अनुशासन पर्व · अध्याय 48
उपमन्यु द्वारा शिव के एक हज़ार आठ नामों का पाठ
कृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि ऋषि उपमन्यु ने मन को एकाग्र करके शिव के उन नामों का पाठ आरम्भ किया जिन्हें ब्रह्मा ने कहा और ऋषि तण्डि ने पृथ्वी पर उतारा था। उपमन्यु इस स्तव को स्तवराज बताते हैं, कहते हैं कि इसे किसे दिया जाए और किसे नहीं, और फिर शर्व के एक हज़ार आठ नामों (स्थाणु, भव, हर, रुद्र आदि) का पाठ करते हैं। अन्त में वे शिव की भक्ति का फल, इस स्तव की गुरु-परम्परा (ब्रह्मा, शक्र, मृत्यु, रुद्र, तण्डि से होकर यम, नचिकेता और मार्कण्डेय तक और फिर उपमन्यु तक) तथा एक वर्ष तक इसके पाठ से मिलनेवाली रक्षा और पुण्य का वर्णन करते हैं।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (13.48.1)
ततः स प्रयतो भूत्वा मम तात युधिष्ठिर । प्राञ्जलिः प्राह विप्रर्षिर्नामसङ्ग्रहमादितः ॥
tataḥ sa prayato bhūtvā mama tāta yudhiṣṭhira | prāñjaliḥ prāha viprarṣirnāmasaṅgrahamāditaḥ
हे तात युधिष्ठिर, तब वह विप्रर्षि उपमन्यु मन को एकाग्र करके, हाथ जोड़कर, मेरे सामने आरम्भ से नामों का संग्रह कहने लगे।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 2 (13.48.2)
ब्रह्मप्रोक्तैर्ऋषिप्रोक्तैर्वेदवेदाङ्गसम्भवैः । सर्वलोकेषु विख्यातं स्तुत्यं स्तोष्यामि नामभिः ॥
brahmaproktairṛṣiproktairvedavedāṅgasambhavaiḥ | sarvalokeṣu vikhyātaṃ stutyaṃ stoṣyāmi nāmabhiḥ
ब्रह्मा और ऋषियों द्वारा कहे गये, वेदों और वेदांगों से उत्पन्न नामों से मैं उन स्तुतियोग्य, सब लोकों में प्रसिद्ध देव की स्तुति करूँगा,
श्लोक 3 (13.48.3)
महद्भिर्विहितैः सत्यैः सिद्धैः सर्वार्थसाधकैः । ऋषिणा तण्डिना भक्त्या कृतैर्वेदकृतात्मना ॥
mahadbhirvihitaiḥ satyaiḥ siddhaiḥ sarvārthasādhakaiḥ | ṛṣiṇā taṇḍinā bhaktyā kṛtairvedakṛtātmanā
जो महान्, सत्य, सिद्ध और सब प्रयोजनों को सिद्ध करनेवाले हैं, और वेद से संस्कारित आत्मावाले ऋषि तण्डि ने भक्तिपूर्वक जिनकी रचना की,
श्लोक 4 (13.48.4)
यथोक्तैः साधुभिः ख्यातैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । प्रवरं प्रथमं स्वर्ग्यं सर्वभूतहितं शुभम् ॥
yathoktaiḥ sādhubhiḥ khyātairmunibhistattvadarśibhiḥ | pravaraṃ prathamaṃ svargyaṃ sarvabhūtahitaṃ śubham
जैसे तत्त्वदर्शी प्रसिद्ध मुनियों ने कहा है, वे श्रेष्ठ, प्रथम, स्वर्ग देनेवाले, सब प्राणियों का हित करनेवाले और मंगलमय हैं,
श्लोक 5 (13.48.5)
श्रुतैः सर्वत्र जगति ब्रह्मलोकावतारितैः । सत्यैस्तत्परमं ब्रह्म ब्रह्मप्रोक्तं सनातनम् । वक्ष्ये यदुकुलश्रेष्ठ शृणुष्वावहितो मम ॥
śrutaiḥ sarvatra jagati brahmalokāvatāritaiḥ | satyaistatparamaṃ brahma brahmaproktaṃ sanātanam | vakṣye yadukulaśreṣṭha śṛṇuṣvāvahito mama
ब्रह्मलोक से उतारे गये, जगत् में सर्वत्र सुने जानेवाले इन सत्य नामों द्वारा मैं उस परम, सनातन ब्रह्म का वर्णन करूँगा जिसे ब्रह्मा ने कहा है। हे यदुकुल के श्रेष्ठ, ध्यान लगाकर मेरी बात सुनो।
श्लोक 6 (13.48.6)
वरयैनं भवं देवं भक्तस्त्वं परमेश्वरम् । तेन ते श्रावयिष्यामि यत्तद्ब्रह्म सनातनम् ॥
varayainaṃ bhavaṃ devaṃ bhaktastvaṃ parameśvaram | tena te śrāvayiṣyāmi yattadbrahma sanātanam
इन देव भव से, जो परमेश्वर हैं, वर माँगो, क्योंकि तुम उनके भक्त हो; इसी कारण मैं तुम्हें वह सनातन ब्रह्म सुनाऊँगा।
श्लोक 7 (13.48.7)
न शक्यं विस्तरात्कृत्स्नं वक्तुं सर्वस्य केनचित् । युक्तेनापि विभूतीनामपि वर्षशतैरपि ॥
na śakyaṃ vistarātkṛtsnaṃ vaktuṃ sarvasya kenacit | yuktenāpi vibhūtīnāmapi varṣaśatairapi
कोई भी, चाहे वह कितना ही संयमी क्यों न हो, सैकड़ों वर्षों में भी उनकी सब विभूतियों का पूरा विस्तार से वर्णन नहीं कर सकता।
श्लोक 8 (13.48.8)
यस्यादिर्मध्यमन्तं च सुरैरपि न गम्यते । कस्तस्य शक्नुयाद्वक्तुं गुणान्कार्त्स्न्येन माधव ॥
yasyādirmadhyamantaṃ ca surairapi na gamyate | kastasya śaknuyādvaktuṃ guṇānkārtsnyena mādhava
जिनके आदि, मध्य और अन्त को देवता भी नहीं पा सकते, हे माधव, उनके गुणों को पूरी तरह कौन कह सकता है?
श्लोक 9 (13.48.9)
किन्तु देवस्य महतः संक्षिप्तार्थपदाक्षरम् । शक्तितश्चरितं वक्ष्ये प्रसादात्तस्य धीमतः ॥
kintu devasya mahataḥ saṃkṣiptārthapadākṣaram | śaktitaścaritaṃ vakṣye prasādāttasya dhīmataḥ
फिर भी उन बुद्धिमान् महादेव की कृपा से मैं अपनी शक्ति के अनुसार उनके चरित्र को संक्षेप में, थोड़े पदों और अक्षरों में कहूँगा।
श्लोक 10 (13.48.10)
अप्राप्य तु ततोऽनुज्ञां न शक्यः स्तोतुमीश्वरः । यदा तेनाभ्यनुज्ञातः स्तुतो वै स तदा मया ॥
aprāpya tu tato'nujñāṃ na śakyaḥ stotumīśvaraḥ | yadā tenābhyanujñātaḥ stuto vai sa tadā mayā
उनकी अनुमति पाये बिना ईश्वर की स्तुति नहीं की जा सकती। जब उन्होंने आज्ञा दी, तभी मैंने उनकी स्तुति की।
श्लोक 11 (13.48.11)
अनादिनिधनस्याहं जगद्योनेर्महात्मनः । नाम्नां कञ्चित्समुद्देशं वक्ष्याम्यव्यक्तयोनिनः ॥
anādinidhanasyāhaṃ jagadyonermahātmanaḥ | nāmnāṃ kañcitsamuddeśaṃ vakṣyāmyavyaktayoninaḥ
जो आदि और अन्त से रहित, जगत् के कारण, महात्मा और अव्यक्त योनिवाले हैं, उनके नामों का कुछ संक्षिप्त संग्रह मैं कहूँगा।
श्लोक 12 (13.48.12)
वरदस्य वरेण्यस्य विश्वरूपस्य धीमतः । शृणु नाम्नां चयं कृष्ण यदुक्तं पद्मयोनिना ॥
varadasya vareṇyasya viśvarūpasya dhīmataḥ | śṛṇu nāmnāṃ cayaṃ kṛṣṇa yaduktaṃ padmayoninā
हे कृष्ण, वर देनेवाले, वरेण्य, विश्वरूप और बुद्धिमान् देव के उन नामों का समूह सुनो जिसे कमलयोनि ब्रह्मा ने कहा है।
श्लोक 13 (13.48.13)
दश नामसहस्राणि यान्याह प्रपितामहः । तानि निर्मथ्य मनसा दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ॥
daśa nāmasahasrāṇi yānyāha prapitāmahaḥ | tāni nirmathya manasā dadhno ghṛtamivoddhṛtam
प्रपितामह ब्रह्मा ने जो दस हज़ार नाम कहे, उन्हें मन में मथकर मैंने दही से निकाले घी के समान उनका सार निकाला है।
श्लोक 14 (13.48.14)
गिरेः सारं यथा हेम पुष्पसारं यथा मधु । घृतात्सारं यथा मण्डस्तथैतत्सारमुद्धृतम् ॥
gireḥ sāraṃ yathā hema puṣpasāraṃ yathā madhu | ghṛtātsāraṃ yathā maṇḍastathaitatsāramuddhṛtam
जैसे पर्वत का सार सोना है, फूलों का सार मधु है और घी का सार मण्ड है, वैसे ही यह उन नामों का सार निकाला गया है।
श्लोक 15 (13.48.15)
सर्वपापापहमिदं चतुर्वेदसमन्वितम् । प्रयत्नेनाधिगन्तव्यं धार्यं च प्रयतात्मना ॥
sarvapāpāpahamidaṃ caturvedasamanvitam | prayatnenādhigantavyaṃ dhāryaṃ ca prayatātmanā
यह सब पापों को हरनेवाला और चारों वेदों से युक्त है; संयमी मनुष्य को इसे प्रयत्नपूर्वक सीखना और धारण करना चाहिए।
श्लोक 16 (13.48.16)
माङ्गल्यं पौष्टिकं चैव रक्षोघ्नं पावनं महत् ॥
māṅgalyaṃ pauṣṭikaṃ caiva rakṣoghnaṃ pāvanaṃ mahat
यह मंगलकारी, पुष्टि देनेवाला, राक्षसों का नाश करनेवाला और महान् पवित्रकारी है।
श्लोक 17 (13.48.17)
इदं भक्ताय दातव्यं श्रद्दधानास्तिकाय च । नाश्रद्दधानरूपाय नास्तिकायाजितात्मने ॥
idaṃ bhaktāya dātavyaṃ śraddadhānāstikāya ca | nāśraddadhānarūpāya nāstikāyājitātmane
इसे भक्त को, श्रद्धावान् आस्तिक को देना चाहिए; श्रद्धाहीन स्वभाववाले को या अजितात्मा नास्तिक को नहीं देना चाहिए।
श्लोक 18 (13.48.18)
यश्चाभ्यसूयते देवं कारणात्मानमीश्वरम् । स कृष्ण नरकं याति सहपूर्वैः सहात्मजैः ॥
yaścābhyasūyate devaṃ kāraṇātmānamīśvaram | sa kṛṣṇa narakaṃ yāti sahapūrvaiḥ sahātmajaiḥ
जो उस देव, कारणस्वरूप ईश्वर की निन्दा करता है, हे कृष्ण, वह अपने पूर्वजों और पुत्रों सहित नरक में जाता है।
श्लोक 19 (13.48.19)
इदं ध्यानमिदं योगमिदं ध्येयमनुत्तमम् । इदं जप्यमिदं ज्ञानं रहस्यमिदमुत्तमम् ॥
idaṃ dhyānamidaṃ yogamidaṃ dhyeyamanuttamam | idaṃ japyamidaṃ jñānaṃ rahasyamidamuttamam
यही ध्यान है, यही योग है, यही सर्वोच्च ध्येय है; यही जपने योग्य है, यही ज्ञान है, यही परम रहस्य है।
श्लोक 20 (13.48.20)
यं ज्ञात्वा अन्तकालेऽपि गच्छेत परमां गतिम् । पवित्रं मङ्गलं मेध्यं कल्याणमिदमुत्तमम् ॥
yaṃ jñātvā antakāle'pi gaccheta paramāṃ gatim | pavitraṃ maṅgalaṃ medhyaṃ kalyāṇamidamuttamam
इसे जानकर मनुष्य अन्त समय में भी परम गति को प्राप्त कर सकता है। यह पवित्र, मंगलमय, शुद्ध करनेवाला और कल्याणकारी है, और सब में उत्तम है।
श्लोक 21 (13.48.21)
इदं ब्रह्मा पुरा कृत्वा सर्वलोकपितामहः । सर्वस्तवानां राजत्वे दिव्यानां समकल्पयत् ॥
idaṃ brahmā purā kṛtvā sarvalokapitāmahaḥ | sarvastavānāṃ rājatve divyānāṃ samakalpayat
सब लोकों के पितामह ब्रह्मा ने पूर्वकाल में इसकी रचना करके इसे सब दिव्य स्तवों का राजा ठहराया।
श्लोक 22 (13.48.22)
तदाप्रभृति चैवायमीश्वरस्य महात्मनः । स्तवराज इति ख्यातो जगत्यमरपूजितः ॥
tadāprabhṛti caivāyamīśvarasya mahātmanaḥ | stavarāja iti khyāto jagatyamarapūjitaḥ
तभी से महात्मा ईश्वर का यह स्तव जगत् में 'स्तवराज' नाम से प्रसिद्ध है और देवताओं द्वारा पूजित है।
श्लोक 23 (13.48.23)
ब्रह्मलोकादयं स्वर्गे स्तवराजोऽवतारितः । यतस्तण्डिः पुरा प्राप तेन तण्डिकृतोऽभवत् ॥
brahmalokādayaṃ svarge stavarājo'vatāritaḥ | yatastaṇḍiḥ purā prāpa tena taṇḍikṛto'bhavat
यह स्तवराज ब्रह्मलोक से स्वर्ग में उतारा गया; क्योंकि तण्डि ने इसे पूर्वकाल में पाया था, इसलिए यह 'तण्डिकृत' कहलाया।
श्लोक 24 (13.48.24)
स्वर्गाच्चैवात्र भूर्लोकं तण्डिना ह्यवतारितः । सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥
svargāccaivātra bhūrlokaṃ taṇḍinā hyavatāritaḥ | sarvamaṅgalamāṅgalyaṃ sarvapāpapraṇāśanam
फिर स्वर्ग से इसे तण्डि ने यहाँ पृथ्वी पर उतारा; यह सब मंगलों का मंगल है और सब पापों का नाश करनेवाला है।
श्लोक 25 (13.48.25)
निगदिष्ये महाबाहो स्तवानामुत्तमं स्तवम् । ब्रह्मणामपि यद्ब्रह्म पराणामपि यत्परम् ॥
nigadiṣye mahābāho stavānāmuttamaṃ stavam | brahmaṇāmapi yadbrahma parāṇāmapi yatparam
हे महाबाहो, मैं स्तवों में सर्वोत्तम इस स्तव को कहूँगा, जो ब्रह्मों में ब्रह्म और परों में भी पर है,
श्लोक 26 (13.48.26)
तेजसामपि यत्तेजस्तपसामपि यत्तपः । शान्तीनामपि या शान्तिर्द्युतीनामपि या द्युतिः ॥
tejasāmapi yattejastapasāmapi yattapaḥ | śāntīnāmapi yā śāntirdyutīnāmapi yā dyutiḥ
जो तेजों में तेज, तपों में तप, शान्तियों में शान्ति और कान्तियों में कान्ति है,
श्लोक 27 (13.48.27)
दान्तानामपि यो दान्तो धीमतामपि या च धीः । देवानामपि यो देव ऋषीणामपि यस्त्वृषिः ॥
dāntānāmapi yo dānto dhīmatāmapi yā ca dhīḥ | devānāmapi yo deva ṛṣīṇāmapi yastvṛṣiḥ
जो दमनशीलों में दमनशील, बुद्धिमानों में बुद्धि, देवों में देव और ऋषियों में ऋषि है,
श्लोक 28 (13.48.28)
यज्ञानामपि यो यज्ञः शिवानामपि यः शिवः । रुद्राणामपि यो रुद्रः प्रभा प्रभवतामपि ॥
yajñānāmapi yo yajñaḥ śivānāmapi yaḥ śivaḥ | rudrāṇāmapi yo rudraḥ prabhā prabhavatāmapi
जो यज्ञों में यज्ञ, कल्याणकारियों में कल्याणकारी, रुद्रों में रुद्र और सामर्थ्यवानों में सामर्थ्य है,
श्लोक 29 (13.48.29)
योगिनामपि यो योगी कारणानां च कारणम् । यतो लोकाः सम्भवन्ति न भवन्ति यतः पुनः ॥
yogināmapi yo yogī kāraṇānāṃ ca kāraṇam | yato lokāḥ sambhavanti na bhavanti yataḥ punaḥ
जो योगियों में योगी और कारणों का भी कारण है, जिससे लोक उत्पन्न होते हैं और जिससे फिर वे लीन हो जाते हैं,
श्लोक 30 (13.48.30)
सर्वभूतात्मभूतस्य हरस्यामिततेजसः । अष्टोत्तरसहस्रं तु नाम्नां शर्वस्य मे शृणु । यच्छ्रुत्वा मनुजव्याघ्र सर्वान्कामानवाप्स्यसि ॥
sarvabhūtātmabhūtasya harasyāmitatejasaḥ | aṣṭottarasahasraṃ tu nāmnāṃ śarvasya me śṛṇu | yacchrutvā manujavyāghra sarvānkāmānavāpsyasi
सब प्राणियों की आत्मा, अपार तेजवाले हर के, उन शर्व के एक हज़ार आठ नाम मुझसे सुनो; हे नरव्याघ्र, इन्हें सुनकर तुम सब कामनाएँ प्राप्त कर लोगे।
श्लोक 31 (13.48.31)
स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भानुः प्रवरो वरदो वरः । सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः ॥
sthiraḥ sthāṇuḥ prabhurbhānuḥ pravaro varado varaḥ | sarvātmā sarvavikhyātaḥ sarvaḥ sarvakaro bhavaḥ
स्थिर, स्थाणु, प्रभु, भानु, प्रवर, वरद, वर; सर्वात्मा, सर्वविख्यात, सर्व, सर्वकर और भव।
श्लोक 32 (13.48.32)
जटी चर्मी शिखी खड्गी सर्वाङ्गः सर्वभावनः । हरश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः ॥
jaṭī carmī śikhī khaḍgī sarvāṅgaḥ sarvabhāvanaḥ | haraśca hariṇākṣaśca sarvabhūtaharaḥ prabhuḥ
जटी, चर्मी, शिखी, खड्गी, सर्वाङ्ग, सर्वभावन; हर, हरिणाक्ष, सर्वभूतहर और प्रभु।
श्लोक 33 (13.48.33)
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नियतः शाश्वतो ध्रुवः । श्मशानवासी भगवान्खचरो गोचरोऽर्दनः ॥
pravṛttiśca nivṛttiśca niyataḥ śāśvato dhruvaḥ | śmaśānavāsī bhagavānkhacaro gocaro'rdanaḥ
प्रवृत्ति, निवृत्ति, नियत, शाश्वत, ध्रुव, श्मशानवासी, भगवान्, खचर, गोचर और अर्दन।
श्लोक 34 (13.48.34)
अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूतभावनः । उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः ॥
abhivādyo mahākarmā tapasvī bhūtabhāvanaḥ | unmattaveṣapracchannaḥ sarvalokaprajāpatiḥ
अभिवाद्य, महाकर्मा, तपस्वी, भूतभावन, उन्मत्तवेष में छिपे हुए और सर्वलोकप्रजापति।
श्लोक 35 (13.48.35)
महारूपो महाकायो वृषरूपो महायशाः । महात्मा सर्वभूतात्मा विश्वरूपो महाहनुः ॥
mahārūpo mahākāyo vṛṣarūpo mahāyaśāḥ | mahātmā sarvabhūtātmā viśvarūpo mahāhanuḥ
महारूप, महाकाय, वृषरूप, महायशा; महात्मा, सर्वभूतात्मा, विश्वरूप और महाहनु।
श्लोक 36 (13.48.36)
लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हयगर्दभिः । पवित्रं च महांश्चैव नियमो नियमाश्रितः ॥
lokapālo'ntarhitātmā prasādo hayagardabhiḥ | pavitraṃ ca mahāṃścaiva niyamo niyamāśritaḥ
लोकपाल, अन्तर्हितात्मा, प्रसाद, हयगर्दभि, पवित्र, महान्, नियम और नियमाश्रित।
श्लोक 37 (13.48.37)
सर्वकर्मा स्वयंभूत आदिरादिकरो निधिः । सहस्राक्षो विशालाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः ॥
sarvakarmā svayaṃbhūta ādirādikaro nidhiḥ | sahasrākṣo viśālākṣaḥ somo nakṣatrasādhakaḥ
सर्वकर्मा, स्वयम्भू, आदि, आदिकर, निधि, सहस्राक्ष, विशालाक्ष, सोम और नक्षत्रसाधक।
श्लोक 38 (13.48.38)
चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः । अत्रिरत्र्या नमस्कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः ॥
candraḥ sūryaḥ śaniḥ keturgraho grahapatirvaraḥ | atriratryā namaskartā mṛgabāṇārpaṇo'naghaḥ
चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, ग्रह, ग्रहपति, वर; अत्रि, अत्रि की पत्नी को नमस्कार करनेवाले, मृग पर बाण चलानेवाले और अनघ।
श्लोक 39 (13.48.39)
महातपा घोरतपा अदीनो दीनसाधकः । संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः ॥
mahātapā ghoratapā adīno dīnasādhakaḥ | saṃvatsarakaro mantraḥ pramāṇaṃ paramaṃ tapaḥ
महातपा, घोरतपा, अदीन, दीनसाधक, संवत्सरकर, मन्त्र, प्रमाण और परम तप।
श्लोक 40 (13.48.40)
योगी योज्यो महाबीजो महारेता महाबलः । सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो बीजवाहनः ॥
yogī yojyo mahābījo mahāretā mahābalaḥ | suvarṇaretāḥ sarvajñaḥ subījo bījavāhanaḥ
योगी, योज्य, महाबीज, महारेता, महाबल, सुवर्णरेता, सर्वज्ञ, सुबीज और बीजवाहन।
श्लोक 41 (13.48.41)
दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः । विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरो बलो गणः ॥
daśabāhustvanimiṣo nīlakaṇṭha umāpatiḥ | viśvarūpaḥ svayaṃ śreṣṭho balavīro balo gaṇaḥ
दशबाहु, अनिमिष, नीलकण्ठ, उमापति, विश्वरूप, स्वयंश्रेष्ठ, बलवीर, बल और गण।
श्लोक 42 (13.48.42)
गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च । मन्त्रवित्परमो मन्त्रः सर्वभावकरो हरः ॥
gaṇakartā gaṇapatirdigvāsāḥ kāma eva ca | mantravitparamo mantraḥ sarvabhāvakaro haraḥ
गणकर्ता, गणपति, दिगम्बर, काम, मन्त्रवित्, परम मन्त्र, सर्वभावकर और हर।
श्लोक 43 (13.48.43)
कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान् । अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महान् ॥
kamaṇḍaludharo dhanvī bāṇahastaḥ kapālavān | aśanī śataghnī khaḍgī paṭṭiśī cāyudhī mahān
कमण्डलुधर, धनुर्धारी, बाणहस्त, कपालवान्; अशनी, शतघ्नी, खड्गी, पट्टिशी, आयुधी और महान्।
श्लोक 44 (13.48.44)
स्रुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः । उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा ॥
sruvahastaḥ surūpaśca tejastejaskaro nidhiḥ | uṣṇīṣī ca suvaktraśca udagro vinatastathā
स्रुवहस्त, सुरूप, तेज, तेजस्कर, निधि, उष्णीषी, सुवक्त्र, उदग्र और विनत।
श्लोक 45 (13.48.45)
दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च । शृगालरूपः सिद्धार्थो मुण्डः सर्वशुभंकरः ॥
dīrghaśca harikeśaśca sutīrthaḥ kṛṣṇa eva ca | śṛgālarūpaḥ siddhārtho muṇḍaḥ sarvaśubhaṃkaraḥ
दीर्घ, हरिकेश, सुतीर्थ, कृष्ण, शृगालरूप, सिद्धार्थ, मुण्ड और सर्वशुभंकर।
श्लोक 46 (13.48.46)
अजश्च बहुरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि । ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभःस्थलः ॥
ajaśca bahurūpaśca gandhadhārī kapardyapi | ūrdhvaretā ūrdhvaliṅga ūrdhvaśāyī nabhaḥsthalaḥ
अज, बहुरूप, गन्धधारी, कपर्दी, ऊर्ध्वरेता, ऊर्ध्वलिङ्ग, ऊर्ध्वशायी और नभःस्थल।
श्लोक 47 (13.48.47)
त्रिजटी चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः । अहश्चरो नक्तंचरस्तिग्ममन्युः सुवर्चसः ॥
trijaṭī cīravāsāśca rudraḥ senāpatirvibhuḥ | ahaścaro naktaṃcarastigmamanyuḥ suvarcasaḥ
त्रिजटी, चीरवासा, रुद्र, सेनापति, विभु, अहश्चर, नक्तंचर, तिग्मन्यु और सुवर्चा।
श्लोक 48 (13.48.48)
गजहा दैत्यहा कालो लोकधाता गुणाकरः । सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्बरावृतः ॥
gajahā daityahā kālo lokadhātā guṇākaraḥ | siṃhaśārdūlarūpaśca ārdracarmāmbarāvṛtaḥ
गजहा, दैत्यहा, काल, लोकधाता, गुणाकर, सिंहशार्दूलरूप और गीले चर्म का वस्त्र ओढ़नेवाले।
श्लोक 49 (13.48.49)
कालयोगी महानादः सर्वकामश्चतुष्पथः । निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः ॥
kālayogī mahānādaḥ sarvakāmaścatuṣpathaḥ | niśācaraḥ pretacārī bhūtacārī maheśvaraḥ
कालयोगी, महानाद, सर्वकाम, चतुष्पथ, निशाचर, प्रेतचारी, भूतचारी और महेश्वर।
श्लोक 50 (13.48.50)
बहुभूतो बहुधरः स्वर्भानुरमितो गतिः । नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलालसः ॥
bahubhūto bahudharaḥ svarbhānuramito gatiḥ | nṛtyapriyo nityanarto nartakaḥ sarvalālasaḥ
बहुभूत, बहुधर, स्वर्भानु, अमित, गति, नृत्यप्रिय, नित्यनर्त, नर्तक और सर्वलालस।
श्लोक 51 (13.48.51)
घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरिरुहो नभः । सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यतन्द्रितः ॥
ghoro mahātapāḥ pāśo nityo giriruho nabhaḥ | sahasrahasto vijayo vyavasāyo hyatandritaḥ
घोर, महातपा, पाश, नित्य, गिरिरुह, नभ, सहस्रहस्त, विजय, व्यवसाय और अतन्द्रित।
श्लोक 52 (13.48.52)
अधर्षणो धर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशकः । दक्षयागापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा ॥
adharṣaṇo dharṣaṇātmā yajñahā kāmanāśakaḥ | dakṣayāgāpahārī ca susaho madhyamastathā
अधर्षण, धर्षणात्मा, यज्ञहा, कामनाशक, दक्षयज्ञ को नष्ट करनेवाले, सुसह और मध्यम।
श्लोक 53 (13.48.53)
तेजोपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितो वरः । गम्भीरघोषो गम्भीरो गम्भीरबलवाहनः ॥
tejopahārī balahā mudito'rtho'jito varaḥ | gambhīraghoṣo gambhīro gambhīrabalavāhanaḥ
तेजोपहारी, बलहा, मुदित, अर्थ, अजित, वर, गम्भीरघोष, गम्भीर और गम्भीरबलवाहन।
श्लोक 54 (13.48.54)
न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्षकर्णस्थितिर्विभुः । सुतीक्ष्णदशनश्चैव महाकायो महाननः ॥
nyagrodharūpo nyagrodho vṛkṣakarṇasthitirvibhuḥ | sutīkṣṇadaśanaścaiva mahākāyo mahānanaḥ
न्यग्रोधरूप, न्यग्रोध, वृक्षकर्णस्थिति, विभु, सुतीक्ष्णदशन, महाकाय और महानन।
श्लोक 55 (13.48.55)
विष्वक्सेनो हरिर्यज्ञः संयुगापीडवाहनः । तीक्ष्णतापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित् ॥
viṣvakseno hariryajñaḥ saṃyugāpīḍavāhanaḥ | tīkṣṇatāpaśca haryaśvaḥ sahāyaḥ karmakālavit
विष्वक्सेन, हरि, यज्ञ, युद्ध में शत्रु को दबानेवाले वाहनवाले, तीक्ष्णताप, हर्यश्व, सहाय और कर्मकालवित्।
श्लोक 56 (13.48.56)
विष्णुप्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः । हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः ॥
viṣṇuprasādito yajñaḥ samudro vaḍavāmukhaḥ | hutāśanasahāyaśca praśāntātmā hutāśanaḥ
विष्णु द्वारा प्रसन्न किये गये यज्ञ, समुद्र, वडवामुख, हुताशन के सहायक, प्रशान्तात्मा और हुताशन।
श्लोक 57 (13.48.57)
उग्रतेजा महातेजा जन्यो विजयकालवित् । ज्योतिषामयनं सिद्धिः सर्वविग्रह एव च ॥
ugratejā mahātejā janyo vijayakālavit | jyotiṣāmayanaṃ siddhiḥ sarvavigraha eva ca
उग्रतेजा, महातेजा, जन्य, विजयकालवित्, ज्योतिषों का अयन, सिद्धि और सर्वविग्रह।
श्लोक 58 (13.48.58)
शिखी मुण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्धगो बली । वेणवी पणवी ताली खली कालकटंकटः ॥
śikhī muṇḍī jaṭī jvālī mūrtijo mūrdhago balī | veṇavī paṇavī tālī khalī kālakaṭaṃkaṭaḥ
शिखी, मुण्डी, जटी, ज्वाली, मूर्तिज, मूर्धग, बली; वेणवी, पणवी, ताली, खली और कालकटंकट।
श्लोक 59 (13.48.59)
नक्षत्रविग्रहमतिर्गुणबुद्धिर्लयो गमः । प्रजापतिर्विश्वबाहुर्विभागः सर्वगोमुखः ॥
nakṣatravigrahamatirguṇabuddhirlayo gamaḥ | prajāpatirviśvabāhurvibhāgaḥ sarvagomukhaḥ
नक्षत्रविग्रहमति, गुणबुद्धि, लय, गम, प्रजापति, विश्वबाहु, विभाग और सर्वगोमुख।
श्लोक 60 (13.48.60)
विमोचनः सुसरणो हिरण्यकवचोद्भवः । मेढ्रजो बलचारी च महीचारी स्रुतस्तथा ॥
vimocanaḥ susaraṇo hiraṇyakavacodbhavaḥ | meḍhrajo balacārī ca mahīcārī srutastathā
विमोचन, सुसरण, हिरण्यकवचोद्भव, मेढ्रज, बलचारी, महीचारी और स्रुत।
श्लोक 61 (13.48.61)
सर्वतूर्यनिनादी च सर्वातोद्यपरिग्रहः । व्यालरूपो गुहावासी गुहो माली तरङ्गवित् ॥
sarvatūryaninādī ca sarvātodyaparigrahaḥ | vyālarūpo guhāvāsī guho mālī taraṅgavit
सर्वतूर्यनिनादी, सर्वातोद्यपरिग्रह, व्यालरूप, गुहावासी, गुह, माली और तरङ्गवित्।
श्लोक 62 (13.48.62)
त्रिदशस्त्रिकालधृक्कर्मसर्वबन्धविमोचनः । बन्धनस्त्वसुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः ॥
tridaśastrikāladhṛkkarmasarvabandhavimocanaḥ | bandhanastvasurendrāṇāṃ yudhi śatruvināśanaḥ
त्रिदश, त्रिकालधृक्, कर्म के सब बन्धनों से छुड़ानेवाले, असुरेन्द्रों के बन्धन और युद्ध में शत्रुओं के नाशक।
श्लोक 63 (13.48.63)
साङ्ख्यप्रसादो दुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः । प्रस्कन्दनो विभागज्ञो अतुल्यो यज्ञभागवित् ॥
sāṅkhyaprasādo durvāsāḥ sarvasādhuniṣevitaḥ | praskandano vibhāgajño atulyo yajñabhāgavit
साङ्ख्यप्रसाद, दुर्वासा, सर्वसाधुनिषेवित, प्रस्कन्दन, विभागज्ञ, अतुल्य और यज्ञभागवित्।
श्लोक 64 (13.48.64)
सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः । हैमो हेमकरो यज्ञः सर्वंधारी धरोत्तमः ॥
sarvavāsaḥ sarvacārī durvāsā vāsavo'maraḥ | haimo hemakaro yajñaḥ sarvaṃdhārī dharottamaḥ
सर्ववास, सर्वचारी, दुर्वासा, वासव, अमर, हैम, हेमकर, यज्ञ, सर्वंधारी और धरोत्तम।
श्लोक 65 (13.48.65)
लोहिताक्षो महाक्षश्च विजयाक्षो विशारदः । सङ्ग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः ॥
lohitākṣo mahākṣaśca vijayākṣo viśāradaḥ | saṅgraho nigrahaḥ kartā sarpacīranivāsanaḥ
लोहिताक्ष, महाक्ष, विजयाक्ष, विशारद, संग्रह, निग्रह, कर्ता और सर्प के चीर को वस्त्र बनानेवाले।
श्लोक 66 (13.48.66)
मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च काहलिः सर्वकामदः । सर्वकालप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृत् ॥
mukhyo'mukhyaśca dehaśca kāhaliḥ sarvakāmadaḥ | sarvakālaprasādaśca subalo balarūpadhṛt
मुख्य, अमुख्य, देह, काहलि, सर्वकामद, सर्वकालप्रसाद, सुबल और बलरूपधृत्।
श्लोक 67 (13.48.67)
सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः । आकाशनिधिरूपश्च निपाती ह्यवशः खगः ॥
sarvakāmavaraścaiva sarvadaḥ sarvatomukhaḥ | ākāśanidhirūpaśca nipātī hyavaśaḥ khagaḥ
सर्वकामवर, सर्वद, सर्वतोमुख, आकाशनिधिरूप, निपाती, अवश और खग।
श्लोक 68 (13.48.68)
रौद्ररूपोऽंशुरादित्यो बहुरश्मिः सुवर्चसी । वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः ॥
raudrarūpo'ṃśurādityo bahuraśmiḥ suvarcasī | vasuvego mahāvego manovego niśācaraḥ
रौद्ररूप, अंशु, आदित्य, बहुरश्मि, सुवर्चसी, वसुवेग, महावेग, मनोवेग और निशाचर।
श्लोक 69 (13.48.69)
सर्ववासी श्रियावासी उपदेशकरोऽकरः । मुनिरात्मनिरालोकः सम्भग्नश्च सहस्रदः ॥
sarvavāsī śriyāvāsī upadeśakaro'karaḥ | munirātmanirālokaḥ sambhagnaśca sahasradaḥ
सर्ववासी, श्रीवासी, उपदेशकर, अकर, मुनि, आत्मनिरालोक, सम्भग्न और सहस्रद।
श्लोक 70 (13.48.70)
पक्षी च पक्षरूपश्च अतिदीप्तो विशाम्पतिः । उन्मादो मदनः कामो ह्यश्वत्थोऽर्थकरो यशः ॥
pakṣī ca pakṣarūpaśca atidīpto viśāmpatiḥ | unmādo madanaḥ kāmo hyaśvattho'rthakaro yaśaḥ
पक्षी, पक्षरूप, अतिदीप्त, विशाम्पति; उन्माद, मदन, काम, अश्वत्थ, अर्थकर और यश।
श्लोक 71 (13.48.71)
वामदेवश्च वामश्च प्राग्दक्षिणश्च वामनः । सिद्धयोगी महर्षिश्च सिद्धार्थः सिद्धसाधकः ॥
vāmadevaśca vāmaśca prāgdakṣiṇaśca vāmanaḥ | siddhayogī maharṣiśca siddhārthaḥ siddhasādhakaḥ
वामदेव, वाम, प्राग्दक्षिण, वामन; सिद्धयोगी, महर्षि, सिद्धार्थ और सिद्धसाधक।
श्लोक 72 (13.48.72)
भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च विपणो मृदुरव्ययः । महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवांपतिः ॥
bhikṣuśca bhikṣurūpaśca vipaṇo mṛduravyayaḥ | mahāseno viśākhaśca ṣaṣṭibhāgo gavāṃpatiḥ
भिक्षु, भिक्षुरूप, विपण, मृदु, अव्यय; महासेन, विशाख, षष्टिभाग और गवांपति।
श्लोक 73 (13.48.73)
वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भन एव च । वृत्तावृत्तकरस्तालो मधुर्मधुकलोचनः ॥
vajrahastaśca viṣkambhī camūstambhana eva ca | vṛttāvṛttakarastālo madhurmadhukalocanaḥ
वज्रहस्त, विष्कम्भी, चमूस्तम्भन, वृत्तावृत्तकर, ताल, मधु और मधुकलोचन।
श्लोक 74 (13.48.74)
वाचस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजितः । ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी विचारवित् ॥
vācaspatyo vājasano nityamāśramapūjitaḥ | brahmacārī lokacārī sarvacārī vicāravit
वाचस्पत्य, वाजसन, आश्रमों में नित्य पूजित, ब्रह्मचारी, लोकचारी, सर्वचारी और विचारवित्।
श्लोक 75 (13.48.75)
ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकवान् । निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः ॥
īśāna īśvaraḥ kālo niśācārī pinākavān | nimittastho nimittaṃ ca nandirnandikaro hariḥ
ईशान, ईश्वर, काल, निशाचारी, पिनाकवान्; निमित्तस्थ, निमित्त, नन्दी, नन्दिकर और हरि।
श्लोक 76 (13.48.76)
नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्धनः । भगहारी निहन्ता च कालो ब्रह्मा पितामहः ॥
nandīśvaraśca nandī ca nandano nandivardhanaḥ | bhagahārī nihantā ca kālo brahmā pitāmahaḥ
नन्दीश्वर, नन्दी, नन्दन, नन्दिवर्धन, भगहारी, निहन्ता, काल, ब्रह्मा और पितामह।
श्लोक 77 (13.48.77)
चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च । लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः ॥
caturmukho mahāliṅgaścāruliṅgastathaiva ca | liṅgādhyakṣaḥ surādhyakṣo yogādhyakṣo yugāvahaḥ
चतुर्मुख, महालिङ्ग, चारुलिङ्ग, लिङ्गाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, योगाध्यक्ष और युगावह।
श्लोक 78 (13.48.78)
बीजाध्यक्षो बीजकर्ता अध्यात्मानुगतो बलः । इतिहासः सकल्पश्च गौतमोऽथ निशाकरः ॥
bījādhyakṣo bījakartā adhyātmānugato balaḥ | itihāsaḥ sakalpaśca gautamo'tha niśākaraḥ
बीजाध्यक्ष, बीजकर्ता, अध्यात्मानुगत, बल, इतिहास, सकल्प, गौतम और निशाकर।
श्लोक 79 (13.48.79)
दम्भो ह्यदम्भो वैदम्भो वश्यो वशकरः कलिः । लोककर्ता पशुपतिर्महाकर्ता ह्यनौषधः ॥
dambho hyadambho vaidambho vaśyo vaśakaraḥ kaliḥ | lokakartā paśupatirmahākartā hyanauṣadhaḥ
दम्भ, अदम्भ, वैदम्भ, वश्य, वशकर, कलि, लोककर्ता, पशुपति, महाकर्ता और अनौषध।
श्लोक 80 (13.48.80)
अक्षरं परमं ब्रह्म बलवच्छक्र एव च । नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो गतागतः ॥
akṣaraṃ paramaṃ brahma balavacchakra eva ca | nītirhyanītiḥ śuddhātmā śuddho mānyo gatāgataḥ
अक्षर, परम ब्रह्म, बलवान्, शक्र, नीति, अनीति, शुद्धात्मा, शुद्ध, मान्य और गतागत।
श्लोक 81 (13.48.81)
बहुप्रसादः सुस्वप्नो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित् । वेदकारो मन्त्रकारो विद्वान्समरमर्दनः ॥
bahuprasādaḥ susvapno darpaṇo'tha tvamitrajit | vedakāro mantrakāro vidvānsamaramardanaḥ
बहुप्रसाद, सुस्वप्न, दर्पण, अमित्रजित्, वेदकार, मन्त्रकार, विद्वान् और समरमर्दन।
श्लोक 82 (13.48.82)
महामेघनिवासी च महाघोरो वशीकरः । अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः ॥
mahāmeghanivāsī ca mahāghoro vaśīkaraḥ | agnijvālo mahājvālo atidhūmro huto haviḥ
महामेघनिवासी, महाघोर, वशीकर, अग्निज्वाल, महाज्वाल, अतिधूम्र, हुत और हवि।
श्लोक 83 (13.48.83)
वृषणः शंकरो नित्यं वर्चस्वी धूमकेतनः । नीलस्तथाङ्गलुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः ॥
vṛṣaṇaḥ śaṃkaro nityaṃ varcasvī dhūmaketanaḥ | nīlastathāṅgalubdhaśca śobhano niravagrahaḥ
वृषण, शंकर, नित्य, वर्चस्वी, धूमकेतन, नील, अङ्गलुब्ध, शोभन और निरवग्रह।
श्लोक 84 (13.48.84)
स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः । उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भपरायणः ॥
svastidaḥ svastibhāvaśca bhāgī bhāgakaro laghuḥ | utsaṅgaśca mahāṅgaśca mahāgarbhaparāyaṇaḥ
स्वस्तिद, स्वस्तिभाव, भागी, भागकर, लघु, उत्सङ्ग, महाङ्ग और महागर्भपरायण।
श्लोक 85 (13.48.85)
कृष्णवर्णः सुवर्णश्च इन्द्रियं सर्वदेहिनाम् । महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः ॥
kṛṣṇavarṇaḥ suvarṇaśca indriyaṃ sarvadehinām | mahāpādo mahāhasto mahākāyo mahāyaśāḥ
कृष्णवर्ण, सुवर्ण, सब देहधारियों की इन्द्रिय; महापाद, महाहस्त, महाकाय और महायशा।
श्लोक 86 (13.48.86)
महामूर्धा महामात्रो महानेत्रो निशालयः । महान्तको महाकर्णो महोष्ठश्च महाहनुः ॥
mahāmūrdhā mahāmātro mahānetro niśālayaḥ | mahāntako mahākarṇo mahoṣṭhaśca mahāhanuḥ
महामूर्धा, महामात्र, महानेत्र, निशालय, महान्तक, महाकर्ण, महोष्ठ और महाहनु।
श्लोक 87 (13.48.87)
महानासो महाकम्बुर्महाग्रीवः श्मशानभाक् । महावक्षा महोरस्को ह्यन्तरात्मा मृगालयः ॥
mahānāso mahākamburmahāgrīvaḥ śmaśānabhāk | mahāvakṣā mahorasko hyantarātmā mṛgālayaḥ
महानास, महाकम्बु, महाग्रीव, श्मशानभाक्, महावक्षा, महोरस्क, अन्तरात्मा और मृगालय।
श्लोक 88 (13.48.88)
लम्बनो लम्बितोष्ठश्च महामायः पयोनिधिः । महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः ॥
lambano lambitoṣṭhaśca mahāmāyaḥ payonidhiḥ | mahādanto mahādaṃṣṭro mahājihvo mahāmukhaḥ
लम्बन, लम्बितोष्ठ, महामाय, पयोनिधि, महादन्त, महादंष्ट्र, महाजिह्व और महामुख।
श्लोक 89 (13.48.89)
महानखो महारोमा महाकेशो महाजटः । प्रसन्नश्च प्रसादश्च प्रत्ययो गिरिसाधनः ॥
mahānakho mahāromā mahākeśo mahājaṭaḥ | prasannaśca prasādaśca pratyayo girisādhanaḥ
महानख, महारोमा, महाकेश, महाजट, प्रसन्न, प्रसाद, प्रत्यय और गिरिसाधन।
श्लोक 90 (13.48.90)
स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनिः । वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वायुवाहनः ॥
snehano'snehanaścaiva ajitaśca mahāmuniḥ | vṛkṣākāro vṛkṣaketuranalo vāyuvāhanaḥ
स्नेहन, अस्नेहन, अजित, महामुनि, वृक्षाकार, वृक्षकेतु, अनल और वायुवाहन।
श्लोक 91 (13.48.91)
गण्डली मेरुधामा च देवाधिपतिरेव च । अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षणः ॥
gaṇḍalī merudhāmā ca devādhipatireva ca | atharvaśīrṣaḥ sāmāsya ṛksahasrāmitekṣaṇaḥ
गण्डली; मेरु जिनका धाम है और जो देवों के अधिपति ही हैं; अथर्वशीर्ष जिनका सिर है, साम जिनका मुख है, और हज़ारों ऋचाएँ जिनके असीम नेत्र हैं।
श्लोक 92 (13.48.92)
यजुःपादभुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा । अमोघार्थः प्रसादश्च अभिगम्यः सुदर्शनः ॥
yajuḥpādabhujo guhyaḥ prakāśo jaṅgamastathā | amoghārthaḥ prasādaśca abhigamyaḥ sudarśanaḥ
यजुर्वेद जिनके चरण और भुजाएँ हैं; जो गुह्य हैं, प्रकाशरूप हैं और जंगम भी हैं; जिनका प्रयोजन कभी व्यर्थ नहीं जाता, जो प्रसादरूप हैं, सुगमता से पास पहुँचने योग्य हैं और सुदर्शन हैं।
श्लोक 93 (13.48.93)
उपकारः प्रियः सर्वः कनकः काञ्चनच्छविः । नाभिर्नन्दिकरो भावः पुष्करस्थपतिः स्थिरः ॥
upakāraḥ priyaḥ sarvaḥ kanakaḥ kāñcanacchaviḥ | nābhirnandikaro bhāvaḥ puṣkarasthapatiḥ sthiraḥ
उपकारी, प्रिय, सर्वरूप; कनक, स्वर्ण-सी कान्तिवाले; नाभि, आनन्द देनेवाले, भावरूप, कमलासन पर विराजमान के स्वामी और स्थिर।
श्लोक 94 (13.48.94)
द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यज्ञो यज्ञसमाहितः । नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः ॥
dvādaśastrāsanaścādyo yajño yajñasamāhitaḥ | naktaṃ kaliśca kālaśca makaraḥ kālapūjitaḥ
द्वादशत्रासन, आदिदेव, यज्ञस्वरूप, यज्ञ में समाहित; रात्रि, कलि, काल, मकर और काल से पूजित।
श्लोक 95 (13.48.95)
सगणो गणकारश्च भूतवाहनसारथिः । भस्मशयो भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरुर्गणः ॥
sagaṇo gaṇakāraśca bhūtavāhanasārathiḥ | bhasmaśayo bhasmagoptā bhasmabhūtastarurgaṇaḥ
गणों के साथ रहनेवाले, गणों के रचयिता, भूतों के वाहन के सारथि; भस्म में शयन करनेवाले, भस्म के रक्षक, भस्मरूप, वृक्ष और गण।
श्लोक 96 (13.48.96)
लोकपालस्तथा लोको महात्मा सर्वपूजितः । शुक्लस्त्रिशुक्लः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ॥
lokapālastathā loko mahātmā sarvapūjitaḥ | śuklastriśuklaḥ sampannaḥ śucirbhūtaniṣevitaḥ
लोकपाल, स्वयं लोकरूप, महात्मा, सबके द्वारा पूजित; शुक्ल, त्रिशुक्ल, सम्पन्न, शुचि और प्राणियों से सेवित।
श्लोक 97 (13.48.97)
आश्रमस्थः क्रियादस्थो विश्वकर्ममतिर्वरः । विशालशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यम्बुजालः सुनिश्चलः ॥
āśramasthaḥ kriyādastho viśvakarmamatirvaraḥ | viśālaśākhastāmroṣṭho hyambujālaḥ suniścalaḥ
आश्रम में स्थित, क्रियाओं में स्थित, विश्वकर्मा के समान बुद्धिवाले, श्रेष्ठ; विशाल शाखाओंवाले, ताँबे-जैसे होंठवाले, अम्बुजाल और अत्यन्त निश्चल।
श्लोक 98 (13.48.98)
कपिलः कपिशः शुक्ल आयुश्चैव परोऽपरः । गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेयः सुशारदः ॥
kapilaḥ kapiśaḥ śukla āyuścaiva paro'paraḥ | gandharvo hyaditistārkṣyaḥ suvijñeyaḥ suśāradaḥ
कपिल, कपिश, शुक्ल, आयु, पर और अपर; गन्धर्व, अदिति, तार्क्ष्य, सुविज्ञेय और सुशारद।
श्लोक 99 (13.48.99)
परश्वधायुधो देव अनुकारी सुबान्धवः । तुम्बवीणो महाक्रोध ऊर्ध्वरेता जलेशयः ॥
paraśvadhāyudho deva anukārī subāndhavaḥ | tumbavīṇo mahākrodha ūrdhvaretā jaleśayaḥ
परशु को आयुध बनानेवाले, देव, अनुकरण करनेवाले, उत्तम बन्धु; तुम्बी की वीणा बजानेवाले, महाक्रोधी, ऊर्ध्वरेता और जल में शयन करनेवाले।
श्लोक 100 (13.48.100)
उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः । सर्वाङ्गरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः ॥
ugro vaṃśakaro vaṃśo vaṃśanādo hyaninditaḥ | sarvāṅgarūpo māyāvī suhṛdo hyanilo'nalaḥ
उग्र, वंशों के संस्थापक, वंशरूप, वंशी बजानेवाले, निन्दा से परे; सब अंगों और रूपों वाले, मायावी, सुहृद, वायु और अग्नि।
श्लोक 101 (13.48.101)
बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः । स यज्ञारिः स कामारिर्महादंष्ट्रो महायुधः ॥
bandhano bandhakartā ca subandhanavimocanaḥ | sa yajñāriḥ sa kāmārirmahādaṃṣṭro mahāyudhaḥ
बाँधनेवाले, बन्धन रचनेवाले, दृढ़ बन्धनों से छुड़ानेवाले; यज्ञ के शत्रु, काम के शत्रु, महादंष्ट्र और महायुध।
श्लोक 102 (13.48.102)
बहुधा निन्दितः शर्वः शङ्करः शङ्करोऽधनः । अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा ॥
bahudhā ninditaḥ śarvaḥ śaṅkaraḥ śaṅkaro'dhanaḥ | amareśo mahādevo viśvadevaḥ surārihā
अनेक प्रकार से निन्दित, शर्व, शंकर, निर्धन शंकर; अमरों के ईश, महादेव, विश्वदेव और देवशत्रुओं के संहारक।
श्लोक 103 (13.48.103)
अहिर्बुध्न्योऽनिलाभश्च चेकितानो हविस्तथा । अजैकपाच्च कापाली त्रिशङ्कुरजितः शिवः ॥
ahirbudhnyo'nilābhaśca cekitāno havistathā | ajaikapācca kāpālī triśaṅkurajitaḥ śivaḥ
अहिर्बुध्न्य, अनिलाभ, चेकितान और हवि; अजैकपाद, कापाली, त्रिशंकु, अजित और शिव।
श्लोक 104 (13.48.104)
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा । धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः ॥
dhanvantarirdhūmaketuḥ skando vaiśravaṇastathā | dhātā śakraśca viṣṇuśca mitrastvaṣṭā dhruvo dharaḥ
धन्वन्तरि, धूमकेतु, स्कन्द और वैश्रवण; धाता, शक्र, विष्णु, मित्र, त्वष्टा, ध्रुव और धर।
श्लोक 105 (13.48.105)
प्रभावः सर्वगो वायुरर्यमा सविता रविः । उषङ्गुश्च विधाता च मांधाता भूतभावनः ॥
prabhāvaḥ sarvago vāyuraryamā savitā raviḥ | uṣaṅguśca vidhātā ca māṃdhātā bhūtabhāvanaḥ
प्रभाव, सर्वव्यापी, वायु, अर्यमा, सविता, रवि; उषंगु, विधाता, मान्धाता और भूतों के उत्पादक।
श्लोक 106 (13.48.106)
विभुर्वर्णविभावी च सर्वकामगुणावहः । पद्मनाभो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रोऽनिलोऽनलः ॥
vibhurvarṇavibhāvī ca sarvakāmaguṇāvahaḥ | padmanābho mahāgarbhaścandravaktro'nilo'nalaḥ
विभु, वर्णों को प्रकट करनेवाले, सब इष्ट गुणों को लानेवाले; पद्मनाभ, महागर्भ, चन्द्रमुख, वायु और अग्नि।
श्लोक 107 (13.48.107)
बलवांश्चोपशान्तश्च पुराणः पुण्यचञ्चुरी । कुरुकर्ता कुरुवासी कुरुभूतो गुणौषधः ॥
balavāṃścopaśāntaśca purāṇaḥ puṇyacañcurī | kurukartā kuruvāsī kurubhūto guṇauṣadhaḥ
बलवान्, उपशान्त, पुराण, पुण्यचंचुरी; कुरुओं के कर्ता, कुरुओं में निवास करनेवाले, कुरुरूप हुए और गुणों की औषधि।
श्लोक 108 (13.48.108)
सर्वाशयो दर्भचारी सर्वेषां प्राणिनां पतिः । देवदेवः सुखासक्तः सदसत्सर्वरत्नवित् ॥
sarvāśayo darbhacārī sarveṣāṃ prāṇināṃ patiḥ | devadevaḥ sukhāsaktaḥ sadasatsarvaratnavit
सबके आश्रय, दर्भ में विचरनेवाले, सब प्राणियों के स्वामी; देवों के देव, सुख में आसक्त, सत् और असत् सब रत्नों के ज्ञाता।
श्लोक 109 (13.48.109)
कैलासगिरिवासी च हिमवद्गिरिसंश्रयः । कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः ॥
kailāsagirivāsī ca himavadgirisaṃśrayaḥ | kūlahārī kūlakartā bahuvidyo bahupradaḥ
कैलास पर्वत के निवासी, हिमालय पर्वत को आश्रय बनानेवाले; कूलों को ढहानेवाले, कूलों को रचनेवाले, अनेक विद्याओं के ज्ञाता और बहुत कुछ देनेवाले।
श्लोक 110 (13.48.110)
वणिजो वर्धकी वृक्षो बकुलश्चन्दनश्छदः । सारग्रीवो महाजत्रुरलोलश्च महौषधः ॥
vaṇijo vardhakī vṛkṣo bakulaścandanaśchadaḥ | sāragrīvo mahājatruralolaśca mahauṣadhaḥ
वणिक्, बढ़ई, वृक्ष, बकुल, चन्दन, छद; मोटी ग्रीवावाले, विशाल हँसलीवाले, अचंचल और महौषध।
श्लोक 111 (13.48.111)
सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्छदो व्याकरणोत्तरः । सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः ॥
siddhārthakārī siddhārthaśchado vyākaraṇottaraḥ | siṃhanādaḥ siṃhadaṃṣṭraḥ siṃhagaḥ siṃhavāhanaḥ
प्रयोजन सिद्ध करनेवाले, सिद्धार्थ, छद, व्याकरण से भी ऊपर; सिंहनाद करनेवाले, सिंह-जैसी दाढ़ोंवाले, सिंह की चाल से चलनेवाले और सिंह पर सवार।
श्लोक 112 (13.48.112)
प्रभावात्मा जगत्कालस्थालो लोकहितस्तरुः । सारङ्गो नवचक्राङ्गः केतुमाली सभावनः ॥
prabhāvātmā jagatkālasthālo lokahitastaruḥ | sāraṅgo navacakrāṅgaḥ ketumālī sabhāvanaḥ
प्रभावात्मा, जगत् और काल के आधार, लोकहित के वृक्ष; सारंग, नौ चक्र-अंगोंवाले, केतुमाली और सभावन।
श्लोक 113 (13.48.113)
भूतालयो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः ॥
bhūtālayo bhūtapatirahorātramaninditaḥ
भूतों के आलय, भूतों के पति, अहोरात्र और निन्दा से परे।
श्लोक 114 (13.48.114)
वाहिता सर्वभूतानां निलयश्च विभुर्भवः । अमोघः संयतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः ॥
vāhitā sarvabhūtānāṃ nilayaśca vibhurbhavaḥ | amoghaḥ saṃyato hyaśvo bhojanaḥ prāṇadhāraṇaḥ
सब प्राणियों के वाहक, उनके निवास, विभु, भव; अमोघ, संयत, अश्व, भोजन देनेवाले और प्राणों को धारण करनेवाले।
श्लोक 115 (13.48.115)
धृतिमान्मतिमान्दक्षः सत्कृतश्च युगाधिपः । गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरिः ॥
dhṛtimānmatimāndakṣaḥ satkṛtaśca yugādhipaḥ | gopālirgopatirgrāmo gocarmavasano hariḥ
धैर्यवान्, बुद्धिमान्, दक्ष, सम्मानित, युगों के अधिपति; गोपालि, गोपति, ग्राम, गोचर्म धारण करनेवाले और हरि।
श्लोक 116 (13.48.116)
हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापालः प्रवेशिनाम् । प्रकृष्टारिर्महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः ॥
hiraṇyabāhuśca tathā guhāpālaḥ praveśinām | prakṛṣṭārirmahāharṣo jitakāmo jitendriyaḥ
स्वर्ण-भुजाओंवाले और भीतर प्रवेश करनेवालों के लिए गुहा के रक्षक; शत्रुओं को कुचलनेवाले, महान् हर्षवाले, कामजयी और जितेन्द्रिय।
श्लोक 117 (13.48.117)
गान्धारश्च सुवासश्च तपःसक्तो रतिर्नरः । महागीतो महानृत्यो ह्यप्सरोगणसेवितः ॥
gāndhāraśca suvāsaśca tapaḥsakto ratirnaraḥ | mahāgīto mahānṛtyo hyapsarogaṇasevitaḥ
गान्धार, सुवास, तप में लीन, रति, नर; महागीत, महानृत्य और अप्सराओं के समूहों से सेवित।
श्लोक 118 (13.48.118)
महाकेतुर्महाधातुर्नैकसानुचरश्चलः । आवेदनीय आदेशः सर्वगन्धसुखावहः ॥
mahāketurmahādhāturnaikasānucaraścalaḥ | āvedanīya ādeśaḥ sarvagandhasukhāvahaḥ
महाकेतु, महाधातु, अनेक शिखरों पर विचरनेवाले, चल; जानने योग्य, आदेश और सब सुगन्धों का सुख लानेवाले।
श्लोक 119 (13.48.119)
तोरणस्तारणो वातः परिधी पतिखेचरः । संयोगो वर्धनो वृद्धो अतिवृद्धो गुणाधिकः ॥
toraṇastāraṇo vātaḥ paridhī patikhecaraḥ | saṃyogo vardhano vṛddho ativṛddho guṇādhikaḥ
तोरण, पार उतारनेवाले, वात, परिधि, आकाशचारियों के पति; संयोग, वर्धन, वृद्ध, अतिवृद्ध और गुणों में सबसे बढ़कर।
श्लोक 120 (13.48.120)
नित्य आत्मसहायश्च देवासुरपतिः पतिः । युक्तश्च युक्तबाहुश्च देवो दिवि सुपर्वणः ॥
nitya ātmasahāyaśca devāsurapatiḥ patiḥ | yuktaśca yuktabāhuśca devo divi suparvaṇaḥ
नित्य, आत्मा ही जिनका सहायक है, देवों और असुरों के पति, स्वामी; युक्त, युक्तबाहु, देव और स्वर्ग में सुपर्वण।
श्लोक 121 (13.48.121)
आषाढश्च सुषाढश्च ध्रुवोऽथ हरिणो हरः । वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः ॥
āṣāḍhaśca suṣāḍhaśca dhruvo'tha hariṇo haraḥ | vapurāvartamānebhyo vasuśreṣṭho mahāpathaḥ
आषाढ, सुषाढ, ध्रुव, हरिण और हर; आवर्तन में पड़े हुओं के लिए शरीर-रूप, वसुओं में श्रेष्ठ और महापथ।
श्लोक 122 (13.48.122)
शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्षणलक्षितः । अक्षश्च रथयोगी च सर्वयोगी महाबलः ॥
śirohārī vimarśaśca sarvalakṣaṇalakṣitaḥ | akṣaśca rathayogī ca sarvayogī mahābalaḥ
शिरों को हरनेवाले, विमर्श, सब शुभ लक्षणों से युक्त; अक्ष, रथ जोड़नेवाले, सब योगों के योगी और महाबली।
श्लोक 123 (13.48.123)
समाम्नायोऽसमाम्नायस्तीर्थदेवो महारथः । निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्षो बहुकर्कशः ॥
samāmnāyo'samāmnāyastīrthadevo mahārathaḥ | nirjīvo jīvano mantraḥ śubhākṣo bahukarkaśaḥ
समाम्नाय, असमाम्नाय, तीर्थों के देव, महारथ; निर्जीव, जीवन देनेवाले, मन्त्र, सुन्दर नेत्रोंवाले और अत्यन्त कठोर।
श्लोक 124 (13.48.124)
रत्नप्रभूतो रत्नाङ्गो महार्णवनिपानवित् । मूलं विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपोनिधिः ॥
ratnaprabhūto ratnāṅgo mahārṇavanipānavit | mūlaṃ viśālo hyamṛto vyaktāvyaktastaponidhiḥ
रत्नों की प्रचुरतावाले, रत्नांग, महासागर के जलाशयों के ज्ञाता; मूल, विशाल, अमृत, व्यक्त और अव्यक्त तथा तप के भण्डार।
श्लोक 125 (13.48.125)
आरोहणोऽधिरोहश्च शीलधारी महायशाः । सेनाकल्पो महाकल्पो योगो युगकरो हरिः ॥
ārohaṇo'dhirohaśca śīladhārī mahāyaśāḥ | senākalpo mahākalpo yogo yugakaro hariḥ
आरोहण, अधिरोह, शील धारण करनेवाले, महायशस्वी; सेनाकल्प, महाकल्प, योग, युगों के रचयिता और हरि।
श्लोक 126 (13.48.126)
युगरूपो महारूपो महानागहनो वधः । न्यायनिर्वपणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः ॥
yugarūpo mahārūpo mahānāgahano vadhaḥ | nyāyanirvapaṇaḥ pādaḥ paṇḍito hyacalopamaḥ
युगरूप, महारूप, बड़े हाथियों के संहारक, वध; न्याय का वितरण करनेवाले, पाद, पण्डित और पर्वत के समान अचल।
श्लोक 127 (13.48.127)
बहुमालो महामालः शशी हरसुलोचनः । विस्तारो लवणः कूपस्त्रियुगः सफलोदयः ॥
bahumālo mahāmālaḥ śaśī harasulocanaḥ | vistāro lavaṇaḥ kūpastriyugaḥ saphalodayaḥ
बहुत मालाओंवाले, महामाल, शशि, सुन्दर नेत्रोंवाले हर; विस्तार, लवण, कूप, त्रियुग और सफल उदयवाले।
श्लोक 128 (13.48.128)
त्रिलोचनो विषण्णाङ्गो मणिविद्धो जटाधरः । बिन्दुर्विसर्गः सुमुखः शरः सर्वायुधः सहः ॥
trilocano viṣaṇṇāṅgo maṇividdho jaṭādharaḥ | bindurvisargaḥ sumukhaḥ śaraḥ sarvāyudhaḥ sahaḥ
त्रिलोचन, विषण्ण अंगोंवाले, मणियों से विद्ध, जटाधारी; बिन्दु, विसर्ग, सुमुख, शर, सब आयुध और सह।
श्लोक 129 (13.48.129)
निवेदनः सुखाजातः सुगन्धारो महाधनुः । गन्धपाली च भगवानुत्थानः सर्वकर्मणाम् ॥
nivedanaḥ sukhājātaḥ sugandhāro mahādhanuḥ | gandhapālī ca bhagavānutthānaḥ sarvakarmaṇām
निवेदन करनेवाले, सुख से उत्पन्न, सुगन्धार, महाधनुर्धर; गन्ध के रक्षक, भगवान् और सब कर्मों के उत्थान।
श्लोक 130 (13.48.130)
मन्थानो बहुलो वायुः सकलः सर्वलोचनः । तलस्तालः करस्थाली ऊर्ध्वसंहननो महान् ॥
manthāno bahulo vāyuḥ sakalaḥ sarvalocanaḥ | talastālaḥ karasthālī ūrdhvasaṃhanano mahān
मन्थन-दण्ड, बहुल, वायु, सकल, सर्वलोचन; तल, ताल, हाथ में पात्र रखनेवाले, ऊर्ध्व देहवाले और महान्।
श्लोक 131 (13.48.131)
छत्रं सुच्छत्रो विख्यातो लोकः सर्वाश्रयः क्रमः । मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी कुण्डी विकुर्वणः ॥
chatraṃ succhatro vikhyāto lokaḥ sarvāśrayaḥ kramaḥ | muṇḍo virūpo vikṛto daṇḍī kuṇḍī vikurvaṇaḥ
छत्र, सुन्दर छत्रवाले, विख्यात, लोक, सबके आश्रय, क्रम; मुण्डित सिरवाले, विरूप, विकृत, दण्डधारी, कमण्डलुधारी और रूप बदलनेवाले।
श्लोक 132 (13.48.132)
हर्यक्षः ककुभो वज्री शतजिह्वः सहस्रपात् । सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः ॥
haryakṣaḥ kakubho vajrī śatajihvaḥ sahasrapāt | sahasramūrdhā devendraḥ sarvadevamayo guruḥ
हर्यक्ष, ककुभ, वज्री, सौ जिह्वाओंवाले, हज़ार चरणोंवाले; हज़ार सिरोंवाले, देवेन्द्र, सब देवों से बने हुए और गुरु।
श्लोक 133 (13.48.133)
सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृत् । पवित्रं त्रिककुन्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः ॥
sahasrabāhuḥ sarvāṅgaḥ śaraṇyaḥ sarvalokakṛt | pavitraṃ trikakunmantraḥ kaniṣṭhaḥ kṛṣṇapiṅgalaḥ
हज़ार भुजाओंवाले, सर्वांग, शरण्य, सब लोकों के रचयिता; पवित्र, त्रिककुद् मन्त्र, कनिष्ठ और कृष्ण-पिंगल।
श्लोक 134 (13.48.134)
ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नीपाशशक्तिमान् । पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः ॥
brahmadaṇḍavinirmātā śataghnīpāśaśaktimān | padmagarbho mahāgarbho brahmagarbho jalodbhavaḥ
ब्रह्मदण्ड के निर्माता, शतघ्नी, पाश और शक्ति धारण करनेवाले; पद्मगर्भ, महागर्भ, ब्रह्मगर्भ और जल से उत्पन्न।
श्लोक 135 (13.48.135)
गभस्तिर्ब्रह्मकृद्ब्रह्मी ब्रह्मविद्ब्राह्मणो गतिः । अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयंभुवः ॥
gabhastirbrahmakṛdbrahmī brahmavidbrāhmaṇo gatiḥ | anantarūpo naikātmā tigmatejāḥ svayaṃbhuvaḥ
गभस्ति, ब्रह्म के कर्ता, ब्रह्मी, ब्रह्मवेत्ता, ब्राह्मण, गति; अनन्तरूप, अनेकात्मा, तीक्ष्ण तेजवाले और स्वयंभू।
श्लोक 136 (13.48.136)
ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः । चन्दनी पद्मनालाग्रः सुरभ्युत्तरणो नरः ॥
ūrdhvagātmā paśupatirvātaraṃhā manojavaḥ | candanī padmanālāgraḥ surabhyuttaraṇo naraḥ
ऊपर को जानेवाली आत्मावाले, पशुपति, वायु की गतिवाले, मन के वेगवाले; चन्दन लगाए हुए, कमलनाल का अग्रभाग, सुरभ्युत्तरण और नर।
श्लोक 137 (13.48.137)
कर्णिकारमहास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृत् । उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवीधृगुमाधवः ॥
karṇikāramahāsragvī nīlamauliḥ pinākadhṛt | umāpatirumākānto jāhnavīdhṛgumādhavaḥ
कर्णिकार के फूलों की बड़ी माला पहननेवाले, नीले मौलिवाले, पिनाकधारी; उमापति, उमाकान्त, जाह्नवी को धारण करनेवाले और उमाधव।
श्लोक 138 (13.48.138)
वरो वराहो वरदो वरेण्यः सुमहास्वनः । महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिङ्गलः ॥
varo varāho varado vareṇyaḥ sumahāsvanaḥ | mahāprasādo damanaḥ śatruhā śvetapiṅgalaḥ
वर, वराह, वर देनेवाले, वरेण्य, महान् स्वरवाले; महाप्रसाद, दमन, शत्रुहन्ता और श्वेत-पिंगल।
श्लोक 139 (13.48.139)
पीतात्मा परमात्मा च प्रयतात्मा प्रधानधृत् । सर्वपार्श्वमुखस्त्र्यक्षो धर्मसाधारणो वरः ॥
pītātmā paramātmā ca prayatātmā pradhānadhṛt | sarvapārśvamukhastryakṣo dharmasādhāraṇo varaḥ
पीतात्मा, परमात्मा, संयतात्मा, प्रधान को धारण करनेवाले; सब ओर मुखवाले, त्र्यक्ष, धर्म के सामान्य आधार और श्रेष्ठ।
श्लोक 140 (13.48.140)
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा अमृतो गोवृषेश्वरः । साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान्सविताऽमृतः ॥
carācarātmā sūkṣmātmā amṛto govṛṣeśvaraḥ | sādhyarṣirvasurādityo vivasvānsavitā'mṛtaḥ
चर और अचर के आत्मा, सूक्ष्मात्मा, अमृत, गौओं और वृषभ के ईश्वर; साध्यर्षि, वसु, आदित्य, विवस्वान्, सविता और अमृत।
श्लोक 141 (13.48.141)
व्यासः सर्गः सुसंक्षेपो विस्तरः पर्ययो नरः । ऋतुः संवत्सरो मासः पक्षः सङ्ख्यासमापनः ॥
vyāsaḥ sargaḥ susaṃkṣepo vistaraḥ paryayo naraḥ | ṛtuḥ saṃvatsaro māsaḥ pakṣaḥ saṅkhyāsamāpanaḥ
व्यास, सर्ग, सुसंक्षेप, विस्तार, पर्यय, नर; ऋतु, संवत्सर, मास, पक्ष और संख्या की समाप्ति।
श्लोक 142 (13.48.142)
कला काष्ठा लवा मात्रा मुहूर्ताहःक्षपाः क्षणाः । विश्वक्षेत्रं प्रजाबीजं लिङ्गमाद्यस्तु निर्गमः ॥
kalā kāṣṭhā lavā mātrā muhūrtāhaḥkṣapāḥ kṣaṇāḥ | viśvakṣetraṃ prajābījaṃ liṅgamādyastu nirgamaḥ
कला, काष्ठा, लव, मात्रा, मुहूर्त, दिन, रात और क्षण; विश्व का क्षेत्र, प्रजा का बीज, लिंग, आद्य और निर्गम।
श्लोक 143 (13.48.143)
सदसद्व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः । स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥
sadasadvyaktamavyaktaṃ pitā mātā pitāmahaḥ | svargadvāraṃ prajādvāraṃ mokṣadvāraṃ triviṣṭapam
सत् और असत्, व्यक्त और अव्यक्त, पिता, माता, पितामह; स्वर्ग का द्वार, प्रजा का द्वार, मोक्ष का द्वार और त्रिविष्टप।
श्लोक 144 (13.48.144)
निर्वाणं ह्लादनश्चैव ब्रह्मलोकः परा गतिः । देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः ॥
nirvāṇaṃ hlādanaścaiva brahmalokaḥ parā gatiḥ | devāsuravinirmātā devāsuraparāyaṇaḥ
निर्वाण, आह्लादक, ब्रह्मलोक और परम गति; देवों और असुरों के निर्माता, देवों और असुरों के परम आश्रय।
श्लोक 145 (13.48.145)
देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः । देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः ॥
devāsuragururdevo devāsuranamaskṛtaḥ | devāsuramahāmātro devāsuragaṇāśrayaḥ
देवों और असुरों के गुरु, देव, देवों और असुरों से नमस्कृत; देवों और असुरों के महामात्य, देव-असुर गणों के आश्रय।
श्लोक 146 (13.48.146)
देवासुरगणाध्यक्षो देवासुरगणाग्रणीः । देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः ॥
devāsuragaṇādhyakṣo devāsuragaṇāgraṇīḥ | devātidevo devarṣirdevāsuravarapradaḥ
देव-असुर गणों के अध्यक्ष, देव-असुर गणों के अग्रणी; देवों के भी देव, देवर्षि और देवों व असुरों को वर देनेवाले।
श्लोक 147 (13.48.147)
देवासुरेश्वरो विश्वो देवासुरमहेश्वरः । सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्माऽत्मसम्भवः ॥
devāsureśvaro viśvo devāsuramaheśvaraḥ | sarvadevamayo'cintyo devatātmā'tmasambhavaḥ
देवों और असुरों के ईश्वर, विश्व, देवों और असुरों के महेश्वर; सब देवों से बने हुए, अचिन्त्य, देवताओं के आत्मा और आत्मसम्भव।
श्लोक 148 (13.48.148)
उद्भित्त्रिविक्रमो वैद्यो विरजो नीरजोऽमरः । ईड्यो हस्तीश्वरो व्याघ्रो देवसिंहो नरर्षभः ॥
udbhittrivikramo vaidyo virajo nīrajo'maraḥ | īḍyo hastīśvaro vyāghro devasiṃho nararṣabhaḥ
उद्भित्, त्रिविक्रम, वैद्य, विरज, नीरज और अमर; स्तुत्य, हाथियों के ईश्वर, व्याघ्र, देवों में सिंह और नरों में श्रेष्ठ।
श्लोक 149 (13.48.149)
विबुधोऽग्रवरः सूक्ष्मः सर्वदेवस्तपोमयः । सुयुक्तः शोभनो वज्री प्रासानां प्रभवोऽव्ययः ॥
vibudho'gravaraḥ sūkṣmaḥ sarvadevastapomayaḥ | suyuktaḥ śobhano vajrī prāsānāṃ prabhavo'vyayaḥ
विबुध, अग्रगण्य और श्रेष्ठ, सूक्ष्म, सर्वदेव, तपोमय; सुयुक्त, शोभन, वज्री, भालों के उद्गम और अव्यय।
श्लोक 150 (13.48.150)
गुहः कान्तो निजः सर्गः पवित्रं सर्वपावनः । शृङ्गी शृङ्गप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः ॥
guhaḥ kānto nijaḥ sargaḥ pavitraṃ sarvapāvanaḥ | śṛṅgī śṛṅgapriyo babhrū rājarājo nirāmayaḥ
गुह, कान्त, निज, सर्ग, पवित्र और सबको पवित्र करनेवाले; शृंगी, शृंगप्रिय, बभ्रु, राजराज और निरामय।
श्लोक 151 (13.48.151)
अभिरामः सुरगणो विरामः सर्वसाधनः । ललाटाक्षो विश्वदेवो हरिणो ब्रह्मवर्चसः ॥
abhirāmaḥ suragaṇo virāmaḥ sarvasādhanaḥ | lalāṭākṣo viśvadevo hariṇo brahmavarcasaḥ
अभिराम, देवगण, विराम और सब कुछ साधनेवाले; ललाट में नेत्रवाले, विश्वदेव, हरिण और ब्रह्मतेज से युक्त।
श्लोक 152 (13.48.152)
स्थावराणां पतिश्चैव नियमेन्द्रियवर्धनः । सिद्धार्थः सिद्धभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यव्रतः शुचिः ॥
sthāvarāṇāṃ patiścaiva niyamendriyavardhanaḥ | siddhārthaḥ siddhabhūtārtho'cintyaḥ satyavrataḥ śuciḥ
स्थावरों के स्वामी और नियम तथा इन्द्रियों को बढ़ानेवाले; सिद्धार्थ, सिद्धों के बीच सिद्ध-प्रयोजनवाले, अचिन्त्य, सत्यव्रत और शुचि।
श्लोक 153 (13.48.153)
व्रताधिपः परं ब्रह्म भक्तानां परमा गतिः । विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमाञ्श्रीवर्धनो जगत् ॥
vratādhipaḥ paraṃ brahma bhaktānāṃ paramā gatiḥ | vimukto muktatejāśca śrīmāñśrīvardhano jagat
व्रतों के अधिपति, परब्रह्म, भक्तों की परम गति; विमुक्त, मुक्त तेजवाले, श्रीमान्, श्री को बढ़ानेवाले और जगत्।
श्लोक 154 (13.48.154)
यथा प्रधानं भगवानिति भक्त्या स्तुतो मया । यन्न ब्रह्मादयो देवा विदुस्तत्त्वेन नर्षयः । स्तोतव्यमर्च्यं वन्द्यं च कः स्तोष्यति जगत्पतिम् ॥
yathā pradhānaṃ bhagavāniti bhaktyā stuto mayā | yanna brahmādayo devā vidustattvena narṣayaḥ | stotavyamarcyaṃ vandyaṃ ca kaḥ stoṣyati jagatpatim
प्रधान नामों के अनुसार भगवान् की मैंने इस प्रकार भक्ति से स्तुति की। जिन्हें ब्रह्मा आदि देवता और ऋषि भी यथार्थ रूप से नहीं जानते, उन स्तुति, पूजा और वन्दना के योग्य जगत्पति की स्तुति भला कौन कर सकता है?
श्लोक 155 (13.48.155)
भक्तिं त्वेवं पुरस्कृत्य मया यज्ञपतिर्विभुः । ततोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य स्तुतो मतिमतां वरः ॥
bhaktiṃ tvevaṃ puraskṛtya mayā yajñapatirvibhuḥ | tato'bhyanujñāṃ samprāpya stuto matimatāṃ varaḥ
भक्ति को सबसे आगे रखकर मैंने उनकी अनुमति पाकर यज्ञपति, विभु और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उन देव की स्तुति की।
श्लोक 156 (13.48.156)
शिवमेभिः स्तुवन्देवं नामभिः पुष्टिवर्धनैः । नित्ययुक्तः शुचिर्भक्तः प्राप्नोत्यात्मानमात्मना ॥
śivamebhiḥ stuvandevaṃ nāmabhiḥ puṣṭivardhanaiḥ | nityayuktaḥ śucirbhaktaḥ prāpnotyātmānamātmanā
जो नित्य संयमी, शुद्ध और भक्त होकर पुष्टि बढ़ानेवाले इन नामों से देव शिव की स्तुति करता है, वह आत्मा के द्वारा आत्मा को प्राप्त करता है।
श्लोक 157 (13.48.157)
एतद्धि परमं ब्रह्म परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
etaddhi paramaṃ brahma paraṃ brahmādhigacchati
यही परम ब्रह्म है; इसके द्वारा मनुष्य परब्रह्म को प्राप्त करता है।
श्लोक 158 (13.48.158)
ऋषयश्चैव देवाश्च स्तुवन्त्येतेन तत्परम् ॥
ṛṣayaścaiva devāśca stuvantyetena tatparam
ऋषि और देवता भी इसी से उस परम की स्तुति करते हैं।
श्लोक 159 (13.48.159)
स्तूयमानो महादेवस्तुष्यते नियतात्मभिः । भक्तानुकम्पी भगवानात्मसंस्थाकरो विभुः ॥
stūyamāno mahādevastuṣyate niyatātmabhiḥ | bhaktānukampī bhagavānātmasaṃsthākaro vibhuḥ
संयतचित्त लोगों द्वारा स्तुति किए जाने पर महादेव प्रसन्न होते हैं; भक्तों पर दया करनेवाले, सर्वव्यापी भगवान् उन्हें आत्मा में प्रतिष्ठित कर देते हैं।
श्लोक 160 (13.48.160)
तथैव च मनुष्येषु ये मनुष्याः प्रधानतः । आस्तिकाः श्रद्धधानाश्च बहुभिर्जन्मभिः स्तवैः ॥
tathaiva ca manuṣyeṣu ye manuṣyāḥ pradhānataḥ | āstikāḥ śraddhadhānāśca bahubhirjanmabhiḥ stavaiḥ
इसी प्रकार मनुष्यों में जो प्रधान मनुष्य हैं, आस्तिक और श्रद्धावान्, अनेक जन्मों में अनेक स्तुतियों के द्वारा,
श्लोक 161 (13.48.161)
भक्त्या ह्यनन्यमीशानं परं देवं सनातनम् । कर्मणा मनसा वाचा भावेनामिततेजसः ॥
bhaktyā hyananyamīśānaṃ paraṃ devaṃ sanātanam | karmaṇā manasā vācā bhāvenāmitatejasaḥ
कर्म, मन, वाणी और भाव से, अनन्य भक्ति के साथ उस परम, सनातन, अमित तेजस्वी देव ईशान की,
श्लोक 162 (13.48.162)
शयाना जाग्रमाणाश्च व्रजन्नुपविशंस्तथा । उन्मिषन्निमिषंश्चैव चिन्तयन्तः पुनःपुनः ॥
śayānā jāgramāṇāśca vrajannupaviśaṃstathā | unmiṣannimiṣaṃścaiva cintayantaḥ punaḥpunaḥ
सोते या जागते, चलते या बैठते, पलक खोलते या मूँदते, बार-बार उनका चिन्तन करते हुए,
श्लोक 163 (13.48.163)
शृण्वन्तः श्रावयन्तश्च कथयन्तश्च ते भवम् । स्तुवन्तः स्तूयमानाश्च तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
śṛṇvantaḥ śrāvayantaśca kathayantaśca te bhavam | stuvantaḥ stūyamānāśca tuṣyanti ca ramanti ca
भव की कथा सुनते, दूसरों को सुनाते, उसे कहते, उनकी स्तुति करते और स्वयं स्तुत होते हुए वे सन्तुष्ट होते हैं और आनन्द मनाते हैं।
श्लोक 164 (13.48.164)
जन्मकोटिसहस्रेषु नानासंसारयोनिषु । जन्तोर्विगतपापस्य भवे भक्तिः प्रजायते ॥
janmakoṭisahasreṣu nānāsaṃsārayoniṣu | jantorvigatapāpasya bhave bhaktiḥ prajāyate
संसार की नाना योनियों में हज़ारों करोड़ जन्मों के बाद, जिस प्राणी का पाप दूर हो जाता है, उसमें भव के प्रति भक्ति उत्पन्न होती है।
श्लोक 165 (13.48.165)
उत्पन्ना च भवे भक्तिरनन्या सर्वभावतः । भाविनः कारणे चास्य सर्वयुक्तस्य सर्वथा ॥
utpannā ca bhave bhaktirananyā sarvabhāvataḥ | bhāvinaḥ kāraṇe cāsya sarvayuktasya sarvathā
और भव के प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाने पर वह सब भावों से अनन्य होती है, और सर्वथा उसी में लगे हुए इस भाग्यवान् के कल्याण का कारण बनती है।
श्लोक 166 (13.48.166)
एतद्देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते । निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिरव्यभिचारिणी ॥
etaddeveṣu duṣprāpaṃ manuṣyeṣu na labhyate | nirvighnā niścalā rudre bhaktiravyabhicāriṇī
यह देवताओं में भी दुर्लभ है और मनुष्यों को नहीं मिलती: रुद्र के प्रति विघ्नरहित, अचल और अविचल भक्ति।
श्लोक 167 (13.48.167)
तस्यैव च प्रसादेन भक्तिरुत्पद्यते नृणाम् । येन यान्ति परां सिद्धिं तद्भागवतचेतसः ॥
tasyaiva ca prasādena bhaktirutpadyate nṛṇām | yena yānti parāṃ siddhiṃ tadbhāgavatacetasaḥ
उन्हीं की कृपा से मनुष्यों में भक्ति उत्पन्न होती है, जिससे भगवान् में चित्त लगानेवाले परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 168 (13.48.168)
ये सर्वभावानुगताः प्रपद्यन्ते महेश्वरम् । प्रपन्नवत्सलो देवः संसारात्तान्समुद्धरेत् ॥
ye sarvabhāvānugatāḥ prapadyante maheśvaram | prapannavatsalo devaḥ saṃsārāttānsamuddharet
जो सब भावों से उनके अनुगामी होकर महेश्वर की शरण लेते हैं, शरणागतों पर कृपा करनेवाले वे देव उन्हें संसार से उबार लेते हैं।
श्लोक 169 (13.48.169)
एवमन्ये विकुर्वन्ति देवाः संसारमोचनम् । मनुष्याणामृते देवं नान्या शक्तिस्तपोबलम् ॥
evamanye vikurvanti devāḥ saṃsāramocanam | manuṣyāṇāmṛte devaṃ nānyā śaktistapobalam
इसी प्रकार अन्य देवता संसार से मुक्ति दिलाने का प्रयत्न कर सकते हैं; किन्तु मनुष्यों के लिए उन देव के बिना कोई दूसरी शक्ति नहीं, तप का कोई बल भी नहीं।
श्लोक 170 (13.48.170)
इति तेनेन्द्रकल्पेन भगवान्सदसत्पतिः । कृत्तिवासाः स्तुतः कृष्ण तण्डिना शुभबुद्धिना ॥
iti tenendrakalpena bhagavānsadasatpatiḥ | kṛttivāsāḥ stutaḥ kṛṣṇa taṇḍinā śubhabuddhinā
इस प्रकार, हे कृष्ण, इन्द्र के समान उन शुभबुद्धि तण्डि ने सत् और असत् के स्वामी, चर्मवस्त्र धारण करनेवाले भगवान् की स्तुति की।
श्लोक 171 (13.48.171)
स्तवमेतं भगवतो ब्रह्मा स्वयमधारयत् । गीयते च स बुद्ध्येत ब्रह्म शंकरसन्निधौ ॥
stavametaṃ bhagavato brahmā svayamadhārayat | gīyate ca sa buddhyeta brahma śaṃkarasannidhau
ब्रह्मा ने स्वयं भगवान् के इस स्तोत्र को धारण किया। शंकर की सन्निधि में इसका गान होने पर मनुष्य ब्रह्म को जान लेता है।
श्लोक 172 (13.48.172)
इदं पुण्यं पवित्रं च सर्वदा पापनाशनम् । योगदं मोक्षदं चैव स्वर्गदं तोषदं तथा ॥
idaṃ puṇyaṃ pavitraṃ ca sarvadā pāpanāśanam | yogadaṃ mokṣadaṃ caiva svargadaṃ toṣadaṃ tathā
यह पुण्य और पवित्र है, सदा पाप का नाश करता है; यह योग और मोक्ष देता है, स्वर्ग और सन्तोष भी देता है।
श्लोक 173 (13.48.173)
एवमेतत्पठन्ते य एकभक्त्या तु शङ्करम् । या गतिः साङ्ख्ययोगानां व्रजन्त्येतां गतिं तदा ॥
evametatpaṭhante ya ekabhaktyā tu śaṅkaram | yā gatiḥ sāṅkhyayogānāṃ vrajantyetāṃ gatiṃ tadā
जो एकनिष्ठ भक्ति से शंकर के प्रति इसका इस प्रकार पाठ करते हैं, वे साङ्ख्य और योग के अनुयायियों की जो गति है, उसी गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 174 (13.48.174)
स्तवमेतं प्रयत्नेन सदा रुद्रस्य सन्निधौ । अब्दमेकं चरेद्भक्तः प्राप्नुयादीप्सितं फलम् ॥
stavametaṃ prayatnena sadā rudrasya sannidhau | abdamekaṃ caredbhaktaḥ prāpnuyādīpsitaṃ phalam
जो भक्त एक वर्ष तक सदा रुद्र की सन्निधि में यत्नपूर्वक इस स्तोत्र का अभ्यास करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
श्लोक 175 (13.48.175)
एतद्रहस्यं परमं ब्रह्मणो हृदि संस्थितम् । ब्रह्मा प्रोवाच शक्राय शक्रः प्रोवाच मृत्यवे ॥
etadrahasyaṃ paramaṃ brahmaṇo hṛdi saṃsthitam | brahmā provāca śakrāya śakraḥ provāca mṛtyave
यह परम रहस्य ब्रह्मा के हृदय में स्थित था। ब्रह्मा ने इसे शक्र को बताया और शक्र ने मृत्यु को।
श्लोक 176 (13.48.176)
मृत्युः प्रोवाच रुद्रेभ्यो रुद्रेभ्यस्तण्डिमागमत् । महता तपसा प्राप्तस्तण्डिना ब्रह्मसद्मानि ॥
mṛtyuḥ provāca rudrebhyo rudrebhyastaṇḍimāgamat | mahatā tapasā prāptastaṇḍinā brahmasadmāni
मृत्यु ने इसे रुद्रों को बताया और रुद्रों से यह तण्डि को मिला, जिसने ब्रह्मा के धाम में महान् तप से इसे प्राप्त किया।
श्लोक 177 (13.48.177)
तण्डिः प्रोवाच शुक्राय गौतमाय च भार्गवः । वैवस्वताय मनवे गौतमः प्राह माधव ॥
taṇḍiḥ provāca śukrāya gautamāya ca bhārgavaḥ | vaivasvatāya manave gautamaḥ prāha mādhava
तण्डि ने इसे शुक्र को बताया और भार्गव ने गौतम को; गौतम ने इसे वैवस्वत मनु को बताया, हे माधव।
श्लोक 178 (13.48.178)
नारायणाय साध्याय समाधिष्ठाय धीमते । यमाय प्राह भगवान्साध्यो नारायणोऽच्युतः ॥
nārāyaṇāya sādhyāya samādhiṣṭhāya dhīmate | yamāya prāha bhagavānsādhyo nārāyaṇo'cyutaḥ
फिर यह ध्यान में स्थित बुद्धिमान् साध्य नारायण को दिया गया; और भगवान् साध्य नारायण अच्युत ने इसे यम को बताया।
श्लोक 179 (13.48.179)
नाचिकेताय भगवानाह वैवस्वतो यमः । मार्कण्डेयाय वार्ष्णेय नाचिकेतोऽभ्यभाषत ॥
nāciketāya bhagavānāha vaivasvato yamaḥ | mārkaṇḍeyāya vārṣṇeya nāciketo'bhyabhāṣata
भगवान् वैवस्वत यम ने इसे नाचिकेत को बताया और नाचिकेत ने मार्कण्डेय को, हे वृष्णिवंशी।
श्लोक 180 (13.48.180)
मार्कण्डेयान्मया प्राप्तो नियमेन जनार्दन । तवाप्यहममित्रघ्न स्तवं दद्यां ह्यविश्रुतम् ॥
mārkaṇḍeyānmayā prāpto niyamena janārdana | tavāpyahamamitraghna stavaṃ dadyāṃ hyaviśrutam
हे जनार्दन, मैंने इसे नियमपूर्वक मार्कण्डेय से पाया; और हे शत्रुघ्न, यह अश्रुतपूर्व स्तोत्र मैं तुम्हें भी दूँगा।
श्लोक 181 (13.48.181)
स्वर्ग्यमारोग्यमायुष्यं धन्यं वेदेन संमितम् । नास्य विघ्नं विकुर्वन्ति दानवा यक्षराक्षसाः ॥
svargyamārogyamāyuṣyaṃ dhanyaṃ vedena saṃmitam | nāsya vighnaṃ vikurvanti dānavā yakṣarākṣasāḥ
यह स्वर्ग देनेवाला है, आरोग्य और आयु देता है, धन्य करता है और वेद के समान है। दानव, यक्ष और राक्षस इसके पाठक के लिए विघ्न नहीं डालते,
श्लोक 182 (13.48.182)
पिशाचा यातुधाना वा गुह्यका भुजगा अपि । यः पठेत शुचिः पार्थ ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । अभग्रयोगो वर्षं तु सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
piśācā yātudhānā vā guhyakā bhujagā api | yaḥ paṭheta śuciḥ pārtha brahmacārī jitendriyaḥ | abhagrayogo varṣaṃ tu so'śvamedhaphalaṃ labhet
न पिशाच, न यातुधान, न गुह्यक, न नाग ही, उसके लिए जो पवित्र, ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय होकर इसका पाठ करता है, हे पार्थ। एक वर्ष तक अखण्ड अभ्यास करने से वह अश्वमेध का फल पाएगा।