अनुशासन पर्व · अध्याय 53
अन्य योनियों से उत्पन्न ऋषि
युधिष्ठिर पूछते हैं कि वैश्य या शूद्र योनि से उत्पन्न ऋषि ब्रह्मर्षि कैसे कहलाते हैं। भीष्म उत्तर देते हैं कि संसार महान् तपस्वियों को ही प्रमाण मानता है; वे बताते हैं कि प्रत्येक वर्ण की स्त्री के लिए कौन-से पति विहित हैं, और व्यास, ऋश्यशृङ्ग, पराशर, द्रोण, धृष्टद्युम्न तथा मान्धाता आदि विलक्षण जन्म वाले ऋषियों और राजाओं की सूची देते हैं। अन्त में मनु का श्लोक कहते हैं कि ऋषियों, नदियों और साधुओं का उद्गम नहीं खोजना चाहिए, क्योंकि महात्माओं में तेज उसी प्रकार है जैसे सब वस्तुओं में अग्नि।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.53.1)
वैश्ययोन्यां समुत्पन्नाः शूद्रयोन्यां तथैव च । ब्रह्मर्षय इति प्रोक्ताः पुराणा द्विजसत्तमाः ॥
vaiśyayonyāṃ samutpannāḥ śūdrayonyāṃ tathaiva ca | brahmarṣaya iti proktāḥ purāṇā dvijasattamāḥ
कहा जाता है कि पूर्वकाल में वैश्य-योनि और शूद्र-योनि से उत्पन्न हुए द्विजश्रेष्ठ भी ब्रह्मर्षि कहलाए।
श्लोक 2 (13.53.2)
कथमेतन्महाराज तत्त्वं शंसितुमर्हसि । विरुद्धमिह पश्यामि वियोनौ ब्राह्मणो भवेत् ॥
kathametanmahārāja tattvaṃ śaṃsitumarhasi | viruddhamiha paśyāmi viyonau brāhmaṇo bhavet
हे महाराज, यह कैसे हो सकता है? आप इसका तत्त्व बताने योग्य हैं। मुझे यहाँ विरोध दिखाई देता है: दूसरी योनि में उत्पन्न व्यक्ति ब्राह्मण कैसे हो सकता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.53.3)
अलं कौतूहलेनात्र निबोध त्वं युधिष्ठिर । शुभेतरं शुभं वाऽपि न चिन्तयितुमर्हसि ॥
alaṃ kautūhalenātra nibodha tvaṃ yudhiṣṭhira | śubhetaraṃ śubhaṃ vā'pi na cintayitumarhasi
हे युधिष्ठिर, इस विषय में कौतूहल रहने दो, सुनो। यहाँ शुभ-अशुभ का विचार करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।
श्लोक 4 (13.53.4)
ईशन्त्यात्मन इत्येते गतिश्चैषां न सञ्जते । ब्रह्मभूयांस इत्येव ऋषयः श्रुतिचोदिताः ॥
īśantyātmana ityete gatiścaiṣāṃ na sañjate | brahmabhūyāṃsa ityeva ṛṣayaḥ śruticoditāḥ
ये ऋषि अपने स्वामी हैं और इनकी गति कहीं रुकती नहीं। श्रुति से प्रेरित ऋषि इन्हें बहुत कुछ ब्रह्मभाव को प्राप्त हुआ बताते हैं।
श्लोक 5 (13.53.5)
निन्द्या न चैते राजेन्द्र प्रमाणं हि प्रमाणिनाम् । लोकोऽनुमन्यते चैतान्प्रमाणं ह्यत्र वै तपः ॥
nindyā na caite rājendra pramāṇaṃ hi pramāṇinām | loko'numanyate caitānpramāṇaṃ hyatra vai tapaḥ
हे राजेन्द्र, इनकी निन्दा नहीं करनी चाहिए; ये प्रमाण माने जाने वालों के भी प्रमाण हैं। संसार इन्हें मान्य करता है, क्योंकि इस विषय में तप ही प्रमाण है।
श्लोक 6 (13.53.6)
एवं महात्मभिस्तात तपोज्ञानसमन्वितैः । प्रवर्तितानि कार्याणि प्रमाणान्येव सत्तम ॥
evaṃ mahātmabhistāta tapojñānasamanvitaiḥ | pravartitāni kāryāṇi pramāṇānyeva sattama
हे तात, इसी प्रकार तप और ज्ञान से सम्पन्न महात्माओं द्वारा चलाए गए कार्य स्वयं प्रमाण ही हैं, हे सत्तम।
श्लोक 7 (13.53.7)
भार्याश्चतस्रो राजेन्द्र ब्राह्मणस्य स्वधर्मतः । ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्रा च भरतर्षभ ॥
bhāryāścatasro rājendra brāhmaṇasya svadharmataḥ | brāhmaṇī kṣatriyā vaiśyā śūdrā ca bharatarṣabha
हे राजेन्द्र, ब्राह्मण के लिए अपने धर्म के अनुसार चार पत्नियाँ हैं: ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 8 (13.53.8)
राज्ञां तु क्षत्रिया वैश्या शूद्रा च भरतर्षभ । वैश्यस्य वैश्या विहिता शूद्रा च भरतर्षभ ॥
rājñāṃ tu kṣatriyā vaiśyā śūdrā ca bharatarṣabha | vaiśyasya vaiśyā vihitā śūdrā ca bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, राजाओं के लिए क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा हैं। वैश्य के लिए वैश्या विहित है और शूद्रा भी, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 9 (13.53.9)
शूद्रस्यैका स्मृता भार्या प्रतिलोमे तु सङ्करः । शूद्रायास्तु नरश्रेष्ठ चत्वारः पतयः स्मृताः ॥
śūdrasyaikā smṛtā bhāryā pratilome tu saṅkaraḥ | śūdrāyāstu naraśreṣṭha catvāraḥ patayaḥ smṛtāḥ
शूद्र के लिए केवल एक पत्नी बताई गई है; क्रम उलटने पर वर्णसंकर होता है। परन्तु हे नरश्रेष्ठ, शूद्रा के चार पति बताए गए हैं।
श्लोक 10 (13.53.10)
वर्णोत्तमायास्तु पतिः सवर्णस्त्वेक एव सः । द्वौ क्षत्रियाया विहितौ ब्राह्मणः क्षत्रियस्तथा ॥
varṇottamāyāstu patiḥ savarṇastveka eva saḥ | dvau kṣatriyāyā vihitau brāhmaṇaḥ kṣatriyastathā
सर्वोच्च वर्ण की स्त्री का केवल एक ही पति होता है, अपने ही वर्ण का। क्षत्रिय स्त्री के लिए दो विहित हैं: ब्राह्मण और क्षत्रिय।
श्लोक 11 (13.53.11)
वैश्यायास्तु नरश्रेष्ठ विहिताः पतयस्त्रयः । सवर्णः क्षत्रियश्चैव ब्राह्मणश्च विशाम्पते ॥
vaiśyāyāstu naraśreṣṭha vihitāḥ patayastrayaḥ | savarṇaḥ kṣatriyaścaiva brāhmaṇaśca viśāmpate
हे नरश्रेष्ठ, वैश्य स्त्री के लिए तीन पति विहित हैं: अपने वर्ण का, क्षत्रिय और ब्राह्मण, हे विशाम्पते।
श्लोक 12 (13.53.12)
एवंविधिमनुस्मृत्य ततस्ते ऋषिभिः पुरा । उत्पादिता महात्मानः पुत्रा ब्रह्मर्षयः पुरा ॥
evaṃvidhimanusmṛtya tataste ṛṣibhiḥ purā | utpāditā mahātmānaḥ putrā brahmarṣayaḥ purā
इस प्रकार के विधान का स्मरण करके पूर्वकाल में ऋषियों ने महात्मा पुत्रों, ब्रह्मर्षियों को उत्पन्न किया।
श्लोक 13 (13.53.13)
पुराणाभ्यामृषिभ्यां तु मित्रेण वरुणेन च । वसिष्ठोऽथ तथाऽगस्त्यो बर्हिषव्यस्तथैव च ॥
purāṇābhyāmṛṣibhyāṃ tu mitreṇa varuṇena ca | vasiṣṭho'tha tathā'gastyo barhiṣavyastathaiva ca
मित्र और वरुण, इन दो प्राचीन ऋषियों से वसिष्ठ, फिर अगस्त्य और इसी प्रकार बर्हिषव्य उत्पन्न हुए।
श्लोक 14 (13.53.14)
कक्षीवानार्ष्टिषेणश्च पुरुषः कक्ष एव च । मामतेयस्य वै पुत्रा गौतमस्यात्मजाः स्मृताः ॥
kakṣīvānārṣṭiṣeṇaśca puruṣaḥ kakṣa eva ca | māmateyasya vai putrā gautamasyātmajāḥ smṛtāḥ
कक्षीवान्, आर्ष्टिषेण, पुरुष और कक्ष, ये मामतेय के पुत्र हैं, जो गौतम की सन्तान माने गए हैं।
श्लोक 15 (13.53.15)
वत्सप्रियश्च भगवान्स्थूलरश्मिस्तथाक्षणिः । गौतमस्यैव तनया ये दास्यां जनिता ह्युत ॥
vatsapriyaśca bhagavānsthūlaraśmistathākṣaṇiḥ | gautamasyaiva tanayā ye dāsyāṃ janitā hyuta
पूज्य वत्सप्रिय, स्थूलरश्मि और अक्षणि गौतम के ही पुत्र हैं, जो उनकी दासी से उत्पन्न हुए।
श्लोक 16 (13.53.16)
कपिञ्जलादो ब्रह्मर्षिश्चाण्डाल्यामुदपद्यत । वैनतेयस्तथा पक्षी तुर्यायां च वसिष्ठतः ॥
kapiñjalādo brahmarṣiścāṇḍālyāmudapadyata | vainateyastathā pakṣī turyāyāṃ ca vasiṣṭhataḥ
ब्रह्मर्षि कपिञ्जलाद चाण्डाली से उत्पन्न हुए; और वैनतेय नामक पक्षी वसिष्ठ से चतुर्थ वर्ण की स्त्री में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 17 (13.53.17)
प्रसादाच्च वसिष्ठस्य शुल्काभ्युपगमेन च । अदृश्यन्त्याः पिता वैश्यो नाम्ना चित्रमुखः पुरा । ब्राह्मणत्वमनुप्राप्तो ब्रह्मर्षित्वं च कौरव ॥
prasādācca vasiṣṭhasya śulkābhyupagamena ca | adṛśyantyāḥ pitā vaiśyo nāmnā citramukhaḥ purā | brāhmaṇatvamanuprāpto brahmarṣitvaṃ ca kaurava
वसिष्ठ की कृपा से और शुल्क स्वीकार किए जाने से अदृश्यन्ती के पिता वैश्य चित्रमुख ने, हे कौरव, पूर्वकाल में ब्राह्मणत्व और ब्रह्मर्षित्व प्राप्त किया।
श्लोक 18 (13.53.18)
वैश्यश्चित्रमुखः कन्यां वसिष्ठतनयस्य वै । शुभां प्रादाद्यतो जातो ब्रह्मर्षिस्तु पराशरः ॥
vaiśyaścitramukhaḥ kanyāṃ vasiṣṭhatanayasya vai | śubhāṃ prādādyato jāto brahmarṣistu parāśaraḥ
वैश्य चित्रमुख ने अपनी शुभ कन्या वसिष्ठ के पुत्र को दी, जिससे ब्रह्मर्षि पराशर उत्पन्न हुए।
श्लोक 19 (13.53.19)
तथैव दाशकन्यायां सत्यवत्यां महानृषिः । पराशरात्प्रसूतश्च व्यासो योगमयो मुनिः ॥
tathaiva dāśakanyāyāṃ satyavatyāṃ mahānṛṣiḥ | parāśarātprasūtaśca vyāso yogamayo muniḥ
इसी प्रकार पराशर से दाशकन्या सत्यवती में महर्षि व्यास उत्पन्न हुए, जो योगमय मुनि थे।
श्लोक 20 (13.53.20)
विभण्डकस्य मृग्यां च तपोयोगात्मको मुनिः । ऋश्यशृङ्गः समुत्पन्नो ब्रह्मचारी महायशाः ॥
vibhaṇḍakasya mṛgyāṃ ca tapoyogātmako muniḥ | ṛśyaśṛṅgaḥ samutpanno brahmacārī mahāyaśāḥ
विभण्डक से एक मृगी में तप और योग के स्वरूप मुनि ऋश्यशृङ्ग उत्पन्न हुए, जो महायशस्वी ब्रह्मचारी थे।
श्लोक 21 (13.53.21)
शार्ङ्ग्यां च मन्दपालस्य चत्वारो ब्रह्मवादिनः । जाता ब्रह्मर्षयः पुण्या यैः स्तुतो हव्यवाहनः ॥
śārṅgyāṃ ca mandapālasya catvāro brahmavādinaḥ | jātā brahmarṣayaḥ puṇyā yaiḥ stuto havyavāhanaḥ
मन्दपाल से शार्ङ्गी पक्षिणी में चार ब्रह्मवादी, पुण्यात्मा ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए, जिन्होंने हव्यवाहन अग्नि की स्तुति की।
श्लोक 22 (13.53.22)
द्रोणश्च स्तम्बमित्रश्च सारिसृक्वश्च बुद्धिमान् । जरितारिश्च विख्यातश्चत्वारः सूर्यसन्निभाः ॥
droṇaśca stambamitraśca sārisṛkvaśca buddhimān | jaritāriśca vikhyātaścatvāraḥ sūryasannibhāḥ
द्रोण, स्तम्बमित्र, बुद्धिमान् सारिसृक्व और प्रसिद्ध जरितारि, ये चार सूर्य के समान तेजस्वी थे।
श्लोक 23 (13.53.23)
महर्षेः कालवृक्षस्य शकुन्त्यामेव जज्ञिवान् । हिरण्यहस्तो भगवान्महर्षिः काञ्चनप्रभः ॥
maharṣeḥ kālavṛkṣasya śakuntyāmeva jajñivān | hiraṇyahasto bhagavānmaharṣiḥ kāñcanaprabhaḥ
महर्षि कालवृक्ष से शकुन्ती (पक्षिणी) में पूज्य महर्षि हिरण्यहस्त उत्पन्न हुए, जिनकी कान्ति सोने जैसी थी।
श्लोक 24 (13.53.24)
पावकात्तात सम्भूता मनसा च महर्षयः । पितामहस्य राजेन्द्र पुलस्त्यपुलहादयः ॥
pāvakāttāta sambhūtā manasā ca maharṣayaḥ | pitāmahasya rājendra pulastyapulahādayaḥ
हे राजेन्द्र, अग्नि से और पितामह के मन से महर्षि उत्पन्न हुए: पुलस्त्य, पुलह आदि।
श्लोक 25 (13.53.25)
सावर्ण्यश्चापि राजर्षिः सवर्णायामजायत । मृण्मय्यां भरतश्रेष्ठ आदित्येन विवस्वता ॥
sāvarṇyaścāpi rājarṣiḥ savarṇāyāmajāyata | mṛṇmayyāṃ bharataśreṣṭha ādityena vivasvatā
हे भरतश्रेष्ठ, राजर्षि सावर्ण्य सूर्य विवस्वान् से मिट्टी की बनी सवर्णा में उत्पन्न हुए।
श्लोक 26 (13.53.26)
शाण्डिल्यश्चाग्नितो जातः कश्यपस्याग्रजः प्रभुः । शरद्वतः शरस्तम्बात्कृपश्च कृपया सह ॥
śāṇḍilyaścāgnito jātaḥ kaśyapasyāgrajaḥ prabhuḥ | śaradvataḥ śarastambātkṛpaśca kṛpayā saha
कश्यप के अग्रज प्रभु शाण्डिल्य अग्नि से उत्पन्न हुए; शरद्वान् सरकण्डों के झुरमुट से उत्पन्न हुए, और कृप कृपी के साथ।
श्लोक 27 (13.53.27)
पद्माच्च जज्ञे राजेन्द्र सोमपस्य महात्मनः । रेणुश्च रेणुका चैव राममाता यशस्विनी ॥
padmācca jajñe rājendra somapasya mahātmanaḥ | reṇuśca reṇukā caiva rāmamātā yaśasvinī
हे राजेन्द्र, महात्मा सोमप के लिए कमल से रेणु और रेणुका उत्पन्न हुईं, जो यशस्विनी रेणुका परशुराम की माता हुईं।
श्लोक 28 (13.53.28)
यमुनायाः समुद्भूतः सोमकेन महात्मना । अर्कदन्तो महानृषिः प्रथितः पृथिवीतले ॥
yamunāyāḥ samudbhūtaḥ somakena mahātmanā | arkadanto mahānṛṣiḥ prathitaḥ pṛthivītale
महात्मा सोमक के द्वारा यमुना से महर्षि अर्कदन्त उत्पन्न हुए, जो पृथ्वी पर प्रसिद्ध हैं।
श्लोक 29 (13.53.29)
अग्नेराहवनीयाच्च द्रुपदस्येन्द्रवर्चसः । धृष्टद्युम्नश्च सम्भूतो वेद्यां कृष्णा च भारत ॥
agnerāhavanīyācca drupadasyendravarcasaḥ | dhṛṣṭadyumnaśca sambhūto vedyāṃ kṛṣṇā ca bhārata
हे भारत, इन्द्र के समान तेजस्वी द्रुपद के आहवनीय अग्नि से वेदी पर धृष्टद्युम्न उत्पन्न हुए, और कृष्णा (द्रौपदी) भी।
श्लोक 30 (13.53.30)
व्याघ्रयोन्यां ततो जाता वसिष्ठस्य महात्मनः । एकोनविंशतिः पुत्राः ख्याता व्याघ्रपदादयः ॥
vyāghrayonyāṃ tato jātā vasiṣṭhasya mahātmanaḥ | ekonaviṃśatiḥ putrāḥ khyātā vyāghrapadādayaḥ
फिर महात्मा वसिष्ठ के व्याघ्री योनि से उन्नीस प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें व्याघ्रपाद आदि हैं।
श्लोक 31 (13.53.31)
मन्धश्च बादलोमश्च जावालिश्च महानृषिः । मन्युश्चैवोपमन्युश्च सेतुकर्णस्तथैव च । एते चान्ये च विख्याताः पृथिव्यां गोत्रतां गताः ॥
mandhaśca bādalomaśca jāvāliśca mahānṛṣiḥ | manyuścaivopamanyuśca setukarṇastathaiva ca | ete cānye ca vikhyātāḥ pṛthivyāṃ gotratāṃ gatāḥ
मन्ध, बादलोम, महर्षि जावालि, मन्यु, उपमन्यु और सेतुकर्ण: ये और अन्य प्रसिद्ध ऋषि पृथ्वी पर गोत्रकर्ता हुए।
श्लोक 32 (13.53.32)
विश्वकाशस्य राजर्षेरैक्ष्वाकोस्तु महात्मनः । बालाश्वो नाम पुत्रोऽभूच्छिखां भित्त्वा विनिस्सृतः ॥
viśvakāśasya rājarṣeraikṣvākostu mahātmanaḥ | bālāśvo nāma putro'bhūcchikhāṃ bhittvā vinissṛtaḥ
इक्ष्वाकुवंशी महात्मा राजर्षि विश्वकाश के बालाश्व नामक पुत्र हुए, जो सिर की शिखा को चीरकर बाहर निकले।
श्लोक 33 (13.53.33)
मान्धाता चैव राजर्षिर्युवनाश्वेन धीमता । स्वयं धृतोऽथ गर्भेण दिव्यास्त्रबलसंयुतः ॥
māndhātā caiva rājarṣiryuvanāśvena dhīmatā | svayaṃ dhṛto'tha garbheṇa divyāstrabalasaṃyutaḥ
और राजर्षि मान्धाता को बुद्धिमान् युवनाश्व ने स्वयं अपने गर्भ में धारण किया; वे दिव्य अस्त्रों और बल से सम्पन्न थे।
श्लोक 34 (13.53.34)
गौरिकश्चापि राजर्षिश्चक्रवर्ती महायशाः । बाहुदायां समुत्पन्नो नद्यां राज्ञा सुबाहुना ॥
gaurikaścāpi rājarṣiścakravartī mahāyaśāḥ | bāhudāyāṃ samutpanno nadyāṃ rājñā subāhunā
महायशस्वी चक्रवर्ती राजर्षि गौरिक भी राजा सुबाहु द्वारा बाहुदा नदी में उत्पन्न हुए।
श्लोक 35 (13.53.35)
भूमेश्च पुत्रो नरकः संवर्तश्चैव पुष्कलः । अद्भिश्चैव महातेजा ऋषिर्गार्ग्योऽभ्यजायत ॥
bhūmeśca putro narakaḥ saṃvartaścaiva puṣkalaḥ | adbhiścaiva mahātejā ṛṣirgārgyo'bhyajāyata
भूमि का पुत्र नरक, तथा संवर्त और पुष्कल; और महातेजस्वी ऋषि गार्ग्य जल से उत्पन्न हुए।
श्लोक 36 (13.53.36)
एते चान्ये च बहवो राजन्या ब्राह्मणास्तथा । प्रभावेनाभिसम्भूता महर्षीणां महात्मनाम् । नासाध्यं तपसा तेषां विद्ययाऽऽत्मगुणैः परैः ॥
ete cānye ca bahavo rājanyā brāhmaṇāstathā | prabhāvenābhisambhūtā maharṣīṇāṃ mahātmanām | nāsādhyaṃ tapasā teṣāṃ vidyayā''tmaguṇaiḥ paraiḥ
ये और अन्य बहुत-से राजा और ब्राह्मण महात्मा महर्षियों के प्रभाव से उत्पन्न हुए; तप, विद्या और श्रेष्ठ आत्मगुणों से उनके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।
श्लोक 37 (13.53.37)
अस्मिन्नर्थे च मनुना नीतः श्लोको नराधिप । धर्मं प्रणयता राजंस्तं निबोध युधिष्ठिर ॥
asminnarthe ca manunā nītaḥ śloko narādhipa | dharmaṃ praṇayatā rājaṃstaṃ nibodha yudhiṣṭhira
हे नराधिप, इस विषय में धर्म का उपदेश करते हुए मनु ने एक श्लोक कहा था; हे युधिष्ठिर, उसे सुनो।
श्लोक 38 (13.53.38)
ऋषीणां च नदीनां च साधूनां च महात्मनाम् । प्रभवो नाधिगन्तव्यः स्त्रीणां दुश्चरितस्य च ॥
ṛṣīṇāṃ ca nadīnāṃ ca sādhūnāṃ ca mahātmanām | prabhavo nādhigantavyaḥ strīṇāṃ duścaritasya ca
ऋषियों, नदियों, साधुओं और महात्माओं का उद्गम तथा स्त्रियों के दुराचरण का मूल कभी खोजना नहीं चाहिए।
श्लोक 39 (13.53.39)
तन्नात्र चिन्ता कर्तव्या महर्षीणां समुद्भवे । यथा सर्वगतो ह्यग्निस्तथा तेजो महात्मसु ॥
tannātra cintā kartavyā maharṣīṇāṃ samudbhave | yathā sarvagato hyagnistathā tejo mahātmasu
इसलिए महर्षियों की उत्पत्ति के विषय में चिन्ता नहीं करनी चाहिए। जैसे अग्नि सर्वत्र विद्यमान है, वैसे ही महात्माओं में तेज विद्यमान है।