 385 (13.45.385)
मनवः सप्त सोमश्च अथर्वा सबृहस्पतिः । भृगुर्दक्षः कश्यपश्च वसिष्ठः काश्य एव च ॥
manavaḥ sapta somaśca atharvā sabṛhaspatiḥ | bhṛgurdakṣaḥ kaśyapaśca vasiṣṭhaḥ kāśya eva ca
सात मनु, सोम, बृहस्पति सहित अथर्वा, भृगु, दक्ष, कश्यप, वसिष्ठ और काश्य;
श्लोक 386 (13.45.386)
छन्दांसि दीक्षा यज्ञाश्च दक्षिणाः पावको हविः । यज्ञोपगानि द्रव्याणि मूर्तिमन्ति युधिष्ठिर ॥
chandāṃsi dīkṣā yajñāśca dakṣiṇāḥ pāvako haviḥ | yajñopagāni dravyāṇi mūrtimanti yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, छन्द, दीक्षाएँ, यज्ञ, दक्षिणाएँ, अग्नि, हवि और यज्ञ में काम आने वाले सब द्रव्य मूर्त रूप में;
श्लोक 387 (13.45.387)
प्रजानां पालकाः सर्वे सरितः पन्नगा नगाः । देवानां मातरः सर्वा देवपत्न्यः सकन्यकाः ॥
prajānāṃ pālakāḥ sarve saritaḥ pannagā nagāḥ | devānāṃ mātaraḥ sarvā devapatnyaḥ sakanyakāḥ
प्रजाओं के सब पालक, नदियाँ, सर्प और पर्वत, देवताओं की सब माताएँ और देवपत्नियाँ अपनी कन्याओं सहित;
श्लोक 388 (13.45.388)
सहस्राणि मुनीनां च अयुतान्यर्बुदानि च । नमस्यन्ति प्रभुं शान्तं पर्वताः सागरा दिशः ॥
sahasrāṇi munīnāṃ ca ayutānyarbudāni ca | namasyanti prabhuṃ śāntaṃ parvatāḥ sāgarā diśaḥ
हज़ारों, दसियों हज़ार और करोड़ों मुनि, तथा पर्वत, समुद्र और दिशाएँ उन शान्त प्रभु को प्रणाम करते हैं।
श्लोक 389 (13.45.389)
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतवादित्रकोविदाः । दिव्यतालेषु गायन्तः स्तुवन्ति भवमद्भुतम् ॥
gandharvāpsarasaścaiva gītavāditrakovidāḥ | divyatāleṣu gāyantaḥ stuvanti bhavamadbhutam
गीत और वाद्य में कुशल गन्धर्व और अप्सराएँ दिव्य तालों पर गाते हुए अद्भुत भव की स्तुति करते हैं;
श्लोक 390 (13.45.390)
विद्याधरा दानवाश्च गुह्यका राक्षसास्तथा । सर्वाणि चैव भूतानि स्थावराणि चराणि च । नमस्यन्ति महाराज वाङ्मनः कर्मभिर्विभुम् ॥
vidyādharā dānavāśca guhyakā rākṣasāstathā | sarvāṇi caiva bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | namasyanti mahārāja vāṅmanaḥ karmabhirvibhum
विद्याधर, दानव, गुह्यक और राक्षस, तथा सब स्थावर और जङ्गम प्राणी, हे महाराज, वाणी, मन और कर्म से उन विभु को प्रणाम करते हैं।
श्लोक 391 (13.45.391)
पुरस्ताद्विष्ठितः शर्वो ममासीत्त्रिदशेश्वरः ॥
purastādviṣṭhitaḥ śarvo mamāsīttridaśeśvaraḥ
त्रिदशेश्वर शर्व मेरे सामने खड़े थे।
श्लोक 392 (13.45.392)
पुरस्ताद्विष्ठितं दृष्ट्वा ममेशानं च भारत । सप्रजापतिशक्रान्तं जगन्मामभ्युदैक्षत ॥
purastādviṣṭhitaṃ dṛṣṭvā mameśānaṃ ca bhārata | saprajāpatiśakrāntaṃ jaganmāmabhyudaikṣata
हे भारत, अपने ईशान को सामने खड़ा देखकर प्रजापति और इन्द्र सहित सारा जगत् मेरी ओर देखने लगा।
श्लोक 393 (13.45.393)
ईक्षितुं च महादेवं न मे शक्तिरभूत्तदा । ततो मामब्रवीद्देवः पश्य कृष्ण वदस्व च ॥
īkṣituṃ ca mahādevaṃ na me śaktirabhūttadā | tato māmabravīddevaḥ paśya kṛṣṇa vadasva ca
तब मुझमें महादेव को देखने की शक्ति नहीं रही। तब देव ने मुझसे कहा, ‘कृष्ण, देखो और बोलो।’
महादेव उवाच
श्लोक 394 (13.45.394)
त्वया ह्याराधितश्चाहं शतशोऽथ सहस्रशः । त्वत्समो नास्ति मे कश्चित्त्रिषु लोकेषु वै प्रियः ॥
tvayā hyārādhitaścāhaṃ śataśo'tha sahasraśaḥ | tvatsamo nāsti me kaścittriṣu lokeṣu vai priyaḥ
तुमने मेरी सैकड़ों और हज़ारों बार आराधना की है; तीनों लोकों में तुम्हारे समान मुझे कोई प्रिय नहीं है।
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 395 (13.45.395)
शिरसा वन्दिते देवे देवी प्रीता ह्युमा तदा । ततोऽहमब्रुवं स्थाणुं स्तुतं ब्रह्मादिभिः सुरैः ॥
śirasā vandite deve devī prītā hyumā tadā | tato'hamabruvaṃ sthāṇuṃ stutaṃ brahmādibhiḥ suraiḥ
जब मैंने सिर झुकाकर देव को प्रणाम किया, तब देवी उमा प्रसन्न हुईं। तब मैंने ब्रह्मा आदि देवताओं से स्तुत स्थाणु की स्तुति की।
कृष्ण उवाच
श्लोक 396 (13.45.396)
नमोस्तु ते शाश्वत सर्वयोने । ब्राह्माधिपं त्वामृषयो वदन्ति । तपश्च सत्वं च रजस्तमश्च । त्वामेव सत्यं च वदन्ति सन्तः ॥
namostu te śāśvata sarvayone | brāhmādhipaṃ tvāmṛṣayo vadanti | tapaśca satvaṃ ca rajastamaśca | tvāmeva satyaṃ ca vadanti santaḥ
हे शाश्वत, सबके उत्पत्तिस्थान, आपको नमस्कार है! ऋषि आपको ब्रह्मा का भी अधिपति कहते हैं। वे आपको तप, सत्त्व, रज और तम कहते हैं; और सज्जन आपको ही सत्य कहते हैं।
श्लोक 397 (13.45.397)
त्वं वै ब्रह्मा च रुद्रश्च वरुणोऽग्निर्मनुर्भवः । धाता त्वष्टा विधाता च त्वं प्रभुः सर्वतोमुखः ॥
tvaṃ vai brahmā ca rudraśca varuṇo'gnirmanurbhavaḥ | dhātā tvaṣṭā vidhātā ca tvaṃ prabhuḥ sarvatomukhaḥ
आप ही ब्रह्मा और रुद्र हैं, वरुण, अग्नि, मनु और भव हैं; आप ही धाता, त्वष्टा और विधाता हैं; आप सब ओर मुख वाले प्रभु हैं।
श्लोक 398 (13.45.398)
त्वत्तो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । त्वया सृष्टमिदं कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥
tvatto jātāni bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | tvayā sṛṣṭamidaṃ kṛtsnaṃ trailokyaṃ sacarācaram
आप से स्थावर और जङ्गम प्राणी उत्पन्न हुए; आप ही ने चराचर सहित यह सम्पूर्ण त्रैलोक्य रचा।
श्लोक 399 (13.45.399)
यानीन्द्रियाणीह मनश्च कृत्स्नं । ये वायवः सप्त तथैव चाग्नयः । ये देवसंस्थास्तव देवताश्च । तस्मात्परं त्वामृषयो वदन्ति ॥
yānīndriyāṇīha manaśca kṛtsnaṃ | ye vāyavaḥ sapta tathaiva cāgnayaḥ | ye devasaṃsthāstava devatāśca | tasmātparaṃ tvāmṛṣayo vadanti
इन्द्रियाँ और सम्पूर्ण मन, सात वायु और उसी प्रकार अग्नियाँ, तथा देवताओं में स्थित आपकी जो देवताएँ हैं, उन सबसे परे ऋषि आपको कहते हैं।
श्लोक 400 (13.45.400)
वेदाश्च यज्ञाः सोमश्च दक्षिणा पावको हविः । यज्ञोपगं च यत्किंचिद्भगवांस्तदसंशयम् ॥
vedāśca yajñāḥ somaśca dakṣiṇā pāvako haviḥ | yajñopagaṃ ca yatkiṃcidbhagavāṃstadasaṃśayam
वेद, यज्ञ, सोम, दक्षिणा, अग्नि, हवि और यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाला जो कुछ भी है, हे भगवन्, वह सब निःसन्देह आप ही हैं।
श्लोक 401 (13.45.401)
इष्टं दत्तमधीतं व्रतानि नियमाश्च ये । ह्रीः कीर्तिः श्रीर्द्युतिस्तुष्टिः सिद्धिश्चैव तदर्पणी ॥
iṣṭaṃ dattamadhītaṃ vratāni niyamāśca ye | hrīḥ kīrtiḥ śrīrdyutistuṣṭiḥ siddhiścaiva tadarpaṇī
यज्ञ, दान, अध्ययन, व्रत और नियम, लज्जा, कीर्ति, श्री, द्युति, तुष्टि और सिद्धि, ये सब आपको ही अर्पित हैं।
श्लोक 402 (13.45.402)
कामः क्रोधो भयं लोभो मदः स्तम्भोथ मत्सरः । आधयो व्याधयश्चैव भगवंस्तनवस्तव ॥
kāmaḥ krodho bhayaṃ lobho madaḥ stambhotha matsaraḥ | ādhayo vyādhayaścaiva bhagavaṃstanavastava
काम, क्रोध, भय, लोभ, मद, जड़ता, मत्सर, तथा मानसिक पीड़ाएँ और रोग, हे भगवन्, ये सब आपके ही शरीर हैं।
श्लोक 403 (13.45.403)
कृतिर्विकारः प्रणयः प्रधानं बीजमव्ययम् । मनसः परमा योनिः प्रभावश्चापि शाश्वतः ॥
kṛtirvikāraḥ praṇayaḥ pradhānaṃ bījamavyayam | manasaḥ paramā yoniḥ prabhāvaścāpi śāśvataḥ
कृति और विकार, प्रणय, प्रधान, अव्यय बीज, मन की परम योनि और शाश्वत प्रभाव आप ही हैं।
श्लोक 404 (13.45.404)
अव्यक्तः पावनोऽचिन्त्यः सहस्रांशुर्हिरण्मयः । आदिर्गणानां सर्वेषां भवान्वैजीविताश्रयः ॥
avyaktaḥ pāvano'cintyaḥ sahasrāṃśurhiraṇmayaḥ | ādirgaṇānāṃ sarveṣāṃ bhavānvaijīvitāśrayaḥ
आप अव्यक्त, पावन, अचिन्त्य, सहस्र किरणों वाले और हिरण्मय हैं; आप सब गणों के आदि और प्राणों के आश्रय हैं।
श्लोक 405 (13.45.405)
महानात्मा मतिर्ब्रह्मा विश्वः शंभुः स्वयंभुवः । बुद्धिः प्रज्ञोपलब्धिश्च संवित्ख्यातिर्धृतिः स्मृतिः ॥
mahānātmā matirbrahmā viśvaḥ śaṃbhuḥ svayaṃbhuvaḥ | buddhiḥ prajñopalabdhiśca saṃvitkhyātirdhṛtiḥ smṛtiḥ
महान् आत्मा, मति, ब्रह्मा, विश्व, शम्भु, स्वयम्भू; बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, संवित्, ख्याति, धृति और स्मृति आप ही हैं।
श्लोक 406 (13.45.406)
पर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते । त्वां बुद्ध्वा ब्राह्मणो वेदात्प्रमोहं विनियच्छति ॥
paryāyavācakaiḥ śabdairmahānātmā vibhāvyate | tvāṃ buddhvā brāhmaṇo vedātpramohaṃ viniyacchati
इन पर्यायवाची शब्दों से महान् आत्मा की कल्पना की जाती है। वेद से आपको जानकर ब्राह्मण मोह को रोक लेता है।
श्लोक 407 (13.45.407)
हृदयं सर्वभूतानां क्षेत्रज्ञस्त्वमृषिस्तुतः ॥
hṛdayaṃ sarvabhūtānāṃ kṣetrajñastvamṛṣistutaḥ
आप सब प्राणियों के हृदय हैं, क्षेत्रज्ञ हैं और ऋषियों द्वारा स्तुत हैं।
श्लोक 408 (13.45.408)
सर्वतः पाणिपादस्त्वं सर्वतोक्षिशिरोमुखः । सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि ॥
sarvataḥ pāṇipādastvaṃ sarvatokṣiśiromukhaḥ | sarvataḥ śrutimām̐lloke sarvamāvṛtya tiṣṭhasi
आपके हाथ-पैर सब ओर हैं, नेत्र, शिर और मुख सब ओर हैं; आपके कान सब ओर हैं और आप संसार में सबको घेरकर स्थित हैं।
श्लोक 409 (13.45.409)
फलं त्वमसि तिग्मांशो निमेषादिषु कर्मसु । त्वं वै प्रभार्चिः पुरुषः सर्वस्य हृदि संश्रितः । अणिमा महिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥
phalaṃ tvamasi tigmāṃśo nimeṣādiṣu karmasu | tvaṃ vai prabhārciḥ puruṣaḥ sarvasya hṛdi saṃśritaḥ | aṇimā mahimā prāptirīśāno jyotiravyayaḥ
हे तिग्मांशु, आप पलक झपकने जैसे कर्मों में फल हैं; आप सबके हृदय में स्थित प्रभा से दीप्त पुरुष हैं। अणिमा, महिमा और प्राप्ति आप ही हैं, आप ईशान और अविनाशी ज्योति हैं।
श्लोक 410 (13.45.410)
त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये । ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्वा जितेन्द्रियाः ॥
tvayi buddhirmatirlokāḥ prapannāḥ saṃśritāśca ye | dhyānino nityayogāśca satyasatvā jitendriyāḥ
आप में बुद्धि, मति और लोक स्थित हैं, और जो आपकी शरण में आए हैं, वे ध्यानी, नित्य योगी, सत्य में स्थित, जितेन्द्रिय पुरुष भी आप में आश्रित हैं।
श्लोक 411 (13.45.411)
यस्त्वां ध्रुवं वेदयते गुहाशयं । प्रभुं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम् । हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं । स बुद्धिमान्बुद्धिमतीत्य तिष्ठति ॥
yastvāṃ dhruvaṃ vedayate guhāśayaṃ | prabhuṃ purāṇaṃ puruṣaṃ viśvarūpam | hiraṇmayaṃ buddhimatāṃ parāṃ gatiṃ | sa buddhimānbuddhimatītya tiṣṭhati
जो बुद्धिमान् आपको ध्रुव, गुहा में रहने वाले, प्रभु, पुराण पुरुष, विश्वरूप, हिरण्मय और बुद्धिमानों की परम गति के रूप में जानता है, वह बुद्धि को पार करके स्थित होता है।
श्लोक 412 (13.45.412)
विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं त्वां च मूर्तितः । प्रधानविधियोगस्थस्त्वामेव विशते बुधः ॥
viditvā sapta sūkṣmāṇi ṣaḍaṅgaṃ tvāṃ ca mūrtitaḥ | pradhānavidhiyogasthastvāmeva viśate budhaḥ
सात सूक्ष्म तत्त्वों को और अपने षडङ्ग मूर्तरूप को जानकर, प्रधान के विधि-योग में स्थित बुद्धिमान् पुरुष आप में ही प्रवेश करता है।
श्लोक 413 (13.45.413)
एवमुक्ते मया पार्थ भवे चार्तिविनाशने । चराचरं जगत्सर्गं सिंहनादं तदाऽकरोत् ॥
evamukte mayā pārtha bhave cārtivināśane | carācaraṃ jagatsargaṃ siṃhanādaṃ tadā'karot
हे पार्थ, पीड़ा का नाश करने वाले भव से मेरे ऐसा कहने पर चराचर सारे जगत् ने तब सिंहनाद किया।
श्लोक 414 (13.45.414)
तं विप्रसङ्घाश्च सुरासुराश्च । नागाः पिशाचाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे । महर्षयश्चैव तदा प्रणेमुः ॥
taṃ viprasaṅghāśca surāsurāśca | nāgāḥ piśācāḥ pitaro vayāṃsi | rakṣogaṇā bhūtagaṇāśca sarve | maharṣayaścaiva tadā praṇemuḥ
तब ब्राह्मणों के समूह, देव और असुर, नाग, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षसों और भूतों के गण तथा सब महर्षि उन्हें प्रणाम करने लगे।
श्लोक 415 (13.45.415)
मम मूर्ध्नि च दिव्यानां कुसुमानां सुगन्धिनाम् । राशयो निपतन्ति स्म वायुश्च सुसुखो ववौ ॥
mama mūrdhni ca divyānāṃ kusumānāṃ sugandhinām | rāśayo nipatanti sma vāyuśca susukho vavau
मेरे मस्तक पर दिव्य सुगन्धित पुष्पों की राशियाँ गिरने लगीं और अत्यन्त सुखद वायु बहने लगी।
श्लोक 416 (13.45.416)
निरीक्ष्य भगवान्देवीं ह्युमां मां च जगद्धितः । शतक्रतुं चाभिवीक्ष्य स्वयं मामाह शङ्करः ॥
nirīkṣya bhagavāndevīṃ hyumāṃ māṃ ca jagaddhitaḥ | śatakratuṃ cābhivīkṣya svayaṃ māmāha śaṅkaraḥ
देवी उमा को, मुझे और इन्द्र को देखकर जगत् के हितकारी भगवान् शंकर ने स्वयं मुझसे कहा।
महादेव उवाच
श्लोक 417 (13.45.417)
विद्मः कृष्ण परां भक्तिमस्मासु तव शत्रुहन् । क्रियतामात्मनः श्रेयः प्रीतिर्हित्वयि मे परा ॥
vidmaḥ kṛṣṇa parāṃ bhaktimasmāsu tava śatruhan | kriyatāmātmanaḥ śreyaḥ prītirhitvayi me parā
हे कृष्ण, हे शत्रुहन्ता, हम तुम्हारी हम पर परम भक्ति को जानते हैं। अपना कल्याण करो; मेरी तुम पर परम प्रीति है।
श्लोक 418 (13.45.418)
वृणीष्वाष्टौ वरान्कृष्ण दाताऽस्मि तव सत्तम । ब्रूहि यादवशार्दूल यानिच्छसि सुदुर्लभान् ॥
vṛṇīṣvāṣṭau varānkṛṣṇa dātā'smi tava sattama | brūhi yādavaśārdūla yānicchasi sudurlabhān
हे कृष्ण, आठ वर माँगो; हे सत्तम, मैं तुम्हें दूँगा। हे यादवशार्दूल, कहो, जो दुर्लभ वस्तुएँ तुम चाहते हो।