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अनुशासन पर्व · अध्याय 65

सिद्ध द्वारा गङ्गा की महिमा

अनेक महर्षि शरशय्या पर लेटे भीष्म से मिलने आते हैं, उनसे बातचीत करके अन्तर्धान हो जाते हैं; तब युधिष्ठिर पूछते हैं कि कौन-से देश, आश्रम, पर्वत और नदियाँ सबसे पवित्र हैं। भीष्म शिलवृत्ति और एक सिद्ध के प्राचीन संवाद से उत्तर देते हैं, जिसमें सिद्ध गङ्गा की विस्तार से महिमा गाता है: वह पापों को धोती है, मृतकों को स्वर्ग पहुँचाती है और सब प्राणियों की परम शरण है। भीष्म युधिष्ठिर को गङ्गा की उपासना का उपदेश देते हैं और पाण्डव प्रसन्न होते हैं।

अध्याय 64अध्याय-सूचीअध्याय 66

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (13.65.1)

बृहस्पतिसमं बुद्ध्या क्षमया ब्रह्मणः समम् । पराक्रमे शक्रसममादित्यसमतेजसम् ॥

bṛhaspatisamaṃ buddhyā kṣamayā brahmaṇaḥ samam | parākrame śakrasamamādityasamatejasam

बुद्धि में बृहस्पति के समान, क्षमा में ब्रह्मा के समान, पराक्रम में इन्द्र के समान और तेज में सूर्य के समान -

श्लोक 2 (13.65.2)

गाङ्गेयमर्जुनेनाजौ निहतं भूरितेजसम् । भ्रातृभिः सहितोऽन्यैश्च पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ॥

gāṅgeyamarjunenājau nihataṃ bhūritejasam | bhrātṛbhiḥ sahito'nyaiśca paryapṛcchadyudhiṣṭhiraḥ

युद्ध में अर्जुन के द्वारा गिराए गए उन महातेजस्वी गाङ्गेय से युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और अन्य लोगों के साथ प्रश्न किया।

श्लोक 3 (13.65.3)

शयानं वीरशयने कालाकाङ्क्षिणमच्युतम् । आजग्मुर्भरतश्रेष्ठं द्रष्टुकामा महर्षयः ॥

śayānaṃ vīraśayane kālākāṅkṣiṇamacyutam | ājagmurbharataśreṣṭhaṃ draṣṭukāmā maharṣayaḥ

वीरशय्या पर लेटे हुए, अपने स्थान से कभी न डिगनेवाले, मृत्यु के समय की प्रतीक्षा करते हुए उन भरतश्रेष्ठ को देखने की इच्छा से महर्षि वहाँ आए।

श्लोक 4 (13.65.4)

अत्रिर्वसिष्ठोऽथ भृगुः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । अङ्गिरा गौतमोऽगस्त्यः सुमतिः सुयतात्मवान् ॥

atrirvasiṣṭho'tha bhṛguḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ | aṅgirā gautamo'gastyaḥ sumatiḥ suyatātmavān

अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, गौतम, अगस्त्य और संयतचित्त सुमति।

श्लोक 5 (13.65.5)

विश्वामित्रः स्थूलशिराः संवर्तः प्रमतिर्दमः । बृहस्पत्युशनोव्यासश्च्यवनः काश्यपो ध्रुवः ॥

viśvāmitraḥ sthūlaśirāḥ saṃvartaḥ pramatirdamaḥ | bṛhaspatyuśanovyāsaścyavanaḥ kāśyapo dhruvaḥ

विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, उशना, व्यास, च्यवन, काश्यप और ध्रुव।

श्लोक 6 (13.65.6)

दुर्वासा जमदग्निश्च मार्कण्डेयोऽथ गालवः । भरद्वाजोऽथ रैभ्यश्च यवक्रीतस्त्रितस्तथा ॥

durvāsā jamadagniśca mārkaṇḍeyo'tha gālavaḥ | bharadvājo'tha raibhyaśca yavakrītastritastathā

दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत और त्रित।

श्लोक 7 (13.65.7)

स्थूलाक्षः शबलाक्षश्च कण्वो मेधातिथिः कृशः । नारदः पर्वतश्चैव सुधन्वाऽथैकतो द्विजः ॥

sthūlākṣaḥ śabalākṣaśca kaṇvo medhātithiḥ kṛśaḥ | nāradaḥ parvataścaiva sudhanvā'thaikato dvijaḥ

स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा और द्विज एकत।

श्लोक 8 (13.65.8)

नितंभूर्भुवनो धौम्यः शतानन्दोऽकृतव्रणः । जामदग्र्यस्तथा रामः कचश्चेत्येवमादयः । समागता महात्मानो भीष्मं द्रष्टुं महर्षयः ॥

nitaṃbhūrbhuvano dhaumyaḥ śatānando'kṛtavraṇaḥ | jāmadagryastathā rāmaḥ kacaścetyevamādayaḥ | samāgatā mahātmāno bhīṣmaṃ draṣṭuṃ maharṣayaḥ

नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्नि के पुत्र राम और कच तथा इसी प्रकार के और भी महात्मा महर्षि भीष्म को देखने के लिए एकत्र हुए थे।

श्लोक 9 (13.65.9)

तेषां महात्मनां पूजामागतानां युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सहितश्चक्रे यथावदनुपूर्वशः ॥

teṣāṃ mahātmanāṃ pūjāmāgatānāṃ yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṛbhiḥ sahitaścakre yathāvadanupūrvaśaḥ

आए हुए उन महात्माओं का युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ क्रम से यथाविधि सत्कार किया।

श्लोक 10 (13.65.10)

ते पूजिताः सुखासीनाः कथाश्चक्रुर्महर्षयः । भीष्माश्रिताः सुमधुराः सर्वेन्द्रियमनोहराः ॥

te pūjitāḥ sukhāsīnāḥ kathāścakrurmaharṣayaḥ | bhīṣmāśritāḥ sumadhurāḥ sarvendriyamanoharāḥ

सत्कार पाकर सुखपूर्वक बैठे हुए उन महर्षियों ने भीष्म को लक्ष्य करके अत्यन्त मधुर कथाएँ कहीं, जो सब इन्द्रियों और मन को हर लेनेवाली थीं।

श्लोक 11 (13.65.11)

भीष्मस्तेषां कथाः श्रुत्वा ऋषीणां भावितात्मनाम् । मेने दिविष्ठमात्मानं तुष्ट्या परमया युतः ॥

bhīṣmasteṣāṃ kathāḥ śrutvā ṛṣīṇāṃ bhāvitātmanām | mene diviṣṭhamātmānaṃ tuṣṭyā paramayā yutaḥ

शुद्ध अन्तःकरणवाले उन ऋषियों की कथाएँ सुनकर भीष्म परम सन्तोष से भर गए और अपने को स्वर्ग में स्थित-सा मानने लगे।

श्लोक 12 (13.65.12)

ततस्ते भीष्ममामन्त्र्य पाण्डवांश्च महर्षयः । अन्तर्धानं गताः सर्वे सर्वेषामेव पश्यताम् ॥

tataste bhīṣmamāmantrya pāṇḍavāṃśca maharṣayaḥ | antardhānaṃ gatāḥ sarve sarveṣāmeva paśyatām

तब वे सभी महर्षि भीष्म और पाण्डवों से विदा लेकर सबके देखते-देखते अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 13 (13.65.13)

तानृषीन्सुमहाभागानन्तर्धानगतानपि । पाण्डवास्तुष्टुवुः सर्वे प्रणेमुश्च मुहुर्मुहुः ॥

tānṛṣīnsumahābhāgānantardhānagatānapi | pāṇḍavāstuṣṭuvuḥ sarve praṇemuśca muhurmuhuḥ

अन्तर्धान हो जाने पर भी उन परम सौभाग्यशाली ऋषियों की सब पाण्डवों ने स्तुति की और बार-बार प्रणाम किया।

श्लोक 14 (13.65.14)

प्रसन्नमनसः सर्वे गाङ्गेयं कुरुसत्तमम् । उपतस्थुर्यथोद्यन्तमादित्यं मन्त्रकोविदाः ॥

prasannamanasaḥ sarve gāṅgeyaṃ kurusattamam | upatasthuryathodyantamādityaṃ mantrakovidāḥ

प्रसन्न मन से सबने कुरुश्रेष्ठ गाङ्गेय की उसी प्रकार उपासना की, जैसे मन्त्रों के जानकार उदय होते हुए सूर्य की उपासना करते हैं।

श्लोक 15 (13.65.15)

प्रभावं तपसस्तेषामृषीणां वीक्ष्य पाण्डवाः । प्रकाशन्तो दिशः सर्वा विस्मयं परमं ययुः ॥

prabhāvaṃ tapasasteṣāmṛṣīṇāṃ vīkṣya pāṇḍavāḥ | prakāśanto diśaḥ sarvā vismayaṃ paramaṃ yayuḥ

उन ऋषियों के तप का प्रभाव देखकर सब दिशाओं में प्रकाशित होते हुए पाण्डव परम विस्मय में पड़ गए।

श्लोक 16 (13.65.16)

महाभाग्यं परं तेषामृषीणामनुचिन्त्य ते । पाण्डवाः सह भीष्मेण कथाश्चक्रुस्तदाश्रयाः ॥

mahābhāgyaṃ paraṃ teṣāmṛṣīṇāmanucintya te | pāṇḍavāḥ saha bhīṣmeṇa kathāścakrustadāśrayāḥ

उन ऋषियों के परम माहात्म्य का चिन्तन करते हुए पाण्डवों ने भीष्म के साथ उन्हीं को लेकर बातचीत की।

श्लोक 17 (13.65.17)

कथान्ते शिरसा पादौ स्पृष्ट्वा भीष्मस्य पाण्डवः । धर्म्यं धर्मसुतः प्रश्नं पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ॥

kathānte śirasā pādau spṛṣṭvā bhīṣmasya pāṇḍavaḥ | dharmyaṃ dharmasutaḥ praśnaṃ paryapṛcchadyudhiṣṭhiraḥ

बातचीत समाप्त होने पर धर्मपुत्र पाण्डव युधिष्ठिर ने सिर से भीष्म के चरणों को छूकर धर्मविषयक प्रश्न पूछा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 18 (13.65.18)

के देशाः के जनपदा आश्रमाः के च पर्वताः । प्रकृष्टाः पुण्यतः काश्च ज्ञेया नद्यः पितामह ॥

ke deśāḥ ke janapadā āśramāḥ ke ca parvatāḥ | prakṛṣṭāḥ puṇyataḥ kāśca jñeyā nadyaḥ pitāmaha

पितामह, कौन-से देश, कौन-से जनपद, कौन-से आश्रम और कौन-से पर्वत पुण्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हैं? और कौन-सी नदियाँ ऐसी जाननी चाहिए?

भीष्म उवाच

श्लोक 19 (13.65.19)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शिलोञ्छवृत्तेः संवादं सिद्धस्य च युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | śiloñchavṛtteḥ saṃvādaṃ siddhasya ca yudhiṣṭhira

युधिष्ठिर, इस विषय में लोग यह प्राचीन इतिहास सुनाया करते हैं - शिलोञ्छवृत्ति से जीनेवाले एक गृहस्थ और एक सिद्ध का संवाद।

श्लोक 20 (13.65.20)

इमां कश्चित्परिक्रम्य पृथिवीं शैलभूषणाम् । असकृद्द्विपदां श्रेष्ठः श्रेष्ठस्य गृहमेधिनः ॥

imāṃ kaścitparikramya pṛthivīṃ śailabhūṣaṇām | asakṛddvipadāṃ śreṣṭhaḥ śreṣṭhasya gṛhamedhinaḥ

पर्वतों से सुशोभित इस पृथ्वी की बार-बार परिक्रमा करके मनुष्यों में श्रेष्ठ कोई एक श्रेष्ठ गृहस्थ के घर पहुँचा।

श्लोक 21 (13.65.21)

शिलवृत्तेर्गृहं प्राप्तः स तेन विधिनाऽर्चितः । उवास रजनीं तत्र सुमुखः सुखभागृषिः ॥

śilavṛttergṛhaṃ prāptaḥ sa tena vidhinā'rcitaḥ | uvāsa rajanīṃ tatra sumukhaḥ sukhabhāgṛṣiḥ

वह शिलवृत्ति के घर पहुँचा और उससे विधिपूर्वक सम्मानित हुआ। प्रसन्नमुख और सुख का भागी वह ऋषि वहाँ रात भर रहा।

श्लोक 22 (13.65.22)

शिलवृत्तिस्तु यत्कृत्यं प्रातस्तत्कृतवाञ्शुचिः । कृतकृत्यमुपातिष्ठत्सिद्धं तमतिथिं तदा ॥

śilavṛttistu yatkṛtyaṃ prātastatkṛtavāñśuciḥ | kṛtakṛtyamupātiṣṭhatsiddhaṃ tamatithiṃ tadā

प्रातःकाल पवित्र शिलवृत्ति ने अपना नित्यकर्म पूरा किया और फिर अपने कृतकृत्य अतिथि सिद्ध की सेवा में उपस्थित हुआ।

श्लोक 23 (13.65.23)

तौ समेत्य महात्मानौ सुखासीनौ कथाः शुभाः । चक्रतुर्वेदसम्बद्धास्तच्छेषकृतलक्षणाः ॥

tau sametya mahātmānau sukhāsīnau kathāḥ śubhāḥ | cakraturvedasambaddhāstaccheṣakṛtalakṣaṇāḥ

वे दोनों महात्मा मिलकर सुखपूर्वक बैठे और वेदसम्बन्धी शुभ कथाएँ करने लगे, जो शेष कर्तव्यों के अनुकूल थीं।

श्लोक 24 (13.65.24)

शिलवृत्तिः कथान्ते तु सिद्धमामन्त्र्य यत्नतः । प्रश्नं पप्रच्छ मेधावी यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥

śilavṛttiḥ kathānte tu siddhamāmantrya yatnataḥ | praśnaṃ papraccha medhāvī yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

कथा के अन्त में बुद्धिमान शिलवृत्ति ने सिद्ध को आदरपूर्वक सम्बोधित करके वही प्रश्न पूछा, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो।

शिलवृत्तिरुवाच

श्लोक 25 (13.65.25)

के देशाः के जनपदाः केऽऽश्रमाः के च पर्वताः । प्रकृष्टाः पुण्यतः काश्च ज्ञेया नद्यस्तदुच्यताम् ॥

ke deśāḥ ke janapadāḥ ke''śramāḥ ke ca parvatāḥ | prakṛṣṭāḥ puṇyataḥ kāśca jñeyā nadyastaducyatām

कौन-से देश, कौन-से जनपद, कौन-से आश्रम और कौन-से पर्वत पुण्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हैं, और कौन-सी नदियाँ ऐसी जाननी चाहिए? कृपया यह बताइए।

सिद्ध उवाच

श्लोक 26 (13.65.26)

ते देशास्ते जनपदास्तेऽऽश्रमास्ते च पर्वताः । येषां भागीरथी गङ्गा मध्येनैति सरिद्वरा ॥

te deśāste janapadāste''śramāste ca parvatāḥ | yeṣāṃ bhāgīrathī gaṅgā madhyenaiti saridvarā

वे ही देश, जनपद, आश्रम और पर्वत श्रेष्ठ हैं, जिनके बीच से नदियों में श्रेष्ठ भागीरथी गङ्गा बहती है।

श्लोक 27 (13.65.27)

तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुनः । गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गङ्गां संसेव्य यां लभेत् ॥

tapasā brahmacaryeṇa yajñaistyāgena vā punaḥ | gatiṃ tāṃ na labhejjanturgaṅgāṃ saṃsevya yāṃ labhet

जिस गति को प्राणी तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्याग से नहीं पाता, उसे वह गङ्गा का सेवन करके पा लेता है।

श्लोक 28 (13.65.28)

स्पृष्टानि येषां गाङ्गेयैस्तोयैर्गात्राणि देहिनाम् । न्यस्तानि न पुनस्तेषां त्यागः स्वर्गाद्विधीयते ॥

spṛṣṭāni yeṣāṃ gāṅgeyaistoyairgātrāṇi dehinām | nyastāni na punasteṣāṃ tyāgaḥ svargādvidhīyate

जिन देहधारियों के शरीर गङ्गा के जल से स्पर्श पाकर उसी में छोड़े गए हैं, उन्हें फिर स्वर्ग से च्युत नहीं होना पड़ता।

श्लोक 29 (13.65.29)

सर्वाणि येषां गाङ्गेयैस्तोयैः कार्याणि देहिनाम् । गां त्यक्त्वा मानवा विप्र दिवि तिष्ठन्ति ते जनाः ॥

sarvāṇi yeṣāṃ gāṅgeyaistoyaiḥ kāryāṇi dehinām | gāṃ tyaktvā mānavā vipra divi tiṣṭhanti te janāḥ

विप्र, जिन मनुष्यों के सभी कर्म गङ्गा के जल से सम्पन्न होते हैं, वे पृथ्वी को छोड़कर स्वर्ग में निवास करते हैं।

श्लोक 30 (13.65.30)

पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि ये नराः । पश्चाद्गङ्गां निषेवन्ते तेऽपि यान्त्युत्तमां गतिम् ॥

pūrve vayasi karmāṇi kṛtvā pāpāni ye narāḥ | paścādgaṅgāṃ niṣevante te'pi yāntyuttamāṃ gatim

जो मनुष्य पूर्व अवस्था में पापकर्म करके बाद में गङ्गा का सेवन करते हैं, वे भी उत्तम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 31 (13.65.31)

युक्ताश्च पातकैस्त्यक्त्वा देहं शुद्धा भवन्ति ते । मुच्यन्ते देहसंत्यागाद्गङ्गायमुनसङ्गमे ॥

yuktāśca pātakaistyaktvā dehaṃ śuddhā bhavanti te | mucyante dehasaṃtyāgādgaṅgāyamunasaṅgame

पापों से बँधे हुए लोग भी शरीर छोड़कर शुद्ध हो जाते हैं; गङ्गा-यमुना के संगम पर देह-त्याग करने से वे मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 32 (13.65.32)

स्नातानां शुचिभिस्तोयैर्गाङ्गेयैः प्रयतात्मनाम् । व्युष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि ॥

snātānāṃ śucibhistoyairgāṅgeyaiḥ prayatātmanām | vyuṣṭirbhavati yā puṃsāṃ na sā kratuśatairapi

गङ्गा के पवित्र जल में संयत मन से स्नान करनेवाले मनुष्यों को जो पुण्य की वृद्धि होती है, वह सैकड़ों यज्ञों से भी नहीं होती।

श्लोक 33 (13.65.33)

यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गातोयेषु तिष्ठति । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥

yāvadasthi manuṣyasya gaṅgātoyeṣu tiṣṭhati | tāvadvarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate

मनुष्य की अस्थि जितने समय तक गङ्गा के जल में रहती है, उतने हज़ार वर्षों तक वह स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 34 (13.65.34)

अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रविः । तथाऽपहत्य पाप्मानं भाति गङ्गाजलोक्षितः ॥

apahatya tamastīvraṃ yathā bhātyudaye raviḥ | tathā'pahatya pāpmānaṃ bhāti gaṅgājalokṣitaḥ

जैसे उदय होता हुआ सूर्य घने अन्धकार को दूर करके चमकता है, वैसे ही गङ्गाजल से सींचा हुआ मनुष्य पाप को दूर करके चमकता है।

श्लोक 35 (13.65.35)

विसोमा इव शर्वर्यो विपुष्पास्तरवो यथा । तद्वद्देशा दिशश्चैव हीना गङ्गाजलैः शिवैः ॥

visomā iva śarvaryo vipuṣpāstaravo yathā | tadvaddeśā diśaścaiva hīnā gaṅgājalaiḥ śivaiḥ

जैसे चन्द्रमा के बिना रात्रियाँ और फूलों के बिना वृक्ष, वैसे ही गङ्गा के मङ्गलमय जल के बिना देश और दिशाएँ हैं।

श्लोक 36 (13.65.36)

वर्णाश्रमा यथा सर्वे धर्मज्ञानविवर्जिताः । क्रतवश्च यथाऽसोमास्तथा गङ्गां विना जगत् ॥

varṇāśramā yathā sarve dharmajñānavivarjitāḥ | kratavaśca yathā'somāstathā gaṅgāṃ vinā jagat

जैसे अपने धर्म के ज्ञान से रहित सब वर्ण और आश्रम, और जैसे सोम के बिना यज्ञ, वैसे ही गङ्गा के बिना यह जगत् है।

श्लोक 37 (13.65.37)

यथा हीनं नभोऽर्केण भूः शैलैः खं च वायुना । तथा देशा दिशश्चैव गङ्गाहीना न संशयः ॥

yathā hīnaṃ nabho'rkeṇa bhūḥ śailaiḥ khaṃ ca vāyunā | tathā deśā diśaścaiva gaṅgāhīnā na saṃśayaḥ

जैसे सूर्य के बिना आकाश, पर्वतों के बिना पृथ्वी और वायु के बिना अन्तरिक्ष, वैसे ही गङ्गा के बिना देश और दिशाएँ हैं - इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 38 (13.65.38)

त्रिषु लोकेषु ये केचित्प्राणिनः सर्व एव ते । तर्प्यमाणाः परां तृप्तिं यान्ति गङ्गाजलैः शुभैः ॥

triṣu lokeṣu ye kecitprāṇinaḥ sarva eva te | tarpyamāṇāḥ parāṃ tṛptiṃ yānti gaṅgājalaiḥ śubhaiḥ

तीनों लोकों में जो कोई भी प्राणी हैं, वे सभी गङ्गा के पवित्र जल से तृप्त होकर परम तृप्ति पाते हैं।

श्लोक 39 (13.65.39)

अन्ये च देवा मुनयः प्रेतानि पितृभिः सह । तर्पितास्तृप्तिमायान्ति त्रिषु लोकेषु सर्वशः ॥

anye ca devā munayaḥ pretāni pitṛbhiḥ saha | tarpitāstṛptimāyānti triṣu lokeṣu sarvaśaḥ

अन्य देवता और मुनि तथा पितरों सहित प्रेत भी तर्पित होकर तीनों लोकों में सर्वत्र तृप्ति पाते हैं।

श्लोक 40 (13.65.40)

यस्तु सूर्येण निष्टप्तं गाङ्गेयं पिबते जलम् । गवां निर्हारनिर्मुक्ताद्यावकात्तद्विशिष्यते ॥

yastu sūryeṇa niṣṭaptaṃ gāṅgeyaṃ pibate jalam | gavāṃ nirhāranirmuktādyāvakāttadviśiṣyate

जो सूर्य की धूप से तपा हुआ गङ्गाजल पीता है, वह गायों के मल से निकाले हुए जौ पर रहनेवाले यावक-व्रत से भी बढ़कर है।

श्लोक 41 (13.65.41)

इन्दुव्रतसहस्रं तु यश्चरेत्कायशोधनम् । पिवेद्यश्चापि गङ्गाम्भः समौ स्यातां न वा समौ ॥

induvratasahasraṃ tu yaścaretkāyaśodhanam | pivedyaścāpi gaṅgāmbhaḥ samau syātāṃ na vā samau

कोई शरीर को शुद्ध करनेवाला चान्द्रायण व्रत हज़ार बार करे और कोई गङ्गाजल पिए - दोनों बराबर हों भी सकते हैं और नहीं भी।

श्लोक 42 (13.65.42)

तिष्ठेद्युगसहस्रं तु पदेनैकेन यः पुमान् । मासमेकं तु गङ्गायां समौ स्यातां न वा समौ ॥

tiṣṭhedyugasahasraṃ tu padenaikena yaḥ pumān | māsamekaṃ tu gaṅgāyāṃ samau syātāṃ na vā samau

कोई पुरुष एक पैर पर हज़ार युग खड़ा रहे और कोई गङ्गा तट पर एक मास रहे - दोनों बराबर हों भी सकते हैं और नहीं भी।

श्लोक 43 (13.65.43)

लम्बतेऽवाक्शिरा यस्तु युगानामयुतं पुमान् । तिष्ठेद्यथेष्टं यश्चापि गङ्गायां स विशिष्यते ॥

lambate'vākśirā yastu yugānāmayutaṃ pumān | tiṣṭhedyatheṣṭaṃ yaścāpi gaṅgāyāṃ sa viśiṣyate

जो पुरुष दस हज़ार युगों तक सिर नीचे करके लटका रहे और जो अपनी इच्छा से गङ्गा के किनारे रहे - इन दोनों में गङ्गा के किनारे रहनेवाला बढ़कर है।

श्लोक 44 (13.65.44)

अग्नौ प्रास्तं प्रधूयेत यथा तूलं द्विजोत्तम । तथा गङ्गावगाढस्य सर्वपापं प्रधूयते ॥

agnau prāstaṃ pradhūyeta yathā tūlaṃ dvijottama | tathā gaṅgāvagāḍhasya sarvapāpaṃ pradhūyate

द्विजश्रेष्ठ, जैसे आग में पड़ी रुई उड़ जाती है, वैसे ही गङ्गा में स्नान करनेवाले का सारा पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 45 (13.65.45)

भूतानामिह सर्वेषां दुःखोपहतचेतसाम् । गतिमन्वेषमाणानां न गङ्गासदृशी गतिः ॥

bhūtānāmiha sarveṣāṃ duḥkhopahatacetasām | gatimanveṣamāṇānāṃ na gaṅgāsadṛśī gatiḥ

इस संसार में दुःख से व्याकुल चित्तवाले और शरण खोजनेवाले सब प्राणियों के लिए गङ्गा के समान कोई गति नहीं है।

श्लोक 46 (13.65.46)

भवन्ति निर्विषाः सर्पा यथा तार्क्ष्यस्य दर्शनात् । गङ्गाया दर्शनात्तद्वत्सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

bhavanti nirviṣāḥ sarpā yathā tārkṣyasya darśanāt | gaṅgāyā darśanāttadvatsarvapāpaiḥ pramucyate

जैसे गरुड़ के दर्शन से सर्प विषहीन हो जाते हैं, वैसे ही गङ्गा के दर्शन से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 47 (13.65.47)

अप्रतिष्ठाश्च ये केचिदधर्मशरणाश्च ये । येषां प्रतिष्ठा गङ्गेह शरणं शर्म वर्म च ॥

apratiṣṭhāśca ye kecidadharmaśaraṇāśca ye | yeṣāṃ pratiṣṭhā gaṅgeha śaraṇaṃ śarma varma ca

जिनका कोई आधार नहीं है और जिन्होंने अधर्म का आश्रय ले रखा है, उनके लिए गङ्गा ही आधार, शरण, सुख और कवच है।

श्लोक 48 (13.65.48)

प्रकृष्टैरशुभैर्ग्रस्ताननेकैः पुरुषाधमान् । पततो नरके गङ्गा संश्रितान्प्रेत्य तारयेत् ॥

prakṛṣṭairaśubhairgrastānanekaiḥ puruṣādhamān | patato narake gaṅgā saṃśritānpretya tārayet

अनेक घोर अशुभ कर्मों से ग्रस्त और नरक में गिरते हुए अधम पुरुषों को भी, यदि वे गङ्गा की शरण में आए हों, गङ्गा मरने के बाद पार लगा देती है।

श्लोक 49 (13.65.49)

ते संविभक्ता मुनिभिर्नूनं देवैः सवासवैः । येऽभिगच्छन्ति सततं गङ्गां मतिमतांवर ॥

te saṃvibhaktā munibhirnūnaṃ devaiḥ savāsavaiḥ | ye'bhigacchanti satataṃ gaṅgāṃ matimatāṃvara

बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, जो निरन्तर गङ्गा के पास जाते हैं, वे निश्चय ही मुनियों और इन्द्र सहित देवताओं के कृपापात्र हैं।

श्लोक 50 (13.65.50)

विनयाचारहीनाश्च अशिवाश्च नराधमाः । ते भवन्ति शिवा विप्र ये वै गङ्गामुपाश्रिताः ॥

vinayācārahīnāśca aśivāśca narādhamāḥ | te bhavanti śivā vipra ye vai gaṅgāmupāśritāḥ

विप्र, जो अधम मनुष्य विनय और सदाचार से रहित तथा अमङ्गलकारी हैं, वे भी गङ्गा का आश्रय लेने पर मङ्गलमय हो जाते हैं।

श्लोक 51 (13.65.51)

यथा सुराणाममृतं पितॄणां च यथा स्वधा । सुधा यथा च नागानां तथा गङ्गाजलं नृणाम् ॥

yathā surāṇāmamṛtaṃ pitṝṇāṃ ca yathā svadhā | sudhā yathā ca nāgānāṃ tathā gaṅgājalaṃ nṛṇām

जैसे देवताओं के लिए अमृत, पितरों के लिए स्वधा और नागों के लिए सुधा है, वैसे ही मनुष्यों के लिए गङ्गाजल है।

श्लोक 52 (13.65.52)

उपासते यथा बाला मातरं क्षुधयाऽर्दिताः । श्रेयस्कामास्तथा गङ्गामुपासन्तीह देहिनः ॥

upāsate yathā bālā mātaraṃ kṣudhayā'rditāḥ | śreyaskāmāstathā gaṅgāmupāsantīha dehinaḥ

जैसे भूख से पीड़ित बालक माता के पास जाते हैं, वैसे ही कल्याण चाहनेवाले प्राणी यहाँ गङ्गा की उपासना करते हैं।

श्लोक 53 (13.65.53)

स्वायंभुवं यथा स्थानं सर्वेषां श्रेष्ठमुच्यते । स्थानानां सरितां श्रेष्ठा गङ्गा तद्वदिहोच्यते ॥

svāyaṃbhuvaṃ yathā sthānaṃ sarveṣāṃ śreṣṭhamucyate | sthānānāṃ saritāṃ śreṣṭhā gaṅgā tadvadihocyate

जैसे स्वयम्भू का धाम सब स्थानों में श्रेष्ठ कहा जाता है, वैसे ही स्थानों और नदियों में गङ्गा श्रेष्ठ कही जाती है।

श्लोक 54 (13.65.54)

उपजीव्या यथा धेनुर्लोकानां ब्राह्ममेव वा । हविषां तु यथा सोमस्तरणेषु तथा त्वियम् ॥

upajīvyā yathā dhenurlokānāṃ brāhmameva vā | haviṣāṃ tu yathā somastaraṇeṣu tathā tviyam

जैसे गौ लोकों का आधार है, अथवा जैसे वेद है, और जैसे हवियों में सोम है, वैसे ही पार उतारनेवाले साधनों में यह गङ्गा है।

श्लोक 55 (13.65.55)

यथोपजीविनां धेनुर्देवादीनां परा स्मृता । तथोपजीविनां गङ्गा सर्वप्राणभृतामिह ॥

yathopajīvināṃ dhenurdevādīnāṃ parā smṛtā | tathopajīvināṃ gaṅgā sarvaprāṇabhṛtāmiha

जैसे देवता आदि पर निर्भर रहनेवालों के लिए गौ परम मानी गई है, वैसे ही यहाँ सब प्राणियों के लिए गङ्गा है।

श्लोक 56 (13.65.56)

देवाः सोमार्कसंस्थानि यथा सत्रादिभिर्मखैः । अमृतान्युपजीवन्ति तथा गङ्गाजलं नराः ॥

devāḥ somārkasaṃsthāni yathā satrādibhirmakhaiḥ | amṛtānyupajīvanti tathā gaṅgājalaṃ narāḥ

जैसे देवता सत्र आदि यज्ञों के द्वारा चन्द्र और सूर्य में स्थित अमृतों से जीवन पाते हैं, वैसे ही मनुष्य गङ्गाजल से जीवन पाते हैं।

श्लोक 57 (13.65.57)

जाह्नवीपुलिनोत्थाभिः सिकताभिः समुक्षितम् । आत्मानं मन्यते लोको दिविष्ठमिव शोभितम् ॥

jāhnavīpulinotthābhiḥ sikatābhiḥ samukṣitam | ātmānaṃ manyate loko diviṣṭhamiva śobhitam

जाह्नवी के तट की बालू से अभिषिक्त मनुष्य अपने को स्वर्ग में स्थित-सा शोभायमान मानता है।

श्लोक 58 (13.65.58)

जाह्नवीतीरसम्भूतां मृदं मूर्ध्ना बिभर्ति यः । बिभर्ति रूपं सोऽर्कस्य तमोनाशाय निर्मलम् ॥

jāhnavītīrasambhūtāṃ mṛdaṃ mūrdhnā bibharti yaḥ | bibharti rūpaṃ so'rkasya tamonāśāya nirmalam

जो जाह्नवी के तट की मिट्टी को सिर पर धारण करता है, वह अन्धकार के नाश के लिए सूर्य का निर्मल रूप धारण करता है।

श्लोक 59 (13.65.59)

गङ्गोर्मिभिरथो दिग्धः पुरुषं पवनो यदा । स्पृशते सोऽस्य पाप्मानं सद्य एवापकर्षति ॥

gaṅgormibhiratho digdhaḥ puruṣaṃ pavano yadā | spṛśate so'sya pāpmānaṃ sadya evāpakarṣati

गङ्गा की लहरों से भीगी हुई वायु जब किसी पुरुष को छूती है, तो वह उसके पाप को तुरन्त खींच ले जाती है।

श्लोक 60 (13.65.60)

व्यसनैरभितप्तस्य नरस्य विनशिष्यतः । गङ्गादर्शनजा प्रीतिर्व्यसनान्यपकर्षति ॥

vyasanairabhitaptasya narasya vinaśiṣyataḥ | gaṅgādarśanajā prītirvyasanānyapakarṣati

विपत्तियों से तपे हुए और नष्ट होने को उद्यत मनुष्य के संकटों को गङ्गा के दर्शन से उत्पन्न प्रीति दूर कर देती है।

श्लोक 61 (13.65.61)

हंसारावैः कोकरवै रवैरन्यैश्च पक्षिणाम् । पस्पर्ध गङ्गा गन्धर्वान्पुलिनैश्च शिलोच्चयान् ॥

haṃsārāvaiḥ kokaravai ravairanyaiśca pakṣiṇām | paspardha gaṅgā gandharvānpulinaiśca śiloccayān

हंसों की पुकार, चकवों की बोली और पक्षियों के अन्य कलरवों से गङ्गा गन्धर्वों से होड़ करती है, और अपने तटों से पर्वतों से।

श्लोक 62 (13.65.62)

हंसादिभिः सुबहुभिर्विविधैः पक्षिभिर्वृताम् । गङ्गां गोकुलसम्बाधां दृष्ट्वा स्वर्गोऽपि विस्मृतः ॥

haṃsādibhiḥ subahubhirvividhaiḥ pakṣibhirvṛtām | gaṅgāṃ gokulasambādhāṃ dṛṣṭvā svargo'pi vismṛtaḥ

हंस आदि अनेक प्रकार के पक्षियों से घिरी और गौओं के झुण्डों से भरी गङ्गा को देखकर स्वर्ग भी भूल जाता है।

श्लोक 63 (13.65.63)

न सा प्रीतिर्दिविष्ठस्य सर्वकामानुपाश्नतः । सम्भवेद्या परा प्रीतिर्गङ्गायाः पुलिने नृणाम् ॥

na sā prītirdiviṣṭhasya sarvakāmānupāśnataḥ | sambhavedyā parā prītirgaṅgāyāḥ puline nṛṇām

सब कामनाओं का भोग करनेवाले स्वर्गवासी को भी वह प्रीति नहीं होती, जो परम प्रीति मनुष्यों को गङ्गा के तट पर होती है।

श्लोक 64 (13.65.64)

वाङ्मनःकर्मजैर्ग्रस्तः पापैरपि पुमानिह । वीक्ष्य गङ्गां भवेत्पूतोऽत्र मे नास्ति संशयः ॥

vāṅmanaḥkarmajairgrastaḥ pāpairapi pumāniha | vīkṣya gaṅgāṃ bhavetpūto'tra me nāsti saṃśayaḥ

वाणी, मन और कर्म से उत्पन्न पापों से ग्रस्त मनुष्य भी गङ्गा को देखकर पवित्र हो जाता है - इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 65 (13.65.65)

सप्तावरान्सप्त परान्पितॄंस्तेभ्यश्च ये परे । पुमांस्तारयते गङ्गां वीक्ष्य स्पृष्ट्वाऽवगाह्य च ॥

saptāvarānsapta parānpitṝṃstebhyaśca ye pare | pumāṃstārayate gaṅgāṃ vīkṣya spṛṣṭvā'vagāhya ca

गङ्गा को देखने, छूने और उसमें स्नान करने से मनुष्य अपने से नीचे की सात और ऊपर की सात पीढ़ियों को तथा उनसे भी ऊपर के पितरों को तार देता है।

श्लोक 66 (13.65.66)

श्रुताभिलषिता पीता स्पृष्टा दृष्टाऽवगाहिता । गङ्गा तारयते नॄणामुभौ वंशौ विशेषतः ॥

śrutābhilaṣitā pītā spṛṣṭā dṛṣṭā'vagāhitā | gaṅgā tārayate nṝṇāmubhau vaṃśau viśeṣataḥ

सुनी, चाही, पी, छुई, देखी और स्नान की गई गङ्गा मनुष्यों को तारती है, और विशेष रूप से उनके दोनों कुलों को।

श्लोक 67 (13.65.67)

तत्तीरगानां तपसा श्राद्धपारायणादिभिः । गङ्गाद्वारप्रभृतिभिस्तत्तीर्थैर्न परं नृणाम् ॥

tattīragānāṃ tapasā śrāddhapārāyaṇādibhiḥ | gaṅgādvāraprabhṛtibhistattīrthairna paraṃ nṛṇām

जो उसके तट पर जाते हैं, उनके लिए तप, श्राद्ध, पारायण आदि से और गङ्गाद्वार आदि उसके तीर्थों से बढ़कर मनुष्यों के लिए कुछ नहीं है।

श्लोक 68 (13.65.68)

सायं प्रातः स्मरेद्गङ्गां नित्यं स्नाने तु कीर्तयेत् । तर्पणे पितृपूजासु मरणे चापि संस्मरेत् ॥

sāyaṃ prātaḥ smaredgaṅgāṃ nityaṃ snāne tu kīrtayet | tarpaṇe pitṛpūjāsu maraṇe cāpi saṃsmaret

सायं और प्रातः गङ्गा का स्मरण करे, स्नान करते समय उसका नाम ले, तर्पण और पितृपूजा में तथा मृत्यु के समय भी उसका भली-भाँति स्मरण करे।

श्लोक 69 (13.65.69)

दर्शनात्स्पर्शनात्पानात्तथा गङ्गेति कीर्तनात् । पुनात्यपुण्यान्पुरुषाञ्शतशोऽथ सहस्रशः ॥

darśanātsparśanātpānāttathā gaṅgeti kīrtanāt | punātyapuṇyānpuruṣāñśataśo'tha sahasraśaḥ

दर्शन, स्पर्श, पान और 'गङ्गा' नाम के उच्चारण से वह सैकड़ों-हज़ारों पापी पुरुषों को पवित्र कर देती है।

श्लोक 70 (13.65.70)

य इच्छेत्सफलं जन्म जीवितं श्रुतमेव च । स पितॄंस्तर्पयेद्गङ्गामभिगम्य सुरांस्तथा ॥

ya icchetsaphalaṃ janma jīvitaṃ śrutameva ca | sa pitṝṃstarpayedgaṅgāmabhigamya surāṃstathā

जो अपने जन्म, जीवन और विद्या को सफल करना चाहे, वह गङ्गा के पास जाकर पितरों और देवताओं को तृप्त करे।

श्लोक 71 (13.65.71)

न श्रुतैर्न च वित्तेन कर्मणा न च तत्फलम् । प्राप्नुयात्पुरुषोऽत्यन्तं गङ्गां प्राप्य यदाप्नुयात् ॥

na śrutairna ca vittena karmaṇā na ca tatphalam | prāpnuyātpuruṣo'tyantaṃ gaṅgāṃ prāpya yadāpnuyāt

जो फल मनुष्य को गङ्गा के पास पहुँचकर मिलता है, उसे वह न शास्त्रज्ञान से, न धन से और न कर्म से पूर्णतः पा सकता है।

श्लोक 72 (13.65.72)

जात्यन्धैरिह तुल्यास्ते मृतैः पङ्गुभिरेव च । समर्था ये न पश्यन्ति गङ्गां पुण्यजलां शिवाम् ॥

jātyandhairiha tulyāste mṛtaiḥ paṅgubhireva ca | samarthā ye na paśyanti gaṅgāṃ puṇyajalāṃ śivām

जो समर्थ होकर भी पुण्यजला और मङ्गलमयी गङ्गा के दर्शन नहीं करते, वे जन्म से अन्धों, मृतकों और लँगड़ों के समान हैं।

श्लोक 73 (13.65.73)

भूतभव्यभविष्यज्ञैर्महर्षिभिरुपस्थिताम् । देवैः सेन्द्रैश्च को गङ्गां नोपसेवेत मानवः ॥

bhūtabhavyabhaviṣyajñairmaharṣibhirupasthitām | devaiḥ sendraiśca ko gaṅgāṃ nopaseveta mānavaḥ

भूत, वर्तमान और भविष्य को जाननेवाले महर्षियों तथा इन्द्र सहित देवताओं द्वारा सेवित गङ्गा की उपासना भला कौन मनुष्य नहीं करेगा?

श्लोक 74 (13.65.74)

वानप्रस्थैर्गृहस्थैश्च यतिभिर्ब्रह्मचारिभिः । विद्यावद्भिः श्रितां गङ्गां पुमान्को नाम नाश्रयेत् ॥

vānaprasthairgṛhasthaiśca yatibhirbrahmacāribhiḥ | vidyāvadbhiḥ śritāṃ gaṅgāṃ pumānko nāma nāśrayet

वानप्रस्थों, गृहस्थों, संन्यासियों, ब्रह्मचारियों और विद्वानों द्वारा आश्रित गङ्गा का आश्रय कौन मनुष्य नहीं लेगा?

श्लोक 75 (13.65.75)

उत्क्रामद्भिश्च यः प्राणैः प्रयतः शिष्टसम्मतः । चिन्तयेन्मनसा गङ्गां स गतिं परमांलभेत् ॥

utkrāmadbhiśca yaḥ prāṇaiḥ prayataḥ śiṣṭasammataḥ | cintayenmanasā gaṅgāṃ sa gatiṃ paramāṃlabhet

प्राण निकलते समय जो संयमी और सज्जनों द्वारा मान्य पुरुष मन से गङ्गा का चिन्तन करता है, वह परम गति पाता है।

श्लोक 76 (13.65.76)

न भयेभ्यो भयं तस्य न पापेभ्यो न राजतः । आदेहपतनाद्गङ्गामुपास्ते यः पुमानिह ॥

na bhayebhyo bhayaṃ tasya na pāpebhyo na rājataḥ | ādehapatanādgaṅgāmupāste yaḥ pumāniha

जो पुरुष यहाँ देह-पात तक गङ्गा की उपासना करता है, उसे न संकटों से भय है, न पापों से, न राजा से।

श्लोक 77 (13.65.77)

गगनाद्गां पतन्तीं वै महापुण्यां महेश्वरः । दधार शिरसा गङ्गां तामेव दिवि सेवते ॥

gaganādgāṃ patantīṃ vai mahāpuṇyāṃ maheśvaraḥ | dadhāra śirasā gaṅgāṃ tāmeva divi sevate

आकाश से पृथ्वी पर गिरती हुई महापुण्यमयी गङ्गा को महेश्वर ने अपने सिर पर धारण किया; स्वर्ग में भी वे उसी की सेवा करते हैं।

श्लोक 78 (13.65.78)

अलङ्कृतास्त्रयो लोकाः पथिभिर्विमलैस्त्रिभिः । यस्तु तस्या जलं सेवेत्कृतकृत्यः पुमान्भवेत् ॥

alaṅkṛtāstrayo lokāḥ pathibhirvimalaistribhiḥ | yastu tasyā jalaṃ sevetkṛtakṛtyaḥ pumānbhavet

उसके तीन निर्मल मार्गों से तीनों लोक अलंकृत हैं; जो उसके जल का सेवन करता है, वह कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 79 (13.65.79)

दिवि ज्योतिर्यथाऽऽदित्यः पितॄणां चैव चन्द्रमाः । देवेशश्च यथा नृणां गङ्गा च सरितां तथा ॥

divi jyotiryathā''dityaḥ pitṝṇāṃ caiva candramāḥ | deveśaśca yathā nṛṇāṃ gaṅgā ca saritāṃ tathā

जैसे आकाश में प्रकाश सूर्य है, पितरों के लिए चन्द्रमा है और मनुष्यों के लिए देवराज है, वैसे ही नदियों में गङ्गा है।

श्लोक 80 (13.65.80)

मात्रा पित्रा सुतैर्दारैर्विमुक्तस्य धनेन वा । न भवेद्धि तथा दुःखं यथा गङ्गावियोगजम् ॥

mātrā pitrā sutairdārairvimuktasya dhanena vā | na bhaveddhi tathā duḥkhaṃ yathā gaṅgāviyogajam

माता, पिता, पुत्र, स्त्री अथवा धन से बिछुड़े हुए मनुष्य को वैसा दुःख नहीं होता, जैसा गङ्गा के वियोग से होता है।

श्लोक 81 (13.65.81)

नारण्यैर्नेष्टविषयैर्न सुतैर्न धनागमैः । तथा प्रसादो भवति गङ्गां वीक्ष्य यथा भवेत् ॥

nāraṇyairneṣṭaviṣayairna sutairna dhanāgamaiḥ | tathā prasādo bhavati gaṅgāṃ vīkṣya yathā bhavet

न वन, न मनचाहे विषय, न पुत्र और न धन की प्राप्ति से वैसी प्रसन्नता होती है, जैसी गङ्गा को देखकर होती है।

श्लोक 82 (13.65.82)

पूर्णमिन्दुं यथा दृष्ट्वा नृणां दृष्टिः प्रसीदति । तथा त्रिपथगां दृष्ट्वा नृणां दृष्टिः प्रसीदति ॥

pūrṇaminduṃ yathā dṛṣṭvā nṛṇāṃ dṛṣṭiḥ prasīdati | tathā tripathagāṃ dṛṣṭvā nṛṇāṃ dṛṣṭiḥ prasīdati

जैसे पूर्ण चन्द्र को देखकर मनुष्यों की दृष्टि प्रसन्न होती है, वैसे ही त्रिपथगा गङ्गा को देखकर प्रसन्न होती है।

श्लोक 83 (13.65.83)

तद्भावस्तद्गतमनास्तन्निष्ठस्तत्परायणः । गङ्गांयोऽनुगतो भक्त्या स तस्याः प्रियतां व्रजेत् ॥

tadbhāvastadgatamanāstanniṣṭhastatparāyaṇaḥ | gaṅgāṃyo'nugato bhaktyā sa tasyāḥ priyatāṃ vrajet

जो भक्ति से गङ्गा का अनुसरण करता है, उसी में भाव रखता है, उसी में मन लगाता है, उसी में निष्ठा रखता है और उसी को परम आश्रय मानता है, वह उसका प्रिय बन जाता है।

श्लोक 84 (13.65.84)

भूस्थैः खस्थैर्दिविष्ठैश्च भूतैरुच्चावचैरपि । गङ्गा विगाह्या सततमेतत्कार्यतमं सताम् ॥

bhūsthaiḥ khasthairdiviṣṭhaiśca bhūtairuccāvacairapi | gaṅgā vigāhyā satatametatkāryatamaṃ satām

पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग में रहनेवाले ऊँच-नीच सब प्राणियों को सदा गङ्गा में स्नान करना चाहिए; सज्जनों का यही सबसे आवश्यक कर्तव्य है।

श्लोक 85 (13.65.85)

विश्वलोकेषु पुण्यत्वाद्गङ्गायाः प्रथितं यशः । दुर्मृताननपत्यांश्च सा मृताननयद्दिवम् । यत्पुत्रान्सगरस्येतो भस्माख्याननयद्दिवम् ॥

viśvalokeṣu puṇyatvādgaṅgāyāḥ prathitaṃ yaśaḥ | durmṛtānanapatyāṃśca sā mṛtānanayaddivam | yatputrānsagarasyeto bhasmākhyānanayaddivam

पवित्रता के कारण गङ्गा का यश सब लोकों में फैला हुआ है। जो बुरी मृत्यु मरे और जो निःसन्तान मरे, उन मृतकों को भी वह स्वर्ग ले गई। और सगर के जिन पुत्रों को केवल 'भस्म' कहा जाने लगा था, उन्हें भी वह यहाँ से स्वर्ग ले गई।

श्लोक 86 (13.65.86)

वाय्वीरिताभिः सुमनोहराभि- । र्द्रुताभिरत्यर्थसमुत्थिताभिः । गङ्गोर्मिभिर्भानुमतीभिरिद्धाः । सहस्ररश्मिप्रतिमा भवन्ति ॥

vāyvīritābhiḥ sumanoharābhi- | rdrutābhiratyarthasamutthitābhiḥ | gaṅgormibhirbhānumatībhiriddhāḥ | sahasraraśmipratimā bhavanti

वायु से प्रेरित, अत्यन्त मनोहर, वेगवान्, ऊँची उठती और तेजोमयी गङ्गा की लहरों से दीप्त होकर मनुष्य सहस्ररश्मि सूर्य के समान हो जाते हैं।

श्लोक 87 (13.65.87)

पयस्विनीं घृतिनीमत्युदारां । समृद्धिनीं वेगिनीं दुर्विगाह्याम् । गङ्गां गत्वा यैः शरीरं विसृष्टं । गता धीरास्ते विबुधैः समत्वम् ॥

payasvinīṃ ghṛtinīmatyudārāṃ | samṛddhinīṃ veginīṃ durvigāhyām | gaṅgāṃ gatvā yaiḥ śarīraṃ visṛṣṭaṃ | gatā dhīrāste vibudhaiḥ samatvam

दूध और घी से भरी, अत्यन्त उदार, समृद्धि देनेवाली, वेगवती और कठिनाई से अवगाहन करने योग्य गङ्गा के पास जाकर जिन धीर पुरुषों ने शरीर छोड़ा, वे देवताओं की समानता को प्राप्त हुए।

श्लोक 88 (13.65.88)

अन्धाञ्जडान्द्रव्यहीनांश्च गङ्गा । यशस्विनी बृहती विश्वरूपा । देवैः सेन्द्रैर्मुनिभिर्मानवैश्च । निषेविता सर्वकामैर्युनक्ति ॥

andhāñjaḍāndravyahīnāṃśca gaṅgā | yaśasvinī bṛhatī viśvarūpā | devaiḥ sendrairmunibhirmānavaiśca | niṣevitā sarvakāmairyunakti

यशस्विनी, विशाल और विश्वरूपा गङ्गा, जो इन्द्र सहित देवताओं, मुनियों और मनुष्यों से सेवित है, अन्धों, जड़ों और निर्धनों को भी सब कामनाओं से जोड़ देती है।

श्लोक 89 (13.65.89)

ऊर्जस्वतीं मधुमतीं महापुण्यां त्रिवर्त्मगाम् । त्रिलोकगोप्त्रीं ये गङ्गां संश्रितास्ते दिवं गताः ॥

ūrjasvatīṃ madhumatīṃ mahāpuṇyāṃ trivartmagām | trilokagoptrīṃ ye gaṅgāṃ saṃśritāste divaṃ gatāḥ

ओजस्विनी, मधुमयी, महापुण्यमयी, तीन मार्गों से बहनेवाली और तीनों लोकों की रक्षा करनेवाली गङ्गा का जिन्होंने आश्रय लिया, वे स्वर्ग को गए।

श्लोक 90 (13.65.90)

यो वत्स्यति द्रक्ष्यति वाऽपि मर्त्य- । स्तस्मै प्रयच्छन्ति सुखानि देवाः । तद्भाविताः स्पर्शनदर्शनेन । इष्टां गतिं तस्य सुरा दिशन्ति ॥

yo vatsyati drakṣyati vā'pi martya- | stasmai prayacchanti sukhāni devāḥ | tadbhāvitāḥ sparśanadarśanena | iṣṭāṃ gatiṃ tasya surā diśanti

जो मनुष्य उसके तट पर निवास करेगा अथवा उसे देखेगा, उसे देवता सुख देते हैं; गङ्गा के स्पर्श और दर्शन से महिमा पाए हुए देवता उसे इच्छित गति प्रदान करते हैं।

श्लोक 91 (13.65.91)

दक्षां पृश्निं बृहतीं विप्रकृष्टां । शिवामृद्धां भागिनीं सुप्रसन्नाम् । विभावरीं सर्वभूतप्रतिष्ठां । गङ्गां गता ये त्रिदिवं गतास्ते ॥

dakṣāṃ pṛśniṃ bṛhatīṃ viprakṛṣṭāṃ | śivāmṛddhāṃ bhāginīṃ suprasannām | vibhāvarīṃ sarvabhūtapratiṣṭhāṃ | gaṅgāṃ gatā ye tridivaṃ gatāste

कुशल, चितकबरी, विशाल, दूर तक फैली, मङ्गलमयी, समृद्ध, सौभाग्यशालिनी, अत्यन्त प्रसन्न, तेजस्विनी और सब प्राणियों की आधारभूत गङ्गा के पास जो गए, वे स्वर्ग को गए।

श्लोक 92 (13.65.92)

ख्यातिर्यस्याः खं दिवं गां च नित्या- । मूर्ध्वं दिशो विदिशश्चावतस्थे । तस्या जलं सेव्य सरिद्वराया । मर्त्याः सर्वे कृतकृत्या भवन्ति ॥

khyātiryasyāḥ khaṃ divaṃ gāṃ ca nityā- | mūrdhvaṃ diśo vidiśaścāvatasthe | tasyā jalaṃ sevya saridvarāyā | martyāḥ sarve kṛtakṛtyā bhavanti

जिसकी कीर्ति आकाश, स्वर्ग और पृथ्वी के तथा दिशाओं-विदिशाओं के ऊपर सदा स्थित है, उस श्रेष्ठ नदी के जल का सेवन करके सब मनुष्य कृतकृत्य हो जाते हैं।

श्लोक 93 (13.65.93)

इयं गङ्गेति नियतं प्रतिष्ठा । गुहस्य रुक्मस्य च गर्भयोषा । प्रातस्त्रिवर्गा घृतवहा विपाप्मा । गङ्गाऽवतीर्णा वियतो विश्वतोया ॥

iyaṃ gaṅgeti niyataṃ pratiṣṭhā | guhasya rukmasya ca garbhayoṣā | prātastrivargā ghṛtavahā vipāpmā | gaṅgā'vatīrṇā viyato viśvatoyā

'यह गङ्गा है' - इस प्रकार वही निश्चय ही आधार है; वह गुह और स्वर्ण को गर्भ की भाँति धारण करनेवाली है; प्रातःकाल वह त्रिवर्ग देनेवाली, घृत-सदृश प्रवाहवाली और निष्पाप है; आकाश से उतरी हुई उस गङ्गा का जल सबको प्रिय है।

श्लोक 94 (13.65.94)

प्रातस्त्रिमार्गेषु कृतावगाहा । विपाप्मनां वितता विश्वगोप्ता । नारायणादक्षयात्पूर्वजाता । विष्णोः पदाच्छिंशुमाराद्ध्रुवाच्च । सोमात्सूर्यान्मेरुरूपाच्च विष्णोः । समागता शिवमूर्ध्नो हिमाद्रिम् ॥

prātastrimārgeṣu kṛtāvagāhā | vipāpmanāṃ vitatā viśvagoptā | nārāyaṇādakṣayātpūrvajātā | viṣṇoḥ padācchiṃśumārāddhruvācca | somātsūryānmerurūpācca viṣṇoḥ | samāgatā śivamūrdhno himādrim

प्रातःकाल जिसके तीनों मार्गों में स्नान किया जाता है, जो पापरहित जनों के लिए फैली हुई और सबकी रक्षक है; जो अविनाशी नारायण से पूर्व में उत्पन्न हुई; विष्णु के चरण से, शिशुमार और ध्रुव से, चन्द्रमा से, सूर्य से और विष्णु के मेरुरूप से होती हुई, शिव के मस्तक से हिमालय को प्राप्त हुई।

श्लोक 95 (13.65.95)

सुताऽवनीध्रस्य हरस्य भार्या । दिवो भुवश्चापि कृतानुरूपा । भव्या पृथिव्यां भागिनी चापि राज- । न्गङ्गा लोकानां पुण्यदा वै त्रयाणाम् ॥

sutā'vanīdhrasya harasya bhāryā | divo bhuvaścāpi kṛtānurūpā | bhavyā pṛthivyāṃ bhāginī cāpi rāja- | ngaṅgā lokānāṃ puṇyadā vai trayāṇām

पर्वत की पुत्री और हर की पत्नी, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी के अनुरूप अपना शृङ्गार किया है; कल्याणी और पृथ्वी पर सौभाग्यवती - हे राजन्, गङ्गा तीनों लोकों को पुण्य देनेवाली है।

श्लोक 96 (13.65.96)

मधुस्रवा घृतधारा घृतार्चि- । र्महोर्मिभिः शोभिता ब्राह्मणैश्च । दिवश्च्युता शिरसाऽऽप्ता शिवेन । गङ्गाऽवनीध्रात्त्रिदिवस्य माता ॥

madhusravā ghṛtadhārā ghṛtārci- | rmahormibhiḥ śobhitā brāhmaṇaiśca | divaścyutā śirasā''ptā śivena | gaṅgā'vanīdhrāttridivasya mātā

मधु बहानेवाली, घृत की धारावाली, घृत-सी ज्वालावाली, ऊँची लहरों और ब्राह्मणों से शोभित; स्वर्ग से गिरी और शिव के सिर पर धारण की गई गङ्गा पर्वत से उतरकर स्वर्ग की माता है।

श्लोक 97 (13.65.97)

योनिर्वरिष्ठा विरजा वितन्वी । शय्याऽचिरा वारिवहा यशोदा । विश्वावती चाकृतिरिष्टसिद्धा । गङ्गोक्षितानां भुवनस्य पन्थाः ॥

yonirvariṣṭhā virajā vitanvī | śayyā'cirā vārivahā yaśodā | viśvāvatī cākṛtiriṣṭasiddhā | gaṅgokṣitānāṃ bhuvanasya panthāḥ

श्रेष्ठ योनि, निर्मल, सूक्ष्मरूपा, शय्या, शीघ्रगामिनी, जल बहानेवाली, यश देनेवाली, विश्व की रक्षा करनेवाली, सुन्दर आकृतिवाली और इच्छित सिद्धि देनेवाली - गङ्गा से सींचे हुए लोगों के लिए वह स्वर्ग का मार्ग है।

श्लोक 98 (13.65.98)

क्षान्त्या मह्या गोपने धारणे च । दीप्त्या कृशानोस्तपनस्य चैव । तुल्या गङ्गा सम्मता ब्राह्मणानां । गुहस्य ब्रह्मण्यतया च नित्यम् ॥

kṣāntyā mahyā gopane dhāraṇe ca | dīptyā kṛśānostapanasya caiva | tulyā gaṅgā sammatā brāhmaṇānāṃ | guhasya brahmaṇyatayā ca nityam

क्षमा, रक्षा और धारण में वह पृथ्वी के समान तथा तेज में अग्नि और सूर्य के समान मानी गई है; वह ब्राह्मणों की मान्य है, और ब्राह्मणों के प्रति अपनी हितैषिता के कारण गुह (कार्तिकेय) को भी सदा मान्य है।

श्लोक 99 (13.65.99)

ऋषिष्टुतां विष्णुपदीं पुराणां । सुपुण्यतोयां मनसाऽपि लोके । सर्वात्मना जाह्नवीं ये प्रपन्ना । स्ते ब्रह्मणः सदनं सम्प्रयाताः ॥

ṛṣiṣṭutāṃ viṣṇupadīṃ purāṇāṃ | supuṇyatoyāṃ manasā'pi loke | sarvātmanā jāhnavīṃ ye prapannā | ste brahmaṇaḥ sadanaṃ samprayātāḥ

ऋषियों से स्तुत, विष्णुपदी, पुरातन और अत्यन्त पवित्र जलवाली - जो लोग सम्पूर्ण भाव से जाह्नवी की शरण में गए, वे ब्रह्मा के धाम को पहुँच गए।

श्लोक 100 (13.65.100)

लोकानिमान्नयति या जननीव पुत्रा- । न्सर्वात्मना सर्वगुणोपपन्ना । तत्स्थानकं ब्राह्ममभीप्समानै- । र्गङ्गा सदैवात्मवशैरुपास्या ॥

lokānimānnayati yā jananīva putrā- | nsarvātmanā sarvaguṇopapannā | tatsthānakaṃ brāhmamabhīpsamānai- | rgaṅgā sadaivātmavaśairupāsyā

जो माता की तरह इन लोकों को अपने पुत्रों के समान ले चलती है और सर्वथा सब गुणों से सम्पन्न है, उस गङ्गा की उपासना ब्रह्मलोक चाहनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषों को सदा करनी चाहिए।

श्लोक 101 (13.65.101)

उस्रां जुष्टां मिषतीं विश्वतोयाम् । इरां वज्रीं रेवतीं भूधराणाम् । शिष्टाश्रयाममृतां ब्रह्मकान्ताम् । गङ्गां श्रयेदात्मवान्सिद्धिकामः ॥

usrāṃ juṣṭāṃ miṣatīṃ viśvatoyām | irāṃ vajrīṃ revatīṃ bhūdharāṇām | śiṣṭāśrayāmamṛtāṃ brahmakāntām | gaṅgāṃ śrayedātmavānsiddhikāmaḥ

सिद्धि चाहनेवाला आत्मसंयमी पुरुष उस गङ्गा का आश्रय ले जो तेजोमयी कामधेनु है, प्रिय है, सबको देखनेवाली है और जिसका जल सबके लिए है; जो पोषण करनेवाली, वज्र धारण करनेवाली, पर्वतों की धनवती देवी है; जो सज्जनों का आश्रय, अमृतमयी और ब्रह्मा की प्रिय है।

श्लोक 102 (13.65.102)

प्रसाद्य देवान्सविभून्समस्ता- । न्भगीरथस्तपसोग्रेण गङ्गाम् । गामानयत्तामभिगम्य शश्व- । त्पुंसां भयं नेह चामुत्र विद्यात् ॥

prasādya devānsavibhūnsamastā- | nbhagīrathastapasogreṇa gaṅgām | gāmānayattāmabhigamya śaśva- | tpuṃsāṃ bhayaṃ neha cāmutra vidyāt

भगीरथ ने उग्र तप से अपने स्वामियों सहित सब देवताओं को प्रसन्न करके गङ्गा को पृथ्वी पर उतारा; उसके पास निरन्तर जाकर मनुष्य को न यहाँ भय रहता है, न परलोक में।

श्लोक 103 (13.65.103)

उदाहृतः सर्वथा ते गुणानां । मयैकदेशः प्रसमीक्ष्य बुद्ध्या । शक्तिर्न मे काचिदिहास्ति वक्तुं । गुणान्सर्वान्परिमातुं तथैव ॥

udāhṛtaḥ sarvathā te guṇānāṃ | mayaikadeśaḥ prasamīkṣya buddhyā | śaktirna me kācidihāsti vaktuṃ | guṇānsarvānparimātuṃ tathaiva

मैंने अपनी बुद्धि से विचार करके तुमसे उसके गुणों का केवल एक अंश कहा है; उसके सब गुणों को कहने या उनका माप करने की शक्ति मुझमें नहीं है।

श्लोक 104 (13.65.104)

मेरोः समुद्रस्य च सर्वयत्नैः । सङ्ख्योपलानामुदकस्य वाऽपि । शक्यं वक्तुं नेह गङ्गाजलानां । गुणाख्यानं परिमातुं तथैव ॥

meroḥ samudrasya ca sarvayatnaiḥ | saṅkhyopalānāmudakasya vā'pi | śakyaṃ vaktuṃ neha gaṅgājalānāṃ | guṇākhyānaṃ parimātuṃ tathaiva

जैसे सब प्रयत्न करने पर भी मेरु, समुद्र, कंकड़ों और जल की गिनती नहीं की जा सकती, वैसे ही गङ्गाजल के गुणों का वर्णन या माप यहाँ नहीं किया जा सकता।

श्लोक 105 (13.65.105)

तस्मादेतान्परया श्रद्धयोक्ता- । न्गुणान्सर्वाञ्जाह्नवीयान्सदैव । भवेद्वाचा मनसा कर्मणा च । भक्त्या युक्तः श्रद्धया श्रद्दधानः ॥

tasmādetānparayā śraddhayoktā- | nguṇānsarvāñjāhnavīyānsadaiva | bhavedvācā manasā karmaṇā ca | bhaktyā yuktaḥ śraddhayā śraddadhānaḥ

इसलिए परम श्रद्धा से कहे गए जाह्नवी के इन सब गुणों में मनुष्य को वाणी, मन और कर्म से सदा भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर विश्वास रखना चाहिए।

श्लोक 106 (13.65.106)

लोकानिमांस्त्रीन्यशसा वितत्य । सिद्धिं प्राप्य महतीं तां दुरापाम् । गङ्गाकृतानचिरेणैव लोका- । न्यथेष्टमिष्टान्विहरिष्यसि त्वम् ॥

lokānimāṃstrīnyaśasā vitatya | siddhiṃ prāpya mahatīṃ tāṃ durāpām | gaṅgākṛtānacireṇaiva lokā- | nyatheṣṭamiṣṭānvihariṣyasi tvam

इन तीनों लोकों में अपना यश फैलाकर और उस अत्यन्त दुर्लभ महान् सिद्धि को पाकर तुम शीघ्र ही गङ्गा से प्राप्त अभीष्ट लोकों में इच्छानुसार विचरोगे।

श्लोक 107 (13.65.107)

तव मम च गुणैर्महानुभावा । जुषतु मतिं सततं स्वधर्मयुक्तैः । अभिमतजनवत्सला हि गङ्गा । जगति युनक्ति सुखैश्च भक्तिमन्तम् ॥

tava mama ca guṇairmahānubhāvā | juṣatu matiṃ satataṃ svadharmayuktaiḥ | abhimatajanavatsalā hi gaṅgā | jagati yunakti sukhaiśca bhaktimantam

अपने-अपने धर्म से युक्त तुम्हारे और मेरे गुणों के कारण महिमामयी गङ्गा सदा हमारी बुद्धि पर कृपा करें। अपने भक्तों पर स्नेह रखनेवाली गङ्गा संसार में अपने भक्त को सुखों से जोड़ देती है।

भीष्म उवाच

श्लोक 108 (13.65.108)

इति परममतिर्गुणानशेषा- । ञ्शिलरतये त्रिपथानुयोगरूपान् । बहुविधमनुशास्य तथ्यरूपा- । न्गगनतलं द्युतिमान्विवेश सिद्धः ॥

iti paramamatirguṇānaśeṣā- | ñśilarataye tripathānuyogarūpān | bahuvidhamanuśāsya tathyarūpā- | ngaganatalaṃ dyutimānviveśa siddhaḥ

इस प्रकार परम बुद्धिमान सिद्ध ने शिलवृत्ति को त्रिपथगा गङ्गा से सम्बन्धित उन सब सत्य गुणों का अनेक प्रकार से उपदेश देकर तेजस्वी रूप में आकाश में प्रवेश किया।

श्लोक 109 (13.65.109)

शिलवृत्तिस्तु सिद्धस्य वाक्यैः सम्बोधितस्तदा । गङ्गामुपास्य विधिवत्सिद्धिं प्राप सुदुर्लभाम् ॥

śilavṛttistu siddhasya vākyaiḥ sambodhitastadā | gaṅgāmupāsya vidhivatsiddhiṃ prāpa sudurlabhām

सिद्ध के वचनों से जागा हुआ शिलवृत्ति गङ्गा की विधिपूर्वक उपासना करके अत्यन्त दुर्लभ सिद्धि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 110 (13.65.110)

तथा त्वमपि कौन्तेय भक्त्या परमया युतः । गङ्गामभ्येहि सततं प्राप्स्यसे सिद्धिमुत्तमाम् ॥

tathā tvamapi kaunteya bhaktyā paramayā yutaḥ | gaṅgāmabhyehi satataṃ prāpsyase siddhimuttamām

इसी प्रकार कुन्तीपुत्र, तुम भी परम भक्ति से युक्त होकर निरन्तर गङ्गा के पास जाओ; तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 111 (13.65.111)

श्रुत्वेतिहासं भीष्मोक्तं गङ्गायाः स्तवसंयुतम् । युधिष्ठिरः परां प्रीतिमगच्छद्धातृभिः सह ॥

śrutvetihāsaṃ bhīṣmoktaṃ gaṅgāyāḥ stavasaṃyutam | yudhiṣṭhiraḥ parāṃ prītimagacchaddhātṛbhiḥ saha

भीष्म द्वारा कहा हुआ गङ्गा की स्तुति से भरा यह इतिहास सुनकर युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ परम प्रसन्न हुए।

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