अनुशासन पर्व · अध्याय 47
तण्डि द्वारा महादेव की स्तुति
उपमन्यु कृष्ण को बताते हैं कि कृतयुग में ऋषि तण्डि ने दस हज़ार वर्ष की आराधना के बाद महादेव के दर्शन किए और उनकी स्तुति की। अपने स्तोत्र में तण्डि शिव को परम ब्रह्म, काल, पुरुष, सूर्य और चन्द्र मार्गों के द्वार, वेदों और यज्ञ के मूल, और यजन करने वालों, तपस्वियों, संन्यासियों, प्रकृति में लय चाहने वालों और ज्ञानियों, सभी साधकों की गति बताते हैं। प्रसन्न होकर शिव तण्डि को अक्षय, तेजस्वी जीवन और सूत्रकार पुत्र का वर देते हैं और उन्हें दृढ़ भक्ति प्रदान करते हैं। फिर उपमन्यु तण्डि से मिले शिव के गुप्त नाम सुनाने की तैयारी करते हैं।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 1 (13.47.1)
ऋषिरासीत्कृते तात तण्डिरित्येव विश्रुतः । दशवर्षसहस्राणि तेन देवः समाधिना ॥
ṛṣirāsītkṛte tāta taṇḍirityeva viśrutaḥ | daśavarṣasahasrāṇi tena devaḥ samādhinā
हे तात, कृतयुग में तण्डि नाम से प्रसिद्ध एक ऋषि थे। दस हज़ार वर्षों तक उन्होंने गहन समाधि के साथ देव की आराधना की।
श्लोक 2 (13.47.2)
आराधितोऽभूद्भक्तेन तस्योदर्कं निशामय । स दृष्टवान्महादेवमस्तौषीच्च स्तवैर्विभुम् ॥
ārādhito'bhūdbhaktena tasyodarkaṃ niśāmaya | sa dṛṣṭavānmahādevamastauṣīcca stavairvibhum
उस भक्त की आराधना का परिणाम सुनो: उन्होंने सर्वव्यापी महादेव के दर्शन किए और स्तोत्रों से उनकी स्तुति की।
श्लोक 3 (13.47.3)
इति तण्डिस्तपोयोगात्परमात्मानमव्ययम् । चिन्तयित्वा महात्मानमिदमाह सुविस्मितः ॥
iti taṇḍistapoyogātparamātmānamavyayam | cintayitvā mahātmānamidamāha suvismitaḥ
इस प्रकार तपोबल से तण्डि ने अविनाशी परमात्मा, उन महात्मा का चिन्तन किया, और अत्यन्त विस्मित होकर यह कहा:
श्लोक 4 (13.47.4)
यं पठन्ति सदा साङ्ख्याश्चिन्तयन्ति च योगिनः । परं प्रधानं पुरुषमधिष्ठातारमीश्वरम् ॥
yaṃ paṭhanti sadā sāṅkhyāścintayanti ca yoginaḥ | paraṃ pradhānaṃ puruṣamadhiṣṭhātāramīśvaram
"जिनका साङ्ख्यवादी सदा पाठ करते हैं और योगी चिन्तन करते हैं, जो परम प्रधान, पुरुष और अधिष्ठाता ईश्वर हैं;
श्लोक 5 (13.47.5)
उत्पत्तौ च विनाशे च कारणं यं विदुर्बुधाः । देवासुरमुनीनां च परं यस्मान्न विद्यते ॥
utpattau ca vināśe ca kāraṇaṃ yaṃ vidurbudhāḥ | devāsuramunīnāṃ ca paraṃ yasmānna vidyate
जिन्हें विद्वान् उत्पत्ति और विनाश का कारण जानते हैं, जिनसे बढ़कर देवों, असुरों और मुनियों में कोई नहीं है;
श्लोक 6 (13.47.6)
अजं तमहमीशानमनादिनिधनं प्रभुम् । अत्यन्तसुखिनं देवमनघं शरणं व्रजे ॥
ajaṃ tamahamīśānamanādinidhanaṃ prabhum | atyantasukhinaṃ devamanaghaṃ śaraṇaṃ vraje
उन अजन्मा, अनादि और अनन्त, प्रभु, परम सुखी, निष्कलंक देव ईशान की मैं शरण लेता हूँ।"
श्लोक 7 (13.47.7)
एवं ब्रुवन्नेव तदा ददर्श तपसां निधिम् । तमव्ययमनौपम्यमचिन्त्यं शाश्वतं ध्रुवम् ॥
evaṃ bruvanneva tadā dadarśa tapasāṃ nidhim | tamavyayamanaupamyamacintyaṃ śāśvataṃ dhruvam
यह कहते-कहते ही उन्होंने तब तपस्या के निधि को देखा, जो अविनाशी, अनुपम, अचिन्त्य, शाश्वत और अटल हैं,
श्लोक 8 (13.47.8)
निष्कलं सकलं ब्रह्म निर्गुणं गुणगोचरम् । योगिनां परमानन्दमक्षरं मोक्षसंज्ञितम् ॥
niṣkalaṃ sakalaṃ brahma nirguṇaṃ guṇagocaram | yogināṃ paramānandamakṣaraṃ mokṣasaṃjñitam
जो निष्कल भी हैं और सकल भी, निर्गुण ब्रह्म होकर भी गुणों के विषय हैं, योगियों के परम आनन्द हैं, अक्षर हैं और मोक्ष नाम से जाने जाते हैं,
श्लोक 9 (13.47.9)
मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम् । अग्राह्यमचलं शुद्धं बुद्धिग्राह्यं मनोमयम् ॥
manorindrāgnimarutāṃ viśvasya brahmaṇo gatim | agrāhyamacalaṃ śuddhaṃ buddhigrāhyaṃ manomayam
जो मनु, इन्द्र, अग्नि और मरुतों की, सम्पूर्ण विश्व की और ब्रह्मा की भी परम गति हैं; जो अग्राह्य, अचल, शुद्ध, बुद्धि से ग्रहण करने योग्य और मनोमय हैं,
श्लोक 10 (13.47.10)
दुर्विज्ञेयमसङ्ख्येयं दुष्प्रापमकृतात्मभिः । योनिं विश्वस्य जगतस्तमसः परतः परम् । परं पुराणं पुरुषं परेभ्यः परतः परम् ॥
durvijñeyamasaṅkhyeyaṃ duṣprāpamakṛtātmabhiḥ | yoniṃ viśvasya jagatastamasaḥ parataḥ param | paraṃ purāṇaṃ puruṣaṃ parebhyaḥ parataḥ param
जो दुर्विज्ञेय, असंख्य, अपरिपक्व आत्मा वालों के लिए दुष्प्राप्य, सारे जगत् के कारण, अन्धकार से परे और परे से भी परे हैं, परम पुराण पुरुष हैं, जो श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 11 (13.47.11)
यः प्राणवन्तमात्मानं ज्योतिर्जीवस्थितं मनः । तं देवं दर्शनाकाङ्क्षी बहून्वर्षगणानृषिः । तपस्युग्रे स्थितो भूत्वा दृष्ट्वा तुष्टाव चेश्वरम् ॥
yaḥ prāṇavantamātmānaṃ jyotirjīvasthitaṃ manaḥ | taṃ devaṃ darśanākāṅkṣī bahūnvarṣagaṇānṛṣiḥ | tapasyugre sthito bhūtvā dṛṣṭvā tuṣṭāva ceśvaram
जो प्राणवान् आत्मा हैं, जीव में स्थित ज्योति हैं, मन हैं: उन देव के दर्शन की इच्छा से ऋषि बहुत वर्षों तक उग्र तपस्या में स्थित रहे, और दर्शन करके उन्होंने ईश्वर की स्तुति की।
तण्डिरुवाच
श्लोक 12 (13.47.12)
पवित्राणां पवित्रस्त्वं गतिर्गतिमतांवर ॥
pavitrāṇāṃ pavitrastvaṃ gatirgatimatāṃvara
आप पवित्रों में भी परम पवित्र हैं, गति हैं, और गतिमानों में श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 13 (13.47.13)
अत्युग्रं तेजसां तेजस्तपसां परमं तपः । विश्वावसुहिरण्याक्षपुरुहूतनमस्कृत ॥
atyugraṃ tejasāṃ tejastapasāṃ paramaṃ tapaḥ | viśvāvasuhiraṇyākṣapuruhūtanamaskṛta
आप तेजों में अत्यन्त उग्र तेज हैं, तपों में परम तप हैं; विश्वावसु, हिरण्याक्ष और पुरुहूत (इन्द्र) आपको नमन करते हैं।
श्लोक 14 (13.47.14)
भूरिकल्याणद विभो परं सत्यं नमोस्तु ते । जातीमरणभीरूणां यतीनां यततां विभो ॥
bhūrikalyāṇada vibho paraṃ satyaṃ namostu te | jātīmaraṇabhīrūṇāṃ yatīnāṃ yatatāṃ vibho
हे विभो, प्रचुर कल्याण देने वाले, परम सत्य: आपको नमस्कार हो! हे विभो, जन्म और मृत्यु से डरकर प्रयत्न करने वाले यतियों के स्वामी,
श्लोक 15 (13.47.15)
निर्वाणद सहस्रांशो नमस्तेऽस्तु सुखाश्रय । ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षयः ॥
nirvāṇada sahasrāṃśo namaste'stu sukhāśraya | brahmā śatakraturviṣṇurviśvedevā maharṣayaḥ
हे निर्वाण देने वाले, सहस्रांशु, सुख के आश्रय: आपको नमस्कार हो! ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, विश्वेदेव और महर्षि भी
श्लोक 16 (13.47.16)
न विदुस्त्वां तु तत्त्वेन कुतो वेत्स्यामहे वयम् । त्वत्तः प्रवर्तते सर्वं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
na vidustvāṃ tu tattvena kuto vetsyāmahe vayam | tvattaḥ pravartate sarvaṃ tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam
आपको यथार्थ रूप में नहीं जानते; तब हम कैसे जानेंगे? आपसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है और आप में ही सब प्रतिष्ठित है।
श्लोक 17 (13.47.17)
कालाख्यः पुरुषाख्यश्च ब्रह्माख्यश्च त्वमेव हि । तनवस्ते स्मृतास्तिस्रः पुराणज्ञैः सुरर्षिभिः ॥
kālākhyaḥ puruṣākhyaśca brahmākhyaśca tvameva hi | tanavaste smṛtāstisraḥ purāṇajñaiḥ surarṣibhiḥ
काल, पुरुष और ब्रह्मा नाम से कहे जाने वाले आप ही हैं। पुराणों के जानकार देवर्षियों ने आपके ये तीन रूप बताए हैं।
श्लोक 18 (13.47.18)
अधिपौरुषमध्यात्ममधिभूताधिदैवतम् । अधिलोकाधिविज्ञानमधियज्ञस्त्वमेव हि ॥
adhipauruṣamadhyātmamadhibhūtādhidaivatam | adhilokādhivijñānamadhiyajñastvameva hi
पुरुष, अध्यात्म, भूत और देवता के अधिष्ठाता, लोकों, विज्ञान और यज्ञ के अधिष्ठाता भी आप ही हैं।
श्लोक 19 (13.47.19)
त्वां विदित्वाऽऽत्मदेवस्थं दुर्विदं दैवतैरपि । विद्वांसो यान्ति निर्मुक्ताः परं भावमनामयम् ॥
tvāṃ viditvā''tmadevasthaṃ durvidaṃ daivatairapi | vidvāṃso yānti nirmuktāḥ paraṃ bhāvamanāmayam
आत्मा के भीतर देवरूप में स्थित, देवताओं के लिए भी दुर्बोध आपको जानकर विद्वान् मुक्त होकर परम निरामय अवस्था को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 20 (13.47.20)
अनिच्छतस्तव विभो जन्ममृत्युरनेकतः । द्वारं तु स्वर्गमोक्षाणामाक्षेप्ता त्वं ददासि च ॥
anicchatastava vibho janmamṛtyuranekataḥ | dvāraṃ tu svargamokṣāṇāmākṣeptā tvaṃ dadāsi ca
हे विभो, आपकी इच्छा के बिना भी जन्म और मृत्यु अनेक रूपों में होते हैं; आप स्वर्ग और मोक्ष के द्वार हैं; आप रोकते भी हैं और देते भी हैं।
श्लोक 21 (13.47.21)
त्वं वै स्वर्गश्च मोक्षश्च कामः क्रोधस्त्वमेव च । सत्वं रजस्तमश्चैव अधश्चोर्ध्वं त्वमेव हि ॥
tvaṃ vai svargaśca mokṣaśca kāmaḥ krodhastvameva ca | satvaṃ rajastamaścaiva adhaścordhvaṃ tvameva hi
आप ही स्वर्ग और मोक्ष हैं, आप ही काम और क्रोध हैं; आप ही सत्त्व, रज और तम हैं, और आप ही अधः तथा ऊर्ध्व हैं।
श्लोक 22 (13.47.22)
ब्रह्मा भवश्च विष्णुश्च स्कन्देन्द्रौ सविता यमः । वरुणेन्दू मनुर्धाता विधाता त्वं धनेश्वरः ॥
brahmā bhavaśca viṣṇuśca skandendrau savitā yamaḥ | varuṇendū manurdhātā vidhātā tvaṃ dhaneśvaraḥ
ब्रह्मा, भव, विष्णु, स्कन्द और इन्द्र, सविता, यम, वरुण और चन्द्रमा, मनु, धाता और विधाता: ये सब आप ही हैं, और आप ही धनेश्वर हैं।
श्लोक 23 (13.47.23)
भूर्वायुः सलिलाग्निश्च खं वाग्बुद्धिः स्थितिर्मतिः । कर्म सत्यानृते चोभे त्वमेवास्ति च नास्ति च ॥
bhūrvāyuḥ salilāgniśca khaṃ vāgbuddhiḥ sthitirmatiḥ | karma satyānṛte cobhe tvamevāsti ca nāsti ca
पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश, वाणी, बुद्धि, स्थिति, मति, कर्म, सत्य और असत्य दोनों: जो है और जो नहीं है, वह सब आप ही हैं।
श्लोक 24 (13.47.24)
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च प्रकृतिभ्यः परं ध्रुवम् । विश्वाविश्वपरो भावश्चिन्त्याचिन्त्यस्त्वमेव हि ॥
indriyāṇīndriyārthāśca prakṛtibhyaḥ paraṃ dhruvam | viśvāviśvaparo bhāvaścintyācintyastvameva hi
इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषय, तथा प्रकृति से परे जो ध्रुव तत्त्व है; विश्व और अविश्व से परे जो भाव है, चिन्त्य और अचिन्त्य: यह सब आप ही हैं।
श्लोक 25 (13.47.25)
यच्चैतत्परमं ब्रह्म यच्च तत्परमं पदम् । या गतिः साङ्ख्ययोगानां स भवान्नात्र संशयः ॥
yaccaitatparamaṃ brahma yacca tatparamaṃ padam | yā gatiḥ sāṅkhyayogānāṃ sa bhavānnātra saṃśayaḥ
जो यह परम ब्रह्म है, जो वह परम पद है, जो साङ्ख्य और योग वालों की गति है: वह आप ही हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 26 (13.47.26)
नूनमद्य कृतार्थाः स्म नूनं प्राप्ताः सतां गतिम् । यां गतिं प्रार्थयन्तीह ज्ञाननिर्मलबुद्धयः ॥
nūnamadya kṛtārthāḥ sma nūnaṃ prāptāḥ satāṃ gatim | yāṃ gatiṃ prārthayantīha jñānanirmalabuddhayaḥ
निश्चय ही आज हम कृतार्थ हो गए; निश्चय ही हमने सज्जनों की वह गति पा ली, जिसे ज्ञान से निर्मल बुद्धि वाले यहाँ चाहते हैं।
श्लोक 27 (13.47.27)
अहो मूढाः स्म सुचिरमिमं कालमचेतसा । यन्न विद्मः परं देवं शाश्वतं यं विदुर्बुधाः ॥
aho mūḍhāḥ sma suciramimaṃ kālamacetasā | yanna vidmaḥ paraṃ devaṃ śāśvataṃ yaṃ vidurbudhāḥ
अहो, हम इतने लम्बे समय तक अज्ञानवश कैसे मूढ़ बने रहे, कि जिन परम शाश्वत देव को विद्वान् जानते हैं, उन्हें हम नहीं जान सके!
श्लोक 28 (13.47.28)
सेयमासादिता साक्षात्त्वद्भक्तिर्जन्मभिर्मया । भक्तानुग्रहकृद्देवो यं ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥
seyamāsāditā sākṣāttvadbhaktirjanmabhirmayā | bhaktānugrahakṛddevo yaṃ jñātvā'mṛtamaśnute
अब अनेक जन्मों के बाद मुझे आपकी भक्ति साक्षात् प्राप्त हुई है: उन देव की, जो भक्तों पर अनुग्रह करते हैं और जिन्हें जानकर मनुष्य अमृत पाता है।
श्लोक 29 (13.47.29)
देवासुरमुनीनां तु यच्च गुह्यं सनातनम् । गुहायां निहितं ब्रह्म दुर्विज्ञेयं मुनेरपि ॥
devāsuramunīnāṃ tu yacca guhyaṃ sanātanam | guhāyāṃ nihitaṃ brahma durvijñeyaṃ munerapi
देवों, असुरों और मुनियों के लिए भी जो गुप्त और सनातन है, गुफा में छिपा हुआ वह ब्रह्म, जिसे मुनि भी कठिनाई से जान पाता है, वही ये हैं।
श्लोक 30 (13.47.30)
स एष भगवान्देवः सर्वकृत्सर्वतोमुखः । सर्वात्मा सर्वदर्शी च सर्वगः सर्ववेदिता ॥
sa eṣa bhagavāndevaḥ sarvakṛtsarvatomukhaḥ | sarvātmā sarvadarśī ca sarvagaḥ sarvaveditā
यही वे भगवान् देव हैं: सबके कर्ता, सब ओर मुख वाले, सबके आत्मा, सर्वदर्शी, सर्वगामी और सर्वज्ञ।
श्लोक 31 (13.47.31)
देहकृद्देहभृद्देही देहभुग्देहिनां गतिः । प्राणकृत्प्राणभृत्प्राणी प्राणदः प्राणिनां गतिः ॥
dehakṛddehabhṛddehī dehabhugdehināṃ gatiḥ | prāṇakṛtprāṇabhṛtprāṇī prāṇadaḥ prāṇināṃ gatiḥ
देह के रचयिता, देह के धारक, देहधारी, देह के भोक्ता और देहधारियों की गति; प्राण के रचयिता, प्राण के धारक, प्राणी, प्राणदाता और प्राणियों की गति।
श्लोक 32 (13.47.32)
अध्यात्मगतिरिष्टानां ध्यायिनामात्मवेदिनाम् । अपुनर्भवकामानां या गतिः सोऽयमीश्वरः ॥
adhyātmagatiriṣṭānāṃ dhyāyināmātmavedinām | apunarbhavakāmānāṃ yā gatiḥ so'yamīśvaraḥ
ये प्रिय जनों, ध्यानियों और आत्मज्ञानियों की आध्यात्मिक गति हैं; और जो गति पुनर्जन्म न चाहने वालों की है, वह ये ही ईश्वर हैं।
श्लोक 33 (13.47.33)
अयं च सर्वभूतानां शुभाशुभगतिप्रदः । अयं च जन्ममरणे विदध्यात्सर्वजन्तुषु । अयं संसिद्धिकामानां या गतिः सोऽयमीश्वरः ॥
ayaṃ ca sarvabhūtānāṃ śubhāśubhagatipradaḥ | ayaṃ ca janmamaraṇe vidadhyātsarvajantuṣu | ayaṃ saṃsiddhikāmānāṃ yā gatiḥ so'yamīśvaraḥ
ये ही सब प्राणियों को शुभ और अशुभ गति देने वाले हैं। ये ही सब जीवों में जन्म और मरण का विधान करते हैं। और जो गति सिद्धि चाहने वालों की है, वह ये ही ईश्वर हैं।
श्लोक 34 (13.47.34)
भूराद्यान्सर्वभुवनानुत्पाद्य सदिवौकसः । दधाति देवस्तनुभिरष्टाभिर्यो बिभर्ति च ॥
bhūrādyānsarvabhuvanānutpādya sadivaukasaḥ | dadhāti devastanubhiraṣṭābhiryo bibharti ca
पृथ्वी आदि सब लोकों को स्वर्गवासियों सहित उत्पन्न करके देव अपने आठ रूपों से उन्हें धारण और पोषण करते हैं।
श्लोक 35 (13.47.35)
अतः प्रवर्तते सर्वमस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् । अस्मिंश्च प्रलयं याति अयमेकः सनातनः ॥
ataḥ pravartate sarvamasminsarvaṃ pratiṣṭhitam | asmiṃśca pralayaṃ yāti ayamekaḥ sanātanaḥ
इन्हीं से सब कुछ प्रवृत्त होता है, इन्हीं में सब प्रतिष्ठित है, और इन्हीं में सब लीन हो जाता है। ये एक ही सनातन हैं।
श्लोक 36 (13.47.36)
अयं स सत्यकामानां सत्यलोकः परं सताम् । अपवर्गश्च मुक्तानां कैवल्यं चात्मवेदिनाम् ॥
ayaṃ sa satyakāmānāṃ satyalokaḥ paraṃ satām | apavargaśca muktānāṃ kaivalyaṃ cātmavedinām
ये सत्यकामों के लिए सत्यलोक हैं, सज्जनों की परम गति हैं; मुक्तों का अपवर्ग हैं और आत्मज्ञानियों का कैवल्य हैं।
श्लोक 37 (13.47.37)
अयं ब्रह्मादिभिः सिद्धैर्गुहायां गोपितः प्रभुः । देवासुरमनुष्याणामप्रकाशो भवेदिति ॥
ayaṃ brahmādibhiḥ siddhairguhāyāṃ gopitaḥ prabhuḥ | devāsuramanuṣyāṇāmaprakāśo bhavediti
ब्रह्मा आदि सिद्धों ने इन प्रभु को गुफा में छिपा रखा है, ताकि ये देवों, असुरों और मनुष्यों के सामने प्रकट न हों।
श्लोक 38 (13.47.38)
तं त्वां देवासुरनरास्तत्त्वेन न विदुर्भवम् । मोहिताः खल्वनेनैव हृदिस्थेनाप्रकाशिना ॥
taṃ tvāṃ devāsuranarāstattvena na vidurbhavam | mohitāḥ khalvanenaiva hṛdisthenāprakāśinā
हे भव, देव, असुर और मनुष्य आपको यथार्थ रूप में नहीं जानते, क्योंकि वे हृदय में बसे हुए उन्हीं अप्रकट आप से मोहित हैं।
श्लोक 39 (13.47.39)
ये चैनं प्रतिपद्यन्ते भक्तियोगेन भाविताः । तेषामेवात्मनात्मानं दर्शयत्येष हृच्छयः ॥
ye cainaṃ pratipadyante bhaktiyogena bhāvitāḥ | teṣāmevātmanātmānaṃ darśayatyeṣa hṛcchayaḥ
किन्तु जो भक्तियोग से भावित होकर इनकी शरण जाते हैं, उन्हीं को ये हृदय में रहने वाले अपने आत्मा से आत्मा का दर्शन कराते हैं।
श्लोक 40 (13.47.40)
यं ज्ञात्वा न पुनर्जन्म मरणं चापि विद्यते । यं विदित्वा परं वेद्यं वेदितव्यं न विद्यते ॥
yaṃ jñātvā na punarjanma maraṇaṃ cāpi vidyate | yaṃ viditvā paraṃ vedyaṃ veditavyaṃ na vidyate
जिन्हें जानकर न पुनर्जन्म रहता है और न मरण; जिन्हें जानकर कोई और परम जानने योग्य वस्तु नहीं रहती।
श्लोक 41 (13.47.41)
यं लब्ध्वा परमं लाभं नाधिकं मन्यते बुधः । यां सूक्ष्मां परमां प्राप्तिं गच्छन्नव्ययमक्षयम् ॥
yaṃ labdhvā paramaṃ lābhaṃ nādhikaṃ manyate budhaḥ | yāṃ sūkṣmāṃ paramāṃ prāptiṃ gacchannavyayamakṣayam
जिन्हें पाकर बुद्धिमान् किसी और लाभ को बड़ा नहीं मानता; जिस सूक्ष्म परम प्राप्ति को पाता हुआ वह अव्यय और अक्षय पद को जाता है।
श्लोक 42 (13.47.42)
यं साङ्ख्या गुणतत्त्वज्ञाः साङ्ख्यशास्त्रविशारदाः । सूक्ष्मज्ञानतराः सूक्ष्मं ज्ञात्वा मुच्यन्ति बन्धनैः ॥
yaṃ sāṅkhyā guṇatattvajñāḥ sāṅkhyaśāstraviśāradāḥ | sūkṣmajñānatarāḥ sūkṣmaṃ jñātvā mucyanti bandhanaiḥ
जिन सूक्ष्म तत्त्व को गुणों और तत्त्वों के ज्ञाता, साङ्ख्यशास्त्र में निपुण, सूक्ष्म ज्ञान में निपुणतर साङ्ख्यवादी जानकर बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं;
श्लोक 43 (13.47.43)
यं च वेदविदो वेद्यं वेदान्ते च प्रतिष्ठितम् । प्राणायामपरा नित्यं यं विशन्ति जपन्ति च ॥
yaṃ ca vedavido vedyaṃ vedānte ca pratiṣṭhitam | prāṇāyāmaparā nityaṃ yaṃ viśanti japanti ca
जिन्हें वेदवेत्ता जानने योग्य मानते हैं, जो वेदान्त में प्रतिष्ठित हैं, और जिनमें प्राणायाम-परायण लोग सदा प्रवेश करते और जप करते हैं:
श्लोक 44 (13.47.44)
ओंकाररथमारुह्य ते विशन्ति महेश्वरम् । अयं स देवयानानामादित्यो द्वारमुच्यते ॥
oṃkārarathamāruhya te viśanti maheśvaram | ayaṃ sa devayānānāmādityo dvāramucyate
ओंकार रूपी रथ पर चढ़कर वे महेश्वर में प्रवेश करते हैं। ये ही देवयान मार्गों के द्वार आदित्य कहे जाते हैं;
श्लोक 45 (13.47.45)
अयं च पितृयानानां चन्द्रमा द्वारमुच्यते । एष काष्ठा दिशश्चैव संवत्सरयुगादि च ॥
ayaṃ ca pitṛyānānāṃ candramā dvāramucyate | eṣa kāṣṭhā diśaścaiva saṃvatsarayugādi ca
और ये ही पितृयान मार्गों के द्वार चन्द्रमा कहे जाते हैं। ये ही कालमान, दिशाएँ, संवत्सर और युग आदि हैं।
श्लोक 46 (13.47.46)
दिव्यादिव्यः परो लाभ अयने दक्षिणोत्तरे । एनं प्रजापतिः पूर्वमाराध्य बहुभिः स्तवैः ॥
divyādivyaḥ paro lābha ayane dakṣiṇottare | enaṃ prajāpatiḥ pūrvamārādhya bahubhiḥ stavaiḥ
ये ही दक्षिण और उत्तर अयन में दिव्य और अदिव्य परम लाभ हैं। प्रजापति ने पूर्वकाल में बहुत-से स्तोत्रों से इनकी आराधना करके
श्लोक 47 (13.47.47)
प्रजार्थं वरयामास नीललोहितसंज्ञितम् । ऋग्भिर्यमनुशासन्ति तत्त्वे कर्मणि बह्वृचाः ॥
prajārthaṃ varayāmāsa nīlalohitasaṃjñitam | ṛgbhiryamanuśāsanti tattve karmaṇi bahvṛcāḥ
प्रजा के लिए नीललोहित नाम से प्रसिद्ध इन्हें वररूप में चुना, जिनकी बह्वृच (ऋग्वेदी) ऋचाओं से सारभूत कर्म में स्तुति करते हैं,
श्लोक 48 (13.47.48)
यजुर्भिर्यत्त्रिधा वेद्यं जुह्वत्यध्वर्यवोऽध्वरे । सामभिर्यं च गायन्ति सामगाः शुद्धबुद्धयः ॥
yajurbhiryattridhā vedyaṃ juhvatyadhvaryavo'dhvare | sāmabhiryaṃ ca gāyanti sāmagāḥ śuddhabuddhayaḥ
जिन्हें अध्वर्यु यज्ञ में यजुर्मन्त्रों से तीन प्रकार से जानने योग्य मानकर आहुति देते हैं, और जिन्हें शुद्ध बुद्धि वाले सामगान करने वाले साम से गाते हैं,
श्लोक 49 (13.47.49)
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म स्तुवन्त्याथर्वणा द्विजाः । यज्ञस्य परमा योनिः पतिश्चायं परः स्मृतः ॥
ṛtaṃ satyaṃ paraṃ brahma stuvantyātharvaṇā dvijāḥ | yajñasya paramā yoniḥ patiścāyaṃ paraḥ smṛtaḥ
जिन्हें अथर्ववेदी ब्राह्मण ऋत, सत्य और परम ब्रह्म कहकर स्तुति करते हैं; ये यज्ञ की परम योनि और परम पति माने गए हैं।
श्लोक 50 (13.47.50)
रात्र्यहः श्रोत्रनयनः पक्षमासशिरोभुजः । ऋतुवीर्यस्तपोधैर्यो ह्यब्दगुह्योरुपादवान् ॥
rātryahaḥ śrotranayanaḥ pakṣamāsaśirobhujaḥ | ṛtuvīryastapodhairyo hyabdaguhyorupādavān
रात और दिन उनके कान और नेत्र हैं; पक्ष और मास उनके सिर और भुजाएँ हैं; ऋतुएँ उनका वीर्य हैं; तप और धैर्य उनके अपने हैं; संवत्सर उनका गुह्य अंग, जंघाएँ और चरण हैं।
श्लोक 51 (13.47.51)
मृत्युर्यमो हुताशश्च कालः संहारवेगवान् । कालस्य परमा योनिः कालश्चायं सनातनः ॥
mṛtyuryamo hutāśaśca kālaḥ saṃhāravegavān | kālasya paramā yoniḥ kālaścāyaṃ sanātanaḥ
मृत्यु, यम, हुताश (अग्नि) और संहार के वेग वाला काल: ये ही काल की परम योनि हैं, और ये स्वयं सनातन काल हैं।
श्लोक 52 (13.47.52)
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ ग्रहाश्च सह वायुना । ध्रुवः सप्तर्षयश्चैव भुवनाः सप्त एव च ॥
candrādityau sanakṣatrau grahāśca saha vāyunā | dhruvaḥ saptarṣayaścaiva bhuvanāḥ sapta eva ca
चन्द्रमा और सूर्य नक्षत्रों सहित, ग्रह वायु के साथ, ध्रुव, सप्तर्षि और सातों लोक:
श्लोक 53 (13.47.53)
प्रधानं महदव्यक्तं विशेषान्तं सवैकृतम् । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं भूतादि सदसच्च यत् ॥
pradhānaṃ mahadavyaktaṃ viśeṣāntaṃ savaikṛtam | brahmādistambaparyantaṃ bhūtādi sadasacca yat
प्रधान, महत्, अव्यक्त, विशेषों तक और उनके विकारों सहित, ब्रह्मा से लेकर तृण तक सब, भूतों का आदि कारण, और जो कुछ सत् और असत् है:
श्लोक 54 (13.47.54)
अष्टौ प्रकृतयश्चैव प्रकृतिभ्यश्च यः परः । अस्य देवस्य यद्भागं कृत्स्नं सम्परिवर्तते ॥
aṣṭau prakṛtayaścaiva prakṛtibhyaśca yaḥ paraḥ | asya devasya yadbhāgaṃ kṛtsnaṃ samparivartate
आठ प्रकृतियाँ, और जो प्रकृतियों से परे है: जो कुछ घूमता है, वह सब इस देव का अंश है।
श्लोक 55 (13.47.55)
एतत्परममानन्दं यत्तच्छाश्वतमेव च । एषा गतिर्विरक्तानामेष भावः परः सताम् ॥
etatparamamānandaṃ yattacchāśvatameva ca | eṣā gatirviraktānāmeṣa bhāvaḥ paraḥ satām
यह परम आनन्द है, यही शाश्वत है; यह विरक्तों की गति है, यह सज्जनों का परम भाव है।
श्लोक 56 (13.47.56)
एतत्पदमनुद्विग्नमेतद्ब्रह्म सनातनम् । शास्त्रवेदाङ्गविदुषामेतद्ध्यानं परं पदम् ॥
etatpadamanudvignametadbrahma sanātanam | śāstravedāṅgaviduṣāmetaddhyānaṃ paraṃ padam
यह उद्वेगरहित पद है, यह सनातन ब्रह्म है; शास्त्रों और वेदाङ्गों के ज्ञाताओं के लिए यही परम ध्येय और परम पद है।
श्लोक 57 (13.47.57)
इयं सा परमा काष्ठा इयं सा परमा कला । इयं सा परमा सिद्धिरियं सा परमा गतिः ॥
iyaṃ sā paramā kāṣṭhā iyaṃ sā paramā kalā | iyaṃ sā paramā siddhiriyaṃ sā paramā gatiḥ
यही परम काष्ठा है, यही परम कला है; यही परम सिद्धि है, यही परम गति है।
श्लोक 58 (13.47.58)
इयं सा परमा शान्तिरियं सा निर्वृतिः परा । यं प्राप्य कृतकृत्याः स्म इत्यमन्यन्त योगिनः ॥
iyaṃ sā paramā śāntiriyaṃ sā nirvṛtiḥ parā | yaṃ prāpya kṛtakṛtyāḥ sma ityamanyanta yoginaḥ
यही परम शान्ति है, यही परम निर्वृत्ति है; जिसे पाकर योगियों ने माना कि "हम कृतकृत्य हो गए।"
श्लोक 59 (13.47.59)
इयं तुष्टिरियं सिद्धिरियं श्रुतिरियं स्मृतिः । अध्यात्मगतिरिष्टानां विदुषां प्राप्तिरव्यया ॥
iyaṃ tuṣṭiriyaṃ siddhiriyaṃ śrutiriyaṃ smṛtiḥ | adhyātmagatiriṣṭānāṃ viduṣāṃ prāptiravyayā
यही तुष्टि है, यही सिद्धि है, यही श्रुति है, यही स्मृति है; अध्यात्म-मार्ग में निष्ठा रखने वाले विद्वानों की यही अक्षय प्राप्ति है।
श्लोक 60 (13.47.60)
यजतां कामयानानां मखैर्विपुलदक्षिणैः । या गतिर्यज्ञशीलानां सा गतिस्त्वं न संशयः ॥
yajatāṃ kāmayānānāṃ makhairvipuladakṣiṇaiḥ | yā gatiryajñaśīlānāṃ sā gatistvaṃ na saṃśayaḥ
कामना से विपुल दक्षिणा वाले यज्ञों द्वारा यजन करने वालों की, यज्ञशील लोगों की जो गति है, वह गति आप ही हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 61 (13.47.61)
सम्यग्योगजपैः शान्तिर्नियमैर्देहतापनैः । तप्यतां या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान् ॥
samyagyogajapaiḥ śāntirniyamairdehatāpanaiḥ | tapyatāṃ yā gatirdeva paramā sā gatirbhavān
सम्यक् योग और जप से, शान्ति से, नियमों और देह-तापन से तप करने वालों की जो परम गति है, हे देव, वह गति आप ही हैं।
श्लोक 62 (13.47.62)
कर्मन्यासकृतानां च विरक्तानां ततस्ततः । या गतिर्ब्रह्मसदने सा गतिस्त्वं सनातन ॥
karmanyāsakṛtānāṃ ca viraktānāṃ tatastataḥ | yā gatirbrahmasadane sā gatistvaṃ sanātana
कर्मों का संन्यास करने वाले और जहाँ-तहाँ से विरक्त लोगों की ब्रह्मलोक में जो गति है, हे सनातन, वह गति आप ही हैं।
श्लोक 63 (13.47.63)
अपुनर्भवकामानां वैराग्ये वर्ततां च या । प्रकृतीनां लयानां च सा गतिस्त्वं सनातन ॥
apunarbhavakāmānāṃ vairāgye vartatāṃ ca yā | prakṛtīnāṃ layānāṃ ca sā gatistvaṃ sanātana
पुनर्जन्म न चाहने वालों, वैराग्य में स्थित रहने वालों और प्रकृतियों में लीन होने वालों की जो गति है, हे सनातन, वह गति आप ही हैं।
श्लोक 64 (13.47.64)
ज्ञानविज्ञानयुक्तानां निरुपाख्या निरञ्जना । कैवल्या या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान् ॥
jñānavijñānayuktānāṃ nirupākhyā nirañjanā | kaivalyā yā gatirdeva paramā sā gatirbhavān
ज्ञान और विज्ञान में लगे हुए लोगों की जो निरुपाख्य, निर्मल और कैवल्य रूप गति है, हे देव, वह परम गति आप ही हैं।
श्लोक 65 (13.47.65)
वेदशास्त्रपुराणोक्ताः पञ्च ता गतयः स्मृताः । त्वत्प्रसादाद्धि लभ्यन्ते न लभ्यन्तेऽन्यथा विभो ॥
vedaśāstrapurāṇoktāḥ pañca tā gatayaḥ smṛtāḥ | tvatprasādāddhi labhyante na labhyante'nyathā vibho
वेद, शास्त्र और पुराणों में ये पाँच गतियाँ बताई गई हैं। हे विभो, ये आपकी कृपा से ही मिलती हैं, अन्यथा नहीं मिलतीं।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 66 (13.47.66)
इति तण्डिस्तपोराशिस्तुष्टावेशानमात्मना । जगौ च परमं ब्रह्म यत्पुरा लोककृज्जगौ ॥
iti taṇḍistaporāśistuṣṭāveśānamātmanā | jagau ca paramaṃ brahma yatpurā lokakṛjjagau
इस प्रकार तपस्या की राशि तण्डि ने पूरे मन से ईशान की स्तुति की, और वह परम ब्रह्म-स्तोत्र गाया जिसे पूर्वकाल में लोकस्रष्टा ने गाया था।
श्लोक 67 (13.47.67)
एवं स्तुतो महादेवस्तण्डिना ब्रह्मवादिना । उवाच भगवान्देव उमया सहितः प्रभुः ॥
evaṃ stuto mahādevastaṇḍinā brahmavādinā | uvāca bhagavāndeva umayā sahitaḥ prabhuḥ
ब्रह्मवादी तण्डि द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर भगवान् महादेव, उमा के साथ विराजमान प्रभु ने कहा।
श्लोक 68 (13.47.68)
ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षयः । न विदुस्त्वामिति ततस्तुष्टः प्रोवाच तं शिवः ॥
brahmā śatakraturviṣṇurviśvedevā maharṣayaḥ | na vidustvāmiti tatastuṣṭaḥ provāca taṃ śivaḥ
तब "ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, विश्वेदेव और महर्षि आपको नहीं जानते" इन शब्दों से प्रसन्न होकर शिव ने उनसे कहा:
शिव उवाच
श्लोक 69 (13.47.69)
अक्षयश्चाव्ययश्चैव भविता दुःखवर्जितः । यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥
akṣayaścāvyayaścaiva bhavitā duḥkhavarjitaḥ | yaśasvī tejasā yukto divyajñānasamanvitaḥ
"तुम अक्षय और अव्यय होगे, दुःख से रहित, यशस्वी, तेज से युक्त और दिव्य ज्ञान से सम्पन्न होगे।
श्लोक 70 (13.47.70)
ऋषीणामभिगम्यश्च सूत्रकर्ता सुतस्तव । मत्प्रसादाद्द्विजश्रेष्ठ भविष्यति न संशयः ॥
ṛṣīṇāmabhigamyaśca sūtrakartā sutastava | matprasādāddvijaśreṣṭha bhaviṣyati na saṃśayaḥ
तुम्हारा पुत्र ऋषियों के पास जाने योग्य और सूत्रकार होगा। हे द्विजश्रेष्ठ, मेरी कृपा से ऐसा होगा, इसमें संशय नहीं।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 71 (13.47.71)
कं वा कामं ददाम्यद्य ब्रूहि यद्वत्स काङ्क्षसे । प्राञ्जलिः स उवाचेदं त्वयि भक्तिर्दृढाऽस्तु मे ॥
kaṃ vā kāmaṃ dadāmyadya brūhi yadvatsa kāṅkṣase | prāñjaliḥ sa uvācedaṃ tvayi bhaktirdṛḍhā'stu me
आज मैं तुम्हें कौन-सी कामना दूँ? हे वत्स, जो चाहते हो, कहो।" हाथ जोड़कर उन्होंने कहा: "आप में मेरी भक्ति दृढ़ रहे।"
श्लोक 72 (13.47.72)
एतान्दत्त्वा वरान्देवो वन्द्यमानः सुरर्षिभिः । स्तूयमानश्च विबुधैस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
etāndattvā varāndevo vandyamānaḥ surarṣibhiḥ | stūyamānaśca vibudhaistatraivāntaradhīyata
ये वर देकर, देवों और ऋषियों से वन्दित और देवताओं से स्तुत होते हुए देव वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 73 (13.47.73)
अन्तर्हिते भगवति सानुगे यादवेश्वर । ऋषिराश्रममागम्य ममैतत्प्रोक्तवानिह ॥
antarhite bhagavati sānuge yādaveśvara | ṛṣirāśramamāgamya mamaitatproktavāniha
हे यादवेश्वर, सेवकों सहित भगवान् के अन्तर्धान हो जाने पर ऋषि मेरे आश्रम में आए और यह सब मुझे सुनाया।
श्लोक 74 (13.47.74)
यानि च प्रथितान्यादौ तण्डिराख्यातवान्मम । नामानि मानवश्रेष्ठ तानि त्वं शृणु सिद्धये ॥
yāni ca prathitānyādau taṇḍirākhyātavānmama | nāmāni mānavaśreṣṭha tāni tvaṃ śṛṇu siddhaye
और जो प्रसिद्ध नाम तण्डि ने आरम्भ में मुझे बताए थे, हे मनुष्यों में श्रेष्ठ, उन्हें तुम सिद्धि के लिए सुनो।
श्लोक 75 (13.47.75)
दश नामसहस्राणि देवेष्वाह पितामहः । सर्वस्य शास्त्रेषु तथा दश नामशतानि च ॥
daśa nāmasahasrāṇi deveṣvāha pitāmahaḥ | sarvasya śāstreṣu tathā daśa nāmaśatāni ca
पितामह ब्रह्मा ने देवताओं के बीच दस हज़ार नाम कहे; और शास्त्रों में सर्व (शिव) के दस सैकड़े (एक हज़ार) नाम भी हैं।
श्लोक 76 (13.47.76)
गुह्यानीमानि नामानि तण्डिर्भगवतोऽच्युत । देवप्रसादाद्देवेशः पुरा प्राह महात्मने ॥
guhyānīmāni nāmāni taṇḍirbhagavato'cyuta | devaprasādāddeveśaḥ purā prāha mahātmane
हे अच्युत, ये भगवान् के गुप्त नाम हैं, जो तण्डि को प्राप्त हुए: देव की कृपा से देवेश ने पूर्वकाल में उन महात्मा को ये बताए थे।