अनुशासन पर्व · अध्याय 49
महर्षियों द्वारा महादेव के वरदानों का वर्णन
व्यास युधिष्ठिर से महेश्वर के स्तव का पाठ करने को कहते हैं, और अनेक ऋषि बताते हैं कि शिव ने उन्हें क्या दिया: कपिल, चारुशीर्ष (आलम्बायन), वाल्मीकि, परशुराम, विश्वामित्र, असित देवल, गृत्समद, कृष्ण, जैगीषव्य, गर्ग, पराशर (व्यास का जन्म), माण्डव्य और गालव। फिर कृष्ण उपमन्यु का उपदेश सुनाते हैं कि जो मन से भी शिव की शरण लेते हैं वे पाप से मुक्त हो जाते हैं, और देवताओं तथा शक्तियों के शर्व से उत्पन्न होने का वर्णन करनेवाला स्तव पढ़ते हैं, जिसके साथ उसके पाठ का फल भी कहा गया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (13.49.1)
महायोगी तु तं प्राह कृष्णद्वैपायनो मुनिः । पठस्व पुत्र भद्रं ते प्रीयतां ते महेश्वरः ॥
mahāyogī tu taṃ prāha kṛṣṇadvaipāyano muniḥ | paṭhasva putra bhadraṃ te prīyatāṃ te maheśvaraḥ
तब महायोगी मुनि कृष्णद्वैपायन ने उनसे कहा, “पुत्र, इसका पाठ करो। तुम्हारा कल्याण हो और महेश्वर तुम पर प्रसन्न हों।”
द्वैपायन उवाच
श्लोक 2 (13.49.2)
पुरा पुत्र मया मेरौ तप्यता परमं तपः । पुत्रहेतोर्महाराज स्तव एषोऽनुकीर्तितः ॥
purā putra mayā merau tapyatā paramaṃ tapaḥ | putrahetormahārāja stava eṣo'nukīrtitaḥ
पुत्र, पूर्वकाल में जब मैं पुत्र की कामना से मेरु पर्वत पर परम तप कर रहा था, तब हे महाराज, मैंने इस स्तव का कीर्तन किया था।
श्लोक 3 (13.49.3)
लब्धवानीप्सितं काममहं वै पाण्डुनन्दन । तथा त्वमपि शर्वाद्धि सर्वान्कामानवाप्स्यसि ॥
labdhavānīpsitaṃ kāmamahaṃ vai pāṇḍunandana | tathā tvamapi śarvāddhi sarvānkāmānavāpsyasi
हे पाण्डुनन्दन, मैंने अपनी इच्छित कामना प्राप्त की; उसी प्रकार तुम भी शर्व से अपनी सब कामनाएँ प्राप्त करोगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (13.49.4)
कपिलश्च ततः प्राह साङ्ख्यर्षिर्देवसम्मतः । मया जन्मान्यनेकानि भक्त्या चाराधितो भवः । प्रीतश्च भगवाञ्ज्ञानं ददौ मम भवान्तकम् ॥
kapilaśca tataḥ prāha sāṅkhyarṣirdevasammataḥ | mayā janmānyanekāni bhaktyā cārādhito bhavaḥ | prītaśca bhagavāñjñānaṃ dadau mama bhavāntakam
फिर देवताओं द्वारा सम्मानित साङ्ख्य-ऋषि कपिल ने कहा, “अनेक जन्मों तक मैंने भक्ति से भव की आराधना की; इससे प्रसन्न होकर भगवान् ने मुझे संसार का अन्त करनेवाला ज्ञान दिया।”
श्लोक 5 (13.49.5)
चारुशीर्षस्ततः प्राह शक्रस्य दयितः सखा । आलम्बायन इत्येवं विश्रुतः करुणात्मकः ॥
cāruśīrṣastataḥ prāha śakrasya dayitaḥ sakhā | ālambāyana ityevaṃ viśrutaḥ karuṇātmakaḥ
फिर शक्र के प्रिय मित्र चारुशीर्ष बोले, जो आलम्बायन नाम से प्रसिद्ध थे और करुणामय स्वभाव के थे।
चारुशीर्ष उवाच
श्लोक 6 (13.49.6)
मया गोकर्णमासाद्य तपस्तप्त्वा शतं समाः । अयोनिजानां दान्तानां धर्मज्ञानां सुवर्चसाम् ॥
mayā gokarṇamāsādya tapastaptvā śataṃ samāḥ | ayonijānāṃ dāntānāṃ dharmajñānāṃ suvarcasām
मैंने गोकर्ण पहुँचकर वहाँ सौ वर्षों तक तप किया और इस प्रकार ऐसे पुत्र पाए जो किसी गर्भ से उत्पन्न नहीं हुए थे, जितेन्द्रिय थे, धर्म को जाननेवाले और महातेजस्वी थे,
श्लोक 7 (13.49.7)
अजराणामदुःखानां शतवर्षसहस्रिणाम् । लब्धं पुत्र शतं शर्वात्पुरा पाण्डुनृपात्मज ॥
ajarāṇāmaduḥkhānāṃ śatavarṣasahasriṇām | labdhaṃ putra śataṃ śarvātpurā pāṇḍunṛpātmaja
वे अजर थे, दुःख से रहित थे और प्रत्येक की आयु सौ हज़ार वर्ष की थी। ऐसे सौ पुत्र मैंने पूर्वकाल में शर्व से पाए, हे पाण्डुपुत्र राजकुमार।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (13.49.8)
वाल्मीकिश्चाह भगवान्युधिष्ठिरमिदं वचः । विवादे साग्निमुनिभिर्ब्रह्मघ्नो वै भवानिति ॥
vālmīkiścāha bhagavānyudhiṣṭhiramidaṃ vacaḥ | vivāde sāgnimunibhirbrahmaghno vai bhavāniti
और भगवान् वाल्मीकि ने युधिष्ठिर से यह वचन कहा, “एक विवाद में अग्नि के सहित मुनियों ने मुझसे कहा, ‘तुम ब्रह्मघाती हो।’
वाल्मीकिरुवाच
श्लोक 9 (13.49.9)
उक्तः क्षणेन चाविष्टस्तेनाधर्मेण भारत । सोऽहमीशानमनघममोघं शरणं गतः ॥
uktaḥ kṣaṇena cāviṣṭastenādharmeṇa bhārata | so'hamīśānamanaghamamoghaṃ śaraṇaṃ gataḥ
हे भारत, इस प्रकार कहे जाने पर मैं क्षणभर में उस अधर्म से ग्रस्त हो गया; तब मैं निष्पाप और अमोघ ईशान की शरण में गया।
श्लोक 10 (13.49.10)
मुक्तश्चास्मि ततः पापैस्ततो दुःखविनाशनः । आह मां त्रिपुरघ्नो वै यशस्तेऽग्र्यं भविष्यति ॥
muktaścāsmi tataḥ pāpaistato duḥkhavināśanaḥ | āha māṃ tripuraghno vai yaśaste'gryaṃ bhaviṣyati
तब मैं उन पापों से मुक्त हो गया, और दुःखों का नाश करनेवाले त्रिपुरघाती ने मुझसे कहा, ‘तुम्हारी कीर्ति सर्वोच्च होगी।’”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (13.49.11)
जामदग्न्यश्च कौन्तेयमिदं धर्मभृतांवरः । ऋषिमध्ये स्थितः प्राह ज्वलन्निव दिवाकरः ॥
jāmadagnyaśca kaunteyamidaṃ dharmabhṛtāṃvaraḥ | ṛṣimadhye sthitaḥ prāha jvalanniva divākaraḥ
और धर्म को धारण करनेवालों में श्रेष्ठ जमदग्निपुत्र ने ऋषियों के बीच बैठकर, सूर्य के समान दीप्तिमान होते हुए, कुन्तीपुत्र से यह कहा—
जामदग्न्य उवाच
श्लोक 12 (13.49.12)
पितृविप्रवधेनाहमार्तो वै पाण्डवाग्रज । शुचिर्भूत्वा महादेवं गतोस्मि शरणं नृप ॥
pitṛvipravadhenāhamārto vai pāṇḍavāgraja | śucirbhūtvā mahādevaṃ gatosmi śaraṇaṃ nṛpa
हे पाण्डवों में ज्येष्ठ, पिता और ब्राह्मणों के वध से मैं व्यथित था; इसलिए, हे राजन्, मैंने शुद्ध होकर महादेव की शरण ली।
श्लोक 13 (13.49.13)
नामभिश्चास्तुवं देवं ततस्तुष्टोऽभवद्भवः । परशुं च ततो देवो दिव्यान्यस्त्राणि चैव मे ॥
nāmabhiścāstuvaṃ devaṃ tatastuṣṭo'bhavadbhavaḥ | paraśuṃ ca tato devo divyānyastrāṇi caiva me
मैंने देवता की उनके नामों से स्तुति की, तब भव प्रसन्न हुए; और उन देव ने मुझे परशु तथा दिव्य अस्त्र भी दिए।
श्लोक 14 (13.49.14)
पापं च ते न भविता अजेयश्च भविष्यसि । न ते प्रभविता मृत्युरजरश्च भविष्यसि ॥
pāpaṃ ca te na bhavitā ajeyaśca bhaviṣyasi | na te prabhavitā mṛtyurajaraśca bhaviṣyasi
उन्होंने कहा, ‘तुम्हें पाप नहीं लगेगा; तुम अजेय होगे; मृत्यु का तुम पर वश नहीं चलेगा, और तुम अजर रहोगे।’
श्लोक 15 (13.49.15)
आह मां भगवानेवं शिखण्डी शिवविग्रहः । तदवाप्तं च मे सर्वं प्रसादात्तस्य धीमतः ॥
āha māṃ bhagavānevaṃ śikhaṇḍī śivavigrahaḥ | tadavāptaṃ ca me sarvaṃ prasādāttasya dhīmataḥ
इस प्रकार शिखाधारी, शिवरूप भगवान् ने मुझसे कहा; और मैंने जो कुछ पाया है, वह सब उन बुद्धिमान् की कृपा से पाया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (13.49.16)
विश्वामित्रस्तदोवाच क्षत्रियोऽहं तदाऽभवम् । ब्राह्मणोऽहं भवानीति मया चाराधितो भवः । तत्प्रसादान्मया प्राप्तं ब्राह्मण्यं दुर्लभं महत् ॥
viśvāmitrastadovāca kṣatriyo'haṃ tadā'bhavam | brāhmaṇo'haṃ bhavānīti mayā cārādhito bhavaḥ | tatprasādānmayā prāptaṃ brāhmaṇyaṃ durlabhaṃ mahat
तब विश्वामित्र ने कहा, “मैं उस समय क्षत्रिय था; ‘मैं ब्राह्मण हो जाऊँ’ — यह संकल्प करके मैंने भव की आराधना की। उनकी कृपा से मुझे दुर्लभ और महान् ब्राह्मणत्व प्राप्त हुआ।”
श्लोक 17 (13.49.17)
असितो देवलश्चैव प्राह पाण्डुसुतं नृपम् ॥
asito devalaścaiva prāha pāṇḍusutaṃ nṛpam
असित देवल ने भी पाण्डुपुत्र राजा से कहा।
असितदेवल उवाच
श्लोक 18 (13.49.18)
शापाच्छक्रस्य कौन्तेय विभो धर्मोऽनशत्तदा । तन्मे धर्मं यशश्चाग्र्यमायुश्चैवाददत्प्रभुः ॥
śāpācchakrasya kaunteya vibho dharmo'naśattadā | tanme dharmaṃ yaśaścāgryamāyuścaivādadatprabhuḥ
हे कुन्तीपुत्र, हे विभो, शक्र के शाप से उस समय मेरा धर्म नष्ट हो गया था; तब प्रभु ने मुझे वह धर्म, सर्वोत्तम यश और दीर्घ आयु प्रदान की।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (13.49.19)
ऋषिर्गृत्समदो नाम शक्रस्य दयितः सखा । प्राहाजमीढं भगवान्बृहस्पतिसमद्युतिः ॥
ṛṣirgṛtsamado nāma śakrasya dayitaḥ sakhā | prāhājamīḍhaṃ bhagavānbṛhaspatisamadyutiḥ
शक्र के प्रिय मित्र, बृहस्पति के समान तेजस्वी, भगवान् गृत्समद ऋषि ने अजमीढ से कहा।
गृत्समद उवाच
श्लोक 20 (13.49.20)
वरिष्ठो नाम भगवांश्चाक्षुषस्य मनोः सुतः । शतक्रतोरचिन्त्यस्य सत्रे वर्षसहस्रिके ॥
variṣṭho nāma bhagavāṃścākṣuṣasya manoḥ sutaḥ | śatakratoracintyasya satre varṣasahasrike
चाक्षुष मनु के पुत्र वरिष्ठ नाम के एक भगवान् थे। अचिन्त्य शतक्रतु का हज़ार वर्ष का सत्र जब चल रहा था,
श्लोक 21 (13.49.21)
वर्तमानेऽब्रवीद्वाक्यं साम्नि ह्युच्चारिते मया । रथन्तरे द्विजश्रेष्ठ न सम्यगिति वर्तते ॥
vartamāne'bravīdvākyaṃ sāmni hyuccārite mayā | rathantare dvijaśreṣṭha na samyagiti vartate
तब मेरे साम का उच्चारण करने पर उन्होंने यह वचन कहा, “हे द्विजश्रेष्ठ, रथन्तर में यह ठीक नहीं है—ऐसी स्थिति है।
श्लोक 22 (13.49.22)
समीक्षस्व पुनर्बुद्ध्या पापं त्यक्त्वा द्विजोत्तम । अयज्ञवाहिनं पापमकार्षीस्त्वं सुदुर्मते ॥
samīkṣasva punarbuddhyā pāpaṃ tyaktvā dvijottama | ayajñavāhinaṃ pāpamakārṣīstvaṃ sudurmate
हे द्विजोत्तम, अपने दोष को छोड़कर बुद्धि से फिर विचार करो। हे दुर्मते, तुमने ऐसा अपराध किया है जो यज्ञ को वहन नहीं करता।”
श्लोक 23 (13.49.23)
एवमुक्त्वा महाक्रोधः प्राह शम्भुं पुनर्वचः । प्रज्ञया रहितो दुःखी नित्यभीतो वनेचरः ॥
evamuktvā mahākrodhaḥ prāha śambhuṃ punarvacaḥ | prajñayā rahito duḥkhī nityabhīto vanecaraḥ
यह कहकर महान् क्रोध से भरे हुए उन्होंने फिर शम्भु से कहा, “बुद्धि से रहित, दुःखी, सदा भयभीत, वन में विचरनेवाले—
श्लोक 24 (13.49.24)
दशवर्षसहस्राणि दशाष्टौ च शतानि च । नष्टपानीयपवने मृगैरन्यैश्च वर्जिते ॥
daśavarṣasahasrāṇi daśāṣṭau ca śatāni ca | naṣṭapānīyapavane mṛgairanyaiśca varjite
दस हज़ार वर्ष और अठारह सौ वर्ष तक, ऐसे स्थान में जहाँ जल और वायु नष्ट हो गए हैं और अन्य मृग तथा जीव भी जिसे छोड़ गए हैं,
श्लोक 25 (13.49.25)
अयज्ञीयद्रुमे देशे रुरुसिंहनिषेविते । भविता त्वं मृगः क्रूरो महादुःखसमन्वितः ॥
ayajñīyadrume deśe rurusiṃhaniṣevite | bhavitā tvaṃ mṛgaḥ krūro mahāduḥkhasamanvitaḥ
जहाँ के वृक्ष यज्ञ के योग्य नहीं हैं और जहाँ रुरु मृग तथा सिंह रहते हैं—उसी देश में तुम महान् दुःख से भरे हुए क्रूर मृग होगे।”
श्लोक 26 (13.49.26)
तस्य वाक्यस्य निधने पार्थ जातो ह्यहं मृगः । ततो मां शरणं प्राप्तं प्राह योगी महेश्वरः ॥
tasya vākyasya nidhane pārtha jāto hyahaṃ mṛgaḥ | tato māṃ śaraṇaṃ prāptaṃ prāha yogī maheśvaraḥ
हे पार्थ, उस वाक्य के समाप्त होते ही मैं मृग हो गया। तब शरण में आए हुए मुझसे योगी महेश्वर ने कहा—
श्लोक 27 (13.49.27)
अजरश्चामरश्चैव भविता दुःखवर्जितः । साम्यं ममास्तु ते सौख्यं युवयोर्वर्धतां क्रतुः ॥
ajaraścāmaraścaiva bhavitā duḥkhavarjitaḥ | sāmyaṃ mamāstu te saukhyaṃ yuvayorvardhatāṃ kratuḥ
“तुम अजर-अमर और दुःख से रहित होगे। मेरे साथ तुम्हारा साम्य हो और तुम्हें सुख मिले; तुम दोनों का यज्ञ बढ़े।”
श्लोक 28 (13.49.28)
अनुग्रहानेवमेष करोति भगवान्विभुः । अयं धाता विधाता च सुखदुःखे च सर्वदा ॥
anugrahānevameṣa karoti bhagavānvibhuḥ | ayaṃ dhātā vidhātā ca sukhaduḥkhe ca sarvadā
इस प्रकार ये सर्वव्यापी भगवान् अनुग्रह करते हैं। वे ही धाता और विधाता हैं, और सदा सुख-दुःख के भी कारण हैं।
श्लोक 29 (13.49.29)
अचिन्त्य एष भगवान्कर्मणा मनसा गिरा । न मे तात युधिश्रेष्ठ विद्यया पण्डितः समः ॥
acintya eṣa bhagavānkarmaṇā manasā girā | na me tāta yudhiśreṣṭha vidyayā paṇḍitaḥ samaḥ
ये भगवान् कर्म, मन और वाणी से अचिन्त्य हैं। हे तात, हे युद्ध में श्रेष्ठ, विद्या में कोई पण्डित मेरे समान नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 30 (13.49.30)
वासुदेवस्तदोवाच पुनर्मतिमतांवरः । सुवर्णाक्षो महादेवस्तपसा तोषितो मया ॥
vāsudevastadovāca punarmatimatāṃvaraḥ | suvarṇākṣo mahādevastapasā toṣito mayā
तब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वासुदेव ने फिर कहा, “स्वर्ण के समान नेत्रोंवाले महादेव मेरी तपस्या से सन्तुष्ट हुए।
वासुदेव उवाच
श्लोक 31 (13.49.31)
ततोऽथ भगवानाह प्रीतो मा वै युधिष्ठिर । अर्थात्प्रियतरः कृष्ण मत्प्रसादाद्भविष्यसि ॥
tato'tha bhagavānāha prīto mā vai yudhiṣṭhira | arthātpriyataraḥ kṛṣṇa matprasādādbhaviṣyasi
तब प्रसन्न हुए भगवान् ने मुझसे कहा, हे युधिष्ठिर, ‘हे कृष्ण, मेरी कृपा से तुम धन से भी अधिक प्रिय होगे।
श्लोक 32 (13.49.32)
अपराजितश्च युद्धेषु तेजश्चैवानलोपमम् । एवं सहस्रशश्चान्यान्महादेवो वरं ददौ ॥
aparājitaśca yuddheṣu tejaścaivānalopamam | evaṃ sahasraśaścānyānmahādevo varaṃ dadau
तुम युद्धों में अपराजित रहोगे और तुम्हारा तेज अग्नि के समान होगा।’ इसी प्रकार महादेव ने मुझे और भी हज़ारों वरदान दिए।
श्लोक 33 (13.49.33)
मणिमन्थेऽथ शैले वै पुरा सम्पूजितो मया । वर्षायुतसहस्राणां सहस्रं शतमेव च ॥
maṇimanthe'tha śaile vai purā sampūjito mayā | varṣāyutasahasrāṇāṃ sahasraṃ śatameva ca
पूर्वकाल में मैंने मणिमन्थ पर्वत पर उनकी पूजा की थी—अयुत वर्षों के हज़ारों के, एक हज़ार और एक सौ (भागों) तक।
श्लोक 34 (13.49.34)
ततो मां भगवान्प्रीत इदं वचनमब्रवीत् । वरं वृणीष्व भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते ॥
tato māṃ bhagavānprīta idaṃ vacanamabravīt | varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te yaste manasi vartate
तब प्रसन्न भगवान् ने मुझसे ये वचन कहे, ‘वर माँगो, जो तुम्हारे मन में हो; तुम्हारा कल्याण हो।’
श्लोक 35 (13.49.35)
ततः प्रणम्य शिरसा इदं वचनमब्रवम् । यदि प्रीतो महादेवो भक्त्या परमया प्रभुः ॥
tataḥ praṇamya śirasā idaṃ vacanamabravam | yadi prīto mahādevo bhaktyā paramayā prabhuḥ
तब मस्तक झुकाकर मैंने ये वचन कहे, ‘यदि प्रभु महादेव मेरी परम भक्ति से प्रसन्न हैं,
श्लोक 36 (13.49.36)
नित्यकालं तवेशान भक्तिर्भवतु मे स्थिरा । एवमस्त्विति भगवांस्तत्रोक्त्वान्तरधीयत ॥
nityakālaṃ taveśāna bhaktirbhavatu me sthirā | evamastviti bhagavāṃstatroktvāntaradhīyata
तो हे ईशान, आपके प्रति मेरी भक्ति सदा स्थिर रहे।’ ‘ऐसा ही हो,’ यह कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गए।”
जैगीषव्य उवाच
श्लोक 37 (13.49.37)
ममाष्टगुणमैश्वर्यं दत्तं भगवता पुरा । यत्नेनान्येन बलिना वाराणस्यां युधिष्ठिर ॥
mamāṣṭaguṇamaiśvaryaṃ dattaṃ bhagavatā purā | yatnenānyena balinā vārāṇasyāṃ yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, पूर्वकाल में भगवान् ने वाराणसी में मुझे अष्टगुण ऐश्वर्य दिया, वह भी अन्य प्रबल प्रयत्न के द्वारा।
गर्ग उवाच
श्लोक 38 (13.49.38)
चतुःषष्ट्यङ्गमददत्कलाज्ञानं ममाद्भुतम् । सरस्वत्यास्तटे तुष्टो मनोयज्ञेन पाण्डव ॥
catuḥṣaṣṭyaṅgamadadatkalājñānaṃ mamādbhutam | sarasvatyāstaṭe tuṣṭo manoyajñena pāṇḍava
हे पाण्डव, सरस्वती के तट पर मेरे मानस यज्ञ से सन्तुष्ट होकर उन्होंने मुझे चौंसठ अंगोंवाला अद्भुत कलाज्ञान दिया।
श्लोक 39 (13.49.39)
तुल्यं मम सहस्रं तु सुतानां ब्रह्मवादिनाम् । आयुश्चैव सपुत्रस्य संवत्सरशतायुतम् ॥
tulyaṃ mama sahasraṃ tu sutānāṃ brahmavādinām | āyuścaiva saputrasya saṃvatsaraśatāyutam
उन्होंने मुझे मेरे समान एक हज़ार ब्रह्मवादी पुत्र दिए, और पुत्रों सहित मुझे सौ अयुत वर्ष की आयु भी दी।
पराशर उवाच
श्लोक 40 (13.49.40)
प्रसाद्येह पुरा शर्वं मनसाऽचिन्तयं नृप । महातपा महातेजा महायोगी महायशाः ॥
prasādyeha purā śarvaṃ manasā'cintayaṃ nṛpa | mahātapā mahātejā mahāyogī mahāyaśāḥ
हे राजन्, पूर्वकाल में शर्व को प्रसन्न करके मैंने मन में एक ऐसे पुत्र का चिन्तन किया जो महातपस्वी, महातेजस्वी, महायोगी और महायशस्वी हो—
श्लोक 41 (13.49.41)
वेदव्यासः श्रियावासो ब्राह्मणः करुणान्वितः । अप्यसावीप्सितः पुत्रो मम स्याद्वै महेश्वरात् ॥
vedavyāsaḥ śriyāvāso brāhmaṇaḥ karuṇānvitaḥ | apyasāvīpsitaḥ putro mama syādvai maheśvarāt
वेदव्यास, जो श्री के निवास और करुणा से भरे ब्राह्मण हों—“वह मेरा इच्छित पुत्र महेश्वर से मुझे प्राप्त हो।”
श्लोक 42 (13.49.42)
इति मत्वा हृदि मतं प्राह मां सुरसत्तमः । मयि सम्भावना यास्याः फलात्कृष्णो भविष्यति ॥
iti matvā hṛdi mataṃ prāha māṃ surasattamaḥ | mayi sambhāvanā yāsyāḥ phalātkṛṣṇo bhaviṣyati
इस प्रकार मेरे मन की बात हृदय में जानकर देवश्रेष्ठ ने मुझसे कहा, “मुझमें तुम्हारी जो आस्था है, उसके फल से कृष्ण का जन्म होगा।
श्लोक 43 (13.49.43)
सावर्णस्य मनोः सर्गे सप्तर्षिश्च भविष्यति । वेदानां च स वै वक्ता कुरुवंशकरस्तथा ॥
sāvarṇasya manoḥ sarge saptarṣiśca bhaviṣyati | vedānāṃ ca sa vai vaktā kuruvaṃśakarastathā
वे सावर्ण मनु के काल में सप्तर्षियों में से एक होंगे; वे वेदों के वक्ता होंगे और कुरुवंश को चलानेवाले भी।
श्लोक 44 (13.49.44)
इतिहासस्य कर्ता च पुत्रस्ते जगतो हितः । भविष्यति महेन्द्रस्य दयितः स महामुनिः ॥
itihāsasya kartā ca putraste jagato hitaḥ | bhaviṣyati mahendrasya dayitaḥ sa mahāmuniḥ
तुम्हारा पुत्र इतिहास का रचयिता और जगत् का हितकारी होगा; वह महामुनि महेन्द्र का प्रिय होगा।
श्लोक 45 (13.49.45)
अजरश्चामरश्चैव पराशर सुतस्तव । एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत । युधिष्ठिर महायोगी वीर्यवानक्षयोऽव्ययः ॥
ajaraścāmaraścaiva parāśara sutastava | evamuktvā sa bhagavāṃstatraivāntaradhīyata | yudhiṣṭhira mahāyogī vīryavānakṣayo'vyayaḥ
हे पराशर, तुम्हारा पुत्र अजर और अमर होगा।” यह कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गए, हे युधिष्ठिर—वे महायोगी, पराक्रमी, अक्षय और अविनाशी हैं।
माण्डव्य उवाच
श्लोक 46 (13.49.46)
अचोरश्चोरशङ्कायां शूले भिन्नो ह्यहं तदा ॥
acoraścoraśaṅkāyāṃ śūle bhinno hyahaṃ tadā
मैं चोर नहीं था, फिर भी चोरी की शंका पर उस समय मुझे शूली में पिरो दिया गया था।
श्लोक 47 (13.49.47)
तत्रस्थेन स्तुतो देवः प्राह मां वै नरेश्वर । मोक्षं प्राप्स्यसि शूलाच्च जीविष्यसि समार्बुदम् ॥
tatrasthena stuto devaḥ prāha māṃ vai nareśvara | mokṣaṃ prāpsyasi śūlācca jīviṣyasi samārbudam
वहीं रहते हुए मैंने देवता की स्तुति की, तब हे नरेश्वर, उन्होंने मुझसे कहा, “तुम शूली से मुक्त हो जाओगे और एक अर्बुद वर्ष तक जीवित रहोगे।
श्लोक 48 (13.49.48)
रुजा शूलकृता चैव न ते विप्र भविष्यति । आधिभिर्व्याधिभिश्चैव वर्जितस्त्वं भविष्यति ॥
rujā śūlakṛtā caiva na te vipra bhaviṣyati | ādhibhirvyādhibhiścaiva varjitastvaṃ bhaviṣyati
हे विप्र, शूली की पीड़ा तुम्हें नहीं होगी; तुम मानसिक और शारीरिक व्याधियों से रहित रहोगे।
श्लोक 49 (13.49.49)
पादाच्चतुर्थात्सम्भूत आत्मा यस्मान्मुने तव । त्वं भविष्यस्यनुपमो जन्म वै सफलं कुरु ॥
pādāccaturthātsambhūta ātmā yasmānmune tava | tvaṃ bhaviṣyasyanupamo janma vai saphalaṃ kuru
हे मुनि, क्योंकि तुम्हारी आत्मा चौथे पाद से उत्पन्न हुई है, इसलिए तुम अनुपम होगे; अपने जन्म को सफल करो।
श्लोक 50 (13.49.50)
तीर्थाभिषेकं सकलं त्वमविघ्नेन चाप्स्यसि । स्वर्गं चैवाक्षयं विप्र विदधामि तवोर्जितम् ॥
tīrthābhiṣekaṃ sakalaṃ tvamavighnena cāpsyasi | svargaṃ caivākṣayaṃ vipra vidadhāmi tavorjitam
तुम बिना विघ्न के तीर्थस्नान का सम्पूर्ण फल पाओगे, और हे विप्र, मैं तुम्हारे लिए प्रबल और अक्षय स्वर्ग का विधान करता हूँ।”
श्लोक 51 (13.49.51)
एवमुक्त्वा तु भगवान्वरेण्यो वृषवाहनः । महेश्वरो महाराजः कृत्तिवासा महाद्युतिः । सगणो दैवतश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
evamuktvā tu bhagavānvareṇyo vṛṣavāhanaḥ | maheśvaro mahārājaḥ kṛttivāsā mahādyutiḥ | sagaṇo daivataśreṣṭhastatraivāntaradhīyata
यह कहकर वृषभवाहन, श्रेष्ठ, गजचर्मधारी, महाद्युतिमान् महाराज भगवान् महेश्वर अपने गणों सहित, देवताओं में श्रेष्ठ होते हुए, वहीं अन्तर्धान हो गए।
गालव उवाच
श्लोक 52 (13.49.52)
विश्वामित्राभ्यनुज्ञातो ह्यहं पितरमागतः । अब्रवीन्मां ततो माता दुःखिता रुदती भृशम् ॥
viśvāmitrābhyanujñāto hyahaṃ pitaramāgataḥ | abravīnmāṃ tato mātā duḥkhitā rudatī bhṛśam
विश्वामित्र से आज्ञा पाकर मैं पिता के पास आया। तब दुःखी होकर बहुत रोती हुई माता ने मुझसे कहा—
श्लोक 53 (13.49.53)
कौशिकेनाभ्यनुज्ञातं पुत्रं देवविभूषितम् । न तात तरुणं दान्तं पिता त्वां पश्यतेऽनघ ॥
kauśikenābhyanujñātaṃ putraṃ devavibhūṣitam | na tāta taruṇaṃ dāntaṃ pitā tvāṃ paśyate'nagha
हे तात, तुम्हारे पिता तुम्हें नहीं देख रहे—तुम जो तरुण और संयमी हो, देवों से विभूषित हो, कौशिक से आज्ञा पाए हुए मेरे पुत्र हो, हे निष्पाप।
श्लोक 54 (13.49.54)
श्रुत्वा जनन्या वचनं निराशो गुरुदर्शने । नियतात्मा महादेवमपश्यं सोऽब्रवीच्च माम् ॥
śrutvā jananyā vacanaṃ nirāśo gurudarśane | niyatātmā mahādevamapaśyaṃ so'bravīcca mām
माता के वचन सुनकर मैं पिता के दर्शन की आशा खो बैठा। संयत मन से मैंने महादेव का दर्शन किया, और उन्होंने मुझसे कहा—
श्लोक 55 (13.49.55)
पिता माता च ते त्वं च पुत्र मृत्युविवर्जिताः । भविष्यथ विश क्षिप्रं द्रष्टासि पितरं क्षये ॥
pitā mātā ca te tvaṃ ca putra mṛtyuvivarjitāḥ | bhaviṣyatha viśa kṣipraṃ draṣṭāsi pitaraṃ kṣaye
पुत्र, तुम्हारे पिता, तुम्हारी माता और तुम—तीनों मृत्यु से रहित हो जाओगे। शीघ्र भीतर जाओ; घर में तुम अपने पिता को देखोगे।
श्लोक 56 (13.49.56)
अनुज्ञातो भगवता गृहं गत्वा युधिष्ठिर । अपश्यं पितरं तात इष्टिं कृत्वा विनिःसृतम् । उपस्पृश्य गृहीत्वेध्मं कुशांश्च शरणाकुरून् ॥
anujñāto bhagavatā gṛhaṃ gatvā yudhiṣṭhira | apaśyaṃ pitaraṃ tāta iṣṭiṃ kṛtvā viniḥsṛtam | upaspṛśya gṛhītvedhmaṃ kuśāṃśca śaraṇākurūn
भगवान् की आज्ञा पाकर, हे युधिष्ठिर, मैं घर गया और देखा कि हे तात, मेरे पिता यज्ञ-कर्म करके बाहर निकले हैं; उन्होंने आचमन किया था और समिधा, कुश तथा गिरे हुए फलों का अन्न ले रखा था।
श्लोक 57 (13.49.57)
तान्विसृज्य च मां प्राह पिता सास्राविलेक्षणः । प्रणमन्तं परिष्वज्य मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डव ॥
tānvisṛjya ca māṃ prāha pitā sāsrāvilekṣaṇaḥ | praṇamantaṃ pariṣvajya mūrdhnyupāghrāya pāṇḍava
इन्हें रखकर, आँखों में आँसू भरे मेरे पिता ने, प्रणाम करते हुए मुझको गले लगाकर और मेरा मस्तक सूँघकर, हे पाण्डव, मुझसे कहा—
श्लोक 58 (13.49.58)
दिष्ट्या दृष्टोसि मे पुत्र कृतविद्य इहागत ॥
diṣṭyā dṛṣṭosi me putra kṛtavidya ihāgata
पुत्र, सौभाग्य से मैंने तुम्हें देखा; तुम विद्या पूरी करके घर आ गए हो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 59 (13.49.59)
एतान्यत्यद्भुतान्येव कर्माण्यथ महात्मनः । प्रोक्तानि मुनिभिः श्रुत्वा विस्मयामास पाण्डवः ॥
etānyatyadbhutānyeva karmāṇyatha mahātmanaḥ | proktāni munibhiḥ śrutvā vismayāmāsa pāṇḍavaḥ
मुनियों द्वारा कहे गए महात्मा के इन अत्यन्त अद्भुत कर्मों को सुनकर पाण्डुपुत्र विस्मित हो गए।
श्लोक 60 (13.49.60)
ततः कृष्णोऽब्रवीद्वाक्यं पुनर्मतिमतांवरः । युधिष्ठिरं धर्मनिधिं पुरुहूतमिवेश्वरः ॥
tataḥ kṛṣṇo'bravīdvākyaṃ punarmatimatāṃvaraḥ | yudhiṣṭhiraṃ dharmanidhiṃ puruhūtamiveśvaraḥ
तब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ कृष्ण ने धर्म के निधि युधिष्ठिर से फिर कहा, जैसे ईश्वर पुरुहूत से कहते हैं।
वासुदेव उवाच
श्लोक 61 (13.49.61)
उपमन्युर्मयि प्राह तपन्निव दिवाकरः । अशुभैः पापकर्माणो ये नराः कलुषीकृताः ॥
upamanyurmayi prāha tapanniva divākaraḥ | aśubhaiḥ pāpakarmāṇo ye narāḥ kaluṣīkṛtāḥ
सूर्य के समान तपते हुए उपमन्यु ने मुझसे कहा, “जो पापकर्मी मनुष्य अशुभ कर्मों से कलुषित हैं,
श्लोक 62 (13.49.62)
ईशानं न प्रपद्यन्ते तमोराजसवृत्तयः ॥
īśānaṃ na prapadyante tamorājasavṛttayaḥ
वे ईशान की शरण नहीं लेते; उनकी वृत्ति तमोगुण और रजोगुण की होती है।
श्लोक 63 (13.49.63)
ईश्वरं सम्प्रपद्यन्ते द्विजा भावितभावनाः ॥
īśvaraṃ samprapadyante dvijā bhāvitabhāvanāḥ
किन्तु जिनकी भावना शुद्ध हो चुकी है, वे द्विज ईश्वर की शरण लेते हैं।
श्लोक 64 (13.49.64)
सर्वथा वर्तमानोपि यो भक्तः परमेश्वरे । सदृशोऽरण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥
sarvathā vartamānopi yo bhaktaḥ parameśvare | sadṛśo'raṇyavāsīnāṃ munīnāṃ bhāvitātmanām
जो मनुष्य किसी भी स्थिति में रहते हुए परमेश्वर का भक्त है, वह शुद्ध आत्मावाले वनवासी मुनियों के समान है।
श्लोक 65 (13.49.65)
ब्रह्मत्वं केशवत्वं वा शक्रत्वं वा सुरैः सह । त्रैलोक्यस्याधिपत्यं वा तुष्टो रुद्रः प्रयच्छति ॥
brahmatvaṃ keśavatvaṃ vā śakratvaṃ vā suraiḥ saha | trailokyasyādhipatyaṃ vā tuṣṭo rudraḥ prayacchati
ब्रह्मत्व, केशवत्व, देवताओं सहित शक्रत्व, अथवा तीनों लोकों का आधिपत्य—प्रसन्न होने पर रुद्र यह सब देते हैं।
श्लोक 66 (13.49.66)
मनसाऽपि शिवं तात ये प्रपद्यन्ति मानवाः । विधूय सर्वपापानि देवैः सह वसन्ति ते ॥
manasā'pi śivaṃ tāta ye prapadyanti mānavāḥ | vidhūya sarvapāpāni devaiḥ saha vasanti te
हे तात, जो मनुष्य मन से भी शिव की शरण लेते हैं, वे सब पापों को झाड़कर देवताओं के साथ निवास करते हैं।
श्लोक 67 (13.49.67)
भित्त्वाभित्त्वा च कूलानि हुत्वा सर्वमिदं जगत् । जयेद्देवं विरूपाक्षं न स पापेन लिप्यते ॥
bhittvābhittvā ca kūlāni hutvā sarvamidaṃ jagat | jayeddevaṃ virūpākṣaṃ na sa pāpena lipyate
जो बार-बार तटों को तोड़कर और इस सारे जगत् की आहुति देकर देव विरूपाक्ष को जीत लेता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता।
श्लोक 68 (13.49.68)
सर्वलक्षणहीनोपि युक्तो वा सर्वपातकैः । सर्वं तुदति तत्पापं भावयञ्शिवमात्मना ॥
sarvalakṣaṇahīnopi yukto vā sarvapātakaiḥ | sarvaṃ tudati tatpāpaṃ bhāvayañśivamātmanā
सब शुभ लक्षणों से हीन अथवा सब पातकों से युक्त मनुष्य भी मन से शिव का ध्यान करता हुआ उस सारे पाप को नष्ट कर देता है।
श्लोक 69 (13.49.69)
कीटपक्षिपतङ्गानां तिरश्चामपि केशव । महादेवप्रपन्नानां न भयं विद्यते क्वचित् ॥
kīṭapakṣipataṅgānāṃ tiraścāmapi keśava | mahādevaprapannānāṃ na bhayaṃ vidyate kvacit
हे केशव, कीट, पक्षी, पतंग और तिर्यक् योनि के जीवों के लिए भी, जो महादेव की शरण में आ गए हों, कहीं भय नहीं रहता।
श्लोक 70 (13.49.70)
एवमेव महादेवं भक्ता ये मानवा भुवि । न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मतिः । ततः कृष्णोऽब्रवीद्वाक्यं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥
evameva mahādevaṃ bhaktā ye mānavā bhuvi | na te saṃsāravaśagā iti me niścitā matiḥ | tataḥ kṛṣṇo'bravīdvākyaṃ dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram
इसी प्रकार पृथ्वी पर जो मनुष्य महादेव के भक्त हैं, वे संसार के वश में नहीं जाते—यह मेरा दृढ़ निश्चय है।” तब कृष्ण ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर से कहा।
विष्णुरुवाच
श्लोक 71 (13.49.71)
आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च । द्यौर्भूमिरापो वसवोऽथ विश्वे । धाताऽर्यमा शुक्रबृहस्पती च । वेदा यज्ञा दक्षिणा वेदवाहाः ॥
ādityacandrāvanilānalau ca | dyaurbhūmirāpo vasavo'tha viśve | dhātā'ryamā śukrabṛhaspatī ca | vedā yajñā dakṣiṇā vedavāhāḥ
सूर्य और चन्द्रमा, वायु और अग्नि, द्युलोक, पृथ्वी और जल, वसु और विश्वेदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र और बृहस्पति, वेद, यज्ञ, दक्षिणाएँ और वेदों के वाहक,
श्लोक 72 (13.49.72)
सोमो यष्टा यच्च हव्यं हविश्च । रक्षा दीक्षा संयमा ये च केचित् ॥
somo yaṣṭā yacca havyaṃ haviśca | rakṣā dīkṣā saṃyamā ye ca kecit
सोम, यजमान, हव्य और हवि, रक्षा, दीक्षा, संयम, और जो कुछ भी और हैं,
श्लोक 73 (13.49.73)
स्वाहा वौषट् ब्राह्मणाः सौरभेयी । धर्मं चाग्र्यं कालचक्रं बलं च । यशो दमो बुद्धिमतां स्थितिश्च । शुभाशुभं ये मुनयश्च सप्त ॥
svāhā vauṣaṭ brāhmaṇāḥ saurabheyī | dharmaṃ cāgryaṃ kālacakraṃ balaṃ ca | yaśo damo buddhimatāṃ sthitiśca | śubhāśubhaṃ ye munayaśca sapta
स्वाहा और वौषट्, ब्राह्मण, सुरभि की सन्तान गौ, परम धर्म, कालचक्र और बल, यश, दम, बुद्धिमानों की स्थिरता, शुभ और अशुभ, और सप्तर्षि—
श्लोक 74 (13.49.74)
अग्र्या बुद्धिर्मनसा दर्शने च । स्पर्शश्चाग्र्यः कर्मणां या च सिद्धिः । गणा देवानामूष्मपाः सोमपाश्च । लेखाः सुयामास्तुषिता ब्रह्मकायाः ॥
agryā buddhirmanasā darśane ca | sparśaścāgryaḥ karmaṇāṃ yā ca siddhiḥ | gaṇā devānāmūṣmapāḥ somapāśca | lekhāḥ suyāmāstuṣitā brahmakāyāḥ
सर्वोच्च बुद्धि, मन से दर्शन में सर्वोच्च, सर्वोच्च स्पर्श, और कर्मों की जो भी सिद्धि है; देवताओं के गण—ऊष्मप और सोमप, लेख, सुयाम, तुषित और ब्रह्मकाय—
श्लोक 75 (13.49.75)
आभासुरा गन्धपा धूमपाश्च । वाचा विरुद्धाश्च मनोविरुद्धाः । शुद्धाश्च निर्माणरताश्च देवाः । स्पर्शाशना दर्शपा आज्यपाश्च ॥
ābhāsurā gandhapā dhūmapāśca | vācā viruddhāśca manoviruddhāḥ | śuddhāśca nirmāṇaratāśca devāḥ | sparśāśanā darśapā ājyapāśca
आभासुर, गन्धप और धूमप, वाणी का संयम करनेवाले और मन का संयम करनेवाले, अनेक रूप रचने में रत शुद्ध देवता, स्पर्शाशन, दर्शप और आज्यप—
श्लोक 76 (13.49.76)
चिन्त्यद्योता ये च देवेषु मुख्या । ये चाप्यन्ते देवताश्चाजमीढ । सुपर्णगन्धर्वपिशाचदानवा । यक्षास्तथा चारणपन्नगाश्च ॥
cintyadyotā ye ca deveṣu mukhyā | ye cāpyante devatāścājamīḍha | suparṇagandharvapiśācadānavā | yakṣāstathā cāraṇapannagāśca
देवताओं में मुख्य वे देवता जिनका संकल्प तुरन्त प्रकट हो जाता है, और अन्त में जो अन्य देवता हैं, हे अजमीढ; सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच और दानव, यक्ष तथा चारण और नाग—
श्लोक 77 (13.49.77)
स्थूलं सूक्ष्मं मृदु चाप्यसूक्ष्मं । दुःखं सुखं दुःखमनन्तरं च । साङ्ख्यं योगं तत्पराणां परं च । शर्वाज्जातं विद्धि यत्कीर्तितं मे ॥
sthūlaṃ sūkṣmaṃ mṛdu cāpyasūkṣmaṃ | duḥkhaṃ sukhaṃ duḥkhamanantaraṃ ca | sāṅkhyaṃ yogaṃ tatparāṇāṃ paraṃ ca | śarvājjātaṃ viddhi yatkīrtitaṃ me
स्थूल और सूक्ष्म, मृदु और अमृदु, दुःख, सुख और उसके पीछे फिर दुःख, साङ्ख्य और योग, और उनमें लगे हुओं का जो परम है—मैंने जो कुछ कहा, उसे शर्व से उत्पन्न जानो।
श्लोक 78 (13.49.78)
तत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्या । सर्वे देवा भुवनस्यास्य गोपाः । आविश्येमां धरणीं येऽभ्यरक्षन् । पुरातनीं तस्य देवस्य सृष्टिम् ॥
tatsambhūtā bhūtakṛto vareṇyā | sarve devā bhuvanasyāsya gopāḥ | āviśyemāṃ dharaṇīṃ ye'bhyarakṣan | purātanīṃ tasya devasya sṛṣṭim
उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं प्राणियों के रचयिता श्रेष्ठ जन; वे सब देवता इस जगत् के रक्षक हैं, जिन्होंने इस पृथ्वी में प्रवेश करके उन देव की पुरातन सृष्टि की रक्षा की।
श्लोक 79 (13.49.79)
विचिन्वन्तस्तपसा तत्स्थवीयः । किञ्चित्तत्त्वं प्राणहेतोर्नतोस्मि । ददातु देवः स वरानिहेष्टान् । अभिष्टुतो नः प्रभुरव्ययः सदा ॥
vicinvantastapasā tatsthavīyaḥ | kiñcittattvaṃ prāṇahetornatosmi | dadātu devaḥ sa varāniheṣṭān | abhiṣṭuto naḥ prabhuravyayaḥ sadā
तप से उस परम विशाल किसी तत्त्व को खोजते हुए हम प्राणों के लिए नतमस्तक हैं। जिनकी हमने स्तुति की है, वे अविनाशी प्रभु देव सदा हमें यहाँ अभीष्ट वर दें।
श्लोक 80 (13.49.80)
इमं स्तवं सन्नियतेन्द्रियश्च । भूत्वा शुचिर्यः पुरुषः पठेत । अभग्नयोगो नियतो मासमेकं । सम्प्राप्नुयादश्वमेधे फलं यत् ॥
imaṃ stavaṃ sanniyatendriyaśca | bhūtvā śuciryaḥ puruṣaḥ paṭheta | abhagnayogo niyato māsamekaṃ | samprāpnuyādaśvamedhe phalaṃ yat
जो पुरुष इन्द्रियों को संयत करके और पवित्र होकर, नियम में स्थिर रहते हुए और योग को भंग किए बिना, एक मास तक इस स्तव का पाठ करता है, वह अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 81 (13.49.81)
वेदान्कृत्स्नान्ब्राह्मणः प्राप्नुयात्तु । जयेन्नृपः पार्थ महीं च कृत्स्नाम् । वैश्यो लाभं प्राप्नुयान्नैपुणं च । शूद्रो गतिं प्रेत्य तथा सुखं च ॥
vedānkṛtsnānbrāhmaṇaḥ prāpnuyāttu | jayennṛpaḥ pārtha mahīṃ ca kṛtsnām | vaiśyo lābhaṃ prāpnuyānnaipuṇaṃ ca | śūdro gatiṃ pretya tathā sukhaṃ ca
ब्राह्मण सब वेद प्राप्त करता है; हे पार्थ, राजा सारी पृथ्वी जीतता है; वैश्य लाभ और कुशलता पाता है; और शूद्र मरने के बाद उत्तम गति तथा सुख।
श्लोक 82 (13.49.82)
स्तवराजमिमं कृत्वा रुद्राय दधिरे मनः । सर्वदोषापहं पुण्यं पवित्रं च यशस्विनः ॥
stavarājamimaṃ kṛtvā rudrāya dadhire manaḥ | sarvadoṣāpahaṃ puṇyaṃ pavitraṃ ca yaśasvinaḥ
इस स्तवराज की रचना करके यशस्वी जनों ने रुद्र में अपना मन लगाया; यह सब दोषों को दूर करनेवाला, पुण्य और पवित्र है।
श्लोक 83 (13.49.83)
यावन्त्यस्य शरीरेषु रोमकूपाणि भारत । तावन्त्यब्दसहस्राणि स्वर्गे वसति मानवः ॥
yāvantyasya śarīreṣu romakūpāṇi bhārata | tāvantyabdasahasrāṇi svarge vasati mānavaḥ
हे भारत, उसके शरीर में जितने रोमकूप हैं, उतने हज़ार वर्ष तक वह मनुष्य स्वर्ग में निवास करता है।