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अनुशासन पर्व · अध्याय 66

नारद बताते हैं कि वे किनकी पूजा करते हैं

युधिष्ठिर पूछते हैं कि तीनों लोकों में कौन पूजनीय हैं। भीष्म कृष्ण और नारद का संवाद सुनाते हैं: कृष्ण के पूछने पर नारद पहले देवताओं के नाम लेते हैं, फिर उन ब्राह्मणों, तपस्वियों, गृहस्थों और ब्रह्मचारियों का वर्णन करते हैं जिनका वे आदर करते हैं, और कहते हैं कि ऐसे लोगों का सम्मान करनेवाले सब संकट पार कर जाते हैं। वे कृष्ण को द्विजों की पूजा करने का उपदेश देते हैं, और अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि पितरों, देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियों की उनकी यथोचित पूजा उन्हें इच्छित गति दिलाएगी।

अध्याय 65अध्याय-सूचीअध्याय 67

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.66.1)

के पूज्या वै त्रिलोकेऽस्मिन्मानवा भरतर्षभ । विस्तरेण तदाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यतः ॥

ke pūjyā vai triloke'sminmānavā bharatarṣabha | vistareṇa tadācakṣva na hi tṛpyāmi kathyataḥ

हे भरतश्रेष्ठ, इन तीनों लोकों में मनुष्यों के बीच कौन पूजा के योग्य हैं? मुझे विस्तार से बताइए, क्योंकि जो कहा जाता है उससे मैं तृप्त नहीं होता।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.66.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदस्य च संवादं वासुदेवस्य चोभयोः ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nāradasya ca saṃvādaṃ vāsudevasya cobhayoḥ

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: नारद और वासुदेव, इन दोनों का संवाद।

श्लोक 3 (13.66.3)

नारदं प्राञ्जलिं दृष्ट्वा पूजयानं द्विजर्षभान् । केशवः परिपप्रच्छ भगवन्कान्नमस्यसि ॥

nāradaṃ prāñjaliṃ dṛṣṭvā pūjayānaṃ dvijarṣabhān | keśavaḥ paripapraccha bhagavankānnamasyasi

नारद को हाथ जोड़े हुए और श्रेष्ठ द्विजों की पूजा करते देखकर केशव ने उनसे पूछा, “भगवन्, आप किन्हें नमस्कार करते हैं?”

वासुदेव उवाच

श्लोक 4 (13.66.4)

बहुमानपरस्तेषु भगवन्यान्नमस्यसि । शक्यं चेच्छ्रोतुमस्माभिर्ब्रूह्येतद्धर्मवित्तम ॥

bahumānaparasteṣu bhagavanyānnamasyasi | śakyaṃ cecchrotumasmābhirbrūhyetaddharmavittama

“भगवन्, आप जिन्हें नमस्कार करते हैं उनके प्रति आपका बहुत आदर है। यदि हम सुन सकें तो हे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, यह हमें बताइए।”

नारद उवाच

श्लोक 5 (13.66.5)

शृणु गोविन्द यानेतान्पूजयाम्यरिमर्दन । त्वत्तोऽन्यः कः पुमाँल्लोके श्रोतुमेतदिहार्हति ॥

śṛṇu govinda yānetānpūjayāmyarimardana | tvatto'nyaḥ kaḥ pumām̐lloke śrotumetadihārhati

“हे गोविन्द, हे शत्रुओं का दमन करनेवाले, सुनिए कि मैं किनकी पूजा करता हूँ। आपके सिवा संसार में और कौन पुरुष इसे सुनने के योग्य है?”

श्लोक 6 (13.66.6)

वरुणं वायुमादित्यं पर्जन्यं जातवेदसम् । स्थाणुं स्कन्दं महालक्ष्मीं विष्णुं ब्रह्माणमेव च ॥

varuṇaṃ vāyumādityaṃ parjanyaṃ jātavedasam | sthāṇuṃ skandaṃ mahālakṣmīṃ viṣṇuṃ brahmāṇameva ca

वरुण, वायु, आदित्य, पर्जन्य, जातवेदा (अग्नि), स्थाणु (शिव), स्कन्द, महालक्ष्मी, विष्णु और ब्रह्मा;

श्लोक 7 (13.66.7)

वाचस्पतिं चन्द्रमसमपः पृथ्वीं सरस्वतीम् । सततं ये नमस्यन्ति तान्नमस्याम्यहं विभो ॥

vācaspatiṃ candramasamapaḥ pṛthvīṃ sarasvatīm | satataṃ ye namasyanti tānnamasyāmyahaṃ vibho

वाचस्पति, चन्द्रमा, जल, पृथ्वी और सरस्वती: जो लोग निरन्तर इन्हें नमस्कार करते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे विभो।

श्लोक 8 (13.66.8)

तपोधनान्वेदविदो नित्यं वेदपरायणान् । महार्हान्वृष्णिशार्दूल सदा सम्पूजयाम्यहम् ॥

tapodhanānvedavido nityaṃ vedaparāyaṇān | mahārhānvṛṣṇiśārdūla sadā sampūjayāmyaham

तप ही जिनका धन है, जो वेदों के ज्ञाता हैं, जो सदा वेद के परायण रहते हैं, उन परम पूज्य जनों की मैं सदा पूजा करता हूँ, हे वृष्णिश्रेष्ठ।

श्लोक 9 (13.66.9)

अभुक्त्वा देवकार्याणि कुर्वते येऽविकत्थनाः । सन्तुष्टाश्च क्षमायुक्तास्तान्नमस्याम्यहं विभो ॥

abhuktvā devakāryāṇi kurvate ye'vikatthanāḥ | santuṣṭāśca kṣamāyuktāstānnamasyāmyahaṃ vibho

जो स्वयं भोजन करने से पहले देवकार्य करते हैं, जो आत्मप्रशंसा नहीं करते, जो सन्तुष्ट और क्षमाशील हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे विभो।

श्लोक 10 (13.66.10)

सम्यग्यजन्ति ये चेष्टीः क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रियाः । सत्यं धर्मं क्षितिं गाश्च तान्नमस्यामि यादव ॥

samyagyajanti ye ceṣṭīḥ kṣāntā dāntā jitendriyāḥ | satyaṃ dharmaṃ kṣitiṃ gāśca tānnamasyāmi yādava

जो विधिपूर्वक यज्ञ करते हैं, जो क्षमाशील, संयमी और जितेन्द्रिय हैं, जो सत्य, धर्म, पृथ्वी और गौओं का आदर करते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे यादव।

श्लोक 11 (13.66.11)

ये वै तपसि वर्तन्ते वने मूलफलाशनाः । असञ्चयाः क्रियावन्तस्तान्नमस्यामि यादव ॥

ye vai tapasi vartante vane mūlaphalāśanāḥ | asañcayāḥ kriyāvantastānnamasyāmi yādava

जो वन में तपस्या करते हुए कन्द-मूल-फल खाकर रहते हैं, कुछ संचय नहीं करते और अपने कर्मों में लगे रहते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे यादव।

श्लोक 12 (13.66.12)

ये भृत्यभरणे शक्ताः सततं चातिथिव्रताः । भुञ्जते देवशेषाणि तान्नमस्यामि यादव ॥

ye bhṛtyabharaṇe śaktāḥ satataṃ cātithivratāḥ | bhuñjate devaśeṣāṇi tānnamasyāmi yādava

जो अपने आश्रितों का भरण-पोषण करने में समर्थ हैं, जो सदा अतिथि-सेवा का व्रत रखते हैं और देवताओं के अर्पण से बचा हुआ अन्न खाते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे यादव।

श्लोक 13 (13.66.13)

ये वेदं प्राप्य दुर्धर्षा वाग्मिनो ब्रह्मचारिणः । याजनाध्यापने युक्ता नित्यं तान्पूजयाम्यहम् ॥

ye vedaṃ prāpya durdharṣā vāgmino brahmacāriṇaḥ | yājanādhyāpane yuktā nityaṃ tānpūjayāmyaham

जो वेद का अध्ययन करके अजेय, वाक्पटु और ब्रह्मचारी हैं, तथा सदा यज्ञ कराने और पढ़ाने में लगे रहते हैं, उनकी मैं पूजा करता हूँ।

श्लोक 14 (13.66.14)

प्रसन्नहृदयाश्चैव सर्वसत्वेषु नित्यशः । आपृष्ठतापान्स्वाध्याये युक्तास्तान्पूजयाम्यहम् ॥

prasannahṛdayāścaiva sarvasatveṣu nityaśaḥ | āpṛṣṭhatāpānsvādhyāye yuktāstānpūjayāmyaham

जिनका हृदय सब प्राणियों के प्रति सदा प्रसन्न रहता है, और जो मध्याह्न की धूप पीठ तपने तक स्वाध्याय में लगे रहते हैं, उनकी मैं पूजा करता हूँ।

श्लोक 15 (13.66.15)

गुरुप्रसादे स्वाध्याये यतन्तो ये स्थिरव्रताः । शुश्रूषवोऽनसूयन्तस्तान्नमस्यामि यादव ॥

guruprasāde svādhyāye yatanto ye sthiravratāḥ | śuśrūṣavo'nasūyantastānnamasyāmi yādava

जो दृढ़ व्रतवाले गुरु की प्रसन्नता और स्वाध्याय के लिए यत्न करते हैं, जो सेवाभाव रखते हैं और दूसरों में दोष नहीं देखते, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे यादव।

श्लोक 16 (13.66.16)

सुव्रता मुनयो ये च ब्राह्मणाः सत्यसङ्गराः । वोढारो हव्यकव्यानां तान्नमस्यामि यादव ॥

suvratā munayo ye ca brāhmaṇāḥ satyasaṅgarāḥ | voḍhāro havyakavyānāṃ tānnamasyāmi yādava

उत्तम व्रतवाले मुनियों और सत्यप्रतिज्ञ ब्राह्मणों को, जो देवताओं और पितरों के हव्य-कव्य को वहन करते हैं, मैं नमस्कार करता हूँ, हे यादव।

श्लोक 17 (13.66.17)

भैक्षचर्यासु निरताः कृशा गुरुकुलाश्रयाः । निःसुखा निर्धना ये तु तान्नमस्यामि यादव ॥

bhaikṣacaryāsu niratāḥ kṛśā gurukulāśrayāḥ | niḥsukhā nirdhanā ye tu tānnamasyāmi yādava

जो भिक्षा से जीवन चलाते हैं, दुबले-पतले हैं, गुरुकुल में रहते हैं, सुख और धन से रहित हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे यादव।

श्लोक 18 (13.66.18)

निर्ममा निष्प्रतिद्वन्द्वा निष्ठिता निष्प्रयोजनाः । ये वेदं प्राप्य दुर्धर्षा वाग्मिनो ब्रह्मवादिनः ॥

nirmamā niṣpratidvandvā niṣṭhitā niṣprayojanāḥ | ye vedaṃ prāpya durdharṣā vāgmino brahmavādinaḥ

जो ममता और प्रतिद्वन्द्विता से रहित हैं, कृतकृत्य हैं, जिनका अपना कोई प्रयोजन नहीं, और जो वेद पढ़कर अजेय, वाक्पटु तथा ब्रह्मवादी हैं।

श्लोक 19 (13.66.19)

अहिंसानिरता ये च ये च सत्यव्रता नराः । दान्ताः शमपराश्चैव तान्नमस्यामि केशव ॥

ahiṃsāniratā ye ca ye ca satyavratā narāḥ | dāntāḥ śamaparāścaiva tānnamasyāmi keśava

जो अहिंसा में लगे हैं, जो सत्य का व्रत रखते हैं, जो संयमी और शान्ति में तत्पर हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे केशव।

श्लोक 20 (13.66.20)

देवतातिथिपूजायां युक्ता ये गृहमेधिनः । कपोतवृत्तयो नित्यं तान्नमस्यामि यादव ॥

devatātithipūjāyāṃ yuktā ye gṛhamedhinaḥ | kapotavṛttayo nityaṃ tānnamasyāmi yādava

जो गृहस्थ देवताओं और अतिथियों की पूजा में लगे रहते हैं और कबूतर की तरह दाना-दाना बटोरकर निर्वाह करते हैं, उन्हें मैं सदा नमस्कार करता हूँ, हे यादव।

श्लोक 21 (13.66.21)

येषां त्रिवर्गः कृत्येषु वर्तते नोपहीयते । शिष्टाचारप्रवृत्ताश्च तान्नमस्याम्यहं सदा ॥

yeṣāṃ trivargaḥ kṛtyeṣu vartate nopahīyate | śiṣṭācārapravṛttāśca tānnamasyāmyahaṃ sadā

जिनके कर्मों में धर्म, अर्थ और काम तीनों बने रहते हैं और कभी क्षीण नहीं होते, तथा जो शिष्टजनों के आचार पर चलते हैं, उन्हें मैं सदा नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 22 (13.66.22)

ब्राह्मणाः श्रुतसम्पन्ना ये त्रिवर्गमनुष्ठिताः । अलोलुपाः पुण्यशीलास्तान्नमस्यामि केशव ॥

brāhmaṇāḥ śrutasampannā ye trivargamanuṣṭhitāḥ | alolupāḥ puṇyaśīlāstānnamasyāmi keśava

जो ब्राह्मण शास्त्रज्ञान से सम्पन्न हैं, धर्म, अर्थ और काम का आचरण करते हैं, लोभरहित और पुण्यशील हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे केशव।

श्लोक 23 (13.66.23)

अवन्ध्यकाला येऽलुब्धास्त्रिवर्गे साधनेषु च । विशिष्टाचारयुक्ताश्च नारायण नमामि तान् ॥

avandhyakālā ye'lubdhāstrivarge sādhaneṣu ca | viśiṣṭācārayuktāśca nārāyaṇa namāmi tān

जिनका समय कभी व्यर्थ नहीं जाता, जो धर्म-अर्थ-काम और उनके साधनों में लोभरहित हैं और जिनका आचरण उत्तम है, उन्हें, हे नारायण, मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 24 (13.66.24)

अब्भक्षा वायुभक्षाश्च सुधाभक्षाश्च ये सदा । व्रतैश्च विविधैर्युक्तास्तान्नमस्यामि माधव ॥

abbhakṣā vāyubhakṣāśca sudhābhakṣāśca ye sadā | vrataiśca vividhairyuktāstānnamasyāmi mādhava

जो सदा जल, वायु या सुधा (वैश्वदेव के शेष अन्न) पर निर्वाह करते हैं और अनेक प्रकार के व्रतों से युक्त हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे माधव।

श्लोक 25 (13.66.25)

अयोनीनग्नियोनींश्च ब्रह्मयोनींस्तथैव च । सर्वभूतात्मयोनींश्च तान्नमस्याम्यहं सदा ॥

ayonīnagniyonīṃśca brahmayonīṃstathaiva ca | sarvabhūtātmayonīṃśca tānnamasyāmyahaṃ sadā

जो अविवाहित हैं, जो पत्नी और अग्नि से युक्त गृहस्थ हैं, जो वेद के आश्रय हैं, और जो सब प्राणियों की आत्मा के उद्गम हैं, उन्हें मैं सदा नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 26 (13.66.26)

नित्यमेतान्नमस्यामि कृष्ण लोककरानृषीन् । लोकज्येष्ठान्कुलज्येष्ठांस्तमोघ्नँल्लोकभास्करान् ॥

nityametānnamasyāmi kṛṣṇa lokakarānṛṣīn | lokajyeṣṭhānkulajyeṣṭhāṃstamoghnam̐llokabhāskarān

हे कृष्ण, इन लोकों को धारण करनेवाले ऋषियों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ: जो लोकों में और अपने कुलों में ज्येष्ठ हैं, अन्धकार का नाश करनेवाले और संसार को प्रकाशित करनेवाले हैं।

श्लोक 27 (13.66.27)

तस्मात्त्वमपि वार्ष्णेय द्विजान्पूजय नित्यदा । पूजिताः पूजनार्हा हि सुखं दास्यन्ति तेऽनघ ॥

tasmāttvamapi vārṣṇeya dvijānpūjaya nityadā | pūjitāḥ pūjanārhā hi sukhaṃ dāsyanti te'nagha

इसलिए हे वार्ष्णेय, तुम भी द्विजों की सदा पूजा करो। हे निष्पाप, पूजित होकर वे पूजनीय जन तुम्हें सुख देंगे।

श्लोक 28 (13.66.28)

अस्मिँल्लोके सदा ह्येते परत्र च सुखप्रदाः । चरन्ते मान्यमाना वै प्रदास्यन्ति सुखं तव ॥

asmim̐lloke sadā hyete paratra ca sukhapradāḥ | carante mānyamānā vai pradāsyanti sukhaṃ tava

ये इस लोक में और परलोक में भी सदा सुख देनेवाले हैं। आदर पाकर ये विचरते हैं और तुम्हें सुख प्रदान करेंगे।

श्लोक 29 (13.66.29)

ये सर्वातिथयो नित्यं गोषु च ब्राह्मणेषु च । नित्यं सत्ये चाभिरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

ye sarvātithayo nityaṃ goṣu ca brāhmaṇeṣu ca | nityaṃ satye cābhiratā durgāṇyatitaranti te

जो सब अतिथियों का सत्कार करते हैं, गौओं और ब्राह्मणों में सदा श्रद्धा रखते हैं और सत्य में निरन्तर लगे रहते हैं, वे सब संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 30 (13.66.30)

नित्यं शमपरा ये च तथा ये चानसूयकाः । नित्यस्वाध्यायिनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

nityaṃ śamaparā ye ca tathā ye cānasūyakāḥ | nityasvādhyāyino ye ca durgāṇyatitaranti te

जो सदा शान्ति में तत्पर रहते हैं, ईर्ष्यारहित हैं और नित्य स्वाध्याय करते हैं, वे सब संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 31 (13.66.31)

सर्वान्देवान्नमस्यन्ति ये चैकं वेदमाश्रिताः । श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

sarvāndevānnamasyanti ye caikaṃ vedamāśritāḥ | śraddadhānāśca dāntāśca durgāṇyatitaranti te

जो सब देवताओं को नमस्कार करते हुए भी एक वेद का ही आश्रय लेते हैं, जो श्रद्धालु और संयमी हैं, वे सब संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 32 (13.66.32)

तथैव विप्रप्रवरान्नमस्कृत्य यतव्रताः । भवन्ति ये दानरता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

tathaiva viprapravarānnamaskṛtya yatavratāḥ | bhavanti ye dānaratā durgāṇyatitaranti te

इसी प्रकार जो नियमबद्ध व्रती श्रेष्ठ ब्राह्मणों को नमस्कार करके दान में लगे रहते हैं, वे सब संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 33 (13.66.33)

तपस्विनश्च ये नित्यं कौमारब्रह्मचारिणः । तपसा भावितात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

tapasvinaśca ye nityaṃ kaumārabrahmacāriṇaḥ | tapasā bhāvitātmāno durgāṇyatitaranti te

जो तपस्वी बचपन से ही ब्रह्मचारी हैं और जिनका अन्तःकरण तप से शुद्ध हो चुका है, वे सब संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 34 (13.66.34)

देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चार्चने रताः । शिष्टान्नभोजिनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

devatātithibhṛtyānāṃ pitṝṇāṃ cārcane ratāḥ | śiṣṭānnabhojino ye ca durgāṇyatitaranti te

जो देवताओं, अतिथियों, भृत्यों और पितरों की पूजा में लगे रहते हैं और उनके बाद बचा हुआ अन्न खाते हैं, वे सब संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 35 (13.66.35)

अग्निमाधाय विधिवत्प्रणता धारयन्ति ये । प्राप्ताः सोमाहुतिं चैव दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

agnimādhāya vidhivatpraṇatā dhārayanti ye | prāptāḥ somāhutiṃ caiva durgāṇyatitaranti te

जो विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना करके विनम्रता से उसे धारण करते हैं और जिन्होंने सोम की आहुति दी है, वे सब संकटों को पार कर जाते हैं।

श्लोक 36 (13.66.36)

मातापित्रोर्गुरुषु च सम्यग्वर्तन्ति ये सदा । यथा त्वं वृष्णिशार्दूलेत्युक्त्वैवं विरराम सः ॥

mātāpitrorguruṣu ca samyagvartanti ye sadā | yathā tvaṃ vṛṣṇiśārdūletyuktvaivaṃ virarāma saḥ

जो माता, पिता और गुरुजनों के प्रति सदा उचित व्यवहार करते हैं, जैसे आप करते हैं, हे वृष्णिश्रेष्ठ। ऐसा कहकर वे चुप हो गए।

भीष्म उवाच

श्लोक 37 (13.66.37)

तस्मात्त्वमपि कौन्तेय पितृदेवद्विजातिथीन् । सम्यक्पूजयसे नित्यं गतिमिष्टामवाप्स्यसि ॥

tasmāttvamapi kaunteya pitṛdevadvijātithīn | samyakpūjayase nityaṃ gatimiṣṭāmavāpsyasi

इसलिए हे कुन्तीपुत्र, यदि तुम भी पितरों, देवताओं, द्विजों और अतिथियों की सदा यथोचित पूजा करोगे तो इच्छित गति प्राप्त करोगे।

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