अनुशासन पर्व · अध्याय 70
ब्राह्मणों की महिमा
भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि ब्राह्मण जन्म से ही पूज्य है, और वे ब्रह्मा की उन गाथाओं को दोहराते हैं जिनमें ब्राह्मणों को अपने ही कर्म और वेदाध्ययन में लगे रहने को कहा गया है। फिर वे ब्राह्मणों के अनेक स्वभाव बताते हैं, कोमल भी और उग्र भी, और दिखाते हैं कि उनके सान्निध्य से वंचित जातियाँ किस प्रकार पतित हो गईं। अन्त में वे राजा से कहते हैं कि दान और सेवा से उनका सम्मान करे और जो दान न लें, उनकी भी रक्षा करे।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.70.1)
जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते । नमस्यः सर्वभूतानामतिथिः प्रश्रिताग्रभुक् ॥
janmanaiva mahābhāgo brāhmaṇo nāma jāyate | namasyaḥ sarvabhūtānāmatithiḥ praśritāgrabhuk
जन्म से ही ब्राह्मण महान् सौभाग्यशाली होकर उत्पन्न होता है। वह सब प्राणियों के लिए वन्दनीय है, अतिथि है, और आदरपूर्वक परोसे गए भोजन को सबसे पहले ग्रहण करने का अधिकारी है।
श्लोक 2 (13.70.2)
सर्वेषां सुहृदस्तात ब्राह्मणाः सुमनोमुखाः । सर्वानेते हनिष्यन्ति ब्राह्मणा जातमन्यवः । गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरनुध्यायन्ति पूजिताः ॥
sarveṣāṃ suhṛdastāta brāhmaṇāḥ sumanomukhāḥ | sarvānete haniṣyanti brāhmaṇā jātamanyavaḥ | gīrbhirmaṅgalayuktābhiranudhyāyanti pūjitāḥ
हे तात, ब्राह्मण सबके मित्र और सौम्य मुख वाले होते हैं। पर क्रोध उत्पन्न हो जाने पर ये ब्राह्मण सबका नाश कर डालेंगे। सम्मानित होने पर वे मंगलमय वाणी से सबका कल्याण चाहते हैं।
श्लोक 3 (13.70.3)
सर्वान्नो द्विषतस्तात ब्राह्मणा जातमन्यवः । गीर्भिर्दारुणयुक्ताभिर्हन्युश्चैते ह्यपूजिताः ॥
sarvānno dviṣatastāta brāhmaṇā jātamanyavaḥ | gīrbhirdāruṇayuktābhirhanyuścaite hyapūjitāḥ
हे तात, जो लोग हमसे द्वेष रखते हैं, उन सबके प्रति यदि ब्राह्मणों का क्रोध जाग उठे और वे उनसे अपूजित रहें, तो वे अपनी कठोर वाणी से उनका नाश कर सकते हैं।
श्लोक 4 (13.70.4)
अत्र गाथाः पुरा गीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । सृष्ट्वा द्विजातीन्धाता हि यथापूर्वं समादधत् ॥
atra gāthāḥ purā gītāḥ kīrtayanti purāvidaḥ | sṛṣṭvā dvijātīndhātā hi yathāpūrvaṃ samādadhat
इस विषय में प्राचीन बातों के जानकार लोग पुराने समय में गाई गई गाथाएँ सुनाते हैं: द्विजों की सृष्टि करके विधाता ने उनके लिए पहले की ही भाँति मार्ग निश्चित किया।
श्लोक 5 (13.70.5)
न वोऽन्यदिह कर्तव्यं किञ्चिदूर्ध्वायनं विधि । गुप्तो गोपायते ब्रह्मा श्रेयो वस्तेन शोभनम् ॥
na vo'nyadiha kartavyaṃ kiñcidūrdhvāyanaṃ vidhi | gupto gopāyate brahmā śreyo vastena śobhanam
यहाँ तुम्हें इसके अतिरिक्त कुछ और करना नहीं है; इस विधान से ऊपर चढ़ने का कोई दूसरा मार्ग नहीं। रक्षित ब्राह्मण स्वयं रक्षा करता है; उसी से तुम्हारा उत्तम कल्याण होता है।
श्लोक 6 (13.70.6)
स्वमेव कुर्वतां कर्म श्रीर्वो ब्राह्मी भविष्यति । प्रमाणं सर्वभूतानां प्रग्रहाश्च भविष्यथ ॥
svameva kurvatāṃ karma śrīrvo brāhmī bhaviṣyati | pramāṇaṃ sarvabhūtānāṃ pragrahāśca bhaviṣyatha
यदि तुम केवल अपना ही कर्म करते रहोगे, तो तुम्हें ब्रह्मतेज की श्री प्राप्त होगी। तुम सब प्राणियों के लिए प्रमाण बनोगे और उनके लिए लगाम के समान नियन्त्रण करने वाले होगे।
श्लोक 7 (13.70.7)
न शौद्रं कर्म कर्तव्यं ब्राह्मणेन विपश्चिता । शौद्रं हि कुर्वतः कर्म ब्राह्मी श्रीरुपरुध्यते ॥
na śaudraṃ karma kartavyaṃ brāhmaṇena vipaścitā | śaudraṃ hi kurvataḥ karma brāhmī śrīruparudhyate
विवेकी ब्राह्मण को शूद्र का कर्म नहीं करना चाहिए; क्योंकि शूद्र का कर्म करने वाले की ब्राह्मी श्री रुक जाती है।
श्लोक 8 (13.70.8)
श्रीश्च बुद्धिश्च तेजश्च विभूतिश्च प्रतापिनी । स्वाध्यायेनैव महात्म्यं विपुलं प्रतिपत्स्यथ ॥
śrīśca buddhiśca tejaśca vibhūtiśca pratāpinī | svādhyāyenaiva mahātmyaṃ vipulaṃ pratipatsyatha
श्री, बुद्धि, तेज और प्रतापशालिनी विभूति: ये सब और विपुल महिमा तुम्हें केवल वेदाध्ययन से ही प्राप्त होगी।
श्लोक 9 (13.70.9)
हुत्वा चाहवनीयस्थं महाभाग्ये प्रतिष्ठिताः । अग्रभोज्याः प्रसूतीनां श्रिया ब्राह्म्याऽनुकल्पिताः ॥
hutvā cāhavanīyasthaṃ mahābhāgye pratiṣṭhitāḥ | agrabhojyāḥ prasūtīnāṃ śriyā brāhmyā'nukalpitāḥ
आहवनीय अग्नि में आहुति देकर तुम महान् सौभाग्य में प्रतिष्ठित हो। तुम सन्तानों से भी पहले भोजन पाने के अधिकारी हो, और ब्राह्मी श्री ने तुम्हें इसके योग्य बनाया है।
श्लोक 10 (13.70.10)
श्रद्धया परया युक्ता ह्यनभिद्रोहलब्धया । दमस्वाध्यायनिरताः सर्वान्कामानवाप्स्यथ ॥
śraddhayā parayā yuktā hyanabhidrohalabdhayā | damasvādhyāyaniratāḥ sarvānkāmānavāpsyatha
जो किसी से द्रोह न करने से प्राप्त हुई है, ऐसी परम श्रद्धा से युक्त होकर और दम तथा स्वाध्याय में लगे रहकर तुम सभी कामनाएँ पा लोगे।
श्लोक 11 (13.70.11)
यच्चैव मानुषे लोके यच्च देवेषु किञ्चन । सर्वं वस्तपसा साध्यं ज्ञानेन नियमेन च ॥
yaccaiva mānuṣe loke yacca deveṣu kiñcana | sarvaṃ vastapasā sādhyaṃ jñānena niyamena ca
मनुष्यलोक में जो कुछ है और देवताओं में जो कुछ है, वह सब तप, ज्ञान और संयम से तुम्हारे लिए साध्य है।
श्लोक 12 (13.70.12)
युष्मत्संमाननां प्रीतिं पावनैः क्षत्रिया भृशम् । अमुत्रेह समायान्ति वैश्यशूद्राधिकास्तथा ॥
yuṣmatsaṃmānanāṃ prītiṃ pāvanaiḥ kṣatriyā bhṛśam | amutreha samāyānti vaiśyaśūdrādhikāstathā
अपने पवित्र करने वाले कर्मों से क्षत्रिय तुम्हारा सम्मान और स्नेह भरपूर पाते हैं; और इसी प्रकार इस लोक और परलोक में वैश्य, शूद्र तथा अन्य लोग भी पाते हैं।
श्लोक 13 (13.70.13)
अरक्षिताश्च युष्माभिर्विरुद्धा यान्ति विप्लवम् । युष्मत्तेजोधृता लोकास्तद्रक्ष्यथ जगत्त्रयम् ॥
arakṣitāśca yuṣmābhirviruddhā yānti viplavam | yuṣmattejodhṛtā lokāstadrakṣyatha jagattrayam
तुमसे रक्षा न पाने पर और तुम्हारे विरुद्ध हो जाने पर वे विनाश को प्राप्त होते हैं। लोक तुम्हारे तेज से धारण किए हुए हैं; इसलिए तुम तीनों लोकों की रक्षा करते हो।
श्लोक 14 (13.70.14)
इत्येवं ब्रह्मगीतास्ते समाख्याता मयाऽनघ । विप्रानुकम्पार्थमिदं तेन प्रोक्तं हि धीमता ॥
ityevaṃ brahmagītāste samākhyātā mayā'nagha | viprānukampārthamidaṃ tena proktaṃ hi dhīmatā
हे निष्पाप, ब्रह्मा द्वारा गाई हुई ये गाथाएँ मैंने तुम्हें सुना दीं। उस बुद्धिमान् ने ब्राह्मणों पर दया करके ही यह कहा था।
श्लोक 15 (13.70.15)
भूयस्तेषां बलं मन्ये यथा राज्ञस्तपस्विनः । दुरासदाश्च चण्डाश्च तपसा क्षिप्रकारिणः ॥
bhūyasteṣāṃ balaṃ manye yathā rājñastapasvinaḥ | durāsadāśca caṇḍāśca tapasā kṣiprakāriṇaḥ
मैं मानता हूँ कि उनका बल और भी बड़ा है, राजाओं और तपस्वियों के बल जैसा। वे तप के कारण दुर्गम, उग्र और शीघ्र फल देने वाले हैं।
श्लोक 16 (13.70.16)
सन्त्येषां सिम्हसत्वाश्च व्याघ्रसत्वास्तथाऽपरे । वराहमृगसत्वाश्च गजसत्वास्तथाऽपरे ॥
santyeṣāṃ simhasatvāśca vyāghrasatvāstathā'pare | varāhamṛgasatvāśca gajasatvāstathā'pare
इनमें कुछ सिंह के स्वभाव वाले हैं, कुछ बाघ के; कुछ सूअर और मृग के स्वभाव वाले हैं, और कुछ हाथी के।
श्लोक 17 (13.70.17)
सर्पस्पर्शसमाः केचित्तथाऽन्ये मकरस्पृशः । विभाष्य घातिनः केचित्तथा चक्षुर्हणोऽपरे ॥
sarpasparśasamāḥ kecittathā'nye makaraspṛśaḥ | vibhāṣya ghātinaḥ kecittathā cakṣurhaṇo'pare
कुछ सर्प के स्पर्श के समान हैं, कुछ मगर के स्पर्श के समान। कुछ केवल बोलकर ही मार डालते हैं, और कुछ दृष्टि से नष्ट कर देते हैं।
श्लोक 18 (13.70.18)
सन्ति चाशीविषसमाः सन्ति मन्दास्तथाऽपरे । विविधानीह वृत्तानि ब्राह्मणानां युधिष्ठिर ॥
santi cāśīviṣasamāḥ santi mandāstathā'pare | vividhānīha vṛttāni brāhmaṇānāṃ yudhiṣṭhira
कुछ विषैले सर्पों के समान हैं और कुछ मन्द स्वभाव के हैं। हे युधिष्ठिर, इस जगत् में ब्राह्मणों के आचरण अनेक प्रकार के हैं।
श्लोक 19 (13.70.19)
मेकला द्राविडा लाटाः पौण्ड्राः कान्वशिरास्तथा । शौण्डिका दरदा दार्वाश्चोराः शबरबर्बराः ॥
mekalā drāviḍā lāṭāḥ pauṇḍrāḥ kānvaśirāstathā | śauṇḍikā daradā dārvāścorāḥ śabarabarbarāḥ
मेकल, द्राविड़, लाट, पौण्ड्र, कान्वशिर, शौण्डिक, दरद, दार्व, चोर, शबर और बर्बर,
श्लोक 20 (13.70.20)
किराता यवनाश्चैव तास्ताः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वमनुप्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥
kirātā yavanāścaiva tāstāḥ kṣatriyajātayaḥ | vṛṣalatvamanuprāptā brāhmaṇānāmadarśanāt
किरात और यवन: ये तथा वे अन्य क्षत्रिय जातियाँ ब्राह्मणों के दर्शन (सान्निध्य) के अभाव से वृषल (शूद्र) भाव को प्राप्त हो गईं।
श्लोक 21 (13.70.21)
ब्राह्मणानां परिभवादसुराः सलिलेशयाः । ब्राह्मणानां प्रसादाच्च देवाः स्वर्गनिवासिनः ॥
brāhmaṇānāṃ paribhavādasurāḥ salileśayāḥ | brāhmaṇānāṃ prasādācca devāḥ svarganivāsinaḥ
ब्राह्मणों के तिरस्कार से असुर जल में रहने वाले हो गए, और ब्राह्मणों की कृपा से देवता स्वर्ग में निवास करते हैं।
श्लोक 22 (13.70.22)
अशक्यं स्प्रष्टुमाकाशमचाल्यो हिमवान्गिरिः । अवार्या सेतुना गङ्गा दुर्जया ब्राह्मणा भुवि ॥
aśakyaṃ spraṣṭumākāśamacālyo himavāngiriḥ | avāryā setunā gaṅgā durjayā brāhmaṇā bhuvi
आकाश को छुआ नहीं जा सकता, हिमालय को हिलाया नहीं जा सकता, गंगा को बाँध से रोका नहीं जा सकता, और पृथ्वी पर ब्राह्मणों को जीता नहीं जा सकता।
श्लोक 23 (13.70.23)
न ब्राह्मणविरोधेन शक्या शास्तुं वसुन्धरा । ब्राह्मणा हि महात्मानो देवानामपि देवताः ॥
na brāhmaṇavirodhena śakyā śāstuṃ vasundharā | brāhmaṇā hi mahātmāno devānāmapi devatāḥ
ब्राह्मणों का विरोध करके पृथ्वी पर शासन नहीं किया जा सकता। ब्राह्मण महात्मा हैं, देवताओं के भी देवता हैं।
श्लोक 24 (13.70.24)
तान्पूजयस्व सततं दानेन परिचर्यया । यदीच्छसि महीं भोक्तमिमां सागरमेखलाम् ॥
tānpūjayasva satataṃ dānena paricaryayā | yadīcchasi mahīṃ bhoktamimāṃ sāgaramekhalām
इसलिए यदि तुम समुद्र की मेखला वाली इस पृथ्वी का भोग करना चाहते हो, तो दान और सेवा से सदा उनकी पूजा करो।
श्लोक 25 (13.70.25)
प्रतिग्रहेण तेजो हि विप्राणां शाम्यतेऽनघ । प्रतिग्रहं ये नेच्छेयुस्तेऽपि रक्ष्यास्त्वया नृप ॥
pratigraheṇa tejo hi viprāṇāṃ śāmyate'nagha | pratigrahaṃ ye neccheyuste'pi rakṣyāstvayā nṛpa
हे निष्पाप, दान स्वीकार करने से ब्राह्मणों का तेज शान्त हो जाता है। और जो दान लेना न चाहें, हे राजन्, उनकी भी तुम्हें रक्षा करनी चाहिए।