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अनुशासन पर्व · अध्याय 50

अष्टावक्र की वदान्य-कन्या के लिए याचना और उत्तर की यात्रा

युधिष्ठिर पूछते हैं कि यदि स्त्रियाँ असत्यवादिनी कही गई हैं और मृत्यु से दम्पति बिछुड़ जाते हैं, तो पति-पत्नी का 'सहधर्म' कैसे टिकता है। भीष्म अष्टावक्र और दिशा के प्राचीन संवाद से उत्तर देते हैं। अष्टावक्र ऋषि वदान्य से उनकी पुत्री सुप्रभा माँगते हैं; वदान्य उन्हें उत्तर दिशा में एक वृद्ध तपस्विनी को देखने भेजते हैं। अष्टावक्र हिमालय और कैलास को पार करते हैं, कुबेर के भवन में एक वर्ष दिव्य आतिथ्य पाते हैं, और रत्नमय आश्रम में पहुँचते हैं, जहाँ सात कन्याएँ और एक वृद्धा हैं; वह वृद्धा उन्हें अपना प्रेम और सारा धन देना चाहती है। वे परस्त्री-गमन के निषेध का हवाला देकर मना कर देते हैं और उसके जर्जर रूप से व्याकुल होकर रात बिताते हैं।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.50.1)

यदिदं सहधर्मेति प्रोच्यते भरतर्षभ । पाणिग्रहणकाले तु स्त्रीणामेतत्कथं स्मृतम् ॥

yadidaṃ sahadharmeti procyate bharatarṣabha | pāṇigrahaṇakāle tu strīṇāmetatkathaṃ smṛtam

हे भरतश्रेष्ठ, यह जो कहा जाता है कि पत्नी 'सहधर्मिणी' है, वह विवाह के समय, पाणिग्रहण के क्षण, स्त्रियों के विषय में कैसे स्मरण किया जाता है?

श्लोक 2 (13.50.2)

आर्ष एष भवेद्धर्मः प्राजापत्योऽथवाऽसुरः । यदेतत्सहधर्मेति पूर्वमुक्तं महर्षिभिः ॥

ārṣa eṣa bhaveddharmaḥ prājāpatyo'thavā'suraḥ | yadetatsahadharmeti pūrvamuktaṃ maharṣibhiḥ

महर्षियों ने पूर्वकाल में जिसे 'सहधर्म' कहा है, वह धर्म आर्ष विवाह का है, प्राजापत्य का है अथवा आसुर का?

श्लोक 3 (13.50.3)

सन्देहः सुमहानेष विरुद्ध इति मे मतिः । इह यः सहधर्मो वै प्रेत्यायं विहितः क्वनु ॥

sandehaḥ sumahāneṣa viruddha iti me matiḥ | iha yaḥ sahadharmo vai pretyāyaṃ vihitaḥ kvanu

यह मेरे लिए बहुत बड़ा संदेह है, और मुझे यह विरोधपूर्ण लगता है: यहाँ इस लोक में जो सहधर्म माना गया है, परलोक में वह कहाँ विहित है?

श्लोक 4 (13.50.4)

स्वर्गो मृतानां भवति सहधर्मः पितामह । पूर्वमेकस्तु म्रियते क्व चैकस्तिष्ठते वद ॥

svargo mṛtānāṃ bhavati sahadharmaḥ pitāmaha | pūrvamekastu mriyate kva caikastiṣṭhate vada

पितामह, कहा जाता है कि सहधर्म से मृतकों को स्वर्ग मिलता है; पर दोनों में से एक पहले मर जाता है। बताइए, तब दूसरा कहाँ रहता है?

श्लोक 5 (13.50.5)

नानाधर्मफलोपेता नानाकर्मनिवासिताः । नानानिरयनिष्ठान्ता मानुषा बहवो यदा ॥

nānādharmaphalopetā nānākarmanivāsitāḥ | nānānirayaniṣṭhāntā mānuṣā bahavo yadā

जब मनुष्य इतने अनेक हैं, जिनमें हर एक भिन्न-भिन्न धर्म के फल से युक्त है, भिन्न-भिन्न कर्मों के कारण भिन्न-भिन्न स्थानों में बसाया गया है, और भिन्न-भिन्न नरकों में जाकर समाप्त होने वाला है,—

श्लोक 6 (13.50.6)

अनृताः स्त्रिय इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति । यदाऽनृताः स्त्रियस्तात सहधर्मः कुतः स्मृतः ॥

anṛtāḥ striya ityevaṃ sūtrakāro vyavasyati | yadā'nṛtāḥ striyastāta sahadharmaḥ kutaḥ smṛtaḥ

और सूत्रकार यह निश्चय करता है कि स्त्रियाँ असत्यवादिनी होती हैं। हे तात, जब स्त्रियाँ असत्यवादिनी हैं, तब सहधर्म की बात कैसे कही गई?

श्लोक 7 (13.50.7)

अनृताः स्त्रिय इत्येवं वेदेष्वपि हि पठ्यते । धर्मो यः पूर्विको दृष्ट उपचारः क्रियाविधिः ॥

anṛtāḥ striya ityevaṃ vedeṣvapi hi paṭhyate | dharmo yaḥ pūrviko dṛṣṭa upacāraḥ kriyāvidhiḥ

वेदों में भी पढ़ा जाता है कि स्त्रियाँ असत्यवादिनी होती हैं। और जो धर्म आदि से चला आया देखा गया है, वह उपचार और क्रियाविधि ही है।

श्लोक 8 (13.50.8)

गह्वरं प्रतिभात्येतन्मम चिन्तयतोऽनिशम् । निःसन्देहमिदं सर्वं पितामह यथाश्रुतिः ॥

gahvaraṃ pratibhātyetanmama cintayato'niśam | niḥsandehamidaṃ sarvaṃ pitāmaha yathāśrutiḥ

निरन्तर विचार करने पर यह विषय मुझे गहन और दुर्बोध प्रतीत होता है। पितामह, श्रुति के अनुसार यह सब मेरे लिए संशयरहित कर दीजिए।

श्लोक 9 (13.50.9)

यदेतद्यादृशं चैतद्यथा चैतत्प्रवर्तितम् । निखिलेन महाप्राज्ञ भवानेतद्ब्रवीतु मे ॥

yadetadyādṛśaṃ caitadyathā caitatpravartitam | nikhilena mahāprājña bhavānetadbravītu me

हे महाप्राज्ञ, यह क्या है, कैसा है और कैसे प्रवर्तित हुआ—यह सब आप मुझे पूरा-पूरा बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 10 (13.50.10)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अष्टावक्रस्य संवादं दिशया सह भारत ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | aṣṭāvakrasya saṃvādaṃ diśayā saha bhārata

हे भारत, इसी विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं—अष्टावक्र का दिशा (दिग्देवी) के साथ संवाद।

श्लोक 11 (13.50.11)

निर्वेष्टुकामस्तु पुरा अष्टावक्रो महातपाः । ऋषेरथ वदान्यस्य वव्रे कन्यां महात्मनः ॥

nirveṣṭukāmastu purā aṣṭāvakro mahātapāḥ | ṛṣeratha vadānyasya vavre kanyāṃ mahātmanaḥ

पूर्वकाल में महातपस्वी अष्टावक्र ने विवाह की इच्छा से महात्मा ऋषि वदान्य की कन्या का वरण करना चाहा।

श्लोक 12 (13.50.12)

सुप्रभां नाम वै नाम्ना रूपेणाप्रतिमां भुवि । गुणप्रभावशीलेन चारित्रेण च शोभनाम् ॥

suprabhāṃ nāma vai nāmnā rūpeṇāpratimāṃ bhuvi | guṇaprabhāvaśīlena cāritreṇa ca śobhanām

उसका नाम सुप्रभा था; रूप में वह पृथ्वी पर अनुपम थी, और गुण, तेज, स्वभाव तथा आचरण से भी सुशोभित थी।

श्लोक 13 (13.50.13)

सा तस्यर्षेर्मनो दृष्टा जहार शुभलोचना । वनराजी यथा चित्रा वसन्ते कुसुमाचिता ॥

sā tasyarṣermano dṛṣṭā jahāra śubhalocanā | vanarājī yathā citrā vasante kusumācitā

उस सुन्दर नेत्रों वाली कन्या ने देखते ही ऋषि का मन हर लिया, जैसे वसन्त में फूलों से लदी हुई रंग-बिरंगी वनपंक्ति मन हर लेती है।

श्लोक 14 (13.50.14)

ऋषिस्तमाह देया मे सुता तुभ्यं हि तच्छृणु ॥

ṛṣistamāha deyā me sutā tubhyaṃ hi tacchṛṇu

ऋषि ने उससे कहा, 'मेरी पुत्री तुम्हें दी जानी है; इसके लिए यह सुनो।'

वदान्य उवाच

श्लोक 15 (13.50.15)

अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो ह्यप्रवासी प्रियंवदः । सुरूपः सम्मतो वीरः शीलवान्भोगभुक्छुचिः ॥

ananyastrījanaḥ prājño hyapravāsī priyaṃvadaḥ | surūpaḥ sammato vīraḥ śīlavānbhogabhukchuciḥ

जिसका कोई अन्य स्त्रीसम्बन्ध न हो, जो विद्वान् हो, परदेश में न रहता हो, मधुर बोलने वाला हो, सुरूप, सम्मानित, वीर, शीलवान्, भोगों का उपभोग करने वाला और पवित्र हो,—

श्लोक 16 (13.50.16)

दारानुमतयज्ञश्च सुनक्षत्रामथोद्वहेत् । सभृत्यः स्वजनोपेत इह प्रेत्य च मोदते ॥

dārānumatayajñaśca sunakṣatrāmathodvahet | sabhṛtyaḥ svajanopeta iha pretya ca modate

और जो पत्नी की अनुमति से यज्ञ करता हो—ऐसा पुरुष शुभ नक्षत्र वाली कन्या (सुनक्षत्रा) से विवाह करे। वह सेवकों और स्वजनों के साथ इस लोक में और परलोक में आनन्द पाता है।

श्लोक 17 (13.50.17)

गच्छ तावद्दिशं पुण्यामुत्तरां द्रक्ष्यसे ततः ॥

gaccha tāvaddiśaṃ puṇyāmuttarāṃ drakṣyase tataḥ

अभी तुम पवित्र उत्तर दिशा की ओर जाओ; उसके बाद तुम (सब) देखोगे।

अष्टावक्र उवाच

श्लोक 18 (13.50.18)

किं द्रष्टव्यं मया तत्र वक्तुमर्हति मे भवान् । तथेदानीं मया कार्यं यथा वक्ष्यति मां भवान् ॥

kiṃ draṣṭavyaṃ mayā tatra vaktumarhati me bhavān | tathedānīṃ mayā kāryaṃ yathā vakṣyati māṃ bhavān

वहाँ मुझे क्या देखना है? आप मुझे बताने की कृपा करें। और आप जैसा कहेंगे, मैं अब ठीक वैसा ही करूँगा।

वदान्य उवाच

श्लोक 19 (13.50.19)

धनदं समतिक्रम्य हिमवन्तं च पर्वतम् । रुद्रस्यायतनं दृष्ट्वा सिद्धचारणसेवितम् ॥

dhanadaṃ samatikramya himavantaṃ ca parvatam | rudrasyāyatanaṃ dṛṣṭvā siddhacāraṇasevitam

धनद (कुबेर) के प्रदेश और हिमालय पर्वत को पार करके तुम रुद्र का वह निवास देखोगे, जहाँ सिद्ध और चारण आते-जाते हैं,—

श्लोक 20 (13.50.20)

संहृष्टैः पार्षदैर्जुष्टं नृत्यद्भिर्विविधाननैः । दिव्याङ्गरागैः पैशाचैरन्यैर्नानाविधैः प्रभोः ॥

saṃhṛṣṭaiḥ pārṣadairjuṣṭaṃ nṛtyadbhirvividhānanaiḥ | divyāṅgarāgaiḥ paiśācairanyairnānāvidhaiḥ prabhoḥ

जो अनेक प्रकार के मुखों वाले, हर्ष से नाचते हुए गणों से, दिव्य अंगराग लगाए पिशाचों से और प्रभु के अन्य नाना प्रकार के अनुचरों से सेवित है।

श्लोक 21 (13.50.21)

पाणितालसुतालैश्च शम्पातालैः समैस्तथा । सम्प्रहृष्टैः प्रनृत्यद्भिः शर्वस्तत्र निषेव्यते ॥

pāṇitālasutālaiśca śampātālaiḥ samaistathā | samprahṛṣṭaiḥ pranṛtyadbhiḥ śarvastatra niṣevyate

वहाँ करतल की ताल, सुताल, शम्पाताल और सम ताल के साथ हर्षित होकर नाचते हुए वे शर्व (शिव) की सेवा करते हैं।

श्लोक 22 (13.50.22)

इष्टं किल गिरौ स्थानं तद्दिव्यमिति शुश्रुम । नित्यं सन्निहितो देवस्तथा ते पार्षदाः स्मृताः ॥

iṣṭaṃ kila girau sthānaṃ taddivyamiti śuśruma | nityaṃ sannihito devastathā te pārṣadāḥ smṛtāḥ

हमने सुना है कि उस पर्वत पर एक प्रिय स्थान है, जो दिव्य है। वहाँ देवता सदा समीप रहते हैं, और उनके पार्षद भी वहाँ रहते माने गए हैं।

श्लोक 23 (13.50.23)

तत्र देव्या तपस्तप्तं शङ्करार्थं सुदुश्चरम् । अतस्तदिष्टं देवस्य तथोमाया इति श्रुतिः ॥

tatra devyā tapastaptaṃ śaṅkarārthaṃ suduścaram | atastadiṣṭaṃ devasya tathomāyā iti śrutiḥ

वहाँ देवी ने शंकर को पाने के लिए अत्यन्त कठिन तप किया था; इसलिए वह स्थान देवता को प्रिय है, और उमा को भी प्रिय है—ऐसी श्रुति है।

श्लोक 24 (13.50.24)

पूर्वे तत्र महापार्श्वे देवस्योत्तरतस्तथा । ऋतवः कालरात्रिश्च ये दिव्या ये च मानुषाः ॥

pūrve tatra mahāpārśve devasyottaratastathā | ṛtavaḥ kālarātriśca ye divyā ye ca mānuṣāḥ

वहाँ पूर्व में, पर्वत के उस विशाल पार्श्व में और देवता के उत्तर की ओर भी, ऋतुएँ और कालरात्रि हैं—जो दिव्य हैं और जो मानुष हैं भी,—

श्लोक 25 (13.50.25)

देवं चोपासते सर्वे रूपिणः किल तत्र ह । तदतिक्रम्य भवनं त्वया यातव्यमेव हि ॥

devaṃ copāsate sarve rūpiṇaḥ kila tatra ha | tadatikramya bhavanaṃ tvayā yātavyameva hi

वे सब वहाँ शरीर धारण करके देवता की उपासना करते हैं, ऐसा कहा जाता है। उस भवन को पार करके तुम्हें आगे जाना है।

श्लोक 26 (13.50.26)

ततो नीलं वनोद्देशं द्रक्ष्यसे मेघसन्निभम् । रमणीयं मनोग्राहि तत्र वै द्रक्ष्यसे स्त्रियम् ॥

tato nīlaṃ vanoddeśaṃ drakṣyase meghasannibham | ramaṇīyaṃ manogrāhi tatra vai drakṣyase striyam

तब तुम मेघ के समान नीला, रमणीय और मन को लुभाने वाला एक वन-प्रदेश देखोगे; और वहाँ एक स्त्री को देखोगे।

श्लोक 27 (13.50.27)

तपस्विनीं महाभागां वृद्धां दीक्षामनुष्ठिताम् । द्रष्टव्या सा त्वया तत्र सम्पूज्या चैव यत्नतः ॥

tapasvinīṃ mahābhāgāṃ vṛddhāṃ dīkṣāmanuṣṭhitām | draṣṭavyā sā tvayā tatra sampūjyā caiva yatnataḥ

वह महाभाग तपस्विनी है, वृद्धा है और दीक्षा के व्रत में लगी है। वहाँ तुम्हें उसके दर्शन करने हैं और यत्न से उसका पूजन करना है।

श्लोक 28 (13.50.28)

तां दृष्ट्वा विनिवृत्तस्त्वं ततः पाणिं ग्रहीष्यसि । यद्येष समयः सर्वः साध्यतां तत्र गम्यताम् ॥

tāṃ dṛṣṭvā vinivṛttastvaṃ tataḥ pāṇiṃ grahīṣyasi | yadyeṣa samayaḥ sarvaḥ sādhyatāṃ tatra gamyatām

उसे देखकर तुम लौट आओगे, तब मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करोगे। यदि यह सब शर्त स्वीकार हो, तो इसे पूरा करो; वहाँ जाओ।

अष्टावक्र उवाच

श्लोक 29 (13.50.29)

तथाऽस्तु साधयिष्यामि तत्र यास्याम्यसंशयम् । यत्र त्वं वदसे साधो भवान्भवतु सत्यवाक् ॥

tathā'stu sādhayiṣyāmi tatra yāsyāmyasaṃśayam | yatra tvaṃ vadase sādho bhavānbhavatu satyavāk

ऐसा ही हो। मैं इसे पूरा करूँगा और जहाँ आप कहते हैं, वहाँ निश्चय ही जाऊँगा। हे साधु, आप अपने वचन पर सत्य बने रहें।

भीष्म उवाच

श्लोक 30 (13.50.30)

ततोऽगच्छत्स भगवानुत्तरामुत्तरां दिशम् । हिमवन्तं गिरिश्रेष्ठं सिद्धचारणसेवितम् ॥

tato'gacchatsa bhagavānuttarāmuttarāṃ diśam | himavantaṃ giriśreṣṭhaṃ siddhacāraṇasevitam

तब वे भगवान् ऋषि उत्तर से और उत्तर की ओर चलते हुए पर्वतश्रेष्ठ हिमालय पहुँचे, जहाँ सिद्ध और चारण विचरते हैं।

श्लोक 31 (13.50.31)

स गत्वा द्विजशार्दूलो हिमवन्तं महागिरिम् । अभ्यगच्छन्नदीं पुण्यां बाहुदां पुण्यदायिनीम् ॥

sa gatvā dvijaśārdūlo himavantaṃ mahāgirim | abhyagacchannadīṃ puṇyāṃ bāhudāṃ puṇyadāyinīm

वे द्विजश्रेष्ठ महान् पर्वत हिमालय पर पहुँचकर पुण्य देने वाली पवित्र नदी बाहुदा के पास आए।

श्लोक 32 (13.50.32)

अशोके विमले तीर्थे स्नात्वा वै तर्प्य देवताः । तत्र वासाय शयने कौशे सुखमुवास ह ॥

aśoke vimale tīrthe snātvā vai tarpya devatāḥ | tatra vāsāya śayane kauśe sukhamuvāsa ha

अशोक नामक निर्मल तीर्थ में स्नान करके और देवताओं का तर्पण करके उन्होंने वहीं निवास किया और कुश की शय्या पर सुख से सोए।

श्लोक 33 (13.50.33)

ततो रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरुत्थाय स द्विजः । स्नात्वा प्रादुश्चकाराग्निं हुत्वा चैवं विधानतः ॥

tato rātryāṃ vyatītāyāṃ prātarutthāya sa dvijaḥ | snātvā prāduścakārāgniṃ hutvā caivaṃ vidhānataḥ

रात बीतने पर प्रातःकाल उठकर उन ब्राह्मण ने स्नान किया, अग्नि प्रज्वलित की और विधिपूर्वक हवन किया।

श्लोक 34 (13.50.34)

रुद्राणीकूपमासाद्य ह्रदे तत्र समाश्वसत् । विश्रान्तश्च समुत्थाय कैलासमभितो ययौ ॥

rudrāṇīkūpamāsādya hrade tatra samāśvasat | viśrāntaśca samutthāya kailāsamabhito yayau

रुद्राणी-कूप पर पहुँचकर उन्होंने वहाँ के सरोवर पर विश्राम किया; फिर विश्राम करके उठे और कैलास की ओर चले।

श्लोक 35 (13.50.35)

सोऽपश्यत्काञ्चनद्वारं दीप्यमानमिव श्रिया । मन्दाकिनीं च नलिनीं धनदस्य महात्मनः ॥

so'paśyatkāñcanadvāraṃ dīpyamānamiva śriyā | mandākinīṃ ca nalinīṃ dhanadasya mahātmanaḥ

उन्होंने एक स्वर्णद्वार देखा, जो तेज से मानो दीप्त हो रहा था, और महात्मा धनद की कमलों वाली मन्दाकिनी वापी देखी।

श्लोक 36 (13.50.36)

अथ ते राक्षसाः सर्वे येऽभिरक्षन्ति पद्मिनीम् । प्रत्युत्थिता भगवन्तं माणिभद्रपुरोगमाः ॥

atha te rākṣasāḥ sarve ye'bhirakṣanti padminīm | pratyutthitā bhagavantaṃ māṇibhadrapurogamāḥ

तब जो राक्षस उस कमलिनी की रक्षा करते हैं, वे सब माणिभद्र को आगे करके उन भगवान् के स्वागत में उठ खड़े हुए।

श्लोक 37 (13.50.37)

स तान्प्रत्यर्चयामास राक्षसान्भीमविक्रमान् । निवेदयत मां क्षिप्रं धनदायेति चाब्रवीत् ॥

sa tānpratyarcayāmāsa rākṣasānbhīmavikramān | nivedayata māṃ kṣipraṃ dhanadāyeti cābravīt

उन्होंने उन भयंकर पराक्रमी राक्षसों का प्रत्युत्तर में सत्कार किया और कहा, 'धनद को शीघ्र मेरी सूचना दो।'

श्लोक 38 (13.50.38)

ते राक्षसास्तथा राजन्भगवन्तमथाब्रुवन् । असौ वैश्रवणो राजा स्वयमायाति तेऽन्तिकम् ॥

te rākṣasāstathā rājanbhagavantamathābruvan | asau vaiśravaṇo rājā svayamāyāti te'ntikam

तब, हे राजन्, उन राक्षसों ने भगवान् से कहा, 'ये राजा वैश्रवण स्वयं आपके पास आ रहे हैं।'

राक्षसा ऊचुः

श्लोक 39 (13.50.39)

विदितो भगवानस्य कार्यमागमनस्य यत् । पश्यैनं त्वं महाभागं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥

vidito bhagavānasya kāryamāgamanasya yat | paśyainaṃ tvaṃ mahābhāgaṃ jvalantamiva tejasā

भगवान् उनके परिचित हैं, और आपके आने का प्रयोजन भी उन्हें ज्ञात है। उन महाभाग को देखिए, जो तेज से मानो जल रहे हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 40 (13.50.40)

ततो वैश्रवणोऽभ्येत्य अष्टावक्रमनिन्दितम् । विधिवत्कुशलं पृष्ट्वा ततो ब्रह्मर्षिमब्रवीत् ॥

tato vaiśravaṇo'bhyetya aṣṭāvakramaninditam | vidhivatkuśalaṃ pṛṣṭvā tato brahmarṣimabravīt

तब वैश्रवण निन्दारहित अष्टावक्र के पास आए, विधिपूर्वक कुशल पूछा और फिर उन ब्रह्मर्षि से बोले।

वैश्रवण उवाच

श्लोक 41 (13.50.41)

सुखं प्राप्तो भवान्कच्चित्किंवा मत्तश्चिकीर्षति । ब्रूहि सर्वं करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि वै द्विज ॥

sukhaṃ prāpto bhavānkaccitkiṃvā mattaścikīrṣati | brūhi sarvaṃ kariṣyāmi yanmāṃ vakṣyasi vai dvija

आप सुखपूर्वक पहुँचे तो हैं? आप मुझसे क्या करवाना चाहते हैं? हे द्विज, सब कहिए; जो कुछ आप मुझसे कहेंगे, मैं करूँगा।

श्लोक 42 (13.50.42)

भवनं प्रविश त्वं मे यथाकामं द्विजोत्तम । सत्कृतः कृतकार्यश्च भवान्यास्यत्यविघ्नतः ॥

bhavanaṃ praviśa tvaṃ me yathākāmaṃ dvijottama | satkṛtaḥ kṛtakāryaśca bhavānyāsyatyavighnataḥ

हे द्विजश्रेष्ठ, आप जैसी इच्छा हो, मेरे भवन में प्रवेश कीजिए। सत्कार पाकर और कार्य सिद्ध करके आप निर्विघ्न जाएँगे।

भीष्म उवाच

श्लोक 43 (13.50.43)

प्राविशद्भवनं स्वं वै गृहीत्वा तं द्विजोत्तमम् । आसनं स्वं ददौ चैव पाद्यमर्घ्यं तथैव च ॥

prāviśadbhavanaṃ svaṃ vai gṛhītvā taṃ dvijottamam | āsanaṃ svaṃ dadau caiva pādyamarghyaṃ tathaiva ca

उन द्विजश्रेष्ठ को साथ लेकर वे अपने भवन में गए और उन्हें अपना आसन तथा पाद्य और अर्घ्य दिया।

श्लोक 44 (13.50.44)

अथोपविष्टयोस्तत्र माणिभद्रपुरोगमाः । निषेदुस्तत्र कौबेरा यक्षगन्धर्वकिन्नराः ॥

athopaviṣṭayostatra māṇibhadrapurogamāḥ | niṣedustatra kauberā yakṣagandharvakinnarāḥ

जब दोनों वहाँ बैठ गए, तब माणिभद्र को आगे करके कुबेर के सेवक—यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—भी बैठ गए।

श्लोक 45 (13.50.45)

ततस्तेषां निषण्णानां धनदो वाक्यमब्रवीत् । भवच्छन्दं समाज्ञाय नृत्येरन्नप्सरोगणाः ॥

tatasteṣāṃ niṣaṇṇānāṃ dhanado vākyamabravīt | bhavacchandaṃ samājñāya nṛtyerannapsarogaṇāḥ

तब उनके बैठ जाने पर धनद ने कहा, 'आपकी इच्छा जानकर अप्सराओं के समूह नृत्य करें।'

श्लोक 46 (13.50.46)

आतिथ्यं परमं कार्यं शुश्रूषा भवतस्तथा । संवर्ततामित्युवाच मुनिर्मधुरया गिरा ॥

ātithyaṃ paramaṃ kāryaṃ śuśrūṣā bhavatastathā | saṃvartatāmityuvāca munirmadhurayā girā

'अतिथि-सत्कार परम कर्तव्य है, और आपकी सेवा भी।' 'चलने दीजिए,' मुनि ने मधुर वाणी में कहा।

श्लोक 47 (13.50.47)

यथोर्वरा मिश्रकेशी रम्भा चैवोर्वशी तथा । अलम्बुसा घृताची च चित्रा चित्राङ्गदारुचिः ॥

yathorvarā miśrakeśī rambhā caivorvaśī tathā | alambusā ghṛtācī ca citrā citrāṅgadāruciḥ

उर्वरा, मिश्रकेशी, रम्भा और उर्वशी, अलम्बुषा, घृताची, चित्रा, चित्रांगदा और रुचि,—

श्लोक 48 (13.50.48)

मनोहरा सुकेशी च सुमुखी हासिनी प्रभा । विद्युता प्रशमी दान्ता विद्योता रतिरेव च ॥

manoharā sukeśī ca sumukhī hāsinī prabhā | vidyutā praśamī dāntā vidyotā ratireva ca

मनोहरा, सुकेशी, सुमुखी, हासिनी, प्रभा, विद्युता, प्रशमी, दान्ता, विद्योता और रति भी।

श्लोक 49 (13.50.49)

एताश्चान्याश्च वै बह्व्यः प्रनृत्ताप्सरसः शुभाः । अवादयंश्च गन्धर्वा वाद्यानि विविधानि च ॥

etāścānyāśca vai bahvyaḥ pranṛttāpsarasaḥ śubhāḥ | avādayaṃśca gandharvā vādyāni vividhāni ca

ये और अन्य बहुत-सी सुन्दर अप्सराएँ नाचीं, और गन्धर्व नाना प्रकार के वाद्य बजाने लगे।

श्लोक 50 (13.50.50)

अथ प्रवृत्ते गान्धर्वे दिव्ये ऋषिरुपाविशत् । दिव्यं संवत्सरं तत्रारमतैष महातपाः ॥

atha pravṛtte gāndharve divye ṛṣirupāviśat | divyaṃ saṃvatsaraṃ tatrāramataiṣa mahātapāḥ

जब दिव्य गान-वादन आरम्भ हुआ, तब ऋषि वहाँ बैठे; और वे महातपस्वी वहाँ एक दिव्य वर्ष तक रमते रहे।

श्लोक 51 (13.50.51)

ततो वैश्रवणो राजा भगवन्तमुवाच ह । साग्रः संवत्सरो यातो विप्रेह तव पश्यतः ॥

tato vaiśravaṇo rājā bhagavantamuvāca ha | sāgraḥ saṃvatsaro yāto vipreha tava paśyataḥ

तब राजा वैश्रवण ने भगवान् से कहा, 'हे विप्र, आपके देखते-देखते यहाँ पूरा वर्ष बीत गया।'

वैश्रवण उवाच

श्लोक 52 (13.50.52)

हार्योऽयं विषयो ब्रह्मन्गान्धर्वो नाम नामतः । छन्दतो वर्ततां विप्र यथा वदति वा भवान् ॥

hāryo'yaṃ viṣayo brahmangāndharvo nāma nāmataḥ | chandato vartatāṃ vipra yathā vadati vā bhavān

हे ब्रह्मन्, यह गान्धर्व नामक क्षेत्र मन को हरने वाला है। हे विप्र, यह आपकी इच्छा से चलता रहे, या जैसा आप कहें।

श्लोक 53 (13.50.53)

अतिथिः पूजनीयस्त्वमिदं च भवतो गृहम् । सर्वमाज्ञाप्यतामाशु परवन्तो वयं त्वयि ॥

atithiḥ pūjanīyastvamidaṃ ca bhavato gṛham | sarvamājñāpyatāmāśu paravanto vayaṃ tvayi

आप अतिथि हैं, पूजनीय हैं, और यह घर आपका है। सब कुछ शीघ्र आज्ञा कीजिए; हम आपके अधीन हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 54 (13.50.54)

अथ वैश्रवणं प्रीतो भगवान्प्रत्यभाषत । अर्चितोस्मि यथान्यायं गमिष्यामि धनेश्वर ॥

atha vaiśravaṇaṃ prīto bhagavānpratyabhāṣata | arcitosmi yathānyāyaṃ gamiṣyāmi dhaneśvara

तब प्रसन्न होकर भगवान् ने वैश्रवण को उत्तर दिया, 'मेरा यथोचित सत्कार हो गया है; हे धनेश्वर, अब मैं चलूँगा।'

अष्टावक्र उवाच

श्लोक 55 (13.50.55)

प्रीतोस्मि सदृशं चैव तव सर्वं धनाधिप । तव प्रसादाद्भगवन्महर्षेश्च महात्मनः । नियोगादद्य यास्यामि वृद्धिमानृद्धिमान्भव ॥

prītosmi sadṛśaṃ caiva tava sarvaṃ dhanādhipa | tava prasādādbhagavanmaharṣeśca mahātmanaḥ | niyogādadya yāsyāmi vṛddhimānṛddhimānbhava

हे धनाधिप, मैं प्रसन्न हूँ; आपका यह सब सत्कार योग्य ही है। हे भगवन्, आपकी कृपा से और महात्मा महर्षि की आज्ञा से मैं आज जाऊँगा। आप वृद्धि और समृद्धि से युक्त हों।

भीष्म उवाच

श्लोक 56 (13.50.56)

अथ निष्क्रम्य भगवान्प्रययावुत्तरामुखः । कैलासे शङ्करावासमभिवीक्ष्य प्रणम्य च ॥

atha niṣkramya bhagavānprayayāvuttarāmukhaḥ | kailāse śaṅkarāvāsamabhivīkṣya praṇamya ca

तब वे भगवान् बाहर निकले और उत्तर की ओर मुख करके चल पड़े; कैलास पर शंकर के निवास को देखकर और प्रणाम करके,—

श्लोक 57 (13.50.57)

गौरीशं शङ्करं दान्तं शरणागतवत्सलम् । गङ्गाधरं गोपतिगं गणावृतमकल्मषम् ॥

gaurīśaṃ śaṅkaraṃ dāntaṃ śaraṇāgatavatsalam | gaṅgādharaṃ gopatigaṃ gaṇāvṛtamakalmaṣam

गौरी के स्वामी, जितेन्द्रिय, शरणागतों पर स्नेह रखने वाले, गंगा को धारण करने वाले, वृषभ पर चलने वाले, गणों से घिरे और निष्कलंक शंकर को प्रणाम करके।

श्लोक 58 (13.50.58)

कैलासं मन्दरं हैमं सर्वाननुचचार ह । तानतीत्य महाशैलान्कैरातं स्थानमुत्तमम् ॥

kailāsaṃ mandaraṃ haimaṃ sarvānanucacāra ha | tānatītya mahāśailānkairātaṃ sthānamuttamam

वे कैलास, मन्दर और हेम पर्वत—इन सबको क्रम से पार करते गए; उन महान् पर्वतों को पार करके वे किरातों के उत्तम स्थान पर पहुँचे।

श्लोक 59 (13.50.59)

प्रदक्षिणं तथा चक्रे प्रयतः शिरसा नतः । धरणीमवतीर्याथ पूतात्माऽसौ तदाऽभवत् ॥

pradakṣiṇaṃ tathā cakre prayataḥ śirasā nataḥ | dharaṇīmavatīryātha pūtātmā'sau tadā'bhavat

संयमपूर्वक, सिर झुकाकर उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की; और पृथ्वी पर उतरकर वे उस समय शुद्ध अन्तःकरण वाले हो गए।

श्लोक 60 (13.50.60)

स तं प्रदक्षिणं कृत्वा निर्यातश्चोत्तरामुखः । समेन भूमिभागेन ययौ प्रीतिपुरस्कृतः ॥

sa taṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā niryātaścottarāmukhaḥ | samena bhūmibhāgena yayau prītipuraskṛtaḥ

उसकी प्रदक्षिणा करके वे उत्तर की ओर मुख किए निकले और प्रसन्नता से भरकर समतल भूमि पर चलते गए।

श्लोक 61 (13.50.61)

ततोऽपरं वनोद्देशं रमणीयमपश्यत । सर्वर्तुभिर्मूलफलैः पक्षिभिश्च समन्वितैः । रमणीयैर्वनोद्देशैस्तत्रतत्र विभूषितम् ॥

tato'paraṃ vanoddeśaṃ ramaṇīyamapaśyata | sarvartubhirmūlaphalaiḥ pakṣibhiśca samanvitaiḥ | ramaṇīyairvanoddeśaistatratatra vibhūṣitam

तब उन्होंने एक और रमणीय वन-प्रदेश देखा, जो सब ऋतुओं के कन्द-फलों और पक्षियों से भरा था और जगह-जगह मनोहर उपवनों से सजा था।

श्लोक 62 (13.50.62)

तत्राश्रमपदं दिव्यं ददर्श भगवानथ ॥

tatrāśramapadaṃ divyaṃ dadarśa bhagavānatha

वहाँ भगवान् ने एक दिव्य आश्रम देखा।

श्लोक 63 (13.50.63)

शैलांश्च विविधाकारान्काञ्चनान्रत्नभूषितान् । मणिभूमौ निविष्टाश्च पुष्करिण्यस्तथैव च ॥

śailāṃśca vividhākārānkāñcanānratnabhūṣitān | maṇibhūmau niviṣṭāśca puṣkariṇyastathaiva ca

उन्होंने अनेक आकारों वाले, सोने के और रत्नों से सजे पर्वत देखे, और मणियों की भूमि में बने कमल-सरोवर भी देखे।

श्लोक 64 (13.50.64)

अन्यान्यपि सुरम्याणि ददर्श सुबहून्यथ । भृशं तस्य मनो रमे महर्षेर्भावितात्मनः ॥

anyānyapi suramyāṇi dadarśa subahūnyatha | bhṛśaṃ tasya mano rame maharṣerbhāvitātmanaḥ

उन्होंने और भी बहुत-सी सुन्दर वस्तुएँ देखीं; उन शुद्धात्मा महर्षि का मन अत्यन्त प्रसन्न हुआ।

श्लोक 65 (13.50.65)

स तत्र काञ्चनं दिव्यं सर्वरत्नमयं गृहम् । ददर्शाद्भुतसङ्काशं धनदस्य गृहाद्वरम् ॥

sa tatra kāñcanaṃ divyaṃ sarvaratnamayaṃ gṛham | dadarśādbhutasaṅkāśaṃ dhanadasya gṛhādvaram

वहाँ उन्होंने सोने का एक दिव्य भवन देखा, जो पूर्णतः रत्नों से बना था, अद्भुत शोभा वाला था और धनद के भवन से भी उत्तम था।

श्लोक 66 (13.50.66)

महान्तो यत्र विविधा मणिकाञ्चनपर्वताः । विमानानि च रम्याणि रत्नानि विविधानि च ॥

mahānto yatra vividhā maṇikāñcanaparvatāḥ | vimānāni ca ramyāṇi ratnāni vividhāni ca

वहाँ मणि और सोने के अनेक विशाल पर्वत थे, सुन्दर विमान थे और नाना प्रकार के रत्न थे।

श्लोक 67 (13.50.67)

मन्दारपुष्पैः सङ्कीर्णां तथा मन्दाकिनीं नदीम् । स्वयम्प्रभाश्च मणयो वज्रैर्भूमिश्च भूषिता ॥

mandārapuṣpaiḥ saṅkīrṇāṃ tathā mandākinīṃ nadīm | svayamprabhāśca maṇayo vajrairbhūmiśca bhūṣitā

उन्होंने मन्दार के फूलों से भरी मन्दाकिनी नदी देखी; मणियाँ अपने आप चमक रही थीं और भूमि हीरों से सजी थी।

श्लोक 68 (13.50.68)

नानाविधैश्च भवनैर्विचित्रमणितोरणैः । मुक्ताजालविनिक्षिप्तैर्मणिरत्नविभूषितैः ॥

nānāvidhaiśca bhavanairvicitramaṇitoraṇaiḥ | muktājālavinikṣiptairmaṇiratnavibhūṣitaiḥ

वह स्थान नाना प्रकार के भवनों से घिरा था, जिनमें विचित्र मणिमय तोरण थे, जो मोतियों के जालों से ढके और मणि-रत्नों से सजे थे,—

श्लोक 69 (13.50.69)

मनोदृष्टिहरै रम्यैः सर्वतः संवृतं शुभैः । ऋषिभिश्चावृतं तत्र आश्रमं तं मनोहरम् ॥

manodṛṣṭiharai ramyaiḥ sarvataḥ saṃvṛtaṃ śubhaiḥ | ṛṣibhiścāvṛtaṃ tatra āśramaṃ taṃ manoharam

और चारों ओर मन तथा नेत्रों को हरने वाली सुन्दर, शुभ वस्तुओं से घिरा था, तथा वहाँ ऋषियों से भरा था—वह मनोहर आश्रम।

श्लोक 70 (13.50.70)

ततस्तस्याभवच्चिन्ता कुत्र वासो भवेदिति । अथ द्वारं समभितो गत्वा स्थित्वा ततोऽब्रवीत् ॥

tatastasyābhavaccintā kutra vāso bhavediti | atha dvāraṃ samabhito gatvā sthitvā tato'bravīt

तब उनके मन में चिन्ता हुई कि 'मेरा निवास कहाँ हो?' फिर द्वार के पास जाकर वे खड़े हुए और बोले,—

अष्टावक्र उवाच

श्लोक 71 (13.50.71)

अतिथिं समनुप्राप्तमभिजानन्तु येऽत्र वै ॥

atithiṃ samanuprāptamabhijānantu ye'tra vai

'जो लोग यहाँ रहते हैं, वे जान लें कि एक अतिथि आया है।'

भीष्म उवाच

श्लोक 72 (13.50.72)

अथ कन्याः परिवृता गृहात्तस्माद्विनिर्गताः । नानारूपाः सप्त विभो कन्याः सर्वा मनोहराः ॥

atha kanyāḥ parivṛtā gṛhāttasmādvinirgatāḥ | nānārūpāḥ sapta vibho kanyāḥ sarvā manoharāḥ

तब उस भवन से कन्याओं का एक समूह बाहर निकला—हे विभो, सात कन्याएँ, नाना रूपों वाली और सब की सब मनोहर।

श्लोक 73 (13.50.73)

यांयामपश्यत्कन्यां वै सासा तस्य मनोऽहरत् । न च शक्तो वारयितुं मनोऽस्याथावसीदति । ततो धृतिः समुत्पन्ना तस्य विप्रस्य धीमतः ॥

yāṃyāmapaśyatkanyāṃ vai sāsā tasya mano'harat | na ca śakto vārayituṃ mano'syāthāvasīdati | tato dhṛtiḥ samutpannā tasya viprasya dhīmataḥ

वे जिस-जिस कन्या को देखते, वही उनका मन हर लेती। वे उसे रोक न पाए और उनका मन डूबने लगा। तब उन बुद्धिमान ब्राह्मण में धैर्य उत्पन्न हुआ।

श्लोक 74 (13.50.74)

अथ तं प्रमदाः प्राहुर्भगवान्प्रविशत्विति । स च तासां सुरूपेण तस्यैव भवनस्य च । कौतूहलं समाविष्टः प्रविवेश गृहं द्विजः ॥

atha taṃ pramadāḥ prāhurbhagavānpraviśatviti | sa ca tāsāṃ surūpeṇa tasyaiva bhavanasya ca | kautūhalaṃ samāviṣṭaḥ praviveśa gṛhaṃ dvijaḥ

तब उन युवतियों ने उनसे कहा, 'भगवान् भीतर पधारें।' और उनके सुन्दर रूप तथा उस भवन के कारण कौतूहल से भरकर वे ब्राह्मण भीतर गए।

श्लोक 75 (13.50.75)

तत्रापश्यज्जरायुक्तामरजोम्बरधारिणीम् । वृद्धां पर्यङ्कमासीनां सर्वाभरणभूषिताम् ॥

tatrāpaśyajjarāyuktāmarajombaradhāriṇīm | vṛddhāṃ paryaṅkamāsīnāṃ sarvābharaṇabhūṣitām

वहाँ उन्होंने एक वृद्धा स्त्री को देखा, जो बुढ़ापे से जर्जर थी, निर्मल वस्त्र पहने थी, पलंग पर बैठी थी और सब आभूषणों से सजी थी।

श्लोक 76 (13.50.76)

स्वस्तीति तेन चैवोक्ता सा स्त्री प्रत्यवदत्तदा । प्रत्युत्थाय च तं विप्रमास्यतामित्युवाच ह ॥

svastīti tena caivoktā sā strī pratyavadattadā | pratyutthāya ca taṃ vipramāsyatāmityuvāca ha

उन्होंने 'कल्याण हो' कहा, और उस स्त्री ने उन्हें उत्तर दिया; उन ब्राह्मण के सम्मान में उठकर उसने कहा, 'बैठिए।'

अष्टावक्र उवाच

श्लोक 77 (13.50.77)

सर्वाः स्वानालयान्यान्तु एका मामुपतिष्ठतु । प्रज्ञाता या प्रशान्ता या शेषा गच्छन्तु च्छन्दतः ॥

sarvāḥ svānālayānyāntu ekā māmupatiṣṭhatu | prajñātā yā praśāntā yā śeṣā gacchantu cchandataḥ

ये सब अपने-अपने निवासों को चली जाएँ, और केवल एक मेरी सेवा में रहे—वही जो ज्ञानवती और शान्त है। बाकी अपनी इच्छा से जाएँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 78 (13.50.78)

ततः प्रदक्षिणीकृत्य कन्यास्तास्तमृषिं तदा । निश्चक्रमुर्गृहात्तस्मात्सा वृद्धाऽथ व्यतिष्ठत । तया सम्पूजितस्तत्र शयने चापि निर्मले ॥

tataḥ pradakṣiṇīkṛtya kanyāstāstamṛṣiṃ tadā | niścakramurgṛhāttasmātsā vṛddhā'tha vyatiṣṭhata | tayā sampūjitastatra śayane cāpi nirmale

तब वे कन्याएँ ऋषि की प्रदक्षिणा करके उस भवन से बाहर चली गईं; वह वृद्धा वहीं रह गई। उसने वहाँ उनका सत्कार किया, और वे एक निर्मल शय्या पर लेटे।

श्लोक 79 (13.50.79)

अथ तां संविशन्प्राह शयने भास्वरे तदा । त्वयाऽपि सुप्यतां भद्रे रजनी ह्यतिवर्तते ॥

atha tāṃ saṃviśanprāha śayane bhāsvare tadā | tvayā'pi supyatāṃ bhadre rajanī hyativartate

फिर तेजस्वी शय्या पर लेटते हुए उन्होंने उससे कहा, 'हे भद्रे, तुम भी सो जाओ; रात बीत रही है।'

श्लोक 80 (13.50.80)

संलापात्तेन विप्रेण तथा सा तत्र भाषिता । द्वितीये शयने दिव्ये संविवेश महाप्रभे ॥

saṃlāpāttena vipreṇa tathā sā tatra bhāṣitā | dvitīye śayane divye saṃviveśa mahāprabhe

उन ब्राह्मण के इस प्रकार कहने पर वह दूसरी दिव्य और देदीप्यमान शय्या पर लेट गई।

श्लोक 81 (13.50.81)

अथ सा वेपमानाङ्गी निमित्तं शीतजं तदा । व्यपदिश्य महर्षेर्वै शयनं व्यवरोहत ॥

atha sā vepamānāṅgī nimittaṃ śītajaṃ tadā | vyapadiśya maharṣervai śayanaṃ vyavarohata

तब काँपते अंगों वाली वह स्त्री शीत का बहाना करके अपनी शय्या छोड़कर महर्षि की शय्या पर आ गई।

श्लोक 82 (13.50.82)

स्वागतेनागतां तां तु भगवानभ्यभाषत । सा जुगूह भुजाभ्यां तु ऋषिं प्रीत्या नरर्षभ ॥

svāgatenāgatāṃ tāṃ tu bhagavānabhyabhāṣata | sā jugūha bhujābhyāṃ tu ṛṣiṃ prītyā nararṣabha

उसके आने पर भगवान् ने 'स्वागत है' कहकर उससे बात की, और हे नरश्रेष्ठ, उसने प्रेम से दोनों भुजाओं में ऋषि को भर लिया।

श्लोक 83 (13.50.83)

निर्विकारमृषिं चापि काष्ठकुड्योपमं तदा । दुखिता प्रेक्ष्य सञ्जल्पमकार्षीदृषिणा सह ॥

nirvikāramṛṣiṃ cāpi kāṣṭhakuḍyopamaṃ tadā | dukhitā prekṣya sañjalpamakārṣīdṛṣiṇā saha

ऋषि को काठ या दीवार के समान निर्विकार देखकर वह दुःखी हुई और उनसे बातचीत करने लगी।

स्त्र्युवाच

श्लोक 84 (13.50.84)

ब्रह्मन्नकामकारोऽस्ति स्त्रीणां पुरुषतो धृतिः । कामेन मोहिता चाहं त्वां भजन्तीं भजस्व माम् ॥

brahmannakāmakāro'sti strīṇāṃ puruṣato dhṛtiḥ | kāmena mohitā cāhaṃ tvāṃ bhajantīṃ bhajasva mām

हे ब्राह्मण, पुरुष के सामने स्त्रियों में अपनी कोई स्थिरता नहीं रहती। मैं काम से मोहित हूँ; मैं आपकी कामना करती हूँ, आप भी मुझे स्वीकार करें।

श्लोक 85 (13.50.85)

प्रहृष्टो भव विप्रर्षे समागच्छ मया सह । उपगूह च मां विप्र कामार्ताऽहं भृशं त्वयि ॥

prahṛṣṭo bhava viprarṣe samāgaccha mayā saha | upagūha ca māṃ vipra kāmārtā'haṃ bhṛśaṃ tvayi

हे विप्रर्षि, प्रसन्न होइए और मेरे पास आइए। हे विप्र, मुझे आलिंगन कीजिए; मैं आपके लिए काम से अत्यन्त पीड़ित हूँ।

श्लोक 86 (13.50.86)

एतद्धि तव धर्मात्मंस्तपसः पूज्यते फलम् । प्रार्थितं दर्शनादेव भजमानां भजस्व माम् ॥

etaddhi tava dharmātmaṃstapasaḥ pūjyate phalam | prārthitaṃ darśanādeva bhajamānāṃ bhajasva mām

हे धर्मात्मन्, यही आपके तप का आदरणीय फल है: देखते ही मैंने आपकी कामना की। मैं आपको चाहती हूँ; मुझे स्वीकार कीजिए।

श्लोक 87 (13.50.87)

सद्म चेदं धनं सर्वं यच्चान्यदपि पश्यसि । प्रभुस्त्वं भव सर्वत्र मयि चैव न संशयः ॥

sadma cedaṃ dhanaṃ sarvaṃ yaccānyadapi paśyasi | prabhustvaṃ bhava sarvatra mayi caiva na saṃśayaḥ

यह भवन, यह धन और जो कुछ और भी आप देखते हैं—उस सबके और मेरे भी आप सर्वत्र स्वामी हों; इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 88 (13.50.88)

सर्वान्कामान्विधास्यामि रमस्व सहितो मया । रमणीये वने विप्र सर्वकामफलप्रदे ॥

sarvānkāmānvidhāsyāmi ramasva sahito mayā | ramaṇīye vane vipra sarvakāmaphalaprade

मैं सब कामनाएँ पूरी करूँगी; हे विप्र, इस रमणीय वन में, जो सब कामनाओं का फल देता है, मेरे साथ आनन्द कीजिए।

श्लोक 89 (13.50.89)

त्वद्वशाऽहं भविष्यामि रंस्यसे च मया सह । सर्वान्कामानुपाश्नीमो ये दिव्या ये च मानुषाः ॥

tvadvaśā'haṃ bhaviṣyāmi raṃsyase ca mayā saha | sarvānkāmānupāśnīmo ye divyā ye ca mānuṣāḥ

मैं आपके वश में रहूँगी और आप मेरे साथ रमण करेंगे; हम दोनों सब भोग भोगेंगे, जो दिव्य हैं और जो मानुष हैं।

श्लोक 90 (13.50.90)

नातः परं हि नारीणां विद्यते च कदाचन । यथा पुरुषसंसर्गः परमेतद्धि नः फलम् ॥

nātaḥ paraṃ hi nārīṇāṃ vidyate ca kadācana | yathā puruṣasaṃsargaḥ parametaddhi naḥ phalam

स्त्रियों के लिए कभी भी पुरुष-संसर्ग से बढ़कर कुछ नहीं है; वही हमारा परम फल है।

श्लोक 91 (13.50.91)

आत्मच्छन्देन वर्तन्ते नार्यो मन्मथचोदिताः । न च दह्यन्ति गच्छन्त्यः सुतप्तैरपि पांसुभिः ॥

ātmacchandena vartante nāryo manmathacoditāḥ | na ca dahyanti gacchantyaḥ sutaptairapi pāṃsubhiḥ

काम से प्रेरित स्त्रियाँ अपनी ही इच्छा से चलती हैं, और खूब तपी हुई धूल पर चलती हुई भी जलती नहीं।

अष्टावक्र उवाच

श्लोक 92 (13.50.92)

परदारानहं भद्रे न गच्छेयं कथञ्चन । दूषितं धर्मशास्त्रज्ञैः परदाराभिमर्शनम् ॥

paradārānahaṃ bhadre na gaccheyaṃ kathañcana | dūṣitaṃ dharmaśāstrajñaiḥ paradārābhimarśanam

हे भद्रे, मैं किसी भी प्रकार परस्त्री के पास नहीं जाऊँगा। धर्मशास्त्र के जानने वालों ने परस्त्री-स्पर्श की निन्दा की है।

श्लोक 93 (13.50.93)

शुद्धक्षेत्रे ब्रह्महत्याप्रायश्चित्तमथोच्यते । पुनश्च पातकं दृष्टं विप्रक्षेत्रे विशेषतः ॥

śuddhakṣetre brahmahatyāprāyaścittamathocyate | punaśca pātakaṃ dṛṣṭaṃ viprakṣetre viśeṣataḥ

कहते हैं कि शुद्ध क्षेत्र में ब्रह्महत्या के समान प्रायश्चित्त बताया जाता है; और फिर पातक भी देखा गया है, विशेषतः ब्राह्मण के क्षेत्र में।

श्लोक 94 (13.50.94)

भद्रे निर्वेष्टुकामोऽहं तत्रावकिरणं मम । प्रायश्चित्तं महदतो दारग्रहणपूर्वकम् ॥

bhadre nirveṣṭukāmo'haṃ tatrāvakiraṇaṃ mama | prāyaścittaṃ mahadato dāragrahaṇapūrvakam

हे भद्रे, मैं विवाह करना चाहता हूँ; उस दशा में 'अवकिरण' (व्रतभंग) मेरा होगा। इसलिए बड़ा प्रायश्चित्त वही है जो पत्नी-ग्रहण के बाद होता है।

श्लोक 95 (13.50.95)

बीजं न शुद्ध्यते वोढुरन्यथाऽकृतनिष्कृतेः । मातृतः पितृतः शुद्धो ज्ञेयः पुत्रो यथार्थतः ॥

bījaṃ na śuddhyate voḍhuranyathā'kṛtaniṣkṛteḥ | mātṛtaḥ pitṛtaḥ śuddho jñeyaḥ putro yathārthataḥ

अन्यथा, यदि पति ने प्रायश्चित्त न किया हो, तो उसका बीज शुद्ध नहीं होता। पुत्र वास्तव में तभी शुद्ध जाना जाता है जब वह माता और पिता, दोनों की ओर से शुद्ध हो।

श्लोक 96 (13.50.96)

विषयेष्वनभिज्ञोऽहं धर्मार्थं किल सन्ततिः । एवं लोकान्गमिष्यामि पुत्रैरिति न संशयः ॥

viṣayeṣvanabhijño'haṃ dharmārthaṃ kila santatiḥ | evaṃ lokāngamiṣyāmi putrairiti na saṃśayaḥ

मैं विषय-भोगों में अनभिज्ञ हूँ; सन्तान धर्म के लिए ही है। इसी प्रकार पुत्रों के द्वारा मैं लोकों को प्राप्त करूँगा, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 97 (13.50.97)

भद्रे धर्मं विजानीहि ज्ञात्वा चोपरमस्व ह ॥

bhadre dharmaṃ vijānīhi jñātvā coparamasva ha

हे भद्रे, धर्म को समझो, और समझकर रुक जाओ।

स्त्र्युवाच

श्लोक 98 (13.50.98)

नानिलोऽग्निर्न वरुणो न चान्ये त्रिदशा द्विज । प्रियाः स्त्रीणां यथा कामो रतिशीला हि योषितः ॥

nānilo'gnirna varuṇo na cānye tridaśā dvija | priyāḥ strīṇāṃ yathā kāmo ratiśīlā hi yoṣitaḥ

हे द्विज, न वायु, न अग्नि, न वरुण और न अन्य देवता स्त्रियों को उतने प्रिय हैं जितना काम; क्योंकि स्त्रियाँ रति में रमने वाली होती हैं।

श्लोक 99 (13.50.99)

सहस्रे किल नारीणां प्राप्येतैका कदाचन । तथा शतसहस्रेषु यदि काचित्पतिव्रता ॥

sahasre kila nārīṇāṃ prāpyetaikā kadācana | tathā śatasahasreṣu yadi kācitpativratā

कहते हैं, हज़ार स्त्रियों में कभी एक ही मिल पाती है; और लाख में भी, यदि कोई पतिव्रता हो।

श्लोक 100 (13.50.100)

नैता जानन्ति पितरं न कुलं न च मातरम् । न भ्रातॄन्न च भर्तारं न च पुत्रान्न देवरान् ॥

naitā jānanti pitaraṃ na kulaṃ na ca mātaram | na bhrātṝnna ca bhartāraṃ na ca putrānna devarān

वे न पिता को जानती हैं, न कुल को, न माता को, न भाइयों को, न पति को, न पुत्रों को और न देवरों को।

श्लोक 101 (13.50.101)

लीलायन्त्यः कुलं घ्नन्ति कूलानीव सरिद्वराः । दोषान्सर्वाश्च मत्वाऽऽशु प्रजापतिरभाषत ॥

līlāyantyaḥ kulaṃ ghnanti kūlānīva saridvarāḥ | doṣānsarvāśca matvā''śu prajāpatirabhāṣata

अपनी लीला में वे अपने कुल का नाश कर देती हैं, जैसे बड़ी नदियाँ अपने किनारों को तोड़ देती हैं। उनके सब दोषों को देखकर प्रजापति ने शीघ्र ही यह कहा।

भीष्म उवाच

श्लोक 102 (13.50.102)

ततः स ऋषिरेकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत । आस्यतांरुचितश्छन्दः किञ्च कार्यं ब्रवीहि मे ॥

tataḥ sa ṛṣirekāgrastāṃ striyaṃ pratyabhāṣata | āsyatāṃrucitaśchandaḥ kiñca kāryaṃ bravīhi me

तब एकाग्र चित्त ऋषि ने उस स्त्री को उत्तर दिया, 'बैठिए; आपकी इच्छा जैसी रुचे वैसी हो। और बताइए, क्या करना है।'

श्लोक 103 (13.50.103)

सा स्त्री प्रोवाच भगवन्द्रक्ष्यसे देशकालतः । वस तावन्महाभाग कृतकृत्यो भविष्यसि ॥

sā strī provāca bhagavandrakṣyase deśakālataḥ | vasa tāvanmahābhāga kṛtakṛtyo bhaviṣyasi

उस स्त्री ने कहा, 'भगवन्, उचित देश और काल आने पर आप देखेंगे। हे महाभाग, अभी रहिए; आप कृतकृत्य हो जाएँगे।'

श्लोक 104 (13.50.104)

ब्रह्मर्षिस्तामथोवाच स तथेति युधिष्ठिर । वत्स्येऽहं यावदुत्साहो भवत्या नात्र संशयः ॥

brahmarṣistāmathovāca sa tatheti yudhiṣṭhira | vatsye'haṃ yāvadutsāho bhavatyā nātra saṃśayaḥ

हे युधिष्ठिर, तब ब्रह्मर्षि ने उससे कहा, 'ऐसा ही हो। जब तक आपकी इच्छा रहेगी, मैं रहूँगा; इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 105 (13.50.105)

अथर्षिरभिसम्प्रेक्ष्य स्त्रियं तां जरयाऽर्दिताम् । चिन्तां परमिकां भेजे सन्तप्त इव चाभवत् ॥

atharṣirabhisamprekṣya striyaṃ tāṃ jarayā'rditām | cintāṃ paramikāṃ bheje santapta iva cābhavat

तब ऋषि बुढ़ापे से पीड़ित उस स्त्री को देखकर गहरी चिन्ता में पड़ गए और मानो सन्तप्त हो उठे।

श्लोक 106 (13.50.106)

यद्यदङ्गं हि सोऽपश्यत्तस्या विप्रर्षभस्तदा । नारमत्तत्रतत्रास्य दृष्टी रूपविरागिता ॥

yadyadaṅgaṃ hi so'paśyattasyā viprarṣabhastadā | nāramattatratatrāsya dṛṣṭī rūpavirāgitā

उन विप्रश्रेष्ठ की दृष्टि उसके जिस-जिस अंग पर जाती, वहाँ-वहाँ रमती नहीं थी, क्योंकि उसके रूप से उन्हें विराग हो गया था।

श्लोक 107 (13.50.107)

देवतेयं गृहस्यास्य शापात्किंनु विरूपिता । अस्याश्च कारणं वेत्तुं न युक्तं सहसा मया ॥

devateyaṃ gṛhasyāsya śāpātkiṃnu virūpitā | asyāśca kāraṇaṃ vettuṃ na yuktaṃ sahasā mayā

'यह अवश्य इस घर की देवी है, जो किसी शाप से कुरूप हो गई है। और इसका कारण एकाएक जानना मेरे लिए उचित नहीं।'

श्लोक 108 (13.50.108)

इति चिन्ताविषक्तस्य तमर्थं ज्ञातुमिच्छतः । व्यगमद्रात्रिशेषः स मनसा व्याकुलेन तु ॥

iti cintāviṣaktasya tamarthaṃ jñātumicchataḥ | vyagamadrātriśeṣaḥ sa manasā vyākulena tu

इस प्रकार चिन्ता में डूबे हुए और उस बात को जानने की इच्छा करते हुए उनकी रात का शेष भाग व्याकुल मन से बीत गया।

श्लोक 109 (13.50.109)

अथ सा स्त्री तथोवाच भगवन्पश्य वै रवेः । रूपं सन्ध्याभ्रसंरक्तं किमुपस्थाप्यतां तव ॥

atha sā strī tathovāca bhagavanpaśya vai raveḥ | rūpaṃ sandhyābhrasaṃraktaṃ kimupasthāpyatāṃ tava

तब उस स्त्री ने कहा, 'भगवन्, सूर्य का रूप देखिए, जो सन्ध्या के बादलों से लाल हो गया है। आपके सामने क्या प्रस्तुत किया जाए?'

श्लोक 110 (13.50.110)

स उवाच ततस्तां स्त्रीं स्नानोदकमिहानय । उपासिष्ये ततः सन्ध्यां वाग्यतो नियतेन्द्रियः ॥

sa uvāca tatastāṃ strīṃ snānodakamihānaya | upāsiṣye tataḥ sandhyāṃ vāgyato niyatendriyaḥ

उन्होंने उस स्त्री से कहा, 'यहाँ स्नान का जल ले आओ। तब मैं मौन और संयतेन्द्रिय होकर सन्ध्या-उपासना करूँगा।'

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