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अनुशासन पर्व · अध्याय 67

राजा वृषदर्भ और श्येन

युधिष्ठिर पूछते हैं कि शरणागतों की रक्षा करनेवालों को क्या फल मिलता है। भीष्म बताते हैं कि एक कपोत श्येन से बचकर काशी के राजा वृषदर्भ (उशीनर) की शरण में आया। राजा ने उसे देने से मना कर दिया और श्येन को दूसरा भोजन देना चाहा, पर श्येन ने कपोत के तौल के बराबर राजा का अपना मांस माँगा। राजा ने अपना मांस काट-काटकर तौला और अन्त में स्वयं तराजू पर चढ़ गया। देवताओं ने उसका सम्मान किया और वह स्वर्ग गया। भीष्म युधिष्ठिर से शरणागतों की इसी प्रकार रक्षा करने को कहते हैं और इस कथा के सुनने का फल बताते हैं।

अध्याय 66अध्याय-सूचीअध्याय 68

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.67.1)

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि धर्मं भरतसत्तम ॥

pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | tvatto'haṃ śrotumicchāmi dharmaṃ bharatasattama

पितामह, हे महाप्राज्ञ, हे सब शास्त्रों में निपुण, भरतश्रेष्ठ, मैं आपसे धर्म सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 2 (13.67.2)

शरणागतं ये रक्षन्ति भूतग्रामं चतुर्विधम् । किं तस्य भरतश्रेष्ठ फलं भवति तत्त्वतः ॥

śaraṇāgataṃ ye rakṣanti bhūtagrāmaṃ caturvidham | kiṃ tasya bharataśreṣṭha phalaṃ bhavati tattvataḥ

जो लोग शरण में आए हुए चारों प्रकार के प्राणियों की रक्षा करते हैं, हे भरतश्रेष्ठ, उन्हें वास्तव में क्या फल मिलता है?

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.67.3)

इदं शृणु महाप्राज्ञ धर्मपुत्र महायशः । इतिहासं पुरावृत्तं शरणार्थं महाफलम् ॥

idaṃ śṛṇu mahāprājña dharmaputra mahāyaśaḥ | itihāsaṃ purāvṛttaṃ śaraṇārthaṃ mahāphalam

हे महाप्राज्ञ, हे महायशस्वी धर्मपुत्र, यह सुनो: शरण के विषय में एक प्राचीन इतिहास, जिसका फल बहुत बड़ा है।

श्लोक 4 (13.67.4)

प्रपात्यमानः श्येनेन कपोतः प्रियदर्शनः । वृषदर्भं महाभागं नरेन्द्रं शरणं गतः ॥

prapātyamānaḥ śyenena kapotaḥ priyadarśanaḥ | vṛṣadarbhaṃ mahābhāgaṃ narendraṃ śaraṇaṃ gataḥ

एक सुन्दर कपोत को श्येन ने झपटकर नीचे गिराना चाहा, तब वह महाभाग नरेन्द्र वृषदर्भ की शरण में आया।

श्लोक 5 (13.67.5)

स तं दृष्ट्वा विशुद्धात्मा त्रासादङ्कमुपागतम् । आश्वास्याश्वसिहीत्याह न तेऽस्ति भयमण्डज ॥

sa taṃ dṛṣṭvā viśuddhātmā trāsādaṅkamupāgatam | āśvāsyāśvasihītyāha na te'sti bhayamaṇḍaja

भय से गोद में आए हुए उस कपोत को देखकर उस शुद्धहृदय राजा ने उसे ढाढ़स बँधाया और कहा, “धीरज रखो, हे अण्डज, तुम्हें कोई भय नहीं है।”

राजोवाच

श्लोक 6 (13.67.6)

भयं ते सुमहत्कस्मात्कुत्र किं वा कृतं त्वया । येन त्वमिह सम्प्राप्तो विसंज्ञो भ्रान्तचेतनः ॥

bhayaṃ te sumahatkasmātkutra kiṃ vā kṛtaṃ tvayā | yena tvamiha samprāpto visaṃjño bhrāntacetanaḥ

“तुम्हें इतना बड़ा भय क्यों है? तुमने कहाँ क्या किया है, जिससे तुम होश खोए और घबराए हुए यहाँ आ पहुँचे हो?”

श्लोक 7 (13.67.7)

नवनीलोत्पलापीड चारुवर्ण सुदर्शन । दाडिमाशोकपुष्पाक्ष मा त्रसस्वाभयं तव ॥

navanīlotpalāpīḍa cāruvarṇa sudarśana | dāḍimāśokapuṣpākṣa mā trasasvābhayaṃ tava

“हे नवीन नीलकमल के समान शिखावाले, सुन्दर रंगवाले, सुदर्शन, अनार और अशोक के फूलों जैसी आँखोंवाले, मत डरो; तुम निर्भय हो।”

श्लोक 8 (13.67.8)

मत्सकाशमनुप्राप्तं न त्वां कश्चित्समुत्सहेत् । मनसा ग्रहणं कर्तुं रक्षाध्यक्षपुरस्कृतम् ॥

matsakāśamanuprāptaṃ na tvāṃ kaścitsamutsahet | manasā grahaṇaṃ kartuṃ rakṣādhyakṣapuraskṛtam

“जब तुम मेरे पास आ गए हो और मेरी रक्षा में हो, तब कोई मन से भी तुम्हें पकड़ने का साहस नहीं कर सकता।”

श्लोक 9 (13.67.9)

काशिराज्यं तदद्यैव त्वदर्थं जीवितं तथा । त्यजेयं भव विस्रब्धः कपोत भयं तव ॥

kāśirājyaṃ tadadyaiva tvadarthaṃ jīvitaṃ tathā | tyajeyaṃ bhava visrabdhaḥ kapota bhayaṃ tava

“यह काशी का राज्य आज तुम्हारा है और मेरा जीवन भी तुम्हारे लिए है। मैं इन्हें त्याग दूँगा। निश्चिन्त रहो, कपोत, तुम्हें भय नहीं है।”

श्येन उवाच

श्लोक 10 (13.67.10)

ममैतद्विहितं भक्ष्यं न राजंस्त्रातुमर्हसि । अतिक्रान्तं च प्राप्तं च प्रयत्नाच्चोपपादितम् ॥

mamaitadvihitaṃ bhakṣyaṃ na rājaṃstrātumarhasi | atikrāntaṃ ca prāptaṃ ca prayatnāccopapāditam

“यह मेरा नियत भोजन है, हे राजन्, तुम्हें इसकी रक्षा नहीं करनी चाहिए। मैंने इसका पीछा किया, इसे पकड़ा और प्रयत्न से प्राप्त किया है।”

श्लोक 11 (13.67.11)

मांसं च रुधिरं चास्य मज्जा मेदश्च मे हितम् । परितोषकरो ह्येष मम माऽस्याग्रतो भव ॥

māṃsaṃ ca rudhiraṃ cāsya majjā medaśca me hitam | paritoṣakaro hyeṣa mama mā'syāgrato bhava

“इसका मांस, रक्त, मज्जा और मेद मेरे लिए हितकर हैं। यह मुझे तृप्ति देनेवाला है। इसके आगे मत खड़े हो।”

श्लोक 12 (13.67.12)

तृष्णा मे बाधतेऽत्युग्रा क्षुधा निर्दहतीव माम् । मुञ्चैनं नहि शक्ष्यामि राजन्मन्दयितुं क्षुधाम् ॥

tṛṣṇā me bādhate'tyugrā kṣudhā nirdahatīva mām | muñcainaṃ nahi śakṣyāmi rājanmandayituṃ kṣudhām

“भयंकर प्यास मुझे सता रही है और भूख मानो मुझे जला रही है। इसे छोड़ दो; हे राजन्, मैं अपनी भूख रोक नहीं सकता।”

श्लोक 13 (13.67.13)

मया ह्यनुसृतो ह्येष मत्पक्षनखविक्षतः । किञ्चिदुच्छ्वासनिःश्वासं न राजन्गोप्तुमर्हसि ॥

mayā hyanusṛto hyeṣa matpakṣanakhavikṣataḥ | kiñciducchvāsaniḥśvāsaṃ na rājangoptumarhasi

“मैंने इसका पीछा किया है और यह मेरे पंखों तथा नखों से घायल है। हे राजन्, तुम्हें इसे एक साँस भर भी बचाना नहीं चाहिए।”

श्लोक 14 (13.67.14)

यदि स्वविषये राजन्प्रभुस्त्वं रक्षणे नृणाम् । खेचरस्य तृषार्तस्य न त्वं प्रभुरथोत्तम ॥

yadi svaviṣaye rājanprabhustvaṃ rakṣaṇe nṛṇām | khecarasya tṛṣārtasya na tvaṃ prabhurathottama

“यदि तुम अपने राज्य में मनुष्यों की रक्षा के स्वामी हो, तो हे उत्तम, आकाश में विचरनेवाले प्यासे जीव के स्वामी तुम नहीं हो।”

श्लोक 15 (13.67.15)

यदि वैरिषु भृत्येषु स्वजनव्यवहारयोः । विषयेष्विन्द्रियाणां च आकाशे मा पराक्रम ॥

yadi vairiṣu bhṛtyeṣu svajanavyavahārayoḥ | viṣayeṣvindriyāṇāṃ ca ākāśe mā parākrama

“अपना पराक्रम शत्रुओं पर, सेवकों पर, स्वजनों के व्यवहार में और इन्द्रियों के विषयों पर दिखाओ, आकाश में नहीं।”

श्लोक 16 (13.67.16)

प्रभुत्वं हि पराक्रम्य सम्यक् पक्षहरेषु ते । यदि त्वमिह धर्मार्थी मामपि द्रष्टुमर्हसि ॥

prabhutvaṃ hi parākramya samyak pakṣahareṣu te | yadi tvamiha dharmārthī māmapi draṣṭumarhasi

“तुम्हारा बल उन पर उचित रूप से चलता है जो तुम्हारे पक्ष को हर लेते हैं। यदि तुम यहाँ धर्म और लाभ चाहते हो, तो मुझ पर भी दृष्टि डालना तुम्हारे योग्य है।”

भीष्म उवाच

श्लोक 17 (13.67.17)

श्रुत्वा श्येनस्य तद्वाक्यं राजर्षिर्विस्मयं गतः । सम्भाव्य चैनं तद्वाक्यं तदर्थी प्रत्यभाषत ॥

śrutvā śyenasya tadvākyaṃ rājarṣirvismayaṃ gataḥ | sambhāvya cainaṃ tadvākyaṃ tadarthī pratyabhāṣata

श्येन की बात सुनकर राजर्षि को विस्मय हुआ। उन्होंने उसका और उसकी बात का आदर किया और उसी प्रयोजन को मन में रखकर उत्तर दिया।

राजोवाच

श्लोक 18 (13.67.18)

गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोपि वा । त्वदर्थमद्य क्रियतां क्षुधाप्रशमनाय ते ॥

govṛṣo vā varāho vā mṛgo vā mahiṣopi vā | tvadarthamadya kriyatāṃ kṣudhāpraśamanāya te

“बैल, सूअर, मृग या भैंसा, इनमें से जो चाहो, आज तुम्हारी भूख मिटाने के लिए तैयार किया जाए।”

श्लोक 19 (13.67.19)

शरणागतं न त्यजेयमिति मे व्रतमाहितम् । न मुञ्चति ममाङ्गानि द्विजोऽयं पश्य वै द्विज ॥

śaraṇāgataṃ na tyajeyamiti me vratamāhitam | na muñcati mamāṅgāni dvijo'yaṃ paśya vai dvija

“मेरा व्रत है कि शरण में आए हुए को मैं नहीं छोड़ूँगा। देखो, हे पक्षी, यह पक्षी मेरे अंगों को नहीं छोड़ रहा।”

श्येन उवाच

श्लोक 20 (13.67.20)

न वराहं न चोक्षाणं न चान्यान्विविधान्द्विजान् । भक्षयामि महाराज किमन्नाद्येन तेन मे ॥

na varāhaṃ na cokṣāṇaṃ na cānyānvividhāndvijān | bhakṣayāmi mahārāja kimannādyena tena me

“हे महाराज, मैं न सूअर खाता हूँ, न बैल, न दूसरे अनेक पक्षी। उस तरह के भोजन से मुझे क्या प्रयोजन?”

श्लोक 21 (13.67.21)

यस्तु मे विहितो भक्ष्यः स्वयं देवैः सनातनः । श्येनाः कपोतान्खादन्ति स्थितिरेषा सनातनी ॥

yastu me vihito bhakṣyaḥ svayaṃ devaiḥ sanātanaḥ | śyenāḥ kapotānkhādanti sthitireṣā sanātanī

“जो भोजन देवताओं ने स्वयं मेरे लिए नियत किया है वह सनातन है: श्येन कपोतों को खाते हैं। यह सनातन मर्यादा है।”

श्लोक 22 (13.67.22)

उशीनर कपोते तु यदि स्नेहस्तवानघ । ततस्त्वं मे प्रयच्छाद्य स्वमांसं तुलया धृतम् ॥

uśīnara kapote tu yadi snehastavānagha | tatastvaṃ me prayacchādya svamāṃsaṃ tulayā dhṛtam

“हे उशीनर, हे निष्पाप, यदि तुम्हें इस कपोत से स्नेह है, तो आज तराजू पर तौलकर अपना मांस मुझे दो।”

राजोवाच

श्लोक 23 (13.67.23)

महाननुग्रहो मेऽद्य यस्त्वमेवमिहात्थ माम् । बाढमेव करिष्यामीत्युक्त्वाऽसौ राजसत्तमः ॥

mahānanugraho me'dya yastvamevamihāttha mām | bāḍhameva kariṣyāmītyuktvā'sau rājasattamaḥ

“आज यह मुझ पर बड़ा अनुग्रह है कि तुम मुझसे ऐसा कह रहे हो। मैं अवश्य ऐसा ही करूँगा,” उस राजश्रेष्ठ ने ऐसा कहा।

भीष्म उवाच

श्लोक 24 (13.67.24)

उत्कृत्योत्कृत्य मांसानि तुलया समतोलयत् । अन्तःपुरे ततस्तस्य स्त्रियो रत्नविभूषिताः ॥

utkṛtyotkṛtya māṃsāni tulayā samatolayat | antaḥpure tatastasya striyo ratnavibhūṣitāḥ

वह अपना मांस काट-काटकर तराजू पर तौलने लगा। तब रत्नों से सजी उसके अन्तःपुर की स्त्रियाँ,

श्लोक 25 (13.67.25)

हाहाभूता विनिष्क्रान्ताः श्रुत्वा परमदुःखिताः । तासां रुदितशब्देन मन्त्रिभृत्यजनस्य च ॥

hāhābhūtā viniṣkrāntāḥ śrutvā paramaduḥkhitāḥ | tāsāṃ ruditaśabdena mantribhṛtyajanasya ca

हाहाकार करती हुई और अत्यन्त दुखी होकर बाहर निकल आईं। उन स्त्रियों तथा मन्त्रियों और सेवकों के रोने की आवाज से,

श्लोक 26 (13.67.26)

बभूव सुमहान्नादो मेघगम्भीरनिःस्वनः । निरुद्धं गगनं सर्वं शुभ्रं मेघैः समन्ततः ॥

babhūva sumahānnādo meghagambhīraniḥsvanaḥ | niruddhaṃ gaganaṃ sarvaṃ śubhraṃ meghaiḥ samantataḥ

मेघ के समान गम्भीर स्वरवाला बड़ा कोलाहल उठा, और सारा आकाश चारों ओर श्वेत मेघों से ढक गया,

श्लोक 27 (13.67.27)

मही प्रचलिता चासीत्तस्य सत्येन कर्मणा ॥

mahī pracalitā cāsīttasya satyena karmaṇā

और उसके सत्यकर्म के प्रभाव से पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 28 (13.67.28)

स राजा पार्श्वतश्चैव बाहुभ्यामूरुतश्च यत् । तानि मांसानि सञ्छिद्य तुलां पूरयते शनैः । तथापि न समस्तेन कपोतेन बभूव ह ॥

sa rājā pārśvataścaiva bāhubhyāmūrutaśca yat | tāni māṃsāni sañchidya tulāṃ pūrayate śanaiḥ | tathāpi na samastena kapotena babhūva ha

वह राजा अपने पार्श्वों, भुजाओं और जाँघों से मांस काट-काटकर धीरे-धीरे तराजू को भरता गया; फिर भी वह पूरे कपोत के बराबर नहीं हुआ।

श्लोक 29 (13.67.29)

अस्थिभूतो यदा राजा निर्मांसो रुधिरस्रवः । तुलां ततः समारूढः स्वं मांसक्षयमुत्सृजन् ॥

asthibhūto yadā rājā nirmāṃso rudhirasravaḥ | tulāṃ tataḥ samārūḍhaḥ svaṃ māṃsakṣayamutsṛjan

जब राजा केवल हड्डियाँ रह गया, मांस से रहित और रक्त बहाता हुआ, तब वह अपने मांस के क्षय की परवाह किए बिना स्वयं तराजू पर चढ़ गया।

श्लोक 30 (13.67.30)

ततः सेन्द्रास्त्रयो लोकास्तं नरेन्द्रमुपस्थिताः । भेर्यश्चाकाशगैस्तत्र वादिता देवदुन्दुभिः ॥

tataḥ sendrāstrayo lokāstaṃ narendramupasthitāḥ | bheryaścākāśagaistatra vāditā devadundubhiḥ

तब इन्द्र सहित तीनों लोक उस नरेन्द्र के सामने उपस्थित हुए; आकाशचारियों ने वहाँ भेरियाँ और देवदुन्दुभियाँ बजाईं।

श्लोक 31 (13.67.31)

अमृतेनावसिक्तश्च वृषदर्भो नरेश्वरः । दिव्यैश्च सुसुखैर्माल्यैरभिवृष्टः पुनःपुनः ॥

amṛtenāvasiktaśca vṛṣadarbho nareśvaraḥ | divyaiśca susukhairmālyairabhivṛṣṭaḥ punaḥpunaḥ

नरेश्वर वृषदर्भ पर अमृत छिड़का गया और उन पर बार-बार सुखद दिव्य मालाओं की वर्षा हुई।

श्लोक 32 (13.67.32)

देवगन्धर्वसङ्घातैरप्सरोभिश्च सर्वतः । नृत्तश्चैवोपगीतश्च पितामह इव प्रभुः ॥

devagandharvasaṅghātairapsarobhiśca sarvataḥ | nṛttaścaivopagītaśca pitāmaha iva prabhuḥ

देवों और गन्धर्वों के समूहों तथा अप्सराओं से चारों ओर घिरे हुए, नृत्य और गान के बीच वे साक्षात् पितामह के समान प्रभु लगते थे।

श्लोक 33 (13.67.33)

हेमप्रासादसम्बाधं मणिकाञ्चनतोरणम् । सवैडूर्यमणिस्तम्भं विमानं समधिष्ठितः ॥

hemaprāsādasambādhaṃ maṇikāñcanatoraṇam | savaiḍūryamaṇistambhaṃ vimānaṃ samadhiṣṭhitaḥ

वे एक दिव्य विमान पर आरूढ़ हुए, जो सोने के महलों से भरा था, जिसके तोरण मणि और स्वर्ण के थे और जिसके खम्भे वैदूर्य मणि के थे।

श्लोक 34 (13.67.34)

स राजर्षिर्गतः स्वर्गं कर्मणा तेन शाश्वतम् । शरणागतेषु चैवं त्वं कुरु सर्वं युधिष्ठिर ॥

sa rājarṣirgataḥ svargaṃ karmaṇā tena śāśvatam | śaraṇāgateṣu caivaṃ tvaṃ kuru sarvaṃ yudhiṣṭhira

उस कर्म से वह राजर्षि शाश्वत स्वर्ग को गया। हे युधिष्ठिर, तुम भी शरणागतों के प्रति यही सब करो।

श्लोक 35 (13.67.35)

भक्तानामनुरक्तानामाश्रितानां च रक्षिता । दयावान्सर्वभूतेषु परत्र सुखमेधते ॥

bhaktānāmanuraktānāmāśritānāṃ ca rakṣitā | dayāvānsarvabhūteṣu paratra sukhamedhate

जो राजा भक्तों, अनुरक्तों और आश्रितों की रक्षा करता है और सब प्राणियों पर दया रखता है, वह परलोक में सुख पाता है।

श्लोक 36 (13.67.36)

साधुवृत्तो हि यो राजा सद्वृत्तमनुतिष्ठति । किं न प्राप्तं भवेत्तेन स्वव्याजेनेह कर्मणा ॥

sādhuvṛtto hi yo rājā sadvṛttamanutiṣṭhati | kiṃ na prāptaṃ bhavettena svavyājeneha karmaṇā

जो राजा सदाचारी है और सज्जनों के मार्ग पर चलता है, वह ऐसे कर्म से, जिसे उसने स्वयं यहाँ सिद्ध किया, क्या नहीं पा सकता?

श्लोक 37 (13.67.37)

स राजर्षिर्विशुद्धात्मा धीरः सत्यपराक्रमः । काशीनामीश्वरः ख्यातस्त्रिषु लोकेषु कर्मणा ॥

sa rājarṣirviśuddhātmā dhīraḥ satyaparākramaḥ | kāśīnāmīśvaraḥ khyātastriṣu lokeṣu karmaṇā

वह विशुद्ध आत्मावाला, धीर और सत्यपराक्रमी राजर्षि उसी कर्म से तीनों लोकों में काशी के अधिपति के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 38 (13.67.38)

योऽप्यन्यः कारयेदेवं शरणागतरक्षणम् । सोपि गच्छेत तामेव गतिं भरतसत्तम ॥

yo'pyanyaḥ kārayedevaṃ śaraṇāgatarakṣaṇam | sopi gaccheta tāmeva gatiṃ bharatasattama

जो कोई दूसरा भी इसी प्रकार शरणागत की रक्षा करेगा, वह भी उसी गति को पाएगा, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 39 (13.67.39)

इदं वृत्तं हि राजर्षे वृषदर्भस्य कीर्तयन् । पूतात्मा वै भवेल्लोके शृणुयाद्यश्च नित्यशः ॥

idaṃ vṛttaṃ hi rājarṣe vṛṣadarbhasya kīrtayan | pūtātmā vai bhavelloke śṛṇuyādyaśca nityaśaḥ

जो राजर्षि वृषदर्भ के इस वृत्तान्त का कीर्तन करता है और जो इसे नित्य सुनता है, वह संसार में पवित्र आत्मावाला हो जाता है।

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