अनुशासन पर्व · अध्याय 54
नारद का मार्कण्डेय को धर्म के ह्रास का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि पुत्रों से मनुष्य का उद्धार कैसे होता है; भीष्म भोगवती के संगम पर नारद और मार्कण्डेय तथा अन्य ऋषियों के बीच हुए एक पुराने संवाद को सुनाते हैं। नारद बताते हैं कि कृतयुग में पूर्ण धर्म प्रत्येक युग में एक-एक पैर खोता जाता है, यहाँ तक कि नन्दिक युग में केवल एक पैर रह जाता है; मन्त्र से पवित्र और न्यायपूर्वक दिया हुआ हव्य-कव्य देवता ग्रहण करते हैं, अनुचित रीति से दिया हुआ असुरों, राक्षसों, प्रेतों और भूतों को जाता है, और निम्नतम वर्णों का दिया हुआ देवता और पितर स्वयं ग्रहण नहीं करते।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.54.1)
पुत्रैः कथं महाराज पुरुषस्तारितो भवेत् । यावन्न लब्धवान्पुत्रमफलः पुरुषो नृप ॥
putraiḥ kathaṃ mahārāja puruṣastārito bhavet | yāvanna labdhavānputramaphalaḥ puruṣo nṛpa
हे महाराज, पुत्रों के द्वारा मनुष्य का उद्धार कैसे होता है? जब तक मनुष्य को पुत्र प्राप्त नहीं होता, तब तक वह निष्फल रहता है, हे राजन्।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.54.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदेन पुरा गीतं मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nāradena purā gītaṃ mārkaṇḍeyāya pṛcchate
इस विषय में लोग यह प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, जिसे पूर्वकाल में नारद ने पूछने वाले मार्कण्डेय को सुनाया था।
श्लोक 3 (13.54.3)
पर्वतं नारदं चैव असितं देवलं च तम् । आरुणेयं च रैभ्यं च एतानत्रागतान्पुरा ॥
parvataṃ nāradaṃ caiva asitaṃ devalaṃ ca tam | āruṇeyaṃ ca raibhyaṃ ca etānatrāgatānpurā
पर्वत और नारद, असित और देवल, आरुणेय और रैभ्य, ये सब पूर्वकाल में वहाँ एकत्र हुए थे।
श्लोक 4 (13.54.4)
गङ्गायमुनयोर्मध्ये भोगवत्याः समागमे । दृष्ट्वा पूर्वं समासीनान्मार्कण्डेयोऽभ्यगच्छत ॥
gaṅgāyamunayormadhye bhogavatyāḥ samāgame | dṛṣṭvā pūrvaṃ samāsīnānmārkaṇḍeyo'bhyagacchata
गंगा और यमुना के बीच, भोगवती के संगम पर, उन्हें पहले से साथ बैठे देखकर मार्कण्डेय उनके पास गए।
श्लोक 5 (13.54.5)
ऋषयस्तु मुनिं दृष्ट्वा समुत्थायोन्मुखाः स्थिताः । अर्चयित्वाऽर्हतो विप्रं किं कुर्म इति चाब्रुवन् ॥
ṛṣayastu muniṃ dṛṣṭvā samutthāyonmukhāḥ sthitāḥ | arcayitvā'rhato vipraṃ kiṃ kurma iti cābruvan
मुनि को देखकर ऋषि उठ खड़े हुए और उनके सामने खड़े रहे; पूजनीय ब्राह्मण का सत्कार करके उन्होंने पूछा, "हम क्या करें?"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 6 (13.54.6)
अयं समागमः सद्भिर्यत्नेनासादितो मया । अत्र प्राप्स्यामि धर्माणामाचारस्य च निश्चयम् ॥
ayaṃ samāgamaḥ sadbhiryatnenāsādito mayā | atra prāpsyāmi dharmāṇāmācārasya ca niścayam
"मैंने बड़े प्रयत्न से सज्जनों का यह समागम पाया है। यहाँ मैं धर्मों और आचार के विषय में निश्चय प्राप्त करूँगा।
श्लोक 7 (13.54.7)
ऋजुः कृतयुगे धर्मस्तस्मिन्क्षीणे विमुह्यति । युगेयुगे महर्षिभ्यो धर्ममिच्छामि वेदितुम् ॥
ṛjuḥ kṛtayuge dharmastasminkṣīṇe vimuhyati | yugeyuge maharṣibhyo dharmamicchāmi veditum
कृतयुग में धर्म सीधा-सरल रहता है; उसके क्षीण होने पर वह उलझ जाता है। मैं प्रत्येक युग में महर्षियों से धर्म जानना चाहता हूँ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (13.54.8)
ऋषिभिर्नारदः प्रोक्तो ब्रूहि यत्रास्य संशयः । धर्माधर्मेषु तत्वज्ञ त्वं हि च्छेत्ता हि संशयान् ॥
ṛṣibhirnāradaḥ prokto brūhi yatrāsya saṃśayaḥ | dharmādharmeṣu tatvajña tvaṃ hi cchettā hi saṃśayān
ऋषियों ने नारद से कहा, "जहाँ इन्हें संशय हो, वहाँ आप बताइए। हे धर्म और अधर्म के तत्त्व को जानने वाले, आप ही संशयों को काटने वाले हैं।"
श्लोक 9 (13.54.9)
ऋषिभ्योऽनुमतं वाक्यं नियोगान्नारदस्तदा । सर्वधर्मार्थतत्वज्ञं मार्कण्डेयं ततोऽब्रवीत् ॥
ṛṣibhyo'numataṃ vākyaṃ niyogānnāradastadā | sarvadharmārthatatvajñaṃ mārkaṇḍeyaṃ tato'bravīt
तब ऋषियों के नियोग से नारद ने सब धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले मार्कण्डेय से, ऋषियों द्वारा अनुमोदित वचन कहे।
नारद उवाच
श्लोक 10 (13.54.10)
दीर्घायो तपसा दीप्त वेदवेदाङ्गतत्ववित् । यत्र ते संशयो ब्रह्मन्समुत्पन्नः स उच्यताम् ॥
dīrghāyo tapasā dīpta vedavedāṅgatatvavit | yatra te saṃśayo brahmansamutpannaḥ sa ucyatām
"हे दीर्घायु, तप से दीप्त, वेद और वेदाङ्गों के तत्त्व के ज्ञाता, हे ब्राह्मण, आपके मन में जो संशय उत्पन्न हुआ है, उसे कहिए।
श्लोक 11 (13.54.11)
धर्मं लोकोपकारं वा यच्चान्यच्छ्रोतुमिच्छसि । तदहं कथयिष्यामि ब्रूहि त्वं सुमहातपाः ॥
dharmaṃ lokopakāraṃ vā yaccānyacchrotumicchasi | tadahaṃ kathayiṣyāmi brūhi tvaṃ sumahātapāḥ
चाहे वह धर्म के विषय में हो, या लोक के उपकार के विषय में, या और कुछ जो आप सुनना चाहते हों, मैं वह बताऊँगा; हे महातपस्वी, आप बोलिए।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 12 (13.54.12)
युगेयुगे व्यतीतेऽस्मिन्धर्मसेतुः प्रणश्यति । कथं धर्मच्छलेनाहं प्राप्नुयामिति मे मतिः ॥
yugeyuge vyatīte'smindharmasetuḥ praṇaśyati | kathaṃ dharmacchalenāhaṃ prāpnuyāmiti me matiḥ
"युग-युग बीतने पर धर्म का सेतु नष्ट हो जाता है। मैं धर्म के बहाने से उसे कैसे प्राप्त करूँ? यही मेरा विचार है।"
नारद उवाच
श्लोक 13 (13.54.13)
आसीद्धर्मः पुरा विप्र चतुष्पादः कृते युगे । ततो ह्यधर्मः कालेन प्रसूतः किञ्चिदूनतः ॥
āsīddharmaḥ purā vipra catuṣpādaḥ kṛte yuge | tato hyadharmaḥ kālena prasūtaḥ kiñcidūnataḥ
"हे विप्र, कृतयुग में पहले धर्म चार पैरों वाला था; फिर समय के साथ कुछ घटा हुआ अधर्म उत्पन्न हुआ।
श्लोक 14 (13.54.14)
ततस्त्रेतायुगं नाम प्रवृत्तं धर्मदूषणम् ॥
tatastretāyugaṃ nāma pravṛttaṃ dharmadūṣaṇam
तब त्रेतायुग नामक युग आरम्भ हुआ, जो धर्म को दूषित करने वाला है।
श्लोक 15 (13.54.15)
तस्मिन्नतीते सम्प्राप्तं तृतीयं द्वापरं युगम् । तदा धर्मस्य द्वौ पादावधर्मो नाशयिष्यति ॥
tasminnatīte samprāptaṃ tṛtīyaṃ dvāparaṃ yugam | tadā dharmasya dvau pādāvadharmo nāśayiṣyati
उसके बीत जाने पर तीसरा द्वापर युग आया; तब अधर्म धर्म के दो पैरों को नष्ट कर देगा।
श्लोक 16 (13.54.16)
द्वापरे तु परिक्षीणे नन्दिके समुपस्थिते । लोकवृत्तं च धर्मं च उच्यमानं निबोध मे ॥
dvāpare tu parikṣīṇe nandike samupasthite | lokavṛttaṃ ca dharmaṃ ca ucyamānaṃ nibodha me
द्वापर के क्षीण हो जाने पर और नन्दिक युग के आ जाने पर लोक-व्यवहार और धर्म का जैसा वर्णन किया जाएगा, वह मुझसे सुनो।
श्लोक 17 (13.54.17)
चतुर्थं नन्दिकं नाम धर्मः पादावशेषितः । ततः प्रभृति जायन्ते क्षीणप्रज्ञायुषो नराः । क्षीणप्राणधना लोके धर्माचारबहिष्कृताः ॥
caturthaṃ nandikaṃ nāma dharmaḥ pādāvaśeṣitaḥ | tataḥ prabhṛti jāyante kṣīṇaprajñāyuṣo narāḥ | kṣīṇaprāṇadhanā loke dharmācārabahiṣkṛtāḥ
चौथा नन्दिक कहलाता है, और उसमें धर्म का एक ही पैर शेष रहता है। तभी से मनुष्य क्षीण बुद्धि और अल्प आयु वाले उत्पन्न होते हैं, उनके प्राण और धन क्षीण हो जाते हैं और वे धर्माचार से बाहर हो जाते हैं।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 18 (13.54.18)
एवं विलुलिते धर्मे लोके चाधर्मसंयुते । चातुर्वर्ण्यस्य नियतं हव्यं कव्यं नियच्छति ॥
evaṃ vilulite dharme loke cādharmasaṃyute | cāturvarṇyasya niyataṃ havyaṃ kavyaṃ niyacchati
"इस प्रकार धर्म के अस्त-व्यस्त हो जाने पर और संसार के अधर्म से युक्त हो जाने पर चारों वर्णों के नियमित हव्य और कव्य रुक जाते हैं।"
नारद उवाच
श्लोक 19 (13.54.19)
मन्त्रपूतं सदा हव्यं कव्यं चैव न नश्यति । प्रतिगृह्णन्ति तद्देवा दातुर्न्यायात्प्रयच्छतः ॥
mantrapūtaṃ sadā havyaṃ kavyaṃ caiva na naśyati | pratigṛhṇanti taddevā dāturnyāyātprayacchataḥ
"मन्त्रों से पवित्र किया हुआ हव्य और कव्य कभी नष्ट नहीं होता; न्यायपूर्वक देने वाले दाता से देवता उसे ग्रहण करते हैं।
श्लोक 20 (13.54.20)
सत्वयुक्तं च दाता च सर्वान्कामानवाप्नुयात् । अवाप्तकामः स्वर्गे च महीयेत यथेप्सितम् ॥
satvayuktaṃ ca dātā ca sarvānkāmānavāpnuyāt | avāptakāmaḥ svarge ca mahīyeta yathepsitam
सत्त्व से युक्त होकर देने वाला दाता सब कामनाएँ प्राप्त करता है, और कामनाएँ पूर्ण होने पर स्वर्ग में इच्छानुसार सम्मान पाता है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 21 (13.54.21)
चत्वारो ह्यथ ये वर्णा हव्यं कव्यं प्रदास्यति । मन्त्रहीनमपन्यायं तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥
catvāro hyatha ye varṇā havyaṃ kavyaṃ pradāsyati | mantrahīnamapanyāyaṃ teṣāṃ dattaṃ kva gacchati
"और जो चारों वर्णों के लोग बिना मन्त्र के और अनुचित रीति से हव्य-कव्य देते हैं, उनका दिया हुआ कहाँ जाता है?"
नारद उवाच
श्लोक 22 (13.54.22)
असुरान्गच्छते दत्तं विप्रै रक्षांसि क्षत्रियैः । वैश्यैः प्रेतानि वै दत्तं शूद्रैर्भूतानि गच्छति ॥
asurāngacchate dattaṃ viprai rakṣāṃsi kṣatriyaiḥ | vaiśyaiḥ pretāni vai dattaṃ śūdrairbhūtāni gacchati
"ब्राह्मणों द्वारा दिया हुआ असुरों को जाता है, क्षत्रियों द्वारा दिया हुआ राक्षसों को; वैश्यों द्वारा दिया हुआ प्रेतों को जाता है और शूद्रों द्वारा दिया हुआ भूतों को।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 23 (13.54.23)
अथ वर्णावरे जाताश्चातुर्वर्ण्योपदेशिनः । दास्यन्ति हव्यकव्यानि तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥
atha varṇāvare jātāścāturvarṇyopadeśinaḥ | dāsyanti havyakavyāni teṣāṃ dattaṃ kva gacchati
"और जो निम्नतम वर्णों में उत्पन्न होकर चारों वर्णों के विषय में उपदेश करते हैं, वे यदि हव्य-कव्य देते हैं तो उनका दिया हुआ कहाँ जाता है?"
नारद उवाच
श्लोक 24 (13.54.24)
वर्णावराणां भूतानां हव्यकव्यप्रदातृणाम् । नैव देवा न पितरः प्रतिगृह्णन्ति तत्स्वयम् ॥
varṇāvarāṇāṃ bhūtānāṃ havyakavyapradātṛṇām | naiva devā na pitaraḥ pratigṛhṇanti tatsvayam
"निम्नतम वर्णों के जो प्राणी हव्य-कव्य देते हैं, उनका दिया हुआ न देवता स्वयं ग्रहण करते हैं, न पितर।
श्लोक 25 (13.54.25)
यातुधानाः पिशाचाश्च भूता ये चापि नैर्ऋताः । तेषां सा विहिता वृत्तिः पितृदैवतनिर्गताः ॥
yātudhānāḥ piśācāśca bhūtā ye cāpi nairṛtāḥ | teṣāṃ sā vihitā vṛttiḥ pitṛdaivatanirgatāḥ
यातुधान, पिशाच, भूत और नैर्ऋत, इनके लिए वही वृत्ति विहित है जो पितरों और देवताओं के द्वारा छोड़ी हुई है।
श्लोक 26 (13.54.26)
तेषां सर्वप्रदातॄणां हव्यकव्यं समाहिताः । यत्प्रयच्छन्ति विधिवत्तद्वै भुञ्जन्ति देवताः ॥
teṣāṃ sarvapradātṝṇāṃ havyakavyaṃ samāhitāḥ | yatprayacchanti vidhivattadvai bhuñjanti devatāḥ
उन सब दाताओं में से जो एकाग्र चित्त वाले लोग विधिपूर्वक हव्य-कव्य देते हैं, उसी को देवता सचमुच भोगते हैं।"