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अनुशासन पर्व · अध्याय 64

अङ्गिरा द्वारा गौतम को तीर्थों के फल का उपदेश

युधिष्ठिर पृथ्वी के पुण्य तीर्थों के विषय में पूछते हैं, और भीष्म वही कहते हैं जो ऋषि अङ्गिरा ने गौतम को बताया था। अङ्गिरा कश्मीर और हिमालय से लेकर प्रयाग, गया और विन्ध्य तक नदियों, सरोवरों, आश्रमों और पर्वतों के नाम गिनाते हैं और बताते हैं कि वहाँ स्नान और उपवास करने वाले को क्या फल मिलता है: यज्ञों का फल, स्वर्ग, पापों से मुक्ति। वे यह भी कहते हैं कि जो तीर्थ पहुँच से बाहर हों, उनकी यात्रा मन से की जा सकती है; अन्त में भीष्म इस उपदेश को सुनने और जपने की महिमा कहते हैं।

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.64.1)

तीर्थानां दर्शनं श्रेयः स्नानं च भरतर्षभ । श्रवणं च महाप्राज्ञ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥

tīrthānāṃ darśanaṃ śreyaḥ snānaṃ ca bharatarṣabha | śravaṇaṃ ca mahāprājña śrotumicchāmi tattvataḥ

हे भरतश्रेष्ठ! तीर्थों का दर्शन और उनमें स्नान कल्याणकारी है, और हे महाप्राज्ञ! उनके विषय में सुनना भी। मैं उनके विषय में यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 2 (13.64.2)

पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि भरतर्षभ । वक्तुमर्हसि मे तानि श्रोताऽस्मि नियतं प्रभो ॥

pṛthivyāṃ yāni tīrthāni puṇyāni bharatarṣabha | vaktumarhasi me tāni śrotā'smi niyataṃ prabho

हे भरतश्रेष्ठ! पृथ्वी पर जो-जो पुण्य तीर्थ हैं, उन्हें बताने की कृपा कीजिए, हे प्रभो! मैं एकाग्र होकर सुनने वाला हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.64.3)

इममङ्गिरसा प्रोक्तं तीर्थवंशं महाद्युते । श्रोतुमर्हसि भद्रं ते प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् ॥

imamaṅgirasā proktaṃ tīrthavaṃśaṃ mahādyute | śrotumarhasi bhadraṃ te prāpsyase dharmamuttamam

हे महातेजस्वी! अङ्गिरा ने तीर्थों की जो परम्परा कही थी, उसे तुम्हें सुनना चाहिए। तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हें उत्तम धर्म की प्राप्ति होगी।

श्लोक 4 (13.64.4)

तपोवनगतं विप्रमभिगम्य महामुनिम् । पप्रच्छाङ्गिरसं धीरं गौतमः संशितव्रतः ॥

tapovanagataṃ vipramabhigamya mahāmunim | papracchāṅgirasaṃ dhīraṃ gautamaḥ saṃśitavrataḥ

दृढ़ व्रत वाले गौतम तपोवन में गए हुए धीर महामुनि विप्र अङ्गिरा के पास पहुँचे और उनसे पूछा।

गौतम उवाच

श्लोक 5 (13.64.5)

अस्ति मे भगवन्कश्चित्तीर्थेभ्यो धर्मसंशयः । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंस महामुने ॥

asti me bhagavankaścittīrthebhyo dharmasaṃśayaḥ | tatsarvaṃ śrotumicchāmi tanme śaṃsa mahāmune

भगवन्! तीर्थों के विषय में मुझे धर्म-सम्बन्धी एक संशय है। मैं वह सब सुनना चाहता हूँ; हे महामुने! आप मुझे बताइए।

श्लोक 6 (13.64.6)

उपस्पृश्य फलं किं स्यात्तेषु तीर्थेषु वै मुने । प्रेत्यभावे महाप्राज्ञ तद्यथाऽस्ति तथा वद ॥

upaspṛśya phalaṃ kiṃ syātteṣu tīrtheṣu vai mune | pretyabhāve mahāprājña tadyathā'sti tathā vada

हे मुने! उन तीर्थों में स्नान-आचमन करने से क्या फल मिलता है? हे महाप्राज्ञ! परलोक में जैसा फल होता है, वैसा ही मुझे बताइए।

अङ्गिरा उवाच

श्लोक 7 (13.64.7)

सप्ताहं चन्द्रभागां वै वितस्तामूर्मिमालिनीम् । विगाह्य वै निराहारो निर्मलो मुनिवद्भवेत् ॥

saptāhaṃ candrabhāgāṃ vai vitastāmūrmimālinīm | vigāhya vai nirāhāro nirmalo munivadbhavet

जो मनुष्य सात दिन तक निराहार रहकर चन्द्रभागा और तरङ्गमालाओं वाली वितस्ता में स्नान करता है, वह निर्मल होकर मुनि के समान हो जाता है।

श्लोक 8 (13.64.8)

काश्मीरमण्डले नद्यो याः पतन्ति महास्वनम् । ता नदीः सिन्धुमासाद्य शीलवान्स्वर्गमाप्नुयात् ॥

kāśmīramaṇḍale nadyo yāḥ patanti mahāsvanam | tā nadīḥ sindhumāsādya śīlavānsvargamāpnuyāt

कश्मीर प्रदेश में जो नदियाँ बड़े घोष के साथ गिरती हैं, उन नदियों और सिन्धु तक पहुँचकर शीलवान् मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है।

श्लोक 9 (13.64.9)

पुष्करं च प्रभासं च नैमिषं सागरोदकम् । देविकामिन्द्रमार्गं च स्वर्णबिन्दुं विगाह्य च ॥

puṣkaraṃ ca prabhāsaṃ ca naimiṣaṃ sāgarodakam | devikāmindramārgaṃ ca svarṇabinduṃ vigāhya ca

पुष्कर, प्रभास, नैमिष, सागरोदक, देविका, इन्द्रमार्ग और स्वर्णबिन्दु में स्नान करके,

श्लोक 10 (13.64.10)

विबोध्यते विमानस्थः सोऽप्सरोभिरभिष्टुतः । हिरण्यबिन्दुमालक्ष्य प्रयतश्चाभिवाद्य च ॥

vibodhyate vimānasthaḥ so'psarobhirabhiṣṭutaḥ | hiraṇyabindumālakṣya prayataścābhivādya ca

वह विमान में बैठा हुआ अप्सराओं द्वारा स्तुति किया जाता हुआ जगाया जाता है; और संयत होकर हिरण्यबिन्दु का दर्शन करके तथा उसे प्रणाम करके,

श्लोक 11 (13.64.11)

कुशेशये च देवत्वं धूयते तस्य किल्बिषम् । इन्द्रतोयां समासाद्य गन्धमादनसन्निधौ ॥

kuśeśaye ca devatvaṃ dhūyate tasya kilbiṣam | indratoyāṃ samāsādya gandhamādanasannidhau

कुशेशय में उसे देवत्व प्राप्त होता है और उसका पाप धुल जाता है; और गन्धमादन के समीप इन्द्रतोया में पहुँचकर,

श्लोक 12 (13.64.12)

करतोयां कुरुङ्गे च त्रिरात्रोपोषितो नरः । अश्वमेधमवाप्नोति विगाह्य प्रयतः शुचिः ॥

karatoyāṃ kuruṅge ca trirātropoṣito naraḥ | aśvamedhamavāpnoti vigāhya prayataḥ śuciḥ

और कुरङ्ग देश में करतोया में स्नान करके, तीन रात उपवास करने वाला, संयमी और पवित्र मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 13 (13.64.13)

गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते । तथा कनखले स्नात्वा धूतपाप्मा दिवं व्रजेत् ॥

gaṅgādvāre kuśāvarte bilvake nīlaparvate | tathā kanakhale snātvā dhūtapāpmā divaṃ vrajet

गङ्गाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत तथा कनखल में स्नान करके मनुष्य पाप धोकर स्वर्ग को जाता है।

श्लोक 14 (13.64.14)

अपां ह्रद उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् । ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यसन्धस्त्वहिंसकः ॥

apāṃ hrada upaspṛśya vājimedhaphalaṃ labhet | brahmacārī jitakrodhaḥ satyasandhastvahiṃsakaḥ

जो ब्रह्मचारी, क्रोध को जीतने वाला, सत्य-प्रतिज्ञ और अहिंसक पुरुष अपां ह्रद (जलाशय) में आचमन-स्नान करता है, वह अश्वमेध का फल पाता है।

श्लोक 15 (13.64.15)

यत्र भागीरथी गङ्गा वहते दिशमुत्तरम् । महेश्वरस्य त्रिस्थाने यो नरस्त्वभिषिच्यते ॥

yatra bhāgīrathī gaṅgā vahate diśamuttaram | maheśvarasya tristhāne yo narastvabhiṣicyate

जहाँ भागीरथी गङ्गा उत्तर दिशा की ओर बहती है, महेश्वर के उस त्रिस्थान में जो मनुष्य स्नान करके अभिषिक्त होता है,

श्लोक 16 (13.64.16)

एकमासं निराहारः स पश्यति हि देवताः । सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च इन्द्रमार्गे च तर्पयन् ॥

ekamāsaṃ nirāhāraḥ sa paśyati hi devatāḥ | saptagaṅge trigaṅge ca indramārge ca tarpayan

वह एक मास निराहार रहकर देवताओं के दर्शन करता है। सप्तगङ्ग, त्रिगङ्ग और इन्द्रमार्ग में तर्पण करता हुआ,

श्लोक 17 (13.64.17)

अर्थान्वै लभते भोक्तुं यो नरो जायते पुनः । महाश्रम उपस्पृश्य योऽग्निहोत्रपरः शुचिः ॥

arthānvai labhate bhoktuṃ yo naro jāyate punaḥ | mahāśrama upaspṛśya yo'gnihotraparaḥ śuciḥ

पुनर्जन्म लेने पर वह मनुष्य भोगने के लिए धन पाता है। जो पवित्र, अग्निहोत्र-परायण पुरुष महाश्रम में आचमन-स्नान करता है,

श्लोक 18 (13.64.18)

एकमासं निराहारः सिद्धिं मासेन स व्रजेत् । महाह्रद उपस्पृश्य भृगुतुङ्गे त्वलोलुपः ॥

ekamāsaṃ nirāhāraḥ siddhiṃ māsena sa vrajet | mahāhrada upaspṛśya bhṛgutuṅge tvalolupaḥ

और एक मास निराहार रहता है, वह एक ही मास में सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो निर्लोभ पुरुष महाह्रद और भृगुतुङ्ग में आचमन-स्नान करके

श्लोक 19 (13.64.19)

त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया । कन्याकूप उपस्पृश्य बलाकायां कृतोदकः ॥

trirātropoṣito bhūtvā mucyate brahmahatyayā | kanyākūpa upaspṛśya balākāyāṃ kṛtodakaḥ

तीन रात उपवास करता है, वह ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है। जो कन्याकूप और बलाका में जलदान (तर्पण) करता है,

श्लोक 20 (13.64.20)

देवेषु लभते कीर्तिं यशसा च विराजते ॥

deveṣu labhate kīrtiṃ yaśasā ca virājate

वह देवताओं में कीर्ति पाता है और यश से शोभित होता है।

श्लोक 21 (13.64.21)

देविकायामुपस्पृश्य तथा सुन्दरिकाह्रदे । अश्विन्यां रूपवर्चस्कं प्रेत्य वै लभते नरः ॥

devikāyāmupaspṛśya tathā sundarikāhrade | aśvinyāṃ rūpavarcaskaṃ pretya vai labhate naraḥ

जो मनुष्य देविका में, सुन्दरिका सरोवर में तथा अश्विनी तीर्थ में आचमन-स्नान करता है, वह मरने के बाद रूप और तेज पाता है।

श्लोक 22 (13.64.22)

महागङ्गामुपस्पृश्य कृत्तिकाङ्गारके तथा । पक्षमेकं निराहारः स्वर्गमाप्नोति निर्मलः ॥

mahāgaṅgāmupaspṛśya kṛttikāṅgārake tathā | pakṣamekaṃ nirāhāraḥ svargamāpnoti nirmalaḥ

महागङ्गा और कृत्तिकाङ्गारक में आचमन-स्नान करके एक पक्ष निराहार रहने वाला मनुष्य निर्मल होकर स्वर्ग पाता है।

श्लोक 23 (13.64.23)

वैमानिक उपस्पृश्य किङ्किणीकाश्रमे तथा । निवासेऽप्सरसां दिव्ये कामचारी महीयते ॥

vaimānika upaspṛśya kiṅkiṇīkāśrame tathā | nivāse'psarasāṃ divye kāmacārī mahīyate

वैमानिक तथा किङ्किणी के आश्रम में आचमन-स्नान करके वह अप्सराओं के दिव्य निवास में इच्छानुसार विचरता हुआ सम्मान पाता है।

श्लोक 24 (13.64.24)

कालिकाश्रममासाद्य विपाशायां कृतोदकः । ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं मुच्यते भवात् ॥

kālikāśramamāsādya vipāśāyāṃ kṛtodakaḥ | brahmacārī jitakrodhastrirātraṃ mucyate bhavāt

कालिका के आश्रम में पहुँचकर विपाशा में जलदान करने वाला ब्रह्मचारी, क्रोध को जीतने वाला मनुष्य तीन रात में संसार से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 25 (13.64.25)

आश्रमे कृत्तिकानां तु स्नात्वा यस्तर्पयेत्पितॄन् । तोषयित्वा महादेवं निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥

āśrame kṛttikānāṃ tu snātvā yastarpayetpitṝn | toṣayitvā mahādevaṃ nirmalaḥ svargamāpnuyāt

जो कृत्तिकाओं के आश्रम में स्नान करके पितरों का तर्पण करता है, वह महादेव को प्रसन्न करके निर्मल होकर स्वर्ग जाता है।

श्लोक 26 (13.64.26)

महाकूपमुपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितः शुचिः । त्रसानां स्थावराणां च द्विपदानां भयं त्यजेत् ॥

mahākūpamupaspṛśya trirātropoṣitaḥ śuciḥ | trasānāṃ sthāvarāṇāṃ ca dvipadānāṃ bhayaṃ tyajet

जो पवित्र मनुष्य महाकूप में आचमन-स्नान करके तीन रात उपवास करता है, वह चर, अचर और द्विपद प्राणियों से होने वाले भय को त्याग देता है।

श्लोक 27 (13.64.27)

देवदारुवने स्नात्वा धूतपाप्मा कृतोदकः । देवशब्दमवाप्नोति सप्तरात्रोषितः शुचिः ॥

devadāruvane snātvā dhūtapāpmā kṛtodakaḥ | devaśabdamavāpnoti saptarātroṣitaḥ śuciḥ

देवदारु वन में स्नान और जलदान करके पाप धो देने वाला, सात रात वहाँ रहने वाला पवित्र मनुष्य 'देव' शब्द (देवत्व) प्राप्त करता है।

श्लोक 28 (13.64.28)

शरस्तम्बे कुशस्तम्बे द्रोणशर्मपदे तथा । अपांप्रपतनासेवी सेव्यते सोप्सरोगणैः ॥

śarastambe kuśastambe droṇaśarmapade tathā | apāṃprapatanāsevī sevyate sopsarogaṇaiḥ

शरस्तम्ब, कुशस्तम्ब, द्रोणशर्मा के आश्रम-स्थान और अपांप्रपतन का सेवन करने वाला मनुष्य अप्सराओं के समूहों से सेवित होता है।

श्लोक 29 (13.64.29)

चित्रकूटे जनस्थाने तथा मन्दाकिनीजले । विगाह्य वै निराहारो राजलक्ष्म्या निषेव्यते ॥

citrakūṭe janasthāne tathā mandākinījale | vigāhya vai nirāhāro rājalakṣmyā niṣevyate

चित्रकूट, जनस्थान तथा मन्दाकिनी के जल में निराहार रहकर स्नान करने वाला मनुष्य राजलक्ष्मी से सेवित होता है।

श्लोक 30 (13.64.30)

श्यामायास्त्वाश्रमं गत्वा उषित्वा चाभिषिच्य च । एकपक्षं निराहारस्त्वन्तर्धानफलं लभेत् ॥

śyāmāyāstvāśramaṃ gatvā uṣitvā cābhiṣicya ca | ekapakṣaṃ nirāhārastvantardhānaphalaṃ labhet

श्यामा के आश्रम में जाकर वहाँ रहने और स्नान करने वाला मनुष्य एक पक्ष निराहार रहकर अन्तर्धान होने की शक्ति का फल पाता है।

श्लोक 31 (13.64.31)

कौशिकीं तु समासाद्य वायुभक्षस्त्वलोलुपः । एकविंशतिरात्रेण स्वर्गमारोहते नरः ॥

kauśikīṃ tu samāsādya vāyubhakṣastvalolupaḥ | ekaviṃśatirātreṇa svargamārohate naraḥ

कौशिकी के तट पर पहुँचकर वायु ही पीकर रहने वाला, लोभरहित मनुष्य इक्कीस रात में स्वर्ग पर चढ़ता है।

श्लोक 32 (13.64.32)

मतङ्गवाप्यां यः स्नायादेकरात्रेण सिध्यति । विगाहति ह्यनालम्बमन्धकं वै सनातनम् ॥

mataṅgavāpyāṃ yaḥ snāyādekarātreṇa sidhyati | vigāhati hyanālambamandhakaṃ vai sanātanam

जो मतङ्गवापी में स्नान करता है, वह एक ही रात में सिद्धि पा लेता है; वह आधाररहित सनातन अन्धक में अवगाहन करता है।

श्लोक 33 (13.64.33)

नैमिषे स्वर्गतीर्थे च उपस्पृश्य जितेन्द्रियः । फलं पुरुषमेधस्य लभेन्मासं कृतोदकः ॥

naimiṣe svargatīrthe ca upaspṛśya jitendriyaḥ | phalaṃ puruṣamedhasya labhenmāsaṃ kṛtodakaḥ

नैमिष में तथा स्वर्गतीर्थ में आचमन-स्नान करके जितेन्द्रिय मनुष्य एक मास तक जलदान करे तो पुरुषमेध का फल पाता है।

श्लोक 34 (13.64.34)

गङ्गाह्रद उपस्पृश्य तथा चैवोत्पलावने । अश्वमेधमवाप्नोति तत्र मासं कृतोदकः ॥

gaṅgāhrada upaspṛśya tathā caivotpalāvane | aśvamedhamavāpnoti tatra māsaṃ kṛtodakaḥ

गङ्गाह्रद में तथा उत्पलावन में आचमन-स्नान करके जो वहाँ एक मास जलदान करता है, वह अश्वमेध का फल पाता है।

श्लोक 35 (13.64.35)

गङ्गायमुनयोस्तीर्थे तथा कालञ्जरे गिरौ । दशाश्वमेधानाप्नोति तत्र मासं कृतोदकः ॥

gaṅgāyamunayostīrthe tathā kālañjare girau | daśāśvamedhānāpnoti tatra māsaṃ kṛtodakaḥ

गङ्गा और यमुना के तीर्थ में तथा कालञ्जर पर्वत पर जो वहाँ एक मास जलदान करता है, वह दस अश्वमेध यज्ञों का फल पाता है।

श्लोक 36 (13.64.36)

यष्टिह्रद उपस्पृश्य चान्नदानाद्विशिष्यते ॥

yaṣṭihrada upaspṛśya cānnadānādviśiṣyate

यष्टिह्रद में आचमन-स्नान करने वाला मनुष्य अन्नदान से भी बढ़कर फल पाता है।

श्लोक 37 (13.64.37)

दशतीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथाऽपराः । समागच्छन्ति माघ्यां तु प्रयागे भरतर्षभ ॥

daśatīrthasahasrāṇi tisraḥ koṭyastathā'parāḥ | samāgacchanti māghyāṃ tu prayāge bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! माघ की पूर्णिमा के दिन प्रयाग में दस हजार तीर्थ और उनके अतिरिक्त तीन करोड़ तीर्थ आकर एकत्र होते हैं।

श्लोक 38 (13.64.38)

माघमासं प्रयागे तु नियतः संशितव्रतः । स्नात्वा तु भरतश्रेष्ठ निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥

māghamāsaṃ prayāge tu niyataḥ saṃśitavrataḥ | snātvā tu bharataśreṣṭha nirmalaḥ svargamāpnuyāt

हे भरतश्रेष्ठ! जो नियमपूर्वक दृढ़ व्रत लेकर पूरे माघ मास में प्रयाग में स्नान करता है, वह निर्मल होकर स्वर्ग पाता है।

श्लोक 39 (13.64.39)

मरुद्गण उपस्पृश्य पितॄणामाश्रमे शुचिः । वैवस्वतस्य तीर्थे च तीर्थभूतो भवेन्नरः ॥

marudgaṇa upaspṛśya pitṝṇāmāśrame śuciḥ | vaivasvatasya tīrthe ca tīrthabhūto bhavennaraḥ

पवित्र मनुष्य मरुद्गण, पितरों के आश्रम और वैवस्वत (यम) के तीर्थ में आचमन-स्नान करके स्वयं तीर्थरूप हो जाता है।

श्लोक 40 (13.64.40)

तथा ब्रह्मसरो गत्वा भागीरथ्यां कृतोदकः । एकमासं निराहारः सोमलोकमवाप्नुयात् ॥

tathā brahmasaro gatvā bhāgīrathyāṃ kṛtodakaḥ | ekamāsaṃ nirāhāraḥ somalokamavāpnuyāt

इसी प्रकार ब्रह्मसर में जाकर भागीरथी में जलदान करके एक मास निराहार रहने वाला मनुष्य सोमलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 41 (13.64.41)

उत्पातके नरः स्नात्वा अष्टावक्रे कृतोदकः । द्वादशाहं निराहारो नरमेधफलं लभेत् ॥

utpātake naraḥ snātvā aṣṭāvakre kṛtodakaḥ | dvādaśāhaṃ nirāhāro naramedhaphalaṃ labhet

उत्पातक में स्नान करके और अष्टावक्र में जलदान करके बारह दिन निराहार रहने वाला मनुष्य नरमेध का फल पाता है।

श्लोक 42 (13.64.42)

अश्मपृष्ठे गयायां च निरविन्दे च पर्वते । तृतीयां क्रौञ्चपद्यां च ब्रह्महत्यां विशुध्यते ॥

aśmapṛṣṭhe gayāyāṃ ca niravinde ca parvate | tṛtīyāṃ krauñcapadyāṃ ca brahmahatyāṃ viśudhyate

अश्मपृष्ठ, गया, निरविन्द पर्वत और तीसरे क्रौञ्चपदी तीर्थ में मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 43 (13.64.43)

कलविङ्क उपस्पृश्य विद्याच्च बहुशो जलम् । अग्नेः पुरे नरः स्नात्वा अग्निकन्यापुरे वसेत् ॥

kalaviṅka upaspṛśya vidyācca bahuśo jalam | agneḥ pure naraḥ snātvā agnikanyāpure vaset

कलविङ्क में बार-बार जल का स्पर्श करके और विद्या प्राप्त करके, अग्नि के नगर में स्नान करने वाला मनुष्य अग्निकन्या के नगर में निवास करे।

श्लोक 44 (13.64.44)

करवीरपुरे स्नात्वा विशालायां कृतोदकः । देवह्रद उपस्पृश्य ब्रह्मभूतो विराजते ॥

karavīrapure snātvā viśālāyāṃ kṛtodakaḥ | devahrada upaspṛśya brahmabhūto virājate

करवीरपुर में स्नान करके, विशाला में जलदान करके और देवह्रद में आचमन-स्नान करके वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होकर शोभित होता है।

श्लोक 45 (13.64.45)

पुनरावर्तनन्दां च महानन्दां च सेव्य वै । नन्दने सेव्यते दान्तस्त्वप्सरोभिरहिंसकः ॥

punarāvartanandāṃ ca mahānandāṃ ca sevya vai | nandane sevyate dāntastvapsarobhirahiṃsakaḥ

जो संयमी, अहिंसक मनुष्य पुनरावर्त, नन्दा और महानन्दा का सेवन करता है, वह नन्दन वन में अप्सराओं द्वारा सेवित होता है।

श्लोक 46 (13.64.46)

उर्वशीं कृत्तिकायोगे गत्वा चैव समाहितः । लौहित्ये विधिवत्स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ॥

urvaśīṃ kṛttikāyoge gatvā caiva samāhitaḥ | lauhitye vidhivatsnātvā puṇḍarīkaphalaṃ labhet

जो कृत्तिका नक्षत्र के योग में एकाग्र मन से उर्वशी तीर्थ जाता है और लौहित्य में विधिपूर्वक स्नान करता है, वह पुण्डरीक यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 47 (13.64.47)

रामह्रद उपस्पृश्य विपाशायां कृतोदकः । द्वादशाहं निराहारः कल्मषाद्विप्रमुच्यते ॥

rāmahrada upaspṛśya vipāśāyāṃ kṛtodakaḥ | dvādaśāhaṃ nirāhāraḥ kalmaṣādvipramucyate

रामह्रद में आचमन-स्नान करके, विपाशा में जलदान करके और बारह दिन निराहार रहकर मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 48 (13.64.48)

महाह्रद उपस्पृश्य शुद्धेन मनसा नरः । एकमासं निराहारो जमदग्निगतिं लभेत् ॥

mahāhrada upaspṛśya śuddhena manasā naraḥ | ekamāsaṃ nirāhāro jamadagnigatiṃ labhet

जो मनुष्य शुद्ध मन से महाह्रद में आचमन-स्नान करके एक मास निराहार रहता है, वह जमदग्नि की गति को प्राप्त करता है।

श्लोक 49 (13.64.49)

विन्ध्ये संताप्य चात्मानं सत्यसन्धस्त्वहिंसकः । विनयात्तप आस्थाय मासेनैकेन सिध्यति ॥

vindhye saṃtāpya cātmānaṃ satyasandhastvahiṃsakaḥ | vinayāttapa āsthāya māsenaikena sidhyati

जो सत्य-प्रतिज्ञ और अहिंसक पुरुष विन्ध्य पर्वत पर अपने को तप से तपाता है और विनयपूर्वक तप का आश्रय लेता है, वह एक ही मास में सिद्धि पा लेता है।

श्लोक 50 (13.64.50)

मुण्डे ब्रह्मगया चैव निर्ऋतिं देवपर्वतम् । देवह्रदमुपस्पृश्य ब्रह्मभूतो विराजते । कुमारपदमास्थाय मासेनैकेन शुध्यति ॥

muṇḍe brahmagayā caiva nirṛtiṃ devaparvatam | devahradamupaspṛśya brahmabhūto virājate | kumārapadamāsthāya māsenaikena śudhyati

मुण्ड में, ब्रह्मगया में, निर्ऋति में और देवपर्वत पर; देवह्रद में आचमन-स्नान करके वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होकर शोभित होता है। कुमारपद का आश्रय लेकर वह एक ही मास में शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 51 (13.64.51)

नर्मदायामुपस्पृश्य तथा शूर्पारकोदके । एकपक्षं निराहारो राजपुत्रो विधीयते ॥

narmadāyāmupaspṛśya tathā śūrpārakodake | ekapakṣaṃ nirāhāro rājaputro vidhīyate

नर्मदा में तथा शूर्पारक के जल में आचमन-स्नान करके एक पक्ष निराहार रहने वाला मनुष्य राजपुत्र के रूप में जन्म पाता है।

श्लोक 52 (13.64.52)

जम्बूमार्गे त्रिभिर्मासैः संयतः सुसमाहितः । अहोरात्रेण चैकेन सिद्धिं समधिगच्छति ॥

jambūmārge tribhirmāsaiḥ saṃyataḥ susamāhitaḥ | ahorātreṇa caikena siddhiṃ samadhigacchati

जम्बूमार्ग में तीन मास तक संयत और एकाग्र रहने वाला मनुष्य एक ही दिन-रात में सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 53 (13.64.53)

कोकामुखे विगाह्याथ गत्वा चाञ्जलिकाश्रमम् । शाकभक्षश्चीरवासाः कुमारीर्विन्दते दश ॥

kokāmukhe vigāhyātha gatvā cāñjalikāśramam | śākabhakṣaścīravāsāḥ kumārīrvindate daśa

कोकामुख में स्नान करके और अञ्जलिका के आश्रम में जाकर, शाक खाने वाला और वल्कल पहनने वाला मनुष्य दस कन्याओं को पाता है।

श्लोक 54 (13.64.54)

वैवस्वतस्य सदनं न स गच्छेत्कदाचन । यस्य कन्याह्रदे वासो देवलोकं स गच्छति ॥

vaivasvatasya sadanaṃ na sa gacchetkadācana | yasya kanyāhrade vāso devalokaṃ sa gacchati

वह विवस्वान् के पुत्र यम के भवन में कभी नहीं जाता; जिसका कन्याह्रद में निवास होता है, वह देवलोक को जाता है।

श्लोक 55 (13.64.55)

प्रभासे त्वेकरात्रेण अमावास्यां समाहितः । सिद्ध्यते तु महाबाहो यो नरो जायतेऽमरः ॥

prabhāse tvekarātreṇa amāvāsyāṃ samāhitaḥ | siddhyate tu mahābāho yo naro jāyate'maraḥ

हे महाबाहो! प्रभास में अमावास्या के दिन एकाग्र मन से एक ही रात में मनुष्य सिद्धि पा लेता है और अमर हो जाता है।

श्लोक 56 (13.64.56)

उज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टिषेणस्य चाश्रमे । पिङ्गायाश्चाश्रमे स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

ujjānaka upaspṛśya ārṣṭiṣeṇasya cāśrame | piṅgāyāścāśrame snātvā sarvapāpaiḥ pramucyate

उज्जानक में और आर्ष्टिषेण के आश्रम में आचमन-स्नान करके तथा पिङ्गा के आश्रम में स्नान करके मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 57 (13.64.57)

कुल्यायां समुपस्पृश्य जप्त्वा चैवाघमर्षणम् । अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥

kulyāyāṃ samupaspṛśya japtvā caivāghamarṣaṇam | aśvamedhamavāpnoti trirātropoṣito naraḥ

कुल्या में आचमन-स्नान करके और अघमर्षण का जप करके तीन रात उपवास करने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है।

श्लोक 58 (13.64.58)

पिण्डारक उपस्पृश्य एकरात्रोषितो नरः । अग्निष्टोममवाप्नोति प्रभातां शर्वरीं शुचिः ॥

piṇḍāraka upaspṛśya ekarātroṣito naraḥ | agniṣṭomamavāpnoti prabhātāṃ śarvarīṃ śuciḥ

पिण्डारक में आचमन-स्नान करके वहाँ एक रात उपवासपूर्वक बिताने वाला, प्रभात होने तक पवित्र रहने वाला मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है।

श्लोक 59 (13.64.59)

तथा ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् । पुण्डरीकमवाप्नोति उपस्पृश्य नरः शुचिः ॥

tathā brahmasaro gatvā dharmāraṇyopaśobhitam | puṇḍarīkamavāpnoti upaspṛśya naraḥ śuciḥ

इसी प्रकार धर्मारण्य से शोभित ब्रह्मसर में जाकर वहाँ आचमन-स्नान करने वाला पवित्र मनुष्य पुण्डरीक यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 60 (13.64.60)

मैनाके पर्वते स्नात्वा तथा सन्ध्यामुपास्य च । कामं जित्वा च वै मासं सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥

maināke parvate snātvā tathā sandhyāmupāsya ca | kāmaṃ jitvā ca vai māsaṃ sarvayajñaphalaṃ labhet

मैनाक पर्वत पर स्नान करके और सन्ध्योपासना करके एक मास तक काम को जीतने वाला मनुष्य सब यज्ञों का फल पाता है।

श्लोक 61 (13.64.61)

कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम् । अभ्येत्य योजनशताद्भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥

kālodakaṃ nandikuṇḍaṃ tathā cottaramānasam | abhyetya yojanaśatādbhrūṇahā vipramucyate

कालोदक, नन्दिकुण्ड और उत्तरमानस तीर्थों में सौ योजन दूर से भी आने पर भ्रूणहत्यारा मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 62 (13.64.62)

नन्दीश्वरस्य मूर्तिं तु दृष्ट्वा मुच्येत किल्बिषैः । स्वर्गमार्गे नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥

nandīśvarasya mūrtiṃ tu dṛṣṭvā mucyeta kilbiṣaiḥ | svargamārge naraḥ snātvā brahmalokaṃ sa gacchati

नन्दीश्वर की मूर्ति के दर्शन करके मनुष्य पापों से छूट जाता है; स्वर्गमार्ग तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 63 (13.64.63)

विख्यातो हिमवान्पुण्यः शंकरश्वशुरो गिरिः । आकरः सर्वरत्नानां सिद्धचारणसेवितः ॥

vikhyāto himavānpuṇyaḥ śaṃkaraśvaśuro giriḥ | ākaraḥ sarvaratnānāṃ siddhacāraṇasevitaḥ

प्रसिद्ध, पुण्यमय हिमालय पर्वत, जो शङ्कर के श्वशुर हैं, सब रत्नों की खान हैं और सिद्धों तथा चारणों से सेवित हैं,

श्लोक 64 (13.64.64)

दर्शनाद्गमनात्पूतो भवेदनशनादपि । शरीरमुत्सृजेत्तत्र विधिपूर्वमनाशके ॥

darśanādgamanātpūto bhavedanaśanādapi | śarīramutsṛjettatra vidhipūrvamanāśake

उसके दर्शन से, वहाँ जाने से और वहाँ उपवास करने से भी मनुष्य पवित्र हो जाता है। वहाँ विधिपूर्वक अनशन करके शरीर का त्याग करे।

श्लोक 65 (13.64.65)

अध्रुवं जीवितं ज्ञात्वा यो वै वेदान्तगो द्विजः । अभ्यर्च्य देवतास्तत्र नमस्कृत्य मुनींस्तथा ॥

adhruvaṃ jīvitaṃ jñātvā yo vai vedāntago dvijaḥ | abhyarcya devatāstatra namaskṛtya munīṃstathā

जीवन को अस्थिर जानकर जो वेदान्त के पारगामी द्विज वहाँ देवताओं की पूजा करके और मुनियों को नमस्कार करके,

श्लोक 66 (13.64.66)

ततः क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्थमावसेत् । न तेन किञ्चिन्न प्राप्तं तीर्थाभिगमनाद्भवेत् ॥

tataḥ krodhaṃ ca lobhaṃ ca yo jitvā tīrthamāvaset | na tena kiñcinna prāptaṃ tīrthābhigamanādbhavet

फिर क्रोध और लोभ को जीतकर किसी तीर्थ में निवास करता है, उसे तीर्थ-यात्रा से कुछ भी अप्राप्त नहीं रहता।

श्लोक 67 (13.64.67)

यान्यगम्यानि तीर्थानि दुर्गाणि विषमाणि च । मनसा तानि गम्यानि सर्वतीर्थसमीक्षया ॥

yānyagamyāni tīrthāni durgāṇi viṣamāṇi ca | manasā tāni gamyāni sarvatīrthasamīkṣayā

जो तीर्थ अगम्य, दुर्गम और विषम हैं, उनकी यात्रा मन से ही करनी चाहिए, सब तीर्थों का स्मरण करते हुए।

श्लोक 68 (13.64.68)

इदं मेध्यमिदं पुण्यमिदं स्वर्ग्यमनुत्तमम् । इदं रहस्यं वेदानामाप्लाव्यं पावनं तथा ॥

idaṃ medhyamidaṃ puṇyamidaṃ svargyamanuttamam | idaṃ rahasyaṃ vedānāmāplāvyaṃ pāvanaṃ tathā

यह पवित्र करने वाला है, पुण्यमय है, स्वर्ग देने वाला और सर्वोत्तम है। यह वेदों का रहस्य है, पवित्र स्नान के योग्य और पावन करने वाला भी।

श्लोक 69 (13.64.69)

इदं दद्याद्द्विजातीनां साधोरात्महितस्य च । सुहृदां च जपेत्कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ॥

idaṃ dadyāddvijātīnāṃ sādhorātmahitasya ca | suhṛdāṃ ca japetkarṇe śiṣyasyānugatasya ca

इसे द्विजातियों को, अपना हित चाहने वाले सज्जन को देना चाहिए और मित्रों तथा अनुगत शिष्य के कान में जपना चाहिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 70 (13.64.70)

दत्तवान्गौतमस्यैतदङ्गिरा वै महातपाः । अङ्गिराः समनुज्ञातः काश्यपेन च धीमता ॥

dattavāngautamasyaitadaṅgirā vai mahātapāḥ | aṅgirāḥ samanujñātaḥ kāśyapena ca dhīmatā

महातपस्वी अङ्गिरा ने यह उपदेश गौतम को दिया था; अङ्गिरा को बुद्धिमान् कश्यप की अनुमति प्राप्त थी।

श्लोक 71 (13.64.71)

महर्षीणामिदं जप्यं पावनानां तथोत्तमम् । जपंश्चाभ्युत्थितः शश्वन्निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥

maharṣīṇāmidaṃ japyaṃ pāvanānāṃ tathottamam | japaṃścābhyutthitaḥ śaśvannirmalaḥ svargamāpnuyāt

यह महर्षियों का जपने योग्य मन्त्र है, पावन करने वालों में भी उत्तम। जो इसे उठते ही निरन्तर जपता है, वह निर्मल होकर स्वर्ग पाता है।

श्लोक 72 (13.64.72)

इदं यश्चापि शृणुयाद्रहस्यं त्वङ्गिरोमतम् । उत्तमे च कुले जन्म लभेज्जातीश्च संस्मरेत् ॥

idaṃ yaścāpi śṛṇuyādrahasyaṃ tvaṅgiromatam | uttame ca kule janma labhejjātīśca saṃsmaret

और जो अङ्गिरा द्वारा बताए इस रहस्य को सुनता है, वह उत्तम कुल में जन्म पाता है और अपने पूर्वजन्मों का स्मरण करता है।

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