Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 69

ब्राह्मणों की पूजा; पृथ्वी का वासुदेव को उत्तर

भीष्म आगे कहते हैं: ब्राह्मणों की सदा पूजा करनी चाहिए और पिता के समान उनकी रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि देवता और पितर उन्हीं के द्वारा हव्य-कव्य ग्रहण करते हैं, क्षत्रियों का तेज उन्हीं में शान्त होता है, और भृगु, अंगिरा तथा भरद्वाज ने बड़ी-बड़ी जातियों को जीता। फिर वे वासुदेव और पृथ्वी का संवाद सुनाते हैं: वासुदेव पूछते हैं कि गृहस्थ पाप से कैसे छूटे; पृथ्वी उत्तर देती है कि ब्राह्मणों की सेवा से सब मल नष्ट हो जाता है, जिसकी वे प्रशंसा करते हैं वह उन्नति पाता है और जिसकी निन्दा करते हैं वह गिरता है, और इन्द्र को भी सहस्र नेत्र उन्हीं के प्रभाव से मिले। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सदा पूजा करने को कहते हैं।

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.69.1)

ब्राह्मणानेव सततं भृशं सम्परिपूजयेत् । एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥

brāhmaṇāneva satataṃ bhṛśaṃ samparipūjayet | ete hi somarājāna īśvarāḥ sukhaduḥkhayoḥ

राजा ब्राह्मणों की सदा भली-भाँति पूजा करे। सोम जिनके राजा हैं, वे ही सुख और दुःख के स्वामी हैं।

श्लोक 2 (13.69.2)

एते भोगैरलङ्कारैरन्यैश्चैव किमिच्छकैः । सदा पूज्या नमस्कारै रक्ष्याश्च पितृवन्नृपैः । ततो राष्ट्राय शान्तिर्हि भूतानामिव वासवात् ॥

ete bhogairalaṅkārairanyaiścaiva kimicchakaiḥ | sadā pūjyā namaskārai rakṣyāśca pitṛvannṛpaiḥ | tato rāṣṭrāya śāntirhi bhūtānāmiva vāsavāt

राजा उन्हें भोगों, आभूषणों और उनकी माँगी हुई अन्य वस्तुओं से सदा पूजें और नमस्कार करें, और पिता के समान उनकी रक्षा करें। इससे राष्ट्र को शान्ति मिलती है, जैसे प्राणियों को वासव (इन्द्र) से।

श्लोक 3 (13.69.3)

ज्ञानवान्ब्रह्मवर्चस्वी राष्ट्रे वै ब्राह्मणः शुचिः । महारथश्च राजन्य एष्टव्यः शत्रुतापनः ॥

jñānavānbrahmavarcasvī rāṣṭre vai brāhmaṇaḥ śuciḥ | mahārathaśca rājanya eṣṭavyaḥ śatrutāpanaḥ

राष्ट्र में ज्ञानवान्, ब्रह्मतेज से सम्पन्न, पवित्र ब्राह्मण की खोज करनी चाहिए, और शत्रुओं को तपानेवाले महारथी क्षत्रिय की भी।

श्लोक 4 (13.69.4)

ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितव्रतम् । भोजयीत गृहे राजन्न तस्मात्परमस्ति वै ॥

brāhmaṇaṃ jātisampannaṃ dharmajñaṃ saṃśitavratam | bhojayīta gṛhe rājanna tasmātparamasti vai

सत्कुल में उत्पन्न, धर्म को जाननेवाले और दृढ़ व्रती ब्राह्मण को राजा अपने घर में भोजन कराए, हे राजन्; इससे बढ़कर कुछ नहीं है।

श्लोक 5 (13.69.5)

ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्तं प्रतिगृह्णन्ति देवताः । पितरः सर्वभूतानां नैतेभ्यो विद्यते परम् ॥

brāhmaṇebhyo havirdattaṃ pratigṛhṇanti devatāḥ | pitaraḥ sarvabhūtānāṃ naitebhyo vidyate param

ब्राह्मणों को दिया हुआ हव्य देवता ग्रहण करते हैं, और पितर तथा सब प्राणी भी; इनसे बढ़कर कुछ नहीं है।

श्लोक 6 (13.69.6)

आदित्यश्चन्द्रमा विष्णुः शङ्करोऽग्निः प्रजापतिः । सर्वे ब्राह्मणमाविश्य सदाऽन्नमुपभुञ्जते ॥

ādityaścandramā viṣṇuḥ śaṅkaro'gniḥ prajāpatiḥ | sarve brāhmaṇamāviśya sadā'nnamupabhuñjate

आदित्य, चन्द्रमा, विष्णु, शंकर, अग्नि और प्रजापति, ये सब ब्राह्मण में प्रवेश करके सदा अन्न ग्रहण करते हैं।

श्लोक 7 (13.69.7)

न तस्याश्नन्ति पितरो यस्य विप्रा न भुञ्जते । देवाश्चाप्यस्य नाश्नन्ति पापस्य ब्राह्मणद्विषः ॥

na tasyāśnanti pitaro yasya viprā na bhuñjate | devāścāpyasya nāśnanti pāpasya brāhmaṇadviṣaḥ

जिसके यहाँ ब्राह्मण भोजन नहीं करते, उसका अन्न पितर नहीं खाते; और ब्राह्मणों से द्वेष करनेवाले उस पापी का अन्न देवता भी नहीं खाते।

श्लोक 8 (13.69.8)

ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रीयन्ते पितरः सदा । तथैव देवता राजन्नात्र कार्या विचारणा ॥

brāhmaṇeṣu tu tuṣṭeṣu prīyante pitaraḥ sadā | tathaiva devatā rājannātra kāryā vicāraṇā

ब्राह्मणों के सन्तुष्ट होने पर पितर सदा प्रसन्न होते हैं, और देवता भी, हे राजन्; इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 9 (13.69.9)

तथैव तेऽपि प्रीयन्ते येषां भवति तद्धविः । न च प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति च परां गतिम् ॥

tathaiva te'pi prīyante yeṣāṃ bhavati taddhaviḥ | na ca pretya vinaśyanti gacchanti ca parāṃ gatim

इसी प्रकार वे भी प्रसन्न होते हैं जिनका वह हव्य होता है, और वे मरकर नष्ट नहीं होते, परम गति को जाते हैं।

श्लोक 10 (13.69.10)

येनयेनैव हविषा ब्राह्मणांस्तर्पयेन्नरः । तेनतेनैव प्रीयन्ते पितरो देवतास्तथा ॥

yenayenaiva haviṣā brāhmaṇāṃstarpayennaraḥ | tenatenaiva prīyante pitaro devatāstathā

मनुष्य जिस-जिस हव्य से ब्राह्मणों को तृप्त करता है, उसी-उसी से पितर और देवता प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 11 (13.69.11)

ब्राह्मणादेव तद्भूतं प्रभवन्ति यतः प्रजाः । यतश्चायं प्रभवति प्रेत्य यत्र च गच्छति ॥

brāhmaṇādeva tadbhūtaṃ prabhavanti yataḥ prajāḥ | yataścāyaṃ prabhavati pretya yatra ca gacchati

यह जगत् ब्राह्मण से ही उत्पन्न होता है, जिससे प्राणी जन्म लेते हैं; इसी से यह मनुष्य उत्पन्न होता है और मरकर जहाँ जाता है वहाँ पहुँचता है।

श्लोक 12 (13.69.12)

वेदैष मार्गं स्वर्गस्य तथैव नरकस्य च । आगतानागते चोमे ब्राह्मणो द्विपदांवरः ॥

vedaiṣa mārgaṃ svargasya tathaiva narakasya ca | āgatānāgate come brāhmaṇo dvipadāṃvaraḥ

वह स्वर्ग का मार्ग और नरक का भी मार्ग जानता है, तथा बीते हुए और आनेवाले दोनों को; ब्राह्मण द्विपदों में श्रेष्ठ है।

श्लोक 13 (13.69.13)

ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठः स्वधर्मं चैव वेद यः । ये चैनमनुवर्तन्ते ते न यान्ति पराभवम् । न ते प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति न पराभवम् ॥

brāhmaṇo dvipadāṃ śreṣṭhaḥ svadharmaṃ caiva veda yaḥ | ye cainamanuvartante te na yānti parābhavam | na te pretya vinaśyanti gacchanti na parābhavam

ब्राह्मण द्विपदों में श्रेष्ठ है, जो अपने धर्म को जानता है। जो उसका अनुसरण करते हैं वे कभी पराजित नहीं होते; मरकर वे नष्ट नहीं होते और विनाश को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 14 (13.69.14)

यद्ब्राह्मणमुखात्प्राप्तं प्रतिगृह्णन्ति वै वचः । कृतात्मानो महात्मानस्ते न यान्ति पराभवम् ॥

yadbrāhmaṇamukhātprāptaṃ pratigṛhṇanti vai vacaḥ | kṛtātmāno mahātmānaste na yānti parābhavam

जो ब्राह्मण के मुख से निकले वचन को ग्रहण करते हैं, वे संस्कारित आत्मावाले महात्मा कभी पराजित नहीं होते।

श्लोक 15 (13.69.15)

क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च । ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च बलानि च ॥

kṣatriyāṇāṃ pratapatāṃ tejasā ca balena ca | brāhmaṇeṣveva śāmyanti tejāṃsi ca balāni ca

तेज और बल से तपनेवाले क्षत्रियों के तेज और बल ब्राह्मणों में ही शान्त हो जाते हैं।

श्लोक 16 (13.69.16)

भृगवस्तालजङ्घांश्च नीपानाङ्गिरसोऽजयन् । भरद्वाजो वैतहव्यानैलांश्च भरतर्षभ ॥

bhṛgavastālajaṅghāṃśca nīpānāṅgiraso'jayan | bharadvājo vaitahavyānailāṃśca bharatarṣabha

भृगुओं ने तालजंघों को जीता, अंगिराओं ने नीपों को, और भरद्वाज ने वीतहव्यों और ऐलों को, हे भरतश्रेष्ठ;

श्लोक 17 (13.69.17)

चित्रायुधांश्चाप्यजयन्नेते कृष्णाजिनध्वजाः । प्रक्षिप्याथ च कुम्भान्वै पारगामिनमारभेत् ॥

citrāyudhāṃścāpyajayannete kṛṣṇājinadhvajāḥ | prakṣipyātha ca kumbhānvai pāragāminamārabhet

काले मृगचर्म की ध्वजावाले इन्हीं ने चित्रायुधों को भी जीता। और घड़ों को फेंककर मनुष्य उस पार ले जानेवाले साधन का आरम्भ करे।

श्लोक 18 (13.69.18)

यत्किंचित्कथ्यते लोके श्रूयते पठ्यतेऽपि वा । सर्वं तद्ब्राह्मणेष्वेव गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥

yatkiṃcitkathyate loke śrūyate paṭhyate'pi vā | sarvaṃ tadbrāhmaṇeṣveva gūḍho'gniriva dāruṣu

संसार में जो कुछ कहा जाता है, सुना जाता है या पढ़ा जाता है, वह सब ब्राह्मणों में ही निहित है, जैसे लकड़ी में छिपी हुई अग्नि।

श्लोक 19 (13.69.19)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं वासुदेवस्य पृथ्व्याश्च भरतर्षभ ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | saṃvādaṃ vāsudevasya pṛthvyāśca bharatarṣabha

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: वासुदेव और पृथ्वी का संवाद, हे भरतश्रेष्ठ।

वासुदेव उवाच

श्लोक 20 (13.69.20)

मातरं सर्वभूतानां पृच्छे त्वां संशयं शुभे । केनस्वित्कर्मणा पापं व्यपोहति नरो गृही ॥

mātaraṃ sarvabhūtānāṃ pṛcche tvāṃ saṃśayaṃ śubhe | kenasvitkarmaṇā pāpaṃ vyapohati naro gṛhī

“हे सब प्राणियों की माता, हे शुभे, मैं आपसे एक संशय पूछता हूँ: गृहस्थ मनुष्य किस कर्म से पाप को दूर करता है?”

पृथिव्युवाच

श्लोक 21 (13.69.21)

ब्राह्मणानेव सेवेत पवित्रं ह्येतदुत्तमम् । ब्राह्मणान्सेवमानस्य रजः सर्वं प्रणश्यति ॥

brāhmaṇāneva seveta pavitraṃ hyetaduttamam | brāhmaṇānsevamānasya rajaḥ sarvaṃ praṇaśyati

“वह ब्राह्मणों की ही सेवा करे, क्योंकि यही सर्वोत्तम पवित्र करनेवाला साधन है। ब्राह्मणों की सेवा करनेवाले का सारा मल नष्ट हो जाता है।”

श्लोक 22 (13.69.22)

अतो भूतिरतः कीर्तिरतो बुद्धिः प्रजायते । अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चैव ये परे ॥

ato bhūtirataḥ kīrtirato buddhiḥ prajāyate | apareṣāṃ pareṣāṃ ca parebhyaścaiva ye pare

“उन्हीं से समृद्धि, कीर्ति और बुद्धि उत्पन्न होती है, निम्न के लिए, उच्च के लिए, और उनके लिए भी जो उच्चतरों से भी उच्च हैं।”

श्लोक 23 (13.69.23)

ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति पुरुषः स प्रवर्धते । अथ यो ब्राह्मणाक्रुष्टः पराभवति सोऽचिरात् ॥

brāhmaṇā yaṃ praśaṃsanti puruṣaḥ sa pravardhate | atha yo brāhmaṇākruṣṭaḥ parābhavati so'cirāt

“ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करते हैं वह पुरुष उन्नति करता है; और जिसे ब्राह्मण धिक्कारते हैं वह शीघ्र ही गिर जाता है।”

श्लोक 24 (13.69.24)

यथा महार्णवे क्षिप्त आमलोष्टो विनश्यति । तथा दुश्चरितं कर्म पराभावाय कल्पते ॥

yathā mahārṇave kṣipta āmaloṣṭo vinaśyati | tathā duścaritaṃ karma parābhāvāya kalpate

“जैसे महासागर में फेंका हुआ कच्चा मिट्टी का ढेला गल जाता है, वैसे ही दुष्कर्म पतन का कारण बनता है।”

श्लोक 25 (13.69.25)

पश्य चन्द्रे कृतं लक्ष्म समुद्रे लवणोदकम् । तथा भगसहस्रेण महेन्द्रं परिचिह्नितम् ॥

paśya candre kṛtaṃ lakṣma samudre lavaṇodakam | tathā bhagasahasreṇa mahendraṃ paricihnitam

“देखो, चन्द्रमा में लगा हुआ चिह्न, समुद्र में खारा जल; वैसे ही महेन्द्र हजार भग-चिह्नों से चिह्नित हुए।”

श्लोक 26 (13.69.26)

तेषामेव प्रभावेन सहस्रनयनो ह्यसौ । शतक्रतुः समभवत्पश्य माधव यादृशम् ॥

teṣāmeva prabhāvena sahasranayano hyasau | śatakratuḥ samabhavatpaśya mādhava yādṛśam

“उन्हीं के प्रभाव से वे शतक्रतु सहस्रनेत्र हुए; देखो माधव, वे कैसे हो गए।”

श्लोक 27 (13.69.27)

इच्छन्भूतिं च कीर्तिं च लोकांश्च मधुसूदन । ब्राह्मणानुमते तिष्ठेत्पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥

icchanbhūtiṃ ca kīrtiṃ ca lokāṃśca madhusūdana | brāhmaṇānumate tiṣṭhetpuruṣaḥ śucirātmavān

“समृद्धि, कीर्ति और उत्तम लोकों की इच्छा रखनेवाला पुरुष, हे मधुसूदन, पवित्र और संयमी रहकर ब्राह्मणों की अनुमति के अनुसार चले।”

भीष्म उवाच

श्लोक 28 (13.69.28)

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा मेदिन्या मधूसूदनः । साधुसाध्विति कौरव्य मेदिनीं प्रत्यपूजयत् ॥

ityetadvacanaṃ śrutvā medinyā madhūsūdanaḥ | sādhusādhviti kauravya medinīṃ pratyapūjayat

पृथ्वी का यह वचन सुनकर मधुसूदन ने, हे कौरव्य, “साधु, साधु” कहा और पृथ्वी का सम्मान किया।

श्लोक 29 (13.69.29)

एतां श्रुत्वोपमां पार्थ प्रयतो ब्राह्मणर्षभान् । सततं पूजयेथास्त्वं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥

etāṃ śrutvopamāṃ pārtha prayato brāhmaṇarṣabhān | satataṃ pūjayethāstvaṃ tataḥ śreyo'bhipatsyase

हे पार्थ, यह उपमा सुनकर तुम भी संयमी होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सदा पूजा करो; उससे तुम कल्याण को प्राप्त करोगे।

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70