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अनुशासन पर्व · अध्याय 71

शक्र और शम्बर: ब्राह्मणों के सम्मान का उपदेश

भीष्म शक्र और असुर शम्बर का प्राचीन संवाद सुनाते हैं। जटाधारी ब्राह्मण के वेश में शक्र शम्बर से पूछते हैं कि वह अपने जाति-बन्धुओं से ऊपर कैसे स्थित है। शम्बर उत्तर देता है कि वह ब्राह्मणों का सम्मान करता है, उनकी सुनता है और उनकी सेवा करता है, और वह बताता है कि चन्द्रमा ने उसके पिता से ब्राह्मणों के बल तथा विद्वानों के उचित आचरण के विषय में क्या कहा था। यह सुनकर शक्र ने द्विजों का सम्मान किया और इन्द्र का पद पाया।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.71.1)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शक्रशम्बरसंवादं तन्निवोध युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | śakraśambarasaṃvādaṃ tannivodha yudhiṣṭhira

इस विषय में भी लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, शक्र और शम्बर का संवाद। हे युधिष्ठिर, उसे सुनो।

श्लोक 2 (13.71.2)

शक्रो ह्यज्ञातरूपेण जटी भूत्वा सुवारुणः । विप्ररूपं समास्थाय प्रश्नं पप्रच्छ शम्बरम् ॥

śakro hyajñātarūpeṇa jaṭī bhūtvā suvāruṇaḥ | viprarūpaṃ samāsthāya praśnaṃ papraccha śambaram

शक्र ने अपना रूप छिपाकर जटाधारी, गहरे लाल वर्ण के ब्राह्मण का रूप धारण किया और शम्बर से प्रश्न किया।

शक्र उवाच

श्लोक 3 (13.71.3)

केन शम्बर वृत्तेन स्वजात्यानधितिष्ठसि । श्रेष्ठं त्वां केन मन्यन्ते तद्वै प्रब्रूहि तत्त्वतः ॥

kena śambara vṛttena svajātyānadhitiṣṭhasi | śreṣṭhaṃ tvāṃ kena manyante tadvai prabrūhi tattvataḥ

हे शम्बर, किस आचरण से तुम अपने जाति-बन्धुओं से ऊपर स्थित हो? वे किस कारण तुम्हें श्रेष्ठ मानते हैं? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ।

शम्बर उवाच

श्लोक 4 (13.71.4)

नासूयामि सदा विप्रान्ब्राह्ममेव च मे मतम् । शास्त्राणि वदतो विप्रान्संमन्यामि यथासुखम् ॥

nāsūyāmi sadā viprānbrāhmameva ca me matam | śāstrāṇi vadato viprānsaṃmanyāmi yathāsukham

मैं ब्राह्मणों से कभी द्वेष नहीं करता, और ब्राह्मणों का मार्ग ही मुझे मान्य है। जब वे शास्त्रों का उपदेश करते हैं, तब मैं प्रसन्न मन से उनका सम्मान करता हूँ।

श्लोक 5 (13.71.5)

श्रुत्वा च नावजानामि नापराध्यामि कर्हिचित् । अभ्यर्च्याभ्यनुपृच्छामि पादौ गृह्णामि धीमताम् ॥

śrutvā ca nāvajānāmi nāparādhyāmi karhicit | abhyarcyābhyanupṛcchāmi pādau gṛhṇāmi dhīmatām

सुनकर मैं उनका अनादर नहीं करता और कभी उनके प्रति अपराध नहीं करता। मैं उनकी पूजा करके उनसे प्रश्न पूछता हूँ और उन बुद्धिमानों के चरण पकड़ता हूँ।

श्लोक 6 (13.71.6)

ते विस्रब्धाः प्रभाषन्ते संयच्छन्ति च मां सदा । प्रमत्तेष्वप्रमत्तोऽस्मि सदा सुप्तेषु जागृमि ॥

te visrabdhāḥ prabhāṣante saṃyacchanti ca māṃ sadā | pramatteṣvapramatto'smi sadā supteṣu jāgṛmi

वे विश्वास के साथ मुझसे बोलते हैं और सदा मुझे संयम में रखते हैं। जब दूसरे असावधान होते हैं, तब मैं सावधान रहता हूँ; जब वे सोते हैं, तब मैं जागता हूँ।

श्लोक 7 (13.71.7)

ते मां शास्त्रपथे युक्तं ब्रह्मण्यमनसूयकम् । समासिञ्चति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥

te māṃ śāstrapathe yuktaṃ brahmaṇyamanasūyakam | samāsiñcati śāstāraḥ kṣaudraṃ madhviva makṣikāḥ

मुझे शास्त्र के मार्ग पर लगा हुआ, ब्राह्मणों का भक्त और ईर्ष्या से रहित देखकर वे गुरुजन मुझमें उसी प्रकार ज्ञान उँडेलते हैं, जैसे मधुमक्खियाँ छत्ते में मधु भरती हैं।

श्लोक 8 (13.71.8)

यच्च भाषन्ति संतुष्टास्तच्च गृह्णाम्यमायया । समाधिमात्मनो नित्यमनुलोममचिन्तयम् ॥

yacca bhāṣanti saṃtuṣṭāstacca gṛhṇāmyamāyayā | samādhimātmano nityamanulomamacintayam

प्रसन्न होकर वे जो कुछ कहते हैं, उसे मैं छल के बिना ग्रहण करता हूँ, और सदा उनके अनुकूल रहकर अपने मन को उन्हीं में स्थिर रखता हूँ।

श्लोक 9 (13.71.9)

सोहं वागग्रमृष्टानां रसानामवलेहकः । स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥

sohaṃ vāgagramṛṣṭānāṃ rasānāmavalehakaḥ | svajātyānadhitiṣṭhāmi nakṣatrāṇīva candramāḥ

इस प्रकार उनकी जिह्वा के अग्रभाग से निकले परिष्कृत रसों का आस्वादन करने वाला मैं अपने जाति-बन्धुओं से ऊपर स्थित हूँ, जैसे नक्षत्रों के ऊपर चन्द्रमा।

श्लोक 10 (13.71.10)

एतत्पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् । यद्ब्राह्मणमुखाच्छास्त्रमिह श्रुत्वा प्रवर्तते ॥

etatpṛthivyāmamṛtametaccakṣuranuttamam | yadbrāhmaṇamukhācchāstramiha śrutvā pravartate

यही पृथ्वी पर अमृत है, यही सर्वोत्तम नेत्र है: वह शास्त्र-ज्ञान जो ब्राह्मण के मुख से सुनकर इस संसार में प्रचलित होता है।

श्लोक 11 (13.71.11)

एतत्कारणमाज्ञाय दृष्ट्वा देवासुरं पुरा । युद्धं पिता मे हृष्टात्मा विस्मितः समपद्यत ॥

etatkāraṇamājñāya dṛṣṭvā devāsuraṃ purā | yuddhaṃ pitā me hṛṣṭātmā vismitaḥ samapadyata

यही कारण जानकर और पूर्वकाल में देवासुर-युद्ध देखकर मेरे पिता हर्षित और विस्मित हुए।

श्लोक 12 (13.71.12)

दृष्ट्वा च ब्राह्मणानां तु महिमानं महात्मनाम् । पर्यपृच्छत्कथममी सिद्धा इति निशाकरम् ॥

dṛṣṭvā ca brāhmaṇānāṃ tu mahimānaṃ mahātmanām | paryapṛcchatkathamamī siddhā iti niśākaram

उन महात्मा ब्राह्मणों की महिमा देखकर उन्होंने चन्द्रमा से पूछा, "ये किस प्रकार सिद्ध हुए हैं?"

सोम उवाच

श्लोक 13 (13.71.13)

ब्राह्मणास्तपसा सर्वे सिध्यन्ते वाग्बलाः सदा । भुजवीर्याश्च राजानो वागस्त्राश्च द्विजातयः ॥

brāhmaṇāstapasā sarve sidhyante vāgbalāḥ sadā | bhujavīryāśca rājāno vāgastrāśca dvijātayaḥ

सब ब्राह्मण तप से सिद्धि पाते हैं, और उनका बल सदा वाणी में रहता है। राजाओं का बल उनकी भुजाओं में होता है; द्विजों के अस्त्र वाणी हैं।

श्लोक 14 (13.71.14)

प्रवसन्वाप्यधीयीत ब्राह्मीर्दुर्वसतीर्वसन् । निर्मन्युरपि निर्वाणो यतिः स्यात्समदर्शनः ॥

pravasanvāpyadhīyīta brāhmīrdurvasatīrvasan | nirmanyurapi nirvāṇo yatiḥ syātsamadarśanaḥ

परदेश में रहते हुए भी, वेदाध्ययन के कठिन आवासों को सहते हुए वह अध्ययन करता रहे। क्रोध से रहित और शान्त होकर वह समदर्शी संयमी बने।

श्लोक 15 (13.71.15)

अपि च ज्ञानसम्पन्नः सर्वान्वेदान्पितुर्गृहे । श्लाघमान इवाधीयाद्ग्राम्य इत्येव तं विदुः ॥

api ca jñānasampannaḥ sarvānvedānpiturgṛhe | ślāghamāna ivādhīyādgrāmya ityeva taṃ viduḥ

जो ज्ञान से सम्पन्न होकर भी पिता के घर में गर्व करते हुए-से सब वेद पढ़ता है, उसे लोग गँवार ही समझते हैं।

श्लोक 16 (13.71.16)

भूमिरेतौ निगिरति सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाप्ययोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥

bhūmiretau nigirati sarpo bilaśayāniva | rājānaṃ cāpyayoddhāraṃ brāhmaṇaṃ cāpravāsinam

इन दोनों को पृथ्वी निगल जाती है, जैसे बिल में सोए प्राणियों को साँप: युद्ध न करने वाले राजा को और परदेश न जाने वाले ब्राह्मण को।

श्लोक 17 (13.71.17)

अभिमानः श्रियं हन्ति पुरुषस्याल्पमेधसः । गर्भेण दुष्यते कन्या गृहवासेन च द्विजः ॥

abhimānaḥ śriyaṃ hanti puruṣasyālpamedhasaḥ | garbheṇa duṣyate kanyā gṛhavāsena ca dvijaḥ

अभिमान अल्पबुद्धि पुरुष की श्री को नष्ट कर देता है। गर्भ से कन्या दूषित होती है और घर में ही बने रहने से द्विज।

श्लोक 18 (13.71.18)

विद्याविदो लोकविदस्तपोदमसमन्विताः । नित्यपूज्याश्च वन्द्याश्च द्विजा लोकद्वयेच्छुभिः ॥

vidyāvido lokavidastapodamasamanvitāḥ | nityapūjyāśca vandyāśca dvijā lokadvayecchubhiḥ

जो ब्राह्मण विद्या और लोक-व्यवहार के जानकार हैं तथा तप और दम से युक्त हैं, उनकी दोनों लोकों का कल्याण चाहने वालों को सदा पूजा और वन्दना करनी चाहिए।

शम्बर उवाच

श्लोक 19 (13.71.19)

इत्येतन्मे पिता श्रुत्वा सोमादद्भुतदर्शनात् । ब्राह्मणान्पूजयामास तथैवाहं महाव्रतान् ॥

ityetanme pitā śrutvā somādadbhutadarśanāt | brāhmaṇānpūjayāmāsa tathaivāhaṃ mahāvratān

अद्भुत स्वरूप वाले सोम से यह सुनकर मेरे पिता ने ब्राह्मणों की पूजा की, और उसी प्रकार मैं भी उन महान् व्रत वाले ब्राह्मणों की पूजा करता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (13.71.20)

श्रुत्वैतद्वचनं शक्रो दानवेन्द्रमुखाच्च्युतम् । द्विजान्सम्पूजयामास महेन्द्रत्वमवाप च ॥

śrutvaitadvacanaṃ śakro dānavendramukhāccyutam | dvijānsampūjayāmāsa mahendratvamavāpa ca

दानवेन्द्र के मुख से निकले इन वचनों को सुनकर शक्र ने द्विजों का सम्मान किया और महेन्द्र का पद प्राप्त किया।

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