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अनुशासन पर्व · अध्याय 55

कन्यादान के विषय में नारद का उपदेश

मार्कण्डेय नारद से पुत्रों और कन्याओं के विवाह के विषय में पूछते हैं। नारद बताते हैं कि कन्या का समय पर योग्य वर को दान करना चाहिए, न देने वाले बन्धु को क्या दोष लगता है, पुनर्विवाहिता स्त्री की क्या स्थिति है, कानीन और सहोढज पुत्र कौन हैं, और कौमारी भार्या किसे कहते हैं। अन्त में वे कन्या को साक्षात् लक्ष्मी और साध्वी पत्नी को कुल की पुष्टि और सन्तति का मूल बताते हैं।

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (13.55.1)

श्रुतं वर्णावरैर्दत्तं हव्यं कव्यं च नारद । सम्प्रयोगे च पुत्राणां कन्यानां च ब्रवीहि मे ॥

śrutaṃ varṇāvarairdattaṃ havyaṃ kavyaṃ ca nārada | samprayoge ca putrāṇāṃ kanyānāṃ ca bravīhi me

हे नारद, निम्न वर्णों द्वारा दिए गए हव्य और कव्य के विषय में मैंने सुन लिया। अब पुत्रों और कन्याओं के संयोग (विवाह) के विषय में मुझे बताइए।

नारद उवाच

श्लोक 2 (13.55.2)

कन्याप्रदानं पुत्राणां स्त्रीणां संयोगमेव च । आनुपूर्व्यान्मया सम्यगुच्यमानं निबोध मे ॥

kanyāpradānaṃ putrāṇāṃ strīṇāṃ saṃyogameva ca | ānupūrvyānmayā samyagucyamānaṃ nibodha me

कन्याओं का दान, पुत्रों का स्त्रियों के साथ संयोग, यह सब मैं क्रम से भली-भाँति बताता हूँ, मुझसे सुनो।

श्लोक 3 (13.55.3)

जातमात्रा तु दातव्या कन्यका सदृशे वरे । काले दत्तासु कन्यासु पिता धर्मेण युज्यते ॥

jātamātrā tu dātavyā kanyakā sadṛśe vare | kāle dattāsu kanyāsu pitā dharmeṇa yujyate

कन्या को जन्म लेते ही योग्य वर को दे देना चाहिए; समय पर कन्याओं का दान करने से पिता धर्म से युक्त होता है।

श्लोक 4 (13.55.4)

यस्तु पुष्पवतीं कन्यां बान्धवो न प्रयच्छति । मासिमासि गते बन्धुस्तस्या भ्रौणघ्न्यमाप्नुते ॥

yastu puṣpavatīṃ kanyāṃ bāndhavo na prayacchati | māsimāsi gate bandhustasyā bhrauṇaghnyamāpnute

जो बन्धु रजस्वला हो चुकी कन्या को विवाह में नहीं देता, उसे हर बीतते मास में उस कन्या के कारण भ्रूणहत्या का पाप लगता है।

श्लोक 5 (13.55.5)

यस्तु कन्यां गृहे रुन्ध्याद्ग्राम्यैर्भोगैर्विवर्जिताम् । अवध्यातः स कन्याया बन्धुः प्राप्नोति भ्रूणहाम् ॥

yastu kanyāṃ gṛhe rundhyādgrāmyairbhogairvivarjitām | avadhyātaḥ sa kanyāyā bandhuḥ prāpnoti bhrūṇahām

जो बन्धु कन्या को सांसारिक भोगों से वंचित करके घर में रोके रखता है और कन्या की उपेक्षा करता है, वह भ्रूणहत्या का भागी होता है।

श्लोक 6 (13.55.6)

दूषिता पाणिमात्रेण मृते भर्तरि दारिका । संस्कारं लभते नारी द्वितीये सा पुनः पतौ ॥

dūṣitā pāṇimātreṇa mṛte bhartari dārikā | saṃskāraṃ labhate nārī dvitīye sā punaḥ patau

जो कन्या केवल पाणिग्रहण मात्र से दूषित हो गई हो और जिसका पति मर गया हो, वह स्त्री दूसरे पति के साथ फिर संस्कार पाती है।

श्लोक 7 (13.55.7)

पुनर्भूर्नाम सा कन्या सपुत्रा हव्यकव्यदा । अदूष्या सा प्रसूतीषु प्रजानां दारकर्मणि ॥

punarbhūrnāma sā kanyā saputrā havyakavyadā | adūṣyā sā prasūtīṣu prajānāṃ dārakarmaṇi

ऐसी कन्या पुनर्भू कहलाती है; पुत्रवती होकर वह हव्य और कव्य देने योग्य होती है। प्रसव में और लोगों के विवाह-कर्म में वह निन्दनीय नहीं है।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 8 (13.55.8)

या तु कन्या प्रसूयेत गर्भिणी या तु वा भवेत् । कथं दारक्रियां भूयः सा भवेदृषिसत्तम ॥

yā tu kanyā prasūyeta garbhiṇī yā tu vā bhavet | kathaṃ dārakriyāṃ bhūyaḥ sā bhavedṛṣisattama

"और जो कन्या प्रसव करे, अथवा गर्भवती हो जाए, हे ऋषिश्रेष्ठ, वह फिर विवाह-संस्कार कैसे पा सकती है?"

नारद उवाच

श्लोक 9 (13.55.9)

तत्वार्थनिश्चितं शब्दं कन्यका नयतेऽग्नये । तस्मात्कुर्वन्ति वै भावं कुमार्यस्ता न कन्यकाः ॥

tatvārthaniścitaṃ śabdaṃ kanyakā nayate'gnaye | tasmātkurvanti vai bhāvaṃ kumāryastā na kanyakāḥ

कन्या तत्त्वार्थ से निश्चित वचन को अग्नि के समक्ष ले जाती है; इसीलिए वे वैसा भाव रखती हैं। वे कुमारी हैं, कन्यका नहीं।

श्लोक 10 (13.55.10)

ब्रह्महत्यात्रिभागेन गर्भाधानविशोधितः । गृह्णीयात्तां चतुर्भागविशुद्धां सर्जनात्पुनः ॥

brahmahatyātribhāgena garbhādhānaviśodhitaḥ | gṛhṇīyāttāṃ caturbhāgaviśuddhāṃ sarjanātpunaḥ

गर्भाधान से ब्रह्महत्या के तीन भागों से शुद्ध हुआ पुरुष उस स्त्री को ग्रहण करे, जो प्रसव के पश्चात् चौथे भाग से भी शुद्ध हो चुकी है।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 11 (13.55.11)

कथं कन्यासु ये जाता बन्धूनां दूषिताः सदा । कस्य ते हव्यकव्यानि प्रदास्यन्ति महामुने ॥

kathaṃ kanyāsu ye jātā bandhūnāṃ dūṣitāḥ sadā | kasya te havyakavyāni pradāsyanti mahāmune

"जो कन्याओं से उत्पन्न होते हैं और जिन्हें बन्धु सदा दूषित मानते हैं, हे महामुने, वे हव्य और कव्य किसे देंगे?"

नारद उवाच

श्लोक 12 (13.55.12)

कन्यायास्तु पितुः पुत्राः कानीना हव्यकव्यदाः । अन्तर्वत्न्यास्तु यः पाणिं गृह्णीयात्स सहोढजः ॥

kanyāyāstu pituḥ putrāḥ kānīnā havyakavyadāḥ | antarvatnyāstu yaḥ pāṇiṃ gṛhṇīyātsa sahoḍhajaḥ

"कन्या के पुत्र उसके पिता के होते हैं; वे कानीन कहलाते हैं और हव्य-कव्य देने वाले हैं। जो पुरुष गर्भवती स्त्री का पाणिग्रहण करे, उसका पुत्र सहोढज कहलाता है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 13 (13.55.13)

अथ येनाहितो गर्भः कन्यायां तत्र नारद । कथं पुत्रफलं तस्य भवेदेतत्प्रचक्ष्व मे ॥

atha yenāhito garbhaḥ kanyāyāṃ tatra nārada | kathaṃ putraphalaṃ tasya bhavedetatpracakṣva me

"और हे नारद, यदि किसी ने कन्या में गर्भ स्थापित किया हो, तो उसे पुत्र का फल कैसे प्राप्त होगा? मुझे यह बताइए।"

नारद उवाच

श्लोक 14 (13.55.14)

धर्माचारेषु ते नित्यं दूषकाः कृतशोधनाः । बीजं च नश्यते तेषां मोघचेष्टा भवन्ति ते ॥

dharmācāreṣu te nityaṃ dūṣakāḥ kṛtaśodhanāḥ | bījaṃ ca naśyate teṣāṃ moghaceṣṭā bhavanti te

"जो लोग धर्माचार में सदा दूषण करने वाले हैं, वे शुद्धि कर लेने पर भी, उनका बीज नष्ट हो जाता है और उनके प्रयत्न व्यर्थ हो जाते हैं।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 15 (13.55.15)

अथ काचिद्भवेत्कन्या क्रीता दत्ता हृताऽपि वा । कथं पुत्रकृतं तस्यास्तद्भवेदृषिसत्तम ॥

atha kācidbhavetkanyā krītā dattā hṛtā'pi vā | kathaṃ putrakṛtaṃ tasyāstadbhavedṛṣisattama

"और यदि कोई कन्या खरीदी गई हो, दी गई हो, अथवा हर ली गई हो, तो हे ऋषिश्रेष्ठ, उसके पुत्र-सम्बन्धी कार्य की क्या स्थिति होगी?"

नारद उवाच

श्लोक 16 (13.55.16)

क्रीता दत्ता हृता चैव या कन्या पाणिवर्जिता । कौमारी नाम सा भार्या प्रसवेदौरसान्सुतान् । न पत्न्यर्थे शुभा प्रोक्ता तत्कर्मण्यपराजिते ॥

krītā dattā hṛtā caiva yā kanyā pāṇivarjitā | kaumārī nāma sā bhāryā prasavedaurasānsutān | na patnyarthe śubhā proktā tatkarmaṇyaparājite

"जो कन्या खरीदी गई हो, दी गई हो या हर ली गई हो, पर जिसका पाणिग्रहण न हुआ हो, वह कौमारी भार्या कहलाती है और औरस पुत्रों को जन्म दे सकती है। परन्तु हे अपराजित, वह पत्नी बनने के योग्य नहीं बताई गई, न उस कर्म के योग्य।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 17 (13.55.17)

केन मङ्गलकृत्येषु विनियुज्यन्ति कन्यकाः । एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्वेनेह महामुने ॥

kena maṅgalakṛtyeṣu viniyujyanti kanyakāḥ | etadicchāmi vijñātuṃ tatveneha mahāmune

"मंगल कार्यों में कन्याओं को किस कारण नियुक्त किया जाता है? हे महामुने, मैं यहाँ यह यथार्थ रूप में जानना चाहता हूँ।"

नारद उवाच

श्लोक 18 (13.55.18)

नित्यं निवसते लक्ष्मीः कन्यकासु प्रतिष्ठिता । शोभना शुभयोग्या च पूज्या मङ्गलकर्मसु ॥

nityaṃ nivasate lakṣmīḥ kanyakāsu pratiṣṭhitā | śobhanā śubhayogyā ca pūjyā maṅgalakarmasu

"लक्ष्मी सदा कन्याओं में प्रतिष्ठित होकर निवास करती हैं। कन्या शोभनीय है, शुभ कार्यों के योग्य है और मंगल कर्मों में पूजनीय है।

श्लोक 19 (13.55.19)

आकरस्थं यथा रत्नं सर्वकामफलोपगम् । तथा कन्या महालक्ष्मीः सर्वलोकस्य मङ्गलम् ॥

ākarasthaṃ yathā ratnaṃ sarvakāmaphalopagam | tathā kanyā mahālakṣmīḥ sarvalokasya maṅgalam

जैसे खान में स्थित रत्न सब कामनाओं का फल देता है, वैसे ही कन्या महालक्ष्मी है, समस्त लोक का मंगल है।

श्लोक 20 (13.55.20)

एवं कन्या परा लक्ष्मी रतिस्तोषश्च देहिनाम् । महाकुलानां चारित्रवृत्तेन निकषोपलम् ॥

evaṃ kanyā parā lakṣmī ratistoṣaśca dehinām | mahākulānāṃ cāritravṛttena nikaṣopalam

इस प्रकार कन्या परम लक्ष्मी है, देहधारियों की प्रीति और सन्तोष है, और महान् कुलों के आचरण की कसौटी है।

श्लोक 21 (13.55.21)

आनयित्वा स्वकाद्वर्णात्कन्यकां यो भजेन्नरः । दातारं हव्यकव्यानां पुत्रकं या प्रसूयति ॥

ānayitvā svakādvarṇātkanyakāṃ yo bhajennaraḥ | dātāraṃ havyakavyānāṃ putrakaṃ yā prasūyati

जो पुरुष अपने ही वर्ण से कन्या लाकर उसे ग्रहण करता है, वह हव्य और कव्य देने वाले पुत्र को जन्म देती है।

श्लोक 22 (13.55.22)

साध्वी कुलं वर्धयति साध्वी पुष्टिर्गृहे परा । साध्वी लक्ष्मी रतिः साक्षात्प्रतिष्ठा सन्ततिस्तथा ॥

sādhvī kulaṃ vardhayati sādhvī puṣṭirgṛhe parā | sādhvī lakṣmī ratiḥ sākṣātpratiṣṭhā santatistathā

साध्वी स्त्री कुल को बढ़ाती है; साध्वी स्त्री घर में परम पुष्टि है। साध्वी स्त्री साक्षात् लक्ष्मी, रति, प्रतिष्ठा और सन्तति है।"

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