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अनुशासन पर्व · अध्याय 80

जिस कन्या का शुल्क दिया जा चुका हो; कन्याविक्रय की निन्दा

युधिष्ठिर पूछते हैं कि जिस कन्या का शुल्क पाया जा चुका हो पर कोई पति न हो, उसके विषय में क्या करना चाहिए। भीष्म सुक्रतु के कथन के साथ उत्तर देते हैं कि शुल्क लेकर कन्या देना आसुर रीति है, और बताते हैं कि पुत्री पुत्र के समान है और उसका पुत्र पिण्डदान करता है। अन्त में वे पुत्र या कन्या को बेचने वालों की निन्दा करते हैं, जो काल नामक नरक में जाते हैं।

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.80.1)

कन्यायां प्राप्तशुल्कायां पतिश्चेन्नास्ति कश्चन । तत्र का प्रतिपत्तिः स्यात्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

kanyāyāṃ prāptaśulkāyāṃ patiścennāsti kaścana | tatra kā pratipattiḥ syāttanme brūhi pitāmaha

यदि कन्या का शुल्क पाया जा चुका हो और उसका कोई पति न हो, तो उस स्थिति में क्या करना चाहिए? हे पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.80.2)

या पुत्रकस्य ऋद्धस्य प्रतिपाल्या तदा भवेत् । अथवा सा हरेच्छुल्कं क्रीता शुल्कप्रदस्य सा ॥

yā putrakasya ṛddhasya pratipālyā tadā bhavet | athavā sā harecchulkaṃ krītā śulkapradasya sā

तब वह समृद्ध पुत्र द्वारा पालन करने योग्य होती है; अथवा खरीदी हुई होने से वह शुल्क देने वाले की ही होती है।

श्लोक 3 (13.80.3)

तस्यार्थेऽपत्यमीहेत येन न्यायेन शक्नुयात् । न तस्मान्मन्त्रवत्कार्यं कश्चित्कुर्वीत किञ्चन ॥

tasyārthe'patyamīheta yena nyāyena śaknuyāt | na tasmānmantravatkāryaṃ kaścitkurvīta kiñcana

जिस उचित उपाय से सम्भव हो, उसके लिए वह सन्तान की चेष्टा करे। इसलिए उसके निमित्त कोई भी मन्त्रयुक्त कर्म न करे।

श्लोक 4 (13.80.4)

स्वयंवृतेन साज्ञप्ता पित्रा वै प्रत्यपद्यत । तत्तस्यान्ये प्रशंसन्ति धर्मज्ञा नेतरे जनाः ॥

svayaṃvṛtena sājñaptā pitrā vai pratyapadyata | tattasyānye praśaṃsanti dharmajñā netare janāḥ

स्वयं वर चुनने वाली, पिता की आज्ञा पाकर भी, उसी को स्वीकार करती रही; इसकी कुछ धर्मज्ञ प्रशंसा करते हैं, दूसरे नहीं।

श्लोक 5 (13.80.5)

एतत्तु नापरे चक्रुरपरे जातु साधवः । साधूनां पुनराचारो गरीयान्धर्मलक्षणः ॥

etattu nāpare cakrurapare jātu sādhavaḥ | sādhūnāṃ punarācāro garīyāndharmalakṣaṇaḥ

दूसरे सज्जनों ने भी कभी ऐसा नहीं किया; फिर भी सज्जनों का आचार धर्म का अधिक भारी लक्षण है।

श्लोक 6 (13.80.6)

अस्मिन्नेव प्रकारे तु सुक्रतुर्वाक्यमब्रवीत् । नप्ता विदेहराजस्य जनकस्य महात्मनः ॥

asminneva prakāre tu sukraturvākyamabravīt | naptā videharājasya janakasya mahātmanaḥ

इसी विषय में महात्मा विदेहराज जनक के नाती सुक्रतु ने यह वचन कहा।

श्लोक 7 (13.80.7)

असदाचरिते मार्गे कथं स्यादनुकीर्तनम् । अनुप्रश्नः संशयो वा सतामेवमुपालभेत् ॥

asadācarite mārge kathaṃ syādanukīrtanam | anupraśnaḥ saṃśayo vā satāmevamupālabhet

जिस मार्ग पर अशुभ आचरण किया गया हो, उसकी स्तुति कैसे हो सकती है? उसके विषय में प्रश्न या संशय करना सज्जनों के लिए निन्दा-योग्य होता है।

श्लोक 8 (13.80.8)

असदेव हि धर्मस्य प्रदानं धर्म आसुरः । नानुशुश्रुम जात्वेनामिमां पूर्वेषु कर्मसु ॥

asadeva hi dharmasya pradānaṃ dharma āsuraḥ | nānuśuśruma jātvenāmimāṃ pūrveṣu karmasu

धर्म के नाम पर ऐसा दान अशोभन ही है; वह आसुर धर्म है। प्राचीन कर्मों में हमने कभी ऐसा नहीं सुना।

श्लोक 9 (13.80.9)

भार्यापत्योर्हि सम्बन्धः स्त्रीपुंसोस्तुल्य एव तु । रतिः साधारणो धर्म इति चाह स पार्थिवः ॥

bhāryāpatyorhi sambandhaḥ strīpuṃsostulya eva tu | ratiḥ sādhāraṇo dharma iti cāha sa pārthivaḥ

पति-पत्नी का सम्बन्ध स्त्री और पुरुष के लिए समान है; रति दोनों का साझा धर्म है, ऐसा उस राजा ने कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (13.80.10)

अथ केन प्रमाणेन पुंसामादीयते धनम् । पुत्रवद्धि पितुस्तस्य कन्या भवितुमर्हति ॥

atha kena pramāṇena puṃsāmādīyate dhanam | putravaddhi pitustasya kanyā bhavitumarhati

तो फिर किस प्रमाण से पुरुष धन ग्रहण करते हैं? पिता के लिए कन्या पुत्र के समान होनी चाहिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 11 (13.80.11)

यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा । तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥

yathaivātmā tathā putraḥ putreṇa duhitā samā | tasyāmātmani tiṣṭhantyāṃ kathamanyo dhanaṃ haret

जैसा अपना आत्मा है, वैसा ही पुत्र है; और पुत्र के समान पुत्री है। जब वह आत्मा-रूप में विद्यमान है, तो दूसरा धन कैसे ले सकता है?

श्लोक 12 (13.80.12)

मातुश्च यौतकं यत्स्यात्कुमारीभाग एव सः । दौहित्र एव तद्रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् ॥

mātuśca yautakaṃ yatsyātkumārībhāga eva saḥ | dauhitra eva tadrikthamaputrasya piturharet

माता का जो यौतक (विवाह में मिला धन) हो, वह कुमारी का ही भाग है; और पुत्रहीन पिता का वह धन दौहित्र ही ले।

श्लोक 13 (13.80.13)

ददाति हि स पिण्डान्वै पितुर्मातामहस्य च । पुत्रदौहित्रयोरेव विशेषो नास्ति धर्मतः ॥

dadāti hi sa piṇḍānvai piturmātāmahasya ca | putradauhitrayoreva viśeṣo nāsti dharmataḥ

क्योंकि वह अपने पिता और मातामह को पिण्ड देता है; धर्म की दृष्टि से पुत्र और दौहित्र में कोई भेद नहीं है।

श्लोक 14 (13.80.14)

अन्यत्र जामया सार्धं प्रजानां पुत्र ईहते । दुहिताऽन्यत्र जातेन पुत्रेणापि विशिष्यते ॥

anyatra jāmayā sārdhaṃ prajānāṃ putra īhate | duhitā'nyatra jātena putreṇāpi viśiṣyate

अन्यत्र पुत्र अपनी कन्या के साथ सन्तान की चेष्टा करता है; किन्तु पुत्री, अन्यत्र उत्पन्न पुत्र के द्वारा, पुत्र से भी बढ़ जाती है।

श्लोक 15 (13.80.15)

दौहित्रकेण धर्मेण तत्र पश्यामि कारणम् । विक्रीतासु हि ये पुत्रा भवन्ति पितुरेव ते ॥

dauhitrakeṇa dharmeṇa tatra paśyāmi kāraṇam | vikrītāsu hi ye putrā bhavanti pitureva te

दौहित्र वाले धर्म में मैं इसका कारण देखता हूँ: बेची गई कन्याओं से जो पुत्र उत्पन्न होते हैं, वे केवल उनके खरीदने वाले पिता के होते हैं।

श्लोक 16 (13.80.16)

असूयवस्त्वधर्मिष्ठाः परस्वादायिनः शठाः । आसुरादधिसम्भूता धर्माद्विषमवृत्तयः ॥

asūyavastvadharmiṣṭhāḥ parasvādāyinaḥ śaṭhāḥ | āsurādadhisambhūtā dharmādviṣamavṛttayaḥ

वे ईर्ष्यालु, अधर्मी, दूसरों का धन हड़पने वाले और शठ होते हैं; आसुर विवाह से उत्पन्न होकर धर्म से टेढ़े आचरण वाले होते हैं।

श्लोक 17 (13.80.17)

अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । धर्मज्ञा धर्मशास्त्रेषु निबद्धा धर्मसेतुषु ॥

atra gāthā yamodgītāḥ kīrtayanti purāvidaḥ | dharmajñā dharmaśāstreṣu nibaddhā dharmasetuṣu

इस विषय में पुरानी बातों के जानकार यम के गाए हुए श्लोक सुनाते हैं, जिन्हें धर्मज्ञों ने धर्म के सेतु-रूप धर्मशास्त्रों में निबद्ध किया है।

श्लोक 18 (13.80.18)

यो मनुष्यः स्वकं पुत्रं विक्रीय धनमिच्छति । कन्यां वा जीवितार्थाय यः शुल्केन प्रयच्छति ॥

yo manuṣyaḥ svakaṃ putraṃ vikrīya dhanamicchati | kanyāṃ vā jīvitārthāya yaḥ śulkena prayacchati

जो मनुष्य अपने पुत्र को बेचकर धन चाहता है, अथवा जीविका के लिए शुल्क लेकर कन्या देता है,

श्लोक 19 (13.80.19)

सप्तावरे महाघोरे निरये कालसाह्वये । स्वेदं मूत्रं पुरीषं च तस्मिन्मूढः समश्नुते ॥

saptāvare mahāghore niraye kālasāhvaye | svedaṃ mūtraṃ purīṣaṃ ca tasminmūḍhaḥ samaśnute

वह मूढ़ सात स्तर नीचे कालनामक महाघोर नरक में पसीना, मूत्र और मल खाता है।

श्लोक 20 (13.80.20)

आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मृषैव तत् । अल्पो वा बहु वा राजन्विक्रयस्तावदेव सः ॥

ārṣe gomithunaṃ śulkaṃ kecidāhurmṛṣaiva tat | alpo vā bahu vā rājanvikrayastāvadeva saḥ

कुछ कहते हैं कि आर्ष विवाह में गाय-बैल का जोड़ा शुल्क है; वह भी झूठ ही है। हे राजन्, थोड़ा हो या बहुत, वह बिक्री ही है।

श्लोक 21 (13.80.21)

यद्यप्याचरितः कैश्चिन्नैष धर्मः सनातनः । अन्येषामपि दृश्यन्ते लोभतः सम्प्रवृत्तयः ॥

yadyapyācaritaḥ kaiścinnaiṣa dharmaḥ sanātanaḥ | anyeṣāmapi dṛśyante lobhataḥ sampravṛttayaḥ

यद्यपि कुछ लोगों ने इसका आचरण किया है, यह सनातन धर्म नहीं है; दूसरों में भी लोभ से ऐसी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं।

श्लोक 22 (13.80.22)

वश्यां कुमारीं बलतो ये तां समुपभुञ्जते । एते पापस्य कर्तारस्तमस्यन्धे च शेरते ॥

vaśyāṃ kumārīṃ balato ye tāṃ samupabhuñjate | ete pāpasya kartārastamasyandhe ca śerate

जो अपने वश में आई कुमारी का बलपूर्वक उपभोग करते हैं, वे पाप करने वाले हैं और घने अन्धकार में सोते हैं।

श्लोक 23 (13.80.23)

अन्योप्यथ न विक्रेयो मनुष्यः किं पुनः प्रजाः । अधर्ममूलैर्हि धनैस्तैर्न धर्मोऽथ कश्चन ॥

anyopyatha na vikreyo manuṣyaḥ kiṃ punaḥ prajāḥ | adharmamūlairhi dhanaistairna dharmo'tha kaścana

किसी और मनुष्य को भी नहीं बेचना चाहिए, फिर अपनी सन्तान की तो बात ही क्या? अधर्म जिनकी जड़ है, ऐसे धन से कोई धर्म नहीं होता।

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